Udyoga Parva Adhyāya 58 — Saṃjaya’s Audience and Kṛṣṇa’s Deterrent Counsel (संजय-प्रवेशः कृष्णवाक्यं च)
यजचध्वं विविधीर्यज्निविप्रेभ्यो दत्त दक्षिणा: । पुत्रैदरिश्ष मोदध्वं महद् वो भयमागतम्,“कौरवो! नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान आरम्भ करो, ब्राह्मणोंको दक्षिणाएँ दो, पुत्रों और स्त्रियोंसे मिल-जुलकर आनन्द भोग लो; क्योंकि तुम्हारे ऊपर बहुत बड़ा भय आ पहुँचा है
“ହେ କୌରବମାନେ! ନାନା ପ୍ରକାର ଯଜ୍ଞ ଆରମ୍ଭ କର, ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ଦକ୍ଷିଣା ଦିଅ, ପୁତ୍ର ଓ ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହ ମିଶି ଆନନ୍ଦ କର; କାରଣ ତୁମ ଉପରେ ମହାଭୟ ଆସି ପହଞ୍ଚିଛି।”
वायुदेव उवाच