Adhyaya 52
Udyoga ParvaAdhyaya 5218 Versesयुद्ध आरम्भ नहीं; कूटनीति/संधि-प्रयास के बीच धृतराष्ट्र की आशंका से पाण्डव-पक्ष की बढ़त का पूर्वाभास।

Adhyaya 52

Udyoga Parva, Adhyaya 52: Dhṛtarāṣṭra’s Appraisal of Pāṇḍava Strength and the Case for Restraint

Upa-parva: Sanjaya–Dhritarashtra Strategic Appraisal (Udyoga Parva context)

Dhṛtarāṣṭra addresses Saṃjaya with an assessment of the Pāṇḍavas as resolute and victory-oriented, paralleling their allies’ determination. He recalls Saṃjaya’s earlier enumeration of powerful supporting kingdoms and emphasizes that Kṛṣṇa’s alignment with the Pāṇḍavas is strategically decisive, implying a force capable of bringing even vast domains under control. The chapter notes Sātyaki’s rapid acquisition of Arjuna’s martial knowledge and highlights Dhṛṣṭadyumna as a formidable commander skilled in advanced weaponry. Dhṛtarāṣṭra then articulates fear arising from Yudhiṣṭhira’s principled anger, Arjuna’s valor, the twins’ capacity, and Bhīma’s power, envisioning an overwhelming, coordinated strike against his forces. He proceeds to praise the Pāṇḍava leader’s virtues—appearance, intellect, dharmic disposition, social support networks, self-control, generosity, and learning—using the metaphor of an unapproachable fire that the imprudent would rush into. Concluding, he argues that avoiding engagement is preferable because war risks the destruction of the entire lineage; peace is presented as his supreme mental pacification. Yet he acknowledges a constraint: Yudhiṣṭhira, repelled by adharma and identifying Dhṛtarāṣṭra as a causal agent, may not simply overlook their conduct even if they seek to be “taught” or corrected.

Chapter Arc: हस्तिनापुर के अंधे सम्राट धृतराष्ट्र संजय से कहते हैं कि जिन वीरों की शक्ति का बखान कभी स्वयं उन्होंने सुना/किया था, वही अब उनके पुत्रों के लिए प्रलय बनकर खड़ी है। → धृतराष्ट्र पाण्डव-पक्ष की शक्ति-श्रृंखला गिनाते हैं—पांचाल, केकय, मत्स्य, मगध, वत्स आदि—और फिर उससे भी ऊपर श्रीकृष्ण की सर्वसमर्थता का स्मरण करते हैं, मानो यह स्वीकार करते हुए कि यह युद्ध साधारण राजाओं का नहीं, जगत्-नियन्ता की इच्छा से जुड़ा है। → वे स्पष्ट भय व्यक्त करते हैं: युधिष्ठिर के क्रोध, अर्जुन के पराक्रम, और भीमसेन तथा दोनों जुड़वाँ भाइयों से उन्हें अपने कुल के विनाश का साक्षात् आभास होता है; पाण्डवों को ‘अग्नि’ कहकर बताते हैं कि उस अनावार्य ज्वाला पर कौन मूढ़ पतंगा बनकर गिरेगा। → धृतराष्ट्र युद्ध को ‘अशुभ’ और ‘कुल-नाशक’ मानते हुए कहते हैं कि कौरवों को पाण्डवों से युद्ध नहीं करना चाहिए; वे संकेत देते हैं कि युधिष्ठिर अधर्म से घृणा करता है और अपने कारण कौरवों को क्लेश में देखकर उपेक्षा नहीं करेगा—अर्थात् अभी भी संधि का द्वार खुला है, यदि दुर्योधन झुके। → संधि की संभावना धृतराष्ट्र के शब्दों में है, पर निर्णय दुर्योधन के हठ पर टिका है—क्या वह इस भय-भरे विवेक को मानेगा या विनाश की ओर बढ़ेगा?

Shlokas

Verse 1

अपन का छा 2 - कुछ दिद्वान्‌ “त्रयस्त्रिंशत्‌ समा55हूय” ऐसा पाठ मानकर आर्ष संधिकी कल्पना करके यह अर्थ करते हैं कि तैंतीस वर्षकी अवस्था बीत जानेपर अर्जुनने अग्निदेवको खाण्डववनमें बुलाकर तृप्त किया था। त्रिपञज्चाशत्तमो<्ध्याय: कौरवसभामें धृतराष्ट्रका युद्धसे भय दिखाकर शान्तिके लिये प्रस्ताव करना धृतराष्ट्र रवाच यथैव पाण्डवा: सर्वे पराक्रान्ता जिगीषव: । तथैवाभिसरास्तेषां त्यक्तात्मानो जये धृता:,धृतराष्ट्र बोले--संजय! जैसे समस्त पाण्डव पराक्रमी और विजयके अभिलाषी हैं, उसी प्रकार उनके सहायक भी विजयके लिये कटिबद्ध तथा उनके लिये अपने प्राण निछावर करनेको तैयार हैं

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ସଞ୍ଜୟ! ଯେପରି ସମସ୍ତ ପାଣ୍ଡବ ପରାକ୍ରମୀ ଓ ବିଜୟାଭିଲାଷୀ, ସେପରି ତାଙ୍କ ସହାୟକମାନେ ମଧ୍ୟ ବିଜୟ ପାଇଁ ଦୃଢ଼ସଙ୍କଳ୍ପ; ତାଙ୍କ ପାଇଁ ପ୍ରାଣ ଯାଏଁ ଦେବାକୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ।

Verse 2

त्वमेव हि पराक्रान्तानाचक्षी था: परान्‌ मम । पञज्चालान्‌ केकयान्‌ मत्स्यान्‌ मागधान्‌ वत्सभूमिपान्‌,तुमने ही मेरे निकट पराक्रमशाली पांचाल, केकय, मत्स्य, मागध तथा वत्सदेशीय उत्कृष्ट भूमिपालोंके नाम लिये हैं--(ये सभी पाण्डवोंकी विजय चाहते हैं)

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ତୁମେ ହିଁ ମୋ ପାଖରେ ସେହି ପରାକ୍ରମୀ ରାଜାମାନଙ୍କ ନାମ କହିଥିଲ—ପାଞ୍ଚାଳ, କେକୟ, ମତ୍ସ୍ୟ, ମାଗଧ ଓ ବତ୍ସଦେଶର ଭୂମିପାଳ; ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ବିଜୟ ଚାହାନ୍ତି।

Verse 3

यश्न सेन्द्रानिमॉल्लोकानिच्छन्‌ कुर्याद्‌ वशे बली । स स््रष्टा जगत: कृष्ण: पाण्डवानां जये धृत:

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ଯଶ ଚାହୁଁଥିବା ଏକ ବଳବାନ ପୁରୁଷ ଇନ୍ଦ୍ର ସହିତ ଏହି ସମସ୍ତ ଲୋକକୁ ମଧ୍ୟ ବଶ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରିପାରେ; କିନ୍ତୁ ଜଗତ୍‌ସ୍ରଷ୍ଟା କୃଷ୍ଣ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ବିଜୟ ପାଇଁ ଦୃଢ଼ ଅଟୁଟ।

Verse 4

इनके सिवा जो इच्छा करते ही इन्द्र आदि देवताओंसहित इन सम्पूर्ण लोकोंको अपने वशमें कर सकते हैं, वे जगत्स्ष्टा महाबली भगवान्‌ श्रीकृष्ण भी पाण्डवोंको विजय दिलानेका दृढ़ निश्चय कर चुके हैं ।। समस्तामर्जुनाद्‌ विद्यां सात्यकि: क्षिप्रमाप्तवान्‌ शैनेय: समरे स्थाता बीजवत्‌ प्रवपठ्छरान्‌,शिनिके पौत्र सात्यकिने थोड़े ही समयमें अर्जुनसे उनकी सारी अस्त्रविद्या सीख ली थी। इस युद्धमें वे भी बीजकी भाँति बाणोंको बोते हुए पाण्डवपक्षकी ओरसे खड़े होंगे

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ଏମାନଙ୍କୁ ଛାଡ଼ି ଆଉ କେତେକ ଅଛନ୍ତି, ଯେମାନେ କେବଳ ସଙ୍କଳ୍ପମାତ୍ରରେ ଇନ୍ଦ୍ରାଦି ଦେବତାମାନଙ୍କ ସହିତ ସମସ୍ତ ଲୋକକୁ ବଶ କରିପାରନ୍ତି; ସେହି ଜଗତ୍‌ସ୍ରଷ୍ଟା ମହାବଳୀ ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ମଧ୍ୟ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ବିଜୟ ଦେବାକୁ ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟ କରିଛନ୍ତି। ତଦୁପରି, ଶିନିଙ୍କ ପୌତ୍ର ଶୈନେୟ ସାତ୍ୟକି ଅଳ୍ପ ସମୟରେ ଅର୍ଜୁନଙ୍କଠାରୁ ସମସ୍ତ ଅସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟା ଅଧିଗତ କରିଛି; ଏହି ଯୁଦ୍ଧରେ ସେ ମଧ୍ୟ ବୀଜ ବୁଣିବା ପରି ଶରବର୍ଷା କରି ପାଣ୍ଡବପକ୍ଷରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହେବ।

Verse 5

धष्टद्युम्नश्व॒ पाज्चाल्य: क्रूरकर्मा महारथ: । मामकेषु रणं कर्ता बलेषु परमास्त्रवित्‌,उत्तम अस्त्रोंका ज्ञाता और क्रूरतापूर्ण पराक्रम प्रकट करनेवाला पांचालराजकुमार महारथी धृष्टद्युम्न भी मेरी सेनाओंमें घुसकर युद्ध करेगा

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ଏବଂ ପାଞ୍ଚାଳର ରାଜକୁମାର ମହାରଥୀ ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ, ଯିଏ କ୍ରୂର କର୍ମରେ ଅଗ୍ରଗାମୀ ଓ ପରମ ଅସ୍ତ୍ରଜ୍ଞ, ସେ ମୋ ସେନାମଧ୍ୟରେ ପ୍ରବେଶ କରି ମୋ ଲୋକମାନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବ।

Verse 6

युधिष्ठिरस्य च क्रोधादर्जुनस्य च विक्रमात्‌ । यमाभ्यां भीमसेनाच्च भयं मे तात जायते,तात संजय! मुझे युधिष्ठिरके क्रोधसे, अर्जुनके पराक्रमसे, दोनों भाई नकुल और सहदेवसे तथा भीमसेनसे बड़ा भय लगता है। संजय! इन नरेशोंके द्वारा मेरी सेनाके भीतर जब अलौकिक अस्त्रोंका जाल-सा बिछा दिया जायगा, तब मेरे सैनिक उसे पार नहीं कर सकेंगे; इसीलिये मैं बिलख रहा हूँ

ବତ୍ସ! ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ କ୍ରୋଧରୁ, ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ପରାକ୍ରମରୁ, ଯମଜ ଭ୍ରାତା (ନକୁଳ–ସହଦେବ) ଓ ଭୀମସେନଙ୍କୁ ନେଇ ମୋ ମନରେ ମହାଭୟ ଜାଗେ। ହେ ସଞ୍ଜୟ! ଏହି ନରେଶମାନେ ଯେତେବେଳେ ମୋ ସେନାମଧ୍ୟରେ ଦିବ୍ୟ ଅସ୍ତ୍ରମାନଙ୍କର ଜାଲ ପସାଇଦେବେ, ମୋ ସୈନିକମାନେ ତାହା ଅତିକ୍ରମ କରିପାରିବେ ନାହିଁ; ତେଣୁ ମୁଁ ବିଳାପ କରୁଛି।

Verse 7

अमानुषं मनुष्येन्द्रैजीलं विततमन्तरा । न मे सैन्यास्तरिष्यन्ति ततः क्रोशामि संजय,तात संजय! मुझे युधिष्ठिरके क्रोधसे, अर्जुनके पराक्रमसे, दोनों भाई नकुल और सहदेवसे तथा भीमसेनसे बड़ा भय लगता है। संजय! इन नरेशोंके द्वारा मेरी सेनाके भीतर जब अलौकिक अस्त्रोंका जाल-सा बिछा दिया जायगा, तब मेरे सैनिक उसे पार नहीं कर सकेंगे; इसीलिये मैं बिलख रहा हूँ

ହେ ସଞ୍ଜୟ! ମନୁଷ୍ୟେନ୍ଦ୍ର ଏହି ରାଜାମାନେ ମୋ ସେନାମଧ୍ୟରେ ଅମାନୁଷ ଅସ୍ତ୍ରଜାଲ ପସାଇଦେଲେ, ମୋ ସେନା ତାହା ଅତିକ୍ରମ କରିପାରିବ ନାହିଁ; ତେଣୁ ମୁଁ ଆର୍ତ୍ତନାଦ କରୁଛି।

Verse 8

दर्शनीयो मनस्वी च लक्ष्मीवान्‌ ब्रह्म॒वर्चसी । मेधावी सुकृतप्रज्ञो धर्मात्मा पाण्डुनन्दन:

ପାଣ୍ଡୁଙ୍କ ସେହି ପୁତ୍ର ଦେଖିବାକୁ ମନୋହର ଓ ଉଚ୍ଚମନା; ସେ ଲକ୍ଷ୍ମୀସମ୍ପନ୍ନ ଏବଂ ବ୍ରହ୍ମତେଜରେ ଦୀପ୍ତ। ସେ ମେଧାବୀ, ପୁଣ୍ୟଜନିତ ସୁବିଚାରବୁଦ୍ଧିସମ୍ପନ୍ନ ଓ ଧର୍ମାତ୍ମା।

Verse 9

मित्रामात्यै: सुसम्पन्न: सम्पन्नो युद्धयोजकै:ः । भ्रातृभि: श्वशुरैवीरैरुपपन्नो महारथै:

ସେ ମିତ୍ର ଓ ଅମାତ୍ୟମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସୁସମ୍ପନ୍ନ; ଯୁଦ୍ଧଯୋଜନାରେ ନିପୁଣ ଲୋକମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ମଧ୍ୟ ସମୃଦ୍ଧ। ଭ୍ରାତାମାନେ ଓ ବୀର ଶ୍ୱଶୁରମାନେ—ମହାରଥୀମାନେ—ତାଙ୍କୁ ସମର୍ଥନ କରୁଛନ୍ତି; ଏହିପରି ସେ ଶକ୍ତିଶାଳୀ ସହାୟରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ।

Verse 10

धृत्या च पुरुषव्याप्रो नैभृत्येन च पाण्डव: । अनृशंसो वदान्यश्व हीमान्‌ सत्यपराक्रम:

ସେହି ପାଣ୍ଡବ ଧୃତିରେ ପୁରୁଷସିଂହ ସମ; ନିଷ୍ଠାପୂର୍ଣ୍ଣ ସେବାଭାବରେ ଶିଷ୍ଟ। ସେ ଅନୃଶଂସ (କରୁଣାଶୀଳ) ଓ ଦାନଶୀଳ; ସେ ହ୍ରୀମାନ/ସଂୟମୀ, ଏବଂ ତାଙ୍କର ପରାକ୍ରମ ସତ୍ୟରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ।

Verse 11

बहुश्रुतः कृतात्मा च वृद्धसेवी जितेन्द्रिय: । त॑ सर्वगुणसम्पन्न॑ं समिद्धमिव पावकम्‌

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—“ସେ ବହୁଶ୍ରୁତ, ଆତ୍ମସଂଯମୀ, ବୃଦ୍ଧସେବୀ ଓ ଇନ୍ଦ୍ରିୟଜୟୀ—ସର୍ବଗୁଣସମ୍ପନ୍ନ, ସୁସମିଦ୍ଧ ଅଗ୍ନି ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ।”

Verse 12

तपन्तमभि को मन्द: पतिष्यति पतड्भवत्‌ । पाण्डवाग्निमनावार्य मुमूर्षुर्नष्टचेतन:

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—“ଜ୍ୱଳନ୍ତ ଅଗ୍ନି ପାଖକୁ ପତଙ୍ଗ ପରି କିଏ ଏତେ ମୂର୍ଖ ହୋଇ ପଡ଼ିବ? ତଥାପି ଯାହାର ଚେତନା ନଷ୍ଟ, ଯେ ମୃତ୍ୟୁକୁ ଆହ୍ୱାନ କରେ—ସେଇ ଅନାବାର୍ୟ ପାଣ୍ଡବ-ଅଗ୍ନିରେ ଝାପ ଦେବ।”

Verse 13

पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर दर्शनीय, मनस्वी, लक्ष्मीवान्‌, ब्रह्मर्षियोंके समान तेजस्वी, मेधावी, सुनिश्चित बुद्धिसे युक्त, धर्मात्मा, मित्रों तथा मन्त्रियोंसे सम्पन्न, युद्धके लिये उद्योगशील सैनिकोंसे संयुक्त, महारथी भाइयों और वीरशिरोमणि श्वशुरोंसे सुरक्षित, धैर्यवान्‌, मन्त्रणाको गुप्त रखनेवाले, पुरुषोंमें सिंहके समान पराक्रमी, दयालु, उदार, लज्जाशील, यथार्थ पराक्रमसे सम्पन्न, अनेक शास्त्रोंके ज्ञाता, मनको वशमें रखनेवाले, वृद्धसेवी तथा जितेन्द्रिय हैं। इस प्रकार सर्वगुणसम्पन्न और प्रज्वलित अग्निके समान ताप देनेवाले उन युधिष्ठिरके सम्मुख युद्ध करनेके लिये कौन मूर्ख जा सकेगा? कौन अचेत एवं मरणासन्न मनुष्य पतंगोंकी भाँति दुर्निवार पाण्डवरूपी अग्निमें जान-बूझकर गिरेगा? ।। ८ --१२ || तनुरुद्धः शिखी राजा मिथ्योपचरितो मया । मन्दानां मम पुत्राणां युद्धेनानतं करिष्यति,राजा युधिष्ठिर सूक्ष्म और एक स्थानमें अवरुद्ध अग्निके समान हैं। मैंने मिथ्या व्यवहारसे उनका तिरस्कार किया है, अतः: वे युद्ध करके मेरे मूर्ख पुत्रोंका अवश्य विनाश कर डालेंगे

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—“ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦର୍ଶନୀୟ, ମହାମନା, ଲକ୍ଷ୍ମୀବାନ। ସେ ବ୍ରହ୍ମର୍ଷିମାନଙ୍କ ପରି ତେଜସ୍ୱୀ; ମେଧାବୀ, ସୁନିଶ୍ଚିତ ବୁଦ୍ଧିଯୁକ୍ତ, ଧର୍ମାତ୍ମା। ମିତ୍ର ଓ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହାୟତାରେ ସେ ସମ୍ପନ୍ନ; ଯୁଦ୍ଧୋଦ୍ୟୋଗୀ ସେନାରେ ସେ ସଂଯୁକ୍ତ; ମହାରଥୀ ଭାଇମାନେ ଓ ବୀରଶିରୋମଣି ଶ୍ୱଶୁରମାନେ ତାଙ୍କୁ ସୁରକ୍ଷା କରୁଛନ୍ତି। ସେ ଧୈର୍ଯ୍ୟବାନ, ମନ୍ତ୍ରଣା ଗୁପ୍ତ ରଖିବାରେ ପାରଙ୍ଗତ, ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସିଂହସମ ପରାକ୍ରମୀ—ତଥାପି ଦୟାଳୁ, ଉଦାର, ଲଜ୍ଜାଶୀଳ; ତାଙ୍କର ପରାକ୍ରମ ସତ୍ୟ, ଢୋଙ୍ଗ ନୁହେଁ। ସେ ଅନେକ ଶାସ୍ତ୍ରଜ୍ଞ, ମନୋଜୟୀ, ବୃଦ୍ଧସେବୀ ଓ ଇନ୍ଦ୍ରିୟଜୟୀ। ଏପରି ସର୍ବଗୁଣସମ୍ପନ୍ନ, ପ୍ରଜ୍ୱଲିତ ଅଗ୍ନି ପରି ଦହନକାରୀ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ କିଏ ମୂର୍ଖ ଯିବ? କିଏ ଅଚେତ, ମରଣାସନ୍ନ ମନୁଷ୍ୟ ପତଙ୍ଗ ପରି ଜାଣିଶୁଣି ଦୁର୍ନିବାର ପାଣ୍ଡବ-ଅଗ୍ନିରେ ପଡ଼ିବ? ଯୁଧିଷ୍ଠିର ତ ସଂକୁଚିତ ସ୍ଥାନରେ ଅବରୁଦ୍ଧ ଅଗ୍ନି ପରି—ମୁକ୍ତ ହେଲେ ଅପରାଜେୟ ହୋଇଯାଏ। ମୁଁ ମିଥ୍ୟା ବ୍ୟବହାରରେ ତାଙ୍କୁ ଅନ୍ୟାୟ କରିଛି; ତେଣୁ ଯୁଦ୍ଧ ଦ୍ୱାରା ସେ ମୋ ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି ପୁଅମାନଙ୍କର ନିଶ୍ଚୟ ଅନ୍ତ କରିଦେବେ।”

Verse 14

तैरयुद्धं साधु मनन्‍्ये कुरवस्तन्निबोधत । युद्धे विनाश: कृत्स्नस्यथ कुलस्य भविता ध्रुवम्‌,कौरवो! मैं पाण्डवोंके साथ युद्ध न होना ही अच्छा मानता हूँ। तुमलोग इसे अच्छी तरह समझ लो। यदि युद्ध हुआ तो समस्त कुरुकुलका विनाश अवश्यम्भावी है। मेरी बुद्धिका यही सर्वोत्तम निश्चय है। इसीसे मेरे मनको शान्ति मिलती है। यदि तुम्हें भी युद्ध न होना ही अभीष्ट हो तो हम शान्तिके लिये प्रयत्न करें

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—“କୁରୁମାନେ ତାଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ ନ କରନ୍ତୁ—ଏହାକୁ ମୁଁ ଶ୍ରେୟ ମନେ କରେ; ତୁମେ ଏହା ଭଲଭାବେ ବୁଝ। ଯୁଦ୍ଧ ହେଲେ ସମଗ୍ର କୁଳର ବିନାଶ ନିଶ୍ଚିତ।”

Verse 15

एषा मे परमा बुद्धिर्यया शाम्यति मे मन: । यदि त्वयुद्धमिष्टं वो वयं शान्त्ये यतामहे,कौरवो! मैं पाण्डवोंके साथ युद्ध न होना ही अच्छा मानता हूँ। तुमलोग इसे अच्छी तरह समझ लो। यदि युद्ध हुआ तो समस्त कुरुकुलका विनाश अवश्यम्भावी है। मेरी बुद्धिका यही सर्वोत्तम निश्चय है। इसीसे मेरे मनको शान्ति मिलती है। यदि तुम्हें भी युद्ध न होना ही अभीष्ट हो तो हम शान्तिके लिये प्रयत्न करें

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—“ଏହା ମୋର ପରମ ବୁଦ୍ଧି; ଏହାଦ୍ୱାରା ମୋ ମନ ଶାନ୍ତ ହୁଏ। ଯଦି ତୁମମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଅଯୁଦ୍ଧ ଇଷ୍ଟ, ତେବେ ଆମେ ଶାନ୍ତି ପାଇଁ ପ୍ରୟାସ କରିବା।”

Verse 16

न तु नः क्लिश्यमानानामुपेक्षेत युधिष्ठिर: । जुगुप्सति हाधर्मेण मामेवोद्धिश्य कारणम्‌,युधिष्छिर हमें (युद्धकी चर्चासे) क्लेशमें पड़े देख हमारी उपेक्षा नहीं कर सकते। वे तो मुझे ही अधर्मपूर्वक कलह बढ़ानेमें कारण मानकर मेरी निन्दा करते हैं (फिर मेरे ही द्वारा शन्तिप्रस्ताव उपस्थित किये जानेपर वे क्यों नहीं सहमत होंगे?)

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ— ଆମେ କ୍ଲେଶରେ ପଡ଼ିଛୁ ବୋଲି ଦେଖି ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଆମକୁ ଅବହେଳା କରିବେ ନାହିଁ। ଅଧର୍ମରେ ଏହି କଳହ ବଢ଼ାଇବାର କାରଣ ମୋତେ ଏକାକୀ ଭାବି ସେ ମୋର ନିନ୍ଦା କରନ୍ତି। ତେଣୁ ମୋ ମାଧ୍ୟମରେ ଯଦି ଶାନ୍ତି ପ୍ରସ୍ତାବ ଆସେ, ସେ କାହିଁକି ମନୋନୀତ କରିବେ ନାହିଁ?

Verse 52

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें धृतराष्ट्रवाक्यविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଯାନ-ସନ୍ଧିପର୍ବରେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରବାକ୍ୟବିଷୟକ ବାଉନତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 53

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि धृतराष्ट्रवाक्ये त्रिपड्चाशत्तमो5ध्याय:

ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତେ ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବଣି ଯାନ-ସନ୍ଧିପର୍ବଣି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରବାକ୍ୟେ ତେପନତମ ଅଧ୍ୟାୟଃ।

Frequently Asked Questions

Whether a ruler should proceed toward confrontation despite recognizing disproportionate risk and collective ruin, or prioritize restraint and peace even when prior actions have generated legitimate grievance.

Strategic clarity and ethical accountability must be paired: accurate appraisal of power and consequence is necessary, but peace-making is unstable if it does not address the moral causes that the aggrieved party identifies as adharma.

No explicit phalaśruti appears in the provided verses; the chapter’s meta-level function is archival and instructional—demonstrating how fear, virtue-assessment, and consequence forecasting operate within royal deliberation.