Adhyaya 87
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Adhyaya 87

अध्याय ८७: कृष्णस्य हस्तिनापुरप्रवेशः (Krishna’s Entry into Hastināpura and Court Reception)

Upa-parva: Kṛṣṇāgamana (Hastināpura-praveśa) Episode

Vaiśaṃpāyana narrates Kṛṣṇa’s morning rites and departure toward the city after receiving brahminical leave. As he approaches Hastināpura, the Dhārtarāṣṭra elders—Bhīṣma, Droṇa, Kṛpa, and others—come out adorned to receive him, with Duryodhana conspicuously absent. The populace gathers in great numbers, crowding the royal road; houses appear filled with onlookers, and even Kṛṣṇa’s swift horses are slowed by the dense reception. Kṛṣṇa enters Dhṛtarāṣṭra’s palace, passes through successive inner enclosures, and is formally greeted by the king, who rises with Bhīṣma and Droṇa; other nobles also stand in honor. Kṛṣṇa offers appropriate salutations in age-graded order, is seated on a golden throne by royal command, and receives customary guest-offerings (madhuparka, water) from the king’s priests. After completing hospitality and formalities, Kṛṣṇa takes leave and proceeds, with due protocol, to Vidura’s residence, where Vidura honors him and inquires about the welfare and activities of the Pāṇḍavas; Kṛṣṇa reports their circumstances in detail.

Chapter Arc: कौरव-सभा में दुर्योधन श्रीकृष्ण के विषय में अपनी नीति-भरी पर भीतर से कपटपूर्ण धारणा प्रकट करता है—उन्हें सत्कार-धन देकर ‘वश’ करने की कल्पना और साथ ही उनके प्रभाव से भय। → सभा में यह तर्क उभरता है कि केशव न तो उपहारों से खरीदे जा सकते हैं, न अवमान से विचलित; वे त्रैलोक्य-पूज्य हैं और जो संकल्प कर लें, उसे कोई उपाय बदल नहीं सकता। दुर्योधन की कुमन्त्रणा और हठ के सामने यह सत्य और तीखा हो उठता है। → भीष्म पितामह दुर्योधन को ‘धर्मत्यागी, नृशंस, दुर्मति’ कहकर उसकी अनर्थयुक्त वाणी सुनने से इंकार करते हैं और क्रोध से भरकर सभा से उठ खड़े होते हैं। → भीष्म का उठकर चले जाना सभा पर नैतिक धिक्कार की मुहर लगा देता है—कौरव-पक्ष के भीतर ही धर्म-समर्थन और अधर्म-हठ का विभाजन स्पष्ट हो जाता है। → भीष्म के प्रस्थान के बाद दुर्योधन की हठधर्मिता के सामने अब कौन टिकेगा, और श्रीकृष्ण के आगामी वचन-प्रयास को कौरव-सभा कैसे झेलेगी—यह तनाव अगले प्रसंग में खिंचता है।

Shlokas

Verse 1

ऑपन-आ का बछ। आर: 2 अष्टाशीतितमो<् ध्याय: दुर्योधनका श्रीकृष्णके विषयमें अपने विचार कहना एवं उसकी कुमन्त्रणासे कुपित हो भीष्मजीका सभासे उठ जाना दुर्योधन उवाच यदाह विदुर: कृष्णे सर्व तत्‌ सत्यमच्युते । अनुरक्तो हासंहार्य: पार्थान्‌ प्रति जनार्दन:,दुर्योधन बोला--पिताजी! अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले श्रीकृष्णके सम्बन्धमें विदुरजी जो कुछ कहते हैं, वह सब कुछ ठीक है। जनार्दन श्रीकृष्णका कुन्तीके पुत्रोंके प्रति अटूट अनुराग है; अतः उन्हें उनकी ओरसे फोड़ा नहीं जा सकता

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ପିତାଜୀ! ଅଚ୍ୟୁତ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ବିଷୟରେ ବିଦୁର ଯାହା କହିଛନ୍ତି, ସେସବୁ ସତ୍ୟ। ଜନାର୍ଦନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କର ପାର୍ଥମାନଙ୍କ (କୁନ୍ତୀପୁତ୍ରମାନଙ୍କ) ପ୍ରତି ଅନୁରାଗ ଅଟୁଟ; ତେଣୁ ତାଙ୍କୁ ସେମାନଙ୍କ ପକ୍ଷରୁ ଅଲଗା କରାଯାଇପାରିବ ନାହିଁ।

Verse 2

यत्‌ तत्‌ सत्कारसंयुक्त देयं वसु जनार्दने | अनेकरूपं राजेन्द्र न तद्‌ देयं कदाचन,राजेन्द्र! आप जो जनार्दनको सत्कारपूर्वक बहुत-सा धन-रत्न भेंट करना चाहते हैं, वह कदापि उन्हें न दें

ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ଜନାର୍ଦନଙ୍କୁ ସତ୍କାରସହିତ ଅନେକ ରୂପରେ ଯେ ଧନ-ରତ୍ନ ଦେବାକୁ ଭାବୁଛନ୍ତି, ସେହି ଧନ ତାଙ୍କୁ କେବେବି ଦିଆଯିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ।

Verse 3

देश: कालस्तथायुक्तो न हि नाहति केशव: । मंस्यत्यधोक्षजो राजन्‌ भयादर्चति मामिति,मैं इसलिये नहीं कहता कि श्रीकृष्ण उन वस्तुओंके अधिकारी नहीं हैं; अपितु इस दृष्टिसे मना कर रहा हूँ कि वर्तमान देश-काल इस योग्य नहीं है कि उनका विशेष सत्कार किया जाय। राजन्‌! इस समय तो श्रीकृष्ण यही समझेंगे कि यह डरके मारे मेरी पूजा कर रहा है

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ଦେଶ ଓ କାଳ ଏବେ ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ଭାବେ ମିଳିନାହିଁ; କେଶବ ଅଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ। କିନ୍ତୁ ବର୍ତ୍ତମାନ ପରିସ୍ଥିତି ତାଙ୍କୁ ବିଶେଷ ସତ୍କାର କରିବାକୁ ଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ—ଏହି ଦୃଷ୍ଟିରୁ ମୁଁ ମନା କରୁଛି। ରାଜନ! ଅଧୋକ୍ଷଜ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ଭାବିବେ—‘ଭୟରୁ ଏହା ମୋ ପୂଜା କରୁଛି।’

Verse 4

अवमान श्र यत्र स्यात्‌ क्षत्रियस्य विशाम्पते | न तत्‌ कुर्याद्‌ बुध: कार्यमिति मे निश्चिता मति:,प्रजानाथ! जहाँ क्षत्रियका अपमान होता हो, वहाँ समझदार क्षत्रियको वैसा कार्य नहीं करना चाहिये। यह मेरा निश्चित विचार है

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ପ୍ରଜାନାଥ! ଯେଉଁଠାରେ କ୍ଷତ୍ରିୟଙ୍କ ଅପମାନ ହୁଏ, ସେଠାରେ ବୁଦ୍ଧିମାନ କ୍ଷତ୍ରିୟ ଏମିତି କାର୍ଯ୍ୟ କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ। ଏହି ମୋର ନିଶ୍ଚିତ ମତ।

Verse 5

स हि पूज्यतमो लोके कृष्ण: पृुथुललोचन: । त्रयाणामपि लोकानां विदितं मम सर्वथा,विशाल नेत्रोंवाले श्रीकृष्ण इस लोकमें ही नहीं, तीनों लोकोंमें सबसे श्रेष्ठ होनेके कारण परम पूजनीय पुरुष हैं, यह बात मुझे सब प्रकारसे विदित है

ବିଶାଳନେତ୍ର ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଏହି ଲୋକରେ ମାତ୍ର ନୁହେଁ—ତିନି ଲୋକରେ ମଧ୍ୟ ସର୍ବଶ୍ରେଷ୍ଠ ଓ ପରମ ପୂଜ୍ୟ; ଏହା ମୋତେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ଜଣା।

Verse 6

न तु तस्मै प्रदेयं स्यात्‌ तथा कार्यगतिः प्रभो | विग्रह: समुपारब्धो न हि शाम्यत्यविग्रहात्‌,प्रभो! तथापि मेरा मत है कि इस समय उन्हें कुछ नहीं देना चाहिये; क्योंकि ऐसी ही कार्यप्रणाली प्राप्त है। जब कलह आरम्भ हो गया है, तब अतिथिसत्कारद्वारा प्रेम दिखानेमात्रसे उसकी शान्ति नहीं हो सकती

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ପ୍ରଭୋ! ତଥାପି ମୋର ମତ ଯେ ଏହି ସମୟରେ ତାଙ୍କୁ କିଛି ଦେବା ଉଚିତ ନୁହେଁ; କାରଣ ଆମ କାର୍ଯ୍ୟସାଧନ ପାଇଁ ଏହି ନୀତି ଯଥାଯୋଗ୍ୟ। ଯେତେବେଳେ ବିଗ୍ରହ ଆରମ୍ଭ ହୋଇଯାଇଛି, ସେତେବେଳେ କେବଳ ଅତିଥିସତ୍କାର କିମ୍ବା ବାହ୍ୟ ମୈତ୍ରୀ-ପ୍ରଦର୍ଶନରେ ତାହା ଶାନ୍ତ ହୁଏ ନାହିଁ।

Verse 7

वैशम्पायन उवाच तस्य तद्‌ वचन श्रुत्वा भीष्म: कुरुपितामह: । वैचित्रवीर्य राजानमिदं वचनमब्रवीत्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! दुर्योधनकी यह बात सुनकर कुरुकुलके वृद्ध पितामह भीष्म विचित्र-वीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रसे इस प्रकार बोले--

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ତାହାର ସେଇ କଥା ଶୁଣି କୁରୁବଂଶର ପିତାମହ ଭୀଷ୍ମ, ବିଚିତ୍ରବୀର୍ଯ୍ୟ-ପୁତ୍ର ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ ଏହିପରି କହିଲେ।

Verse 8

सत्कृतो5सत्कृतो वापि न क्रुद्धयेत जनार्दन: । नालमेनमवज्ञातुं नावज्ञेयो हि केशव:,“राजन! श्रीकृष्णका कोई सत्कार करे या न करे, इससे वे कुपित नहीं होंगे, परंतु वे अवहेलनाके योग्य कदापि नहीं हैं; अतः कोई भी उनका अपमान या अवहेलना नहीं कर सकता

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ସତ୍କାର କରାଯାଉ କି ନ କରାଯାଉ, ଜନାର୍ଦନ କ୍ରୋଧିତ ହୁଅନ୍ତି ନାହିଁ; କିନ୍ତୁ କେଶବ କେବେ ଅବଜ୍ଞାର ଯୋଗ୍ୟ ନୁହନ୍ତି—ତାଙ୍କୁ ତୁଚ୍ଛ କରିବା କାହା ପାଇଁ ଶୋଭା ନୁହେଁ।

Verse 9

यत्‌ तु कार्य महाबाहो मनसा कार्यतां गतम्‌ | सर्वोपायैर्न तच्छक्यं केनचित्‌ कर्तुमन्यथा,“महाबाहो! श्रीकृष्ण जिस कार्यको करनेकी बात अपने मनमें ठान लेते हैं, उसे कोई सारे उपाय करके भी उलट नहीं सकता

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ମହାବାହୋ! ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଯେ କାର୍ଯ୍ୟକୁ ମନରେ ଦୃଢ଼ ଭାବେ କରିବାକୁ ନିଶ୍ଚୟ କରନ୍ତି, ତାହାକୁ କେହି—ସମସ୍ତ ଉପାୟ ଲଗାଇଲେ ମଧ୍ୟ—ଅନ୍ୟଥା କରିପାରେ ନାହିଁ।

Verse 10

स यद्‌ ब्रूयान्महाबाहुस्तत्‌ कार्यमविशड्धकया । वासुदेवेन तीर्थेन क्षिप्रं संशाम्य पाण्डवै:,“अतः महाबाहु श्रीकृष्ण जो कुछ कहें, उसे निःशंक होकर करना चाहिये। वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको मध्यस्थ बनाकर तुम शीघ्र ही पाण्डवोंके साथ संधि कर लो

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେ ମହାବାହୁ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଯାହା କହନ୍ତି, ତାହାକୁ ନିର୍ଭୟ ଓ ନିଃଶଙ୍କ ଭାବେ କରିବା ଉଚିତ। ବାସୁଦେବଙ୍କୁ ପବିତ୍ର ମଧ୍ୟସ୍ଥ ଭାବେ ଗ୍ରହଣ କରି, ତୁମେ ଶୀଘ୍ର ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ସନ୍ଧି କର।

Verse 11

धर्म्यमर्थ्य च धर्मात्मा ध्रुवं वक्ता जनार्दन: । तस्मिन्‌ वाच्या: प्रिया वाचो भवता बान्धवै: सह,“धर्मात्मा भगवान्‌ श्रीकृष्ण जो कुछ कहेंगे, वह निश्चय ही धर्म और अर्थके अनुकूल होगा। अतः तुम्हें अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ उनसे प्रिय वचन ही बोलना चाहिये”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଧର୍ମାତ୍ମା ଜନାର୍ଦନ ଯାହା କହିବେ, ତାହା ନିଶ୍ଚୟ ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥ—ଦୁହିଁଙ୍କୁ ଅନୁକୂଳ ହେବ। ତେଣୁ ତୁମେ ନିଜ ବନ୍ଧୁ-ବାନ୍ଧବମାନଙ୍କ ସହ ତାଙ୍କୁ ପ୍ରିୟ ଓ ସମ୍ମାନଜନକ ବଚନ ହିଁ କହିବା ଉଚିତ।

Verse 12

दुर्योधन उवाच न पर्यायो$स्ति यद्‌ राजन्‌ श्रियं निष्केवलामहम्‌ | तैः सहेमामुपाश्नीयां यावज्जीवं पितामह,दुर्योधन बोला--पितामह! नरेश्वर! अब इस बातकी कोई सम्भावना नहीं है कि मैं जीवनभर पाण्डवोंके साथ मिलकर इस सारी सम्पत्तिका उपभोग करूँ

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ହେ ପିତାମହ! ହେ ରାଜନ୍! ଏହାର କୌଣସି ସମ୍ଭାବନା ନାହିଁ ଯେ ମୁଁ ଜୀବନଭରି ସେମାନଙ୍କ ସହ ଏହି ଅଖଣ୍ଡ ରାଜଶ୍ରୀକୁ ଏକାସାଥି ଭୋଗ କରିବି।

Verse 13

इदं तु सुमहत्‌ कार्य शृणु मे यत्‌ समर्थितम्‌ । परायणं पाण्डवानां नियच्छामि जनार्दनम्‌,इस समय मैंने जो यह महान्‌ कार्य करनेका निश्चय किया है, उसे सुनिये। पाण्डवोंके सबसे बड़े सहारे श्रीकृष्णको यहाँ आनेपर मैं कैद कर लूँगा

ଏବେ ମୁଁ ଯେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ମହାନ କାର୍ଯ୍ୟ କରିବାକୁ ନିଶ୍ଚୟ କରିଛି, ତାହା ଶୁଣ। ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କର ପ୍ରଧାନ ଆଶ୍ରୟ ଜନାର୍ଦନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଏଠାକୁ ଆସିଲେ, ମୁଁ ତାଙ୍କୁ ରୋକି ବନ୍ଦୀ କରିଦେବି।

Verse 14

तस्मिन्‌ बद्धे भविष्यन्ति वृष्णय: पृथिवी तथा । पाण्डवाश्ष विधेया मे स च प्रातरिहैष्पति

ସେ ବନ୍ଧା ହେଲେ ବୃଷ୍ଣିମାନେ ଓ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀ ମୋର ଅଧୀନ ହେବ; ପାଣ୍ଡବମାନେ ମଧ୍ୟ ମୋ ଆଜ୍ଞାକୁ ମାନିବାକୁ ବାଧ୍ୟ ହେବେ। ଏବଂ ସେ କାଲି ପ୍ରଭାତେ ଏଠାକୁ ଆସିବ।

Verse 15

उनके कैद हो जानेपर समस्त यदुवंशी, इस भूमण्डलका राज्य तथा पाण्डव भी मेरी आज्ञाके अधीन हो जायूँगे। श्रीकृष्ण कल सबेरे यहाँ आ ही जायँगे ।। अत्रोपायान्‌ यथा सम्यड् न बुद्धयेत जनार्दन: । न चापायो भवेत्‌ कक्ित्‌ तद्‌ भवान्‌ प्रब्रवीतु मे

ସେ କାରାଗାରରେ ପଡ଼ିଲେ ସମସ୍ତ ଯାଦବବଂଶ, ଏହି ଭୂମଣ୍ଡଳ ଓ ପାଣ୍ଡବମାନେ—ସବୁ ମୋ ଆଜ୍ଞାଧୀନ ହେବେ; ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କାଲି ପ୍ରଭାତେ ଏଠାକୁ ନିଶ୍ଚୟ ଆସିବେ। ତେଣୁ ଏମିତି ଉପାୟ ମୋତେ କହନ୍ତୁ, ଯାହାଦ୍ୱାରା ଜନାର୍ଦନ ଆମ ଏହି ଯୁକ୍ତିକୁ ସ୍ପଷ୍ଟ ଭାବେ ବୁଝିପାରିବେ ନାହିଁ ଏବଂ ଆମ ପାଇଁ କୌଣସି ବିପଦ ମଧ୍ୟ ନ ହେଉ।

Verse 16

अतः इस विषयमें जो अच्छे उपाय हों, जिनसे श्रीकृष्णको इन बातोंका पता न लगे और मेरे इस मन्तव्यमें कोई विघ्न न पड़ सके, उन्हें आप मुझे बताइये ।। वैशम्पायन उवाच तस्य तद्‌ वचन श्रुत्वा घोरं कृष्णाभिसंहितम्‌ । धृतराष्ट्र: सहामात्यो व्यथितो विमनाभवत्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! श्रीकृष्णसे छल करनेके विषयमें दुर्योधनकी वह भयंकर बात सुनकर धुृतराष्ट्र अपने मन्त्रियोंक साथ बहुत दुःखी और उदास हो गये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଠକିବାକୁ ଲକ୍ଷ୍ୟ କରି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଥିବା ସେଇ ଭୟଙ୍କର କଥା ଶୁଣି, ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହିତ ବିକଳ ହୋଇ ଅତ୍ୟନ୍ତ ନିରାଶ ହେଲେ।

Verse 17

ततो दुर्योधनमिदं धृतराष्ट्रोडब्रवीद्‌ वच: । मैवं वोच: प्रजापाल नैष धर्म: सनातन:,तदनन्तर धृतराष्ट्रने दुर्योधनसे कहा--'प्रजापालक दुर्योधन! तुम ऐसी बात मुँहसे न निकालो। यह सनातन धर्म नहीं है

ତାପରେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ କହିଲେ—“ପ୍ରଜାପାଳକ! ଏପରି କଥା ମୁଖରୁ କହନି; ଏହା ସନାତନ ଧର୍ମ ନୁହେଁ।”

Verse 18

दूतश्न हि हृषीकेश: सम्बन्धी च प्रियश्न नः । अपाप: कौरवेयेषु स कथं बन्धमर्हति,“श्रीकृष्ण इस समय दूत बनकर आ रहे हैं। वे हमारे प्रिय और सम्बन्धी भी हैं तथा उन्होंने कौरवोंका कोई अपराध भी नहीं किया है। ऐसी दशामें वे कैद करनेके योग्य कैसे हो सकते हैं?”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ହୃଷୀକେଶ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ଏବେ ଦୂତ ହୋଇ ଆସୁଛନ୍ତି। ସେ ଆମର ପ୍ରିୟ ଓ ସମ୍ବନ୍ଧୀ ମଧ୍ୟ; କୁରୁପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ସେ କୌଣସି ଅପରାଧ କରିନାହାନ୍ତି। ଏପରି ସ୍ଥିତିରେ ତାଙ୍କୁ କିପରି ବାନ୍ଧି କାରାବନ୍ଦ କରାଯିବ?”

Verse 19

भीष्म उवाच परीतस्तव पुत्रो5यं धृतराष्ट्र सुमन्दधी: । वृणोत्यनर्थ नैवार्थ याच्यमान: सुहज्जनै:,यह सुनकर भीष्मजीने कहा--धृतराष्ट्र! तुम्हारा यह मन्दबुद्धि पुत्र कालके वशमें हो गया है। यह अपने हितैषी सुहृदोंके कहने-समझानेपर भी अनर्थको ही अपना रहा है; अर्थको नहीं

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ— “ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର! ତୁମର ଏହି ଅତ୍ୟନ୍ତ ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି ପୁତ୍ର କାଳର ବଶରେ ପଡ଼ିଛି। ହିତେଚ୍ଛୁ ସୁହୃଦମାନେ ଯେତେ ବୁଝାଇଲେ ମଧ୍ୟ, ସେ ହିତକୁ ନୁହେଁ—ଅନର୍ଥକୁ ହିଁ ବାଛୁଛି।”

Verse 20

इममुत्पथि वर्तन्तं पापं पापानुबन्धिनम्‌ । वाक्यानि सुद्ददां हित्वा त्वमप्यस्थानुवर्तसे,तुम भी सगे-सम्बन्धियोंकी बातें न मानकर कुमार्गपर चलनेवाले इस पापासक्त पापात्माका ही अनुसरण करते हो

“ଏହି ପାପୀ କୁପଥରେ ଚାଲି ପାପର ପଛେ ପାପ ଯୋଗୁଛି। ଦୃଢ଼ ଓ ହିତକର ବଚନ ଛାଡ଼ି ତୁମେ ମଧ୍ୟ ଏହି ଅନୁଚିତ ପଥକୁ ଅନୁସରଣ କରୁଛ।”

Verse 21

््च्खच्-ञॉ्-आऑखचखि ्ज््ज््स्य््ििः कि 2 ् कृष्णमक्लिष्टकर्माणमासाद्यायं सुदुर्मति: । तव पुत्र: सहामात्य: क्षणेन न भविष्यति,अनायास ही महान्‌ कर्म करनेवाले श्रीकृष्णसे भिड़कर तुम्हारा यह दुर्बुद्धि पुत्र अपने मन्त्रियोंसहित क्षणभरमें नष्ट हो जायगा

“ଅକ୍ଲିଷ୍ଟକର୍ମା—ଅନାୟାସେ ମହାକର୍ମ ସାଧନକାରୀ—ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ସମ୍ମୁଖୀନ କଲେ, ତୁମର ଏହି ଦୁର୍ମତି ପୁତ୍ର ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହିତ କ୍ଷଣମାତ୍ରେ ନଶିଯିବ।”

Verse 22

पापस्यास्य नृशंसस्य त्यक्तथधर्मस्य दुर्मते: । नोत्सहेडनर्थसंयुक्ता: श्रोतुं वाच: कथंचन,इसने धर्मका सर्वथा त्याग कर दिया है। अब मैं इस दुर्बुद्धि, पापी एवं क्रूर दुर्योधनकी अनर्थभरी बातें किसी प्रकार भी नहीं सुनना चाहता

“ଏହି ପାପୀ, ନିର୍ଦୟ, ଦୁର୍ମତି ଧର୍ମକୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ତ୍ୟାଗ କରିଛି। ଅନର୍ଥରେ ଯୁକ୍ତ ତାହାର କଥା ମୁଁ କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ଶୁଣିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରେନି।”

Verse 23

इत्युक्त्वा भरतश्रेष्ठो वृद्ध: परममन्युमान्‌ । उत्थाय तस्मात्‌ प्रातिष्ठद्‌ भीष्म: सत्यपराक्रम:,ऐसा कहकर भरतश्रेष्ठ सत्यपराक्रमी वृद्ध पितामह भीष्म अत्यन्त कुपित हो उस सभाभवनसे उठकर चले गये

ଏହିପରି କହି, ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ ସତ୍ୟପରାକ୍ରମୀ ବୃଦ୍ଧ ପିତାମହ ଭୀଷ୍ମ ପରମ କ୍ରୋଧିତ ହୋଇ ସଭାଭବନରୁ ଉଠି ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।

Verse 88

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि दुर्योधनवाक्ये अष्टाशीतितमो<ध्याय:

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବର ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନବାକ୍ୟ ପ୍ରସଙ୍ଗର ଅଷ୍ଟାଶୀତିତମ (୮୮ତମ) ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ।

Frequently Asked Questions

The chapter presents a legitimacy dilemma: whether outward adherence to dharmic hospitality and diplomatic protocol can coexist with internal political resistance to reconciliation, indicated by the mixed court posture and Duryodhana’s absence.

It emphasizes that dharma is enacted through procedures—ritual, etiquette, and truthful inquiry—yet the ethical value of such procedures depends on intent; public honor without corresponding policy sincerity remains an unstable foundation for peace.

No explicit phalaśruti is stated here; the chapter functions as narrative documentation of diplomatic protocol and social response, supplying contextual evidence for subsequent counsel and negotiations.