
Udyoga Parva Adhyāya 58 — Saṃjaya’s Audience and Kṛṣṇa’s Deterrent Counsel (संजय-प्रवेशः कृष्णवाक्यं च)
Upa-parva: Sañjaya–Kṛṣṇa–Arjuna Saṃvāda (Court Report Episode)
Dhṛtarāṣṭra requests Saṃjaya to recount what Vāsudeva (Kṛṣṇa) and Dhanaṃjaya (Arjuna) said. Saṃjaya narrates his respectful entry into the royal inner quarters to report on the two leaders, noting the exclusivity and guarded nature of their presence. He describes their courtly presentation—garlands, fine garments, ornaments, and a jeweled golden seat—then observes embodied hierarchy through details of posture and foot-rest imagery. Seeing them seated together, Saṃjaya experiences apprehension and interprets their combined stature through divine comparison, concluding that Yudhiṣṭhira’s resolve will succeed because such allies stand aligned. After receiving hospitality, Saṃjaya delivers Kṛṣṇa’s message intended for Dhṛtarāṣṭra (and heard by senior figures such as Droṇa): Kṛṣṇa urges the Kauravas to perform rites, give gifts, and take joy with family because a great danger is approaching. He recalls a personal debt to Draupadī’s cry of “Govinda,” frames Arjuna’s martial capacity as beyond ordinary opposition, and cites the Virāṭa episode as evidence that one warrior can rout many. The chapter closes with Saṃjaya noting Kṛṣṇa’s rousing speech and Arjuna preparing an awe-inducing reply.
Chapter Arc: धृतराष्ट्र, संजय से आग्रह करते हैं कि वह वही सुनाए जो उसने श्रीकृष्ण और अर्जुन के अन्तःपुर में प्रत्यक्ष देखा-सुना—क्योंकि अब राज्य और रक्त, दोनों का निर्णय वाणी से होने वाला है। → संजय राजसभा को उस अंतरंग दृश्य में ले जाता है जहाँ कृष्ण, अर्जुन, द्रौपदी और सत्यभामा विराजमान हैं; सत्कार के बाद संजय हाथ जोड़कर संदेश-प्रसंग छेड़ता है। फिर कृष्ण अर्जुन को उकसाते हुए कौरवों के पूर्व अपराध और पाण्डव-पराक्रम की स्मृति जगाते हैं—विशेषतः विराटनगर में अर्जुन द्वारा अकेले कौरव-सेना को भगाने का उदाहरण देकर। → कृष्ण का गर्जन-सा वचन—इन्द्र की समयोचित वर्षा-गर्जना के समान—अर्जुन के भीतर क्षात्र-तेज को प्रज्वलित करता है: ‘एक पाण्डुपुत्र ही पर्याप्त प्रमाण है’—यह उद्घोष युद्ध-न्याय और शक्ति-न्याय दोनों का शिखर बनता है। → कृष्ण के वचन सुनकर किरीटी अर्जुन रोमांचकारी प्रत्युत्तर देता है; संजय उस संवाद को धृतराष्ट्र के सामने यथावत रख देता है—यह स्पष्ट करते हुए कि पाण्डव पक्ष आत्मविश्वास और नीति-बल दोनों से सुसज्जित है। → संजय का कथन आगे के निर्णय की ओर धकेलता है—अब धृतराष्ट्र और कौरव-सभा इस संदेश को कैसे ग्रहण करेगी: संधि की ओर या विनाश की ओर?
Verse 1
ऑपन--मा_जल छा जज ड:ि:अ एकोनषशष्टितमो< ध्याय: संजयका 4:30 87 छनेपर उन्हें श्रीकृष्ण और अर्जुनके अन्तःपुरमें कहे हुए संदेश सुनाना धृतराष्ट उवाच यदब्रूतां महात्मानौ वासुदेवधनंजयौ । तन्मे ब्रूहि महाप्राज्ञ शुश्रूषे वचनं तव,धृतराष्ट्रने पूछा--महाप्राज्ञ संजय! महात्मा भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनने जो कुछ कहा हो, वह मुझे बताओ; मैं तुम्हारे मुखसे उनके संदेश सुनना चाहता हूँ
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ମହାପ୍ରାଜ୍ଞ ସଞ୍ଜୟ! ମହାତ୍ମା ବାସୁଦେବ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ଓ ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ଯାହା କହିଛନ୍ତି, ସେହି ସବୁ ମୋତେ କୁହ। ତୋ ମୁଖରୁ ତାଙ୍କର ସନ୍ଦେଶ ଶୁଣିବାକୁ ମୁଁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି।
Verse 2
संजय उवाच शृणु राजन् यथा दृष्टौ मया कृष्णधनंजयौ । ऊचतुश्चापि यद् वीरौ तत् ते वक्ष्यामि भारत
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍, ଶୁଣ; ମୁଁ କୃଷ୍ଣ ଓ ଧନଞ୍ଜୟଙ୍କୁ ଯେପରି ଦେଖିଥିଲି, ସେପରି କହିବି। ହେ ଭାରତ, ସେଇ ଦୁଇ ବୀର ଯାହା କହିଥିଲେ, ତାହା ମଧ୍ୟ ତୋତେ କହିବି।
Verse 3
संजयने कहा--भरतवंशी नरेश! सुनिये। मैंने वीरवर श्रीकृष्ण और अर्जुनको जैसे देखा है और उन्होंने जो संदेश दिया है, वह आपको बता रहा हूँ ।। पादाड्गुलीरभिप्रेक्षन् प्रयतो5हं कृताज्जलि: । शुद्धान्तं प्राविशं राजन्नाख्यातुं नरदेवयो:,राजन! मैं नरदेव श्रीकृष्ण और अर्जुनसे आपका संदेश सुनानेके लिये मनको पूर्णतः संयममें रखकर अपने पैरोंकी अंगुलियोंपर ही दृष्टि लगाये और हाथ जोड़े हुए उनके अन्तःपुरमें गया
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ ରାଜନ୍, ଶୁଣ। ମୁଁ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଓ ଧନଞ୍ଜୟଙ୍କୁ ଯେପରି ଦେଖିଥିଲି, ଏବଂ ସେମାନେ ଯେ ସନ୍ଦେଶ ଦେଇଥିଲେ, ସେହି ସବୁ ତୋତେ କହୁଛି। ମନକୁ ସଂଯମ କରି, ହାତ ଯୋଡି, ଦୃଷ୍ଟିକୁ ପାଦାଙ୍ଗୁଳିରେ ନମାଇ, ହେ ରାଜନ୍, ତୋର ବଚନ ଜଣାଇବାକୁ ମୁଁ ସେମାନଙ୍କ ଅନ୍ତଃପୁରକୁ ପ୍ରବେଶ କଲି।
Verse 4
नैवाभिमन्युर्न यमौ त॑ देशमभियान्ति वै । यत्र कृष्णौ च कृष्णा च सत्यभामा च भामिनी,जहाँ श्रीकृष्ण, अर्जुन, द्रौपदी और मानिनी सत्यभामा विराज रही थीं, उस स्थानमें कुमार अभिमन्यु तथा नकुल-सहदेव भी नहीं जा सकते थे
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଯେଉଁ ସ୍ଥାନରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଓ ପାର୍ଥ (ଅର୍ଜୁନ) ଥିଲେ, ଏବଂ କୃଷ୍ଣା (ଦ୍ରୌପଦୀ) ଓ ମାନିନୀ ସତ୍ୟଭାମା ବସିଥିଲେ, ସେଠାକୁ ନ ଅଭିମନ୍ୟୁ, ନ ଯମଜ ନକୁଳ-ସହଦେବ ଯାଇପାରୁଥିଲେ।
Verse 5
उभौ मध्वासवक्षीबावुभौ चन्दनरूषितौ | स्रग्विणौ वरवस्त्रौ तौ दिव्याभरणभूषितौ,वे दोनों मित्र मधुर पेय पीकर आनन्दविभोर हो रहे थे। उन दोनोंके श्रीअंग चन्दनसे चर्चित थे। वे सुन्दर वस्त्र और मनोहर पुष्पमाला धारण करके दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थे
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସେ ଦୁଇଜଣେ ମଧୁ ଓ ଆସବ ପାନ କରି ଆନନ୍ଦରେ ମତ୍ତ ଥିଲେ। ତାଙ୍କ ଅଙ୍ଗରେ ଚନ୍ଦନଲେପ ଥିଲା। ସେମାନେ ପୁଷ୍ପମାଳାଧାରୀ, ଉତ୍ତମ ବସ୍ତ୍ରପରିଧାନକାରୀ ଏବଂ ଦିବ୍ୟ ଆଭୂଷଣରେ ବିଭୂଷିତ ଥିଲେ।
Verse 6
नैकरत्नविचित्रं तु काड्चन॑ं महदासनम् | विविधास्तरणाकीर्ण यत्रासातामरिंदमौ,शत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों वीर जिस विशाल आसनपर बैठे थे, वह सोनेका बना हुआ था। उसमें अनेक प्रकारके रत्न जटित होनेके कारण उसकी विचित्र शोभा हो रही थी। उसपर भाँति-भाँतिके सुन्दर बिछौने बिछे हुए थे
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଯେଉଁ ମହାଆସନରେ ସେଇ ଦୁଇ ଶତ୍ରୁଦମନ ବୀର ବସିଥିଲେ, ସେ ଆସନ ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ଥିଲା। ନାନା ପ୍ରକାର ରତ୍ନରେ ଜଟିତ ହୋଇ ତାହା ବିଚିତ୍ର ଦ୍ୟୁତିରେ ଜ୍ଵଳମାନ ଥିଲା, ଏବଂ ତାହାର ଉପରେ ଭିନ୍ନଭିନ୍ନ ଉତ୍ତମ ଆବରଣ ପତିଥିଲା—ରାଜମର୍ଯ୍ୟାଦା ଓ ସଭାର ଗମ୍ଭୀରତାର ଚିହ୍ନ ସ୍ୱରୂପ।
Verse 7
अर्जुनोत्सड्रगौ पादौ केशवस्योपलक्षये । अर्जुनस्य च कृष्णायां सत्यायां च महात्मन:,मैंने देखा, श्रीकृष्णके दोनों चरण अर्जुनकी गोदमें थे और महात्मा अर्जुनका एक पैर द्रौपदीकी तथा दूसरा सत्यभामाकी गोदमें था
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ମୁଁ ଦେଖିଲି, କେଶବଙ୍କ ଦୁଇ ପାଦ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ କୋଳରେ ରଖାଯାଇଥିଲା। ଏବଂ ମହାତ୍ମା ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ଗୋଟିଏ ପାଦ କୃଷ୍ଣା (ଦ୍ରୌପଦୀ)ଙ୍କ କୋଳରେ, ଅନ୍ୟଟି ସତ୍ୟା (ସତ୍ୟଭାମା)ଙ୍କ କୋଳରେ ଥିଲା।
Verse 8
काज्चनं पादपीठं तु पार्थो मे प्रादिशत् तदा । तदहं पाणिना स्पृष्टवा ततो भूमावुपाविशम्,कुन्तीकुमार अर्जुनने उस समय मुझे बैठनेके लिये एक सोनेके पादपीठ (पैर रखनेके पीढ़े)-की ओर संकेत कर दिया। परंतु मैं हाथसे उसका स्पर्शमात्र करके पृथ्वीपर ही बैठ गया
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସେତେବେଳେ ପାର୍ଥ ଅର୍ଜୁନ ମୋତେ ବସିବା ପାଇଁ ଗୋଟିଏ ସୁବର୍ଣ୍ଣ ପାଦପୀଠ ଦେଖାଇଲେ। କିନ୍ତୁ ମୁଁ ତାହାକୁ କେବଳ ହାତରେ ସ୍ପର୍ଶ କରି, ପରେ ଭୂମିରେ ହିଁ ବସିଲି।
Verse 9
ऊर्ध्वरेखातलौ पादौ पार्थस्य शुभलक्षणौ । पादपीठादपदह्तौ तत्रापश्यमहं शुभौ
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସେଠାରେ ମୁଁ ପାର୍ଥଙ୍କ ଶୁଭଲକ୍ଷଣଯୁକ୍ତ ଦୁଇ ପାଦ ଦେଖିଲି; ତାଙ୍କ ପାଦତଳରେ ଊର୍ଧ୍ୱଗାମୀ ରେଖା ଥିଲା ଏବଂ ତଳ ସମତଳ ଥିଲା। ପାଦପୀଠ ଉପରେ ଥିଲେ ମଧ୍ୟ ସେଗୁଡ଼ିକ ଅକ୍ଷତ ଥିଲା—ସେଇ ଦୁଇ ମଙ୍ଗଳମୟ ପାଦ ମୁଁ ଦେଖିଲି।
Verse 10
बैठ जानेपर वहाँ मैंने पादपीठसे हटाये हुए अर्जुनके दोनों सुन्दर चरणोंको (ध्यानपूर्वक) देखा। उनके तलुओंमें ऊर्ध्वगामिनी रेखाएँ दृष्टिगोचर हो रही थीं और वे दोनों पैर शुभसूचक विविध लक्षणोंसे सम्पन्न थे ।। श्यामौ बृहन्तौ तरुणौ शालस्कन्धाविवोद्गतौ । एकासनगतोौ दृष्टवा भयं मां महदाविशत्,श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों श्यामवर्ण, बड़े डील-डौलवाले, तरुण तथा शालवृक्षके स्कन्धोंके समान उन्नत हैं। उन दोनोंको एक आसनपर बैठे देख मेरे मनमें बड़ा भय समा गया
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସେଠାରେ ବସିବା ପରେ ମୁଁ ପାଦପୀଠରୁ ପଛକୁ ହଟାଇଥିବା ପାର୍ଥଙ୍କ ଦୁଇ ସୁନ୍ଦର ପାଦକୁ ଧ୍ୟାନପୂର୍ବକ ଦେଖିଲି। ତାଙ୍କ ପାଦତଳରେ ଊର୍ଧ୍ୱଗାମୀ ରେଖା ଦୃଶ୍ୟମାନ ଥିଲା ଏବଂ ସେ ଦୁଇ ପାଦ ନାନା ଶୁଭଲକ୍ଷଣରେ ସମ୍ପନ୍ନ ଥିଲା। ତାପରେ ମୁଁ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଓ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ଦେଖିଲି—ଦୁହେଁ ଶ୍ୟାମବର୍ଣ୍ଣ, ବିଶାଳଦେହୀ, ଯୁବକ, ଶାଳବୃକ୍ଷର ସ୍କନ୍ଧ ପରି ଉନ୍ନତ—ଏକେ ଆସନରେ ସହିତ ବସିଥିଲେ; ସେ ଦୃଶ୍ୟ ଦେଖି ମୋ ହୃଦୟରେ ମହାଭୟ ପ୍ରବେଶ କଲା।
Verse 11
इन्द्रविष्णुसमावेतौ मन्दात्मा नावबुद्धयते । संश्रयाद् द्रोणभीष्मा भ्यां कर्णस्य च विकत्थनात्,मैंने सोचा, इन्द्र और विष्णुके समान अचिन्त्य शक्तिशाली इन दोनों वीरोंको मन्दबुद्धि दुर्योधन नहीं समझ पाता है। वह द्रोणाचार्य और भीष्मका भरोसा करके तथा कर्णकी डींगभरी बातें सुनकर मोहित हो रहा है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ଇନ୍ଦ୍ର ଓ ବିଷ୍ଣୁ ସମ ଅଚିନ୍ତ୍ୟ ପ୍ରଭାବରେ ଏକତ୍ର ଥିବା ସେଇ ଦୁଇ ଯୋଦ୍ଧାଙ୍କୁ ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଯଥାର୍ଥରେ ବୁଝିପାରେ ନାହିଁ। ଦ୍ରୋଣ ଓ ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ଆଶ୍ରୟରେ ଏବଂ କର୍ଣ୍ଣଙ୍କ ଡ଼ଙ୍ଗାମାରା କଥାରେ ମୋହିତ ହୋଇ ସେ ଭ୍ରମରେ ରହେ—ଆସନ୍ତା ଯୁଦ୍ଧର ବଳ-ତୁଳା ଓ ଧର୍ମର ଗାମ୍ଭୀର୍ୟକୁ ସଠିକ୍ ଭାବେ ମାପିପାରେ ନାହିଁ।
Verse 12
निदेशस्थाविमौ यस्य मानसस्तस्य सेत्स्यते । संकल्पो धर्मराजस्य निश्चयो मे तदाभवत्,ये दोनों महात्मा जिनकी आज्ञाका पालन करनेके लिये सदा उद्यत रहते हैं, उन धर्मराज युधिष्ठिरका मानसिक संकल्प अवश्य सिद्ध होगा; यही उस समय मेरा निश्चय हुआ था
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ଯାହାଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ପାଳନ କରିବାକୁ ଏହି ଦୁଇ ମହାତ୍ମା ସଦା ପ୍ରସ୍ତୁତ ରହନ୍ତି, ସେ ମଣିଷର ମାନସିକ ସଙ୍କଳ୍ପ ନିଶ୍ଚୟ ସିଦ୍ଧ ହୁଏ। ତେଣୁ ସେ ସମୟରେ ମୋର ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟ ହେଲା ଯେ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ସଙ୍କଳ୍ପ ଅବଶ୍ୟ ପୂରଣ ହେବ।
Verse 13
सत्कृतश्नान्नपाना भ्यामासीनो लब्धसत्क्रिय: । अज्जलिं मूर्थ्नि संधाय तौ संदेशमचोदयम्,तत्पश्चात् अन्न और जलके द्वारा मेरा सत्कार किया गया। यथोचित आदर-सत्कार पाकर जब मैं बैठा, तब माथेपर अंजलि जोड़कर मैंने उन दोनोंसे आपका संदेश कह सुनाया
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ଅନ୍ନ ଓ ଜଳ ଦ୍ୱାରା ମୋର ଯଥୋଚିତ ସତ୍କାର ହେଲା। ଯୋଗ୍ୟ ଆତିଥ୍ୟ ପାଇ ମୁଁ ଆସନଗ୍ରହଣ କରି, ଶ୍ରଦ୍ଧାରେ ମସ୍ତକ ଉପରେ ଅଞ୍ଜଳି ଯୋଡ଼ି, ସେଇ ଦୁଇଜଣଙ୍କୁ ଆପଣଙ୍କ ସନ୍ଦେଶ ନିବେଦନ କଲି।
Verse 14
धनुर्गुणकिणाड्केन पाणिना शुभलक्षणम् | पादमानमयन् पार्थ: केशवं समचोदयत्,तब अर्जुनने जिसमें धनुषकी डोरीकी रगड़से चिह्न बन गया था, उस हाथसे भगवान् श्रीकृष्णके शुभसूचक लक्षणोंसे युक्त चरणको धीरे-धीरे दबाते हुए उन्हें मुझको उत्तर देनेके लिये प्रेरित किया
ତେବେ ପାର୍ଥ ଅର୍ଜୁନ, ଧନୁଷ୍ୟର ଡୋରିର ଘଷାରେ ଚିହ୍ନିତ ହୋଇଥିବା ସେଇ ହାତରେ, ଶୁଭଲକ୍ଷଣଯୁକ୍ତ ଭଗବାନ କେଶବଙ୍କ ପାଦକୁ ଧୀରେ ଧୀରେ ମର୍ଦ୍ଦନ କରି, ମୋତେ ଉତ୍ତର ଦେବାକୁ ତାଙ୍କୁ ପ୍ରେରିତ କଲେ।
Verse 15
इन्द्रकेतुरिवोत्थाय सर्वाभरणभूषित: । इन्द्रवीयोंपम: कृष्ण: संविष्टो माभ्यभाषत
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ଇନ୍ଦ୍ରକେତୁ ପରି ଉଠି ଦାଁଡ଼ାଇ, ସମସ୍ତ ଆଭରଣରେ ଭୂଷିତ, ଇନ୍ଦ୍ରସମ ପରାକ୍ରମୀ କୃଷ୍ଣ ପରେ ଆସନଗ୍ରହଣ କରି ମୋତେ ସମ୍ବୋଧନ କଲେ।
Verse 16
वाचं स वदतां श्रेष्ठो ह्वादिनीं वचनक्षमाम् | त्रासिनीं धार्तराष्ट्राणां मृदुपूर्वां सुदारुणाम्
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ବକ୍ତାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସେ ଏମିତି ବାଣୀ କହିଲେ ଯାହା ମଧୁର ଓ ସୁସଂଗଠିତ, ତଥାପି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଭୟଜନକ; ଆରମ୍ଭରେ ମୃଦୁ, ଶେଷରେ ସତ୍ୟକୁ କାଟି ଦେଖାଇବା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଅତ୍ୟନ୍ତ କଠୋର।
Verse 17
तदनन्तर इन्द्रके समान पराक्रमी तथा समस्त आभूषणोंसे विभूषित वक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण इन्द्रध्वजके समान उठ बैठे और मुझसे पहले तो मृदुल एवं मनको आह्लाद प्रदान करनेवाली प्रवचनयोग्य वाणी बोले। फिर वह वाणी अत्यन्त दारुणरूपमें प्रकट हुई, जो आपके पुत्रोंके लिये भय उपस्थित करनेवाली थी ।। वाचं तां वचनार्हस्य शिक्षाक्षरसमन्विताम् । अश्रौषमहमिष्टार्था पश्चाद्धदयहारिणीम्,तत्पश्चात् बातचीतमें कुशल भगवान् श्रीकृष्णकी वह वाणी मेरे सुननेमें आयी, जिसका एक-एक अक्षर शिक्षाप्रद था। वह अभीष्ट अर्थका प्रतिपादन करनेवाली तथा मनको मोह लेनेवाली थी
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ତାପରେ ଇନ୍ଦ୍ରସମ ପରାକ୍ରମୀ, ସମସ୍ତ ଆଭୂଷଣରେ ବିଭୂଷିତ, ବକ୍ତାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଇନ୍ଦ୍ରଧ୍ୱଜ ପରି ଉଠି ଆସନରେ ବସିଲେ। ପ୍ରଥମେ ସେ ଉପଦେଶଯୋଗ୍ୟ, ମୃଦୁ ଓ ମନକୁ ଆହ୍ଲାଦ ଦେବା ବାଣୀ କହିଲେ; ପରେ ସେହି ବାଣୀ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦାରୁଣ ରୂପ ଧାରଣ କରି ଆପଣଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଭୟ ଉପସ୍ଥିତ କଲା। ମୁଁ ସେଇ ବଚନାର୍ହ ବକ୍ତାଙ୍କ ବାଣୀ ଶୁଣିଲି—ପ୍ରତ୍ୟେକ ଅକ୍ଷର ଶିକ୍ଷାପ୍ରଦ; ଅଭୀଷ୍ଟ ଅର୍ଥ ପ୍ରତିପାଦନ କରୁଥିବା ଏବଂ ଏକାସାଥି ହୃଦୟକୁ ମୋହିତ କରୁଥିବା।
Verse 18
वायुदेव उवाच संजयेदं वचो ब्रूया धृतराष्ट्र मनीषिणम् | कुरुमुख्यस्य भीष्मस्य द्रोणस्यापि च शृण्वतः,भगवान् श्रीकृष्णने कहा--संजय! जब कुरुकुलके प्रधान पुरुष भीष्म तथा आचार्य द्रोण भी सुन रहे हों, उसी समय तुम बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रसे यह बात कहना
ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ସଞ୍ଜୟ, କୁରୁମୁଖ୍ୟ ଭୀଷ୍ମ ଓ ଆଚାର୍ଯ୍ୟ ଦ୍ରୋଣ ମଧ୍ୟ ଶୁଣୁଥିବା ସମୟରେ, ବୁଦ୍ଧିମାନ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ ଏହି କଥା କହ।
Verse 19
आवयोर्वचनात् सूत ज्येष्ठानप्यभिवादयन् । यवीयसश्व कुशल पश्चात् पृष्टवैवमुत्तरम्,सूत! हम दोनोंकी ओरसे पहले तुम हमसे बड़ी अवस्थावाले श्रेष्ठ पुरुषोंको प्रणाम कहना और जो लोग अवस्थामें हमसे छोटे हों, उनकी कुशल पूछना। इसके बाद हमारा यह उत्तर सुना देना--
ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ହେ ସୂତ, ଆମ ଦୁହେଁଙ୍କ ପକ୍ଷରୁ ପ୍ରଥମେ ବୟସ ଓ ମର୍ଯ୍ୟାଦାରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଜ୍ୟେଷ୍ଠମାନଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କର; ପରେ ଯେମାନେ ଆମଠାରୁ କନିଷ୍ଠ, ସେମାନଙ୍କ କୁଶଳ ପଚାର। ତା’ପରେ ଆମର ଏହି ଉତ୍ତର ଶୁଣାଇଦେ।
Verse 20
यजचध्वं विविधीर्यज्निविप्रेभ्यो दत्त दक्षिणा: । पुत्रैदरिश्ष मोदध्वं महद् वो भयमागतम्,“कौरवो! नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान आरम्भ करो, ब्राह्मणोंको दक्षिणाएँ दो, पुत्रों और स्त्रियोंसे मिल-जुलकर आनन्द भोग लो; क्योंकि तुम्हारे ऊपर बहुत बड़ा भय आ पहुँचा है
“ହେ କୌରବମାନେ! ନାନା ପ୍ରକାର ଯଜ୍ଞ ଆରମ୍ଭ କର, ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ଦକ୍ଷିଣା ଦିଅ, ପୁତ୍ର ଓ ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହ ମିଶି ଆନନ୍ଦ କର; କାରଣ ତୁମ ଉପରେ ମହାଭୟ ଆସି ପହଞ୍ଚିଛି।”
Verse 21
“तुम सुपात्र व्यक्तियोंको धनका दान दे लो, अपनी इच्छाके अनुसार पुत्र पैदा कर लो तथा अपने प्रेमीजनोंका प्रिय कार्य सिद्ध कर लो; क्योंकि राजा युधिष्ठिर अब तुमलोगोंपर विजय पानेके लिये उतावले हो रहे हैं
ବାୟୁ କହିଲେ— ଯୋଗ୍ୟ ପାତ୍ରମାନଙ୍କୁ ଧନ ଦାନ କର, ନିଜ ଇଚ୍ଛାଅନୁସାରେ ପୁତ୍ର ପ୍ରାପ୍ତ କର, ଏବଂ ପ୍ରିୟଜନଙ୍କ ପ୍ରିୟ କାର୍ଯ୍ୟ ସିଦ୍ଧ କର; କାରଣ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଏବେ ତୁମମାନଙ୍କୁ ଜିତିବାକୁ ଆତୁର ହେଉଛନ୍ତି।
Verse 22
ऋणमेतत् प्रवृद्धं मे हृदयान्नापसर्पति । यद् गोविन्देति चुक्रोश कृष्णा मां दूरवासिनम्
ଏହି କୃତଜ୍ଞତାର ଋଣ ମୋ ହୃଦୟରେ ବଢ଼ିଯାଇ ମଧ୍ୟ ସରେ ନାହିଁ—ମୁଁ ଦୂରେ ଥିବାବେଳେ ଦ୍ରୌପଦୀ ‘ଗୋବିନ୍ଦ!’ ବୋଲି ଆର୍ତ୍ତରେ ମୋତେ ଡାକିଥିଲା।
Verse 23
अर्थास्त्यजत पात्रेभ्य: सुतान् प्राप्तुत कामजान् । प्रियं प्रियेभ्यश्षरत राजा हि त्वरते जये,“जिस समय कौरवसभामें द्रौपदीका वस्त्र खींचा जा रहा था, मैं हस्तिनापुरसे बहुत दूर था। उस समय कृष्णाने आर्तभावसे “गोविन्द” कहकर जो मुझे पुकारा था, उसका मेरे ऊपर बहुत बड़ा ऋण है और यह ऋण बढ़ता ही जा रहा है। (अपराधी कौरवोंका संहार किये बिना) उसका भार मेरे हृदयसे दूर नहीं हो सकता ।। तेजोमयं दुराधर्ष गाण्डीवं यस्य कार्मुकम् । मद्द्वितीयेन तेनेह वैरं व: सव्यसाचिना “जिनके पास अजेय तेजस्वी गाण्डीव नामक धनुष है और जिनका मित्र या सहायक दूसरा मैं हूँ, उन्हीं सव्यसाची अर्जुनके साथ यहाँ तुमने वैर बढ़ाया है
ବାୟୁଦେବ କହିଲେ— ଯୋଗ୍ୟ ପାତ୍ରମାନଙ୍କୁ ଧନ ତ୍ୟାଗ କରି ଦାନ କର; ଧର୍ମସମ୍ମତ ଇଚ୍ଛାରୁ ଜନ୍ମିତ ପୁତ୍ର ପ୍ରାପ୍ତି ପାଇଁ ଚେଷ୍ଟା କର; ପ୍ରିୟମାନଙ୍କୁ ପ୍ରିୟ ବସ୍ତୁ ଅର୍ପଣ କର—କାରଣ ରାଜା ଜୟ ପାଇଁ ତ୍ୱରାନ୍ୱିତ। କିନ୍ତୁ ଏଠାରେ ତୁମେ ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନ ସହିତ ବୈର ବଢ଼ାଇଛ; ଯାହାଙ୍କ ଧନୁଷ ତେଜୋମୟ, ଦୁରାଧର୍ଷ ଗାଣ୍ଡୀବ, ଏବଂ ଯାହାଙ୍କ ଦ୍ୱିତୀୟ ସହାୟ ମୁଁ ନିଜେ। ତେଣୁ ଅପରାଧୀ କୌରବମାନଙ୍କୁ ସଂହାର ନ କଲେ ସେଇ ଋଣର ଭାର ମୋ ହୃଦୟରୁ ଦୂର ହେବ ନାହିଁ।
Verse 24
मदद्वितीयं पुनः पार्थ कः प्रार्थयितुमिच्छति । यो न कालपरीतो वाप्यपि साक्षात् पुरंदर:,“जिसको कालने सब ओरसे घेर न लिया हो, ऐसा कौन पुरुष, भले ही वह साक्षात् इन्द्र ही क्यों न हो, उस अर्जुनके साथ युद्ध करना चाहता है, जिसका सहायक दूसरा मैं हूँ
ବାୟୁ କହିଲେ— ହେ ପାର୍ଥ! ମୁଁ ଯେତେବେଳେ ତୁମର ଦ୍ୱିତୀୟ ସହାୟ, ତେବେ ତୁମକୁ ଆହ୍ୱାନ କରିବାକୁ କିଏ ଇଚ୍ଛା କରିବ? ଯାହାକୁ କାଳବିଧି ସବୁଦିଗରୁ ଘେରିନାହିଁ, ସେ କିଏ—ସେ ସାକ୍ଷାତ୍ ପୁରନ୍ଦର (ଇନ୍ଦ୍ର) ହେଲେ ମଧ୍ୟ—ଅର୍ଜୁନ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ଚାହିବ?
Verse 25
बाहुभ्यामुद्धहेद् भूमिं दहेत् क्रुद्ध इमा: प्रजा: । पातयेत् त्रिदिवाद देवान् योडर्जुनं समरे जयेत्,“जो अर्जुनको युद्धमें जीत ले, वह अपनी दोनों भुजाओंपर इस पृथ्वीको उठा सकता है, कुपित होकर इन समस्त प्रजाओंको भस्म कर सकता है, और सम्पूर्ण देवताओंको स्वर्गसे नीचे गिरा सकता है
ବାୟୁଦେବ କହିଲେ— ଯେ ଯୁଦ୍ଧରେ ଅର୍ଜୁନକୁ ଜିତିପାରେ, ସେ ନିଜ ଦୁଇ ଭୁଜାରେ ପୃଥିବୀକୁ ଉଠାଇପାରିବ; କ୍ରୋଧରେ ଏହି ସମସ୍ତ ପ୍ରଜାକୁ ଭସ୍ମ କରିପାରିବ; ଏବଂ ସ୍ୱର୍ଗରୁ ଦେବମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ତଳେ ପତିତ କରିପାରିବ।
Verse 26
देवासुरमनुष्येषु यक्षगन्धर्वभोगिषु । नतं पश्याम्यहं युद्धे पाण्डवं यो5भ्ययाद् रणे,“देवताओं, असुरों, मनुष्यों, यक्षों, गन्धर्वों तथा नागोंमें भी मुझे कोई ऐसा वीर नहीं दिखायी देता, जो पाण्डुनन्दन अर्जुनका सामना कर सके
ଦେବ, ଅସୁର, ମନୁଷ୍ୟ, ଯକ୍ଷ, ଗନ୍ଧର୍ବ ଓ ନାଗଜାତିମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ ଯୁଦ୍ଧରେ ପାଣ୍ଡବ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖେ ଦୃଢ଼ ହୋଇ ଠିଆ ରହିପାରିବା, ରଣରେ ତାଙ୍କ ବିରୋଧରେ ଆଗେଇବାକୁ ସାହସ କରିପାରିବା—ଏମିତି କାହାକୁ ମୁଁ ଦେଖୁନାହିଁ।
Verse 27
यत् तद् विराटनगरे श्रूयते महदद्भुतम् | एकस्य च बहूनां च पर्याप्तं तन्निदर्शनम्,“विराटनगरमें अकेले अर्जुन और बहुत-से कौरवोंका जो अद्भुत और महान संग्राम सुना जाता है, वही मेरे उपर्युक्त कथनकी सत्यताका पर्याप्त प्रमाण है
ବିରାଟନଗରରେ ଶୁଣାଯାଉଥିବା ସେଇ ମହାନ୍ ଓ ଅଦ୍ଭୁତ କାର୍ଯ୍ୟ—ଏକଜଣଙ୍କର ଅନେକଙ୍କ ସହ ସଂଘର୍ଷ—ମୁଁ ଏମାତ୍ର କହିଥିବା କଥାର ସତ୍ୟତାକୁ ପ୍ରମାଣ କରିବାକୁ ପର୍ଯ୍ୟାପ୍ତ।
Verse 28
एकेन पाण्डुपुत्रेण विराटनगरे यदा । भग्ना: पलायत दिश: पर्याप्त॑ तन्निदर्शनम्,“जब विराटनगरमें एकमात्र पाण्डुकुमार अर्जुनसे पराजित हो तुमलोगोंने भागकर विभिन्न दिशाओंकी शरण ली थी, वह एक ही दृष्टान्त अर्जुनकी प्रबलताका पर्याप्त प्रमाण है
ବିରାଟନଗରରେ ଯେତେବେଳେ ଏକମାତ୍ର ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ର ଅର୍ଜୁନ ତୁମମାନଙ୍କୁ ପରାଜିତ କରି, ତୁମେ ଭାଙ୍ଗିପଡ଼ି ବିଭିନ୍ନ ଦିଗକୁ ପଳାଇଥିଲ—ସେଇ ଏକ ଘଟଣା ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ପ୍ରବଳତାର ପର୍ଯ୍ୟାପ୍ତ ପ୍ରମାଣ।
Verse 29
बलं॑ वीर्य च तेजश्न शीघ्रता लघुहस्तता । अविषादश्न धैर्य च पार्थन्नान्यत्र विद्यते,“बल, पराक्रम, तेज, शीघ्रकारिता, हाथोंकी फुर्ती, विषादहीनता तथा धैर्य--ये सभी सदगुण कुन्तीपुत्र अर्जुनके सिवा (एक साथ) दूसरे किसी पुरुषमें नहीं हैं'
ବଳ, ବୀର୍ଯ୍ୟ, ତେଜ, ଶୀଘ୍ରତା, ହାତର ଚାତୁର୍ୟ, ବିଷାଦହୀନତା ଓ ଧୈର୍ଯ୍ୟ—ଏ ସମସ୍ତ ଗୁଣ ଏକାସାଥିରେ ପାର୍ଥ ଅର୍ଜୁନ ବ୍ୟତୀତ ଅନ୍ୟ କାହାରେ ନାହିଁ।
Verse 30
इत्यब्रवीद्धूषीकेश: पार्थमुद्धर्षपयन् गिरा । गर्जन् समयवर्षीव गगने पाकशासन:,जैसे इन्द्र आकाशमें गर्जता हुआ समयपर वर्षा करता है, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको अपनी वाणीसे आनन्दित करते हुए उपर्युक्त बात कही
ଏହିପରି ହୃଷୀକେଶ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ନିଜ ବାଣୀଦ୍ୱାରା ପାର୍ଥ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ଉତ୍ସାହିତ କରି କହିଲେ; ଯେପରି ଗଗନେ ପାକଶାସନ ଇନ୍ଦ୍ର ଗର୍ଜନ କରି ସମୟରେ ବର୍ଷା କରନ୍ତି, ସେପରି ତାଙ୍କ ବଚନ ମଧ୍ୟ ସମୟୋଚିତ ଓ ପ୍ରଭାବଶାଳୀ ଥିଲା।
Verse 31
केशवस्य वच: श्रुत्वा किरीटी श्वेतवाहन: । अर्जुनस्तन्महद् वाक्यमब्रवीद् रोमहर्षणम्,भगवान् श्रीकृष्णका वचन सुनकर किरीटधारी श्वेतवाहन अर्जुनने भी उसी रोमांचकारी महावाक्यको दुहरा दिया
କେଶବଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି, କିରୀଟଧାରୀ ଶ୍ୱେତବାହନ ଅର୍ଜୁନ ମଧ୍ୟ ସେଇ ମହାନ୍, ରୋମାଞ୍ଚକର ବାକ୍ୟ ଉଚ୍ଚାରଣ କଲା।
Verse 59
इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि संजयेन श्रीकृष्णवाक्यकथने एकोनषष्टितमो5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें संजयद्वारा श्रीकृष्णके संदेशका कथनविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଯାନସନ୍ଧିପର୍ବରେ ସଞ୍ଜୟଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣବାକ୍ୟକଥନବିଷୟକ ଏକୋନଷଷ୍ଟିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
The tension is between persisting in a contested claim to power versus acknowledging looming harm and prior moral obligations; Kṛṣṇa’s speech reframes policy as an ethical choice with foreseeable consequences rather than a neutral exercise of authority.
Speech and counsel are presented as instruments of governance: leaders must evaluate capability, precedent, and obligation together, because ignoring credible counsel converts manageable dispute into systemic danger.
No explicit phalaśruti is stated here; instead, the chapter’s meta-function is archival and diagnostic—documenting how protocol, perception, and persuasive speech operate at a critical decision point in the epic’s ethical history.