
Udyoga-parva Adhyāya 69: Dhṛtarāṣṭra’s Reverential Address to Sañjaya on Vāsudeva
Upa-parva: Sanjaya–Dhritarashtra Dialogue on Vasudeva (Contextual Hymnic Praise Episode)
This chapter presents Dhṛtarāṣṭra’s speech to Sañjaya in which he expresses yearning for those able to behold Vāsudeva nearby, described as radiant and direction-illuminating. The discourse proceeds through a sequence of elevated descriptors: Vāsudeva as the stirring voice and revered speech among the Bhāratas; as the singular hero and leader of the Yādavas; as a disruptor of adversarial confidence and a remover of opponents’ fame; and as a figure whose compassionate, non-cruel speech can ‘bewilder’ or morally disarm Dhṛtarāṣṭra’s party. The language culminates in cosmological identifications—Vāsudeva as ancient seer, ocean of speech, refuge beyond refuges, creator-like principle associated with the ordering of the three worlds, and a supreme shelter invoked through explicit acts of taking refuge (śaraṇa-prapatti). The thematic lesson is the fusion of political anticipation with theological recognition: Kṛṣṇa’s authority is framed as simultaneously rhetorical (ethical speech), strategic (leadership and deterrence), and metaphysical (cosmic ground).
Chapter Arc: धृतराष्ट्र, संजय से पुनः पूछते हैं—‘पुण्डरीकाक्ष’ श्रीकृष्ण के विविध नामों की व्युत्पत्ति और उनका रहस्य मुझे विस्तार से सुनाओ; जिन नामों में स्वयं धर्म का प्रकाश छिपा है, वे कैसे बने? → संजय कहता है कि उसने वासुदेव के शुभ नाम-निर्वचन को सुना है; फिर एक-एक नाम के अर्थ खोलते हुए वह कृष्ण की सर्वव्यापकता, अविनाशिता और लोक-व्यापी सत्ता का संकेत देता है—मानो राजसभा में युद्ध-पूर्व क्षणों में ईश्वर-परिचय का दीपक जल रहा हो। → नामों की व्युत्पत्ति के माध्यम से कृष्ण का ‘सत्य’ से अभिन्न होना उभरता है—‘गोविन्द’ सत्य में प्रतिष्ठित हैं और सत्य उनमें; साथ ही ‘अधोक्षज’, ‘नारायण’, ‘विष्णु’, ‘जिष्णु’ आदि नामों से उनका अजेय, अवनत न होने वाला, और त्रिलोकी-विक्रमी स्वरूप चरम पर पहुँचता है। → संजय नामों के अर्थों को समेटकर यह स्थापित करता है कि ये नाम केवल संबोधन नहीं, बल्कि भगवान् के गुण, कर्म और तत्त्व का संक्षिप्त वेद हैं—जिससे धृतराष्ट्र को कृष्ण-तत्त्व का बोध और आगामी निर्णयों के लिए नैतिक आलोक मिलता है। → कृष्ण के नामों से सत्य और धर्म का मानदण्ड तो स्पष्ट हो गया—अब प्रश्न यह रह जाता है कि धृतराष्ट्र और कौरव उस मानदण्ड के सामने झुकेंगे या उसे अनसुना कर युद्ध की ओर बढ़ेंगे।
Verse 1
ऑपन--माजल बछ। अकाल सप्ततितमो<ध्याय: भगवान् श्रीकृष्णके विभिन्न नामोंकी व्युत्पत्तियोंका कथन धृतराष्ट उवाच भूयो मे पुण्डरीकाक्षं संजयाचक्ष्व पृच्छत: । नामकर्मार्थिवित् तात प्राप्तुयां पुरुषोत्तमम्,धृतराष्ट्र बोले--संजय! तुम भगवान् श्रीकृष्णके नाम और कर्मोका अभिप्राय जानते हो, अतः मेरे प्रश्नके अनुसार एक बार पुनः कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णका वर्णन करो
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ସଞ୍ଜୟ, ମୋ ପ୍ରଶ୍ନର ଉତ୍ତରରେ ପୁନର୍ବାର କମଳନୟନ ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ବର୍ଣ୍ଣନା କର। ତାତ, ତୁମେ ତାଙ୍କର ନାମ ଓ କର୍ମର ଅନ୍ତର୍ଥ ଜାଣ; ତେଣୁ ସେହି ପୁରୁଷୋତ୍ତମଙ୍କୁ କିପରି ପ୍ରାପ୍ତ କରାଯାଏ, କହ।
Verse 2
संजय उवाच श्रुतं मे वासुदेवस्य नामनिर्वचनं शुभम् | यावत् तत्राभिजाने5हमप्रमेयो हि केशव:,संजयने कहा--राजन्! मैंने वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके नामोंकी मंगलमयी व्युत्पत्ति सुन रखी है, उसमें जितना मुझे स्मरण है, उतना बता रहा हूँ। वास्तवमें तो भगवान् श्रीकृष्ण समस्त प्राणियोंकी पहुँचसे परे हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ରାଜନ୍! ବସୁଦେବନନ୍ଦନ ବାସୁଦେବଙ୍କ ନାମମାନଙ୍କର ମଙ୍ଗଳମୟ ବ୍ୟୁତ୍ପତ୍ତି ଓ ତାତ୍ପର୍ୟ ମୁଁ ଶୁଣିଛି। ଯେତେ ମୋତେ ସ୍ମରଣ ଅଛି, ସେତେ ମାତ୍ର କହୁଛି; କାରଣ କେଶବ ସତ୍ୟରେ ଅପ୍ରମେୟ—ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ପହଞ୍ଚର ପରେ।
Verse 3
वसनात् सर्वभूतानां वसुत्वाद् देवयोनित: । वासुदेवस्ततो वेद्यो बृहत्त्वाद् विष्णुरुच्यते,भगवान् समस्त प्राणियोंके निवासस्थान हैं तथा वे सब भूतोंमें वास करते हैं, इसलिये “वसु' हैं एवं देवताओंकी उत्पत्तिके स्थान होनेसे और समस्त देवता उनमें वास करते हैं, इसलिये उन्हें 'देव” कहा जाता है। अतएव उनका नाम “वासुदेव” है, ऐसा जानना चाहिये। बृहत् अर्थात् व्यापक होनेके कारण वे ही “विष्णु' कहलाते हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସମସ୍ତ ଭୂତଙ୍କର ନିବାସସ୍ଥାନ ହେବାରୁ ଏବଂ ସମସ୍ତ ଭୂତମଧ୍ୟରେ ସ୍ୱୟଂ ବାସ କରିବାରୁ ସେ ‘ବସୁ’ ଭାବେ ପରିଚିତ। ଦେବମାନଙ୍କର ଉତ୍ପତ୍ତିସ୍ଥାନ ହେବାରୁ ଏବଂ ସମସ୍ତ ଦେବତା ତାଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅଧିଷ୍ଠିତ ଥିବାରୁ ସେ ‘ଦେବ’ କୁହାଯାନ୍ତି। ଏହିପରି ସେ ‘ବାସୁଦେବ’ ନାମରେ ଜଣାଯିବା ଉଚିତ। ଏବଂ ବୃହତ୍ତ୍ୱ—ଅର୍ଥାତ୍ ସର୍ବବ୍ୟାପକତା—ହେତୁ ସେ ‘ବିଷ୍ଣୁ’ କୁହାଯାନ୍ତି।
Verse 4
मौनाद् ध्यानाच्च योगाच्च विद्धि भारत माधवम् | सर्वतत्त्वमयत्वाच्च मधुहा मधुसूदन:,भारत! मौन, ध्यान और योगसे उनका बोध अथवा साक्षात्कार होता है; इसलिये आप उन्हें “माधव” समझें। मधु शब्दसे प्रतिपादित पृथ्वी आदि सम्पूर्ण तत्त्वोंके उपादान एवं अधिष्ठान होनेके कारण मधुसूदन श्रीकृष्णको “मधुहा' कहा गया है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ମୌନ, ଧ୍ୟାନ ଓ ଯୋଗ ଦ୍ୱାରା ତାଙ୍କର ବୋଧ ହୁଏ; ତେଣୁ ତାଙ୍କୁ ‘ମାଧବ’ ବୋଲି ଜାଣ। ଏବଂ ସେ ସର୍ବତତ୍ତ୍ୱମୟ, ସମସ୍ତ ତତ୍ତ୍ୱର ଆଧାର ହେବାରୁ ମଧୁସୂଦନ ‘ମଧୁହା’ ବୋଲି ମଧ୍ୟ କୁହାଯାନ୍ତି।
Verse 5
कृषिर्भूवाचक: शब्दो णश्न निर्वतिवाचक: । विष्णुस्तद्भधावयोगाच्च कृष्णो भवति सात्वत:,“कृष' धातु सत्ता अर्थका वाचक है और “ण” शब्द आनन्द अर्थका बोध कराता है, इन दोनों भावोंसे युक्त होनेके कारण यदुकुलमें अवतीर्ण हुए नित्य आनन्दस्वरूप श्रीविष्णु “कृष्ण” कहलाते हैं
‘କୃଷ୍’ ଧାତୁ ସତ୍ତା/ଭୂ ଅର୍ଥକୁ ସୂଚାଏ ଏବଂ ‘ଣ’ ଶବ୍ଦ ନିର୍ବୃତି—ଆନନ୍ଦ—କୁ ବୋଧ କରାଏ। ଏହି ଦୁଇ ଭାବର ଯୋଗରୁ, ଯଦୁବଂଶରେ ଅବତୀର୍ଣ୍ଣ ନିତ୍ୟାନନ୍ଦସ୍ୱରୂପ ଭଗବାନ ବିଷ୍ଣୁ ‘କୃଷ୍ଣ’ ବୋଲି ପରିଚିତ।
Verse 6
पुण्डरीकं परं धाम नित्यमक्षयमव्ययम् । तद्धभावात् पुण्डरीकाक्षो दस्युत्रासाज्जनार्दन:
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—‘ପୁଣ୍ଡରୀକ’ ହେଉଛି ପରମ ଧାମ—ନିତ୍ୟ, ଅକ୍ଷୟ ଓ ଅବ୍ୟୟ। ସେହି ପରମ ତତ୍ତ୍ୱରେ ତାଙ୍କର ଭାବ-ସ୍ଥିତି ଥିବାରୁ ସେ ‘ପୁଣ୍ଡରୀକାକ୍ଷ’; ଏବଂ ଦସ୍ୟୁମାନଙ୍କୁ ଭୟଭୀତ କରି ଦମନ କରିବାରୁ ସେ ‘ଜନାର୍ଦନ’।
Verse 7
नित्य, अक्षय, अविनाशी एवं परम भगवद्धामका नाम पुण्डरीक है। उसमें स्थित होकर जो अक्षतभावसे विराजते हैं, वे भगवान् 'पुण्डरीकाक्ष' कहलाते हैं। (अथवा पुण्डरीक-- कमलके समान उनके अक्षि--नेत्र हैं, इसलिये उनका नाम पुण्डरीकाक्ष है)। दस्युजनोंको त्रास (अर्दन या पीड़ा) देनेके कारण उनको “जनार्दन” कहते हैं ।। यतः सत्त्वान्न च्यवते यच्च सत्त्वान्न हीयते । सत्त्वतः सात्वतस्तस्मादार्षभाद् वृषभेक्षण:
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସେ ସତ୍ତ୍ୱ (ସଦ୍ଗୁଣ) ଠାରୁ କେବେ ଚ୍ୟୁତ ହୁଅନ୍ତି ନାହିଁ, ଏବଂ ତାଙ୍କର ସତ୍ତ୍ୱ କେବେ କ୍ଷୟ ହୁଏ ନାହିଁ; ତେଣୁ ସେ ‘ସାତ୍ୱତ’ ବୋଲି ପରିଚିତ। ଧର୍ମୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ—ଯେପରି ଗୋସମୂହରେ ବୃଷଭ—ଏହିକାରଣେ ସେ ‘ବୃଷଭେକ୍ଷଣ’ (ବୃଷଭ-ନୟନ) ମଧ୍ୟ କୁହାଯାନ୍ତି।
Verse 8
वे सत्यसे कभी च्युत नहीं होते और न सत्त्वसे अलग ही होते हैं, इसलिये सद्भावके सम्बन्धसे उनका नाम 'सात्वत” है। आर्ष कहते हैं वेदको, उससे भासित होनेके कारण भगवानका एक नाम “आर्षभ' है। आर्षभके योगसे ही वे “वृषभेक्षण” कहलाते हैं (वृषभका अर्थ है वेद, वही ईक्षण--नेत्रके समान उनका ज्ञापक है; इस व्युत्पत्तिके अनुसार वृषभेक्षण नामकी सिद्धि होती है) ।। न जायते जनित्रायमजस्तस्मादनीकजित् । देवानां स्वप्रकाशत्वाद् दमाद् दामोदरो विभु:,शत्रुसेनाओंपर विजय पानेवाले ये भगवान् श्रीकृष्ण किसी जन्मदाताके द्वारा जन्म ग्रहण नहीं करते हैं, इसलिये “अज” कहलाते हैं। देवता स्वयंप्रकाशरूप होते हैं, अतः उत्कृष्ट रूपसे प्रकाशित होनेके कारण भगवान् श्रीकृष्णको “उदर' कहा गया है और दम (इन्द्रियसंयम) नामक गुणसे सम्पन्न होनेके कारण उनका नाम “दाम” है। इस प्रकार दाम और उदर--इन दोनों शब्दोंके संयोगसे वे 'दामोदर' कहलाते हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଶତ୍ରୁସେନାଜୟୀ, ସର୍ବବ୍ୟାପୀ ପ୍ରଭୁ କୌଣସି ଜନକ ଦ୍ୱାରା ଜନ୍ମ ଗ୍ରହଣ କରନ୍ତି ନାହିଁ; ତେଣୁ ସେ ‘ଅଜ’ (ଅଜନ୍ମା)। ଦେବତ୍ୱ ସ୍ୱପ୍ରକାଶ ଥିବାରୁ ପରମ ପ୍ରକାଶିତ ଭାବେ ସେ ‘ଉଦର’ ବୋଲି କୁହାଯାନ୍ତି; ଏବଂ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ-ନିଗ୍ରହ (ଦମ) ଗୁଣରୁ ସେ ‘ଦାମ’। ‘ଦାମ’ ଓ ‘ଉଦର’—ଏହି ଦୁଇର ସଂଯୋଗରୁ ସେ ‘ଦାମୋଦର’ ନାମେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ।
Verse 9
हर्षात् सुखात् सुखैश्वर्याद्धूषीकेशत्वम श्रुते । बाहुभ्यां रोदसी बिश्रन्महाबाहुरिति स्मृतः,वे हर्ष अर्थात् सुखसे युक्त होनेके कारण हृषीक हैं और सुख-ऐश्वर्यसे सम्पन्न होनेके कारण “ईश' कहे गये हैं। इस प्रकार वे भगवान् 'हृषीकेश” नाम धारण करते हैं। अपनी दोनों बाहुओंद्वारा भगवान् इस पृथ्वी और आकाशको धारण करते हैं, इसलिये उनका नाम “महाबाहु' है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହର୍ଷ ଓ ସୁଖରେ ଯୁକ୍ତ, ଏବଂ ସୁଖ-ଐଶ୍ୱର୍ୟରେ ସମ୍ପନ୍ନ ଥିବାରୁ ସେ ‘ହୃଷୀକେଶ’ ନାମେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ। ଏବଂ ନିଜ ଦୁଇ ଭୁଜାଦ୍ୱାରା ପୃଥିବୀ ଓ ଆକାଶ—ଏହି ଦୁଇ ଲୋକକୁ ଧାରଣ କରୁଥିବାରୁ ସେ ‘ମହାବାହୁ’ ବୋଲି ସ୍ମରଣୀୟ।
Verse 10
अधो न क्षीयते जातु यस्मात् तस्मादधोक्षज: । नराणामयनाच्चापि ततो नारायण: स्मृत:,श्रीकृष्ण कभी नीचे गिरकर क्षीण नहीं होते, अतः (“अधो न क्षीयते जातु'--इस व्युत्पत्तिके अनुसार) “अधोक्षज' कहलाते हैं। वे नरों (जीवात्माओं)-के अयन (आश्रय) हैं, इसलिये उन्हें “नारायण” भी कहते हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସେ କେବେ ଅଧୋଗତ ହୋଇ କ୍ଷୟ ପାଉନ୍ତି ନାହିଁ; ତେଣୁ ସେ ‘ଅଧୋକ୍ଷଜ’ ବୋଲି ପରିଚିତ। ଏବଂ ସେ ନରମାନଙ୍କ (ଜୀବମାନଙ୍କ) ଅୟନ—ଆଶ୍ରୟ—ହେବାରୁ ସେ ‘ନାରାୟଣ’ ବୋଲି ମଧ୍ୟ ସ୍ମରଣୀୟ।
Verse 11
पूरणात् सदनाच्चापि ततो$सौ पुरुषोत्तम: | असतश्न सतश्वैव सर्वस्य प्रभवाप्ययात्
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ପୂରଣ ଓ ସଦନ (ଲୟ/ସଂହାର)—ଏହି ଦୁଇଠାରୁ ମଧ୍ୟ ପରେ ସେଇ ପୁରୁଷୋତ୍ତମ; କାରଣ ଅସତ୍ ଓ ସତ୍—ଉଭୟର, ଏବଂ ସମସ୍ତର, ଉଦ୍ଭବ ତାଙ୍କଠାରୁ ହୁଏ ଓ ଲୟ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କରେ ହୁଏ।
Verse 12
सर्वस्य च सदा ज्ञानात् सर्वमेतं प्रचक्षते । वे सर्वत्र परिपूर्ण हैं तथा सबके निवासस्थान हैं, इसलिये 'पुरुष' हैं और सब पुरुषोंमें उत्तम होनेके कारण उनकी पुरुषोत्तम" संज्ञा है। वे सत् और असत् सबकी उत्पत्ति और लयके स्थान हैं तथा सर्वदा उन सबका ज्ञान रखते हैं; इसलिये उन्हें “सर्व” कहते हैं ।। ११ ६ || सत्ये प्रतिष्ठित: कृष्ण: सत्यमत्र प्रतिष्ठितम्
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସେ ସଦା ସମସ୍ତଙ୍କର ଜ୍ଞାନ ଧାରଣ କରନ୍ତି, ତେଣୁ ଜ୍ଞାନୀମାନେ ତାଙ୍କୁ ‘ସର୍ବ’ ବୋଲି କହନ୍ତି। କୃଷ୍ଣ ସତ୍ୟରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ; ସତ୍ୟ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କଠାରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ।
Verse 13
विष्णुविक्रमणाद् देवो जयनाज्जिष्णुरुच्यते
ବିଷ୍ଣୁଙ୍କ ବିକ୍ରମ କାରଣରୁ ସେ ‘ଦେବ’ ବୋଲି କୁହାଯାନ୍ତି; ଯୁଦ୍ଧରେ ଜୟୀ ହେବାରୁ ‘ଜିଷ୍ଣୁ’ ବୋଲି ଉଚ୍ଚାରିତ।
Verse 14
अतत्त्वं कुरुते तत्त्व तेन मोहयते प्रजा:,वे अपनी सत्ता-स्फूर्ति देकर असत्यको भी सत्य-सा कर देते हैं और इस प्रकार सारी प्रजाको मोहमें डाल देते हैं
ସେ ଅସତ୍ୟକୁ ମଧ୍ୟ ସତ୍ୟ ପରି କରିଦିଅନ୍ତି; ଏହି ଶକ୍ତିରେ ପ୍ରଜାକୁ ମୋହିତ କରନ୍ତି।
Verse 15
एवंविधो धर्मनित्यो भगवान् मधुसूदन: । आगन्ता हि महाबाहुरानृशंस्यार्थमच्युत:,निरन्तर धर्ममें तत्पर रहनेवाले उन भगवान् मधुसूदनका स्वरूप ऐसा ही है। अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले महाबाहु श्रीकृष्ण कौरवोंपर कृपा करनेके लिये यहाँ पधारनेवाले हैं
ଏହିପରି ହେଉଛି ଧର୍ମରେ ନିତ୍ୟ ନିଷ୍ଠ ଭଗବାନ ମଧୁସୂଦନଙ୍କ ସ୍ୱରୂପ। ମହାବାହୁ ଅଚ୍ୟୁତ କୌରବମାନଙ୍କ ଉପରେ କୃପା କରି ଧର୍ମରକ୍ଷା ପାଇଁ ନିଶ୍ଚୟ ଏଠାକୁ ଆସିବେ।
Verse 70
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि संजयवाक्ये सप्ततितमो< ध्याय: ।। ७० || इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें संजयवाक्यविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଯାନସନ୍ଧିପର୍ବରେ ସଞ୍ଜୟବାକ୍ୟବିଷୟକ ସପ୍ତତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 126
सत्यात् सत्यं तु गोविन्दस्तस्मात् सत्योडपि नामतः । श्रीकृष्ण सत्यमें प्रतिष्ठित हैं और सत्य उनमें प्रतिष्ठित है। वे भगवान् गोविन्द सत्यसे भी उत्कृष्ट सत्य हैं। अतः उनका एक नाम “सत्य” भी है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଗୋବିନ୍ଦ ସାଧାରଣ ସତ୍ୟକୁ ମଧ୍ୟ ଅତିକ୍ରମ କରିଥିବା ପରମ ସତ୍ୟ; ତେଣୁ ତାଙ୍କର ଗୋଟିଏ ନାମ ‘ସତ୍ୟ’ ମଧ୍ୟ ଅଟେ। ସେ ସତ୍ୟରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ, ଏବଂ ସତ୍ୟ ତାଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ—ଏହିପରି ସେ ଧର୍ମ-ଭରସାର ପରମ ମାପଦଣ୍ଡ।
Verse 136
शाश्वतत्वादनन्तश्न गोविन्दो वेदनाद् गवाम् | विक्रमण (वामनावतारमें तीनों लोकोंको आक्रान्त) करनेके कारण वे भगवान् “विष्णु' कहलाते हैं। वे सबपर विजय पानेसे “जिष्णु', शाश्वत (नित्य) होनेसे 'अनन्त' तथा गौओं (इन्द्रियों)-के ज्ञाता और प्रकाशक होनेके कारण (गां विन्दति) इस व्युत्पत्तिके अनुसार 'गोविन्द' कहलाते हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଶାଶ୍ୱତ ହେବାରୁ ସେ ‘ଅନନ୍ତ’; ‘ଗୋ’ ଅର୍ଥାତ୍ ଇନ୍ଦ୍ରିୟମାନଙ୍କୁ ଜାଣି ଓ ପ୍ରକାଶ କରାଇବାରୁ ‘ଗୋବିନ୍ଦ’। ବାମନାବତାରରେ ତିନି ଲୋକକୁ ପାଦବିକ୍ରମରେ ଆବୃତ କରିଥିବାରୁ ‘ବିଷ୍ଣୁ’; ଏବଂ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଜୟ କରିବାରୁ ‘ଜିଷ୍ଣୁ’ ବୋଲି ପରିଚିତ।
The implicit dilemma is whether the Kuru court can remain committed to its current course when confronted with an authority portrayed as both ethically compelling (non-cruel, truth-oriented speech) and strategically decisive.
Legitimate leadership and counsel are depicted as grounded in moral speech and discernment, and the text frames recognition of higher ethical authority as integral to sound political judgment.
No explicit phalaśruti is stated in the provided verses; the chapter’s meta-function is devotional-ethical framing—positioning Vāsudeva as a refuge principle that reorients interpretation of the surrounding political narrative.