Adhyaya 63
Udyoga ParvaAdhyaya 6328 Verses

Adhyaya 63

उद्योगपर्व — धृतराष्ट्रस्य दुर्योधनप्रति शक्तिस्मारक-उपदेशः (Udyoga Parva 63: Dhṛtarāṣṭra’s Counsel Reminding Duryodhana of Opponent Strength)

Upa-parva: Dhṛtarāṣṭra–Duryodhana Nīti-Upadeśa (Counsel on Assessing Pāṇḍava Power)

Chapter 63 presents Dhṛtarāṣṭra addressing Duryodhana with a corrective warning: Duryodhana is portrayed as mistaking a wrong path for the right, like an unknowing traveler. Dhṛtarāṣṭra then enumerates the strategic reality of the opposing side by describing the Pāṇḍavas’ exceptional capacities—Yudhiṣṭhira’s firm grounding in dharma, Bhīma’s unmatched physical force, and Arjuna’s superiority as the wielder of the Gāṇḍīva—framed through comparative metaphors that stress disproportionate risk. The counsel expands to allied figures such as Dhṛṣṭadyumna and Sātyaki, and culminates in the assertion that Kṛṣṇa’s presence renders the Pāṇḍava side practically unassailable. Dhṛtarāṣṭra urges Duryodhana to heed the words of well-wishers and senior authorities (Bhīṣma, Droṇa, Kṛpa, Vikarṇa, Bāhlīka), emphasizing institutional counsel. The chapter closes by invoking precedent from Virāṭa’s city as an evidentiary case: Arjuna’s demonstrated capacity there is presented as proof that Duryodhana’s forces have previously been checked, and that broader confrontation invites systemic loss. The thematic lesson is a synthesis of ethical restraint and strategic realism: ignoring dharma-aligned counsel and empirical indicators is positioned as a failure of governance judgment.

Chapter Arc: विदुर धृतराष्ट्र के सम्मुख कौटुम्बिक कलह की विनाश-शक्ति का स्मरण कराते हैं और संधि का मार्ग खोलने के लिए एक दृष्टान्त-कथा आरम्भ करते हैं—पक्षियों और जाल की कथा। → दो सदा-साथ रहने वाले पक्षी शिकारी के जाल में फँसते हैं; वे मिलकर जाल उठाकर आकाश में उड़ जाते हैं, परन्तु संकट के बीच एकता डगमगाती है—वे परस्पर दोषारोपण और झगड़े में उतर आते हैं। → जब दोनों पक्षी क्रोध में लड़ते हैं, तभी शिकारी चुपके से पास आकर उन्हें पकड़ लेता है—विदुर का संकेत स्पष्ट हो उठता है कि ‘विभाजन’ ही शत्रु का सबसे बड़ा अवसर है। → विदुर धृतराष्ट्र को नीति-सार सुनाते हैं: एकता में बल है, कलह में सर्वनाश। वे धृतराष्ट्र से आग्रह करते हैं कि युधिष्ठिर को ‘अंक’ (गोद/आश्रय) दें, संधि करें, क्योंकि युद्ध में किसी की भी निश्चित विजय नहीं और पाण्डव-समर्थन (द्रुपद, विराट, अर्जुन आदि) अत्यन्त प्रचण्ड है। → धृतराष्ट्र के भीतर पुत्रमोह और राज्यलोभ के रहते क्या वह विदुर की संधि-नीति स्वीकार करेगा, या दुर्योधन-पक्ष की हठधर्मिता उसे युद्ध की ओर धकेल देगी?

Shlokas

Verse 1

अपर चतु:षष्टितमो<5 ध्याय: विदुरका कौटुम्बिक कलहसे हानि बताते हुए धृतराष्ट्रको संधिकी सलाह देना विदुर उवाच शकुनीनामिहार्थाय पाशं भूमावयोजयत्‌ । वश्चिच्छाकुनिकस्तात पूर्वेषामिति शुश्रुम

ବିଦୁର କହିଲେ—ତାତ! ଆମେ ପୂର୍ବଜମାନଙ୍କ ମୁଖରୁ ଶୁଣିଛୁ—ଶକୁନିମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଜଣେ ପକ୍ଷୀଧରା ଭୂମିରେ ପାଶ ପତିଥିଲା; କିନ୍ତୁ ପୁତ୍ର, ସେଇ ପକ୍ଷୀଧରା ମଧ୍ୟ ନିଜେ ପତିଥିବା ପାଶର ବଶରେ ପଡ଼ିଯାଏ।

Verse 2

विदुरजी कहते हैं--तात! हमने पूर्वपुरुषोंके मुखसे सुन रखा है कि किसी समय एक चिड़ीमारने चिड़ियोंको फँसानेके लिये पृथ्वीपर एक जाल फैलाया ।। तस्मिन्‌ द्वौ शकुनौ बद्धौ युगपत्‌ सहचारिणौ । तावुपादाय त॑ पाशं जग्मतु: खचरावुभौ

ବିଦୁର କହିଲେ—ତାତ! ପୂର୍ବପୁରୁଷମାନଙ୍କ ମୁଖରୁ ଆମେ ଶୁଣିଛୁ—ଏକ ସମୟରେ ଜଣେ ପକ୍ଷୀଧରା ପକ୍ଷୀମାନଙ୍କୁ ଧରିବା ପାଇଁ ଭୂମିରେ ଜାଲ ପସାରିଥିଲା। ସେଇ ଜାଲରେ ସହଚର ଭାବେ ଏକାସାଥି ଘୁରୁଥିବା ଦୁଇଟି ପକ୍ଷୀ ଏକେ ସମୟରେ ବନ୍ଧିଗଲେ। ସେମାନେ ଦୁଇଜଣେ ସେଇ ଜାଲକୁ ଉଠାଇ—ବନ୍ଧିତ ଥିଲେ ମଧ୍ୟ—ଆକାଶକୁ ଉଡ଼ିଗଲେ।

Verse 3

उस जालमें दो ऐसे पक्षी फँस गये, जो सदा साथ-साथ उड़ने और विचरनेवाले थे। वे दोनों पक्षी उस समय उस जालको लेकर आकाशमें उड़ चले ।। तौ विहायसमाक्रान्तौ दृष्टयवा शाकुनिकस्तदा । अन्वधावदनिर्विण्णो येन येन सम गच्छत:,चिड़ीमार उन दोनोंको आकाशमें उड़ते देखकर भी खिन्न या हताश नहीं हुआ। वे जिधर-जिधर गये, उधर-उधर ही वह उनके पीछे दौड़ता रहा

ଏକେ ଜାଲରେ ଧରାପଡ଼ିଥିବା, ସଦା ସହଯାତ୍ରୀ ଦୁଇଟି ପକ୍ଷୀ ସେଇ ଜାଲକୁ ନେଇ ଆକାଶକୁ ଉଡ଼ିଗଲେ। ସେମାନଙ୍କୁ ଆକାଶରେ ଉଡ଼ୁଥିବା ଦେଖି ମଧ୍ୟ ଚିଡ଼ିମାର ନିରାଶ ହେଲା ନାହିଁ; ସେମାନେ ଯେଉଁଯେଉଁ ଦିଗକୁ ଏକାସାଥି ଗଲେ, ସେ ନିରୁତ୍ସାହ ନହୋଇ ସେଇ ଦିଗକୁ ପଛୁଆଇ ଦୌଡ଼ିଲା।

Verse 4

तथा तमनुधावन्तं मृगयुं शकुनार्थिनम्‌ । आश्रमस्थो मुनि: कश्रिद्‌ ददर्शाथ कृताह्विक:,उन दिनों उस वनमें कोई मुनि रहते थे, जो उस समय संध्या-वन्दन आदि नित्यकर्म करके आश्रममें ही बैठे हुए थे। उन्होंने पक्षियोंको पकड़नेके लिये उनका पीछा करते हुए उस व्याधको देखा

ସେହି ସମୟରେ, ଆଶ୍ରମରେ ବସୁଥିବା ଜଣେ ମୁନି—ସନ୍ଧ୍ୟାବନ୍ଦନ ଆଦି ନିତ୍ୟକର୍ମ ସମାପ୍ତ କରି—ପକ୍ଷୀ ଧରିବା ଲୋଭରେ ଦୌଡ଼ୁଥିବା ସେଇ ବ୍ୟାଧକୁ ଦେଖିଲେ।

Verse 5

तावन्तरिक्षगौ शीघ्रमनुयान्तं महीचरम्‌ । श्लोकेनानेन कौरव्य पप्रच्छ स मुनिस्तदा,कुरुनन्दन! उन आकाशचारी पक्षियोंके पीछे-पीछे भूमिपर पैदल दौड़नेवाले उस व्याधसे मुनिने निम्नांकित श्लोकके अनुसार प्रश्न किया--

ହେ କୌରବ୍ୟ! ସେତେବେଳେ ଆକାଶରେ ଯାଉଥିବା ପକ୍ଷୀମାନଙ୍କୁ ଶୀଘ୍ର ଅନୁସରଣ କରି ଭୂମିରେ ପାଦେ ଦୌଡ଼ୁଥିବା ସେଇ ବ୍ୟାଧକୁ ମୁନି ଏହି ଶ୍ଲୋକରେ ପ୍ରଶ୍ନ କଲେ।

Verse 6

विचित्रमिदमाश्चर्य मृगहन्‌ प्रतिभाति मे । प्लवमानौ हि खचरौ पदातिरनुधावसि,“अरे व्याध! मुझे यह बात बड़ी विचित्र और आश्चर्यजनक जान पड़ती है कि तू आकाशमें उड़ते हुए इन दोनों पक्षियोंके पीछे पृथ्वीपर पैदल दौड़ रहा है”

“ହେ ବ୍ୟାଧ! ଏହା ମୋତେ ବହୁତ ବିଚିତ୍ର ଓ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟକର ଲାଗୁଛି—ଆକାଶରେ ଉଡ଼ୁଥିବା ସେଇ ଦୁଇ ପକ୍ଷୀର ପଛେ ପଛେ ତୁମେ ଭୂମିରେ ପାଦେ ଦୌଡ଼ୁଛ।”

Verse 7

शाकुनिक उवाच पाशमेकमुभावेतौ सहितौ हरतो मम । यत्र वै विवदिष्येते तत्र मे वशमेष्यत:,व्याध बोला--मुने! ये दोनों पक्षी आपसमें मिल गये हैं, अतः मेरे एकमात्र जालको लिये जा रहे हैं। अब ये जहाँ-कहीं एक दूसरेसे झगड़ेंगे, वहीं मेरे वशमें आ जायँगे

ବ୍ୟାଧ କହିଲା—“ମୁନେ! ଏହି ଦୁଇ ପକ୍ଷୀ ଏକାସାଥି ମୋର ଏକମାତ୍ର ଜାଲକୁ ନେଇଯାଉଛନ୍ତି। ଏମାନେ ଯେଉଁଠି ପରସ୍ପରେ ବିବାଦ କରିବେ, ସେଉଁଠି ହିଁ ମୋର ବଶରେ ପଡ଼ିଯିବେ।”

Verse 8

विदुर उवाच तौ विवादमनुप्राप्ती शकुनौ मृत्युसंधितौ । विगृहा[ च सुददुर्बुद्धी पृथिव्यां संनिपेततु:,विदुरजी कहते हैं--राजन्‌! तदनन्तर कुछ ही देरमें कालके वशीभूत हुए वे दोनों दुर्बद्धि पक्षी आपसमें झगड़ने लगे और लड़ते-लड़ते पृथ्वीपर गिर पड़े

ବିଦୁର କହିଲେ—ରାଜନ୍! କାଳବଶୀଭୂତ, ଯେନ ମୃତ୍ୟୁସନ୍ଧିରେ ବନ୍ଧା, ସେଇ ଦୁଇ ଦୁର୍ବୁଦ୍ଧି ପକ୍ଷୀ ପରସ୍ପର ବିବାଦରେ ପଡ଼ିଲେ; ଝଗଡ଼ିଝଗଡ଼ି ଶେଷେ ପୃଥିବୀରେ ପଡ଼ିଗଲେ।

Verse 9

तौ युध्यमानौ संरब्धौ मृत्युपाशवशानुगौ । उपसृत्यापरिज्ञातो जग्राह मृगहा तदा,जब मौततके फंदेमें फँसे हुए वे पक्षी अत्यन्त कुपित होकर एक-दूसरेसे लड़ रहे थे, उसी समय व्याधने चुपचाप उनके पास आकर उन दोनोंको पकड़ लिया

ମୃତ୍ୟୁପାଶର ବଶରେ ପଡ଼ି ଅନ୍ଧ କ୍ରୋଧରେ ସେମାନେ ଦୁଇଜଣ ଯୁଦ୍ଧ କରୁଥିଲେ; ସେତେବେଳେ ବ୍ୟାଧ ଅପରିଚିତ ଭାବେ ନିକଟକୁ ଆସି ସେମାନଙ୍କୁ ଦୁହେଁକୁ ଧରିନେଲା।

Verse 10

एवं ये ज्ञातयो<र्थषु मिथो गच्छन्ति विग्रहम्‌ तेडमित्रवशमायान्ति शकुनाविव विग्रहात्‌,इसी प्रकार जो कुट॒म्बीजन धन-सम्पत्तिके लिये आपसमें कलह करते हैं, वे युद्ध करके उन्हीं दोनों पक्षियोंकी भाँति शत्रुओंके वशमें पड़ जाते हैं

ଏହିପରି ଧନ-ସମ୍ପତ୍ତି ନିମିତ୍ତେ ଯେ ଜ୍ଞାତିମାନେ ପରସ୍ପର ବିଗ୍ରହକୁ ଯାଆନ୍ତି, ସେମାନେ ସେଇ ଦୁଇ ପକ୍ଷୀ ପରି ନିଜ ବିବାଦରୁ ଶତ୍ରୁବଶକୁ ପଡ଼ନ୍ତି।

Verse 11

सम्भोजनं संकथन सम्प्रश्नो5थ समागम: । एतानि ज्ञातिकार्याणि न विरोध: कदाचन,साथ बैठकर भोजन करना, आपसमें प्रेमसे वार्तालाप करना, एक-दूसरेके सुख- दुःखको पूछना और सदा मिलते-जुलते रहना--ये ही भाई-बन्धुओंके काम हैं, परस्पर विरोध करना कदापि उचित नहीं है

ସଙ୍ଗେ ବସି ଭୋଜନ କରିବା, ସ୍ନେହରେ କଥାବାର୍ତ୍ତା କରିବା, ପରସ୍ପର କୁଶଳ-କ୍ଷେମ ପଚାରିବା ଏବଂ ସଦା ମିଳିମିଶି ରହିବା—ଏହିମାନେ ଜ୍ଞାତିଙ୍କ କାର୍ଯ୍ୟ; ପରସ୍ପର ବିରୋଧ କେବେ ନୁହେଁ।

Verse 12

ये सम काले सुमनस: सर्वे वृद्धानुपासते । सिंहगुप्तमिवारण्यमप्रधृष्या भवन्ति ते,जो शुद्ध हृदयवाले मनुष्य समय-समयपर बड़े-बूढ़ोंकी सेवा एवं संग करते रहते हैं, वे सिंहसे सुरक्षित वनके समान दूसरोंके लिये दुर्धर्ष हो जाते हैं (शत्रु उनके पास आनेका साहस नहीं करते हैं)

ଯେ ସୁମନସ, ଶୁଦ୍ଧହୃଦୟ ଲୋକେ ସମୟେ ସମୟେ ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କୁ ସେବା-ଉପାସନା କରନ୍ତି, ସେମାନେ ସିଂହରକ୍ଷିତ ଅରଣ୍ୟ ପରି ଅପ୍ରଧର୍ଷ୍ୟ ହୋଇଯାନ୍ତି।

Verse 13

ये3र्थ संततमासाद्य दीना इव समासते । श्रियं ते सम्प्रयच्छन्ति द्विषद्धयों भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ) जो धनको पाकर भी सदा दीनोंके समान तृष्णासे पीड़ित रहते हैं, वे (आपसमें कलह करके) अपनी सम्पत्ति शत्रुओंको दे डालते हैं

ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଯେମାନେ ଧନ ପାଇଲେ ମଧ୍ୟ ସଦା ଦୀନମାନଙ୍କ ପରି ତୃଷ୍ଣାରେ ପୀଡ଼ିତ ରହନ୍ତି, ସେମାନେ ପରସ୍ପର କଳହ କରି ନିଜ ସମୃଦ୍ଧିକୁ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ହାତକୁ ଦେଇଦିଅନ୍ତି।

Verse 14

धूमायन्ते व्यपेतानि ज्वलन्ति सहितानि च । धृतराष्ट्रोल्मुकानीव ज्ञातयो भरतर्षभ,भरतकुलभूषण धृतराष्ट्र! जैसे जलते हुए काष्ठ अलग-अलग कर दिये जानेपर जल नहीं पाते, केवल धुआँ देते हैं और परस्पर मिल जानेपर प्रज्वलित हो उठते हैं, उसी प्रकार कुटुम्बीजन आपसी फूटके कारण अलग-अलग रहनेपर अशक्त हो जाते हैं तथा परस्पर संगठित होनेपर बलवान्‌ एवं तेजस्वी होते हैं

ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର! ଯେପରି ଜଳୁଥିବା କାଠକୁ ଅଲଗା କରିଦେଲେ ତାହା ଜ୍ୱଳିନଥାଏ, କେବଳ ଧୂଆଁ ହୁଏ; ଏକଠା କଲେ ପୁଣି ଦାହିଉଠେ—ସେପରି ଆତ୍ମୀୟମାନେ ଫୁଟରେ ଅଲଗା ହେଲେ ଦୁର୍ବଳ ହୁଅନ୍ତି, ଏକତାରେ ଶକ୍ତିଶାଳୀ ଓ ତେଜସ୍ୱୀ ହୁଅନ୍ତି।

Verse 15

इदमन्यत्‌ प्रवक्ष्यामि यथा दृष्टं गिरो मया । श्रुत्वा तदपि कौरव्य यथा श्रेयस्तथा कुरु,कौरवनन्दन! पूर्वकालमें किसी पर्वतपर मैंने जैसा देखा था, उसके अनुसार यह एक दूसरी बात बता रहा हूँ। इसे भी सुनकर आपको जिसमें अपनी भलाई जान पड़े, वही कीजिये

ହେ କୌରବନନ୍ଦନ! ମୁଁ ଆଉ ଗୋଟିଏ କଥା କହିବି—ମୁଁ ଯେପରି ଦେଖିଥିଲି, ସେପରି ମୋ ବାଣୀରେ ରହିଛି। ତାହା ମଧ୍ୟ ଶୁଣି, ଯାହା ତୁମ ମଙ୍ଗଳକର, ସେହିପରି କର।

Verse 16

वयं किरातै: सहिता गच्छामो गिरिमुत्तरम्‌ । ब्राह्मणैदेवकल्पैश्न विद्याजम्भकवार्तिकै:ः,एक समयकी बात है, हम बहुत-से भीलों और देवोपम ब्राह्मणोंके साथ उत्तर-दिशामें गन्धमादन पर्वतपर गये थे। हमारे साथ जो ब्राह्मण थे, उन्हें मन्त्र-यन्त्रादिरूप विद्या और ओषधियोंके साधन आदिकी बातें बहुत प्रिय थीं

ଏକଥର ଆମେ ଅନେକ କିରାତ (ଭିଲ) ଓ ଦେବତୁଲ୍ୟ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ସହ ଉତ୍ତର ଦିଗରେ ଗୋଟିଏ ପର୍ବତକୁ ଗଲୁ। ଆମ ସହ ଥିବା ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ବିଦ୍ୟା, ମନ୍ତ୍ର-ଯନ୍ତ୍ର ଓ ଔଷଧି-ସାଧନ ଆଦିର କଥାବାର୍ତ୍ତାରେ ରୁଚି ରଖୁଥିଲେ।

Verse 17

कुञ्जभूतं गिरिं सर्वमभितो गन्धमादनम्‌ । दीप्यमानौषधिगणं सिद्धगन्धर्वसेवितम्‌,समस्त गन्धमादन पर्वत सब ओरसे कुंज-सा जान पड़ता था। वहाँ दिव्य ओषधियाँ प्रकाशित हो रही थीं। सिद्ध और गन्धर्व उस पर्वतपर निवास करते थे

ଚାରିପାଖରୁ ସମଗ୍ର ଗନ୍ଧମାଦନ ପର୍ବତଟି ଗୋଟିଏ ବିଶାଳ କୁଞ୍ଜ ପରି ଲାଗୁଥିଲା। ସେଠାରେ ଦିବ୍ୟ ଔଷଧିମାନଙ୍କ ଗୋଷ୍ଠୀ ଦୀପ୍ତିମାନ ଥିଲା, ଏବଂ ସେହି ଶିଖରକୁ ସିଦ୍ଧ ଓ ଗନ୍ଧର୍ବମାନେ ସେବନ କରି ବସବାସ କରୁଥିଲେ।

Verse 18

तत्रापश्याम वै सर्वे मधु पीतकमाक्षिकम्‌ । मरुप्रपाते विषमे निविष्टं कुम्भसम्मितम्‌,वहाँ हम सब लोगोंने देखा, पर्वतकी एक दुर्गम गुफामें जहाँसे कोई कूल-किनारा न होनेके कारण गिरनेकी ही अधिक सम्भावना रहती है, एक मधुकोष है। वह मक्खियोंका तैयार किया हुआ नहीं था। उसका रंग सुवर्णके समान पीला था और वह देखनेमें घड़ेके समान जान पड़ता था

ସେଠାରେ ଆମେ ସମସ୍ତେ ଏକ ମଧୁର ରାଶି ଦେଖିଲୁ—ସୁବର୍ଣ୍ଣ-ପୀତ ବର୍ଣ୍ଣର, ମହୁମାଛି ତିଆରି କରିଥିବା ନୁହେଁ। ତାହା ଦୁର୍ଗମ ପର୍ବତ-ଚିରାରେ, ଏମିତି ଭୟଙ୍କର ପ୍ରପାତର କାଠେ ଥିଲା ଯେ ପାଦ ଖସିଲେ ପତନ ନିଶ୍ଚିତ; ଆକାରରେ ତାହା କୁମ୍ଭ ସମାନ ଲାଗୁଥିଲା।

Verse 19

आशीविषै रक्ष्यमाणं कुबेरदयितं भूशम्‌ । यत्‌ प्राप्य पुरुषो म्त्योउप्यमरत्वं नियच्छति,भयंकर विषधर सर्प उस मधुकी रक्षा करते थे। कुबेरको वह मधु अत्यन्त प्रिय था। हमारे साथी औषधसाधक ब्राह्मणलोग यह बता रहे थे कि इस मधुको पाकर मरणथधर्मा मनुष्य भी अमरत्व प्राप्त कर लेता है। इसको पीनेसे अंधेको दृष्टि मिल जाती है और बूढ़ा भी जवान हो जाता है

ସେଇ ମଧୁ ଭୟଙ୍କର ବିଷଧର ସର୍ପମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ରକ୍ଷିତ ଥିଲା ଏବଂ କୁବେରଙ୍କୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରିୟ ଥିଲା। କୁହାଯାଏ, ତାହା ପାଇଲେ ମୃତ୍ୟୁଧର୍ମା ମଣିଷ ମଧ୍ୟ ଅମରତ୍ୱ ଲାଭ କରେ।

Verse 20

अचक्षुर्लभते चक्षुरवृद्धो भवति वै युवा । इति ते कथयन्ति सम ब्राह्मणा जम्भसाधका:,भयंकर विषधर सर्प उस मधुकी रक्षा करते थे। कुबेरको वह मधु अत्यन्त प्रिय था। हमारे साथी औषधसाधक ब्राह्मणलोग यह बता रहे थे कि इस मधुको पाकर मरणथधर्मा मनुष्य भी अमरत्व प्राप्त कर लेता है। इसको पीनेसे अंधेको दृष्टि मिल जाती है और बूढ़ा भी जवान हो जाता है

ଜମ୍ଭସାଧକ ସେଇ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଆମକୁ କହୁଥିଲେ—ତାହା ପାଇଲେ ଅନ୍ଧ ଦୃଷ୍ଟି ପାଏ, ଏବଂ ବୃଦ୍ଧ ମଧ୍ୟ ପୁନଃ ଯୁବା ହୋଇଯାଏ।

Verse 21

ततः किरातास्तद्‌ दृष्टवा प्रार्थयन्तो महीपते । विनेशुर्विषमे तस्मिन्‌ ससर्पे गिरिगह्दरे,महाराज! उस समय उस मधुका अद्भुत गुण सुनकर और उसे प्रत्यक्ष देखकर भीलोंने उसे पानेकी चेष्टा की; परंतु सर्पोंसे भरी हुई उस दुर्गम पर्वतगुहामें जाकर वे सब-के-सब नष्ट हो गये

ତାପରେ, ହେ ମହୀପତେ! ତାହା ଦେଖି ଏବଂ ପାଇବାକୁ ଆକାଂକ୍ଷା କରି କିରାତ (ଭୀଲ)ମାନେ ସର୍ପଭରା ସେଇ ବିଷମ ପର୍ବତ-ଗହ୍ୱରକୁ ପ୍ରବେଶ କଲେ; ଏବଂ ସେଠାରେ ସମସ୍ତେ ନଶ୍ଟ ହେଲେ।

Verse 22

तथैव तव पुत्रो5यं पृथिवीमेक इच्छति । मधु पश्यति सम्मोहात्‌ प्रपातं नानुपश्यति,इसी प्रकार आपका यह पुत्र दुर्योधन अकेला ही सारी पृथ्वीका राज्य भोगना चाहता है। यह मोहवश केवल मधुको ही देखता है, भावी पतन या विनाशकी ओर इसकी दृष्टि नहीं जाती है

ସେହିପରି ଆପଣଙ୍କ ଏହି ପୁତ୍ର ଏକାକୀ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି। ସମ୍ମୋହରେ ସେ କେବଳ ମଧୁର ମାଧୁର୍ୟକୁ ଦେଖେ; ପ୍ରପାତ—ଆଗାମୀ ପତନ ଓ ବିନାଶ—ତାହାକୁ ଦେଖେ ନାହିଁ।

Verse 23

दुर्योधनो योद्धुमना: समरे सव्यसाचिना । न च पश्यामि तेजो<स्य विक्रमं वा तथाविधम्‌,दुर्योधन समरभूमिमें सव्यसाची अर्जुनके साथ युद्ध करनेकी बात सोचता है, परंतु मैं इसके भीतर अर्जुनके समान तेज या पराक्रम नहीं देखता

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ସମରଭୂମିରେ ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ; କିନ୍ତୁ ତାହାରେ ଅର୍ଜୁନସମ ତେଜ କିମ୍ବା ସେପରି ପରାକ୍ରମ ମୁଁ ଦେଖୁନାହିଁ।

Verse 24

एकेन रथमास्थाय पृथिवी येन निर्जिता । भीष्मद्रोणप्रभृतय: संत्रस्ता: साधुयायिन:,जिस वीरने अकेले ही रथपर बैठकर सारी पृथ्वीपर विजय पायी है, विराटनगरपर चढ़ाई करने गये हुए भीष्म और द्रोण-जैसे महान्‌ योद्धाओंको भी जिसने भयभीत करके भगा दिया है, उसके सामने आपका पुत्र क्या पराक्रम कर सकता है? यह आप ही देखिये। आज भी वह वीर आपकी मैत्रीपूर्ण दृष्टिकी प्रतीक्षा कर रहा है और आपकी आज्ञासे वह कौरवोंका सारा अपराध क्षमा कर सकता है

ଯେ ବୀର ଏକାକୀ ରଥାରୂଢ଼ ହୋଇ ପୃଥିବୀକୁ ଜୟ କରିଛି, ଏବଂ ଧର୍ମଯାତ୍ରାରେ ଅଗ୍ରସର ଭୀଷ୍ମ-ଦ୍ରୋଣ ପ୍ରମୁଖମାନେ ମଧ୍ୟ ଯାହାଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଭୟଭୀତ ହୋଇ ପଛକୁ ହଟିଥିଲେ—ତାଙ୍କ ବିରୋଧରେ ଆପଣଙ୍କ ପୁତ୍ର କେଉଁ ପରାକ୍ରମ ଦେଖାଇବ? ଏହା ଆପଣେ ନିଜେ ବିଚାର କରନ୍ତୁ। ଆଜି ମଧ୍ୟ ସେ ମହାବୀର ଆପଣଙ୍କ ମୈତ୍ରୀଦୃଷ୍ଟିର ପ୍ରତୀକ୍ଷା କରୁଛନ୍ତି; ଏବଂ ଆପଣଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ କୌରବମାନଙ୍କ ସମସ୍ତ ଅପରାଧ କ୍ଷମା କରିପାରିବେ।

Verse 25

विराटनगरे भग्ना: कि तत्र तव दृश्यताम्‌ । प्रतीक्षमाणो यो वीर: क्षमते वीक्षितं तव,जिस वीरने अकेले ही रथपर बैठकर सारी पृथ्वीपर विजय पायी है, विराटनगरपर चढ़ाई करने गये हुए भीष्म और द्रोण-जैसे महान्‌ योद्धाओंको भी जिसने भयभीत करके भगा दिया है, उसके सामने आपका पुत्र क्या पराक्रम कर सकता है? यह आप ही देखिये। आज भी वह वीर आपकी मैत्रीपूर्ण दृष्टिकी प्रतीक्षा कर रहा है और आपकी आज्ञासे वह कौरवोंका सारा अपराध क्षमा कर सकता है

ବିରାଟନଗରରେ ସେମାନେ ପରାଜିତ ହୋଇ ପଳାଇଥିଲେ—ସେଠାରେ ତୁମ ଶକ୍ତି କ’ଣ ଦେଖାଯାଏ? ଯେ ବୀର ଆଜି ମଧ୍ୟ ତୁମ ମୈତ୍ରୀଦୃଷ୍ଟିର ପ୍ରତୀକ୍ଷା କରୁଛନ୍ତି, ତୁମେ ଅନୁଗ୍ରହରେ ଦୃଷ୍ଟି ପାତ କଲେ ମାତ୍ର କୌରବମାନଙ୍କ ସମସ୍ତ ଅପରାଧ କ୍ଷମା କରିପାରିବେ।

Verse 26

ट्रुपदो मत्स्यराजश्न संक्रुद्धक्ष धनंजय: । न शेषयेयु: समरे वायुयुक्ता इवाग्नय:,राजा द्रुपद, मत्स्यनरेश विराट और क्रोधमें भरा हुआ अर्जुन--ये तीनों वायुका सहारा पाकर प्रज्वलित हुई त्रिविध अग्नियोंके समान जब युद्धभूमिमें आक्रमण करेंगे, तब किसीको जीता नहीं छोड़ेंगे

ରାଜା ଦ୍ରୁପଦ, ମତ୍ସ୍ୟରାଜ ବିରାଟ ଏବଂ କ୍ରୋଧରେ ଦହୁଥିବା ଧନଞ୍ଜୟ ଅର୍ଜୁନ—ଏ ତିନିଜଣ ଯେତେବେଳେ ସମରଭୂମିରେ ବାୟୁସହାୟ ଜ୍ୱଳିତ ତ୍ରିବିଧ ଅଗ୍ନି ପରି ଆକ୍ରମଣ କରିବେ, ସେତେବେଳେ କାହାକୁ ମଧ୍ୟ ଜୀବିତ ଛାଡ଼ିବେ ନାହିଁ।

Verse 27

अड्के कुरुष्व राजानं धृतराष्ट्र युधिष्ठिरम्‌ । युध्यतोर्हि द्वयोर्युद्धे नैकान्तेन भवेज्जय:,महाराज धृतराष्ट्र!्‌ आप राजा युधिष्ठिरको अपनी गोदमें बैठा लीजिये; क्योंकि जब दोनों पक्षोंमें युद्ध छिड़ जायगा, तब विजय किसकी होगी, यह निश्चितरूपसे नहीं कहा जा सकता

ମହାରାଜ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର! ଆପଣ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ନିଜ କୋଳରେ ବସାନ୍ତୁ; କାରଣ ଦୁଇ ପକ୍ଷର ଯୁଦ୍ଧ ଆରମ୍ଭ ହେଲେ, ଜୟ କାହାର ହେବ—ଏହା ନିଶ୍ଚିତ ଭାବେ କୁହାଯାଇ ପାରେ ନାହିଁ।

Verse 64

इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि विदुरवाक्ये चतु:षष्टितमो5ध्याय: ।। घड़े ।। इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें विदुरवाक्यविषयक चौसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଯାନସନ୍ଧିପର୍ବରେ ବିଦୁରବାକ୍ୟ-ବିଷୟକ ଚଉଷଠିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether to persist in a pride-driven course that disregards ethical counsel and realistic appraisal, or to adopt restraint and listen to elders whose advice aims at preventing broader harm to the polity.

Sound action requires aligning intention with dharma and evidence: strategic decisions should be guided by accurate assessment, humility before expertise, and awareness that moral blindness often manifests as misreading the path ahead.

No explicit phalaśruti appears in the provided passage; the meta-function is implicit—positioning this counsel as a diagnostic node in the epic where ignored advice becomes a narrative marker for preventable escalation.