Adhyaya 21
Udyoga ParvaAdhyaya 2121 Versesयुद्ध आरम्भ नहीं; कूटनीतिक चरण में तनाव बढ़ रहा है, संधि-प्रयास बनाम हठ की खींचतान स्पष्ट।

Adhyaya 21

Udyoga Parva 21 — Bhīṣma’s Conciliatory Counsel, Karṇa’s Rebuttal, and Dhṛtarāṣṭra Sends Sañjaya (भीष्म-कर्ण-विवादः; संजय-प्रेषणम्)

Upa-parva: Dūtavākyāni (Embassy Discourses) — Kuru-sabhā deliberations preceding Sañjaya’s mission

Vaiśaṃpāyana reports Bhīṣma’s response to prior remarks in the Kuru assembly. Bhīṣma begins with auspicious acknowledgment of the Pāṇḍavas’ welfare and their orientation toward dharma, emphasizing their preference for settlement over conflict. He affirms that the Pāṇḍavas have endured hardship yet remain entitled to their paternal inheritance by lawful principle. Bhīṣma then underscores Arjuna’s martial capacity, presenting a deterrence argument: an engagement against Dhanaṃjaya is strategically imprudent. Karṇa interrupts with a sharper counter-position, rejecting repeated cautions and reframing the dispute through the dice-game precedent and the exile term; he implies that the Pāṇḍavas’ claims are procedurally barred and that reliance on allies (Matsya and Pāñcāla) should not compel concessions. Bhīṣma rebukes Karṇa by recalling Arjuna’s demonstrated prowess and warns of likely defeat if prudent counsel is ignored. Dhṛtarāṣṭra then endorses Bhīṣma’s statement as beneficial for the Kurus and for broader stability, and resolves to send Sañjaya as envoy to the Pāṇḍavas, formally commissioning him in the assembly.

Chapter Arc: हस्तिनापुर की सभा में बीते तेरह वर्षों (बारह वर्ष वनवास + एक वर्ष अज्ञातवास) की गणना और उसके धर्मसम्मत पूर्ण होने का स्मरण होते ही प्रश्न उठता है—अब राज्य किसका, और शान्ति किसकी? → धृतराष्ट्र के निकट यह समाचार और विचार गूँजते हैं कि पाण्डव क्लेश सहकर भी धर्मतः पिता का धन पाने के अधिकारी हैं; साथ ही यह भी कि वे संधि चाहते हैं, युद्ध नहीं। परन्तु दुर्योधन-शकुनि की पुरानी कूटनीति (जुए द्वारा वनवास) स्मृति बनकर सभा में अविश्वास और भय बढ़ाती है। → सभा के बीच धृतराष्ट्र संजय को बुलाकर निर्णायक वाक्य कहता है—पाण्डवों के पास दूत बनाकर जाओ; उनके भाव, संधि की शर्तें और युद्ध की सम्भावना का सत्य लौटाकर लाओ। → ब्राह्मणों/पुरोहितों का सत्कार कर उन्हें पाण्डवों की ओर विदा करने के बाद, धृतराष्ट्र राजकीय स्तर पर संवाद का मार्ग चुनता है और संजय-यान की तैयारी करता है—कम से कम औपचारिक रूप से शान्ति का द्वार खुला रहता है। → संजय का प्रस्थान तय है; अब प्रश्न यह है कि पाण्डव क्या उत्तर देंगे—और क्या हस्तिनापुर उस उत्तर को स्वीकार करेगा?

Shlokas

Verse 1

नीपस्न्नगा हज न्ि््श्िन्य्य - बारह वर्षका वनवास एवं एक वर्षका अज्ञातवास दोनों मिलाकर तेरह वर्ष समझने चाहिये। > यहाँ अनेक रूपधारी शब्दका यह तात्पर्य है कि अर्जुन इतने वेगसे युद्ध करते थे कि वे रणभूमिमें अनेक-से दिखायी देते थे। द्रोणपर्वके ८९ वें अध्यायमें युद्धके प्रसंगमें ऐसा वर्णन भी मिलता है-- अयं पार्थ: कुतः पार्थ एष पार्थ इति प्रभो । तव सैन्येषु योधानां पार्थभूतमिवाभवत्‌ ।। अन्योन्यमपि चाजघ्नुरात्मानमपि चापरे । पार्थभूतममन्यन्त जगत्‌ कालेन मोहिता: ।। महाराज! आपके सैनिकोंको सब ओर अर्जुन-ही-अर्जुन दिखायी देते थे। वे बार-बार “अर्जुन यह है, अर्जुन कहाँ है? अर्जुन वह खड़ा है” इस प्रकार चिल्ला उठते थे। इस भ्रममें पड़कर उनमेंसे कोई-कोई तो आपसमें और कोई अपनेपर ही प्रहार कर बैठते थे। उस समय कालके वशीभूत हो वे सारे संसारको अर्जुनमय ही देखने लगे थे। एकविशो< ध्याय: भीष्मके द्वारा द्रुपदके पुरोहितकी बातका समर्थन करते हुए अर्जुनकी प्रशंसा करना, इसके विरुद्ध कर्णके आक्षेपपूर्ण वचन तथा धुृतराष्ट्रद्वारा भीष्मकी बातका समर्थन करते हुए दूतको सम्मानित करके विदा करना वैशम्पायन उवाच तस्य तद्‌ वचन श्रुत्वा प्रज्ञावृद्धों महाद्युति: । सम्पूज्यैनं यथाकालं भीष्मो वचनमबत्रवीत्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! पुरोहितकी यह बात सुनकर बुद्धिमें बढ़े-चढ़े महातेजस्वी भीष्मने समयके अनुरूप उनकी पूजा करके इस प्रकार कहा-- अ-४#--कात द्ाविशोद्ध्याय: धृतराष्ट्रका संजयसे पाण्डवोंके प्रभाव और प्रतिभाका वर्णन करते हुए उसे संदेश देकर पाण्डवोंके पास भेजना धृतराष्ट्र रवाच प्राप्तानाहु: संजय पाण्डुपुत्रा- नुपप्लव्ये तान्‌ विजानीहि गत्वा । अजातशत्रुं च सभाजयेथा दिष्ट्या55नहा स्थानमुपस्थितस्त्वम्‌

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେହି କଥା ଶୁଣି ପ୍ରଜ୍ଞାରେ ପକ୍ୱ, ମହାତେଜସ୍ବୀ ଭୀଷ୍ମ ସମୟୋଚିତ ଭାବେ ତାଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ କରି ପରେ ପ୍ରତିଉତ୍ତର ଦେଲେ।

Verse 2

दिष्ट्या कुशलिन: सर्वे सह दामोदरेण ते । दिष्ट्या सहायवन्तश्न दिष्ट्या धर्मे च ते रता:,“ब्रह्म! सब पाण्डव भगवान्‌ श्रीकृष्णके साथ सकुशल हैं, यह सौभाग्यकी बात है। उनके बहुत-से सहायक हैं और वे धर्ममें भी तत्पर हैं, यह और भी सौभाग्य तथा हर्षका विषय है

ଦାମୋଦର (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ସହ ସେମାନେ ସମସ୍ତେ କୁଶଳରେ ଅଛନ୍ତି—ଏହା ସୌଭାଗ୍ୟ। ସେମାନଙ୍କର ଅନେକ ସହାୟ ଅଛନ୍ତି—ଏହା ମଧ୍ୟ ସୌଭାଗ୍ୟ; ଏବଂ ସେମାନେ ଧର୍ମରେ ରତ—ଏହା ତ ଅଧିକ ହର୍ଷଦାୟକ ସୌଭାଗ୍ୟ।

Verse 3

दिष्ट्या च संधिकामास्ते भ्रातर: कुरुनन्दना: । दिष्ट्या न युद्धमनस: पाण्डवा: सह बान्धवै:,“कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले पाँचों भाई पाण्डव सन्धिकी इच्छा रखते हैं, यह सौभाग्यका विषय है। वे अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ युद्धमें मन नहीं लगा रहे हैं, यह भी सौभाग्यकी बात है

କୁରୁବଂଶକୁ ଆନନ୍ଦିତ କରୁଥିବା ସେହି ଭାଇମାନେ ସନ୍ଧି ଚାହୁଁଛନ୍ତି—ଏହା ସୌଭାଗ୍ୟ। ପାଣ୍ଡବମାନେ ବନ୍ଧୁ-ବାନ୍ଧବମାନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧରେ ମନ ଦେଉନାହାନ୍ତି—ଏହା ମଧ୍ୟ ସୌଭାଗ୍ୟ।

Verse 4

भवता सत्यमुक्तं तु सर्वमेतन्न संशय: । अतितीक्षणं तु ते वाक्यं ब्राह्मण्यादिति मे मति:,“आपने जितनी बातें कही हैं, वे सब सत्य है; इसमें संशय नहीं है। परंतु आपकी बातें बड़ी तीखी हैं। यह तीक्ष्णता ब्राह्मण-स्वभावके कारण ही है, ऐसा मुझे प्रतीत होता है

ଆପଣ କହିଥିବା ସବୁ କଥା ସତ୍ୟ—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ। କିନ୍ତୁ ଆପଣଙ୍କ ବାକ୍ୟ ଅତ୍ୟନ୍ତ ତୀକ୍ଷ୍ଣ; ମୋ ମତରେ ଏହି ତୀକ୍ଷ୍ଣତା ଆପଣଙ୍କ ବ୍ରାହ୍ମଣ୍ୟ-ସ୍ୱଭାବରୁ ଉଦ୍ଭବ।

Verse 5

असंशयं क्लेशितास्ते वने चेह च पाण्डवा: । प्राप्ताश्न धर्मतः सर्व पितुर्धनमसंशयम्‌,“निस्संदेह पाण्डवोंको वनमें और यहाँ भी कष्ट उठाना पड़ा है। उन्हें धर्मतः अपनी सारी पैतृक सम्पत्ति पानेका अधिकार प्राप्त हो चुका है; इसमें भी कोई संशय नहीं है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ନିଶ୍ଚୟ ପାଣ୍ଡବମାନେ ବନରେ ମଧ୍ୟ ଏଠାରେ ମଧ୍ୟ କ୍ଲେଶ ଭୋଗ କରିଛନ୍ତି। ଧର୍ମାନୁସାରେ ପିତୃଧନର ସମଗ୍ର ଅଂଶ ଉପରେ ତାଙ୍କର ନିର୍ବିବାଦ ଅଧିକାର ସ୍ଥାପିତ ହୋଇଛି; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।

Verse 6

किरीटी बलवान पार्थ: कृतास्त्रश्न महारथ: । को हि पाण्डुसुतं युद्धे विषहेत धनंजयम्‌,“कुन्तीपुत्र किरीटधारी महारथी अर्जुन बलवान्‌ तथा अस्त्रविद्यामें निपुण हैं। कौन ऐसा वीर है, जो युद्धमें पाण्डुपुत्र अर्जुनका वेग सह सके?

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କିରୀଟଧାରୀ ପାର୍ଥ ଅର୍ଜୁନ ବଳବାନ, ଅସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟାରେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ପ୍ରଶିକ୍ଷିତ ଏବଂ ମହାରଥୀ। ଯୁଦ୍ଧରେ ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ର ଧନଞ୍ଜୟଙ୍କ ବେଗ କିଏ ସହିପାରିବ?

Verse 7

अपि वज्रधर: साक्षात्‌ किमुतान्ये धनुर्भुतः । त्रयाणामपि लोकानां समर्थ इति मे मति:,'साक्षात्‌ वज्रधारी इन्द्र भी युद्धमें उनका सामना नहीं कर सकते; फिर दूसरे धनुर्धरोंकी बात ही क्‍या है? मेरा तो ऐसा विश्वास है कि अर्जुन तीनों लोकोंका सामना करनेमें समर्थ हैं!

ସାକ୍ଷାତ୍ ବଜ୍ରଧାରୀ ଇନ୍ଦ୍ର ମଧ୍ୟ ଯୁଦ୍ଧରେ ତାଙ୍କ ସମ୍ମୁଖୀନ ହୋଇପାରିବେ ନାହିଁ; ତେବେ ଅନ୍ୟ ଧନୁର୍ଧରମାନଙ୍କ କଥା କ’ଣ! ମୋ ମତରେ ଅର୍ଜୁନ ତିନି ଲୋକକୁ ମଧ୍ୟ ସମ୍ମୁଖୀନ କରିବାକୁ ସମର୍ଥ।

Verse 8

भीष्मे ब्रुवति तद्‌ वाक्य धृष्टमाक्षिप्य मन्युना । दुर्योधनं समालोक्य कर्णो वचनमब्रवीत्‌,भीष्मजी इस प्रकार कह ही रहे थे कि कर्णने दुर्योधनकी ओर देखकर क्रोधसे धृष्टतापूर्वक आक्षेप करते हुए (भीष्मजीके कथनकी अवहेलना करके) यह बात कही --[

ଭୀଷ୍ମ ଏହି କଥା କହୁଥିବାବେଳେ, କର୍ଣ୍ଣ କ୍ରୋଧରେ ଧୃଷ୍ଟତାପୂର୍ବକ ଆକ୍ଷେପ କରି ମଧ୍ୟରେ ଅଟକାଇଲା। ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ଦେଖି, ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ଉପଦେଶକୁ ଅବହେଳା କରି, ସେ ଏହି କଥା କହିଲା।

Verse 9

६... न तत्राविदितं ब्रहाँल्‍लोके भूतेन केनचित्‌ । पुनरुक्तेन कि तेन भाषितेन पुनः पुनः,“ब्रह्मन] इस लोकमें जो घटना बीत चुकी है, वह किसीको अज्ञात नहीं है, उसको दोहरानेसे या बारंबार उसपर भाषण देनेसे क्या लाभ है?

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲା—ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ! ଏହି ଲୋକରେ ଯାହା ଘଟିଗଲା, ତାହା କାହା ପାଖରେ ଅଜଣା ନୁହେଁ। ତାହାକୁ ପୁନରୁକ୍ତି କରିବାରେ କିମ୍ବା ବାରମ୍ବାର ସେଥିପାଇଁ କହିବାରେ କ’ଣ ଲାଭ?

Verse 10

दुर्योधनार्थे शकुनिर्ययूते निर्जितवान्‌ पुरा । समयेन गतो<रण्यं पाण्डुपुत्रो युधिष्ठिर:,“पहलेकी बात है, शकुनिने दुर्योधनके लिये पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको द्यूत-क्रीड़ामें परास्त किया था और वे उस जूएकी शर्तके अनुसार वनमें गये थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ପୂର୍ବେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ହିତରେ ଶକୁନି ଦ୍ୟୂତରେ କପଟ କରି ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ପରାଜିତ କରିଥିଲା। ସେହି ପଣର ସମୟ-ନିୟମର ବନ୍ଧନରୁ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ତେବେ ବନକୁ ଗଲେ॥

Verse 11

स तं समयम॒श्रित्य राज्यं नेच्छति पैतृकम्‌ । बलमाश्रित्य मत्स्यानां पज्चालानां च मूर्खवत्‌,'युधिष्ठिर उस शर्तका पालन करके अपना पैतृक राज्य चाहते हों, ऐसी बात नहीं है। वे तो मूर्खोकी भाँति मत्स्य और पांचाल देशकी सेनाके भरोसे राज्य लेना चाहते हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେ ଏହି ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ସମୟ-ଶର୍ତ୍ତକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ପୈତୃକ ରାଜ୍ୟ ସତ୍ୟସତ୍ୟ ଚାହୁଁନାହିଁ। ମୂର୍ଖ ପରି ମତ୍ସ୍ୟ ଓ ପାଞ୍ଚାଳଙ୍କ ସେନାବଳରେ ଭରସା କରି ରାଜ୍ୟ ଦଖଲ କରିବାକୁ ଚାହେ॥

Verse 12

दुर्योधनो भयाद्‌ विद्वन्‌ न दद्यात्‌ पादमन्तत: । धर्मतस्तु महीं कृत्स्नां प्रदद्याच्छत्रवेडषपि च,“विद्वन! दुर्योधन किसीके भयसे अपने राज्यका आधा कौन कहे चौथाई भाग भी नहीं देंगे; परंतु धर्मानुसार तो वे शत्रुको भी समूची पृथ्वीतक दे सकते हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ବିଦ୍ୱାନ! ଭୟରୁ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ରାଜ୍ୟର ଚତୁର୍ଥାଂଶ ତ ଦୂର, ପାଦମାତ୍ର ଭୂମି ମଧ୍ୟ ଦେବେ ନାହିଁ। କିନ୍ତୁ ଧର୍ମମାର୍ଗରେ ଚାଲିଲେ ସେ ଶତ୍ରୁକୁ ମଧ୍ୟ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀ ଦେଇପାରେ॥

Verse 13

यदि काडुश्षन्ति ते राज्यं पितृपैतामहं पुन: । यथाप्रतिज्ञं काल॑ तं चरन्तु वनमाश्रिता:,“यदि पाण्डव अपने बाप-दादोंका राज्य लेना चाहते हैं तो पूर्व-प्रतिज्ञाके अनुसार उतने समयतक पुनः वनमें निवास करें

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯଦି ପାଣ୍ଡବମାନେ ପିତୃ-ପୈତାମହିକ ରାଜ୍ୟ ପୁନଃ ଚାହାନ୍ତି, ତେବେ ପୂର୍ବ ପ୍ରତିଜ୍ଞାନୁସାରେ ସେହି ସମୟ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ବନବାସ କରନ୍ତୁ॥

Verse 14

ततो दुर्योधनस्याड्के वर्तन्तामकुतो भया: । अधार्मिकीं तु मा बुद्धि मौख्यात्‌ कुर्वन्तु केवलात्‌,“तत्पश्चात्‌ वे दुर्योधनके आश्रयमें निर्भय होकर रह सकते हैं। केवल मूर्खतावश वे अपनी बुद्धिको अधर्मपरायण न बनावें

ତା’ପରେ ସେମାନେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ଆଶ୍ରୟରେ ସମସ୍ତ ଦିଗରୁ ନିର୍ଭୟ ହୋଇ ରହୁନ୍ତୁ। କିନ୍ତୁ କେବଳ ମୂର୍ଖତାରୁ ନିଜ ବୁଦ୍ଧିକୁ ଅଧର୍ମପଥେ ନ ଘୁଞ୍ଚାନ୍ତୁ॥

Verse 15

अथ ते धर्ममुत्सृज्य युद्धमिच्छन्ति पाण्डवा: । आसट्येमान्‌ कुरुश्रेष्ठान्‌ स्मरिष्यन्ति वचो मम

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯଦି ପାଣ୍ଡବମାନେ ଧର୍ମପଥ ତ୍ୟାଗ କରି ଯୁଦ୍ଧ ଇଚ୍ଛା କରନ୍ତି, ତେବେ ଏହି କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠମାନେ (ଅସତ୍ୟ ଆଚରଣ କରି) ମୋ କଥା ସ୍ମରଣ କରିବେ।

Verse 16

“यदि पाण्डव धर्मको त्यागकर युद्ध ही करना चाहते हैं तो इन कुरुश्रेष्ठ वीरोंसे भिड़नेपर मेरी बात याद करेंगे” ।। भीष्म उवाच कि नु राधेय वाचा ते कर्म तत्‌ स्मर्तुमहसि । एक एव यदा पार्थ: षड्रथाञ्जितवान्‌ युधि,भीष्मजी बोले--राधानन्दन! तू जो इस प्रकार बढ़-बढ़कर बातें बनाता है, इससे क्या होगा? तुझे पार्थका वह पराक्रम याद करना चाहिये, जब कि विराटनगरके युद्धमें उन्होंने अकेले ही सम्पूर्ण सेनासहित छ: अतिरथियोंकोी जीत लिया था

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ରାଧେୟ! ତୋର ଏହି ଗର୍ବୋକ୍ତିରୁ କ’ଣ ଲାଭ? ଯୁଦ୍ଧରେ ପାର୍ଥ ଏକାକୀ ଛଅ ମହାରଥୀଙ୍କୁ ଜିତିଥିବା ସେ କର୍ମ ସ୍ମରଣ କର।

Verse 17

बहुशो जीयमानस्य कर्म दृष्टं तदैव ते । न चेदेवं करिष्यामो यदयं ब्राह्मणो5ब्रवीत्‌ । ध्रुवं युधि हतास्तेन भक्षयिष्याम पांसुकान्‌,तेरा पराक्रम तो उसी समय देखा गया था, जब कि अनेक बार उनके सामने जाकर तुझे परास्त होना पड़ा। इन ब्राह्मणदेवताने जो कुछ कहा है, यदि हमलोग तदनुसार कार्य नहीं करेंगे तो यह निश्चय है कि युद्धमें पाण्डुनन्दन अर्जुनके हाथसे आहत होकर हमें धूल खानी पड़ेगी

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ତୋର ପରାକ୍ରମ ତ ସେତେବେଳେ ଦେଖାଗଲା, ଯେତେବେଳେ ତୁ ତାଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ବାରମ୍ବାର ପରାଜିତ ହେଲୁ। ଏହି ବ୍ରାହ୍ମଣ ଯାହା କହିଛନ୍ତି, ତାହାନୁସାରେ ଆମେ ନ ଚାଲିଲେ, ଯୁଦ୍ଧରେ ତାଙ୍କ ହାତରେ ହତ ହୋଇ ନିଶ୍ଚୟ ଧୂଳି ଖାଇବାକୁ ପଡିବ।

Verse 18

वैशम्पायन उवाच धृतराष्ट्रस्ततो भीष्ममनुमान्य प्रसाद्य च | अवभर्त्स्य च राधेयमिदं वचनमत्रवीत्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर धुृतराष्ट्रने कर्णको डाँटकर भीष्मजीका सम्मान किया और उन्हें राजी करके इस प्रकार कहा--

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ସମ୍ମାନ ଦେଇ ପ୍ରସନ୍ନ କଲେ, ଏବଂ ରାଧେୟ (କର୍ଣ୍ଣ)ଙ୍କୁ ତିରସ୍କାର କରି ଏହି କଥା କହିଲେ।

Verse 19

अस्मद्धितं वाक्यमिदं भीष्म: शान्तनवोडब्रवीत्‌ | पाण्डवानां हित॑ चैव सर्वस्य जगतस्तथा,'शान्तनुनन्दन भीष्मने हमारे लिये यह हितकर बात कही है। इसमें पाण्डवोंका तथा सम्पूर्ण जगत्‌का भी हित है

ଶାନ୍ତନୁନନ୍ଦନ ଭୀଷ୍ମ ଏହି କଥା ଆମ ହିତ ପାଇଁ କହିଛନ୍ତି; ଏଥିରେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ହିତ ମଧ୍ୟ ଅଛି, ଏବଂ ସମଗ୍ର ଜଗତର ମଙ୍ଗଳ ମଧ୍ୟ।

Verse 20

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत संजययानपर्वमें पुरोहितका यात्राविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,चिन्तयित्वा तु पार्थेभ्य: प्रेषयिष्यामि संजयम्‌ । स भवान्‌ प्रति यात्वद्य पाण्डवानेव मा चिरम्‌ “ब्रह्म! अब मैं कुछ सोच-विचारकर पाण्डवोंके पास संजयको भेजूँगा। आप पुनः पाण्डवोंके पास ही पधारें, विलम्ब न करें”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ଚିନ୍ତା କରି ପୃଥାପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ସଞ୍ଜୟଙ୍କୁ ପଠାଇବି। ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ! ଆପଣ ମଧ୍ୟ ଆଜିହିଁ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ଫେରନ୍ତୁ; ବିଳମ୍ବ କରନ୍ତୁ ନାହିଁ।”

Verse 21

स तं सत्कृत्य कौरव्य: प्रेषयामास पाण्डवान्‌ । सभामध्ये समाहूय संजयं वाक्यमब्रवीत्‌,तदनन्तर राजा धृतराष्ट्रने उन ब्राह्मणका सत्कार करके उन्हें पाण्डवोंके पास वापस भेजा और सभामें संजयको बुलाकर यह बात कही

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— କୌରବ ରାଜା ତାଙ୍କୁ ସତ୍କାର କରି ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ପଠାଇଦେଲେ। ତାପରେ ସଭାମଧ୍ୟରେ ସଞ୍ଜୟଙ୍କୁ ଡାକି ଏହି କଥା କହିଲେ।

Frequently Asked Questions

Whether the Kurus should prioritize lawful restitution and social stability (acknowledging the Pāṇḍavas’ inheritance-right) or enforce a strict procedural reading of the dice-game and exile terms to deny concessions despite foreseeable harm.

Governance requires disciplined speech and prudent risk appraisal: counsel should integrate dharma (justice and legitimacy) with realistic assessment of capacity and consequences, rather than relying on pride or selective precedent.

No explicit phalaśruti appears here; the chapter’s meta-function is archival and procedural—showing how sabhā counsel and envoy dispatch operate as the epic’s mechanism for testing dharmic settlement before escalation.