Adhyaya 83
Udyoga ParvaAdhyaya 8331 Versesयुद्ध आरम्भ नहीं; पर निमित्तों से संघर्ष की अनिवार्यता और निकटता का संकेत।

Adhyaya 83

कुरुसभायां केशवागमन-सत्कारविधानम् / Preparations to Honor Keśava at the Kuru Court

Upa-parva: Kṛṣṇāgamana / Dūta-satkāra (Reception of Keśava) Episode

Vaiśaṃpāyana reports that, upon learning from messengers of Madhusūdana’s approach, Dhṛtarāṣṭra addresses Bhīṣma (and also Droṇa, Sañjaya, Vidura, and Duryodhana with ministers). He notes widespread public discussion and treats Kṛṣṇa’s arrival as an extraordinary event. Dhṛtarāṣṭra frames honoring Kṛṣṇa as a normative requirement (sanātana-dharma) and as prudent statecraft: if Kṛṣṇa is satisfied, the Kurus may secure broader political aims among kings. He orders immediate arrangements—assembly halls and route preparations furnished with desired amenities—and asks Bhīṣma how best to ensure Kṛṣṇa’s goodwill. The elders assent. Duryodhana then oversees the creation of multiple ornate halls in pleasing locales, stocked with seats, perfumes, ornaments, fine garments, food and drink, and garlands; he especially commissions a richly appointed residence-hall at Vṛkasthala and reports completion to Dhṛtarāṣṭra. Keśava proceeds to the Kuru residence without inspecting these displays, underscoring the limits of material spectacle in diplomatic ethics.

Chapter Arc: राजसभा की सांसें थमी हैं—दूत-धर्म का भार उठाए मधुसूदन श्रीकृष्ण शांति-प्रयास हेतु प्रस्थान की तैयारी करते हैं, और मार्ग स्वयं शुभाशुभ संकेतों से बोल उठता है। → जनमेजय का प्रश्न कथा को धार देता है—कृष्ण किस प्रकार चले, और जाते समय कौन-कौन से निमित्त प्रकट हुए? वैशम्पायन मार्ग-वर्णन करते हैं: रम्य ग्राम, पशुधन, विविध राष्ट्र, और साथ ही असामान्य हलचल—अग्नियों का भड़कना, पृथ्वी का कंपना, जलाशयों का छलकना, आकाश में अदृश्य-सी आकृतियों का दीखना। ये संकेत बताते हैं कि शांति-यात्रा के नीचे युद्ध का ज्वार उफन रहा है। → अशुभ निमित्तों का चरम—‘प्राज्वलन्नग्नयो… पृथिवी समकम्पत’ और ‘महाउच्छब्द’ के साथ आकाश में मनुष्याकार-सा दृश्य; प्रकृति और लोक-मन दोनों मानो आने वाले महासंघर्ष की घोषणा कर देते हैं। → कृष्ण वृकस्थल में रथ से उतरकर विधिपूर्वक शौच-संध्या करते हैं, रथमोचन का आदेश देते हैं, ब्राह्मणों को सुस्वादु भोजन कराते हैं और उनके साथ स्वयं भी भोजन कर रात्रि विश्राम करते हैं—धर्म-आचरण द्वारा यात्रा को पवित्र आधार देते हुए। → अगला अध्याय (84) उसी ‘कृष्णप्रयाण’ को आगे बढ़ाता है—शांति-दूत अब कौरव-सभा की ओर बढ़ेगा, जहाँ वचन और अहंकार टकराने वाले हैं।

Shlokas

Verse 1

[दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ ३ *लोक मिलाकर कुल ७७ ६ “लोक हैं।] व््य्््न्च्ध्् श्यु आप आय चतुरशीतितमो< ध्याय: मार्गके शुभाशुभ हे 26247 तथा मार्गमें लोगोंद्वारा सत्कार पाते हुए वृकस्थल पहुँचकर वहाँ विश्राम करना वैशम्पायन उवाच प्रयान्तं देवकीपुत्रं परवीररुजो दश । महारथा महाबाहुमन्वयु: शस्त्रपाणय:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! महाबाहु श्रीकृष्णके प्रस्थान करते समय विपक्षी वीरोंपर विजय पानेवाले शस्त्रधारी दस महारथी, एक हजार पैदल योद्धा, एक हजार घुड़सवार, प्रचुर खाद्य-सामग्री तथा दूसरे सैकड़ों सेवक उनके साथ गये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ଦେବକୀପୁତ୍ର ମହାବାହୁ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରିବାବେଳେ, ପରବୀରମାନଙ୍କୁ ସନ୍ତାପ ଦେବାରେ ସମର୍ଥ ଶସ୍ତ୍ରପାଣି ଦଶ ମହାରଥୀ ତାଙ୍କୁ ଅନୁସରଣ କଲେ।

Verse 2

पदातीनां सहस्नं च सादिनां च परंतप । भोज्यं च विपुलं राजन प्रेष्याश्न शतशो5परे,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! महाबाहु श्रीकृष्णके प्रस्थान करते समय विपक्षी वीरोंपर विजय पानेवाले शस्त्रधारी दस महारथी, एक हजार पैदल योद्धा, एक हजार घुड़सवार, प्रचुर खाद्य-सामग्री तथा दूसरे सैकड़ों सेवक उनके साथ गये

ଆଉ, ହେ ପରନ୍ତପ ରାଜନ! ଏକ ହଜାର ପଦାତି, ଏକ ହଜାର ଅଶ୍ୱାରୋହୀ, ପ୍ରଚୁର ଭୋଜ୍ୟସାମଗ୍ରୀ ଏବଂ ଶତଶଃ ଅନ୍ୟ ସେବକମାନେ ମଧ୍ୟ ଥିଲେ।

Verse 3

जनमेजय उवाच कथं प्रयातो दाशाहों महात्मा मधुसूदन: । कानि वा व्रजतस्तस्य निमित्तानि महौजस:,जनमेजयने पूछा--दशार्हकुलतिलक महात्मा मधुसूदनने किस प्रकार यात्रा की? उन महातेजस्वी श्रीकृष्णके जाते समय कौन-कौन-से भले-बुरे शकुन प्रकट हुए थे?

ଜନମେଜୟ କହିଲେ—ଦାଶାର୍ହକୁଳତିଳକ ମହାତ୍ମା ମଧୁସୂଦନ କିପରି ଯାତ୍ରାକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ? ଏବଂ ସେହି ମହୌଜସ୍ବୀ ପ୍ରସ୍ଥାନକାଳେ କେଉଁ କେଉଁ ଶୁଭାଶୁଭ ନିମିତ୍ତ ପ୍ରକଟ ହେଲା?

Verse 4

वैशम्पायन उवाच तस्य प्रयाणे यान्यासन्‌ निमित्तानि महात्मन: । तानि मे शृणु सर्वाणि दैवान्यौत्पातिकानि च,वैशम्पायनजीने कहा--राजन! महात्मा श्रीकृष्णके प्रस्थान करते समय जो दिव्य शकुन और उत्पातसूचक अपशकुन प्रकट हुए थे, मुझसे उन सबका वर्णन सुनो

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ସେଇ ମହାତ୍ମାଙ୍କ ପ୍ରୟାଣବେଳେ ଯେଉଁ ଯେଉଁ ନିମିତ୍ତ ପ୍ରକଟ ହେଲା—ଦେବଜନିତ ଶୁଭ ଲକ୍ଷଣ ଓ ଉତ୍ପାତସୂଚକ ଅଶୁଭ ସଙ୍କେତ—ସେ ସବୁର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ବିବରଣୀ ମୋ ପାଖରୁ ଶୁଣ।

Verse 5

अनभ्रे5शनिनिर्घोष: सविद्युत्‌ समजायत । अन्वगेव च पर्जन्य: प्रावर्षद्‌ विधने भूशम्‌,बिना बादलके ही आकाशमें बिजलीसहित वज्रकी गड़गड़ाहट सुनायी देने लगी। उसके साथ ही पर्जन्यदेवताने मेघोंकी घटा न होनेपर भी प्रचुर जलकी वर्षा की

ମେଘ ନଥିବା ଆକାଶରେ ମଧ୍ୟ ବିଜୁଳି ସହିତ ବଜ୍ରଗର୍ଜନ ହେଲା। ଏବଂ ସେହି ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ, ମେଘଘଟା ନଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ପର୍ଜନ୍ୟଦେବ ଭୂମି ଉପରେ ପ୍ରଚୁର ବର୍ଷା କଲେ।

Verse 6

प्रत्यगूहुर्महानद्य: प्राडमुखा: सिन्धुसप्तमा: । विपरीता दिश: सर्वा न प्राज्ञायत किंचन,पूर्वी ओर बहनेवाली सिन्धु आदि बड़ी-बड़ी नदियोंका प्रवाह उलटकर पश्चिमकी ओर हो गया। सारी दिशाएँ विपरीत प्रतीत होने लगीं। कुछ भी समझमें नहीं आता था

ସିନ୍ଧୁକୁ ସପ୍ତମ ଭାବେ ଧରି ମହାନଦୀମାନେ, ଯେମାନେ ପୂର୍ବମୁଖୀ ଭାବେ ବହୁଥିଲେ, ସେମାନେ ଉଲଟି ପଶ୍ଚିମମୁଖୀ ହୋଇ ବହିବାକୁ ଲାଗିଲେ। ସମସ୍ତ ଦିଗ ଉଲଟା ଲାଗୁଥିଲା; କିଛି ମଧ୍ୟ ସ୍ପଷ୍ଟ ହେଉନଥିଲା।

Verse 7

प्राज्वलन्नग्नयो राजन्‌ पृथिवी समकम्पत । उदपानाश्न कुम्भाश्न प्रासिज्चड्छतशो जलम्‌,राजन! सब ओर आग जलने लगी। धरती डोलने लगी। सैकड़ों जलाशय और कलश छलक-छलककर जल गिराने लगे

ହେ ରାଜନ! ସବୁଦିଗରେ ଅଗ୍ନି ପ୍ରଜ୍ୱଳିତ ହେଲା ଏବଂ ପୃଥିବୀ କମ୍ପିତ ହେଲା। କୂଆ ଓ ଜଳକୁମ୍ଭମାନେ ଯେନ ଆପେଆପେ ଉଫାନି, ଶତଶଃ ଧାରାରେ ଜଳ ଢାଳିବାକୁ ଲାଗିଲେ।

Verse 8

तमःसंवृतमप्यासीत्‌ सर्व जगदिदं तथा । न दिशो नादिशो राजन प्रज्ञायन्ते सम रेणुना,राजन! यह सारा संसार धूलके कारण अन्धकारसे आच्छन्न-सा हो गया। कौन दिशा है, कौन दिशा नहीं है--इसका ज्ञान नहीं हो पाता था

ହେ ରାଜନ! ଧୂଳି ସମଭାବେ ସବୁଠାରେ ଉଠିଯାଇଥିବାରୁ ଏ ସମଗ୍ର ଜଗତ ଅନ୍ଧକାରରେ ଆବୃତ ହୋଇଗଲା। କେଉଁଟି ଦିଗ ଓ କେଉଁଟି ଅଦିଗ—ତାହା ମଧ୍ୟ ଜଣା ପଡୁନଥିଲା।

Verse 9

प्रादुरासीन्‍न्महाउ्छब्द: खे शरीरमदृश्यत । सर्वेषु राजन देशेषु ला भवत्‌,महाराज! फिर बड़े कोलाहल होने लगा। आकाशमें सब ओर मनुष्यकी-सी आकृति दिखायी देने लगी। सम्पूर्ण देशोंमें यह अद्भुत-सी बात दिखायी दी

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହଠାତ୍ ଏକ ମହାକୋଳାହଳ ଉଠିଲା, ଏବଂ ଆକାଶରେ ମନୁଷ୍ୟସଦୃଶ ଏକ ଆକୃତି ଦେଖାଗଲା। ହେ ରାଜନ, ହେ ମହାରାଜ! ସମସ୍ତ ଦେଶରେ ଏହି ଅଦ୍ଭୁତ ଓ ବିସ୍ମୟକର ଘଟଣା ପ୍ରକଟ ହେଲା—ସର୍ବତ୍ର ପ୍ରସାରିତ ଅପଶକୁନ ନିମିତ୍ତ ଭାବେ।

Verse 10

प्रामथ्नाद्धास्तिनपुरं वातो दक्षिणपश्चिम: । आरुजन्‌ गणशो वृक्षान्‌ परुषो5शनिनि:स्वन:,दक्षिण-पश्चिमसे आँधी उठी और हस्तिनापुरको मथने लगी। उसने झुंड-के-झुंड वृक्षोंको तोड़उखाड़कर धराशायी कर दिया। वज्रपातका-सा कठोर शब्द होने लगा (इस प्रकारके उत्पात हस्तिनापुरके आस-पास घटित होते थे)

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଦକ୍ଷିଣ-ପଶ୍ଚିମ ଦିଗରୁ ଏକ କଠୋର ବାତାସ ଉଠିଲା; ବଜ୍ରପାତ ସଦୃଶ ଘୋର ଧ୍ୱନି କରି ସେ ହସ୍ତିନାପୁରକୁ ମଥିବାକୁ ଲାଗିଲା। ସେ ଦଳେ ଦଳେ ବୃକ୍ଷ ଭାଙ୍ଗି ଉପାଡ଼ି ଭୂମିସାତ କରିଦେଲା—ଏପରି ଅପଶକୁନ ଉତ୍ପାତ ହସ୍ତିନାପୁର ଆସପାସରେ ଘଟୁଥିଲା।

Verse 11

यत्र यत्र च वार्ष्णेयो वर्तते पथि भारत । तत्र तत्र सुखो वायु: सर्व चासीत्‌ प्रदक्षिणम्‌,भारत! वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण मार्गमें जहाँ-जहाँ रहते थे, वहाँ-वहाँ सुखदायिनी वायु चलती थी और सभी शुभ शकुन उनके दाहिने भागमें प्रकट होते थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ବୃଷ୍ଣିନନ୍ଦନ ବାର୍ଷ୍ଣେୟ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଯେଉଁଯେଉଁ ସ୍ଥାନରେ ପଥେ ଚାଲୁଥିଲେ, ସେଉଁଠାରେ ସେଉଁଠାରେ ସୁଖଦ ବାୟୁ ବହୁଥିଲା; ଏବଂ ସମସ୍ତ ଶୁଭ ଶକୁନ ତାଙ୍କର ଦକ୍ଷିଣ (ଡାହାଣ) ପାର୍ଶ୍ୱରେ ପ୍ରକଟ ହେଉଥିଲା।

Verse 12

ववर्ष पुष्पवर्ष च कमलानि च भूरिश: । समश्न पन्था निर्दु:खो व्यपेतकुशकण्टक:,उनपर फूलोंकी और बहुत-से खिले हुए कमलोंकी भी वृष्टि होती तथा सारा मार्ग कुश- कण्टकसे शून्य और समतल होकर क्लेश और दुःखसे रहित हो जाता था

ତାପରେ ତାଙ୍କ ଉପରେ ପୁଷ୍ପବୃଷ୍ଟି ହେଲା; ଅପାର ପରିମାଣରେ ଫୁଟିଥିବା କମଳମାନେ ମଧ୍ୟ ବର୍ଷିଲେ। ସମଗ୍ର ପଥ ସମତଳ ଓ ସୁଖଦ ହେଲା; କୁଶଘାସ ଓ କଣ୍ଟକ ଦୂର ହୋଇ, କ୍ଲେଶ-ଦୁଃଖ ଶୂନ୍ୟ ହେଲା।

Verse 13

संस्तुतो ब्राह्मणैर्गीर्िस्तत्र तत्र सहस्रश: । अर्च्यते मधुपर्कश्न वसुभिश्च वसुप्रद:

ସେ ଯେଉଁଯେଉଁ ସ୍ଥାନକୁ ଯାଉଥିଲେ, ସେଉଁଠାରେ ସେଉଁଠାରେ ସହସ୍ର ସହସ୍ର ବ୍ରାହ୍ମଣ ଆଶୀର୍ବାଦବାଣୀରେ ତାଙ୍କୁ ସ୍ତୁତି କରୁଥିଲେ। ମଧୁପର୍କ ବିଧିରେ ତାଙ୍କର ସତ୍କାର ହେଉଥିଲା ଏବଂ ଧନ-ସମ୍ପଦର ଉପହାର ଦିଆଯାଉଥିଲା—କାରଣ ସେ ନିଜେ ମଧ୍ୟ ଉଦାର ଧନପ୍ରଦ ଦାତା ଥିଲେ।

Verse 14

सहसों ब्राह्मण विभिन्न स्थानोंमें भगवान्‌ श्रीकृष्णकी स्तुति करते तथा मधुपर्कद्वारा उनकी पूजा करते थे। धनदाता भगवानने भी उन सबको यशथेष्ट धन दिया ।। त॑ किरन्ति महात्मान वन्यै: पुष्पै: सुगन्धिभि: । स्त्रियः पथि समागम्य सर्वभूतहिते रतम्‌,मार्गमें कितनी ही स्त्रियाँ आकर सम्पूर्ण भूतोंके हितमें रत रहनेवाले उन महात्मा श्रीकृष्णके ऊपर वनके सुगन्धित फूलोंकी वर्षा करती थीं

ପଥରେ ଅଗ୍ରସର ହେଉଥିବା ସମୟରେ, ସର୍ବଭୂତହିତେ ରତ ମହାତ୍ମା ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଦେଖିବାକୁ ଅନେକ ନାରୀ ଆସି ତାଙ୍କ ଉପରେ ବନର ସୁଗନ୍ଧିତ ପୁଷ୍ପବର୍ଷା କଲେ।

Verse 15

स शालिभवन रम्यं सर्वसस्यसमाचितम्‌ | सुखं परमधर्मिष्ठम भ्यगाद्‌ भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ) उस समय धर्मकार्यके लिये अत्यन्त उपयोगी तथा सम्पूर्ण सस्य-सम्पत्तिसे भरे हुए अगहनी धानके मनोहर खेत देखते हुए भगवान्‌ बड़े सुखसे यात्रा कर रहे थे

ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ସେ ସମୟରେ ଭଗବାନ୍ ସୁଖରେ ଯାତ୍ରା କରୁଥିଲେ ଏବଂ ଅଗହଣୀ ଧାନର ମନୋହର କ୍ଷେତ୍ରବିସ୍ତାର ଦେଖୁଥିଲେ—ଯାହା ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ଶସ୍ୟସମ୍ପଦରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଓ ଧର୍ମକାର୍ଯ୍ୟ ପାଇଁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଉପଯୁକ୍ତ ମନାଯାଉଥିଲା।

Verse 16

पश्यन्‌ बहुपशून्‌ ग्रामान्‌ रम्यान्‌ हृदयतोषणान्‌ | पुराणि च व्यतिक्रामन्‌ राष्ट्रीणि विविधानि च,रास्तेमें कितने ही ऐसे गाँव मिलते, जिनमें बहुत-से पशुओंका पालन-पोषण होता था। वे देखनेमें अत्यन्त सुन्दर और मनको संतोष देनेवाले थे। उन सबको देखते और अनेकानेक नगरों एवं राष्ट्रोंको लाँघते हुए वे आगे बढ़ते चले गये

ଯାତ୍ରାପଥରେ ସେମାନେ ଅନେକ ପଶୁସମ୍ପଦରେ ଧନ୍ୟ ଗ୍ରାମ ଦେଖିଲେ—ଦେଖିବାକୁ ରମ୍ୟ ଓ ହୃଦୟକୁ ତୃପ୍ତ କରୁଥିବା। ସେଗୁଡ଼ିକୁ ଅତିକ୍ରମ କରି, ଅନେକ ପୁରାତନ ନଗର ଓ ବିଭିନ୍ନ ରାଷ୍ଟ୍ର ଦେଇ ସେମାନେ ଆଗକୁ ବଢ଼ିଗଲେ।

Verse 17

नित्यं हृष्ट: सुमनसो भारतैरभिरक्षिता: | नोद्विग्ना: परचक्राणां व्यसनानामकोविदा:,इधर उपप्लव्य नगरसे आते हुए भगवान्‌ श्रीकृष्णको देखनेकी इच्छासे अनेक नागरिक रास्तेमें एक साथ खड़े थे। भरतवंशियोंद्वारा सुरक्षित होनेके कारण वे सदा हर्ष एवं उल्लाससे भरे रहते थे। उनका मन बहुत प्रसन्न था। उन्हें शत्रुओंकी सेनाओंसे उद्विग्न होनेका अवसर नहीं आता था। दुःख और संकट कैसा होता है, इसको वे जानते ही नहीं थे

ଭରତବଂଶୀମାନଙ୍କ ରକ୍ଷାରେ ନଗରବାସୀମାନେ ସଦା ହର୍ଷିତ ଓ ପ୍ରସନ୍ନଚିତ୍ତ ଥିଲେ। ଶତ୍ରୁସେନାରେ ସେମାନେ କେବେ ଉଦ୍ବିଗ୍ନ ହେଉନଥିଲେ; ଦୁଃଖ ଓ ସଙ୍କଟ କ’ଣ, ସେଥିରେ ସେମାନେ ପ୍ରାୟ ଅପରିଚିତ ଥିଲେ।

Verse 18

उपप्लव्यादथायान्तं जना: पुरनिवासिन: । पथ्यतिष्ठन्त सहिता विष्वक्सेनदिदृक्षया,इधर उपप्लव्य नगरसे आते हुए भगवान्‌ श्रीकृष्णको देखनेकी इच्छासे अनेक नागरिक रास्तेमें एक साथ खड़े थे। भरतवंशियोंद्वारा सुरक्षित होनेके कारण वे सदा हर्ष एवं उल्लाससे भरे रहते थे। उनका मन बहुत प्रसन्न था। उन्हें शत्रुओंकी सेनाओंसे उद्विग्न होनेका अवसर नहीं आता था। दुःख और संकट कैसा होता है, इसको वे जानते ही नहीं थे

ଉପପ୍ଲବ୍ୟ ନଗରରୁ ଆସୁଥିବା ବିଷ୍ୱକ୍ସେନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଦେଖିବା ଇଚ୍ଛାରେ ନଗରର ପୁରୁଣା ନିବାସୀମାନେ ସମେତି ପଥରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହେଲେ।

Verse 19

ते तु सर्वे समायान्तमग्निमिद्धमिव प्रभुम्‌ । अर्चयामासुरर्चाह देशातिथिमुपस्थितम्‌

ତେବେ ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ପ୍ରଜ୍ୱଳିତ ଅଗ୍ନି ସମ ଦୀପ୍ତିମାନ ପ୍ରଭୁଙ୍କୁ ଆସୁଥିବା ଦେଖି, ଅନ୍ୟ ଦେଶରୁ ଆସିଥିବା ଅତିଥିଙ୍କୁ ଯଥାବିଧି ଅର୍ଘ୍ୟ-ସତ୍କାରରେ ପୂଜା କଲେ।

Verse 20

उन सबने प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी और अपने देशके पूजनीय अतिथि भगवान्‌ श्रीकृष्णको समीप आते देख निकट जाकर उनका यथावत्‌ पूजन किया ।। वृकस्थलं समासाद्य केशव: परवीरहा । प्रकीर्णरश्मावादित्ये व्योम्नि वै लोहितायति,शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्ण जब वृकस्थलमें पहुँचे, उस समय नाना किरणोंसे मण्डित सूर्य अस्त होने लगे और पश्चिमके आकाशमें लाली छा गयी। तब भगवानने शीघ्र ही रथसे उतरकर उसे खोलनेकी आज्ञा दी और विधिपूर्वक शौच-स्नान करके वे संध्योपासना करने लगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଶତ୍ରୁବୀର-ସଂହାରକ କେଶବ ଯେତେବେଳେ ବୃକସ୍ଥଳକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ, ସେତେବେଳେ ନାନା କିରଣରେ ମଣ୍ଡିତ ସୂର୍ଯ୍ୟ ଅସ୍ତ ହେବାକୁ ଲାଗିଲା ଏବଂ ପଶ୍ଚିମ ଆକାଶ ରକ୍ତିମ ହେଲା। ପୂଜ୍ୟ ଅତିଥି ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଆସୁଥିବା ଦେଖି ସମସ୍ତେ ନିକଟକୁ ଯାଇ ଯଥାବିଧି ପୂଜା କଲେ। ପରେ ଭଗବାନ ଶୀଘ୍ର ରଥରୁ ଅବତରି, ରଥ ଖୋଲିବାକୁ ଆଜ୍ଞା ଦେଇ, ବିଧିମତେ ଶୌଚ-ସ୍ନାନ କରି ସନ୍ଧ୍ୟାବନ୍ଦନାରେ ବସିଲେ।

Verse 21

अवतीर्य रथात्‌ तूर्ण कृत्वा शौच॑ यथाविधि । रथमोचनमादिश्य संध्यामुपविवेश ह,शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्ण जब वृकस्थलमें पहुँचे, उस समय नाना किरणोंसे मण्डित सूर्य अस्त होने लगे और पश्चिमके आकाशमें लाली छा गयी। तब भगवानने शीघ्र ही रथसे उतरकर उसे खोलनेकी आज्ञा दी और विधिपूर्वक शौच-स्नान करके वे संध्योपासना करने लगे

ସେ ଶୀଘ୍ର ରଥରୁ ଅବତରି, ଯଥାବିଧି ଶୌଚ-ଆଚମନ କରି, ରଥ ଖୋଲିବାକୁ ଆଜ୍ଞା ଦେଇ ସନ୍ଧ୍ୟାବନ୍ଦନାରେ ବସିଲେ।

Verse 22

दारुको5पि हयान्‌ मुक्त्वा परिचर्य च शास्त्रत: । मुमोच सर्वयोक्‍त्रादि मुक्त्वा चैतानवासृजत्‌,दारुकने भी घोड़ोंको खोलकर शास्त्रविधिके अनुसार उनकी परिचर्या की और उनका सारा साज-बाज उतार दिया तथा उन्हें बन्धनमुक्त करके छोड़ दिया

ଦାରୁକ ମଧ୍ୟ ଘୋଡ଼ାମାନଙ୍କୁ ଖୋଲି, ଶାସ୍ତ୍ରବିଧି ଅନୁସାରେ ସେମାନଙ୍କର ପରିଚର୍ଯ୍ୟା କଲା; ପରେ ସମସ୍ତ ଯୋକ୍ତ୍ର-ସାଜସଜ୍ଜା ଖୋଲି, ସବୁ ପଟ୍ଟା-ବନ୍ଧନରୁ ମୁକ୍ତ କରି ସେମାନଙ୍କୁ ଛାଡ଼ିଦେଲା।

Verse 23

अभ्यतीत्य तु तत्‌ सर्वमुवाच मधुसूदन: । युधिष्ठिरस्य कार्यार्थमिह वत्स्यामहे क्षपाम्‌,संध्या-वन्दन आदि सारा कार्य समाप्त करके मधुसूदन श्रीकृष्णने कहा--“युधिष्ठिरका कार्य सिद्ध करनेके लिये आज रातमें हमलोग यहीं रहेंगे”

ସେ ସମସ୍ତ ଅନୁଷ୍ଠାନ ସମାପ୍ତ କରି ମଧୁସୂଦନ କହିଲେ—“ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ କାର୍ଯ୍ୟ ସିଦ୍ଧି ପାଇଁ ଆଜି ରାତି ଆମେ ଏଠାରେ ରହିବୁ।”

Verse 24

तस्य तन्मतमाज्ञाय चक्कुरावसथं नरा: । क्षणेन चान्नपानानि गुणवन्ति समार्जयन्‌,उनका यह विचार जानकर सेवकोंने वहीं डेरे डाल दिये। क्षणभरमें उन्होंने खाने-पीनेके उत्तमोत्तम पदार्थ प्रस्तुत कर दिये

ତାଙ୍କର ଅଭିପ୍ରାୟ ଜାଣି ସେବକମାନେ ସେଠାରେଇ କୌରବମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଆବାସ ବ୍ୟବସ୍ଥା କଲେ। କ୍ଷଣମାତ୍ରରେ ଉତ୍ତମ ଅନ୍ନପାନ ସଜାଇ ଦେଲେ।

Verse 25

तस्मिन्‌ ग्रामे प्रधानास्तु य आसन्‌ ब्राह्मणा नृप । आर्या: कुलीना ह्वीमन्तो ब्राद्मीं वृत्तिमनुछिता:,राजन! उस गाँवमें जो प्रमुख ब्राह्मण रहते थे, वे श्रेष्ठ कुलीन, लज्जाशील और ब्राह्मणोचित वृत्तिका पालन करनेवाले थे

ହେ ରାଜନ! ସେଇ ଗ୍ରାମରେ ଯେ ପ୍ରଧାନ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ବସୁଥିଲେ, ସେମାନେ ଆର୍ୟ, କୁଳୀନ, ଲଜ୍ଜାଶୀଳ ଏବଂ ବ୍ରାହ୍ମଣୋଚିତ ବୃତ୍ତିରେ ଅଟୁଟ ଥିଲେ।

Verse 26

तेडभिगम्य महात्मानं हृषीकेशमरिंदमम्‌ | पूजां चक्कुर्यथान्यायमाशीर्मज्जलसंयुताम्‌

ସେମାନେ ଶତ୍ରୁଦମନ ମହାତ୍ମା ହୃଷୀକେଶଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ, ନିୟମାନୁସାରେ ପୂଜା କଲେ; ଆଶୀର୍ବାଦ ସହ ଅର୍ଘ୍ୟ-ଜଳ ଅର୍ପଣ କରି ସମ୍ମାନ ଦେଲେ।

Verse 27

उन्होंने शत्रुदमन महात्मा हृषीकेशके पास जाकर आशीर्वाद तथा मंगलपाठपूर्वक उनका यथोचित पूजन किया ।। ते पूजयित्वा दाशाहं सर्वलोकेषु पूजितम्‌ । न्यवेदयन्त वेश्मानि रत्नवन्ति महात्मने,सर्वलोकपूजित दशार्हनन्दन श्रीकृष्णकी पूजा करके उन्होंने उन महात्माको अपने रत्नसम्पन्न गृह समर्पित कर दिये अर्थात्‌ अपने-अपने घरोंमें ठहरनेके लिये प्रभुसे प्रार्थना की

ସର୍ବଲୋକପୂଜିତ ଦାଶାର୍ହ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ)ଙ୍କୁ ପୂଜା କରି ସେମାନେ ସେଇ ମହାତ୍ମାଙ୍କୁ ନିଜ ନିଜ ରତ୍ନସମ୍ପନ୍ନ ଗୃହ ନିବେଦନ କଲେ—ଅର୍ଥାତ୍ ନିଜ ଘରେ ରହିବାକୁ ବିନୟପୂର୍ବକ ଅନୁରୋଧ କଲେ।

Verse 28

तान्‌ प्रभु: कृतमित्युक्त्वा सत्कृत्य च यथाहत: । अभ्येत्य चैषां वेश्मानि पुनरायात्‌ सहैव तै:,तब भगवानने यह कहकर कि यहाँ ठहरनेके लिये पर्याप्त स्थान है, उनका यथायोग्य सत्कार किया और (उनके संतोषके लिये) उन सबके घरोंपर जाकर पुनः उनके साथ ही लौट आये

ତେବେ ପ୍ରଭୁ “ବ୍ୟବସ୍ଥା ହୋଇଗଲା (ଏଠାରେ ରହିବାକୁ ପର୍ଯ୍ୟାପ୍ତ)” ବୋଲି କହି, ସେମାନଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ସତ୍କାର କଲେ। ପରେ ସେମାନଙ୍କ ସନ୍ତୋଷ ପାଇଁ ସେମାନଙ୍କ ପ୍ରତ୍ୟେକଙ୍କ ଗୃହକୁ ଯାଇ ଦେଖି, ସେମାନଙ୍କ ସହିତ ପୁନର୍ବାର ଫେରି ଆସିଲେ।

Verse 29

सुमृष्टं भोजयित्वा च ब्राह्मणांस्तत्र केशव: । भुक्त्वा च सह तै: सर्वैरवसत्‌ तां क्षपां सुखम्‌,तत्पश्चात्‌ केशवने वहीं उन ब्राह्मणोंको सुस्वादु अन्न भोजन कराया, फिर स्वयं भी भोजन करके उन सबके साथ उस रातमें वहाँ सुखपूर्वक निवास किया

ସେଠାରେ କେଶବ ପ୍ରଥମେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ସୁସଜ୍ଜିତ ସୁସ୍ୱାଦୁ ଅନ୍ନ ଭୋଜନ କରାଇ ତୃପ୍ତ କଲେ; ପରେ ସେ ନିଜେ ମଧ୍ୟ ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତଙ୍କ ସହ ଭୋଜନ କରି ସେଇ ରାତି ସେଠାରେ ସୁଖରେ ବିତାଇଲେ।

Verse 83

इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें श्रीकृष्णप्रस्थानविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣପ୍ରସ୍ଥାନବିଷୟକ ତ୍ର୍ୟଶୀତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 84

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि श्रीकृष्णप्रयाणे चतुरशीतितमो<ध्याय:

ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତେ ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବଣି ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବଣି ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣପ୍ରୟାଣେ ଚତୁରଶୀତିତମୋऽଧ୍ୟାୟଃ।

Frequently Asked Questions

The court must balance sincere adherence to envoy-hospitality norms with the instrumental use of honor as political leverage; the passage tests whether protocol is grounded in dharma or deployed as strategy without moral alignment.

Legitimate governance requires honoring ethical procedures—especially toward envoys and guests—because public order and political credibility depend on visible compliance with rājadharma, not only on coercive capacity.

No explicit phalaśruti appears here; the meta-point is conveyed narratively—Kṛṣṇa’s uninspected passage past the prepared splendor implies that moral authority is not necessarily persuaded by material display.