Adhyaya 56
Udyoga ParvaAdhyaya 5664 Verses

Adhyaya 56

Sainyasaṅgraha and Bhāga-Vyavasthā (Forces Assembled and Rival Allocations) | सैन्यसंग्रह-भागव्यवस्था

Upa-parva: Sainyavibhāga (Alliance and Battle-Array Allocation) Episode

Chapter 56 records a court dialogue in which Dhṛtarāṣṭra asks Saṃjaya to identify those assembled to fight for the Pāṇḍavas. Saṃjaya enumerates prominent allies and contingents—Kṛṣṇa and leading Vṛṣṇis, Pāñcālas under Dhṛṣṭadyumna, Drupada, Virāṭa with Matsya forces, Cedi and other kings, and the five Kekaya brothers—presenting the Pāṇḍava coalition as multi-regional and heavily resourced (akṣauhiṇī references). The chapter then shifts from roster to strategic framing: Saṃjaya notes command competence (Dhṛṣṭadyumna’s knowledge of battle arrays) and outlines anticipated rival pairings (bhāga) among principal combatants across both sides. Dhṛtarāṣṭra voices apprehension about confronting a coalition led by Yudhiṣṭhira and protected by Kṛṣṇa, emphasizing the Pāṇḍavas’ renowned valor. Duryodhana counters with assertions of parity and confidence in his champions (Bhīṣma, Droṇa, Kṛpa, Karṇa, Jayadratha, Aśvatthāmā, etc.). The chapter concludes with Dhṛṣṭadyumna’s rallying posture and a cautionary emphasis on Arjuna’s exceptional martial capacity, framing escalation as strategically foreseeable even if ethically contested.

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र को पाण्डव-पक्ष की सुसज्जित तैयारी और एक-एक करके जुटते हुए महारथियों का दृश्य सुनाते हैं—मानो धर्म की ओर से उठती हुई सेना की धड़कन राजसभा में सुनाई देने लगे। → वृष्णि-अन्धक वीरों (कृष्ण, चेकितान, सात्यकि) का आगमन, पृथक-पृथक अक्षौहिणियों का पाण्डवों में समावेश, और पांचाल-नरेश द्रुपद का धृष्टद्युम्न व अन्य पुत्रों सहित संगठित होना—इन सबका वर्णन धृतराष्ट्र के भीतर भय और दुर्योधन के भीतर दर्प को एक साथ भड़काता है। → धृतराष्ट्र के विलाप और दुर्योधन के ‘अपनी प्रबलता’ के प्रतिपादन के बीच निर्णायक स्वर उभरता है—अर्जुन का दिव्य रथ और गाण्डीव-धारी पराक्रम ‘मनुष्य से अजेय’ कहकर युद्ध की दिशा को लगभग अपरिहार्य बना देता है। → पाण्डव-पक्ष के सहयोगी राजाओं और शूरवीरों की सामर्थ्य स्पष्ट हो जाती है; साथ ही यह भी संकेत मिलता है कि भीष्म जैसे धर्मज्ञ महात्मा पाण्डवों की शक्ति जानते हुए भी विग्रह को न रोक पाने की स्थिति में हैं—राजनीतिक समाधान क्षीण पड़ता है। → धृतराष्ट्र के भय, दुर्योधन के हठ और दोनों पक्षों के राजाओं के ‘तुमुल शस्त्र-संकुल’ संग्राम में मिलने की घोषणा के साथ अध्याय युद्ध के द्वार पर आकर ठहर जाता है।

Shlokas

Verse 1

ऑपनआ कराता बछ। 2 सप्तपञ्चाशत्तमो<्ध्याय: संजयद्दारा पाण्डवोंकी 32 कक तैयारीका वर्णन, धृतराष्ट्रका विलाप, दुर्योधनद्वारा अपनी प्रबलताका प्रतिपादन, धृतराष्ट्रका उसपर अविश्वास तथा संजयद्दारा धृष्टद्युम्नकी शक्ति एवं संदेशका कथन धृतराष्ट उवाच कांस्तत्र संजयापश्य: प्रीत्यर्थन समागतान्‌ । ये योत्स्यन्ते पाण्डवार्थे पुत्रस्य मम वाहिनीम्‌,धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! तुमने वहाँ युधिष्ठटिरकी प्रसन्नताके लिये आये हुए किन-किन राजाओंको देखा था, जो पाण्डवोंके हितके लिये मेरे पुत्रकी सेनाके साथ युद्ध करेंगे?

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—“ସଞ୍ଜୟ! ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ପ୍ରସନ୍ନ କରିବା ପାଇଁ ସେଠାରେ କେଉଁ କେଉଁ ରାଜା ଏକତ୍ର ହୋଇଥିଲେ, ତୁମେ କାହାକୁ ଦେଖିଲ—ଯେମାନେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ହିତରେ ମୋ ପୁତ୍ରର ସେନା ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବେ?”

Verse 2

संजय उवाच मुख्यमन्धकवृष्णीनामपश्यं कृष्णमागतम्‌ | चेकितानं च तत्रैव युयुधानं च सात्यकिम्‌,संजयने कहा--राजन्‌! मैंने वहाँ देखा कि वृष्णि और अन्धकवंशके प्रधान पुरुष भगवान्‌ श्रीकृष्ण पधारे हुए हैं। वहाँ चेकितान और युयुधान सात्यकि भी उपस्थित हैं

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—“ରାଜନ୍! ଅନ୍ଧକ ଓ ବୃଷ୍ଣିବଂଶର ଅଗ୍ରଣୀ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ସେଠାରେ ଆସିଥିବା ମୁଁ ଦେଖିଲି। ସେଠାରେ ଚେକିତାନ ଓ ଯୁୟୁଧାନ ସାତ୍ୟକି ମଧ୍ୟ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲେ।”

Verse 3

पृथगक्षौहिणी भ्यां तु पाण्डवानभिसंश्रितौ | महारथौ समाख्यातावुभौ पुरुषमानिनौ,अपनेको पौरुषशाली वीर माननेवाले वे दोनों विख्यात महारथी अलग-अलग एक-एक अक्षौहिणी सेनाके साथ पाण्डवोंकी सहायताके लिये आये हैं

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—“ନିଜ ପୌରୁଷରେ ଅଭିମାନୀ ସେଇ ଦୁଇ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ମହାରଥୀ ପୃଥକ୍ ପୃଥକ୍ ଭାବେ ଏକେକ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ସହ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପକ୍ଷରେ ଆଶ୍ରୟ ନେଇଛନ୍ତି।”

Verse 4

अक्षौहिण्याथ पाज्चाल्यो दशभिस्तनयैर्वृत: । सत्यजिप्प्रमुखैर्वरिर्धष्टद्युम्नपुरोगमै:,पांचालनरेश ट्रुपद धृष्टद्युम्म और सत्यजित्‌ आदि दस वीर पुत्रोंक साथ शिखण्डीद्वारा सुरक्षित हो कवच आदिसे सम्पूर्ण सैनिकोंके शरीरोंको आच्छादित करके उन सबकी एक अक्षौहिणी सेनाके साथ युधिष्छिरका मान बढ़ानेके लिये वहाँ आये हुए हैं

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—“ତାପରେ ପାଞ୍ଚାଳରାଜ ଦ୍ରୁପଦ, ସତ୍ୟଜିତ୍ ଆଦି ଦଶଜଣ ବୀର ପୁତ୍ରଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଘେରାଯାଇ, ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନଙ୍କୁ ଅଗ୍ରେ ରଖି, ଏକ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ସହ ସେଠାରେ ପହଞ୍ଚିଲେ।”

Verse 5

द्रुपदो वर्धयन्‌ मानं शिखण्डिपरिपालित: । उपायात्‌ सर्वसैन्यानां प्रतिच्छाद्य तदा वपु:,पांचालनरेश ट्रुपद धृष्टद्युम्म और सत्यजित्‌ आदि दस वीर पुत्रोंक साथ शिखण्डीद्वारा सुरक्षित हो कवच आदिसे सम्पूर्ण सैनिकोंके शरीरोंको आच्छादित करके उन सबकी एक अक्षौहिणी सेनाके साथ युधिष्छिरका मान बढ़ानेके लिये वहाँ आये हुए हैं

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—“ଶିଖଣ୍ଡୀଙ୍କ ସୁରକ୍ଷାରେ ଦ୍ରୁପଦ ସେଠାକୁ ଆସିଲେ; ସମସ୍ତ ସେନାଙ୍କ ଦେହକୁ କବଚରେ ଆବୃତ କରାଇ, ସେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ମାନ ବଢ଼ାଇଲେ।”

Verse 6

विराट: सह पुत्राभ्यां शड़्खेनैवोत्तरेण च । सूर्यदत्तादिभिवरीरिर्मदिराक्षपुरोगमै:

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ବିରାଟ ରାଜା ନିଜ ଦୁଇ ପୁତ୍ର ଶଙ୍ଖ ଓ ଉତ୍ତର ସହ, ସୂର୍ଯ୍ୟଦତ୍ତ ଆଦି ବୀରମାନଙ୍କ ସଙ୍ଗେ—ମଦିରାକ୍ଷକୁ ଅଗ୍ରଭାଗରେ ରଖି—ଆଗେ ବଢ଼ିଲେ।

Verse 7

सहित: पृथिवीपालो भ्रातृभिस्तनयैस्तथा । अक्षौहिण्यैव सैन्यानां वृत: पार्थ समाश्रित:

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ସେ ଭୂପତି ନିଜ ଭାଇମାନେ ଓ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହ ଥିଲେ; ଏକ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନାରେ ଘେରା ହୋଇ, ହେ ପାର୍ଥ, ସେହି ବଳକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ଦଢ଼ ହୋଇ ରହିଲେ।

Verse 8

राजा विराट अपने दो पुत्रों शंख और उत्तरको साथ लिये, सूर्यदत्त और मदिराक्ष आदि वीर भ्राताओं और अन्य पुत्रोंक साथ एक अक्षौहिणी सेनासे घिरे हुए कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरकी सहायताके लिये उपस्थित हैं ।। जारासंधिमागधश्न धृष्टकेतुश्च चेदिराट्‌ । पृथक्‌ पृथगनुप्राप्तौ पृथगक्षौहिणीवृतौ,जरासंधकुमार मगधनरेश सहदेव तथा चेदिराज धृष्टकेतु--ये दोनों भी अलग-अलग एक-एक अक्षौहिणी सेना लेकर आये हैं

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ସହାୟତା ପାଇଁ ବିରାଟ ରାଜା ଆସିଛନ୍ତି। ସେ ନିଜ ଦୁଇ ପୁତ୍ର ଶଙ୍ଖ ଓ ଉତ୍ତର, ସୂର୍ଯ୍ୟଦତ୍ତ ଓ ମଦିରାକ୍ଷ ଆଦି ବୀର ଭାଇମାନେ ଏବଂ ଅନ୍ୟ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହ, ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନାରେ ଘେରା ହୋଇ ଉପସ୍ଥିତ। ଏହିପରି, ଜରାସନ୍ଧବଂଶୀ ମଗଧରାଜକୁମାର ସହଦେବ ଓ ଚେଦିରାଜ ଧୃଷ୍ଟକେତୁ ମଧ୍ୟ ପୃଥକ୍ ପୃଥକ୍ ଭାବେ, ପ୍ରତ୍ୟେକ ନିଜ ନିଜ ଏକ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ସହ ଆସିଛନ୍ତି।

Verse 9

केकया भ्रातर: पज्च सर्वे लोहितकध्वजा: । अक्षौहिणीपरिवृता: पाण्डवानभिसंश्रिता:,लाल रंगकी ध्वजावाले जो पाँचों भाई केकयराजकुमार हैं, वे सभी एक अक्षौहिणी सेनाके साथ पाण्डवोंकी सेवामें उपस्थित हुए हैं

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— କେକୟର ପାଞ୍ଚ ଭାଇ, ସମସ୍ତେ ଲାଲ ଧ୍ୱଜଧାରୀ, ଏକ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନାରେ ଘେରା ହୋଇ, ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ତାଙ୍କ ସେବାରେ ଉପସ୍ଥିତ ହେଲେ।

Verse 10

एतानेतावतस्तत्र तानपश्यं समागतान्‌ | ये पाण्डवार्थे योत्स्यन्ति धार्तराष्ट्रस्य वाहिनीम्‌,मैंने इन सबको इतनी सेनाओंके साथ वहाँ आया हुआ देखा है। ये लोग पाण्डवोंके हितके लिये दुर्योधनकी सेनाके साथ युद्ध करेंगे

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ସେଠାରେ ମୁଁ ଏମାନଙ୍କୁ ଏତେ ସେନାବଳ ସହ ଏକତ୍ର ହୋଇଥିବା ଦେଖିଲି। ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ହିତ ପାଇଁ ଏମାନେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରଙ୍କ ବାହିନୀ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବେ।

Verse 11

यो वेद मानुषं व्यूहं दैवं गान्धर्वमासुरम्‌ । स तत्र सेनाप्रमुखे धृष्टद्युम्नो महारथ:,जो मनुष्यों, देवताओं, गन्धर्वों तथा असुरोंकी भी व्यूहरचना-प्रणालीको जानते हैं, वे महारथी धृष्टद्युम्न पाण्डवपक्षकी सेनाके अग्रभागमें (सेनापति होकर) रहेंगे

ମନୁଷ୍ୟ, ଦେବ, ଗନ୍ଧର୍ବ ଓ ଅସୁରମାନଙ୍କର ଯୁଦ୍ଧବ୍ୟୂହ-ରଚନା ପ୍ରଣାଳୀ ଯେ ଜାଣେ, ସେଇ ମହାରଥୀ ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ ସେଠାରେ ପାଣ୍ଡବସେନାର ଅଗ୍ରଭାଗରେ ସେନାପତି ହୋଇ ରହିବେ।

Verse 12

भीष्म: शान्तनवो राजन्‌ भाग: क्लृप्त: शिखण्डिन: । तं॑ विराटोडनुसंयाता सार्थ मत्स्यै: प्रहारिभि:,राजन! शान्तनुनन्दन भीष्मजीके वधका कार्य शिखण्डीको सौंपा गया है। राजा विराट मत्स्यदेशीय योद्धाओंके साथ शिखण्डीकी सहायताके लिये उसका अनुसरण करेंगे

ରାଜନ୍! ଶାନ୍ତନୁନନ୍ଦନ ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ବଧକାର୍ଯ୍ୟ ଶିଖଣ୍ଡୀଙ୍କୁ ଅର୍ପିତ ହୋଇଛି। ମତ୍ସ୍ୟଦେଶୀୟ ପ୍ରହାରୀ ଯୋଦ୍ଧାମାନଙ୍କ ସହ ରାଜା ବିରାଟ ଶିଖଣ୍ଡୀଙ୍କୁ ସହାୟତା କରିବାକୁ ତାଙ୍କ ପଛେ ପଛେ ଯିବେ।

Verse 13

ज्येष्ठस्य पाण्डुपुत्रस्य भागो मद्राधिपो बली । तौ तु तत्राब्रुवन्‌ केचिद्‌ विषमौ नो मताविति,बलवान मद्रनरेश ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरके हिस्सेमें पड़े हैं--युधिष्ठिर ही उनके साथ युद्ध करेंगे। परंतु यह बाँटवारा सुनकर कुछ लोग वहाँ बोल उठे थे कि ये दोनों तो हमें परस्पर समान शक्तिशाली नहीं जान पड़ते

ଜ୍ୟେଷ୍ଠ ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଭାଗରେ ବଳବାନ ମଦ୍ରାଧିପତି ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ହେଲେ; ଯୁଧିଷ୍ଠିର ହିଁ ତାଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବେ। କିନ୍ତୁ ଏହି ବଣ୍ଟନ ଶୁଣି କେତେକ ଲୋକ ସେଠାରେ କହିଉଠିଲେ—‘ଆମ ମତରେ ଏହି ଦୁଇଜଣ ସମବଳ ନୁହେଁ।’

Verse 14

दुर्योधन: सहसुतः सार्थ भ्रातृशतेन च । प्राच्याश्न दाक्षिणात्याक्ष भीमसेनस्थ भागत:,अपने सौ भाइयों तथा पुत्रोंसहित दुर्योधन और पूर्व एवं दक्षिण-दिशाके कौरवसैनिक भीमसेनका भाग नियत किये गये हैं

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ନିଜ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହ ଓ ଶତଭ୍ରାତାଙ୍କ ସହ, ଏବଂ ପୂର୍ବ ଓ ଦକ୍ଷିଣ ଦିଗର କୌରବ ସେନାମାନେ—ଏ ସମସ୍ତେ ଭୀମସେନଙ୍କ ଭାଗରେ ନିୟତ ହେଲେ।

Verse 15

अर्जुनस्य तु भागेन कर्णो वैकर्तनो मत: । अश्रत्थामा विकर्णक्ष सैन्धवश्न जयद्रथ:,वैकर्तन कर्ण, अश्वत्थामा, विकर्ण और सिंधुराज जयद्रथ--ये सब अर्जुनके हिस्सेमें पड़े हैं

ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ଭାଗରେ ବୈକର୍ତ୍ତନ କର୍ଣ୍ଣ, ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା, ବିକର୍ଣ୍ଣ ଏବଂ ସିନ୍ଧୁରାଜ ଜୟଦ୍ରଥ—ଏ ସମସ୍ତେ ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ହେଲେ।

Verse 16

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें संजयवाक्यविषयक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ,अशब्याश्रैव ये केचित्‌ पृथिव्यां शूरमानिन: । सर्वास्तानर्जुन: पार्थ: कल्पयामास भागत: इनके सिवा और भी अपनेको शूरवीर माननेवाले जो कोई नरेश इस भूमण्डलमें अजेय माने जाते हैं, उन सबको कुन्तीकुमार अर्जुनने अपना भाग निश्चित किया है

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଏହି ପୃଥିବୀରେ ଯେଉଁ ଅନ୍ୟ ରାଜାମାନେ ନିଜକୁ ଶୂର ବୋଲି ଭାବି ଅଜେୟ ବୋଲି ପ୍ରସିଦ୍ଧ, ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତଙ୍କର ଭାଗ ମଧ୍ୟ ପୃଥାପୁତ୍ର ପାର୍ଥ ଅର୍ଜୁନ ପୂର୍ବରୁ ହିଁ ନିର୍ଦ୍ଧାରଣ କରି ରଖିଛନ୍ତି।

Verse 17

महेष्वासा राजपुत्रा भ्रातर: पठ्च केकया: । केकयानेव भागेन कृत्वा योत्स्यन्ति संयुगे,पाँच भाई केकयराजकुमार भी महान धनुर्धर हैं। वे समरांगणमें अपने विरोधी केकयदेशीय योद्धाओंको ही अपना भाग (वध्य वैरी) मानकर युद्ध करेंगे

କେକୟ ଦେଶର ପାଞ୍ଚ ଭାଇ ରାଜପୁତ୍ର ମହାଧନୁର୍ଧର। ସେମାନେ ସମରରେ କେକୟମାନଙ୍କୁ ହିଁ ନିଜ ଭାଗ ବୋଲି ଧରି ଯୁଦ୍ଧ କରିବେ।

Verse 18

तेषामेव कृतो भागो मालवा: शाल्वकास्तथा । त्रिगर्तानां चैव मुख्यौ यौ तौ संशप्तकाविति,मालव, शाल्व तथा त्रिगर्तदेशके सैनिक और संशप्तक--सेनाके दो प्रमुख वीर भी उन केकयराज-कुमारोंके ही भाग नियत किये गये हैं

ସେମାନଙ୍କ (କେକୟକୁମାରମାନଙ୍କ) ପାଇଁ ହିଁ ଭାଗ ଭାବେ ମାଲବ, ଶାଲ୍ବକ, ଏବଂ ତ୍ରିଗର୍ତ୍ତମାନଙ୍କ ଦୁଇ ମୁଖ୍ୟ ନାୟକ—‘ସଂଶପ୍ତକ’ ନାମେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ—ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ହେଲେ।

Verse 19

दुर्योधनसुता: सर्वे तथा दुःशासनस्य च । सौभद्रेण कृतो भागो राजा चैव बृहद्धल:,दुर्योधन तथा दुःशासनके सभी पुत्र और राजा बृहद्वल सुभद्रानन्दन अभिमन्युके हिस्सेमें पड़े हैं

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ସମସ୍ତ ପୁତ୍ର, ତଥା ଦୁଃଶାସନଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ, ଏବଂ ରାଜା ବୃହଦ୍ଧଳ—ଏ ସମସ୍ତେ ସୌଭଦ୍ର (ଅଭିମନ୍ୟୁ)ଙ୍କ ଭାଗ ଭାବେ ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ହେଲେ।

Verse 20

द्रौपदेया महेष्वासा: सुवर्णविकृतध्वजा: । धृष्टद्युम्नमुखा द्रोणमभियास्यन्ति भारत

ହେ ଭାରତ! ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ ମହାଧନୁର୍ଧର; ସୁବର୍ଣ୍ଣରେ ଶୋଭିତ ଧ୍ୱଜଧାରୀ। ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନଙ୍କୁ ଅଗ୍ରେ ରଖି ସେମାନେ ଦ୍ରୋଣଙ୍କୁ ଆକ୍ରମଣ କରିବାକୁ ଅଭିମୁଖୀ ହେବେ।

Verse 21

भरतनन्दन! सुवर्णनिर्मित ध्वजाओंसे युक्त महाधनुर्धथर द्रौपदीपुत्र भी धृष्टद्युम्नके साथ द्रोणगपर आक्रमण करेंगे ।। चेकितान: सोमदत्तं द्वैरथे योद्धुमिच्छति । भोजं तु कृतवर्माणं युयुधानो युयुत्सति,चेकितान द्वैरथ-संग्राममें सोमदत्तके साथ युद्ध करना चाहते हैं। सात्यकि भोजवंशी कृतवर्माके साथ युद्ध करनेको उत्सुक हैं

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଚେକିତାନ ରଥଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱ ଯୁଦ୍ଧରେ ସୋମଦତ୍ତଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛନ୍ତି। ଏବଂ ଯୁୟୁଧାନ (ସାତ୍ୟକି) ଭୋଜବଂଶୀ କୃତବର୍ମାଙ୍କ ସହ ମୁକାବିଲା ପାଇଁ ଉତ୍ସୁକ।

Verse 22

सहदेवस्तु माद्रेय: शूर: संक्रन्दनो युधि । स्वमंशं कल्पयामास श्यालं ते सुबलात्मजम्‌,महाराज! युद्धमें इन्द्रके समान पराक्रमी शूरवीर माद्रीनन्दन सहदेवने आपके साले सुबलपुत्र शकुनिको अपना भाग निश्चित किया है

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ମାଦ୍ରୀପୁତ୍ର ବୀର ସହଦେବ, ଯୁଦ୍ଧରେ ଇନ୍ଦ୍ରସମ ପରାକ୍ରମୀ, ତୁମ ଶ୍ୟାଳ ସୁବଳପୁତ୍ର ଶକୁନିଙ୍କୁ ନିଜ ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱୀ ଭାବେ ଠିକ୍ କରିଛନ୍ତି।

Verse 23

उलूकं चैव कैतव्यं ये च सारस्वता गणा: । नकुल: कल्पयामास भागं माद्रवतीसुत:,उस धूर्त जुआरी शकुनिका पुत्र जो उलूक है तथा जो सारस्वतप्रदेशके सैनिक हैं, उन सबको माद्रीकुमार नकुलने अपना भाग नियत किया है

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ମାଦ୍ରୀପୁତ୍ର ନକୁଳ ଧୂର୍ତ୍ତ ଉଲୂକଙ୍କୁ ଏବଂ ସାରସ୍ୱତ ଅଞ୍ଚଳର ସେନାଗଣକୁ ନିଜ ଭାଗ ଭାବେ ନିର୍ଦ୍ଧାରଣ କରିଛନ୍ତି।

Verse 24

ये चान्ये पार्थिवा राजन प्रत्युद्यास्यन्ति सड़रे । समाद्दानेन तांश्वापि पाण्डुपुत्रा अकल्पयन्‌,राजन! दूसरे भी जो-जो नरेश (आपकी ओरसे) युद्धमें पदार्पण करेंगे, उन सबका भी नाम ले-लेकर पाण्डवोंने उन्हें अपना भाग निश्चित किया है

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ରାଜନ୍! ତୁମ ପକ୍ଷରୁ ଯେଯେ ଅନ୍ୟ ରାଜାମାନେ ଯୁଦ୍ଧକୁ ଅଗ୍ରସର ହେବେ, ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନେ ସେମାନଙ୍କ ନାମ ନେଇ ମଧ୍ୟ ପୂର୍ବରୁ ନିଜେ-ନିଜେ ଭାଗ ନିର୍ଦ୍ଧାରଣ କରିସାରିଛନ୍ତି।

Verse 25

एवमेषामनीकानि प्रविभक्तानि भागश: । यत्‌ ते कार्य सपुत्रस्य क्रियतां तदकालिकम्‌,इस प्रकार पाण्डवोंकी सेनाएँ पृथक्‌-पृथक्‌ भागोंमें बँटी हुई हैं। अब पुत्रोंसहित आपका जो कर्तव्य हो, उसे अविलम्ब पूरा करें

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଏହିପରି ତାଙ୍କର ସେନାବ୍ୟୁହଗୁଡ଼ିକ ଭାଗଭାଗରେ ବିଭକ୍ତ ହୋଇ ସୁସଜ୍ଜିତ ହୋଇଛି। ଏବେ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହିତ ତୁମର ଯେ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ଅଛି, ତାହା ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍—ବିଳମ୍ବ ବିନା—ସମ୍ପାଦନ କର।

Verse 26

धृतराष्ट उवाच न सन्ति सर्वे पुत्रा मे मूढा दुर्यूतदेविन: । येषां युद्ध बलवता भीमेन रणमूर्थनि,धृतराष्ट्र बोले--संजय! समरभूमिके प्रमुख भागमें बलवान्‌ भीमसेनके साथ जिनका युद्ध होनेवाला है, वे कपटपूर्ण जूआ खेलनेवाले मेरे सभी मूर्ख पुत्र अब नहींके बराबर हैं

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ— ସଞ୍ଜୟ! ରଣଭୂମିର ଅଗ୍ରଭାଗରେ ବଳବାନ ଭୀମସେନଙ୍କ ସହ ଯାହାଙ୍କ ଯୁଦ୍ଧ ହେବ, ସେ କପଟ ଦ୍ୟୂତରେ ଆସକ୍ତ ମୋର ସମସ୍ତ ମୂଢ଼ ପୁତ୍ର ଏବେ ପ୍ରାୟ ନାହାନ୍ତି ବୋଲି ମନେ ହୁଏ।

Verse 27

राजान: पार्थिवा: सर्वे प्रोक्षिता: कालधर्मणा । गाण्डीवानिनें प्रवेक्ष्यन्ति पतज्रा इव पावकम्‌,भूमण्डलके समस्त राजाओंका वध करनेके लिये मानो कालधर्मा यमराजने उनका प्रोक्षण (संस्कार) किया है; अत: जैसे पतंग आगमें गिरते हैं, वैसे ही ये सब नरेश गाण्डीव धनुषकी आगमें समा जायँगे

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ— “ଏହି ସମସ୍ତ ରାଜା ଓ ପାର୍ଥିବ ନରେଶମାନେ କାଳଧର୍ମର ଅନିବାର୍ୟ ବିଧାନରେ ମୃତ୍ୟୁ ପାଇଁ ଯେନେ ଅଭିଷିକ୍ତ ହୋଇଛନ୍ତି। ତେଣୁ ପତଙ୍ଗ ଯେପରି ଜ୍ୱଳନ୍ତ ଅଗ୍ନିରେ ପଡ଼େ, ସେପରି ଏମାନେ ସମସ୍ତେ ଗାଣ୍ଡୀବ-ଧନୁଷର ଅଗ୍ନିରେ ପ୍ରବେଶ କରିବେ।”

Verse 28

विद्रुतां वाहिनीं मन्ये कृतवैरैर्महात्मभि: । तां रणे केडनुयास्यन्ति प्रभग्नां पाण्डवैर्युधि,मैं तो समझता हूँ; जिनका हमलोगोंके साथ वैर ठन गया है, वे महात्मा पाण्डव समरांगणमें हमारी विशाल सेनाको अवश्य मार भगायेंगे। उनके द्वारा खदेड़ी हुई उस सेनाका अनुसरण अथवा सहयोग कौन कर सकेंगे?

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ— “ମୋତେ ଲାଗେ, ଯେ ମହାତ୍ମା ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ଆମର ବୈର ଦୃଢ଼ ହୋଇଛି, ସେମାନେ ରଣଭୂମିରେ ଆମର ବିଶାଳ ସେନାକୁ ନିଶ୍ଚୟ ମାରି ଭଗାଇବେ। ପାଣ୍ଡବମାନେ ଯୁଦ୍ଧରେ ଭଙ୍ଗ କରି ଖଦେଡ଼ିଦେଇଥିବା ସେ ସେନାକୁ କିଏ ଅନୁସରଣ କରିପାରିବ—କିଏ ତାହାକୁ ସହାୟତା ଦେଇ ଦଢ଼ ହୋଇ ରହିପାରିବ?”

Verse 29

सर्वे ह्यतिरथा: शूरा: कीर्तिमन्त: प्रतापिन: । सूर्यपावकयोस्तुल्यास्तेजसा समितिज्जया:

ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଅତିରଥ, ଶୂର, କୀର୍ତ୍ତିମାନ ଓ ପ୍ରତାପୀ; ସମରଜୟୀ, ତେଜରେ ସୂର୍ଯ୍ୟ ଓ ଅଗ୍ନି ସମାନ।

Verse 30

समस्त पाण्डव अतिरथी शूरवीर, यशस्वी, प्रतापी, युद्धविजयी तथा अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी हैं ।। येषां युधिष्ठिरो नेता गोप्ता च मधुसूदन: । योधौ च पाण्डवौ वीरौ सव्यसाचिवृकोदरौ,संजय! युधिष्छिर जिनके नेता हैं, भगवान्‌ मधुसूदन जिनके रक्षक हैं, पाण्डुपुत्र वीरवर अर्जुन और भीमसेन जिनके प्रमुख योद्धा हैं, नकुल, सहदेव, पृषद्वंशी धृष्टद्युम्न, सात्यकि, ट्रपद, धृष्टकेतु, सुकेतु, पांचालदेशीय उत्तमौजा, दुर्जय युधामन्यु, शिखण्डी, क्षत्रदेव, विराटकुमार उत्तर, काशि, चेदि तथा मत्स्यदेशके सैनिक, सूंजयवंशी क्षत्रिय, विराटकुमार बश्रु तथा पांचालदेशीय प्रभद्रकगण जिनके पक्षमें युद्धके लिये उद्यत हैं, जिनकी इच्छाके बिना देवराज इन्द्र भी इस पृथ्वीका अपहरण नहीं कर सकते, जो वीर तथा रणधीर हैं, जो पर्वतोंको भी विदीर्ण कर सकते हैं, जिनका प्रताप देवताओंके समान है तथा जो समस्त सदगुणोंसे सम्पन्न हैं, उन्हीं पाण्डवोंके साथ मेरा दुष्ट पुत्र दुर्योधन मेरे चीखते-चिल्लाते हुए भी युद्ध करना चाहता है

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ— “ସଞ୍ଜୟ! ପାଣ୍ଡବମାନେ ସମସ୍ତେ ଅତିରଥ—ଶୂର, ଯଶସ୍ବୀ, ପ୍ରତାପୀ, ସମରଜୟୀ; ଅଗ୍ନି ଓ ସୂର୍ଯ୍ୟ ସମ ତେଜସ୍ବୀ। ଯାହାଙ୍କ ନେତା ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ଯାହାଙ୍କ ରକ୍ଷକ ମଧୁସୂଦନ (କୃଷ୍ଣ), ଏବଂ ଯାହାଙ୍କ ପ୍ରମୁଖ ଯୋଦ୍ଧା ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ର ଦୁଇ ବୀର—ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନ ଓ ବୃକୋଦର ଭୀମ। ସେମାନଙ୍କ ସହ ନକୁଳ-ସହଦେବ, ପୃଷଦବଂଶୀ ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ, ସାତ୍ୟକି, ଦ୍ରୁପଦ, ଧୃଷ୍ଟକେତୁ, ସୁକେତୁ, ପାଞ୍ଚାଳର ଉତ୍ତମୌଜା, ଅଜେୟ ଯୁଧାମନ୍ୟୁ, ଶିଖଣ୍ଡୀ, କ୍ଷତ୍ରଦେବ, ବିରାଟପୁତ୍ର ଉତ୍ତର, କାଶୀ-ଚେଦି-ମତ୍ସ୍ୟର ସେନା, ଏବଂ ସୃଞ୍ଜୟ କ୍ଷତ୍ରିୟ, ବଭ୍ରୁ ଓ ପାଞ୍ଚାଳର ପ୍ରଭଦ୍ରକଗଣ—ସମସ୍ତେ ତାଙ୍କ ପକ୍ଷରେ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ସଜ୍ଜ। ଯାହାଙ୍କ ଅନୁମତି ବିନା ଦେବରାଜ ଇନ୍ଦ୍ର ମଧ୍ୟ ଏହି ପୃଥିବୀକୁ ହରଣ କରିପାରିବେ ନାହିଁ। ସେମାନେ ରଣଧୀର, ପର୍ବତକୁ ମଧ୍ୟ ବିଦୀର୍ଣ୍ଣ କରିପାରନ୍ତି, ଦେବତୁଲ୍ୟ ପ୍ରଭାବଶାଳୀ ଓ ସମସ୍ତ ସଦ୍‌ଗୁଣରେ ସମ୍ପନ୍ନ। ତଥାପି ମୋର ପାପକର୍ମୀ ପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ, ମୋର ଆର୍ତ୍ତ ଆକ୍ରନ୍ଦନ ସତ୍ତ୍ୱେ, ସେହି ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ହିଁ ଚାହୁଁଛି।”

Verse 31

नकुल: सहदेवश्व धष्टद्युम्नश्न पार्षत: । सात्यकिर्द्रपदश्चैव धृष्टकेतुश्न सानुज:,संजय! युधिष्छिर जिनके नेता हैं, भगवान्‌ मधुसूदन जिनके रक्षक हैं, पाण्डुपुत्र वीरवर अर्जुन और भीमसेन जिनके प्रमुख योद्धा हैं, नकुल, सहदेव, पृषद्वंशी धृष्टद्युम्न, सात्यकि, ट्रपद, धृष्टकेतु, सुकेतु, पांचालदेशीय उत्तमौजा, दुर्जय युधामन्यु, शिखण्डी, क्षत्रदेव, विराटकुमार उत्तर, काशि, चेदि तथा मत्स्यदेशके सैनिक, सूंजयवंशी क्षत्रिय, विराटकुमार बश्रु तथा पांचालदेशीय प्रभद्रकगण जिनके पक्षमें युद्धके लिये उद्यत हैं, जिनकी इच्छाके बिना देवराज इन्द्र भी इस पृथ्वीका अपहरण नहीं कर सकते, जो वीर तथा रणधीर हैं, जो पर्वतोंको भी विदीर्ण कर सकते हैं, जिनका प्रताप देवताओंके समान है तथा जो समस्त सदगुणोंसे सम्पन्न हैं, उन्हीं पाण्डवोंके साथ मेरा दुष्ट पुत्र दुर्योधन मेरे चीखते-चिल्लाते हुए भी युद्ध करना चाहता है

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ନକୁଳ ଓ ସହଦେବ, ପାର୍ଷତ (ଦ୍ରୁପଦପୁତ୍ର) ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ, ସାତ୍ୟକି, ସ୍ୱୟଂ ଦ୍ରୁପଦ ଏବଂ ଅନୁଜମାନଙ୍କ ସହିତ ଧୃଷ୍ଟକେତୁ—ଏମାନେ ମଧ୍ୟ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପକ୍ଷରେ ଅଛନ୍ତି।

Verse 32

उत्तमौजाश्व पाज्चाल्यो युधामन्युश्न दुर्जय: । शिखण्डी क्षत्रदेवश्ष तथा वैराटिरुत्तर:,संजय! युधिष्छिर जिनके नेता हैं, भगवान्‌ मधुसूदन जिनके रक्षक हैं, पाण्डुपुत्र वीरवर अर्जुन और भीमसेन जिनके प्रमुख योद्धा हैं, नकुल, सहदेव, पृषद्वंशी धृष्टद्युम्न, सात्यकि, ट्रपद, धृष्टकेतु, सुकेतु, पांचालदेशीय उत्तमौजा, दुर्जय युधामन्यु, शिखण्डी, क्षत्रदेव, विराटकुमार उत्तर, काशि, चेदि तथा मत्स्यदेशके सैनिक, सूंजयवंशी क्षत्रिय, विराटकुमार बश्रु तथा पांचालदेशीय प्रभद्रकगण जिनके पक्षमें युद्धके लिये उद्यत हैं, जिनकी इच्छाके बिना देवराज इन्द्र भी इस पृथ्वीका अपहरण नहीं कर सकते, जो वीर तथा रणधीर हैं, जो पर्वतोंको भी विदीर्ण कर सकते हैं, जिनका प्रताप देवताओंके समान है तथा जो समस्त सदगुणोंसे सम्पन्न हैं, उन्हीं पाण्डवोंके साथ मेरा दुष्ट पुत्र दुर्योधन मेरे चीखते-चिल्लाते हुए भी युद्ध करना चाहता है

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ପାଞ୍ଚାଳଙ୍କ ଉତ୍ତମୌଜ, ଅଜେୟ ଯୁଧାମନ୍ୟୁ, ଶିଖଣ୍ଡୀ, କ୍ଷତ୍ରଦେବ ଏବଂ ବିରାଟପୁତ୍ର ଉତ୍ତର—ହେ ସଞ୍ଜୟ—ଏମାନେ ମଧ୍ୟ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପକ୍ଷରେ ଅଛନ୍ତି।

Verse 33

काशयश्नेदयश्नैव मत्स्या: सर्वे च सूंजया: । विराटपुत्रो बश्रुश्न॒ पञ्चालाश्व प्रभद्रका:,संजय! युधिष्छिर जिनके नेता हैं, भगवान्‌ मधुसूदन जिनके रक्षक हैं, पाण्डुपुत्र वीरवर अर्जुन और भीमसेन जिनके प्रमुख योद्धा हैं, नकुल, सहदेव, पृषद्वंशी धृष्टद्युम्न, सात्यकि, ट्रपद, धृष्टकेतु, सुकेतु, पांचालदेशीय उत्तमौजा, दुर्जय युधामन्यु, शिखण्डी, क्षत्रदेव, विराटकुमार उत्तर, काशि, चेदि तथा मत्स्यदेशके सैनिक, सूंजयवंशी क्षत्रिय, विराटकुमार बश्रु तथा पांचालदेशीय प्रभद्रकगण जिनके पक्षमें युद्धके लिये उद्यत हैं, जिनकी इच्छाके बिना देवराज इन्द्र भी इस पृथ्वीका अपहरण नहीं कर सकते, जो वीर तथा रणधीर हैं, जो पर्वतोंको भी विदीर्ण कर सकते हैं, जिनका प्रताप देवताओंके समान है तथा जो समस्त सदगुणोंसे सम्पन्न हैं, उन्हीं पाण्डवोंके साथ मेरा दुष्ट पुत्र दुर्योधन मेरे चीखते-चिल्लाते हुए भी युद्ध करना चाहता है

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—କାଶୀ ଓ ଚେଦି, ସମସ୍ତ ମତ୍ସ୍ୟ ଓ ସୂଞ୍ଜୟ, ବିରାଟପୁତ୍ର ବଭ୍ରୁ, ଏବଂ ପାଞ୍ଚାଳ ଓ ପ୍ରଭଦ୍ରକ—ହେ ସଞ୍ଜୟ—ଏମାନେ ମଧ୍ୟ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ପ୍ରସ୍ତୁତ ହୋଇ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପକ୍ଷରେ ଅଛନ୍ତି।

Verse 34

येषामिन्द्रो5प्पकामानां न हरेत्‌ पृथिवीमिमाम्‌ । वीराणां रणधीराणां ये भिन्द्यु: पर्वतानपि,संजय! युधिष्छिर जिनके नेता हैं, भगवान्‌ मधुसूदन जिनके रक्षक हैं, पाण्डुपुत्र वीरवर अर्जुन और भीमसेन जिनके प्रमुख योद्धा हैं, नकुल, सहदेव, पृषद्वंशी धृष्टद्युम्न, सात्यकि, ट्रपद, धृष्टकेतु, सुकेतु, पांचालदेशीय उत्तमौजा, दुर्जय युधामन्यु, शिखण्डी, क्षत्रदेव, विराटकुमार उत्तर, काशि, चेदि तथा मत्स्यदेशके सैनिक, सूंजयवंशी क्षत्रिय, विराटकुमार बश्रु तथा पांचालदेशीय प्रभद्रकगण जिनके पक्षमें युद्धके लिये उद्यत हैं, जिनकी इच्छाके बिना देवराज इन्द्र भी इस पृथ्वीका अपहरण नहीं कर सकते, जो वीर तथा रणधीर हैं, जो पर्वतोंको भी विदीर्ण कर सकते हैं, जिनका प्रताप देवताओंके समान है तथा जो समस्त सदगुणोंसे सम्पन्न हैं, उन्हीं पाण्डवोंके साथ मेरा दुष्ट पुत्र दुर्योधन मेरे चीखते-चिल्लाते हुए भी युद्ध करना चाहता है

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ହେ ସଞ୍ଜୟ! ସେମାନେ ଏମିତି ବୀର ଓ ରଣଧୀର ଯେ ଅଳ୍ପକାମ ଦେବରାଜ ଇନ୍ଦ୍ର ମଧ୍ୟ ସେମାନଙ୍କ ଇଚ୍ଛା ବିରୋଧରେ ଏହି ପୃଥିବୀକୁ ଛିନିନେଇ ପାରିବେ ନାହିଁ; ସେମାନେ ପର୍ବତକୁ ମଧ୍ୟ ଭେଦି ପାରିବେ।

Verse 35

तान्‌ सर्वगुणसम्पन्नानमनुष्यप्रतापिन: । क्रोशतो मम दुष्पुत्रो योद्धुमिच्छति संजय,संजय! युधिष्छिर जिनके नेता हैं, भगवान्‌ मधुसूदन जिनके रक्षक हैं, पाण्डुपुत्र वीरवर अर्जुन और भीमसेन जिनके प्रमुख योद्धा हैं, नकुल, सहदेव, पृषद्वंशी धृष्टद्युम्न, सात्यकि, ट्रपद, धृष्टकेतु, सुकेतु, पांचालदेशीय उत्तमौजा, दुर्जय युधामन्यु, शिखण्डी, क्षत्रदेव, विराटकुमार उत्तर, काशि, चेदि तथा मत्स्यदेशके सैनिक, सूंजयवंशी क्षत्रिय, विराटकुमार बश्रु तथा पांचालदेशीय प्रभद्रकगण जिनके पक्षमें युद्धके लिये उद्यत हैं, जिनकी इच्छाके बिना देवराज इन्द्र भी इस पृथ्वीका अपहरण नहीं कर सकते, जो वीर तथा रणधीर हैं, जो पर्वतोंको भी विदीर्ण कर सकते हैं, जिनका प्रताप देवताओंके समान है तथा जो समस्त सदगुणोंसे सम्पन्न हैं, उन्हीं पाण्डवोंके साथ मेरा दुष्ट पुत्र दुर्योधन मेरे चीखते-चिल्लाते हुए भी युद्ध करना चाहता है

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ହେ ସଞ୍ଜୟ! ସମସ୍ତ ଗୁଣରେ ସମ୍ପନ୍ନ, ମାନବ ପ୍ରତାପରେ ଅତୁଳ ସେହି ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ—ମୁଁ କ୍ରନ୍ଦନ କରୁଥିଲେ ମଧ୍ୟ—ମୋ ଦୁଷ୍ଟ ପୁତ୍ର ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛି।

Verse 36

दुर्योधन उवाच उभौ स्व एकजातीयौ तथोभौ भूमिगोचरीौ । अथ कस्मात्‌ पाण्डवानामेकतो मन्यसे जयम्‌,दुर्योधन बोला--पिताजी! हम कौरव तथा पाण्डव दोनों एक ही जातिके हैं और दोनों इसी भूमिपर रहते हैं। फिर एकमात्र पाण्डवोंकी ही विजय होगी, यह धारणा आपने कैसे बना ली?

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ପିତାଜୀ! ଆମେ କୌରବ ଓ ପାଣ୍ଡବ ଉଭୟେ ଏକେ ବଂଶର; ଏହି ଏକେ ପୃଥିବୀରେ ହିଁ ରହୁଛୁ ଓ ବିଚରୁଛୁ। ତେବେ ଜୟ କେବଳ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କର ହେବ ବୋଲି ଆପଣ କିପରି ଧାରଣା କଲେ?

Verse 37

पितामहं च द्रोणं च कृप॑ कर्ण च दुर्जयम्‌ । जयद्रथं सोमदत्तम श्चवत्थामानमेव च,तात! पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, दुर्जय वीर कर्ण, जयद्रथ, सोमदत्त तथा अश्वृत्थामा, ये सभी उत्तम तेजस्वी और महान्‌ धनुर्धर हैं। देवताओंसहित इन्द्र भी इन्हें युद्धमें जीत नहीं सकते; फिर पाण्डवोंकी तो बात ही क्या है?

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ତାତ! ପିତାମହ ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣାଚାର୍ଯ୍ୟ, କୃପାଚାର୍ଯ୍ୟ, ଦୁର୍ଜୟ ବୀର କର୍ଣ୍ଣ, ଜୟଦ୍ରଥ, ସୋମଦତ୍ତ ଏବଂ ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା—ଏମାନେ ସମସ୍ତେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ତେଜସ୍ବୀ ଓ ମହାଧନୁର୍ଧର। ଦେବତାମାନଙ୍କ ସହିତ ଇନ୍ଦ୍ର ମଧ୍ୟ ଯୁଦ୍ଧରେ ଏମାନଙ୍କୁ ଜିତିପାରିବେ ନାହିଁ; ତେବେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ କଥା କ’ଣ!

Verse 38

सुतेजसो महेष्वासानिन्द्रोडपि सहितो<मरै: । अशक्त: समरे जेतुं कि पुनस्तात पाण्डवा:,तात! पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, दुर्जय वीर कर्ण, जयद्रथ, सोमदत्त तथा अश्वृत्थामा, ये सभी उत्तम तेजस्वी और महान्‌ धनुर्धर हैं। देवताओंसहित इन्द्र भी इन्हें युद्धमें जीत नहीं सकते; फिर पाण्डवोंकी तो बात ही क्या है?

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ତାତ! ଏହି ତେଜସ୍ବୀ ମହାଧନୁର୍ଧରମାନଙ୍କୁ ଦେବତାମାନଙ୍କ ସହିତ ଇନ୍ଦ୍ର ମଧ୍ୟ ସମରରେ ଜିତିପାରିବେ ନାହିଁ; ତେବେ ପାଣ୍ଡବମାନେ କ’ଣ!

Verse 39

सर्वे च पृथिवीपाला मदर्थे तात पाण्डवान्‌ । आर्या: शस्त्रभृत: शूरा: समर्था: प्रतिबाधितुम्‌,तात! ये सभी भूपाल श्रेष्ठ, शस्त्रधारी और शूरवीर होनेके साथ ही मेरे लिये पाण्डवोंको पीड़ा देनेमें समर्थ हैं

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ତାତ! ଏହି ସମସ୍ତ ପୃଥିବୀପାଳ ମୋ ପକ୍ଷରେ ଅଛନ୍ତି; ସେମାନେ କୁଳୀନ, ଶସ୍ତ୍ରଧାରୀ ଓ ଶୂର—ମୋ ପାଇଁ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ରୋକିବା ଓ ପୀଡ଼ା ଦେବାରେ ସମର୍ଥ।

Verse 40

न मामकान्‌ पाण्डवास्ते समर्था: प्रतिवीक्षितुम्‌ पराक्रान्तो हाहं पाण्डून्‌ सपुत्रान्‌ योद्धुमाहवे

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ସେ ପାଣ୍ଡବମାନେ ମୋ ପକ୍ଷକୁ ସାମ୍ନା କରି ଦେଖିବାକୁ ମଧ୍ୟ ସମର୍ଥ ନୁହେଁ। ମୁଁ ପରାକ୍ରମୀ; ରଣଭୂମିରେ ମୁଁ ନିଜେ ପାଣ୍ଡୁଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହ, ସେମାନଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହିତ ମଧ୍ୟ, ଯୁଦ୍ଧ କରିବି।

Verse 41

पाण्डव मेरे पक्षके इन वीरोंकी ओर आँख उठाकर देखनेमें भी समर्थ नहीं हैं। पुत्रोंसहित पाण्डवोंके साथ मैं अकेला ही समरांगणमें युद्ध करनेकी शक्ति रखता हूँ ।। मत्प्रियं पार्थिवा: सर्वे ये चिकीर्षन्ति भारत | ते तानावारयिष्यन्ति ऐणेयानिव तन्तुना

ହେ ଭରତ! ଯେଯେ ରାଜାମାନେ ମୋର ପ୍ରିୟ କରିବାକୁ ଚାହାନ୍ତି, ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଆଗେ ବଢ଼ିବାରୁ ସେହିପରି ରୋକିଦେବେ, ଯେପରି ସୂକ୍ଷ୍ମ ସୂତାରେ ହରିଣଶାବକମାନେ ଅଟକିଯାନ୍ତି।

Verse 42

भरतनन्दन! जो भूपाल मेरा प्रिय करना चाहते हैं, वे सब उन पाण्डवोंको आगे बढ़नेसे उसी प्रकार रोक देंगे, जैसे फन्देसे हिरनके बच्चोंको रोका जाता है ।। महता रथवंशेन शरजालैश्व मामकै: । अभिद्रुता भविष्यन्ति पञ्चाला: पाण्डवैः सह,मेरे पक्षकी विशाल रथसेना तथा मेरे सैनिकोंके बाणसमूहोंसे आहत होकर पांचाल और पाण्डव भाग खड़े होंगे

ହେ ଭରତନନ୍ଦନ! ଯେ ଭୂପାଳମାନେ ମୋର ପ୍ରିୟ କରିବାକୁ ଚାହାନ୍ତି, ସେମାନେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଗତିକୁ ଫାନ୍ଦାରେ ହରିଣଶାବକ ଅଟକିଯାଏ ପରି ରୋକିଦେବେ। ଆଉ ମୋ ପକ୍ଷର ବିଶାଳ ରଥସେନା ଓ ମୋ ସେନାର ଘନ ବାଣବର୍ଷାରେ ଆହତ ହୋଇ, ପାଞ୍ଚାଳମାନେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହିତ ପଳାଇବେ।

Verse 43

धृतराष्ट्र रवाच उन्मत्त इव मे पुत्रो विलपत्येष संजय । न हि शक्तो रणे जेतुं धर्मराजं युधिष्ठिरम्‌,धृतराष्ट्र बोले--संजय! मेरा यह पुत्र पागलके समान प्रलाप कर रहा है। यह युद्धमें धर्मराज युधिष्ठिरको कभी जीत नहीं सकता

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ସଞ୍ଜୟ! ମୋ ପୁଅ ଉନ୍ମତ୍ତ ପରି ପ୍ରଲାପ କରୁଛି। ରଣରେ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଜିତିବାକୁ ସେ ସମର୍ଥ ନୁହେଁ।

Verse 44

जानाति हि यथा भीष्म: पाण्डवानां यशस्विनाम्‌ । बलवत्तां सपुत्राणां धर्मज्ञानां महात्मनाम्‌

ଭୀଷ୍ମ ସେହି ଯଶସ୍ବୀ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କର ସତ୍ୟ ସାମର୍ଥ୍ୟ ଭଲଭାବେ ଜାଣନ୍ତି—ସେମାନେ ବଳବାନ, ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହିତ, ଧର୍ମଜ୍ଞ ଏବଂ ମହାତ୍ମା।

Verse 45

कि तु संजय मे ब्रूहि पुनस्तेषां विचेष्टितम्‌,संजय! तुम पुनः मेरे सामने पाण्डवोंकी चेष्टाका वर्णन करो। कौन ऐसा वीर है, जो वेगशाली और तेजस्वी महाधनुर्धर पाण्डवोंको बार-बार उसी प्रकार उत्तेजित किया करता है, जैसे घीकी आहुति डालनेसे आग प्रज्वलित हो उठती है

କିନ୍ତୁ ସଞ୍ଜୟ! ସେମାନଙ୍କର ବିଚେଷ୍ଟିତ ପୁନର୍ବାର ମୋତେ କୁହ। ସେ କିଏ ସେହି ବୀର—ବେଗବାନ, ତେଜସ୍ବୀ, ମହାଧନୁର୍ଧର—ଯେ ଦୀପ୍ତତେଜ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ପୁନଃପୁନଃ ସେହିପରି ଉଦ୍ଦୀପିତ କରେ, ଯେପରି ଘୃତାହୁତି ପାଇଲେ ଅଗ୍ନି ଭୟଙ୍କର ଭାବେ ପ୍ରଜ୍ୱଳିତ ହୁଏ?

Verse 46

कस्तांस्तरस्विनो भूय: संदीपयति पाण्डवान्‌ | अर्चिष्मतो महेष्वासान्‌ हविषा पावकानिव,संजय! तुम पुनः मेरे सामने पाण्डवोंकी चेष्टाका वर्णन करो। कौन ऐसा वीर है, जो वेगशाली और तेजस्वी महाधनुर्धर पाण्डवोंको बार-बार उसी प्रकार उत्तेजित किया करता है, जैसे घीकी आहुति डालनेसे आग प्रज्वलित हो उठती है

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ସଞ୍ଜୟ, ପୁଣି ମୋ ସମ୍ମୁଖରେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କର ଯୋଜନା ଓ ଚଳନ ବର୍ଣ୍ଣନା କର। କିଏ ସେ ବୀର, ଯେ ବେଗଶାଳୀ, ତେଜସ୍ୱୀ, ମହାଧନୁର୍ଧର ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ପୁନଃପୁନଃ ଏମିତି ଉତ୍ତେଜିତ କରେ—ଯେପରି ଘୃତାହୁତି ପାଇଲେ ଅଗ୍ନି ପ୍ରଜ୍ୱଳିତ ହୁଏ?

Verse 47

संजय उवाच धृष्टद्युम्न: सदेवैतान्‌ संदीपयति भारत । युद्धयध्वमिति मा भैष्ट युद्धाद्‌ भरतसत्तमा:,संजयने कहा--भारत! धृष्टद्युम्न सदा ही इन पाण्डवोंको उत्तेजित करते रहते हैं। वे कहते हैं--"भरतकुलभूषण पाण्डवो! आपलोग युद्ध करें, उससे तनिक भी भयभीत न हों

ସଞ୍ଜୟ କହିଲା—ହେ ଭାରତ! ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ ସଦା ଏମାନଙ୍କୁ ଉତ୍ତେଜିତ କରେ। ସେ କହେ—“ଯୁଦ୍ଧ କର; ଯୁଦ୍ଧରୁ ଭୟ କରନି, ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠମାନେ।”

Verse 48

ये केचित्‌ पार्थिवास्तत्र धार्तराष्ट्रेण संवृता: । युद्धे समागमिष्यन्ति तुमुले शस्त्रसंकुले

ସେଠାରେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପକ୍ଷରେ ଯେଯେ ରାଜାମାନେ ଏକତ୍ର ହୋଇଛନ୍ତି, ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଶସ୍ତ୍ରସଂକୁଳ ସେଇ ଘୋର, କୋଳାହଳମୟ ଯୁଦ୍ଧରେ ସମାଗମ କରିବେ।

Verse 49

तान्‌ सर्वानाहवे क्रुद्धान्‌ सानुबन्धान्‌ समागतान्‌ | अहमेक: समादास्ये तिमिर्मत्स्यानिवौदकान्‌

ସେମାନେ ସମସ୍ତେ କ୍ରୋଧିତ ହୋଇ, ଅନୁଚର-ସହିତ, ରଣରେ ଏକତ୍ର ହେବେ; ସେ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ମୁଁ ଏକାକୀ ଧରି ବଶ କରିଦେବି—ଯେପରି ଜଳରେ ତିମି ମାଛ ଅନ୍ୟ ମାଛମାନଙ୍କୁ ଧରେ।

Verse 50

“धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनके द्वारा एकत्र किये हुए जो-जो नरेश अस्त्र-शस्त्रोंकी मारकाटसे व्याप्त हुए भयानक संग्राममें मेरे सामने आयेंगे, वे कितने ही क्रोधमें भरे हुए क्यों न हों, सगे-सम्बन्धियोंसहित रणभूमिमें आये हुए उन सभी राजाओंको मैं अकेला ही उसी प्रकार वशमें कर लूँगा, जैसे तिमि नामक महामत्स्य जलकी दूसरी मछलियोंको निगल जाता है ।। भीष्म द्रोणं कृपं कर्ण द्रौ्णिं शल्यं सुयोधनम्‌ । एतांश्वापि निरोत्स्यामि वेलेव मकरालयम्‌,'भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, शल्य तथा दुर्योधन--इन सबको मैं उसी भाँति आगे बढ़नेसे रोक दूँगा, जैसे किनारा समुद्रको रोके रखता है”

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଯେଯେ ରାଜାମାନଙ୍କୁ ଏକତ୍ର କରିଛି, ସେମାନେ ଶସ୍ତ୍ର-ସଂହାରରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ସେଇ ଭୟଙ୍କର ସଙ୍ଗ୍ରାମରେ ମୋ ସମ୍ମୁଖକୁ ଆସିଲେ—ସେମାନେ ଯେତେ କ୍ରୋଧରେ ଭରିଥାଉନାହିଁ, ଆତ୍ମୀୟ-ସହିତ ରଣଭୂମିକୁ ଆସିଥାଉନାହିଁ—ସେ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ମୁଁ ଏକାକୀ ବଶ କରିଦେବି; ଯେପରି ‘ତିମି’ ନାମକ ମହାମତ୍ସ୍ୟ ଜଳରେ ଅନ୍ୟ ମାଛମାନଙ୍କୁ ଗିଳିଯାଏ। ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣ, କୃପାଚାର୍ଯ୍ୟ, କର୍ଣ୍ଣ, ଦ୍ରୋଣପୁତ୍ର ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା, ଶଲ୍ୟ ଓ ସୁୟୋଧନ—ଏମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ଆଗକୁ ବଢ଼ିବାରୁ ରୋକିଦେବି; ଯେପରି ତଟ ମକରାଳୟ ସମୁଦ୍ରକୁ ରୋକି ରଖେ।

Verse 51

इस प्रकार बोलते हुए धृष्टद्युम्नसे धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरने कहा--“महाबाहो! पाण्डवोंसहित समस्त पांचाल वीर तुम्हारे धैर्य और पराक्रमका ही आश्रय लेकर युद्धके लिये उद्यत हुए हैं, इसलिये तुम्हीं इस संग्रामसे हमलोगोंका उद्धार करो। मैं जानता हूँ कि तुम क्षत्रियधर्ममें प्रतेष्ठित हो और युद्धकी इच्छासे सामने आये हुए समस्त कौरवोंको अकेले ही कैद कर लेनेकी पूरी शक्ति रखते हो

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ ଏପରି କହୁଥିବାବେଳେ ଧର୍ମାତ୍ମା ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଉତ୍ତର ଦେଲେ—“ମହାବାହୋ! ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ସମସ୍ତ ପାଞ୍ଚାଳ ବୀର ତୁମ ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଓ ପରାକ୍ରମର ଆଶ୍ରୟ ନେଇ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଉଦ୍ୟତ ହୋଇଛନ୍ତି। ତେଣୁ ଏହି ସଂଗ୍ରାମରୁ ଆମକୁ ତୁମେ ଏକା ଉଦ୍ଧାର କର। ମୁଁ ଜାଣେ, ତୁମେ କ୍ଷତ୍ରିୟଧର୍ମରେ ଦୃଢ଼ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ; ଯୁଦ୍ଧକାମନାରେ ସାମ୍ନାକୁ ଆସିଥିବା ସମସ୍ତ କୌରବଙ୍କୁ ତୁମେ ଏକା ଧରି ବନ୍ଦୀ କରିବାର ପୂର୍ଣ୍ଣ ଶକ୍ତି ରଖ।”

Verse 52

सर्वे समधिरूढा: सम संग्रामान्न: समुद्धर । जानामि त्वां महाबाहो क्षत्रधर्मे व्यवस्थितम्‌,इस प्रकार बोलते हुए धृष्टद्युम्नसे धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरने कहा--“महाबाहो! पाण्डवोंसहित समस्त पांचाल वीर तुम्हारे धैर्य और पराक्रमका ही आश्रय लेकर युद्धके लिये उद्यत हुए हैं, इसलिये तुम्हीं इस संग्रामसे हमलोगोंका उद्धार करो। मैं जानता हूँ कि तुम क्षत्रियधर्ममें प्रतेष्ठित हो और युद्धकी इच्छासे सामने आये हुए समस्त कौरवोंको अकेले ही कैद कर लेनेकी पूरी शक्ति रखते हो

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—“ଆମେ ସମସ୍ତେ ସମାନ ସଙ୍କଳ୍ପରେ ଆରୂଢ଼ ଓ ପ୍ରସ୍ତୁତ; ତେଣୁ ଏହି ସଂଗ୍ରାମରୁ ଆମକୁ ଉଦ୍ଧାର କର। ମହାବାହୋ! ମୁଁ ତୁମକୁ କ୍ଷତ୍ରିୟଧର୍ମରେ ଦୃଢ଼ ଭାବେ ସ୍ଥିତ ଜାଣେ—ସହାୟମାନଙ୍କ ପକ୍ଷରୁ ମଧ୍ୟ ଯୁଦ୍ଧଭାର ବହିବାକୁ ସମର୍ଥ।”

Verse 53

समर्थमेकं पर्याप्तं कौरवाणां विनिग्रहे । पुरस्तादुपयातानां कौरवाणां युयुत्सताम्‌,इस प्रकार बोलते हुए धृष्टद्युम्नसे धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरने कहा--“महाबाहो! पाण्डवोंसहित समस्त पांचाल वीर तुम्हारे धैर्य और पराक्रमका ही आश्रय लेकर युद्धके लिये उद्यत हुए हैं, इसलिये तुम्हीं इस संग्रामसे हमलोगोंका उद्धार करो। मैं जानता हूँ कि तुम क्षत्रियधर्ममें प्रतेष्ठित हो और युद्धकी इच्छासे सामने आये हुए समस्त कौरवोंको अकेले ही कैद कर लेनेकी पूरी शक्ति रखते हो

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—“ଯୁଦ୍ଧକାମନାରେ ସାମ୍ନାକୁ ଆସୁଥିବା କୌରବମାନଙ୍କୁ ଦମନ କରିବାକୁ ସେ ଏକା ହିଁ ସମର୍ଥ—ଏକା ହିଁ ପର୍ଯ୍ୟାପ୍ତ।”

Verse 54

भवता यद्‌ विधातव्य॑ तन्न: श्रेय: परंतप । संग्रामादपयातानां भग्नानां शरणैषिणाम्‌,“परंतप! तुम जो कुछ करोगे, वही हमारे लिये मंगलकारी होगा। जो वीर पुरुष अपना पौरुष प्रकट करते हुए युद्धभूमिसे पराजित होकर भागे हुए शरणार्थी सैनिकोंके सामने खड़ा होता (और उनके भयका निवारण करता) है, उसे सहस्रोंकी सम्पत्ति देकर भी खरीद ले (अपने पक्षमें कर ले); यही नीतिज्ञ पुरुषोंका मत है

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—“ପରନ୍ତପ! ତୁମେ ଯାହା କରିବ, ସେହିଟା ଆମ ପାଇଁ ଶ୍ରେୟସ୍କର। ଯେମାନେ ସଂଗ୍ରାମରୁ ଫେରି ମନୋଭଙ୍ଗ ହୋଇ ଶରଣ ଖୋଜୁଛନ୍ତି—ସେମାନଙ୍କ ସାମ୍ନାରେ ଦଢ଼ି ରହି ଯେ ବୀର ତାଙ୍କ ଭୟ ଦୂର କରେ, ସେହି ବୀରକୁ ହଜାରର ସମ୍ପତ୍ତି ଦେଇ ମଧ୍ୟ ନିଜ ପକ୍ଷରେ କରିନେବା ଉଚିତ; ନୀତିଜ୍ଞମାନଙ୍କ ମତ ଏହିପରି।”

Verse 55

पौरुषं दर्शयजञ्शूरो यस्तिछेदग्रत: पुमान्‌ क्रीणीयात्‌ तं सहस्नेण इति नीतिमतां मतम्‌,“परंतप! तुम जो कुछ करोगे, वही हमारे लिये मंगलकारी होगा। जो वीर पुरुष अपना पौरुष प्रकट करते हुए युद्धभूमिसे पराजित होकर भागे हुए शरणार्थी सैनिकोंके सामने खड़ा होता (और उनके भयका निवारण करता) है, उसे सहस्रोंकी सम्पत्ति देकर भी खरीद ले (अपने पक्षमें कर ले); यही नीतिज्ञ पुरुषोंका मत है

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—“ପୌରୁଷ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରି, ସଂଗ୍ରାମରେ ପରାଜିତ ହୋଇ ପଳାଉଥିବା ଓ ଶରଣ ଖୋଜୁଥିବା ସେନାମାନଙ୍କ ସାମ୍ନାରେ ଦଢ଼ି ରହି ସେମାନଙ୍କୁ ସ୍ଥିର କରେ ଏବଂ ଭୟ ହରେ—ସେହି ଶୂରକୁ ହଜାରର ସମ୍ପତ୍ତି ଦେଇ ମଧ୍ୟ ନିଜ ପକ୍ଷରେ କରିନେବା ଉଚିତ; ନୀତିଜ୍ଞମାନଙ୍କ ମତ ଏହିପରି।”

Verse 56

सत्वं शूरश्न वीरश्न विक्रान्तश्न नरर्षभ | भयार्तानां परित्राता संयुगेषु न संशय:,“नरश्रेष्ठ! इसमें संदेह नहीं कि तुम शूर, वीर और पराक्रमी हो तथा युद्धमें भयसे पीड़ित हुए सैनिकोंकी रक्षा कर सकते हो”

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ହେ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ; ତୁମର ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଅଚଳ, ତୁମେ ଶୂର, ବୀର ଓ ପରାକ୍ରମୀ। ଯୁଦ୍ଧସଂଘର୍ଷରେ ଭୟାର୍ତ୍ତ ସୈନିକମାନଙ୍କର ତୁମେ ନିଶ୍ଚୟ ରକ୍ଷକ।

Verse 57

एवं ब्रुवति कौन्तेये धर्मात्मनि युधिष्ठिरे । धृष्टद्युम्न उवाचेदं मां वचो गतसाध्वसम्‌ | सवज्जनपदान्‌ सूत योधा दुर्योधनस्य ये,इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि संजयवाक्ये सप्तपञ्चाशत्तमोड्ध्याय:

କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଧର୍ମାତ୍ମା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଏପରି କହୁଥିବାବେଳେ, ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ ଭୟଶୂନ୍ୟ ବାକ୍ୟରେ ମୋତେ କହିଲା— “ହେ ସୂତ! ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ଯୋଦ୍ଧାମାନଙ୍କୁ, ତାଙ୍କର ମିତ୍ର ଓ ଜନପଦସହିତ କହ।”

Verse 58

सबाह्नल्विकान्‌ कुरून्‌ ब्रूया: प्रातिपियाउशरद्वत: । सूतपुत्रं तथा द्रोणं सहपुत्र॑ जयद्रथम्‌

ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ କହିଲା— “ମୋର ଏହି ବାକ୍ୟ—ଏବେ ଭୟଶୂନ୍ୟ—କୁରୁସଭାକୁ ପହଞ୍ଚା: ବାହ୍ଲୀକ ସହ କୁରୁମାନଙ୍କୁ, ପ୍ରତୀପବଂଶୀ ଶାରଦ୍ୱତପୁତ୍ର କୃପଙ୍କୁ, ସୂତପୁତ୍ର କର୍ଣ୍ଣଙ୍କୁ, ପୁତ୍ରସହିତ ଦ୍ରୋଣଙ୍କୁ, ଏବଂ ପୁତ୍ରସହିତ ଜୟଦ୍ରଥଙ୍କୁ।”

Verse 59

दुःशासनं विकर्ण च तथा दुर्योधन नृपम्‌ भीष्म॑ च ब्रूहि गत्वा त्वमाशु गच्छ च मा चिरम्‌

“ଦୁଃଶାସନ, ବିକର୍ଣ୍ଣ, ରାଜା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଓ ଭୀଷ୍ମ—ଏମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଯାଇ ମୋ କଥା କହ। ଶୀଘ୍ର ଯାଅ; ବିଳମ୍ବ କରନି।”

Verse 60

धर्मात्मा कुन्तीकुमार युधिष्ठिर जब इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय धृष्टद्युम्नने मुझसे भयरहित यह वचन कहा--'सूत! वहाँ दुर्योधनके जितने योद्धा हैं, उनसे, समस्त देशवासियोंसे, बाह्नीक आदि प्रतीपवंशी कौरवोंसे, शरद्वानके पुत्र कृपाचार्यसे, सूतपुत्र कर्णसे, द्रोणाचार्य और अश्वत्थामासे तथा जयद्रथ, दुःशासन, विकर्ण, राजा दुर्योधन और भीष्मसे भी शीघ्र जाकर मेरा यह संदेश कहो। अभी जाओ, विलम्ब मत करो ।। युधिष्ठिर: साधुनैवाभ्युपेयो मा वो वधीदर्जुनो देवगुप्त: । राज्यं दद्ध्वं धर्मराजस्य तूर्ण याचध्वं वै पाण्डवं लोकवीरम्‌,(वह संदेश इस प्रकार है--) “कौरवो! राजा युधिष्ठिर सद॒व्यवहारसे ही वशमें किये जा सकते हैं (युद्धसे नहीं)। ऐसा अवसर न आने दो कि देवताओंद्वारा सुरक्षित वीरवर अर्जुन तुमलोगोंका वध कर डालें। धर्मराज युधिष्ठिरको शीघ्र उनका राज्य सौंप दो और विश्वविख्यात वीर पाण्डुकुमार अर्जुनसे क्षमा-याचना करो

ଧର୍ମାତ୍ମା କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଏପରି କହୁଥିବାବେଳେ, ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ ଭୟଶୂନ୍ୟ ଆତୁରତାରେ ମୋତେ କହିଲା— “ହେ ସୂତ! ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ସମସ୍ତ ଯୋଦ୍ଧାଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ—ତାଙ୍କର ମିତ୍ର ଓ ଜନପଦସହିତ; ବାହ୍ଲୀକାଦି ପ୍ରତୀପବଂଶୀ କୌରବମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ; ଶାରଦ୍ୱତପୁତ୍ର କୃପାଚାର୍ଯ୍ୟଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ; ସୂତପୁତ୍ର କର୍ଣ୍ଣଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ; ଦ୍ରୋଣାଚାର୍ଯ୍ୟ ଓ ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମାଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ; ଏବଂ ଜୟଦ୍ରଥ, ଦୁଃଶାସନ, ବିକର୍ଣ୍ଣ, ରାଜା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଓ ଭୀଷ୍ମ—ଏମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ମଧ୍ୟ—ଶୀଘ୍ର ଯାଇ ମୋ ସନ୍ଦେଶ କହ। ଏବେଇ ଯାଅ; ବିଳମ୍ବ କରନି। ସନ୍ଦେଶ ଏହି— ‘ହେ କୌରବମାନେ! ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଯୁଦ୍ଧରେ ନୁହେଁ, ସଦ୍ବ୍ୟବହାରରେ ମାତ୍ର ବଶ ହୁଅନ୍ତି। ଦେବତାମାନଙ୍କ ରକ୍ଷାରେ ଥିବା ଅର୍ଜୁନ ତୁମମାନଙ୍କୁ ବଧ କରିଦେବେ—ଏପରି ଅବସ୍ଥା ଆସିବାକୁ ଦିଅନି। ଶୀଘ୍ର ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ରାଜ୍ୟ ଫେରାଇ ଦିଅ, ଏବଂ ଲୋକବିଖ୍ୟାତ ପାଣ୍ଡବବୀର ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ କ୍ଷମା ଯାଚନା କର।’”

Verse 61

नैतादृशो हि योधो5स्ति पृथिव्यामिह कश्नन । यथाविध: सव्यसाची पाण्डव: सत्यविक्रम:,“सव्यसाची पाण्डुपुत्र अर्जुन जैसे सत्यपराक्रमी हैं, वैसा योद्धा इस भूमण्डलमें दूसरा कोई नहीं है

ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ କହିଲେ—ଭୟ ବିନା ମୋ କଥା ଶୁଣ। ଏହି ପୃଥିବୀରେ ସବ୍ୟସାଚୀ, ସତ୍ୟପରାକ୍ରମୀ ପାଣ୍ଡବ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ସମାନ ଅନ୍ୟ କୌଣସି ଯୋଦ୍ଧା ନାହିଁ; ତାଙ୍କରେ ଅଦ୍ୱିତୀୟ କୌଶଳ ଓ ଅଚଳ ସାହସ ଅଛି, ତେଣୁ ଧର୍ମଯୁଦ୍ଧର ପ୍ରଧାନ ଆଧାର ସେଇ।

Verse 62

देवै्हि सम्भूतो दिव्यो रथो गाण्डीवधन्चन: । न स जेयो मनुष्येण मा सम कृढद्ध्वं मनो युधि,'गाण्डीव धनुष धारण करनेवाले वीर अर्जुनका दिव्य रथ देवताओंद्वारा सुरक्षित है। कोई भी मनुष्य उन्हें जीत नहीं सकता, अतः तुमलोग अपने मनको युद्धकी ओर न जाने दो”

ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ କହିଲେ—ଭୟ ବିନା ମୋ କଥା ମାନ। ଗାଣ୍ଡୀବଧାରୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ଦିବ୍ୟ ରଥ ଦେବତାମାନେ ରକ୍ଷା କରୁଛନ୍ତି; କୌଣସି ମନୁଷ୍ୟ ତାଙ୍କୁ ଜିତିପାରିବ ନାହିଁ; ତେଣୁ ତାଙ୍କ ବିରୋଧରେ ଯୁଦ୍ଧର ଭାବନା ମଧ୍ୟ ମନେ ଆଣନି।

Verse 446

यतो नारोचयदयं विग्रहं तैर्महात्मभि: । पुत्रोंसहित धर्मज्ञ एवं यशस्वी महात्मा पाण्डव कितने बलशाली हैं, इस बातको भीष्मजी अच्छी तरह जानते हैं। इसीलिये उन्हें उन महात्माओंके साथ युद्ध छेड़नेकी बात पसंद नहीं आयी

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ସେହି ମହାତ୍ମାମାନଙ୍କ ସହ ବିଗ୍ରହ ଆରମ୍ଭ କରିବାକୁ ଭୀଷ୍ମ ରୁଚିଲେ ନାହିଁ; ଧର୍ମଜ୍ଞ ଓ ଯଶସ୍ବୀ ପାଣ୍ଡବ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହ କେତେ ବଳଶାଳୀ, ଏହା ସେ ଭଲଭାବେ ଜାଣନ୍ତି; ତେଣୁ ଏମିତି ମହାନ ପ୍ରତିପକ୍ଷଙ୍କ ବିରୋଧରେ ଯୁଦ୍ଧ ଖୋଲିବା ତାଙ୍କୁ ଭଲ ଲାଗିଲା ନାହିଁ।

Verse 5131

तथा ब्रुवन्तं धर्मात्मा प्राह राजा युधिष्ठिर: । तव धैर्य च वीर्य च पञठ्चाला: पाण्डवै: सह

ସେ ଏପରି କହୁଥିବାବେଳେ ଧର୍ମାତ୍ମା ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—“ତୁମ ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଓ ବୀର୍ଯ୍ୟ ଆମ ସହ ଅଛି; ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ପାଞ୍ଚାଳମାନେ ମଧ୍ୟ ଏକତ୍ର—ଧର୍ମପକ୍ଷର ଏହି ସଙ୍କଳ୍ପ ଓ ଏହି ସଂଯୁକ୍ତ ବଳ ଅଚଳ।”

Frequently Asked Questions

The ethical tension lies in evaluating whether proceeding toward large-scale confrontation is defensible when the opposing coalition is demonstrably formidable—testing the line between duty-bound resolve (kṣātradharma) and avoidable escalation (prudential rājadharma).

Strategic clarity does not eliminate ethical accountability: accurate intelligence, role assignment, and disciplined command are necessary for governance, yet pride-driven certainty and denial of risk distort judgment and magnify collective harm.

No explicit phalaśruti is stated here; the chapter’s meta-function is archival and diagnostic—cataloging forces and mindsets to help the listener interpret later outcomes as consequences of assessed capabilities and chosen attitudes.