
अध्याय २३ — संजयस्योपप्लव्यगमनम् तथा युधिष्ठिरकुशलप्रश्नाः (Sanjaya’s Arrival at Upaplavya and Yudhiṣṭhira’s Welfare Inquiries)
Upa-parva: Sañjaya–Pāṇḍava Saṃvāda (Envoy Visit to Upaplavya)
Vaiśaṃpāyana narrates that Saṃjaya, having received Dhṛtarāṣṭra’s instructions, proceeds to Upaplavya to see the Pāṇḍavas. He approaches the dharmic king Yudhiṣṭhira, offers formal obeisance, and conveys Dhṛtarāṣṭra’s anāmaya inquiry, extending it to Bhīma, Arjuna, the Mādrī twins, and Draupadī. Yudhiṣṭhira welcomes Saṃjaya, affirms his own welfare with his brothers, and then pivots into a comprehensive sequence of kaccit-questions about the Kuru court: the health and conduct of elders (Bhīṣma), the status of Dhṛtarāṣṭra and principal warriors, and the condition of broader dependents (women, mothers, household staff, kin). He further probes institutional ethics—whether brāhmaṇas receive due protection and whether transgressions are checked—warning that unrestrained greed can precipitate collective ruin. The chapter also contains recollective assertions of Pāṇḍava martial capacity (not as incitement but as political signaling): reminders of Arjuna’s unmatched archery and the proven strength of Bhīma and the twins in prior engagements. The unit ends with a sober strategic reflection that a single virtuous act is insufficient to resolve the crisis unless the structural problem—Dhṛtarāṣṭra’s son’s intransigence—can be comprehensively addressed.
Chapter Arc: युधिष्ठिर के प्रश्नों के उत्तर में संजय वचन देता है कि वह धृतराष्ट्र का रात्रिकालीन संदेश ज्यों-का-त्यों सुनाएगा—और सभा का ध्यान एक ही बिंदु पर टिक जाता है: क्या हस्तिनापुर अभी भी धर्म की भाषा समझता है? → संजय धृतराष्ट्र के स्वभाव और राज्य की स्थिति का संकेत देता है—धृतराष्ट्र के यहाँ वृद्ध-साधु भी हैं और पापी-प्रवृत्ति वाले भी; फिर भी ब्राह्मणों का दान न रोकने वाला राजा क्या अपने ही भतीजों का न्याय रोक देगा? इसी के साथ दुर्योधन की कृतघ्नता/क्रूरता का चित्र उभरता है: पाण्डवों ने कभी द्रोह नहीं किया, फिर भी वह द्रोही-सा आचरण करता है। → संजय पाण्डव-वीरों की युद्ध-प्रतिष्ठा का स्मरण कराता है—भीमसेन की गदा-गर्जना, अर्जुन की विजय-ध्वनि, और माद्रीपुत्रों (नकुल-सहदेव) की रणभूमि में दिशाओं को कंपा देने वाली गति; यह स्मरण स्वयं एक चेतावनी बन जाता है कि अन्याय का परिणाम युद्ध में प्रकट होगा। → संजय युधिष्ठिर को यह भी कहता है कि भविष्य का पूर्ण ज्ञान किसी को नहीं; फिर भी यदि युधिष्ठिर सर्वधर्म-सम्पन्न होकर भी क्लेश में पड़े हैं, तो इस कठिन गाँठ को सुलझाने का उपाय भी उन्हें ही धर्म-बुद्धि से निकालना होगा—और अंततः वह धृतराष्ट्र का संदेश सुनाने के लिए प्रस्तुत होता है। → धृतराष्ट्र का वास्तविक संदेश अब आरम्भ होने को है—क्या वह न्याय की ओर झुकेगा या पुत्र-मोह की ओर?
Verse 1
अपन प्रा बछ। अ--क्ाजज चतुर्विशो$ध्याय: संजयका युधिष्ठिरको उनके प्रश्नोंका उत्तर देते हुए उन्हें राजा धृतराष्ट्रका संदेश सुनानेकी प्रतिज्ञा करना सयजय उवाच यथा5त्थ मे पाण्डव तत् तथैव कुरून् कुरुश्रेष्ठ जनं च पृच्छसि । अनामयास्तात मनस्विनस्ते कुरुश्रेष्ठान् पृच्छसि पार्थ यांस्त्वम्,संजय बोला--कुरुश्रेष्ठ पाण्डुनन्दन! आपने मुझसे जो कुछ कहा है, वह बिलकुल ठीक है। कौरवों तथा अन्य लोगोंके विषयमें आप जो कुछ पूछ रहे हैं, वह बताता हूँ, सुनिये। तात! कुन्तीनन्दन! आपने जिन श्रेष्ठ कुरुवंशियोंके कुशल-समाचार पूछे हैं, वे सभी मनस्वी पुरुष स्वस्थ और सानन्द हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲା—ହେ ପାଣ୍ଡବ, କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ! ତୁମେ ଯାହା କହିଛ, ସେହିପରି ହିଁ। ତୁମେ କୁରୁମାନଙ୍କ ଓ ଅନ୍ୟ ଲୋକମାନଙ୍କ ବିଷୟରେ ପଚାରୁଛ; ମୁଁ କହୁଛି। ତାତ, ହେ ପାର୍ଥ! ଯେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ କୁରୁମାନଙ୍କର କୁଶଳ ତୁମେ ପଚାରିଛ, ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ନିରାମୟ, ଉତ୍ସାହୀ ଓ ସୁସ୍ଥ ଅଛନ୍ତି।
Verse 2
सन्त्येव वृद्धा: साधवो धार्राष्टर सन्त्येव पापा: पाण्डव तस्य विद्धि । दद्याद् रिपुभ्योडपि हि धारराष्ट्र: कुतो दायॉल्लोपयेद् ब्राह्मणानाम्,पाण्डव! धृतराष्ट्र-पुत्र दुर्योधनके पास जैसे बहुत-से पापी रहते हैं, उसी प्रकार उसके यहाँ साधुस्वभाववाले वृद्ध पुरुष भी रहते ही हैं। आप इस बातको सत्य समझें। दुर्योधन तो शत्रुओंको भी धन देता है, फिर वह ब्राह्मणोंकी जीविकाका लोप तो कर ही कैसे सकता है?
ସଞ୍ଜୟ କହିଲା—ହେ ପାଣ୍ଡବ! ଏହାକୁ ସତ୍ୟ ଜାଣ: ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଗୃହରେ ପାପୀମାନେ ଯେପରି ଅଛନ୍ତି, ସେପରି ସାଧୁସ୍ୱଭାବ ଥିବା ବୃଦ୍ଧମାନେ ମଧ୍ୟ ଅଛନ୍ତି। ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଧନ ଦେଇଥାଏ; ତେବେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ଜୀବିକାକୁ ସେ କିପରି ଲୋପ କରିବ?
Verse 3
यद् युष्माकं वर्तते सौनधर्म्य- मद्रग्धेषु द्रग्धवत् तन्न साधु । मित्रध्रुक् स्याद् धृतराष्ट्र: सपुत्रो युष्मान् द्विषन् साधुवृत्तानसाधु:
ସଞ୍ଜୟ କହିଲା—ହେ ସୌନଧର୍ମ୍ୟ! ତୁମମାନଙ୍କ ପକ୍ଷର ଆଚରଣ—ଯେମାନେ ଦଗ୍ଧ ନୁହନ୍ତି ସେମାନଙ୍କୁ ଦଗ୍ଧ ଭଳି ଧରିନେବା—ଏହା ଭଲ ନୁହେଁ। ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହ, ଧର୍ମବୃତ୍ତି ଥିବା ତୁମମାନଙ୍କୁ ଦ୍ୱେଷ କରି, ମିତ୍ରଦ୍ରୋହୀ ହେବେ ଏବଂ ଅସାଧୁ ଭାବେ ଆଚରଣ କରିବେ।
Verse 4
आपलोगोंने दुर्योधनके प्रति कभी द्रोहका भाव नहीं रखा है, तो भी वह आपके प्रति जो क्रूरतापूर्ण व्यवहार करता है--द्रोही पुरुषोंके समान ही आचरण करता है, (दुर्योधनके लिये) यह उचित नहीं है। आप-जैसे साधु-स्वभाव लोगोंसे द्वेष करनेपर तो पुत्रोंसहित राजा धृतराष्ट्र असाधु और मित्रद्रोही ही समझे जायाँगे ।। न चानुजानाति भृशं च तप्यते शोचत्यन्त: स्थविरो5जातशत्रो | शृणोति हि ब्राह्मुणानां समेत्य मित्रद्रोह: पातकेभ्यो गरीयान्,अजातशत्रो! राजा धृतराष्ट्र अपने पुत्रोंकी आपसे द्वेष करनेकी आज्ञा नहीं देते; बल्कि आपके प्रति उनके द्रोहकी बात सुनकर वे मन-ही-मन अत्यन्त संतप्त होते तथा शोक किया करते हैं? क्योंकि वे अपने यहाँ पधारे हुए ब्राह्मणोंसे मिलकर सदा उनसे यही सुना करते हैं कि मित्रद्रोह सब पापोंसे बढ़कर है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ଅଜାତଶତ୍ରୁ! ବୃଦ୍ଧ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ନିଜ ପୁଅମାନଙ୍କୁ ତୁମ ପ୍ରତି ଦ୍ୱେଷ ରଖିବାକୁ ସତ୍ୟରେ ଅନୁମତି ଦିଅନ୍ତି ନାହିଁ। ସେମାନଙ୍କର ତୁମ ପ୍ରତି ମିତ୍ରଦ୍ରୋହର କଥା ଶୁଣିଲେ ସେ ଅନ୍ତରେ ଗଭୀର ଦୁଃଖରେ ଦଗ୍ଧ ହୋଇ ଶୋକ କରନ୍ତି। କାରଣ ଆସିଥିବା ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ମିଳି ସେ ପୁନଃପୁନଃ ଏହି କଥା ଶୁଣନ୍ତି—‘ମିତ୍ରଦ୍ରୋହ ସମସ୍ତ ପାପଠାରୁ ଅଧିକ ଭାରୀ’।
Verse 5
स्मरन्ति तुभ्यं नरदेव संयुगे युद्धे च जिष्णोश्व युधां प्रणेतु: । समुत्कृष्टे दुन्दुभिशड्खशब्दे गदापार्णिं भीमसेन॑ स्मरन्ति,नरदेव! कौरवगण युद्धकी चर्चा चलनेपर आपको तथा वीराग्रणी अर्जुनको भी स्मरण करते हैं। युद्धकालमें जब दुन्दुभि और शंखकी ध्वनि गूँज उठती है, उस समय उन्हें गदापाणि भीमसेनकी बहुत याद आती है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ନରଦେବ! ଯୁଦ୍ଧର କଥା ଉଠିଲେ ଓ ସମରକାଳେ ସେମାନେ ତୁମକୁ ସ୍ମରଣ କରନ୍ତି; ଯୋଧାମାନଙ୍କ ନେତା ଜିଷ୍ଣୁ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ସ୍ମରଣ କରନ୍ତି। ଏବଂ ଦୁନ୍ଦୁଭି ଓ ଶଙ୍ଖର ଉଚ୍ଚ ନାଦ ଗୁଞ୍ଜିଲେ, ସେମାନେ ବିଶେଷକରି ଗଦାପାଣି ଭୀମସେନଙ୍କୁ ମନେ ପକାନ୍ତି।
Verse 6
माद्रीसुती चापि रणाजिमध्ये सर्वा दिश: सम्पतन्तौ स्मरन्ति | सेनां वर्षन्ती शरवर्षैरजस्तरं महारथौ समरे दुष्प्रकम्पौ,समरांगणमें जिन्हें हराना तो दूरकी बात है, विचलित या कम्पित करना भी अत्यन्त कठिन है, जो शत्रुसेनापर निरन्तर बाणोंकी वर्षा करते हैं और संग्राममें सम्पूर्ण दिशाओंमें आक्रमण करते हैं, उन महारथी माद्रीकुमार नकुल-सहदेवको भी कौरव सदा याद करते हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ରଣମଧ୍ୟରେ କୌରବମାନେ ମାଦ୍ରୀପୁତ୍ର ନକୁଳ ଓ ସହଦେବଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ସ୍ମରଣ କରନ୍ତି। ସେମାନେ ସମସ୍ତ ଦିଗକୁ ଧାଇ ଶତ୍ରୁସେନା ଉପରେ ନିରନ୍ତର ଶରବର୍ଷା କରନ୍ତି। ସେଇ ଦୁଇ ମହାରଥୀ ସମରେ ଏତେ ଅଚଳ ଯେ ତାଙ୍କୁ ଜିତିବା ତ ଦୂର, କମ୍ପିତ କରିବା ମଧ୍ୟ ଅତ୍ୟନ୍ତ କଠିନ।
Verse 7
न त्वेव मन्ये पुरुषस्य राज- न्ननागतं ज्ञायते यद् भविष्यम् | त्वं चेत् तथा सर्वरधर्मोपपन्न: प्राप्त: क्लेशं पाण्डव कृच्छुरूपम् । त्वमेवैतत् कृच्छूगतश्न भूय: समीकुर्या: प्रज्ञयाजातशत्रो,पाण्डुनन्दन महाराज युधिष्ठिर! मेरा यह विश्वास है कि मनुष्यका भविष्य जबतक वह सामने नहीं आता, किसीको ज्ञात नहीं होता; क्योंकि आप-जैसे सर्वधर्मसम्पन्न पुरुष भी अत्यन्त भयंकर क्लेशमें पड़ गये। अजातशत्रो! संकटमें पड़नेपर भी आप ही अपनी बुद्धिसि विचारकर इस झगड़ेकी शान्तिके लिये पुनः कोई सरल उपाय ढूँढ़ निकालिये
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ଭବିଷ୍ୟତ ଯେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ସାମ୍ନାକୁ ନାଆସେ, ସେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ମନୁଷ୍ୟ ତାହା ଜାଣିପାରେ—ଏହା ମୁଁ ମନେ କରେ ନାହିଁ। କାରଣ ତୁମେ ସର୍ବଧର୍ମସମ୍ପନ୍ନ ପାଣ୍ଡବ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ଭୟଙ୍କର କ୍ଲେଶରେ ପଡ଼ିଛ। ତେଣୁ, ହେ ଅଜାତଶତ୍ରୁ! ଏହି ସଙ୍କଟରେ ମଧ୍ୟ ତୁମେ ନିଜ ପ୍ରଜ୍ଞାରେ ପୁନଃ ବିଚାର କରି, ଏହି କଲହର ଶାନ୍ତି ପାଇଁ କୌଣସି ସରଳ ଉପାୟ ଖୋଜି ବାହାର କର।
Verse 8
न कामार्थ संत्यजेयूुर्हि धर्म पाण्डो: सुता: सर्व एवेन्द्रकल्पा: । त्वमेवैतत् प्रज्याजातशत्रो समीकुर्या येन शर्मप्नुयुस्ते
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ପାଣ୍ଡୁଙ୍କ ପୁଅମାନେ ସମସ୍ତେ ଇନ୍ଦ୍ରସମାନ; କାମନା କିମ୍ବା ଲାଭ ପାଇଁ ସେମାନେ କେବେ ଧର୍ମ ତ୍ୟାଗ କରିବେ ନାହିଁ। ତେଣୁ, ହେ ଅଜାତଶତ୍ରୁ! ତୁମେ ନିଜ ପ୍ରଜ୍ଞାରେ ଏହି ସମାଧାନ ସାଧନ କର—ଯେପରି ତୁମ ବାନ୍ଧବମାନେ ଶାନ୍ତି ଓ କ୍ଷେମ ପାଇବେ।
Verse 9
यन्माब्रवीद् धृतराष्ट्रो निशाया- मजातशत्रो वचन पिता ते,महाराज युधिष्ठिर! आपके ताऊ धुृतराष्ट्रने रातके समय मुझसे आपलोगोंके लिये जो संदेश कहा था, उसे आप मन्त्रियों और पुत्रोंसहित मेरे इन शब्दोंमें सुनिये
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଅଜାତଶତ୍ରୁ ମହାରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ତୁମ ହିତ ପାଇଁ ତୁମ ପିତୃବ୍ୟ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ରାତିରେ ମୋତେ ଯେ ସନ୍ଦେଶ କହିଥିଲେ, ସେହି କଥା ତୁମେ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ଓ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହିତ ମୋର ଏହି ଶବ୍ଦରେ ଶୁଣ।
Verse 10
सहामात्य: सहतपुत्रश्न राजन् समेत्य तां वाचमिमां निबोध,महाराज युधिष्ठिर! आपके ताऊ धुृतराष्ट्रने रातके समय मुझसे आपलोगोंके लिये जो संदेश कहा था, उसे आप मन्त्रियों और पुत्रोंसहित मेरे इन शब्दोंमें सुनिये
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ, ତୁମେ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ଓ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହିତ ଏକତ୍ର ହୋଇ ଏହି ବାକ୍ୟକୁ ସାବଧାନରେ ଶୁଣ। ମହାୟଶସ୍ବୀ ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ତୁମ ହିତ ପାଇଁ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ରାତିରେ ମୋତେ ଯାହା କହିଥିଲେ, ସେହି ସନ୍ଦେଶ ତୁମେ ପରାମର୍ଶଦାତା ଓ ଭ୍ରାତାମାନଙ୍କ ସହିତ ମୋ ପାଖରୁ ଶୁଣ।
Verse 24
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सञ्जययानपर्वणि संजयवाक्ये चतुर्विशो5ध्याय: ।। २४ ।। इस प्रकार श्रीमह्ाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत संजययानपर्वमें संजयवाक्यविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ସଞ୍ଜୟୟାନପର୍ବରେ ସଞ୍ଜୟବାକ୍ୟବିଷୟକ ଚବିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 86
धार्तराष्ट्रा: पाण्डवा: सूंजया श्च ये चाप्यन्ये संनिविष्टा नरेन्द्रा: । पाण्डुके सभी पुत्र इन्द्रके समान पराक्रमी हैं। वे किसी भी स्वार्थके लिये कभी धर्मका त्याग नहीं करते। अतः अजातशत्रो! आप ही इस समस्याको हल कीजिये, जिससे धृतराष्ट्रके सभी पुत्र, पाण्डव, सूंजयवंशी क्षत्रिय तथा अन्य नरेश, जो आकर सेनाकी छावनीमें टिके हुए हैं, कल्याणके भागी हों
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ, ପାଣ୍ଡବମାନେ, ସୃଞ୍ଜୟମାନେ ଓ ଅନ୍ୟ ଯେ ସମସ୍ତ ନରେନ୍ଦ୍ର ଆସି ସେନା-ଶିବିରରେ ଅବସ୍ଥିତ—ପାଣ୍ଡୁଙ୍କ ସମସ୍ତ ପୁତ୍ର ଇନ୍ଦ୍ର ସମ ପରାକ୍ରମୀ। କୌଣସି ସ୍ୱାର୍ଥ ପାଇଁ ସେମାନେ କେବେ ଧର୍ମ ତ୍ୟାଗ କରନ୍ତି ନାହିଁ। ତେଣୁ, ହେ ଅଜାତଶତ୍ରୁ! ଆପଣ ଏହି ସଙ୍କଟକୁ ଏମିତି ସମାଧାନ କରନ୍ତୁ ଯେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ର, ପାଣ୍ଡବ, ସୃଞ୍ଜୟବଂଶୀ କ୍ଷତ୍ରିୟ ଓ ଶିବିରରେ ଥିବା ଅନ୍ୟ ରାଜାମାନେ—ସମସ୍ତେ କଲ୍ୟାଣର ଭାଗୀ ହୁଅନ୍ତୁ।
The tension is between diplomatic civility and moral accountability: how to maintain respectful interstate communication while scrutinizing whether governance is being undermined by partiality, factional counsel, and unrestrained greed.
A stable polity depends on institutional ethics—protecting brāhmaṇas, honoring elders, preventing ministerial factionalism, and restraining lobha—because moral failure at the top propagates systemic collapse.
No formal phalaśruti is stated; the meta-commentary is implicit in the warning that if leaders do not restrain greed and uphold social duties, collective ruin follows—positioning ethical governance as the chapter’s interpretive key.