
उद्योगपर्व — अध्याय ५ (कृष्णनीति: न्यायशम-उपदेशः; विराट-द्रुपदयोः सैन्यसमाह्वानम्)
Upa-parva: Udyoga Parva — Alliance Mobilization and Peace-Counsel Episode (Virāṭa–Drupada mustering; Kṛṣṇa’s counsel)
The chapter opens with Vāsudeva (Kṛṣṇa) affirming that a proposed statement is well-reasoned and goal-effective for the Pāṇḍava king, and that correct prior action (pūrvakārya) is essential for those seeking sound policy (sunīti). He stresses relational parity with both Kurus and Pāṇḍavas and frames the request as guidance to an elder, respected figure who is valued by Dhṛtarāṣṭra and connected to Droṇa and Kṛpa. Kṛṣṇa urges that a message beneficial to the Pāṇḍavas be sent immediately, arguing that if the Kuru leader adopts just peace (nyāyena śama), great destruction among kin can be avoided; if pride and delusion prevail, Duryodhana will meet ruin when facing the enraged Gāṇḍīva-bearer (Arjuna). The narration then shifts to Vaiśaṃpāyana: Virāṭa honors Kṛṣṇa and sends him home; after Kṛṣṇa departs for Dvārakā, Yudhiṣṭhira and Virāṭa complete military preparations. Virāṭa and Drupada dispatch summons to kings, who arrive energized and strong; hearing of the Pāṇḍava mustering, Dhṛtarāṣṭra’s son also gathers rulers. The earth is described as unsettled by the Kuru–Pāṇḍava cause as armies converge. Finally, Pāñcālya sends his aged, wise purohita as an envoy to the Kurus, aligned with Yudhiṣṭhira’s counsel.
Chapter Arc: वायुदेव के वचन से नीति का स्वर उठता है—“पहले उचित कार्य, अन्यथा पुरुष सुबालिश कहलाए”—और उसी क्षण श्रीकृष्ण के द्वारका-गमन तथा विराट-द्रुपद के संदेशों से राजाओं के जुटने का संकेत युद्ध-मेघों को घना कर देता है। → पक्ष-निर्णय की घड़ी आती है: अनेक नरेश कहते हैं कि कौरव और पाण्डव—दोनों से उनका समान सम्बन्ध है, अतः वे नीति और मर्यादा के अनुसार ही चलेंगे। पर संदेशों की गति, दूतों का आवागमन, और दूर-दूर से चतुरंगिणी सेनाओं का प्रस्थान—सब मिलकर अनिवार्य संघर्ष की ओर धकेलते हैं। → पाण्डवों के यहाँ ‘महद् बल’ के समागम का समाचार फैलते ही धृतराष्ट्र-पुत्र भी राजाओं को अपने पक्ष में खींचने लगते हैं; उधर युधिष्ठिर की सम्मति से पांचाल-नरेश द्रुपद अपने प्रज्ञा-वयोवृद्ध पुरोहित को कुरुओं के पास भेजते हैं—यह दूत-प्रेषण ही अध्याय का निर्णायक मोड़ बनता है, जहाँ नीति का वचन अब राजनय में बदल जाता है। → दोनों ओर से सेनाएँ क्रमशः एकत्र होने लगती हैं; पृथ्वी घोड़ों, रथों, हाथियों और पदातियों के भार से संकुल हो उठती है। नीति की भाषा अभी शेष है, पर तैयारी युद्ध की है—और दूत का प्रस्थान आगामी संवादों का द्वार खोल देता है। → वन-पर्वत सहित धरती को कंपित करती सेनाओं के बीच प्रश्न अधूरा रह जाता है—क्या नीति की पहली शर्त (पूर्व-कार्य) शान्ति होगी, या वही नीति युद्ध को धर्मोचित ठहराएगी?
Verse 1
अत--णक+ पञठ्चमो<ध्याय: भगवान् श्रीकृष्णका द्वारकागमन, विराट और द्रुपदके संदेशसे राजाओंका पाण्डवपक्षकी ओरसे युद्धके लिये आगमन वायुदेव उवाच उपपन्नमिदं वाक््यं सोमकानां धुरंधरे । अर्थसिद्धिकरं राज्ञ: पाण्डवस्यामितौजस:,(तत्पश्चात् भगवान) श्रीकृष्णने कहा--सभासदो! सोमकवंशके धुरंधर वीर महाराज द्रपदने जो बात कही है, वह उन्हींके योग्य है। इसीसे अमित तेजस्वी पाण्डुनन्दन राजा युधिष्ठिरके अभीष्ट कार्यकी सिद्धि हो सकती है इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि पुरोहितयाने पठचमो<ध्याय: ।। ५ || इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोट्रोगपर्वमें पुरोहितप्रस्थानविषयक पॉचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ५ ॥ दे | आह ॥ #* षष्ठो 5 ध्याय: ट्रुपदका पुरोहितको दौत्यकर्मके लिये अनुमति देना तथा पुरोहितका हस्तिनापुरको प्रस्थान दुपद उवाच भूतानां प्राणिन: श्रेष्ठा: प्राणिनां बुद्धिजीविन: । बुद्धिमत्सु नस: श्रेष्ठा नरेष्वपि द्विजातय:
ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ସୋମକମାନଙ୍କ ଧୁରନ୍ଧର ବୀରଙ୍କ ପାଇଁ ଏହି ବାକ୍ୟ ସମୁଚିତ ଓ ଯଥାଯୋଗ୍ୟ। ଏହା ଅମିତତେଜସ୍ବୀ ପାଣ୍ଡବ ରାଜାଙ୍କ ଅଭୀଷ୍ଟ କାର୍ଯ୍ୟସିଦ୍ଧି କରାଇବାରେ ସମର୍ଥ।
Verse 2
एतच्च पूर्व कार्य न: सुनीतमभिकाड्क्षताम् । अन्यथा हाचरन् कर्म पुरुष: स्यात् सुबालिश:,हमलोग सुनीतिकी इच्छा रखनेवाले हैं; अतः हमें सबसे पहले यही कार्य करना चाहिये। जो अवसरके विपरीत आचरण करता है, वह मनुष्य अत्यन्त मूर्ख माना जाता है
ଆମେ ଯେ ସୁନୀତି ଓ ସଦାଚାର ଆକାଙ୍କ୍ଷା କରୁ, ପ୍ରଥମେ ଏହି କାର୍ଯ୍ୟଟି କରିବା ଉଚିତ। ଯେ ଯଥୋଚିତ ଅବସରର ବିପରୀତ କର୍ମ କରେ, ସେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ମୂର୍ଖ ବୋଲି ଗଣ୍ୟ।
Verse 3
कि तु सम्बन्धकं तुल्यमस्माकं कुरुपाण्डुषु । यथेष्टं वर्तमानेषु पाण्डवेषु च तेषु च,परंतु हमलोगोंका कौरवों और पाण्डवोंसे एक-सा सम्बन्ध है। पाण्डव और कौरव दोनों ही हमारे साथ यथायोग्य अनुकूल बर्ताव करते हैं
କିନ୍ତୁ କୁରୁ ଓ ପାଣ୍ଡବ—ଦୁହିଁପକ୍ଷ ସହିତ ଆମର ସମ୍ପର୍କ ସମାନ। ପାଣ୍ଡବ ହେଉନ୍ତୁ କି ସେ କୌରବ, ଦୁହେଁ ଆମ ପ୍ରତି ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ଓ ଅନୁକୂଳ ବ୍ୟବହାର କରନ୍ତି।
Verse 4
इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोट्योगपर्वमें दुपदवाक्यविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ,ते विवाहार्थमानीता वयं सर्वे तथा भवान् | कृते विवाहे मुदिता गमिष्यामो गृहान् प्रति इस समय हम और आप सब लोग विवाहोत्सवमें निमन्त्रित होकर आये हैं। विवाहकार्य सम्पन्न हो गया; अतः अब हम प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने घरोंको लौट जायूँगे
ଦ୍ରୁପଦ କହିଲେ—ଆମେ ସମସ୍ତେ, ଆପଣ ମଧ୍ୟ, ବିବାହ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ନିମନ୍ତ୍ରିତ ହୋଇ ଏଠାକୁ ଆସିଛୁ। ବିବାହକାର୍ଯ୍ୟ ସମ୍ପନ୍ନ ହୋଇଛି; ତେଣୁ ଏବେ ଆମେ ଆନନ୍ଦରେ ନିଜ-ନିଜ ଘରକୁ ପ୍ରତ୍ୟାବର୍ତ୍ତନ କରିବୁ।
Verse 5
भवान् वृद्धतमो राज्ञां वयसा च श्रुतेन च । शिष्यवत् ते वयं सर्वे भवामेह न संशय:,आप समस्त राजाओंमें अवस्था तथा शास्त्रज्ञान दोनों ही दृष्टियोंसे सबकी अपेक्षा बड़े हैं। इसमें संदेह नहीं कि हम सब लोग आपके शिष्यके समान हैं
ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ରାଜାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଆପଣ ବୟସରେ ଓ ଶ୍ରୁତଜ୍ଞାନରେ—ଦୁହିଁଦିଗରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଅର୍ଥାତ୍ ସର୍ବାଧିକ ବୃଦ୍ଧ ଓ ଶାସ୍ତ୍ରଜ୍ଞ। ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ; ଏଠାରେ ଆମେ ସମସ୍ତେ ଆପଣଙ୍କ ଶିଷ୍ୟସଦୃଶ।
Verse 6
भवन्तं धृतराष्ट्रश्न सततं बहु मन्यते । आचार्ययो: सखा चासि द्रोणस्य च कृपस्यथ च,राजा धृतराष्ट्र भी सदा आपको विशेष आदर देते हैं, आचार्य द्रोण और कृप दोनोंके आप सखा हैं
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ସଦା ଆପଣଙ୍କୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ସମ୍ମାନ କରନ୍ତି। ଆପଣ ଆଚାର୍ଯ୍ୟ ଦ୍ରୋଣ ଓ କୃପ—ଉଭୟଙ୍କର ସଖା।
Verse 7
स भवान् प्रेषयत्वद्य पाण्डवार्थकरं वच: । सर्वेषां निश्चितं तन्नः प्रेषयिष्यति यद् भवान्,अतः आप ही आज पाण्डवोंकी कार्य-सिद्धिके अनुकूल संदेश भेजिये। आप जो भी संदेश भेजेंगे, वह हम सब लोगोंका निश्चित मत होगा
ଏହେତୁ ହେ ପୂଜ୍ୟ, ଆଜି ଆପଣ ନିଜେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ କାର୍ଯ୍ୟସିଦ୍ଧିକୁ ଅନୁକୂଳ ଏକ ବାର୍ତ୍ତା ପଠାନ୍ତୁ। ଆପଣ ଯେ ବାର୍ତ୍ତା ପଠାଇବେ, ସେହିଟି ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କର ନିଶ୍ଚିତ ଓ ସର୍ବସମ୍ମତ ମତ ହେବ।
Verse 8
यदि तावच्छमं कुर्यानन््यायेन कुरुपुड्रव: । न भवेत् कुरुपाण्डूनां सौभ्रात्रेण महान् क्षय:,यदि कुरुश्रेष्ठ दुर्योधन न्यायके अनुसार शान्ति स्वीकार करेगा, तो कौरव और पाण्डवोंमें परस्पर बन्धुजनोचित सौहार्दवश महान् संहार न होगा
ଯଦି କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଏବେ ମଧ୍ୟ ନ୍ୟାୟାନୁସାରେ ଶାନ୍ତି କରେ, ତେବେ କୌରବ ଓ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଭ୍ରାତୃଭାବରୁ ହେବାକୁ ଥିବା ମହାକ୍ଷୟ ହେବ ନାହିଁ।
Verse 9
अथ दर्पान्वितो मोहान्न कुर्याद् धृतराष्ट्रज: । अन््येषां प्रेषयित्वा च पश्चादस्मान् समाह्ये,यदि धृतराष्ट्र-पुत्र दुर्योधन मोहवश घमंडमें आकर हमारा प्रस्ताव न स्वीकार करे, तो आप दूसरे राजाओंको युद्धका निमन्त्रण भेजकर सबके बाद हमलोगोंको आमन्त्रित कीजियेगा
ଆଉ ଯଦି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଜ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ମୋହ ଓ ଦର୍ପରେ ଆବୃତ ହୋଇ ଆମ ପ୍ରସ୍ତାବ ଗ୍ରହଣ ନ କରେ, ତେବେ ପ୍ରଥମେ ଅନ୍ୟ ରାଜାମାନଙ୍କୁ ଯୁଦ୍ଧ-ନିମନ୍ତ୍ରଣ ପଠାଇ, ପରେ ଆମକୁ ମଧ୍ୟ ଆହ୍ୱାନ କର।
Verse 10
ततो दुर्योधनो मन्द: सहामात्य: सबान्धव: । निष्ठामापत्स्यते मूढ: क्रुद्धे गाण्डीवधन्चनि,फिर तो गाण्डीवधन्चा अर्जुनके कुपित होनेपर मन्दबुद्धि मूढ दुर्योधन अपने मन्त्रियों और बन्धुजनोंके साथ सर्वथा नष्ट हो जायगा
ତାପରେ ଗାଣ୍ଡୀବଧନ୍ୱା ଅର୍ଜୁନ କ୍ରୁଦ୍ଧ ହେଲେ, ସେଇ ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି ମୂଢ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ନିଜ ଅମାତ୍ୟ ଓ ବାନ୍ଧବମାନଙ୍କ ସହିତ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ବିନାଶକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେବ।
Verse 11
वैशम्पायन उवाच ततः सत्कृत्य वार्ष्णेयं विराट: पृथिवीपति: । गृहान् प्रस्थापयामास सगणं सहबान्धवम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर राजा विराटने सेवकवृन्द तथा बान्धवोंसहित वृष्णिकुलनन्दन भगवान् श्रीकृष्णका सत्कार करके उन्हें द्वारका जानेके लिये विदा किया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତତ୍ପରେ ପୃଥିବୀପତି ରାଜା ବିରାଟ ବାର୍ଷ୍ଣେୟ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ)ଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ସତ୍କାର କରି, ତାଙ୍କୁ ଗଣ ଓ ବାନ୍ଧବମାନଙ୍କ ସହିତ ନିଜ ଗୃହ (ଦ୍ୱାରକା)କୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରାଇଲେ।
Verse 12
द्वारकां तु गते कृष्णे युधिष्ठिरपुरोगमा: । चक्रु: सांग्रामिकं सर्व विराटश्न महीपति:,श्रीकृष्णके द्वारका चले जानेपर युधिष्ठिर आदि पाण्डव तथा राजा विराट युद्धकी सारी तैयारियाँ करने लगे
କୃଷ୍ଣ ଦ୍ୱାରକାକୁ ଗଲାପରେ, ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଅଗ୍ରେ ରଖି ପାଣ୍ଡବମାନେ ଓ ଭୂପତି ବିରାଟ ଯୁଦ୍ଧର ସମସ୍ତ ପ୍ରସ୍ତୁତି କଲେ।
Verse 13
ततः सम्प्रेषयामास विराट: सह बान्धवै: । सर्वेषां भूमिपालानां द्रुपदश्च॒ महीपति:
ତତ୍ପରେ ବିରାଟ ରାଜା ବାନ୍ଧବମାନଙ୍କ ସହିତ ଏବଂ ଭୂପତି ଦ୍ରୁପଦ ମଧ୍ୟ—ସମସ୍ତ ଭୂମିପାଳମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ସନ୍ଦେଶ ପଠାଇଲେ।
Verse 14
बन्धुओंसहित राजा विराट तथा महाराज ट्रपदने मिल-कर सब राजाओंके पास युद्धका निमन्त्रण भेजा ।। वचनात् कुरुसिंहानां मत्स्यपाञज्चालयोश्न ते । समाजम्मुर्महीपाला: सम्प्रहृषषश महाबला:,कुरुकुलके सिंह पाण्डव, मत्स्यनरेश विराट तथा पांचालराज ट्रुपदके संदेशसे (दूर- दूरके) महाबली नरेश बड़े हर्ष और उत्साहमें भरकर वहाँ आने लगे
କୁରୁସିଂହ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଓ ମତ୍ସ୍ୟରାଜ ବିରାଟ ଏବଂ ପାଞ୍ଚାଳରାଜ ଦ୍ରୁପଦଙ୍କ ଆହ୍ୱାନରେ, ଦୂରଦେଶର ମହାବଳୀ ନରେଶମାନେ ହର୍ଷ ଓ ଉତ୍ସାହରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇ ସେଠାକୁ ସମବେତ ହେବାକୁ ଲାଗିଲେ।
Verse 15
तच्छुत्वा पाण्डुपुत्राणां समागच्छन्महद् बलम् । धृतराष्ट्रसुता श्वापि समानिन्युर्महीपतीन्,पाण्डवोंके यहाँ विशाल सेना एकत्र हो रही है; यह सुनकर धृतराष्ट्रके पुत्रोंने भी भूमिपालोंको बुलाना आरम्भ कर दिया
ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ପକ୍ଷରେ ବିଶାଳ ସେନା ସମବେତ ହେଉଛି—ଏହା ଶୁଣି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ ମଧ୍ୟ ଭୂମିପାଳମାନଙ୍କୁ ଡାକିବା ଆରମ୍ଭ କଲେ।
Verse 16
समाकुला मही राजन् कुरुपाण्डवकारणात् | तदा समभवत् कृत्स्ना सम्प्रयाणे महीक्षिताम्
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ, କୁରୁ ଓ ପାଣ୍ଡବଙ୍କ ବିରୋଧ ହେତୁ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀ ଅଶାନ୍ତ ହୋଇଉଠିଲା। ସେତେବେଳେ ରାଜମାନେ କୁଚ କରିବାକୁ ଯାତ୍ରା କଲେ, ସମସ୍ତ ଜଗତ ଯେନ ଏକ ଅସ୍ଥିର ଗତିରେ ଏକତ୍ର ଭାବେ ଚାଲିଯାଉଛି ବୋଲି ଲାଗିଲା।
Verse 17
बलानि तेषां वीराणामागच्छन्ति ततस्तत:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ସେହି ବୀରମାନଙ୍କର ସେନାବଳ ନାନା ସ୍ଥାନରୁ, କ୍ରମେ କ୍ରମେ ଆସି ପହଞ୍ଚୁଥିଲା।
Verse 18
ततः प्रज्ञावयोवृद्धं पाउ्चाल्य: स्वपुरोहितम् | कुरुभ्य: प्रेषयामास युधिषछिरमते स्थित:,तदनन्तर पांचालनरेशने युधिष्ठिरकी सम्मतिके अनुसार बुद्धि और अवस्थामें भी बढ़े- चढ़े अपने पुरोहितको कौरवोंके पास भेजा
ତାପରେ ପାଞ୍ଚାଳରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ମତାନୁସାରେ, ପ୍ରଜ୍ଞା ଓ ବୟସରେ ବୃଦ୍ଧ ନିଜ ପୁରୋହିତଙ୍କୁ କୁରୁମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ପଠାଇଲେ।
Verse 166
संकुला च तदा भूमिश्नषतुरड्गरबलान्विता । राजन! इस प्रकार कौरवों तथा पाण्डवोंके उद्देश्यसे दूर-दूरके नरेश अपनी सेना लेकर प्रस्थान करने लगे। इनकी चतुरंगिणी सेनासे सारी पृथ्वी व्याप्त हुई-सी जान पड़ने लगी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତେବେ ଚତୁରଙ୍ଗ ସେନାରେ ପୃଥିବୀ ଭିଡ଼ଭାଡ଼ ହୋଇଗଲା। ହେ ରାଜନ, କୌରବ ଓ ପାଣ୍ଡବଙ୍କ ନିମିତ୍ତରେ ଦୂରଦେଶର ନରେଶମାନେ ନିଜ ନିଜ ସେନା ସହ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ। ସେହି ଚତୁରଙ୍ଗ ସେନାରେ ଯେନ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀ ଆବୃତ ହୋଇଗଲା।
Verse 176
चालयन्तीव गां देवीं सपर्वतवनामिमाम् । चारों ओरसे उन वीरोंके जो सैनिक आ रहे थे, वे पर्वतों और वनोंसहित इस सारी पृथ्वीको प्रकम्पित-सी कर रहे थे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସମସ୍ତ ଦିଗରୁ ଆଗେଇ ଆସୁଥିବା ସେହି ବୀରମାନଙ୍କ ସେନା, ପର୍ବତ ଓ ବନ ସହିତ ଏହି ଦେବୀସମ ପୃଥିବୀକୁ ଯେନ କମ୍ପିତ କରୁଥିଲା।
Whether the Kuru leadership will adopt a just peace initiative (nyāyena śama) to prevent kin-destruction, or allow pride and delusion (darpa, moha) to override counsel, thereby legitimizing escalation.
Sound action requires proper sequence and principled method: policy must begin with justice and restraint, because ignoring due process and counsel converts power into self-defeating conduct and amplifies collective harm.
No explicit phalaśruti appears in this unit; the chapter’s meta-level function is causal and instructional—showing how ethical counsel and diplomatic procedure condition later outcomes within the epic’s governance framework.