
द्रुपदवाक्यं (Drupada’s Counsel on Conciliation and Alliance Mobilization)
Upa-parva: Dūta-prasthāna (Envoy-Dispatch and Alliance Mobilization Episode)
Chapter 4 presents Drupada’s assessment of the political situation: he predicts that Duryodhana will not relinquish sovereignty through gentle speech and that Dhṛtarāṣṭra, due to attachment to his son, will follow Duryodhana’s line; senior figures (Bhīṣma, Droṇa) and key allies are described as constrained by pity, confusion, or prior commitments. Drupada critiques the suitability of Baladeva’s approach (implied preference for mild counsel) and argues that conciliatory language toward a perceived unethical actor can be strategically counterproductive, as it may be interpreted as incapacity. The chapter then shifts from diagnosis to administration: Drupada urges immediate effort, rapid dispatch of envoys, and early solicitation of allied rulers, listing numerous kings and regions to be contacted. It concludes with instructions to send a Brahmin envoy (purohita) to Dhṛtarāṣṭra with calibrated messages for Duryodhana, Bhīṣma (Śāṃtanava), Dhṛtarāṣṭra, and Droṇa—indicating differentiated diplomatic address based on role and authority.
Chapter Arc: सात्यकि के क्रोधपूर्ण वचनों के बाद सभा में मौन टूटता है—राजा द्रुपद गंभीर स्वर में स्वीकार करते हैं कि दुर्योधन मधुर वाणी से राज्य नहीं देगा। → द्रुपद स्पष्ट करते हैं कि धृतराष्ट्र पुत्र-प्रेम से दुर्योधन का ही अनुगमन करेगा; भीष्म-द्रोण करुणा/मोह से, और कर्ण-शकुनि अपनी प्रकृति व पक्षपात से उसी ओर झुकेंगे। इसलिए केवल उपदेश नहीं, ठोस तैयारी आवश्यक है—मित्र-राजाओं को शीघ्र बुलाने और सेनाएँ उद्योजित करने का प्रस्ताव रखा जाता है। → द्रुपद का निर्णायक आदेश: ‘एतच्चैव करिष्यामो’—दूत भेजे जाएँ, राजाओं की सूची उच्चारित हो, और यह भी निश्चित हो कि दुर्योधन, शान्तनव भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोण आदि से किस प्रकार और किन शब्दों में बात की जाए। → रणनीति का ढाँचा बनता है—कूटनीति के साथ-साथ शक्ति-संग्रह; मित्र-नरेशों (पञ्चनद, पर्वतीय, समुद्रसेन आदि) को बुलाने की योजना और संदेश-भाषा की रूपरेखा तय होती है। → दूत-प्रेषण और राजाओं के आगमन के बाद अगला प्रश्न लटकता है—क्या यह शक्ति-संग्रह शान्ति-वार्ता को बल देगा, या युद्ध को अवश्यंभावी बना देगा?
Verse 1
अपन बक। ] अतिफशशा+< चतुथों5 ध्याय: राजा ट्रुपदकी सम्मति दुपद उवाच एवमेतन्महाबाहो भविष्यति न संशय: । न हि दुर्योधनो राज्यं मधुरेण प्रदास्यति,(सात्यकिकी बात सुनकर) द्रपदने कहा--महाबाहो! तुम्हारा कहना ठीक है। इसमें संदेह नहीं कि ऐसा ही होगा; क्योंकि दुर्योधन मधुर व्यवहारसे राज्य नहीं देगा। अपने उस पुत्रके प्रति आसक्त रहनेवाले धृतराष्ट्र भी उसीका अनुसरण करेंगे। भीष्म और द्रोणाचार्य दीनतावश तथा कर्ण और शकुनि मूर्खतावश दुर्योधनका साथ देंगे
ଦ୍ରୁପଦ କହିଲେ— ମହାବାହୋ! ତୁମ କଥା ସତ୍ୟ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ—ଏମିତି ହେବ। ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ମଧୁର କଥା କିମ୍ବା ବିନୟରେ ରାଜ୍ୟ ଦେବ ନାହିଁ।
Verse 2
अनुवर्त्स्यति तं चापि धृतराष्ट्र: सुतप्रिय: । भीष्मद्रोणौ च कार्पण्यान्मौख्याद् राधेयसौबलौ,(सात्यकिकी बात सुनकर) द्रपदने कहा--महाबाहो! तुम्हारा कहना ठीक है। इसमें संदेह नहीं कि ऐसा ही होगा; क्योंकि दुर्योधन मधुर व्यवहारसे राज्य नहीं देगा। अपने उस पुत्रके प्रति आसक्त रहनेवाले धृतराष्ट्र भी उसीका अनुसरण करेंगे। भीष्म और द्रोणाचार्य दीनतावश तथा कर्ण और शकुनि मूर्खतावश दुर्योधनका साथ देंगे
ଦ୍ରୁପଦ କହିଲେ—ପୁତ୍ରସ୍ନେହରେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ମଧ୍ୟ ତାହାକୁ ଅନୁସରଣ କରିବେ। ଭୀଷ୍ମ ଓ ଦ୍ରୋଣ କାର୍ପଣ୍ୟ-ଦୁର୍ବଳତାରୁ, ଏବଂ କର୍ଣ୍ଣ ଓ ଶକୁନି ମୂର୍ଖତାରୁ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ପକ୍ଷ ନେବେ।
Verse 3
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत येनोट्योगपर्वनें सात्यकिका क्रोधपूर्ण वचनसम्बन्धी तीसरा अध्याय पूरा हुआ,बलदेवस्य वाक््यं तु मम ज्ञाने न युज्यते । एतद्धि पुरुषेणाग्रे कार्य सुनयमिच्छता बलदेवजीका कथन मेरी समझमें ठीक नहीं जान पड़ता। मैं जो कुछ कहने जा रा हूँ, वही सुनीतिकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको सबसे पहले करना चाहिये। धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनसे मधुर अथवा नग्रतापूर्ण वचन कहना किसी प्रकार उचित नहीं है। मेरा ऐसा मत है कि वह पापपूर्ण विचार रखनेवाला है, अतः मृदु व्यवहारसे वशमें आनेवाला नहीं है
କିନ୍ତୁ ବଳଦେବଙ୍କ ପରାମର୍ଶ ମୋ ମତରେ ଯଥୋଚିତ ନୁହେଁ। ଯେ ପୁରୁଷ ସୁନୀତି ଚାହେ, ସେ ପ୍ରଥମେ ମୁଁ ଯାହା କହିବି ତାହା କରିବା ଉଚିତ। ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ମଧୁର କିମ୍ବା ସମାଧାନକାରୀ କଥା କହିବା କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ଯୁକ୍ତିସଙ୍ଗତ ନୁହେଁ। ମୋ ମତ—ତାଙ୍କ ବୁଦ୍ଧି ପାପରେ ଲଗ୍ନ; ମୃଦୁତାରେ ସେ ବଶ ହୁଏ ନାହିଁ।
Verse 4
न तु वाच्यो मृदुवचो धार्तराष्ट्र: कथंचन । न हि मार्दवसाध्योडसौ पापबुद्धिर्मतो मम,बलदेवजीका कथन मेरी समझमें ठीक नहीं जान पड़ता। मैं जो कुछ कहने जा रा हूँ, वही सुनीतिकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको सबसे पहले करना चाहिये। धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनसे मधुर अथवा नग्रतापूर्ण वचन कहना किसी प्रकार उचित नहीं है। मेरा ऐसा मत है कि वह पापपूर्ण विचार रखनेवाला है, अतः मृदु व्यवहारसे वशमें आनेवाला नहीं है दुर्योधनसे क्या कहना है? शान्तनुनन्दन भीष्मजीसे किस प्रकार बातचीत करनी है? धृतराष्ट्रको क्या संदेश देना है? तथा रथियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यसे किस प्रकार वार्तालाप करना है? यह सब उन्हें समझा दीजिये ।। इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि द्रुपदवाक्ये चतुर्थो&ध्याय:
ଦ୍ରୁପଦ କହିଲେ—ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରଙ୍କୁ କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ମୃଦୁବଚନ କହିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ। ମୋ ମତରେ ତାଙ୍କ ବୁଦ୍ଧି ପାପରେ ଲଗ୍ନ; ମାର୍ଦ୍ଦବରେ ସେ ସାଧ୍ୟ ନୁହେଁ।
Verse 5
गर्दभे मार्दवं कुर्याद् गोषु तीक्ष्णं समाचरेत् । मृदु दुर्योधने वाक्य यो ब्रूयात् पापचेतसि,जो पापात्मा दुर्योधनके प्रति मृदु वचन बोलेगा, वह मानो गदहेके प्रति कोमलतापूर्ण व्यवहार करेगा और गायोंके प्रति कठोर बर्ताव
ଦ୍ରୁପଦ କହିଲେ—ପାପଚେତନା ଥିବା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ଯେ ମୃଦୁ କଥା କହେ, ସେ ଗର୍ଦ୍ଦଭ ପ୍ରତି ମାର୍ଦ୍ଦବ କରି ଗୋମାତାଙ୍କ ପ୍ରତି ତୀକ୍ଷ୍ଣତା ଆଚରଣ କରୁଥିବା ପରି।
Verse 6
मृदु वै मन्यते पापो भाषमाणमशक्तिकम् । जितमर्थ विजानीयादबुधो मार्दवे सति,पापी एवं मूर्ख मनुष्य मृदु वचन बोलनेवालेको शक्तिहीन समझता है और कोमलताका बर्ताव करनेपर यह मानने लगता है कि मैंने इसके धनपर विजय पा ली
ଦ୍ରୁପଦ କହିଲେ—ପାପୀ ଲୋକ ମୃଦୁଭାଷୀକୁ ଅଶକ୍ତ ଭାବେ ମନେ କରେ। ମାର୍ଦ୍ଦବ ଦେଖିଲେ ସେ ମୂର୍ଖ ‘ମୁଁ ତାଙ୍କ ଅର୍ଥ (ହିତ/ଧନ) ଜିତିଲି’ ବୋଲି ଭାବେ।
Verse 7
एतच्चैव करिष्यामो यत्नश्ष क्रियतामिह । प्रस्थापयाम मित्रेभ्यो बलान्युद्योजयन्तु न:,(हम आपके सामने जो प्रस्ताव ला रहे हैं;) इसीको सम्पन्न करेंगे और इसीके लिये यहाँ प्रयत्न किया जाना चाहिये। हमें अपने मित्रोंके पास यह संदेश भेजना चाहिये कि वे हमारे लिये सैन्य-संग्रहका उद्योग करें
ଦ୍ରୁପଦ କହିଲେ—“ଏହି ଯୋଜନାକୁ ନିଶ୍ଚୟ ଆମେ କାର୍ଯ୍ୟରୂପ କରିବୁ; ଏଠାରେ ଏବେଇ ଦୃଢ଼ ପ୍ରୟାସ ହେଉ। ଆମ ମିତ୍ରମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ସନ୍ଦେଶ ପଠାଯାଉ, ଯେପରି ସେମାନେ ଆମ ପକ୍ଷରେ ସେନା ସମାହାର ଓ ପ୍ରସ୍ତୁତି ଆରମ୍ଭ କରନ୍ତୁ।”
Verse 8
शल्यस्य धृष्टकेतो श्व जयत्सेनस्य वा विभो | केकयानां च सर्वेषां दूता गच्छन्तु शीघ्रगा:,भगवन्! हमारे शीघ्रगामी दूत शल्य, धृष्टकेतु, जयत्सेन और समस्त केकय राजकुमारोंके पास जायाँ
ଦ୍ରୁପଦ କହିଲେ—“ହେ ବଳବାନ! ଆମ ଶୀଘ୍ରଗାମୀ ଦୂତମାନେ ତୁରନ୍ତ ଶଲ୍ୟ, ଧୃଷ୍ଟକେତୁ, ଜୟତ୍ସେନ ଏବଂ ସମସ୍ତ କେକୟ ରାଜକୁମାରମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଆନ୍ତୁ।”
Verse 9
स च दुर्योधनो नून॑ प्रेषयिष्यति सर्वश: । पूर्वाभिपन्ना: सन्तश्न भजन्ते पूर्वचोदनम्,निश्चय ही दुर्योधन भी सबके यहाँ संदेश भेजेगा। श्रेष्ठ राजा जब किसीके द्वारा पहले सहायताके लिये निमन्त्रित हो जाते हैं, तब प्रथम निमन्त्रण देनेवालेकी ही सहायता करते हैं
ଏବଂ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ମଧ୍ୟ ନିଶ୍ଚୟ ସବୁଠାରେ ସନ୍ଦେଶ ପଠାଇବ। କାରଣ ମର୍ଯ୍ୟାଦାଶୀଳ ରାଜାମାନେ, ଯଦି କେହି ପ୍ରଥମେ ସାହାଯ୍ୟ ପାଇଁ ଆହ୍ୱାନ କରିଥାଏ, ତେବେ ସେମାନେ ପୂର୍ବ ଆହ୍ୱାନକୁ ନିଶ୍ଚୟ ମାନି ପ୍ରଥମ ଆହ୍ୱାନକାରୀଙ୍କୁ ହିଁ ସହାୟତା କରନ୍ତି।
Verse 10
तत् त्वरध्वं नरेन्द्राणां पूर्वमेव प्रचोदने । महद्धि कार्य वोढव्यमिति मे वर्तते मति:,अतः सभी राजाओंके पास पहले ही अपना निमन्त्रण पहुँच जाय; इसके लिये शीघ्रता करो। मैं समझता हूँ, हम सब लोगोंको महान् कार्यका भार वहन करना है
ଦ୍ରୁପଦ କହିଲେ—“ଏହେତୁ ତ୍ୱରା କର; ରାଜାମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ଆମ ନିମନ୍ତ୍ରଣ ପୂର୍ବରୁ ହିଁ ପହଞ୍ଚୁ, ପୁଣି ଉତ୍ସାହିତ କରିବାକୁ ପଡ଼ିବା ପୂର୍ବରୁ। ମୋ ମତରେ ଆମ ସମ୍ମୁଖରେ ଏକ ମହାକାର୍ଯ୍ୟ ଅଛି; ତାହାର ଭାର ବହନ କରିବାକୁ ଆମେ ପ୍ରସ୍ତୁତ ରହିବା ଉଚିତ।”
Verse 11
शल्यस्य प्रेष्यतां शीघ्र ये च तस्यानुगा नृपा: । भगदत्ताय राज्ञे च पूर्वसागरवासिने,राजा शल्य तथा उनके अनुगामी नरेशोंके पास शीघ्र दूत भेजे जायाँ। पूर्व समुद्रके तटवर्ती राजा भगदत्तके पास भी दूत भेजना चाहिये
ଦ୍ରୁପଦ କହିଲେ—“ଶଲ୍ୟ ରାଜାଙ୍କ ପାଖକୁ ଏବଂ ତାଙ୍କ ଅନୁଗାମୀ ନୃପମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ଶୀଘ୍ର ଦୂତ ପଠାଅ। ତଥା ପୂର୍ବ ସମୁଦ୍ରତଟରେ ବସୁଥିବା ଭଗଦତ୍ତ ରାଜାଙ୍କ ପାଖକୁ ମଧ୍ୟ ଦୂତ ପଠାଅ।”
Verse 12
अमितौजसे तथोग्राय हार्दिक्यायान्धकाय च । दीर्घप्रज्ञाय शूराय रोचमानाय वा विभो,भगवन्! इसी प्रकार अमितौजा, उग्र, हार्दिक्य (कृतवर्मा), अन्धक, दीर्घप्रज्ञ तथा शूरवीर रोचमानके पास भी दूतोंको भेजना आवश्यक है
ହେ ବିଭୋ! ସେହିପରି ଅମିତୌଜ, ଉଗ୍ର, ହାର୍ଦିକ୍ୟ (କୃତବର୍ମା), ଅନ୍ଧକ, ଦୀର୍ଘପ୍ରଜ୍ଞ ଏବଂ ଶୂରବୀର ରୋଚମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ମଧ୍ୟ ଦୂତ ପଠାଇବା ଆବଶ୍ୟକ।
Verse 13
आनीयतां बृहन्तश्न सेनाबिन्दुश्न पार्थिव: । सेनजित् प्रतिविन्ध्यश्व चित्रवर्मा सुवास्तुक:
ରାଜା ବୃହନ୍ତ ଓ ରାଜା ସେନାବିନ୍ଦୁଙ୍କୁ ଏଠାକୁ ଆଣାଯାଉ; ସହିତ ସେନଜିତ୍, ପ୍ରତିବିନ୍ଧ୍ୟଶ୍ୱ, ଚିତ୍ରବର୍ମା ଓ ସୁବାସ୍ତୁକଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଡାକାଯାଉ।
Verse 14
बाह्लीको मुज्जकेशश्व चैद्याधिपतिरेव च । सुपार्श्रश्च सुबाहुश्च पौरवश्ष महारथ:
ବାହ୍ଲୀକ, ମୁଜ୍ଜକେଶ ଓ ଚେଦିର ଅଧିପତି; ତଥା ସୁପାର୍ଶ୍ର, ସୁବାହୁ ଏବଂ ମହାରଥୀ ପୌରବ—ଏମାନେ ମଧ୍ୟ (ପ୍ରମୁଖମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ) ଅଛନ୍ତି।
Verse 15
शकानां पह्नवानां च दरदानां च ये नृपा: । सुरारिश्व नदीजश्न कर्णवेष्टश्न॒ पार्थिव:
ଶକ, ପହ୍ଲବ ଓ ଦରଦ ଜନଙ୍କ ଯେଯେ ରାଜାମାନେ; ଏବଂ ସୁରାରିଶ୍ୱ, ନଦୀଜ, କର୍ଣ୍ଣବେଷ୍ଟ ନାମକ ପାର୍ଥିବମାନେ ମଧ୍ୟ (ଏଥିରେ) ଅଛନ୍ତି।
Verse 16
नीलश्न वीरधर्मा च भूमिपालश्च वीर्यवान् दुर्जयो दन्तवक्त्रश्न रुकमी च जनमेजय:
ହେ ଜନମେଜୟ! ନୀଳ, ବୀରଧର୍ମ, ବୀର୍ୟବାନ୍ ଭୂମିପାଳ, ଦୁର୍ଜୟ, ଦନ୍ତବକ୍ତ୍ର ଏବଂ ରୁକ୍ମୀ—ଏମାନେ ମଧ୍ୟ ଶୌର୍ୟପ୍ରସିଦ୍ଧ ରାଜାମାନେ।
Verse 17
आषाढो वायुवेगश्न पूर्वपाली च पार्थिव: । भूरितेजा देवकश्न॒ एकलव्य: सहात्मजै:
ଦ୍ରୁପଦ କହିଲେ—“ଆଷାଢ ଓ ବାୟୁବେଗ, ଏବଂ ରାଜା ପୂର୍ବପାଳୀ; ଭୂରିତେଜା ଓ ଦେବକ; ଏକଲବ୍ୟ ତାଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହିତ।”
Verse 18
कारूषकाश्न राजान: क्षेमधूर्तिश्न वीर्यवान् काम्बोजा ऋषिका ये च पश्चिमानूपकाश्न ये
ଦ୍ରୁପଦ କହିଲେ—“କାରୂଷ ଦେଶର ରାଜାମାନେ, ପରାକ୍ରମୀ କ୍ଷେମଧୂର୍ତ୍ତି; କାମ୍ବୋଜ ଓ ଋଷିକମାନେ, ଏବଂ ପଶ୍ଚିମର ଆନୂପ (ଚିତ୍ତଡ଼ି) ଭୂମିରେ ବସୁଥିବାମାନେ—ଏମାନେ ମଧ୍ୟ (ଗଣନାରେ ଅଛନ୍ତି)।”
Verse 19
जयत्सेनश्न काश्यश्वल॒ तथा पञ्चनदा नृपा: । क्राथपुत्रश्न दुर्धर्ष: पार्वतीयाश्व ये नृपा:
ଦ୍ରୁପଦ କହିଲେ—“ଜୟତ୍ସେନ ଓ କାଶ୍ୟଶ୍ୱ, ଏବଂ ପଞ୍ଚନଦର ରାଜାମାନେ; ଦୁର୍ଧର୍ଷ କ୍ରାଥପୁତ୍ର; ଏବଂ ପାର୍ବତ୍ୟ ଭୂମିରେ ବସୁଥିବା ରାଜାମାନେ—ଏମାନେ ମଧ୍ୟ (ଗଣନାରେ ଅଛନ୍ତି)।”
Verse 20
जानकिश्च सुशर्मा च मणिमान् योतिमत्सक: । पांशुराष्ट्राधिपश्चैव धृष्टकेतुश्व वीर्यवान्
ଦ୍ରୁପଦ କହିଲେ—“ଜାନକି ଓ ସୁଶର୍ମା, ମଣିମାନ ଓ ଜ୍ୟୋତିମତ୍ସକ; ଏବଂ ପାଂଶୁରାଷ୍ଟ୍ରର ଅଧିପତି; ପରାକ୍ରମୀ ଧୃଷ୍ଟକେତୁ—ଏମାନେ ମଧ୍ୟ (ଅଛନ୍ତି)।”
Verse 21
तुण्डश्न दण्डधारश्न बृहत्सेनश्व वीर्यवान् । अपराजितो निषादश्च श्रेणिमान् वसुमानपि
ଦ୍ରୁପଦ କହିଲେ—“ତୁଣ୍ଡଶ୍ନ, ଦଣ୍ଡଧାର, ଏବଂ ପରାକ୍ରମୀ ବୃହତ୍ସେନ; ଅପରାଜିତ; ନିଷାଦ; ଶ୍ରେଣିମାନ ଓ ବସୁମାନ ମଧ୍ୟ।”
Verse 22
बृहद्धलो महौजाश्न बाहु: परपुरञ्जय: । समुद्रसेनो राजा च सह पुत्रेण वीर्यवान्
ଦ୍ରୁପଦ କହିଲେ— “ବୃହଦ୍ଧଲ, ମହୌଜା ଏବଂ ପରପୁରଞ୍ଜୟୀ ବାହୁ; ତଥା ବୀର୍ୟବାନ୍ ରାଜା ସମୁଦ୍ରସେନ ମଧ୍ୟ, ପୁତ୍ରସହିତ।”
Verse 23
उद्धव: क्षेमकश्नैव वाटधानश्व पार्थिव: | श्रुतायुश्न दृढायुश्व शाल्वपुत्रश्न वीर्यवान्
ଦ୍ରୁପଦ କହିଲେ— “ଉଦ୍ଧବ, କ୍ଷେମକ ଏବଂ ପାର୍ଥିବ ରାଜା ୱାଟଧାନ; ତଥା ଶ୍ରୁତାୟୁ, ଦୃଢାୟୁ ଓ ବୀର୍ୟବାନ୍ ଶାଲ୍ୱପୁତ୍ର।”
Verse 24
कुमारश्न कलिड्डानामीश्वरो युद्धदुर्मद: । एतेषां प्रेष्यतां शीघ्रमेतद्धि मम रोचते
ଦ୍ରୁପଦ କହିଲେ— “କଲିଡ୍ଡମାନଙ୍କ ଈଶ୍ୱର କୁମାରଶ୍ନ ଯୁଦ୍ଧମଦରେ ଉନ୍ମତ୍ତ। ତାଙ୍କୁ ଶୀଘ୍ର ପ୍ରେଷଣ କରାଯାଉ—ଏହି ମୋତେ ରୋଚେ।”
Verse 25
बृहन्तको भी बुलाया जाय। राजा सेनाबिन्दु, सेनजित, प्रतिविन्ध्य, चित्रवर्मा, सुवास्तुक, बाह्नीक, मुंजकेश, चैद्यराज, सुपार्श्व, सुबाहु, महारथी पौरव, शकनरेश, पह्नवराज तथा दरददेशके नरेश भी निमन्त्रित किये जाने चाहिये। सुरारि, नदीज, भूपाल क्णवेष्ट, नील, वीरधर्मा, पराक्रमी भूमिपाल, दुर्जय दन्तवक्त्र, रुकमी, जनमेजय, आषाढ, वायुवेग, राजा पूर्वपाली, भूरितेजा, देवक, पुत्रोंसहित एकलव्य, करूषदेशके बहुत-से नरेश, पराक्रमी क्षेमधूर्ति, काम्बोजनरेश, ऋषिकदेशके राजा, पश्चिम द्वीपवासी नरेश, जयत्सेन, काश्य, पंचनद प्रदेशके राजा, दुर्धर्ष क्राथपुत्र, पर्वतीय नरेश, राजा जनकके पुत्र, सुशर्मा, मणिमान्ू, योतिमत्सक, पांशुराज्यके अधिपति, पराक्रमी धृष्टकेतु, तुण्ड, दण्डधार, वीर्यशाली बृहत्सेन, अपराजित, निषादराज, श्रेणिमान्, वसुमान्ू, बृहद्धल, महौजा, शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले बाहु, पुत्रसहित पराक्रमी राजा समुद्रसेन, उद्भव, क्षेमक, राजा वाटधान, श्रुतायु, दृढायु, पराक्रमी शाल्व-पुत्र, कुमार तथा युद्धदुर्मद कलिंगराज--इन सबके पास शीघ्र ही रण-निमन्त्रण भेजा जाय; मुझे यही ठीक जान पड़ता है ॥। १३-- २४ ।। अयं च ब्राह्मणो विद्वान् मम राजन् पुरोहित: । प्रेष्यतां धृतराष्ट्राय वाक्यमस्मै प्रदीयताम्,मत्स्यराज! ये मेरे पुरोहित दिद्वान् ब्राह्मण हैं, इन्हें धृतराष्ट्रके पास भेजिये और वहाँके लिये उचित संदेश दीजिये
ଦ୍ରୁପଦ କହିଲେ— “ହେ ମତ୍ସ୍ୟରାଜ! ଏହି ବିଦ୍ୱାନ୍ ବ୍ରାହ୍ମଣ ମୋର ରାଜପୁରୋହିତ। ଏହାକୁ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପାଖକୁ ପ୍ରେଷଣ କରାଯାଉ ଏବଂ ଯଥୋଚିତ ବାର୍ତ୍ତା ଦିଆଯାଉ।”
Verse 26
यथा दुर्योधनो वाच्यो यथा शान्तनवो नृप: । धृतराष्ट्रो यथा वाच्यो द्रोणश्व॒ रथिनां वर:
ଦ୍ରୁପଦ କହିଲେ— “ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ଭାବେ ସମ୍ବୋଧନ କରାଯାଉ; ଶାନ୍ତନୁପୁତ୍ର ରାଜାଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ସେହିପରି। ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଯଥାଯୋଗ୍ୟ କୁହାଯାଉ, ଏବଂ ରଥୀମାନଙ୍କ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦ୍ରୋଣଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ।”
The dilemma is whether ethical governance should continue conciliatory persuasion when the opponent is judged unwilling to act justly, or whether responsibility requires firmer posture and preparedness to prevent further harm through delayed action.
Speech is not only moral expression but also political signal; counsel must fit the character and incentives of the recipient, and prudent leadership balances civility with credibility, ensuring that diplomacy does not undermine legitimate security obligations.
No explicit phalaśruti appears in the provided verses; the chapter’s meta-function is practical—positioning this counsel as a rationale for immediate alliance coordination within the epic’s broader escalation toward conflict.