Udyoga-parva Adhyāya 69: Dhṛtarāṣṭra’s Reverential Address to Sañjaya on Vāsudeva
कृषिर्भूवाचक: शब्दो णश्न निर्वतिवाचक: । विष्णुस्तद्भधावयोगाच्च कृष्णो भवति सात्वत:,“कृष' धातु सत्ता अर्थका वाचक है और “ण” शब्द आनन्द अर्थका बोध कराता है, इन दोनों भावोंसे युक्त होनेके कारण यदुकुलमें अवतीर्ण हुए नित्य आनन्दस्वरूप श्रीविष्णु “कृष्ण” कहलाते हैं
‘କୃଷ୍’ ଧାତୁ ସତ୍ତା/ଭୂ ଅର୍ଥକୁ ସୂଚାଏ ଏବଂ ‘ଣ’ ଶବ୍ଦ ନିର୍ବୃତି—ଆନନ୍ଦ—କୁ ବୋଧ କରାଏ। ଏହି ଦୁଇ ଭାବର ଯୋଗରୁ, ଯଦୁବଂଶରେ ଅବତୀର୍ଣ୍ଣ ନିତ୍ୟାନନ୍ଦସ୍ୱରୂପ ଭଗବାନ ବିଷ୍ଣୁ ‘କୃଷ୍ଣ’ ବୋଲି ପରିଚିତ।
संजय उवाच