Adhyaya 79
Udyoga ParvaAdhyaya 7920 Verses

Adhyaya 79

सहदेव–सात्यकि संवादः (Sahadeva and Satyaki on resolve after failed conciliation)

Upa-parva: Yāna–Udyoga Context (War-Counsel and Mobilization Discourse)

Chapter 79 records a compact counsel sequence in which Sahadeva asserts that the “sanātana” dharma articulated by the king is acknowledged, yet insists that the practical outcome must be organized engagement rather than mere pacification. He argues that even if the Kurus were to desire reconciliation with the Pāṇḍavas, preparation for conflict should still proceed, reflecting distrust of durable settlement. Sahadeva grounds his resolve in remembered moral injury—Draupadī’s public humiliation—and states that his anger toward Suyodhana cannot be calmed without decisive redress. He further notes that even if leading figures (Bhīma, Arjuna, Kṛṣṇa, and the dharmic Yudhiṣṭhira) were to set aside dharma, he himself would still seek combat, emphasizing personal commitment to retributive justice. Sātyaki then affirms Sahadeva’s assessment, linking peace to the removal of Duryodhana as the condition for anger’s cessation, and recalls shared hardship in exile as a catalyst for indignation. Vaiśaṃpāyana closes the scene by describing widespread approval among the warriors, expressed through acclamation and heightened morale.

Chapter Arc: धर्मराज युधिष्ठिर के बहुविध, धर्मयुक्त वचनों को स्मरण कर नकुल श्रीकृष्ण से निवेदन करता है—अब निर्णायक प्रयत्न का समय है, और वह प्रयत्न स्वयं केशव हैं। → नकुल बताता है कि भीम ने पहले संधि का मार्ग रखा, फिर अपने बाहुबल का संकल्प प्रकट किया; अर्जुन ने भी अपना मत बार-बार स्पष्ट किया। पर कौरव-पक्ष में अचिन्त्य पराक्रमी, शस्त्रधारी वीरों की भीड़ देखकर किसी का भी मन डगमगा सकता है—यही भय और दुविधा तनाव बढ़ाते हैं। → नकुल का निर्णायक निष्कर्ष: ‘महाबाहो! आप वहाँ केवल जाने मात्र से धर्मराज का अभीष्ट सिद्ध कर देंगे’—क्योंकि विदुर श्रोता हैं और जनार्दन वक्ता; इन दोनों की संयुक्त नीति-शक्ति किसी भी भटके हुए प्रयोजन को मार्ग पर रोक सकती है। → नकुल कृष्ण को दूत-कार्य के लिए प्रेरित करता है और आश्वस्त करता है कि भीष्म, द्रोण, विदुर आदि भी ‘श्रेय’ (कल्याणकारी समाधान) के पक्ष में होंगे; अतः कृष्ण का प्रस्थान ही शांति-प्रयास की कुंजी है। → कृष्ण के गमन से कौरव सभा में क्या परिवर्तन होगा—धृतराष्ट्र-दुर्योधन नीति के आगे झुकेंगे या युद्ध अनिवार्य होगा?

Shlokas

Verse 1

अपन का छा ] अतडकडज अशीतितमो<ध्याय: नकुलका निवेदन नकुल उवाच उक्त बहुविध॑ वाक्‍्यं धर्मराजेन माधव । धर्मज्ञेन वदान्येन श्रुतं चैव हि तत्‌ त्वया,नकुल बोले--माधव! धर्मज्ञ और उदार धर्मराजने बहुत-सी बातें कही हैं और आपने उन्हें सुना है

ନକୁଳ କହିଲେ—ହେ ମାଧବ! ଧର୍ମଜ୍ଞ ଓ ଦାନଶୀଳ ଧର୍ମରାଜ ବହୁବିଧ କଥା କହିଛନ୍ତି; ତୁମେ ସେସବୁ ଶୁଣିଛ।

Verse 2

मतमाज्ञाय राज्ञश्न भीमसेनेन माधव । संशमो बाहुवीर्य च ख्यापितं माधवात्मन:,यदुकुलभूषण! राजाका मत जानकर भाई भीमसेनने भी पहले संधिस्थापनकी, फिर अपने बाहुबलकी बात बतायी है

ହେ ଯଦୁକୁଳଭୂଷଣ! ରାଜାଙ୍କ ମତ ଜାଣି ଭୀମସେନ ପ୍ରଥମେ ସନ୍ଧି-ସ୍ଥାପନର କଥା କହିଲେ; ପରେ ନିଜ ବାହୁବଳର ପ୍ରତାପ ମଧ୍ୟ ପ୍ରକାଶ କଲେ।

Verse 3

तथैव फाल्गुनेनापि यदुक्तं तत्‌ त्वया श्रुवम्‌ । आत्मनश्व मतं वीर कथितं भवतासकृत्‌

ସେହିପରି ଫାଲ୍ଗୁନ (ଅର୍ଜୁନ) ଯାହା କହିଛନ୍ତି, ତାହା ମଧ୍ୟ ତୁମେ ଶୁଣିଛ। ହେ ବୀର! ତୁମେ ମଧ୍ୟ ନିଜ ମତ ପୁନଃପୁନଃ କହିଛ।

Verse 4

वीर! इसी प्रकार अर्जुनने भी जो कुछ कहा है, वह भी आपने सुन ही लिया है। आपका जो अपना मत है, उसे भी आपने अनेक बार प्रकट किया है ।। सर्वमेतदतिक्रम्य श्रुत्वा परमतं भवान्‌ | यत्‌ प्राप्तकालं मन्येथास्तत्‌ कुर्या: पुरुषोत्तम,परंतु पुरुषोत्तम! इन सब बातोंको पीछे छोड़कर और विपक्षियोंके मतको अच्छी तरह सुनकर आपको समयके अनुसार जो कर्तव्य उचित जान पड़े, वही कीजियेगा

କିନ୍ତୁ ହେ ପୁରୁଷୋତ୍ତମ! ଏସବୁକୁ ଅତିକ୍ରମ କରି, ପ୍ରତିପକ୍ଷର ମତକୁ ମଧ୍ୟ ଭଲଭାବେ ଶୁଣି, ଏହି ସମୟରେ ଯାହାକୁ ତୁମେ ଯଥୋଚିତ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ଭାବିବ, ସେହି କାମଟି କର।

Verse 5

तस्मिंस्तस्मिन्‌ निमित्ते हि मतं भवति केशव । प्राप्तकालं मनुष्येण क्षमं कार्यमरिंदम,शत्रुओंका दमन करनेवाले केशव! भिन्न-भिन्न कारण उपस्थित होनेपर मनुष्योंके विचार भी भिन्न-भिन्न प्रकारके हो जाते हैं; अतः मनुष्यको वही कार्य करना चाहिये, जो उसके योग्य और समयोचित हो

ହେ ଶତ୍ରୁଦମନ କେଶବ! ନାନା କାରଣ ଉପସ୍ଥିତ ହେଲେ ମନୁଷ୍ୟଙ୍କ ମତ ମଧ୍ୟ ନାନା ପ୍ରକାର ହୋଇଯାଏ; ତେଣୁ ମନୁଷ୍ୟ ନିଜ ଯୋଗ୍ୟତା ଓ ସମୟୋଚିତ କାର୍ଯ୍ୟ ହିଁ କରିବା ଉଚିତ।

Verse 6

अन्यथा चिन्तितो हार्थ: पुनर्भवति सो3न्यथा । अनित्यमतयो लोके नरा: पुरुषसत्तम,पुरुषश्रेष्ठती किसी वस्तुके विषयमें सोचा कुछ और जाता है और हो कुछ और ही जाता है। संसारके मनुष्य स्थिर विचारवाले नहीं होते हैं

ହେ ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ! କୌଣସି ବିଷୟକୁ ଏକ ପ୍ରକାର ଭାବାଯାଏ, କିନ୍ତୁ ତାହା ପୁଣି ଅନ୍ୟ ପ୍ରକାର ହୋଇଯାଏ। ଏହି ଲୋକରେ ମନୁଷ୍ୟଙ୍କ ମତ ସ୍ଥିର ନୁହେଁ; ତାଙ୍କର ଆଶା-ଆକାଂକ୍ଷା ଅନିତ୍ୟ।

Verse 7

अन्यथा बुद्धयो हासन्नस्मासु वनवासिषु । अदृश्येष्वन्यथा कृष्ण दृश्येषु पुनरन्यथा,श्रीकृष्ण! जब हम वनमें निवास करते थे, उस समय हमारे विचार कुछ और ही थे, अज्ञातवासके समय वे बदलकर कुछ और हो गये और उस अवधिको पूर्ण करके जब हम सबके सामने प्रकट हुए हैं, तबसे हमलोगोंका विचार कुछ और हो गया है

ହେ କୃଷ୍ଣ! ଆମେ ବନବାସ କରୁଥିବାବେଳେ ଆମ ଚିନ୍ତା ଏକ ପ୍ରକାର ଥିଲା; ଅଜ୍ଞାତବାସରେ ତାହା ବଦଳି ଅନ୍ୟ ପ୍ରକାର ହେଲା; ଏବେ ସେ ଅବଧି ପୂରଣ କରି ସମସ୍ତଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ପ୍ରକଟ ହେବା ପରେ ଆମ ଭାବନା ପୁଣି ଅନ୍ୟ ହୋଇଯାଇଛି।

Verse 8

अस्माकमपि वार्ष्णेय वने विचरतां तदा । न तथा प्रणयो राज्ये यथा सम्प्रति वर्तते

ହେ ବାର୍ଷ୍ଣେୟ! ସେ ସମୟରେ ବନରେ ବିଚରଣ କରୁଥିବାବେଳେ ରାଜ୍ୟ ପ୍ରତି ଆମର ଆସକ୍ତି ଏତେ ଥିଲା ନାହିଁ, ଯେତେ ଏବେ ହୋଇଛି।

Verse 9

वृष्णिनन्दन! वनमें विचरते समय राज्यके विषयमें हमारा वैसा आकर्षण नहीं था, जैसा इस समय है ।। निवृत्तवनवासान्‌ नः श्रुत्वा वीर समागता: । अक्षौहिण्यो हि सप्तेमास्त्वत्प्रसादाज्जनार्दन,वीर जनार्दन! हमलोग वनवासकी अवधि पूरी करके आ गये हैं; यह सुनकर आपकी कृपासे ये सात अक्षौहिणी सेनाएँ यहाँ एकत्र हो गयी हैं

ହେ ବୀର ଜନାର୍ଦନ! ଆମର ବନବାସ ସମାପ୍ତ ହୋଇଛି—ଏହା ଶୁଣି ତୁମ କୃପାରେ ଏହି ସାତ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ଏଠାରେ ଏକତ୍ର ହୋଇଛି।

Verse 10

इमान्‌ हि पुरुषव्याप्रानचिन्त्यवलपौरुषान्‌ । आत्तशस्त्रान्‌ रणे दृष्टवा न व्यथेदिह कः पुमान्‌,यहाँ जो पुरुषसिंह वीर उपस्थित हैं, इनके बल और पौरुष अचिन्त्य हैं। रणभूमिमें इन्हें अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित देखकर किस पुरुषका हृदय भयभीत न हो उठेगा?

ଏଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ ଏହି ପୁରୁଷସିଂହ ବୀରମାନଙ୍କର ବଳ ଓ ପୌରୁଷ ଅଚିନ୍ତ୍ୟ। ରଣଭୂମିରେ ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ର ଧାରଣ କରି ସେମାନଙ୍କୁ ଦେଖି କେଉଁ ପୁରୁଷର ହୃଦୟ ଭୟରେ କମ୍ପିବ ନାହିଁ?

Verse 11

स भवान्‌ कुरुमध्ये तं सान्त्वपूर्व भयोत्तरम्‌ | ब्रूयाद्‌ वाक्‍्यं यथा मन्दो न व्यथेत सुयोधन:,आप कौदरवोंके बीचमें उससे पहले सान्त्वनापूर्ण बातें कहियेगा और अन्तमें युद्धका भय भी दिखाइयेगा, जिससे मूर्ख दुर्योधनके मनमें व्यथा न हो

କୁରୁମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ତାଙ୍କୁ ପ୍ରଥମେ ସାନ୍ତ୍ୱନାପୂର୍ଣ୍ଣ କଥା କହି, ଶେଷରେ ଯୁଦ୍ଧର ଭୟ ମଧ୍ୟ ଦେଖାଅ—ଯେପରି ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି ସୁୟୋଧନ (ଦୁର୍ୟୋଧନ) ମନରେ ବ୍ୟଥିତ ନ ହୁଏ।

Verse 12

युधिष्ठिरं भीमसेनं बीभत्सुं चापराजितम्‌ । सहदेवं च मां चैव त्वां च रामं च केशव,केशव! अपने शरीरमें मांस और रक्तका बोझ बढ़ानेवाला कौन ऐसा मनुष्य है, जो युद्धमें युधिष्ठि, भीमसेन, किसीसे पराजित न होनेवाले अर्जुन, सहदेव, बलराम, महापराक्रमी सात्यकि, पुत्रोंसहित विराट, मन्त्रियोंसहित द्रुपद, धृष्टद्युम्न, पराक्रमी काशिराज, चेदिनरेश धृष्टकेतु तथा आपका और मेरा सामना कर सके?

ହେ କେଶବ! ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ଭୀମସେନ, ଯୁଦ୍ଧରେ ଅପରାଜିତ ବୀଭତ୍ସୁ (ଅର୍ଜୁନ), ସହଦେବ ଓ ମୁଁ; ଏବଂ ତୁମେ ଓ ରାମ—ଏମିତି ବୀରମାନଙ୍କ ବିରୋଧରେ ଯୁଦ୍ଧକୁ ନେମି ନିଜ ଦେହରେ ମାଂସ ଓ ରକ୍ତର ଭାର ବଢ଼ାଇବାକୁ ଚାହୁଁଥିବା ମଣିଷ କିଏ?

Verse 13

सात्यकिं च महावीर्य विराटं च सहात्मजम्‌ । द्रपदं॑ च सहामात्य॑ धृष्टद्युम्नं च माधव,केशव! अपने शरीरमें मांस और रक्तका बोझ बढ़ानेवाला कौन ऐसा मनुष्य है, जो युद्धमें युधिष्ठि, भीमसेन, किसीसे पराजित न होनेवाले अर्जुन, सहदेव, बलराम, महापराक्रमी सात्यकि, पुत्रोंसहित विराट, मन्त्रियोंसहित द्रुपद, धृष्टद्युम्न, पराक्रमी काशिराज, चेदिनरेश धृष्टकेतु तथा आपका और मेरा सामना कर सके?

ହେ ମାଧବ! ମହାବୀର୍ୟ ସାତ୍ୟକି, ପୁତ୍ରସହିତ ବିରାଟ, ମନ୍ତ୍ରୀସହିତ ଦ୍ରୁପଦ, ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ ମଧ୍ୟ—ଏମାନେ ସମସ୍ତେ ଆମ ପକ୍ଷରେ ଥିବାବେଳେ, ନିଜ ଦେହରେ ମାଂସ ଓ ରକ୍ତର ଭାର ବଢ଼ାଇବାକୁ ଚାହୁଁଥିବା କିଏ ଯୁଦ୍ଧରେ ତୁମକୁ ଓ ମୋତେ ପ୍ରତିମୁଖ ହୋଇପାରିବ?

Verse 14

काशिराजं च विक्रान्तं धृष्टकेतुं च चेदिपम्‌ । मांसशोणित भभन्मर्त्य: प्रतियुध्येत को युधि,केशव! अपने शरीरमें मांस और रक्तका बोझ बढ़ानेवाला कौन ऐसा मनुष्य है, जो युद्धमें युधिष्ठि, भीमसेन, किसीसे पराजित न होनेवाले अर्जुन, सहदेव, बलराम, महापराक्रमी सात्यकि, पुत्रोंसहित विराट, मन्त्रियोंसहित द्रुपद, धृष्टद्युम्न, पराक्रमी काशिराज, चेदिनरेश धृष्टकेतु तथा आपका और मेरा सामना कर सके?

ହେ କେଶବ! ବିକ୍ରାନ୍ତ କାଶିରାଜ ଓ ଚେଦିପତି ଧୃଷ୍ଟକେତୁ ପରି ବୀରମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ, ନିଜ ଦେହରେ ମାଂସ ଓ ରକ୍ତର ଭାର ବହନ କରୁଥିବା କେଉଁ ମର୍ତ୍ୟ ଯୁଦ୍ଧରେ ପ୍ରତିଯୁଦ୍ଧ କରିବ?

Verse 15

स भवान्‌ गमनादेव साधयिष्यत्यसंशयम्‌ | इष्टमर्थ महाबाहो धर्मराजस्य केवलम्‌

ନକୁଳ କହିଲେ—ମହାବାହୋ! ଆପଣ କେବଳ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରିଲେ ମାତ୍ରେ, ନିଃସନ୍ଦେହ, ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଏକମାତ୍ର ଇଷ୍ଟ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ସିଦ୍ଧ ହେବ।

Verse 16

महाबाहो! आप वहाँ केवल जानेमात्रसे धर्मराजके अभीष्ट मनोरथको सिद्ध कर देंगे; इसमें संशय नहीं है ।। विदुरश्नैव भीष्मश्न द्रोणश्न सहबाह्विक: । श्रेय: समर्था विज्ञातुमुच्यमानास्त्वयानघ,निष्पाप श्रीकृष्ण! विदुर, भीष्म, द्रोणाचार्य तथा बाह्नीक--ये आपके बतानेपर कल्याणकारी मार्गको समझनेमें समर्थ हैं

ନକୁଳ କହିଲେ—ମହାବାହୋ! ଆପଣ ସେଠାକୁ କେବଳ ଯାଇଲେ ମାତ୍ରେ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଅଭୀଷ୍ଟ ମନୋରଥ ସିଦ୍ଧ ହେବ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ। ଏବଂ ବିଦୁର, ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣାଚାର୍ଯ୍ୟ ଓ ବାହ୍ଲୀକ—ହେ ଅନଘ, ନିଷ୍ପାପ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ—ଆପଣ କହିଦେଲେ ଶ୍ରେୟସ୍ (କଲ୍ୟାଣ) ମାର୍ଗକୁ ବୁଝିବାରେ ସମର୍ଥ।

Verse 17

ते चैनमनुनेष्यन्ति धृतराष्ट्र जनाधिपम्‌ | त॑ च पापसमाचारं सहामात्यं सुयोधनम्‌,ये लोग राजा धूृतराष्ट्र तथा मन्त्रियोंसहित पापाचारी दुर्योधनको (समझा-बुझाकर) राहपर लायँगे

ସେମାନେ ମନୁଷ୍ୟାଧିପ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ ବୁଝାଇ ସଠିକ୍ ପଥକୁ ଫେରାଇ ଆଣିବେ; ଏବଂ ପାପାଚାରୀ ସୁୟୋଧନକୁ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହିତ ଉପଦେଶ ଦେଇ ନିବାରିବେ।

Verse 18

श्रोता चार्थस्य विदुरस्त्वं च वक्ता जनार्दन । कमिवार्थ निवर्तन्तं स्थापयेतां न वर्त्मनि,जनार्दन! जहाँ विदुरजी किसी प्रयोजनको सुनें और आप उसका प्रतिपादन करें, वहाँ आप दोनों मिलकर किस बिगड़ते हुए कार्यको सिद्धिके मार्गपर नहीं ला देंगे?

ଜନାର୍ଦନ! ବିଦୁର ଅର୍ଥର ମର୍ମ ବୁଝୁଥିବା ଶ୍ରୋତା, ଆପଣ ତାହାର ପ୍ରତିପାଦକ ବକ୍ତା; ଆପଣ ଦୁହେଁ ମିଶି କେଉଁ ଭ୍ରଷ୍ଟ ହେଉଥିବା କାର୍ଯ୍ୟକୁ ସଠିକ୍ ପଥରେ ସ୍ଥାପିତ କରିପାରିବେ ନାହିଁ?

Verse 79

इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वनें श्रीकृष्णवाक्यविषयक उन्नासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣବାକ୍ୟବିଷୟକ ଉଣାଅଶୀତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 80

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि नकुलवाक्ये अशीतितमो<ध्याय: ।। ८० || इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें नकुलवाक्यविषयक असीवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ନକୁଳବାକ୍ୟବିଷୟକ ଅଶୀତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether reconciliation (śama) remains ethically credible after severe public wrongdoing; Sahadeva frames peace as insufficient without enforceable justice, asserting that mere verbal settlement cannot resolve moral injury.

The chapter emphasizes that ethical governance requires enforceability: when institutional remedies fail, leaders may prioritize coordinated preparedness and accountability, while still acknowledging the language of dharma.

No explicit phalaśruti is presented here; the meta-level closure is narrative—Vaiśaṃpāyana notes collective acclamation, functioning as an internal validation of the counsel’s persuasive force within the coalition.