
धृतराष्ट्र-संजय संवादः — उपप्लव्यगमनाज्ञा (Dhṛtarāṣṭra–Saṃjaya Dialogue: Command to Proceed to Upaplavya)
Upa-parva: Udyoga Parva – Saṃjaya Mission / Upaplavya Intelligence Briefing (contextual unit for Adhyāya 22)
Dhṛtarāṣṭra addresses Saṃjaya with a directive to go to Upaplavya, confirm the Pāṇḍavas’ presence, and offer respectful greetings to Ajātaśatru (Yudhiṣṭhira). He asserts that he has not observed deceitful conduct in the Pāṇḍavas and describes them as disciplined agents of dharma and artha who restrain bodily impulses and cultivate endurance and discernment. The king then shifts into a structured appraisal of the Pāṇḍava coalition’s military and political capital: Arjuna’s singular prowess with the Gāṇḍīva, Bhīma’s unmatched strength, the twin sons of Mādrī as swift and skilled, and the presence of key allies such as Dhṛṣṭadyumna, Virāṭa, the Kekaya brothers, Sṛñjayas, Pāṇḍya, Sātyaki, and other rulers and fighters from diverse regions. Kṛṣṇa (Keśava/Janārdana) is presented as a decisive deterrent whose prior feats establish a high risk of escalation if provoked. Dhṛtarāṣṭra expresses anxiety about the consequences of anger—especially Yudhiṣṭhira’s potential wrath—and instructs Saṃjaya to speak appropriately in the royal assembly so that speech does not culminate in war. The chapter thus functions as a hybrid of ethical characterization, coalition intelligence, and envoy protocol.
Chapter Arc: हस्तिनापुर के राजमहल में धृतराष्ट्र को समाचार मिलता है कि पाण्डव उपप्लव्य पहुँचे हैं; वह संजय को बुलाकर आदेश देता है कि जाकर उनकी स्थिति और मनोभाव जान आए। → धृतराष्ट्र संजय को केवल दूत नहीं, अपने भय और आशा का वाहक बनाकर भेजता है—युधिष्ठिर से आदरपूर्वक मिलना, कुशल पूछना, और पाण्डवों की शक्ति-संरचना का सूक्ष्म आकलन करना। वह पाण्डवों की सत्यवृत्ति और आत्मवीर्य से अर्जित श्री का स्मरण करता है, साथ ही भीम-अर्जुन की अतुल सामर्थ्य और उनके पक्ष में जुटे सहयोगियों (केकय, सृंजय, विराट, युयुधान) का संकेत देता है। → धृतराष्ट्र का अंतर्द्वंद्व चरम पर आता है: वह स्वयं को ‘शान्तिमीप्सु’ कहकर संजय से कहलवाता है कि मेरे वचन से पाण्डवों का अनामय पूछो—पर साथ ही यह भी स्वीकार करता है कि कृष्ण के पाण्डव-हितकारी कर्मों का स्मरण उसे शान्ति नहीं देता; अर्थात् शान्ति की चाह और युद्ध की अनिवार्यता का भय एक साथ उभरता है। → धृतराष्ट्र संजय को स्पष्ट निर्देश देता है—अजातशत्रु युधिष्ठिर, जनार्दन कृष्ण, पाँचों द्रौपदेय, तथा पाण्डव-पक्ष के प्रमुखों से मिलकर कुशल पूछना और समयोचित, ‘भारतों के हित’ का वचन कहना। → संजय उपप्लव्य की ओर प्रस्थान करता है—अब प्रश्न यह है कि पाण्डव धृतराष्ट्र के संदेश को शान्ति का संकेत मानेंगे या कपट का।
Verse 1
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४१ “लोक हैं।] नी ्रा पल हज निया धाइसिा त्रयोविशो<् ध्याय: संजयका युधिष्ठिससे मिलकर उनकी कुशल पूछना एवं युधिष्ठिरका संजयसे कौरवपक्षका कुशल-समाचार पूछते हुए उससे सारगर्भित प्रश्न करना वैशम्पायन उवाच राज्ञस्तु वचन श्रुत्वा धृतराष्ट्रस्य संजय: । उपप्लव्यं ययौ द्रष्टं पाण्डवानमितौजस:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजा धृतराष्ट्रकी बात सुनकर संजय अमित तेजस्वी पाण्डवोंसे मिलनेके लिये उपप्लव्य गया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି ସଞ୍ଜୟ, ଅମିତ ତେଜସ୍ବୀ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଦେଖିବାକୁ ଉପପ୍ଲବ୍ୟକୁ ଗଲେ।
Verse 2
धृतराष्ट्रने कहा--संजय! लोग कहते हैं कि पाण्डव उपप्लव्य नामक स्थानमें आ गये हैं। तुम वहाँ जाकर उनका समाचार जानो। अजातशत्रु युधिष्ठिरसे आदरपूर्वक मिलकर कहना, सौभाग्यकी बात है कि आप सन्नद्ध होकर अपने योग्य स्थानपर आ पहुँचे हैं ।। सर्वान् वदे: संजय स्वस्तिमन्तः कृच्छूं वासमतदर्हान् निरुष्य । तेषां शान्तिर्विद्यते5स्मासु शीघ्र मिथ्यापेतानामुपकारिणां सताम्,संजय! सब पाण्डवोंसे कहना कि हमलोग सकुशल हैं। पाण्डवलोग मिथ्यासे दूर रहनेवाले, परोपकारी तथा साधु पुरुष हैं। वे वनवासका कष्ट भोगनेयोग्य नहीं थे, तो भी उन्होंने वनवासका नियम पूरा कर लिया है। इतनेपर भी हमारे ऊपर उनका क्रोध शीघ्र ही शान्त हो गया है स तु राजानमासाद्य कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । अभिवाद्य तत: पूर्व सूतपुत्रो5भ्यभाषत वहाँ पहले कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरके पास जाकर सूतपुत्र संजयने उन्हें प्रणाम किया और उनसे बातचीत प्रारम्भ की
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ— “ସଞ୍ଜୟ! ସମସ୍ତ ପାଣ୍ଡବଙ୍କୁ କହ, ଆମେ ସୁସ୍ଥ ଓ କୁଶଳରେ ଅଛୁ। ସେମାନେ ମିଥ୍ୟାରୁ ଦୂର, ପରହିତକାରୀ ଓ ସାଧୁ; ବନବାସର କଷ୍ଟ ସେମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଯୋଗ୍ୟ ନ ଥିଲା, ତଥାପି ସେମାନେ ନିୟମ ପୂରା କରିଛନ୍ତି। ଏବଂ ଆମ ପ୍ରତି ସେମାନଙ୍କ କ୍ରୋଧ ମଧ୍ୟ ଶୀଘ୍ର ଶାନ୍ତ ହୋଇଛି।” ତାପରେ ସଞ୍ଜୟ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଭେଟି, ପ୍ରଥମେ ପ୍ରଣାମ କରି, ସୂତପୁତ୍ର ସଞ୍ଜୟ କଥା ଆରମ୍ଭ କଲେ।
Verse 3
नाहं क्वचित् संजय पाण्डवानां मिथ्यावृत्ति काज्चन जात्वपश्यम् | सर्वा श्रियं ह्यात्मवीर्येण लब्धां पर्याकार्ष: पाण्डवा महा[मेव,संजय! मैंने कभी कहीं पाण्डवोंमें थोड़ी-सी भी मिथ्या वृत्ति नहीं देखी है। पाण्डवोंने अपने पराक्रमसे प्राप्त हुई सारी सम्पत्ति मेरे ही अधीन कर दी थी गावल्गणि: संजय: सूतसूनु- रजातशत्रुमवदत् प्रतीत: । दिष्ट्या राजंस्त्वामरोगं प्रपश्ये सहायवन्तं च महेन्द्रकल्पम् गवल्गणनन्दन सूतपुत्र संजयने प्रसन्न होकर अजातशत्रु राजा युधिष्ठिर्से कहा --'राजन्! बड़े सौभाग्यकी बात है कि आज मैं देवराज इन्द्रके समान आपको अपने सहायकोंके साथ स्वस्थ एवं सकुशल देख रहा हूँ
“ସଞ୍ଜୟ! ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମୁଁ କେବେ କେଉଁଠି ମଧ୍ୟ ଅଳ୍ପମାତ୍ର ମିଥ୍ୟାବୃତ୍ତି ଦେଖିନାହିଁ। ସେମାନେ ନିଜ ବୀର୍ୟରେ ଲାଭ କରିଥିବା ସମସ୍ତ ଶ୍ରୀକୁ ମୋର ଅଧୀନରେ ରଖିଥିଲେ।” ତାପରେ ଗାବଲ୍ଗଣିଙ୍କ ପୁତ୍ର, ସୂତପୁତ୍ର ସଞ୍ଜୟ ଆନନ୍ଦିତ ହୋଇ ଅଜାତଶତ୍ରୁ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ କହିଲେ— “ରାଜନ୍! ଆପଣଙ୍କୁ ନିରୋଗ, କୁଶଳ, ସହାୟମାନଙ୍କ ସହ—ମହେନ୍ଦ୍ର ସମ—ଦେଖୁଛି; ଏହା ମୋର ମହା ସୌଭାଗ୍ୟ।”
Verse 4
दोषं होषां नाध्यगच्छ॑ परीच्छन् नित्यं कंचिद् येन गर्हेय पार्थान् धर्मार्थाभ्यां कर्म कुर्वन्ति नित्यं सुखप्रिये नानुरुध्यन्ति कामात्,मैंने सदा ढूँढ़ते रहनेपर भी कुन्तीपुत्रोंका कोई ऐसा दोष नहीं देखा है, जिससे उनकी निन्दा करूँ। वे सदा धर्म और अर्थके लिये ही कर्म करते हैं, कामनावश मानसिक प्रीति और स्त्री-पुत्रादि प्रिय वस्तुओंमें नहीं फँसते हैं--कामभोगमें आसक्त होकर धर्मका परित्याग नहीं करते हैं अनामयं पृच्छति त्वा55म्बिकेयो वृद्धो राजा धृतराष्ट्रो मनीषी । कच्चिद् भीम: कुशली पाण्डवाग्रयो धनंजयस्तौ च माद्रीतनूजी वृद्ध एवं बुद्धिमान् अम्बिकानन्दन महाराज धृतराष्ट्रने आपका कुशल-समाचार पूछा है। भीमसेन, पाण्डवप्रवर अर्जुन तथा वे दोनों माद्रीकुमार नकुल-सहदेव कुशलसे तो हैं न?
Vaiśampāyana said: “Though I have examined them constantly, I have found no fault in the sons of Pṛthā by which I could censure them. They act ever for the sake of dharma and artha; they do not, out of desire, yield themselves to the lure of pleasure and what is dear. They do not abandon dharma through attachment to sensual enjoyments. The aged and wise king Dhṛtarāṣṭra, son of Ambikā, asks after your well-being. Are Bhīma—foremost among the Pāṇḍavas—Dhanaṃjaya (Arjuna), and the two sons of Mādrī (Nakula and Sahadeva) all in good health?”
Verse 5
धर्म शीतं क्षुत्पिपासे तथैव निद्रां तन्द्रीं क्रोधहर्षों प्रमादम् । धृत्या चैव प्रज्ञया चाभिभूय धर्मार्थयोगात् प्रयतन्ति पार्था:,पाण्डव घाम-शीत, भूख-प्यास, निद्रा-तन्द्रा, क्रोध-हर्ष तथा प्रमादको धैर्य एवं विवेकपूर्ण बुद्धिके द्वारा जीतकर धर्म और अर्थके लिये ही प्रयत्नशील बने रहते हैं कच्चित् कृष्णा द्रौपदी राजपुत्री सत्यव्रता वीरपत्नी सपुत्रा । मनस्थविनी यत्र च वाउ्छसि त्व- मिष्टान् कामान् भारत स्वस्तिकाम: 'सत्यव्रतका पालन करनेवाली वीरपत्नी ट्रुपदकुमारी राजपुत्री मनस्विनी कृष्णा अपने पुत्रोंसहित कुशलपूर्वक है न? भारत! इनके सिवा आप जिन-जिनके कल्याणकी इच्छा रखते हैं तथा जिन अभीष्ट भोगोंको बनाये रखना चाहते हैं, वे आत्मीय जन तथा धन- वैभव-वाहन आदि भोगोपकरण सकुशल हैं न?”
Vaiśampāyana said: The Pāṇḍavas, having conquered cold and heat, hunger and thirst, sleep and drowsiness, anger and elation, and also heedlessness—by steadfastness and discerning intelligence—remain continually intent upon the disciplined pursuit of dharma and artha. And is Kṛṣṇā Draupadī, the princess, the daughter of Drupada—true to her vows, the wife of heroes, and with her sons—well and secure? O Bhārata, wishing welfare, are all those dear ones and all those cherished enjoyments and possessions that you desire to preserve also safe?
Verse 6
त्यजन्ति मित्रेषु धनानि काले न संवासाज्जीर्यति तेषु मैत्री । यथार्हमानार्थकरा हि पार्था- स्तेषां द्वेष्ठा नास्त्याजमीढस्य पक्षे,वे समय पड़नेपर मित्रोंको उनकी सहायताके लिये धन देते हैं। दीर्घकालिक प्रवाससे भी उनकी मैत्री क्षीण नहीं होती है। कुन्तीके पुत्र सबका यथायोग्य सत्कार करनेवाले हैं। अजमीढवंशी हम कौरवोंके पक्षमें पापी, बेईमान तथा मन्दबुद्धि दुर्योधन एवं अत्यन्त क्षुद्र स्वभाववाले कर्णको छोड़कर दूसरा कोई भी उनसे द्वेष रखनेवाला नहीं है। संजय! मेरा पुत्र दुर्योधन कालके अधीन हो गया है; क्योंकि उसकी बुद्धि रागसे दूषित है। वह मूर्ख अत्यन्त तेजस्वी महात्मा पाण्डवोंके स्वत्वको दबा लेनेकी चेष्टा कर रहा है। केवल दुर्योधन और कर्ण ही सुख और प्रियजनोंसे बिछुड़े हुए महामना पाण्डवोंके मनमें क्रोध उत्पन्न करते रहते हैं युधिछिर उवाच गावल्गणे संजय स्वागतं ते प्रीयामहे ते वयं दर्शनेन । अनामयं प्रतिजाने तवाहं सहानुजै: कुशली चास्मि विद्वन् युधिष्ठिर बोले--गवल्गणकुमार संजय! तुम्हारा स्वागत है। तुम्हें देखकर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है। विद्वन! मैं अपने भाइयोंसहित कुशलसे हूँ तथा तुम्हें अपने आरोग्यकी सूचना दे रहा हूँ
Vaiśaṃpāyana said: “In times of need they give wealth to their friends; and even long separation does not wear down their friendship. The sons of Pṛthā (the Pāṇḍavas) honor people as is fitting and do not act to anyone’s harm. In the line of Ajāmīḍha, on the Kaurava side, there is virtually no one who bears hatred toward them.”
Verse 7
अन्यत्र पापाद् विषमान्मन्दबुद्धे- दुर्योधनात् क्षुद्रतराच्च कर्णात् । (पुत्रो महां मृत्युवशं जगाम दुर्योधन: संजय रागबुद्धि: । भागं हर्तु घटते मन्दबुद्धि- महात्मनां संजय दीप्ततेजसाम् ।। ) तेषां हीमौ हीनसुखप्रियाणां महात्मनां संजनयतो हि तेज:,वे समय पड़नेपर मित्रोंको उनकी सहायताके लिये धन देते हैं। दीर्घकालिक प्रवाससे भी उनकी मैत्री क्षीण नहीं होती है। कुन्तीके पुत्र सबका यथायोग्य सत्कार करनेवाले हैं। अजमीढवंशी हम कौरवोंके पक्षमें पापी, बेईमान तथा मन्दबुद्धि दुर्योधन एवं अत्यन्त क्षुद्र स्वभाववाले कर्णको छोड़कर दूसरा कोई भी उनसे द्वेष रखनेवाला नहीं है। संजय! मेरा पुत्र दुर्योधन कालके अधीन हो गया है; क्योंकि उसकी बुद्धि रागसे दूषित है। वह मूर्ख अत्यन्त तेजस्वी महात्मा पाण्डवोंके स्वत्वको दबा लेनेकी चेष्टा कर रहा है। केवल दुर्योधन और कर्ण ही सुख और प्रियजनोंसे बिछुड़े हुए महामना पाण्डवोंके मनमें क्रोध उत्पन्न करते रहते हैं चिरादिदं कुशलं भारतस्य श्र॒त्वा राज्ञ: कुरुवृद्धस्य सूत । मन्ये साक्षाद् दृष्टमहं नरेन्द्र दृष्टवैव त्वां संजय प्रीतियोगात् सूत! कुरुकुलके वृद्ध पुरुष भरतनन्दन महाराज धुृतराष्ट्रका यह कुशल-समाचार दीर्घकालके बाद सुनकर और प्रेमपूर्वक तुम्हें भी देखकर मैं यह अनुभव करता हूँ कि आज मुझे साक्षात् महाराज धृतराष्ट्रका ही दर्शन हुआ है
Vaiśampāyana said: “Except for that sinful and crooked fool Duryodhana—and for Karṇa, baser still—there is no one among the Kauravas who bears enmity toward the sons of Kuntī, who honor all as is fitting and whose friendships do not wither even through long absence. Sañjaya, my son Duryodhana has fallen under the dominion of Death, for his mind is stained by passion. In his folly he strives to seize the rightful share of those great-souled Pāṇḍavas, blazing with energy. Indeed, it is Duryodhana and Karṇa alone who keep kindling the fierce ardor (wrath) in the hearts of those high-minded men, deprived of happiness and separated from their loved ones.”
Verse 8
उत्थानवीर्य: सुखमेधमानो दुर्योधन: सुकृतं मन्यते तत् । तेषां भागं यच्च मन्येत बाल: शक््यं हर्तु जीवतां पाण्डवानाम्,दुर्योधन आरम्भमें ही पराक्रम दिखानेवाला है, (अन्ततक उसे निभा नहीं सकता;) क्योंकि वह सुखमें ही पलकर बड़ा हुआ है। वह इतना मूर्ख है कि पाण्डवोंके जीते-जी उनका भाग हर लेना सरल समझता है। इतना ही नहीं, वह इस कुकर्मको उत्तम कर्म भी मानने लगा है पितामहो नः स्थविरो मनस्वी महाप्राज्ञ: सर्वधर्मोपपन्न: । स कौरव्य: कुशली तात भीष्मो यथापूर्व वृत्तिरस्त्यस्य कच्चित् तात! मनस्वी, परम ज्ञानी तथा समस्त धर्मोके ज्ञानसे सम्पन्न हमारे बूढ़े पितामह कुरुवंशी भीष्मजी तो कुशलसे हैं न? हमलोगोंपर उनका स्नेहभाव तो पूर्ववत् बना हुआ है न?
Vaiśampāyana said: Duryodhana, quick to display valor at the outset yet reared in comfort, imagines that deed to be meritorious. In his childish folly he thinks it easy, while the Pāṇḍavas still live, to seize their rightful share—and he has even begun to regard this wrongdoing as a good act. And (he asks): “Father, is our grandsire Bhīṣma—aged, high-minded, supremely wise, and grounded in every principle of dharma—well? Does his former disposition toward us, his affection and steady regard, remain as before?”
Verse 9
यस्यार्जुन: पदवीं केशवश्व वृकोदर: सात्यको5जातशत्रो: | माद्रीपुत्रौ संजयाश्चापि यान्ति पुरा युद्धात् साधु तस्य प्रदानम्,अर्जुन, भगवान् श्रीकृष्ण, भीमसेन, सात्यकि, नकुल, सहदेव और सम्पूर्ण सुंजयवंशी वीर जिनके पीछे चलते हैं, उन युधिष्ठिरको युद्धके पहले ही उनका राज्यभाग दे देनेमें भलाई है कच्चिद् राजा धृतराष्ट्र: सपुत्रो वैचित्रवीर्य: कुशली महात्मा । महाराजो बाह्लिक: प्रातिपेय: कच्चिद् विद्वान् कुशली सूतपुत्र संजय! क्या अपने पुत्रोंसहित विचित्रवीर्यनन्दन महामना राजा धृतराष्ट्र सकुशल हैं? प्रतीपके विद्वान् पुत्र महाराज बाह्नलीक तो कुशलपूर्वक हैं न?
Vaiśaṃpāyana said: “He whom Arjuna leads, and Kṛṣṇa (Keśava) follows; whom Bhīma (Vṛkodara), Sātyaki, and Yudhiṣṭhira (Ajātaśatru) accompany; and behind whom Nakula and Sahadeva—the sons of Mādrī—together with the valiant men of the Sañjaya line proceed: it would be wise to grant that Yudhiṣṭhira his rightful share of the kingdom even before war begins. And tell me, Sañjaya—does the great-souled King Dhṛtarāṣṭra, son of Vicitravīrya, remain well along with his sons? And is the learned King Bāhlika, descendant of Pratīpa, also in good health?”
Verse 10
स होवैक: पृथिवीं सव्यसाची गाण्डीवधन्वा प्रणुदेद् रथस्थ: । तथा जिष्णु: केशवो&प्यप्रधृष्यो लोकत्रयस्याधिपतिर्महात्मा,गाण्डीवधारी सव्यसाची अर्जुन रथमें बैठकर अकेले ही सारी पृथ्वीको जीत सकते हैं। इसी प्रकार विजयशील एवं दुर्धर्ष महात्मा श्रीकृष्ण भी तीनों लोकोंको जीतकर उनके अधिपति हो सकते हैं। जो समस्त लोकोंमें एकमात्र सर्वश्रेष्ठ वीर हैं, जो मेघ-गर्जनाके समान गम्भीर शब्द करनेवाले तथा टिडियोंके दलकी भाँति तीव्र वेगसे चलनेवाले बाणसमूहोंकी वर्षा करते हैं, उन वीरवर अर्जुनके सामने कौन मनुष्य ठहर सकता है? स सोमदत्त: कुशली तात कच्चिद् भूरिश्रवा: सत्यसंध: शलश्न | द्रोण: सपुत्रश्न कृपश्च विप्रो महेष्वासा: कच्चिदेते5प्यरोगा: तात! सोमदत्त, भूरिश्रवा, सत्यप्रतिज्ञ शल, पुत्रसहित द्रोणाचार्य और विद्रश्रेष्ठ कृपाचार्य--ये महाधनुर्धर वीर स्वस्थ तो हैं न?
Vaiśaṃpāyana said: “Savyasācin Arjuna, the wielder of the Gāṇḍīva, seated in his chariot, could by himself subdue the whole earth. In the same way, the victorious and unassailable Keśava—great-souled—could conquer the three worlds and become their lord. Before that foremost of heroes, whose roar is like thunder and whose arrows pour forth in swift, swarming volleys, what man could stand? And, dear one, are Somadatta well? Is Bhūriśravā, and Śala of truthful resolve? Are Droṇa with his son, and the brahmin Kṛpa—those great bowmen—also free from illness?”
Verse 11
तिछेत कस्तस्य मर्त्य: पुरस्ताद् यः सर्वलोकेषु वरेण्य एक: । पर्जन्यघोषान् प्रवपञ्छरौघान् पतड़सड्घानिव शीघ्रवेगान्,गाण्डीवधारी सव्यसाची अर्जुन रथमें बैठकर अकेले ही सारी पृथ्वीको जीत सकते हैं। इसी प्रकार विजयशील एवं दुर्धर्ष महात्मा श्रीकृष्ण भी तीनों लोकोंको जीतकर उनके अधिपति हो सकते हैं। जो समस्त लोकोंमें एकमात्र सर्वश्रेष्ठ वीर हैं, जो मेघ-गर्जनाके समान गम्भीर शब्द करनेवाले तथा टिडियोंके दलकी भाँति तीव्र वेगसे चलनेवाले बाणसमूहोंकी वर्षा करते हैं, उन वीरवर अर्जुनके सामने कौन मनुष्य ठहर सकता है? सर्वे कुरुभ्य: स्पृहयन्ति संजय धनुर्धरा ये पृथिव्यां प्रधाना: । महाप्राज्ञा: सर्वशास्त्रावदाता धनुर्भता मुख्यतमा: पृथिव्याम् संजय! क्या पृथ्वीके ये महान् धनुर्धर, जो परम बुद्धिमान, समस्त शास्त्रोंके ज्ञानसे उज्ज्वल तथा भू-मण्डलके धनुर्धरोंमें प्रधान हैं, कौरवोंसे स्नेह-भाव रखते हैं?
Vaiśampāyana said: Who among mortals could stand before that one peerless hero, the best in all the worlds—who, with a roar like thunderclouds, pours forth volleys of arrows that rush as swiftly as swarms of locusts? Gāṇḍīva-bearing Arjuna, the ambidextrous master of the bow, could mount his chariot and conquer the whole earth even alone. Likewise, the victorious and unassailable great-souled Śrī Kṛṣṇa could subdue the three worlds and become their lord. And, Sañjaya—do the foremost bowmen of the earth, supremely intelligent and radiant with knowledge of all the śāstras, truly feel attachment toward the Kauravas?
Verse 12
दिशं ह्युदीचीमपि चोत्तरान् कुरून् गाण्डीवधन्वैकरथो जिगाय । धनं चैषामाहरत् सव्यसाची सेनानुगान् द्रविडांश्वैव चक्रे,गाण्डीव धनुष धारण करके एकमात्र रथपर आरूढ़ हो सव्यसाची अर्जुनने न केवल उत्तर-दिशापर विजय पायी थी, अपितु उत्तर कुरुदेशको भी जीत लिया था और उन सबकी धन-सम्पत्ति जीतकर ले आये थे। उन्होंने द्रविड़ोंको भी जीतकर अपनी सेनाका अनुगामी बनाया था कच्चिन्मानं तात लभन्त एते धनुर्भुतः कच्चिदेते5प्यरोगा: । येषां राष्ट्र निवसति दर्शनीयो महेष्वास: शीलवान द्रोणपुत्र: तात! जिनके राष्ट्रमें दर्शनीय, शीलवान् तथा महाथधनुर्धर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा निवास करता है, उन कौरवोंके बीच क्या पूर्वोक्त धनुर्धर विद्वान् आदर पाते हैं? क्या ये कौरव भी नीरोग हैं?
Vaiśampāyana said: Arjuna, the ambidextrous archer who bears the Gāṇḍīva, riding alone in a single chariot, conquered even the northern quarter and subdued the Northern Kurus. He brought back their wealth and made the Draviḍas, along with their forces, follow his army. ‘Dear one, do those bowmen there receive due honor? And are those Kurus also free from illness—those in whose realm dwells the illustrious, great archer, the well-conducted son of Droṇa, Aśvatthāmā?’
Verse 13
यश्चैव देवान् खाण्डवे सव्यसाची गाण्डीवधन्वा प्रजिगाय सेन्द्रान् | उपाहरत् पाण्डवो जातवेदसे यशो मान वर्धयन् पाण्डवानाम्,गाण्डीव धनुष धारण करनेवाले पाण्डुपुत्र सव्यसाची अर्जुन वे ही हैं, जिन्होंने खाण्डववनमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंपर विजय पायी थी और पाण्डवोंके यश तथा सम्मानकी वृद्धि करते हुए अग्निदेवको वह वन उपहारके रूपमें अर्पित किया था वैश्यापुत्र: कुशली तात कच्चि- न्महाप्राज्ञो राजपुत्रो युयुत्सु: । कर्णोडमात्य: कुशली तात कच्चित् सुयोधनो यस्य मन्दो विधेय: तात! क्या राजा धुृतराष्ट्रकी वैश्यजातीय पत्नीके पुत्र महाज्ञानी राजकुमार युयुत्सु सकुशल हैं? संजय! मूढ़ दुर्योधन सदा जिसकी आज्ञाके अधीन रहता है, वह मन्त्री कर्ण भी कुशलपूर्वक है न?
Vaiśampāyana said: The Pāṇḍava Arjuna—Savyasācī, bearer of the Gāṇḍīva bow—was the very one who, in the Khāṇḍava forest, overcame the gods even with Indra among them. Seeking to increase the fame and honor of the Pāṇḍavas, he offered that forest as an oblation-gift to Agni (Jātavedas).
Verse 14
गदाभूतां नास्ति समो5त्र भीमा- द्धस्त्यारोहो नास्ति समक्ष तस्य । रथे<र्जुनादाहुरहीनमेनं बाद्वोर्बलेनायुतनागवीर्यम्,गदाधारियोंमें इस भूतलपर भीमसेनके समान दूसरा कोई नहीं है और न उनके-जैसा कोई हाथीसवार ही है। रथमें बैठकर युद्ध करनेकी कलामें भी वे अर्जुनसे कम नहीं बताये जाते हैं और बाहुबलमें तो वे दस हजार हाथियोंके समान शक्तिशाली हैं स्त्रियों वृद्धा भारतानां जनन्यो महानस्यो दासभार्याश्चव सूत । वध्व: पुत्रा भागिनेया भगिन्यो दौहित्रा वा कच्चिदप्यव्यलीका: सूत! भरतवंशियोंकी माताएँ, बड़ी-बूढ़ी स्त्रियाँ, रसोई बनानेवाली सेविकाएँ, दासियाँ, बहुएँ, पुत्र, भानजे, बहिनें और पुत्रियोंके पुत्र--ये सभी निष्कपट-भावसे रहते हैं न?
Vaiśampāyana said: “On this earth there is none equal to Bhīma among the mace-bearers; nor is there any elephant-rider who can stand before him. In chariot-war too, they say he is not inferior to Arjuna; and in the strength of his arms he has the might of ten thousand elephants. And, O Sūta, are the women of the Bhāratas—mothers, elderly ladies, kitchen-attendants, slave-wives, daughters-in-law, sons, nephews, sisters, and grandsons through daughters—are all of them living without deceit and in good faith?”
Verse 15
सुशिक्षित:ः कृतवैरस्तरस्वी दहेत् क्षुद्रांस्तरसा धार्तराष्ट्रान् । सदात्यमर्षी न बलात् स शक््यो युद्धे जेतुं वासवेनापि साक्षात्,अस्त्र-विद्यामें उन्हें अच्छी शिक्षा मिली है। वे बड़े वेगशाली वीर हैं। उनके साथ मेरे पुत्रोंने वैर ठान रखा है और वे सदा अत्यन्त अमर्षमें भरे रहते हैं; अतः यदि युद्ध हुआ तो भीमसेन मेरे क्षुद्र स्वभाववाले पुत्रोंको वेगपूर्वक (अपनी कोपाग्निसे) जलाकर भस्म कर देंगे। साक्षात् इन्द्र भी उन्हें युद्धमें बलपूर्वक परास्त नहीं कर सकते कच्चिद् राजा ब्राह्मणानां यथावत् प्रवर्तते पूर्ववत् तात वृत्तिम् । कच्चिद् दायान् मामकान धार्तराष्ट्रो द्विजातीनां संजय नोपहन्ति तात! क्या राजा दुर्योधन पहलेकी भाँति ब्राह्मणोंको जीविका देनेमें यथोचित रीतिसे तत्पर रहता है? संजय! मैंने ब्राह्मणोंको वृत्तिके रूपमें जो गाँव आदि दिये थे, उन्हें वह छीनता तो नहीं है?
Vaiśampāyana said: “Well-trained, swift, and with enmity firmly set, he would in an instant burn up the petty-minded sons of Dhṛtarāṣṭra. Ever seething with fierce indignation, he cannot be conquered in battle by sheer force—not even by Indra himself in person. Tell me, dear one: does King Duryodhana still, as before, duly maintain the livelihood of the Brāhmaṇas? Sañjaya, does that Dhārtarāṣṭra refrain from harming the endowments I granted—villages and the like—meant as sustenance for the twice-born?”
Verse 16
सुचेतसौ बलिनौ शीघ्रहस्तौ सुशिक्षितौ भ्रातरौ फाल्गुनेन । श्येनौ यथा पक्षिपूगान् रुजन्तौ माद्रीपुत्रौ शेषयेतां न शत्रून्,माद्रीनन्दन नकुल और सहदेव भी शुद्धचित्त और बलवान हैं। अस्त्र-संचालनमें उनके हाथोंकी फुर्ती देखने ही योग्य है। स्वयं अर्जुनने अपने उन दोनों भाइयोंको युद्धकी अच्छी शिक्षा दी है। जैसे दो बाज पक्षियोंके समुदायको (सर्वथा) नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार वे दोनों भाई शत्रुओंसे भिड़कर उन्हें जीवित नहीं छोड़ सकते कच्चिद् राजा धृतराष्ट्र: सपुत्र उपेक्षते ब्राह्म॒णातिक्रमान् वै । स्वर्गस्य कच्चिन्न तथा वर्त्मभूता- मुपेक्षते तेषु सदैव वृत्तिम् पुत्रोंसहित राजा धृतराष्ट्र ब्राह्मणोंके प्रति किये गये अपराधोंकी उपेक्षा तो नहीं करते? ब्राह्मणोंको जो सदा वृत्ति दी जाती है, वह स्वर्गलोकमें पहुँचनेका मार्ग है; अतः राजा उस वृत्तिकी उपेक्षा या अवहेलना तो नहीं करते हैं?
Vaiśampāyana said: “Nakula and Sahadeva, the sons of Mādrī, are pure-minded and strong, with swift hands; they have been well trained by Phālguna (Arjuna). Like two hawks tearing through a flock of birds, those two brothers, once they close with the enemy, would leave no foe alive. And does King Dhṛtarāṣṭra, together with his sons, truly not disregard the transgressions committed against brāhmaṇas? And does he not neglect the continual maintenance (vṛtti) that is to be provided to them—maintenance that stands as a path leading to heaven?”
Verse 17
एतदू बल॑ पूर्णमस्माकमेवं यत् सत्य॑ तान् प्राप्प नास्तीति मन्ये । तेषां मध्ये वर्तमानस्तरस्वी धृष्टद्युम्न: पाण्डवानामिहैक:,यह ठीक है कि हमारी सेना सब प्रकारसे परिपूर्ण है तथापि मेरा यह विश्वास है कि यह पाण्डवोंका सामना पड़नेपर नहींके बराबर है। पाण्डवोंके पक्षमें धृष्टद्युम्न नामसे प्रसिद्ध एक बलवान योद्धा है, जो सोमकवंशका श्रेष्ठ राजकुमार है। मैंने सुना है, उसने पाण्डवोंके लिये मन्त्रियोंसहित अपने शरीरको निछावर कर दिया है। जिन अजातशत्रु युधिष्ठिरके अगुआ अथवा नेता वृष्णिवंशके सिंह भगवान् श्रीकृष्ण हैं, उनका वेग दूसरा कौन सह सकता है? एतज्ज्योतिक्षोत्तमं जीवलोके शुक्ल प्रजानां विहित॑ विधात्रा | ते चेद् दोषं न नियच्छन्ति मन्दा: कृत्स्नो नाशो भविता कौरवाणाम् ब्राह्मणोंको दी हुई जीविकावृत्तिकी रक्षा परलोकको प्रकाशित करनेवाली उत्तम ज्योति है और इस जीव-जगतमें वह उज्ज्वल यशका विस्तार करनेवाली है। यह नियम विधाताने ही प्रजाके हितके लिये रच रखा है। यदि मन्दबुद्धि कौरव लोभवश ब्राह्मणोंकी जीविका- वृत्तिक अपहरणरूप दोषको काबूमें नहीं रखेंगे तो कौरवकुलका सर्वथा विनाश हो जायगा
Vaiśampāyana said: “Our army is indeed complete in every respect; yet I believe that, when it comes to facing the Pāṇḍavas, it will prove as good as nothing. Among them stands one mighty warrior here—Dhṛṣṭadyumna—alone on the Pāṇḍavas’ side, a forceful champion. And this, too, is the highest light in the world of living beings: the protection of the livelihood granted to Brāhmaṇas—an ordinance established by the Creator for the welfare of the people, spreading pure renown. If the dull-witted Kauravas, driven by greed, do not restrain the fault of seizing that Brāhmaṇa livelihood, then total destruction will befall the Kaurava line.”
Verse 18
सहामात्य: सोमकानां प्रवर्ह: संत्यक्तात्मा पाण्डवार्थे श्रुतो मे । अजातशगत्रुं प्रसहेत को 5न्यो येषां स स्यादग्रणीर्वृष्णिसिंह:,यह ठीक है कि हमारी सेना सब प्रकारसे परिपूर्ण है तथापि मेरा यह विश्वास है कि यह पाण्डवोंका सामना पड़नेपर नहींके बराबर है। पाण्डवोंके पक्षमें धृष्टद्युम्न नामसे प्रसिद्ध एक बलवान योद्धा है, जो सोमकवंशका श्रेष्ठ राजकुमार है। मैंने सुना है, उसने पाण्डवोंके लिये मन्त्रियोंसहित अपने शरीरको निछावर कर दिया है। जिन अजातशत्रु युधिष्ठिरके अगुआ अथवा नेता वृष्णिवंशके सिंह भगवान् श्रीकृष्ण हैं, उनका वेग दूसरा कौन सह सकता है? कच्चिद् राजा धृतराष्ट्र: सपुत्रो बुभूषते वृत्तिममात्यवर्गे । कच्चिन्न भेदेन जिजीविषन्ति सुहृद्रपा दुर्हदेश्चैकमत्यात् क्या पुत्रोंसहित राजा धृतराष्ट्र मन्त्रिवर्कको भी जीवन-निर्वाहके योग्य वृत्ति देनेकी इच्छा रखते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं होता कि वे भेदसे जीविका चलाना चाहते हों (शत्रुओंने उन्हें फोड़ लिया हो और वे उन्हींके दिये हुए धनसे जीवन-निर्वाह करना चाहते हों)। वे सुहृदके रूपमें रहते हुए भी एकमत होकर शत्रु तो नहीं बन गये हैं?
Vaiśampāyana said: “I have heard that the foremost prince of the Somakas—together with his ministers—has wholly dedicated himself to the Pandavas’ cause, as though he had renounced his own life for them. And who else could withstand the might of Ajātaśatru (Yudhiṣṭhira), when the leader at their head is the lion of the Vṛṣṇis, Śrī Kṛṣṇa? The verse underscores a moral reality: strength in war is not merely numbers, but the power of righteous alliance, steadfast commitment, and inspired leadership.”
Verse 19
सहोषितकश्षरितार्थो वयःस्थो मात्स्येयानामधिपो वै विराट: । स वै सपुत्र: पाण्डवार्थे च शश्वद् युधिष्ठिरं भक्त इति श्रुतं मे,मत्स्यदेशके राजा विराट भी अपने पुत्रोंक साथ पाण्डवोंकी सहायताके लिये सदा उद्यत रहते हैं। मैंने सुना है कि वे युधिष्ठिरके बड़े भक्त हैं। कारण यह है कि अज्ञातवासके समय वे युधिष्ठिरके साथ एक वर्ष रहे हैं और युधिष्ठिरके द्वारा उनके गोधनकी रक्षा हुई है। अवस्थामें वृद्ध होनेपर भी वे युद्धमें नौजवान-से जान पड़ते हैं कच्चिन्न पापं कथयन्ति तात ते पाण्डवानां कुरव: सर्व एव । द्रोण: सपुत्रश्न कृपश्च वीरो नास्मासु पापानि वदन्ति कच्चित् तात संजय! कहीं सब कौरव मिलकर पाण्डवोंके किसी दोषकी चर्चा तो नहीं करते हैं? पुत्रसहित द्रोणाचार्य और वीर कृपाचार्य हमलोगोंपर किन््हीं दोषोंका आरोप तो नहीं करते हैं?
Vaiśampāyana said: “Virāṭa, the lord of the Matsyas, though advanced in years, appears youthful in battle and is a man of proven purpose. Together with his sons he is ever ready to act for the Pāṇḍavas’ cause. I have heard that he is devoted to Yudhiṣṭhira—indeed, during the year of concealment he lived in Yudhiṣṭhira’s company, and through Yudhiṣṭhira his cattle were protected. ‘Dear Sañjaya, do all the Kurus speak of any fault in the Pāṇḍavas? Do Droṇa with his son, and the valiant Kṛpa, impute any wrongdoing to us?’”
Verse 20
अवरुद्धा रथिन: केकये भ्यो महेष्वासा भ्रातर: पञठ्च सन्ति । केकयेभ्यो राज्यमाकाड्क्षमाणा युद्धार्थिनश्वानुवसन्ति पार्थान्,केकयदेशसे बाहर निकाले हुए पाँच भाई केकयराजकुमार महान् धनुर्थधर एवं रथी वीर हैं। वे पाण्डवोंके सहयोगसे केकयदेशके राजाओंसे पुनः अपना राज्य लेना चाहते हैं, इसलिये उनकी ओरसे युद्ध करनेकी इच्छा रखकर उन्हींके साथ रह रहे हैं कच्चिद् राज्ये धृतराष्ट्रं सपुत्रं समेत्याहु: कुरव: सर्व एव | कच्चिद् दृष्टवा दस्युसड्घान् समेतान् स्मरन्ति पार्थस्य युधां प्रणेतु: क्या कभी सब कौरव एकत्र हो पुत्रसहित धृतराष्ट्रके पास जाकर हमें राज्य देनेके विषयमें कुछ कहते हैं? कया राज्यमें लुटेरोंके दलोंको देखकर वे कभी संग्रामविजयी अर्जुनको भी याद करते हैं?
Vaiśampāyana said: “There are five brothers—great archers and chariot-warriors—who have been driven out by the Kekayas. Longing to regain their kingdom from the Kekaya rulers, they stay with the Pāṇḍavas, intent on fighting on their side. Do all the Kurus ever assemble and approach Dhṛtarāṣṭra together with his sons to speak of restoring the kingdom (to the rightful claimants)? And when they see bands of robbers gathered in the realm, do they ever remember Arjuna, the Pārtha who leads men in battle?”
Verse 21
सर्वाश्न वीरान् पृथिवीपतीनां समागतान् पाण्डवार्थे निविष्टान् शूरानहं भक्तिमत: शृणोमि प्रीत्या युक्तान् संश्रितान् धर्मराजम्,मैं यह भी सुनता हूँ कि राजाओंमें जितने वीर हैं, वे सब पाण्डवोंकी सहायताके लिये आकर उनकी छावनीमें रहते हैं। वे सब-के-सब शौर्यसम्पन्न, युधिष्ठिरके प्रति भक्ति रखनेवाले, प्रसन्नचित्त एवं धर्मराजके आश्रित हैं मौर्वीभुजाग्रप्रहितान् सम तात दोधूयमानेन धनुर्गुणेन । गाण्डीवनुन्नान् स्तनयित्नुघोषा- नजिद्दागान् कच्चिदनुस्मरन्ति संजय! प्रत्यंचाको बारंबार हिलाकर और कानोंतक खींचकर अँगुलियोंके अग्रभागसे जिनका संधान किया जाता है तथा जो गाण्डीव धनुषसे छूटकर मेघकी गर्जनाके समान सनसनाते हुए सीधे लक्ष्यतक पहुँच जाते हैं, अर्जुनके उन बाणोंको कौरवलोग बराबर याद करते हैं न?
Vaiśampāyana said: “I also hear that all the valiant kings of the earth—warriors who have gathered and taken their stand for the Pāṇḍavas’ cause—are encamped there. They are brave, devoted to Yudhiṣṭhira, glad at heart, and have sought refuge in the righteous king. And tell me, Sañjaya: do the Kauravas still remember Arjuna’s arrows—those set to the bowstring by the very tips of his fingers, drawn back to the ear as the string is made to quiver, driven forth by the Gāṇḍīva, roaring like thunderclouds, and flying straight to their mark without swerving?”
Verse 22
गिर्याश्रया दुर्गनिवासिनश्च योधा: पृथिव्यां कुलजातिशुद्धा: । म्लेच्छाश्व नानायुधवीर्यवन्त: समागता: पाण्डवार्थे निविष्टा:,पर्वतोंपर रहनेवाले, दुर्गम भूमिमें निवास करनेवाले एवं समतल भूमिके निवासी योद्धा, जो कुल और जातिकी दृष्टिसे बहुत शुद्ध हैं, वे तथा म्लेच्छ भी नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र एवं बल-पराक्रमसे सम्पन्न हो पाण्डवोंकी सहायताके लिये आये हैं और उनके शिविरमें निवास करते हैं क्योंकि श्रीकृष्ण इनको आत्माके समान प्रिय हैं। श्रीकृष्ण विद्वान् हैं और सदा पाण्डवोंके हितके कार्यमें लगे रहते हैं। संजय! तुम वहाँ एकत्र हुए पाण्डवों तथा सूंजयवंशी क्षत्रियोंसे और श्रीकृष्ण, सात्यकि, राजा विराट एवं द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंसे भी मेरी ओरसे स्वास्थ्यका समाचार पूछना। इसके सिवा जैसा अवसर हो और जिसमें तुम्हें भरतवंशियोंका हित प्रतीत हो, वैसी बातें पाण्डवपक्षके लोगोंसे कहना। राजाओंके बीचमें ऐसा कोई वचन »/) 4 / 45 #्र' 77० 7 >०/६] ॥ ८ >> । 22.0 की 6 8. २२ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत संजययानपर्वमें धृतराष्ट्रसंदेशविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ न चापश्यं कंचिदहं पृथिव्यां योध॑ सम॑ वाधिकमर्जुनेन । यस्यैकषष्टिनिशितास्ती क्षणधारा: सुवासस: सम्मतो हस्तवाप: मैंने इस पृथ्वीपर अर्जुनसे बढ़कर या उनके समान दूसरे किसी योद्धाको नहीं देखा है; क्योंकि जब वे एक बार अपने हाथोंसे धनुषपर शर-संधान करते हैं, तब उससे सुन्दर पंख और पैनी धारवाले इकसठ तीखे बाण प्रकट होते हैं
Vaiśampāyana said: Warriors of many kinds—those who dwell in mountain fastnesses, those who live in difficult and inaccessible regions, and those settled on the plains—men renowned on earth for the purity of their lineage and community, and even foreign tribesmen endowed with diverse weapons and martial prowess, have assembled and taken their place for the Pāṇḍavas’ cause. The verse underscores how, in a time of impending war, alliances form across geography and social boundaries, and how loyalty to a righteous cause can draw support even from those considered outsiders.
Verse 23
पाण्ड्यक्ष राजा समितीन्द्रकल्पो योधप्रवीरैर्बहुभि: समेत: । समागत: पाण्डवार्थे महात्मा लोकप्रवीरो<5प्रतिवीर्यतेजा:,पाण्ड्यदेशके महामना राजा, जो संसारके सुविख्यात वीर, अनुपम पराक्रम और तेजसे सम्पन्न तथा युद्धमें देवराज इन्द्रके समान हैं, पाण्डवोंकी सहायताके लिये बहुत-से प्रमुख योद्धाओंके साथ पधारे हैं गदापाणिभ्भीमसेनस्तरस्वी प्रवेपयञ्छत्रुसड्घाननीके । नाग: प्रभिन्न इव नड्वलेषु चंक्रम्यते कच्चिदेनं स्मरन्ति जैसे मस्तकसे मदकी धारा बहानेवाला गजराज सरकंडोंसे भरे हुए स्थानोंमें निर्भय विचरता है, उसी प्रकार वेगशाली वीर भीमसेन हाथमें गदा लिये रणभूमिमें शत्रुसमुदायको कम्पित करते हुए विचरण करते हैं। क्या कौरवलोग उन्हें भी कभी याद करते हैं? इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सञ्जययानपर्वणि युधिष्ठिरप्रश्ने त्रयोविंशो 5ध्याय: ।। २३ ।। इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत संजययानपर्वमें युधिष्िरप्रश्नविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ
Vaiśampāyana said: The king of the Pāṇḍyas—like Indra in the clash of armies—arrived for the Pāṇḍavas’ cause, accompanied by many foremost warriors. That great-souled ruler, famed throughout the world, possessed of unrivalled valor and splendor, came as their ally. And Bhīmasena, mighty and swift, with mace in hand, roams the battlefield shaking the enemy hosts—like a rut-maddened elephant striding fearlessly through reed-filled marshes. Do the Kauravas ever remember him even now?
Verse 24
अस्त्र द्रोणादर्जुनाद् वासुदेवात् कृपाद् भीष्माद् येन वृतं शूणोमि । यं तं कार्ष्णिप्रतिममाहुरेक॑ स सात्यकि: पाण्डवार्थे निविष्ट:,जिसने द्रोणाचार्य, अर्जुन, श्रीकृष्ण, कृपाचार्य तथा भीष्मसे भी अस्त्रविद्या सीखी है तथा जिस एकमात्र वीरको श्रीकृष्णपुत्र प्रद्युम्मके समान पराक्रमी बताया जाता है, वह सात्यकि भी, सुनता हूँ, पाण्डवोंकी सहायताके लिये आकर टिका हुआ है माद्रीपुत्र: सहदेव:ः कलिड्रान् समागतानजयद् दन्तकूरे । वामेनास्यन् दक्षिणेनैव यो वै महाबलं कच्चिदेनं स्मरन्ति जिसमें दाँत पीसकर अस्त्र-शस्त्र चलाये जाते हैं, उस भयंकर युद्धमें माद्रीनन्दन सहदेवने दाहिने और बायें हाथसे बाणोंकी वर्षा करके अपना सामना करनेके लिये आये हुए कलिंगदेशीय योद्धाओंको परास्त किया था। क्या इस महाबली वीरको भी कौरव कभी याद करते हैं?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ମୁଁ ଶୁଣୁଛି, ସାତ୍ୟକି—ଯିଏ ଦ୍ରୋଣ, ଅର୍ଜୁନ, ବାସୁଦେବ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ), କୃପ ଓ ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ନିକଟରୁ ଅସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟା ଅଧିଗତ କରିଛି, ଏବଂ ଯାହାକୁ ଏକମାତ୍ର କାର୍ଷ୍ଣି (ପ୍ରଦ୍ୟୁମ୍ନ) ସମ ପରାକ୍ରମୀ ବୋଲି କୁହାଯାଏ—ସେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପକ୍ଷରେ ଦୃଢ଼ ଭାବେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଅଛି। ଏବଂ ସେଇ ଭୟଙ୍କର ଦନ୍ତକୂର ଯୁଦ୍ଧରେ, ଯେଉଁଠାରେ ଯୋଧାମାନେ ଦାନ୍ତ ଚେପି ଲଢ଼ନ୍ତି, ମାଦ୍ରୀପୁତ୍ର ସହଦେବ ବାମ-ଦକ୍ଷିଣ ଦୁଇ ହାତରେ ଶରବର୍ଷା କରି ସମ୍ମୁଖୀନ କଳିଙ୍ଗମାନଙ୍କୁ ପରାଜିତ କରିଥିଲେ। କୌରବମାନେ ଏହି ମହାବଳୀକୁ ମଧ୍ୟ ସ୍ମରଣ କରନ୍ତି କି?
Verse 25
उपश्ििताक्षेदिकरूषका श्र सर्वोद्योगैर्भूमिपाला: समेता: । तेषां मध्ये सूर्यमिवातपन्तं श्रिया वृतं चेदिपतिं ज्वलन्तम्,(युधिष्ठिरके राजसूययज्ञमें) चेदि और करूषदेशके भूपाल सब प्रकारकी तैयारीसे संगठित होकर आये थे। उन सबके बीचमें चेदिराज शिशुपाल अपनी दिव्य शोभासे तपते हुए सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहा था। युद्धमें उसके वेगको रोकना असम्भव था। धनुषकी प्रत्यंचा खींचनेवाले भूमण्डलके सभी योद्धाओंमें शिशुपाल एक श्रेष्ठतम वीर था। यह सब समझकर भगवान् श्रीकृष्णने वहाँ चेदिदेशीय क्षत्रियोंके सम्पूर्ण उत्साहको नष्ट करके हठपूर्वक बड़े वेगसे शिशुपालको मार डाला पुरा जेतुं नकुल: प्रेषितो<5यं शिबींस्त्रिगर्तान् संजय पश्यतस्ते | दिशं प्रतीचीं वशमानयन्मे माद्रीसुतं कच्चिदेनं स्मरन्ति संजय! पहले राजसूययज्ञमें तुम्हारे सामने ही शिबि और त्रिगर्तदेशके वीरोंको जीतनेके लिये इस नकुलको भेजा गया था; परंतु इसने सारी पश्चिम दिशाको जीतकर मेरे अधीन कर दिया। क्या कौरव इस वीर माद्रीकुमारका भी स्मरण करते हैं?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଚେଦି ଓ କରୂଷ ଦେଶର ଭୂପାଳମାନେ ସମସ୍ତ ପ୍ରସ୍ତୁତି ସହିତ ସେଠାରେ ଏକତ୍ର ହୋଇଥିଲେ। ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଚେଦିପତି ଶିଶୁପାଳ ଶ୍ରୀରେ ଆବୃତ ହୋଇ ତପ୍ତ ସୂର୍ଯ୍ୟ ପରି ଜ୍ୱଳମାନ ଦେଖାଯାଉଥିଲେ। ସଞ୍ଜୟ! ପୂର୍ବେ (ରାଜସୂୟରେ) ତୁମ ଦେଖୁଥିବାବେଳେ ଶିବି ଓ ତ୍ରିଗର୍ତ୍ତମାନଙ୍କୁ ଜିତିବାକୁ ଏହି ନକୁଳକୁ ପଠାଯାଇଥିଲା; କିନ୍ତୁ ସେ ସମଗ୍ର ପଶ୍ଚିମ ଦିଗକୁ ଜିତି ମୋ ଅଧୀନ କରିଦେଲା। କୌରବମାନେ ଏହି ମାଦ୍ରୀକୁମାରକୁ ମଧ୍ୟ ସ୍ମରଣ କରନ୍ତି କି?
Verse 26
अस्तम्भनीयं युधि मनन््यमानो ज्यां कर्षतां श्रेष्ठतमं पृथिव्याम् । सर्वोत्साहं क्षत्रियाणां निहत्य प्रसह कृष्णस्तरसा सम्ममर्द,(युधिष्ठिरके राजसूययज्ञमें) चेदि और करूषदेशके भूपाल सब प्रकारकी तैयारीसे संगठित होकर आये थे। उन सबके बीचमें चेदिराज शिशुपाल अपनी दिव्य शोभासे तपते हुए सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहा था। युद्धमें उसके वेगको रोकना असम्भव था। धनुषकी प्रत्यंचा खींचनेवाले भूमण्डलके सभी योद्धाओंमें शिशुपाल एक श्रेष्ठतम वीर था। यह सब समझकर भगवान् श्रीकृष्णने वहाँ चेदिदेशीय क्षत्रियोंके सम्पूर्ण उत्साहको नष्ट करके हठपूर्वक बड़े वेगसे शिशुपालको मार डाला पराभवो द्वैतवने य आसीद् दुर्मन्त्रिते घोषयात्रागतानाम् । यत्र मन्दाउछत्रुवशं प्रयाता- नमोचयद् भीमसेनो जयश्नल कर्णकी खोटी सलाहके अनुसार घोषयात्रामें गये हुए धृतराष्ट्रपुत्रोंकी द्वैतवनमें जो पराजय हुई थी, उसमें वे सभी मन्दबुद्धि कौरव शत्रुओंके अधीन हो गये थे। उस समय भीमसेन और अर्जुनने ही उन्हें बन्धनसे मुक्त किया था
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଯୁଦ୍ଧରେ ତାଙ୍କୁ ଅସ୍ତମ୍ଭନୀୟ (ଅଟକାଇ ନହେବା) ବୋଲି ଭାବି, ଏବଂ ପୃଥିବୀରେ ଧନୁଷ୍ୟର ଜ୍ୟା ଟାଣୁଥିବାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ତାଙ୍କୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠତମ ଜାଣି, କୃଷ୍ଣ ପ୍ରଥମେ କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କ ସମସ୍ତ ଉତ୍ସାହକୁ ଚୁର୍ଣ୍ଣ କରି, ପରେ ବଳପୂର୍ବକ ମହାବେଗରେ ତାଙ୍କୁ ଦମନ କଲେ। ଏବଂ କର୍ଣ୍ଣଙ୍କ ଦୁର୍ମନ୍ତ୍ରଣାରେ ଘୋଷଯାତ୍ରାକୁ ଯାଇଥିବା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ଦ୍ୱୈତବନର ପରାଭବରେ—ଯେଉଁଠାରେ ସେଇ ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି କୌରବମାନେ ଶତ୍ରୁବଶ ହୋଇପଡ଼ିଥିଲେ—ସେତେବେଳେ ଭୀମସେନ ଓ ଅର୍ଜୁନ ହିଁ ତାଙ୍କୁ ବନ୍ଧନରୁ ମୁକ୍ତ କରିଥିଲେ।
Verse 27
यशोमानौ वर्धयन् पाण्डवानां पुराभिनच्छिशुपालं समीक्ष्य । यस्य सर्वे वर्धयन्ति सम मान॑ करूषराजप्रमुखा नरेन्द्रा:,करूषराज आदि सब नरेश जिसका सम्मान बढ़ाते थे, उस शिशुपालकी ओर दृष्टिपात करके पाण्डवोंके यश और मानकी वृद्धिके उद्देश्यसे श्रीकृष्णने उसे पहले ही मार डाला अहं पश्चादर्जुनमभ्यरक्ष॑ माद्रीपुत्रो भीमसेनो5प्यरक्षत् गाण्डीवधन्वा शत्रुसड्घानुदस्य स्वस्त्यागमत् कच्चिदेनं स्मरन्ति उस युद्धमें मैंने पीछे रहकर यज्ञके द्वारा अर्जुनकी रक्षा की थी और भीमसेनने नकुल तथा सहदेवका संरक्षण किया था। गाण्डीवधारी अर्जुनने शत्रुओंके समुदायको मार गिराया था और स्वयं सकुशल लौट आये थे। क्या कौरव कभी उनकी याद करते हैं?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— କରୂଷରାଜ ଆଦି ନରେନ୍ଦ୍ରମାନେ ଯାହାଙ୍କ ସମାନ ମାନ ବଢ଼ାଉଥିଲେ, ସେଇ ଶିଶୁପାଳଙ୍କୁ ଦେଖି ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଯଶ ଓ ମାନ ବୃଦ୍ଧି ପାଇଁ କୃଷ୍ଣ ପୂର୍ବରୁ ହିଁ ତାଙ୍କୁ ବଧ କରିଥିଲେ। ସେଇ ଯୁଦ୍ଧରେ ମୁଁ ପଛେ ରହି ଯଜ୍ଞକର୍ମ ଦ୍ୱାରା ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ରକ୍ଷା କରିଥିଲି; ମାଦ୍ରୀପୁତ୍ର ଭୀମସେନ ମଧ୍ୟ (ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ) ରକ୍ଷା କରିଥିଲେ। ଗାଣ୍ଡୀବଧାରୀ ଅର୍ଜୁନ ଶତ୍ରୁସଂଘମାନଙ୍କୁ ନିହତ କରି କୁଶଳରେ ଫେରିଲେ। କୌରବମାନେ ତାଙ୍କୁ କେବେ ସ୍ମରଣ କରନ୍ତି କି?
Verse 28
तमसहां केशवं तत्र मत्वा सुग्रीवयुक्तेन रथेन कृष्णम् सम्प्राद्रव॑श्षेदिपतिं विहाय सिंहं दृष्टवा क्षुद्रमृूगा इवान्ये,सुग्रीव आदि घोड़ोंसे जुते हुए रथपर आरूढ़ होनेवाले श्रीकृष्णणो असहा मानकर चेदिराज शिशुपालके सिवा दूसरे भूपाल उसी प्रकार पलायन कर गये, जैसे सिंहको देखते ही जंगलके क्षुद्र पशु भाग जाते हैं न कर्मणा साधुनैकेन नूनं॑ सुखं शक्यं वै भवतीह संजय । सर्वात्मना परिजेतं वयं चे- न्न शवनुमो धृतराष्ट्रस्य पुत्रम् संजय! यदि हम धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको सभी उपायोंसे नहीं जीत सकते तो केवल एक अच्छे व्यवहारसे ही उसे सुखपूर्वक जीतना हमारे लिये निश्चय ही सम्भव नहीं है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେଠାରେ କେଶବ କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଅପରାଜେୟ ବୋଲି ଭାବି, ସୁଗ୍ରୀବ ଆଦି ଘୋଡ଼ା ଯୁକ୍ତ ରଥରେ ଆରୂଢ଼ କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଦେଖି, ଚେଦିପତିଙ୍କୁ ଛାଡ଼ି ଅନ୍ୟ ରାଜାମାନେ ସିଂହକୁ ଦେଖି ଛୋଟ ଅରଣ୍ୟମୃଗ ପରି ପଳାଇଗଲେ। ଏବଂ ସଞ୍ଜୟ! ଯଦି ଆମେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରକୁ ସମସ୍ତ ଉପାୟ ଓ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଶକ୍ତିରେ ଜିତିପାରୁନାହିଁ, ତେବେ ଏଠାରେ କେବଳ ଗୋଟିଏ ‘ସଦ୍ବ୍ୟବହାର’ ଦ୍ୱାରା ସୁଖ-ଶାନ୍ତି ଲାଭ ନିଶ୍ଚୟ ହେବ ନାହିଁ।
Verse 29
यस्तं प्रतीपस्तरसा प्रत्युदीया- दाशंसमानो दैरथे वासुदेवम् । सो<शेत कृष्णेन हतः परासु- वतिनेवोन्मथित: कर्णिकार:,जिसने द्वैरथ-युद्धमें विजयकी आशा रखकर भगवान् श्रीकृष्णका विरोधी हो बड़े वेगसे उनपर धावा किया, वह शिशुपाल श्रीकृष्णके हाथसे मारा जाकर प्राणशून्य हो सदाके लिये इस प्रकार धरतीपर सो गया, मानो कनेरका वृक्ष हवाके वेगसे उखड़कर धराशायी हो गया हो
ଯେ ରଥଯୁଦ୍ଧରେ ବିଜୟର ଆଶା ଧରି, ହୃଦୟରେ ବୈର ରଖି, ମହାବେଗରେ ବାସୁଦେବ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ଉପରେ ଧାଇଗଲା—ସେ କୃଷ୍ଣଙ୍କ ହାତରେ ହତ ହୋଇ ପ୍ରାଣଶୂନ୍ୟ ଭାବେ ଧରାପରେ ଏମିତି ପଡ଼ିରହିଲା, ଯେପରି ବାତାସର ବେଗରେ ଉଖଡ଼ି ପଡ଼ିଥିବା କର୍ଣ୍ଣିକାର (କନେର) ଗଛ।
Verse 30
पराक्रमं मे यदवेदयन्त तेषामर्थे संजय केशवस्य । अनुस्मरंस्तस्य कर्माणि विष्णो- गवलल्गणे नाधिगच्छामि शान्तिम्,संजय! पाण्डवोंके लिये किये हुए श्रीकृष्णके उस पराक्रमका वृत्तान्त मेरे गुप्तचरोंने मुझे बताया था। गावल्गणे! श्रीहरिके उन वीरोचित कर्मोको बारंबार याद करके मुझे शान्ति नहीं मिल रही है
ସଞ୍ଜୟ! ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ହିତାର୍ଥେ କେଶବ ଯେ ପରାକ୍ରମ କରିଥିଲେ, ତାହାର ବୃତ୍ତାନ୍ତ ମୋ ଗୁପ୍ତଚରମାନେ ମୋତେ ଜଣାଇଥିଲେ। ଗାବଲ୍ଗଣେ! ବିଷ୍ଣୁସ୍ୱରୂପ ଶ୍ରୀହରିଙ୍କ ସେହି ବୀରକର୍ମକୁ ପୁନଃପୁନଃ ସ୍ମରଣ କରି, ସଞ୍ଜୟ, ମୁଁ ଶାନ୍ତି ପାଉନାହିଁ।
Verse 31
न जातु ताउचछत्रुरन्य: सहेत येषां स स्यादग्रणीर्वृष्णिसिंह: । प्रवेपते मे हृदयं भयेन श्रुत्वा कृष्णावेकरथे समेतीौ,जिनके अग्रगामी वृष्णिसिंह भगवान् वासुदेव हैं, उन पाण्डवोंका आक्रमण कभी भी दूसरा कोई शत्रु नहीं सह सकता। श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों एक रथपर एकत्र हो गये हैं, यह सुनकर तो मेरा हृदय भयसे काँप उठता है
ଯେମାନଙ୍କ ଅଗ୍ରଣୀ ବୃଷ୍ଣିସିଂହ ବାସୁଦେବ, ସେହି ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଆକ୍ରମଣକୁ ଅନ୍ୟ କୌଣସି ଶତ୍ରୁ କେବେ ସହିପାରିବ ନାହିଁ। ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଓ ଅର୍ଜୁନ ଏକ ରଥରେ ଏକତ୍ର ହୋଇଛନ୍ତି—ଏହା ଶୁଣିଲେ ମୋ ହୃଦୟ ଭୟରେ କମ୍ପିଉଠେ।
Verse 32
न चेद् गच्छेत् संगरं मन्दबुद्धि- स्ताभ्यां लभेच्छर्म तदा सुतो मे । नो चेत् कुरून् संजय निर्दहेता- मिन्द्राविष्णू दैत्यसेनां यथैव,संजय! यदि मेरा मन्दबुद्धि पुत्र उन दोनोंसे युद्ध करनेके लिये न जाय, तभी वह कल्याणका भागी हो सकता है। अन्यथा वे दोनों वीर कौरवोंको उसी प्रकार भस्म कर देंगे, जैसे इन्द्र और विष्णु दैत्यसेनाका संहार कर डालते हैं
ସଞ୍ଜୟ! ମୋ ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି ପୁତ୍ର ସେଇ ଦୁଇଜଣଙ୍କ ବିରୋଧରେ ସଙ୍ଗ୍ରାମକୁ ନ ଯାଉ—ତେବେ ମାତ୍ର ସେ କ୍ଷେମ ଓ କଲ୍ୟାଣ ପାଇବ। ନଚେତ୍, ସଞ୍ଜୟ, ସେଇ ଦୁଇ ବୀର କୁରୁମାନଙ୍କୁ ଏମିତି ଭସ୍ମ କରିଦେବେ, ଯେପରି ଇନ୍ଦ୍ର ଓ ବିଷ୍ଣୁ ଦୈତ୍ୟସେନାକୁ ନାଶ କରିଥିଲେ।
Verse 33
मतो हि मे शक्रसमो धनंजय: सनातनो वृष्णिवीरश्व विष्णु: । धर्मारामो ह्लीनिषेवस्तरस्वी कुन्तीपुत्र: पाण्डवोडजातशत्रु:,मुझे तो अर्जुन इन्द्रके समान प्रतीत होते हैं और वृष्णिवीर श्रीकृष्ण सनातन विष्णु जान पड़ते हैं। कुन्तीनन्दन पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर धर्माचरणमें ही सुख मानते हैं। वे लज्जाशील और बलशाली हैं। उनके मनमें किसीके प्रति कभी शत्रुभाव नहीं पैदा हुआ है। नहीं तो वे मनस्वी युधिष्ठिर दुर्योधनके द्वारा छल-कपटके शिकार होनेपर क्रोध करके मेरे सभी पुत्रोंको जलाकर भस्म कर देते। संजय! मैं अर्जुन, भगवान् श्रीकृष्ण, भीमसेन तथा नकुल-सहदेवसे भी उतना नहीं डरता, जितना कि क्रोधसे तमतमाये हुए राजा युधिष्ठिरके कोपसे। उनके रोषसे मैं सदा ही अत्यन्त भयभीत रहता हूँ; क्योंकि वे महान् तपस्वी और ब्रह्मचर्यसे सम्पन्न हैं, इसलिये उनके मनमें जो संकल्प होगा, वह सिद्ध होकर ही रहेगा
ମୋ ମତରେ ଧନଞ୍ଜୟ ଅର୍ଜୁନ ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର) ସମାନ, ଏବଂ ବୃଷ୍ଣିବୀର ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ସନାତନ ବିଷ୍ଣୁ ମନେ ପଡ଼ନ୍ତି। କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ପାଣ୍ଡବ ଅଜାତଶତ୍ରୁ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଧର୍ମରେ ହିଁ ରମଣ କରନ୍ତି; ସେ ଲଜ୍ଜାଶୀଳ ଓ ବଳବାନ, ତାଙ୍କ ମନରେ କାହା ପ୍ରତି ଶତ୍ରୁଭାବ କେବେ ଜନ୍ମ ନେଇନାହିଁ।
Verse 34
दुर्योधनेन निकृतो मनस्वी नो चेत् क्रुद्ध: प्रदहेद् धार्तराष्ट्रान्ू । नाहं तथा हार्जुनाद् वासुदेवाद् भीमाद् वाहं यमयोर्वा बिभेमि,मुझे तो अर्जुन इन्द्रके समान प्रतीत होते हैं और वृष्णिवीर श्रीकृष्ण सनातन विष्णु जान पड़ते हैं। कुन्तीनन्दन पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर धर्माचरणमें ही सुख मानते हैं। वे लज्जाशील और बलशाली हैं। उनके मनमें किसीके प्रति कभी शत्रुभाव नहीं पैदा हुआ है। नहीं तो वे मनस्वी युधिष्ठिर दुर्योधनके द्वारा छल-कपटके शिकार होनेपर क्रोध करके मेरे सभी पुत्रोंको जलाकर भस्म कर देते। संजय! मैं अर्जुन, भगवान् श्रीकृष्ण, भीमसेन तथा नकुल-सहदेवसे भी उतना नहीं डरता, जितना कि क्रोधसे तमतमाये हुए राजा युधिष्ठिरके कोपसे। उनके रोषसे मैं सदा ही अत्यन्त भयभीत रहता हूँ; क्योंकि वे महान् तपस्वी और ब्रह्मचर्यसे सम्पन्न हैं, इसलिये उनके मनमें जो संकल्प होगा, वह सिद्ध होकर ही रहेगा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ଛଳରେ ଠକାଯାଇଥିବା ଉଚ୍ଚମନା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଯଦି ସତ୍ୟସତ୍ୟ କ୍ରୋଧିତ ହୁଅନ୍ତି, ତେବେ ସମସ୍ତ ଧାର୍ତ୍ତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ ଭସ୍ମ କରିଦେଇପାରିବେ। ଅର୍ଜୁନ, ବାସୁଦେବ (କୃଷ୍ଣ), ଭୀମ କିମ୍ବା ଯମଜ ଭାଇମାନଙ୍କଠାରୁ ମୁଁ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ କୋପକୁ ଅଧିକ ଭୟ କରେ। ତାଙ୍କ ରୋଷ ତପୋବଳ ଓ ଅଚଳ ସଂଯମରେ ଭିତ୍ତିକୃତ; ଏମିତି ପୁରୁଷଙ୍କ ସଂକଳ୍ପ ନିଶ୍ଚୟ ସିଦ୍ଧ ହୁଏ।
Verse 35
यथा राज्ञ: क्रोधदीप्तस्य सूत मन्योरहं भीततर: सदैव । महातपा ब्रह्मचर्येण युक्त: संकल्पो5यं मानसस्तस्य सिद्धयेत्,मुझे तो अर्जुन इन्द्रके समान प्रतीत होते हैं और वृष्णिवीर श्रीकृष्ण सनातन विष्णु जान पड़ते हैं। कुन्तीनन्दन पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर धर्माचरणमें ही सुख मानते हैं। वे लज्जाशील और बलशाली हैं। उनके मनमें किसीके प्रति कभी शत्रुभाव नहीं पैदा हुआ है। नहीं तो वे मनस्वी युधिष्ठिर दुर्योधनके द्वारा छल-कपटके शिकार होनेपर क्रोध करके मेरे सभी पुत्रोंको जलाकर भस्म कर देते। संजय! मैं अर्जुन, भगवान् श्रीकृष्ण, भीमसेन तथा नकुल-सहदेवसे भी उतना नहीं डरता, जितना कि क्रोधसे तमतमाये हुए राजा युधिष्ठिरके कोपसे। उनके रोषसे मैं सदा ही अत्यन्त भयभीत रहता हूँ; क्योंकि वे महान् तपस्वी और ब्रह्मचर्यसे सम्पन्न हैं, इसलिये उनके मनमें जो संकल्प होगा, वह सिद्ध होकर ही रहेगा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ସୂତ! ସେଇ ରାଜାଙ୍କ କ୍ରୋଧ ଯେତେବେଳେ ଜ୍ୱଳନ୍ତ ହୁଏ, ମୁଁ ସଦା ତାଙ୍କ ରୋଷକୁ ଅଧିକ ଭୟ କରେ। ସେ ମହାତପସ୍ବୀ ଓ ବ୍ରହ୍ମଚର୍ୟରେ ଯୁକ୍ତ; ତେଣୁ ତାଙ୍କ ମନସ୍ଥ ସଂକଳ୍ପ ନିଶ୍ଚୟ ସିଦ୍ଧ ହୁଏ।
Verse 36
तस्य क्रोधं संजयाहं समीक्ष्य स्थाने जानन् भृशमस्म्यद्य भीत: । स गच्छ शीघ्र प्रहितो रथेन पाञ्चालराजस्य चमूनिवेशनम्,संजय! मैं उनके क्रोधको देखकर और उसे उचित जानकर आज बहुत डरा हुआ हूँ। मेरे द्वारा भेजे हुए तुम रथपर बैठकर शीघ्र ही पांचालराज ट्रुपदकी छावनीमें जाकर वहाँ अत्यन्त प्रेमपूर्वक अजातशत्रु युधिष्ठिरसे वार्तालाप करना और बारंबार उनका कुशल-मंगल पूछना। तात! तुम बलवानोंमें श्रेष्ठ महाभाग भगवान् श्रीकृष्णसे भी मिलकर मेरी ओरसे उनका कुशल-समाचार पूछना और यह बताना कि धुृतराष्ट्र पाण्डवोंके साथ शान्तिपूर्ण बर्ताव चाहते हैं। सूत! कुन्तीकुमार युधिष्ठिर भगवान् श्रीकृष्णाकी कोई भी बात टाल नहीं सकते
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସଞ୍ଜୟ! ତାଙ୍କ କ୍ରୋଧକୁ ଦେଖି ଏବଂ ତାହା ଯଥାଯଥ ବୋଲି ଜାଣି, ମୁଁ ଆଜି ଅତ୍ୟନ୍ତ ଭୟଭୀତ। ତେଣୁ ମୋ ପକ୍ଷରୁ ପ୍ରେରିତ ହୋଇ ତୁମେ ରଥରେ ଚଢ଼ି ଶୀଘ୍ର ପାଞ୍ଚାଳରାଜଙ୍କ ସେନାଶିବିରକୁ ଯାଅ।
Verse 37
अजातशशतन्रुं कुशलं सम पृच्छे: पुन: पुनः प्रीतियुक्त वदेस्त्वम् । जनार्दनं चापि समेत्य तात महामात्र वीर्यवतामुदारम्,संजय! मैं उनके क्रोधको देखकर और उसे उचित जानकर आज बहुत डरा हुआ हूँ। मेरे द्वारा भेजे हुए तुम रथपर बैठकर शीघ्र ही पांचालराज ट्रुपदकी छावनीमें जाकर वहाँ अत्यन्त प्रेमपूर्वक अजातशत्रु युधिष्ठिरसे वार्तालाप करना और बारंबार उनका कुशल-मंगल पूछना। तात! तुम बलवानोंमें श्रेष्ठ महाभाग भगवान् श्रीकृष्णसे भी मिलकर मेरी ओरसे उनका कुशल-समाचार पूछना और यह बताना कि धुृतराष्ट्र पाण्डवोंके साथ शान्तिपूर्ण बर्ताव चाहते हैं। सूत! कुन्तीकुमार युधिष्ठिर भगवान् श्रीकृष्णाकी कोई भी बात टाल नहीं सकते
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସଞ୍ଜୟ! ଅଜାତଶତ୍ରୁ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ କୁଶଳ ମଙ୍ଗଳ ପୁନଃପୁନଃ ପଚାରିବୁ, ଏବଂ ପ୍ରୀତିସହ କଥା କହିବୁ। ଆଉ, ପୁତ୍ର! ଜନାର୍ଦ୍ଦନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଭେଟି— ଯିଏ ଉଦାର, ପରାକ୍ରମୀ ଓ ବଳବାନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅଗ୍ରଗଣ୍ୟ— ତାଙ୍କ କୁଶଳ ମଧ୍ୟ ପଚାରିବୁ।
Verse 38
अनामयं मद्वचनेन पृच्छे- र्धतराष्ट्र: पाण्डवै: शान्तिमीप्सु: । न तस्य किंचिद् वचन न कुर्यात् कुन्तीपुत्रो वासुदेवस्य सूत,संजय! मैं उनके क्रोधको देखकर और उसे उचित जानकर आज बहुत डरा हुआ हूँ। मेरे द्वारा भेजे हुए तुम रथपर बैठकर शीघ्र ही पांचालराज ट्रुपदकी छावनीमें जाकर वहाँ अत्यन्त प्रेमपूर्वक अजातशत्रु युधिष्ठिरसे वार्तालाप करना और बारंबार उनका कुशल-मंगल पूछना। तात! तुम बलवानोंमें श्रेष्ठ महाभाग भगवान् श्रीकृष्णसे भी मिलकर मेरी ओरसे उनका कुशल-समाचार पूछना और यह बताना कि धुृतराष्ट्र पाण्डवोंके साथ शान्तिपूर्ण बर्ताव चाहते हैं। सूत! कुन्तीकुमार युधिष्ठिर भगवान् श्रीकृष्णाकी कोई भी बात टाल नहीं सकते
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ମୋ ନାମରେ ତାଙ୍କ କୁଶଳ ପଚାରିବୁ। ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ଶାନ୍ତି ଚାହାନ୍ତି। ହେ ସୂତ! କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ବାସୁଦେବଙ୍କ କୌଣସି ବଚନକୁ ଅବହେଳା କରିବେ ନାହିଁ।
Verse 39
प्रियश्वैधामात्मसमश्न कृष्णो विद्वांश्रैषां कर्मणि नित्ययुक्त: । समानीतान् पाण्डवान् सृंजयांश्न जनार्दनं युयुधानं विराटम्
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସମସ୍ତଙ୍କ ପ୍ରିୟ, ସମସ୍ତ ଭୂତପ୍ରାଣୀ ପ୍ରତି ସମଦୃଷ୍ଟିଶୀଳ, ଏବଂ ଶ୍ରେୟସ୍କର କର୍ମରେ ସଦା ନିଷ୍ଠାବାନ କୃଷ୍ଣ ପାଣ୍ଡବ ଓ ସୃଞ୍ଜୟମାନଙ୍କୁ ଏକତ୍ର କଲେ; ଏବଂ ଜନାର୍ଦନ, ଯୁଯୁଧାନ ଓ ରାଜା ବିରାଟଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ସହିତ ଡାକିଲେ।
Verse 40
अनामयं मद्वचनेन पृच्छे: सर्वास्तथा द्रौपदेयांश्व॒ पञ्च । यद् यत् तत्र प्राप्तकालं परेभ्य- स्त्वं मन्येथा भारतानां हितं च | तद् भाषेथा: संजय राजमध्ये न मूर्च्ईयेद् यन्न च युद्धहेतु:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ମୋର ସନ୍ଦେଶ ସହିତ ସମସ୍ତଙ୍କ କୁଶଳ ପଚାର; ବିଶେଷକରି ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କ ପାଞ୍ଚ ପୁତ୍ରଙ୍କର। ଏବଂ ସେଠାରେ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଯାହାକୁ ତୁମେ ସମୟୋଚିତ ଭାବ, ଓ ଭାରତମାନଙ୍କ ହିତକର ଭାବ, ସେହି କଥା, ସଞ୍ଜୟ, ରାଜସଭା ମଧ୍ୟରେ କହ; କିନ୍ତୁ ଏମିତି କହ, ଯେ ରାଜା ହୃଦୟଭଙ୍ଗ ନ କରନ୍ତୁ, ଓ ତୁମ ବାକ୍ୟ ଯୁଦ୍ଧର ହେତୁ ନ ହେଉ।”
The implicit dilemma is whether a ruler can credibly pursue peace while acknowledging—through intelligence and deterrence logic—that refusal of equitable settlement may trigger unavoidable escalation; the chapter balances conciliatory intent with strategic realism.
Speech and messaging are strategic instruments: an envoy must verify, greet, and communicate in ways that preserve dignity and reduce the probability of conflict, especially when opposing coalitions are strong and emotionally primed.
No explicit phalaśruti appears in the provided passage; the meta-level significance is functional—this chapter serves as a narrative brief that frames subsequent diplomacy by documenting perceived capabilities, alliances, and the urgency of de-escalatory communication.