Adhyaya 75
Udyoga ParvaAdhyaya 7527 Verses

Adhyaya 75

अध्याय ७५ — दैव-पुरुषकार-समन्वयः (Reconciling Contingency and Human Effort)

Upa-parva: Krishna–Bhimasena Saṃvāda (Counsel on Daiva and Pauruṣa) — Udyoga Parva

Kṛṣṇa clarifies to Bhīmasena that his prior words were spoken from affection and inquiry into Bhīma’s intent, not from insult, pedantry, anger, or provocation (1). He affirms knowledge of Bhīma’s greatness, strength, and deeds, explicitly denying any intention to disparage him (2–4). The discourse then turns to a technical ethical-politico analysis: when dharma is uncertain, people struggle to determine the relative causal priority of daiva (circumstance/fate) and mānuṣa/pauruṣa (human effort) (5–7). Kṛṣṇa explains that the same factor may appear as the cause of success or ruin, and that even well-planned, well-governed, and rationally justified human action can be opposed by daiva, while adverse circumstance can be countered by effort (8–10). He recommends a cognitive stance in which one acts within karma (action) without disproportionate elation in success or distress in failure, recognizing outcomes as mixed-causal (11–12). The practical implication is preparatory: Kṛṣṇa intends to meet Dhṛtarāṣṭra the next day to attempt pacification for the Pāṇḍavas’ interests; if accepted, it yields reputational and welfare benefits for all parties, but if rejected, organized conflict becomes likely (15–17). Operational roles are assigned: Bhīma bears primary burden, Arjuna carries the main ‘load’ in execution, and Kṛṣṇa positions himself as Arjuna’s charioteer, emphasizing that war is not his preference but may become necessary if counsel is refused (18–20).

Chapter Arc: वासुदेव के उपदेश/संयम-वचन सुनकर भीमसेन का नित्य-अन्युर, अमर्षी स्वभाव और अधिक भड़क उठता है; वह तुरंत प्रत्युत्तर देता है—मानो युद्धभूमि अभी सामने हो। → भीम कृष्ण से कहता है कि तुम मुझे गलत समझ रहे हो—मैं ‘प्रणीतभाव’ (दबाया हुआ/विनीत) नहीं, सत्य-पराक्रमी और युद्ध के लिए तत्पर हूँ; वह अपने भीतर की अडिगता, निर्भयता और क्रोध की ज्वाला का वर्णन करता है, और समस्त लोकों को साक्षी बनाकर अपनी शक्ति का उद्घोष करता है। → भीम प्रतिज्ञा-स्वर में घोषणा करता है कि पाण्डवों के प्रति आततायी बने क्षत्रियों को वह पृथ्वी पर गिराकर पाँव तले रौंद देगा; घमासान में हाथियों, रथियों, अश्वारोहियों को उखाड़-फेंकने की अपनी उग्र छवि कृष्ण के सामने रखता है। → वह अपने पूर्व पराक्रमों का स्मरण कराता है—जिन राजाओं को उसने जीतकर वश में किया—और कृष्ण से कहता है कि युद्ध के ‘सम्बाध’ और ‘वैशस’ दिन में तुम स्वयं देखोगे कि मेरा मन न काँपता है, न मज्जा शिथिल होती है। → भीम की प्रतिज्ञा हवा में गूँजती रह जाती है—अब प्रश्न यह है कि कृष्ण इस उग्र संकल्प को नीति और धर्म की मर्यादा में कैसे बाँधेंगे, और क्या शान्ति का कोई मार्ग शेष है।

Shlokas

Verse 1

अ्र-क्ा् षट्सप्ततितमो< ध्याय: भीमसेनका उत्तर वैशम्पायन उवाच तथोक्तो वासुदेवेन नित्यमन्युरमर्षण: । सदश्ववत्‌ समाधावद्‌ बभाषे तदनन्तरम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! वसुदेवनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर सदा क्रोध और अमर्षमें भरे रहनेवाले भीमसेन पहले सुशिक्षित घोड़ेकी भाँति सरपट भागने लगे (जल्दी-जल्दी बोलने लगे); फिर धीरे-धीरे बोले

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ବାସୁଦେବ ଏପରି କହିବା ପରେ, ସଦା କ୍ରୋଧ ଓ ଅମର୍ଷରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭୀମସେନ ପ୍ରଥମେ ସୁଶିକ୍ଷିତ ଘୋଡ଼ା ପରି ବେଗରେ ଉଛଳି କଥା କହିଉଠିଲେ; ତାପରେ ସେ ତୁରନ୍ତ ଅଧିକ ସ୍ଥିର ହୋଇ କହିଲେ।

Verse 2

भीमसेन उवाच अन्यथा मां चिकीर्षन्तमन्यथा मन्यसे<च्युत । प्रणीतभावमत्यर्थ युधि सत्यपराक्रमम्‌

ଭୀମସେନ କହିଲେ—ହେ ଅଚ୍ୟୁତ! ମୋତେ ତୁମେ ଏକ ପ୍ରକାରେ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛ, କିନ୍ତୁ ମୋ ବିଷୟରେ ଭାବୁଛ ଅନ୍ୟ ପ୍ରକାରେ। ତୁମେ ମୋତେ ଅତ୍ୟଧିକ ବିନୀତ ଓ ସହଜେ ନିୟନ୍ତ୍ରଣଯୋଗ୍ୟ ଭାବୁଛ—କିନ୍ତୁ ଯୁଦ୍ଧରେ ମୋର ପରାକ୍ରମ ସତ୍ୟ ଓ ଅଚଳ।

Verse 3

उत वा मां न जानासि प्लवन्‌ हृद इवाप्लवे

ନାହିଁ କି ତୁମେ ମୋତେ ଚିହ୍ନୁନାହ—ଯେପରି ନଦୀରେ ଘାଟ ନମିଳିଲେ ମଧ୍ୟ ଜଣେ ସ୍ନାତକ ତେରି ଆଗେଇଯାଏ?

Verse 4

तस्मादनभिरूपाभिरन्वाम्भिम्मा त्वं समर्च्छ॑सि । अथवा यह भी सम्भव है कि बिना नौकाके अगाध सरोवरमें तैरनेवाले पुरुषको जैसे उसकी गहराईका पता नहीं चलता, उसी तरह आप मुझे अच्छी तरह न जानते हों। इसीलिये आप अनुचित वचनोंद्वारा मुझपर आशक्षेप कर रहे हैं ।। ३ ई ।। कथं हि भीमसेनं मां जानन्‌ कश्नन माधव

ସେହିପାଇଁ ତୁମେ ପ୍ରସଙ୍ଗକୁ ନ ଶୋଭେ ଏମିତି କଥାରେ ମୋତେ ଆକ୍ରମଣ କରୁଛ। କିମ୍ବା ଏହା ମଧ୍ୟ ସମ୍ଭବ—ନୌକା ବିନା ଗଭୀର ସରୋବରରେ ତେରୁଥିବା ଲୋକ ତାହାର ଗଭୀରତାକୁ ସତ୍ୟରେ ଜାଣିପାରେ ନାହିଁ, ସେପରି ତୁମେ ମୋତେ ଭଲଭାବେ ଜାଣୁନାହ; ତେଣୁ ଅନୁଚିତ ବାକ୍ୟରେ ସଙ୍କେତ-ଆକ୍ଷେପ କରୁଛ। କାରଣ, ହେ ମାଧବ, ମୋତେ—ଭୀମସେନକୁ—ଜାଣି କିଏ ଏପରି କହିପାରିବ?

Verse 5

तस्मादिदं प्रवक्ष्यामि वचन वृष्णिनन्दन

ଏହିପରି, ହେ ବୃଷ୍ଣିନନ୍ଦନ, ମୁଁ ଏବେ ଏହି ବଚନ କହିବି।

Verse 6

सर्वथानार्यकर्मतत्‌ प्रशंसा स्वयमात्मन:

ଏହି କର୍ମ ସର୍ବଥା ଅନାର୍ୟ; ଆଉ ନିଜକୁ ନିଜେ ପ୍ରଶଂସା କରିବା ମଧ୍ୟ ନୀଚତାର ଲକ୍ଷଣ।

Verse 7

पश्येमे रोदसी कृष्ण ययोरासन्निमा: प्रजा:

ଦେଖ, ହେ କୃଷ୍ଣ, ଏହି ଦୁଇ ଲୋକ—ସ୍ୱର୍ଗ ଓ ପୃଥିବୀ—ଯାହାର ମଧ୍ୟରେ ଏହି ସମସ୍ତ ପ୍ରଜା ବସେ।

Verse 8

यदीमे सहसा क्रुद्धे समेयातां शिले इव

ଯଦି ଏମାନେ ହଠାତ୍ କ୍ରୋଧେ ଉଦ୍ଦୀପ୍ତ ହୋଇ ଦୁଇ ଶିଳା ପରି ପରସ୍ପର ଧାଇ ଟକ୍କର ଖାଆନ୍ତି, ତେବେ ସେଇ ସଂଘାତ ଭୟଙ୍କର ଓ ବିନାଶକାରୀ ହେବ—ଯେଉଁଠାରେ ଧର୍ମ ନୁହେଁ, କ୍ରୋଧ ହିଁ ପରିଣାମକୁ ଚାଳାଏ।

Verse 9

अहमेते निगृल्लीयां बाहुभ्यां सचराचरे । यदि ये दोनों लोक सहसा कुपित होकर दो शिलाओंकी भाँति परस्पर टकराने लगें, तो मैं चराचर प्राणियोंसहित इन्हें अपनी दोनों भुजाओंसे रोक सकता हूँ ।। ८ हू ।। पश्यैतदन्तरं बाद्वोर्महापरिघयोरिव

ମୁଁ ଏମାନଙ୍କୁ—ଚରାଚର ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀ ସହିତ—ମୋର ଦୁଇ ଭୁଜାରେ ଧରି ରୋକିପାରିବି; ଯଦି ଦୁଇ ଲୋକ ମଧ୍ୟ ହଠାତ୍ କ୍ରୋଧିତ ହୋଇ ଦୁଇ ଶିଳା ପରି ପରସ୍ପର ଟକ୍କର ଖାଇବାକୁ ଆସନ୍ତି ତଥାପି। ଦେଖ, ମୋ ଭୁଜାଦ୍ୱୟ ମଧ୍ୟର ଏହି ଅନ୍ତର—ଦୁଇ ମହାପରିଘ ମଧ୍ୟର ଖାଲି ଜାଗା ପରି।

Verse 10

हिमवांश्व समुद्रश्न वजी वा बलभित्‌ स्वयम्‌

ହିମବାନ୍ ହେଉ କି ସମୁଦ୍ର, କିମ୍ବା ବଲକୁ ବଧ କରିଥିବା ବଜ୍ରଧାରୀ ଇନ୍ଦ୍ର ସ୍ୱୟଂ—ଦୃଢ଼ ବଳର ସମ୍ମୁଖେ ଏମାନେ ମଧ୍ୟ ମୋର ପହଞ୍ଚରୁ ପରେ ନୁହେଁ।

Verse 11

मयाभिपन्नं त्रायेरन्‌ बलमास्थाय न त्रयः । जो मेरी पकड़में आ जायगा, उसे हिमालय पर्वत, विशाल महासागर तथा बल नामक दैत्यका विनाश करनेवाले साक्षात्‌ वज्रधारी इन्द्र--ये तीनों अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी बचा नहीं सकते ।। १० ह || युद्धाह्नि क्षत्रियान्‌ सर्वान्‌ पाण्डवेष्वाततायिन:

ଯେ ମୋର ଧରାରେ ପଡ଼ିବ, ତାକୁ ଏ ତିନିଜଣ—ହିମବାନ୍, ବିଶାଳ ସମୁଦ୍ର, ଏବଂ ବଲକୁ ବଧ କରିଥିବା ବଜ୍ରଧାରୀ ଇନ୍ଦ୍ର ସ୍ୱୟଂ—ସମସ୍ତ ବଳ ଲଗାଇଲେ ମଧ୍ୟ ଉଦ୍ଧାର କରିପାରିବେ ନାହିଁ। ଏବଂ ଯୁଦ୍ଧଦିନେ, ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଉପରେ ଆତତାୟୀ ହୋଇଥିବା ସମସ୍ତ କ୍ଷତ୍ରିୟ…

Verse 12

न हि त्वं नाभिजानासि मम विक्रममच्युत

ହେ ଅଚ୍ୟୁତ! ତୁମେ ମୋର ବିକ୍ରମର ସତ୍ୟ ପରିମାଣ ଜାଣ ନାହ।

Verse 13

अथ चेन्मां न जानासि सूर्यस्येवोद्यत: प्रभाम्‌

ଯଦି ତୁମେ ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ମୋତେ ଚିହ୍ନିନାହ, ତେବେ ଉଦୟମାନ ସୂର୍ଯ୍ୟର ପ୍ରଭା ପରି ମୋର ତେଜକୁ ଦେଖ।

Verse 14

विगाढे युधि सम्बाधे वेत्स्यसे मां जनार्दन । जनार्दन! यदि कदाचित्‌ आप मुझे या मेरे पराक्रमको न जानते हों तो जब भयंकर संहारकारी घमासान युद्ध प्रारम्भ होगा, उस समय उगते हुए सूर्यकी प्रभाके समान आप मुझे अवश्य जान लेंगे ।। १३ ह ।। परुषैराक्षिपसि किं व्रणं पूतिमिवोन्नयन्‌,पके हुए घावको चाकूसे चीरने या उकसानेवाले पुरुषके समान आप मुझे अपने कठोर वचनोंद्वारा तिरस्कृत क्यों कर रहे हैं?

ହେ ଜନାର୍ଦନ! ଯୁଦ୍ଧ ଘନ ହୋଇ ସମରସଙ୍କୁଳ ହେଲେ, ସେଇ ଭିଡ଼ରେ ତୁମେ ମୋତେ ନିଶ୍ଚୟ ଚିହ୍ନିବ। ତେବେ କାହିଁକି କଠୋର ବଚନରେ ମୋତେ ଉତ୍ତେଜିତ କରୁଛ—ପଚା ଘାଉକୁ କୁରେଦି ବେଦନା ବଢ଼ାଇବା ପରି?

Verse 15

यथामति ब्रवीम्येतद्‌ विद्धि मामधिकं ततः । द्रष्टासि युधि सम्बाधे प्रवृत्ते वैशसेडहनि,मैं अपनी बुद्धिके अनुसार यहाँ जो कुछ कह रहा हूँ, उससे भी बढ़-चढ़कर मुझे समझें। जिस समय योद्धाओंसे खचाखच भरे हुए युद्धमें भयानक मारकाट मचेगी, उस दिन मुझे देखियेगा

ମୁଁ ମୋର ବୁଦ୍ଧି ଅନୁସାରେ ଏହା କହୁଛି; କିନ୍ତୁ ମୋତେ ଏହାଠାରୁ ଅଧିକ ବୋଲି ଜାଣ। ଯୁଦ୍ଧର ଭିଡ଼ରେ ଭୟଙ୍କର ସଂହାରର ଦିନ ଆରମ୍ଭ ହେଲେ, ସେଦିନ ତୁମେ ମୋତେ ଦେଖିବ।

Verse 16

मया प्रणुन्नान्‌ मातड्रान्‌ रथिन: सादिनस्तथा । तथा नरानभिक्रुद्ध॑ निष्नन्तं क्षत्रियर्षभान्‌

ମୁଁ ମଦୋନ୍ମତ୍ତ ହାତୀମାନଙ୍କୁ ହଂକାଇଛି; ଏହିପରି ରଥୀ ଓ ଅଶ୍ୱାରୋହୀମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ। ଏବଂ କ୍ରୋଧରେ ଧାଇଆସିଥିବା—କ୍ଷତ୍ରିୟଶ୍ରେଷ୍ଠମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ନିହତ କରିଛି।

Verse 17

न मे सीदन्ति मज्जानो न ममोद्वेपते मन:,मेरी मज्जा शिथिल नहीं हो रही है और न मेरा हृदय ही काँप रहा है। मधुसूदन! यदि समस्त संसार अत्यन्त कुपित होकर मुझपर आक्रमण करे, तो भी उससे मुझे भय नहीं है; किंतु मैंने जो शान्तिका प्रस्ताव किया है, यह तो केवल मेरा सौहार्द ही है। मैं दयावश सारे क्लेश सह लेनेको तैयार हूँ और चाहता हूँ कि हमारे कारण भरतवंशियोंका नाश न हो

ମୋର ମଜ୍ଜା ଶିଥିଳ ହୁଏନାହିଁ, ନା ମୋର ମନ ପଛକୁ ହଟେ।

Verse 18

सर्वलोकादभिक्रुद्धान्न भयं विद्यते मम । कि तु सौहृदमेवैतत्‌ कृपया मधुसूदन । सर्वास्तितिक्षे संक्लेशान्‌ मा सम नो भरता नशन्‌,मेरी मज्जा शिथिल नहीं हो रही है और न मेरा हृदय ही काँप रहा है। मधुसूदन! यदि समस्त संसार अत्यन्त कुपित होकर मुझपर आक्रमण करे, तो भी उससे मुझे भय नहीं है; किंतु मैंने जो शान्तिका प्रस्ताव किया है, यह तो केवल मेरा सौहार्द ही है। मैं दयावश सारे क्लेश सह लेनेको तैयार हूँ और चाहता हूँ कि हमारे कारण भरतवंशियोंका नाश न हो

ମଧୁସୂଦନ! ସମଗ୍ର ଲୋକ ଅତ୍ୟନ୍ତ କ୍ରୋଧିତ ହୋଇ ମୋପରେ ଆକ୍ରମଣ କଲେ ମଧ୍ୟ ମୋତେ ଭୟ ନାହିଁ। କିନ୍ତୁ ମୁଁ ଯେ ଶାନ୍ତିର ପ୍ରସ୍ତାବ ରଖିଛି, ସେ ମାତ୍ର ସୌହାର୍ଦ୍ୟବଶତଃ। କରୁଣାବଶେ ମୁଁ ସମସ୍ତ କ୍ଲେଶ ସହିବାକୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ; ଆମ କାରଣରୁ ଭରତବଂଶୀମାନଙ୍କର ନାଶ ନ ହେଉ—ଏହି ମୋର ଇଚ୍ଛା।

Verse 26

वेत्सि दाशार्ह सत्यं मे दीर्घकालं सहोषित: । भीमसेनने कहा--अच्युत! मैं करना तो कुछ और चाहता हूँ, परंतु आप समझ कुछ और ही रहे हैं। दशाहनन्दन! आप दीर्घकालतक मेरे साथ रहे हैं। अतः मेरे विषयमें यह सच्ची जानकारी रखते ही होंगे कि मेरा युद्धमें अत्यन्त अनुराग है और मेरा पराक्रम भी मिथ्या नहीं है

ଭୀମସେନ କହିଲେ—ଅଚ୍ୟୁତ! ଦାଶାର୍ହବଂଶଜ! ତୁମେ ଦୀର୍ଘକାଳ ମୋ ସହିତ ନିକଟରେ ରହିଛ; ତେଣୁ ମୋ ବିଷୟରେ ସତ୍ୟ ଜାଣ। ଏହିପରି ତୁମେ ନିଶ୍ଚୟ ବୁଝୁଛ—ମୋ ହୃଦୟରେ ଯୁଦ୍ଧ ପ୍ରତି ଗଭୀର ଅନୁରାଗ ଅଛି, ଏବଂ ମୋର ପରାକ୍ରମ ଖାଲି ଦମ୍ଭ ନୁହେଁ।

Verse 46

ब्रूयादप्रतिरूपाणि यथा मां वक्तुमहसि । माधव! मुझ भीमसेनको अच्छी तरह जाननेवाला कोई भी मनुष्य मेरे प्रति ऐसे अयोग्य वचन, जैसे आप कह रहे हैं, कैसे कह सकता है?

ଭୀମସେନ କହିଲେ—ମାଧବ! ଯେ ମୋତେ ଭଲଭାବେ ଜାଣେ, ସେ ତୁମେ କହୁଥିବା ପରି ଅନୁଚିତ କଥା ମୋ ପ୍ରତି କିପରି କହିପାରିବ? ମୋ ସ୍ୱଭାବ ବୁଝୁଥିବା ଲୋକ ମୋର ସଙ୍କଳ୍ପକୁ ହ୍ରାସ କରୁଥିବା ଉକ୍ତି କହିବେ ନାହିଁ।

Verse 56

आत्मन: पौरुषं चैव बल॑ं च न सम॑ परै: । वृष्णिकुलनन्दन! इसीलिये मैं आपसे अपने उस पौरुष तथा बलका वर्णन करना चाहता हूँ, जिसकी समानता दूसरे लोग नहीं कर सकते

ବୃଷ୍ଣିକୁଳନନ୍ଦନ! ଏହି କାରଣରୁ ମୁଁ ମୋର ସେହି ପୌରୁଷ ଓ ବଳ ବିଷୟରେ ତୁମକୁ ବର୍ଣ୍ଣନା କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛି, ଯାହାର ସମତା ଅନ୍ୟେ କେହି କରିପାରିବେ ନାହିଁ।

Verse 66

अतिवादापविद्धस्तु वक्ष्यामि बलमात्मन: । यद्यपि स्वयं अपनी प्रशंसा करना सर्वथा नीच पुरुषोंका ही कार्य है, तथापि आपने जो मेरे सम्मानके विपरीत बातें कहकर मेरा तिरस्कार किया है, उससे पीड़ित होकर मैं अपने बलका बखान करता हूँ

ଭୀମସେନ କହିଲେ—ତୁମର ଅତିଶୟ ଓ ଅପମାନଜନକ କଥାରେ ଆହତ ହୋଇ ଏବେ ମୁଁ ମୋର ବଳ ବିଷୟରେ କହିବି। ଯଦିଓ ନିଜ ପ୍ରଶଂସା କରିବାକୁ ସାଧାରଣତଃ ନୀଚଙ୍କ କାମ ବୋଲି ଧରାଯାଏ, ତଥାପି ମୋ ସମ୍ମାନ ବିରୋଧରେ ତୁମ କଥା ମୋତେ ପୀଡ଼ା ଦେଇଛି; ସେହି ତିରସ୍କାରରେ ବାଧ୍ୟ ହୋଇ ମୁଁ ମୋର ଶକ୍ତି ପ୍ରକାଶ କରୁଛି।

Verse 76

अचले चाप्रतिष्ठे चाप्यनन्ते सर्वमातरौ । श्रीकृष्ण! आप इस भूतल और स्वर्गलोकपर दृष्टिपात करें। इन्हीं दोनोंके भीतर ये समस्त प्रजाजन निवास करते हैं। ये दोनों सबके माता-पिता हैं। इन्हें अचल एवं अनन्त माना गया है। ये दूसरोंके आधार होते हुए भी स्वयं आधारशून्य हैं,इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि भीमसेनवाक्ये षट्सप्ततितमो<डध्याय:

ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! ଏହି ଭୂତଳ ଓ ସ୍ୱର୍ଗଲୋକ ଉପରେ ଦୃଷ୍ଟି ପାତ କରନ୍ତୁ। ଏହି ଦୁଇ ଲୋକର ମଧ୍ୟରେ ହିଁ ସମସ୍ତ ପ୍ରଜାଜନ ବସବାସ କରନ୍ତି। ଏହି ଦୁଇଟିକୁ ସମସ୍ତଙ୍କ ମାତା-ପିତା ସମାନ କୁହାଯାଏ—ଅଚଳ ଓ ଅନନ୍ତ। ଏମାନେ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ଆଧାର ଦିଅନ୍ତି, କିନ୍ତୁ ନିଜେ କୌଣସି ଆଧାରରେ ନୁହେଁ।

Verse 93

य एतत्‌ प्राप्य मुच्येत न त॑ पश्यामि पूरुषम्‌ । लोहेके विशाल परिघोंकी भाँति मेरी इन मोटी भुजाओंका मध्यभाग कैसा है, यह देख लीजिये। मैं ऐसे किसी वीर पुरुषको नहीं देखता, जो इनके भीतर आकर फिर जीवित निकल जाय

ମୋ ଏହି ମୋଟା ଭୁଜାଦ୍ୱୟର ଗ୍ରାସରେ ପଡ଼ି ପୁଣି ମୁକ୍ତି ପାଇ ଜୀବନ୍ତ ଭାବେ ବାହାରିବ—ଏମିତି କୌଣସି ପୁରୁଷକୁ ମୁଁ ଦେଖୁନାହିଁ। ଲୋହାର ବିଶାଳ ପରିଘ ପରି ମୋ ଭୁଜମଧ୍ୟର ବଳ ଦେଖ; ଯେ ଏଥିରେ ଧରାପଡ଼ିବ ସେ ଜୀବନ୍ତ ନିଷ୍କ୍ରମଣ କରିପାରିବ ନାହିଁ।

Verse 113

अध: पादतलेनैतानधिष्ठास्यामि भूतले । पाण्डवोंके प्रति आततायी बने हुए इन समस्त क्षत्रियोंको, जो युद्धके लिये उद्यत हुए हैं, मैं नीचे पृथ्वीपर गिराकर पैरोंतले रौंद डालूँगा

ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଆତତାୟୀ ହୋଇ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଉଦ୍ୟତ ହୋଇଥିବା ଏହି ସମସ୍ତ କ୍ଷତ୍ରିୟଙ୍କୁ ମୁଁ ଭୂମିରେ ପକାଇ, ପାଦତଳେ ଦଳିଦେବି।

Verse 126

यथा मया विनिर्जित्य राजानो वशगा: कृता: । अच्युत! मैंने राजाओंको जिस प्रकार युद्धमें जीतकर अपने अधीन किया था, मेरे उस पराक्रमसे आप अपरिचित नहीं हैं

ଅଚ୍ୟୁତ! ମୁଁ ଯେପରି ଯୁଦ୍ଧରେ ରାଜାମାନଙ୍କୁ ଜିତି ବଶୀଭୂତ କରିଥିଲି, ମୋ ସେହି ପରାକ୍ରମ ଆପଣଙ୍କୁ ଅପରିଚିତ ନୁହେଁ।

Verse 166

द्रष्टा मां त्वं च लोकश्न विकर्षन्तं वरान्‌ वरान्‌ जब (घमासान युद्धमें) मैं कुपित होकर मतवाले हाथियों, रथियों तथा घुड़सवारोंको धराशायी करना और फेंकना आरम्भ करूँगा एवं दूसरे श्रेष्ठ क्षत्रियवीरोंका वध करने लगूँगा, उस समय आप और दूसरे लोग भी मुझे देखेंगे कि मैं किस प्रकार चुन-चुनकर प्रधान-प्रधान वीरोंका संहार कर रहा हूँ

ଲୋକଜ୍ଞ! ଯେତେବେଳେ ଘୋର ସମରରେ ମୁଁ କ୍ରୋଧିତ ହୋଇ ମତ୍ତ ହାତୀ, ରଥୀ ଓ ଅଶ୍ୱାରୋହୀମାନଙ୍କୁ ଧରାଶାୟୀ କରି ଫେଙ୍କିବା ଆରମ୍ଭ କରିବି, ଏବଂ ଅନ୍ୟ ଶ୍ରେଷ୍ଠ କ୍ଷତ୍ରିୟବୀରମାନଙ୍କୁ ବଧ କରିବାକୁ ଲାଗିବି—ସେତେବେଳେ ଆପଣ ଓ ଅନ୍ୟମାନେ ମୋତେ ଦେଖିବେ: ମୁଁ କିପରି ଏକେକରି ପ୍ରଧାନ ପ୍ରଧାନ ବୀରଙ୍କୁ ବାଛି ବାଛି ସଂହାର କରୁଛି।

Frequently Asked Questions

The dilemma is how to act responsibly when dharma is ambiguous and outcomes are uncertain: whether to attribute results to contingency (daiva) or to human initiative (pauruṣa), and how to choose action without either fatalism or arrogance.

Undertake well-reasoned action with steadiness, recognizing mixed causality; avoid psychological extremes by focusing on duty and process rather than treating success or failure as absolute personal validation or condemnation.

No explicit phalaśruti is stated; the meta-commentary is pragmatic and ethical—framing composure, accountability, and diplomatic intent as the proper orientation for agents operating amid political risk and uncertain results.