Adhyaya 192
Udyoga ParvaAdhyaya 19223 Verses

Adhyaya 192

Śikhaṇḍinī’s Disclosure, Drupada’s Counsel, and the Petition to Yakṣa Sthūṇākarṇa (Udyoga Parva 192)

Upa-parva: Śikhaṇḍinī–Sthūṇākarṇa (Yakṣa) Episode (Udyoga Parva, Bhīṣma-vacana context)

Bhīṣma recounts how Śikhaṇḍinī’s mother discloses the factual circumstances of Śikhaṇḍinī’s birth: due to fear of co-wives and the absence of a son, a daughter was presented as male, a decision earlier accepted in light of a prophetic assurance that she would later become male. Drupada, informed of the full situation, consults advisers on measures appropriate to protecting subjects and preventing civic harm. He attempts to stabilize the marital alliance with Daśārṇa while preparing defensive arrangements and seeking non-violent exit from the looming confrontation. The queen recommends intensified worship, offerings, and strategic reliance on divine favor alongside ministerial planning, arguing that success arises when human effort is paired with auspicious support. Observing her parents’ distress, Śikhaṇḍinī resolves to end the crisis at personal cost and departs for a remote forest feared by the public, guarded by the affluent yakṣa Sthūṇākarṇa. Entering his well-protected dwelling, she undertakes prolonged fasting. The yakṣa appears, offers boons as Kubera’s attendant, and invites her request; Śikhaṇḍinī explains the imminent attack by the powerful Daśārṇa king and petitions protection and the promised transformation into male form—at least until danger passes—so that political retaliation may be averted.

Chapter Arc: दुर्योधन, पाण्डव-सेना की अपारता और सज्जता देखकर भीष्म से पूछता है—यह ‘सेनासागर’ क्या सचमुच जीता जा सकता है? → भीष्म पाण्डवों की सेना का विराट वर्णन करते हैं—भीम-अर्जुन जैसे महाधनुर्धर, धृष्टद्युम्न के नेतृत्व में, लोकपाल-तुल्य रक्षकों से सुरक्षित; यह सेना सागर की तरह अजेय-सी प्रतीत होती है। दुर्योधन की चिंता बढ़ती है और वह आचार्यों से ‘कब और कैसे’ संहार सम्भव है, यह जानना चाहता है। → द्रोण, कृप, अश्वत्थामा और कर्ण—एक-एक कर अपनी-अपनी ‘समय-सीमा’ बताते हैं कि वे कितने दिनों/मासों में पाण्डव-सेना का क्षय कर सकते हैं; कर्ण का गर्वोक्त ‘पाँच दिन’ और उस पर वासुदेव-युक्त रथ में अर्जुन के सामने आने की चुनौती—सभा में वाणी-युद्ध को शिखर पर ले जाती है। → वृद्ध भीष्म भी प्रतिज्ञा-सा करते हैं कि क्षीण प्राणशक्ति के बावजूद अपने शस्त्राग्नि से पाण्डव-वाहिनी को भस्म कर देंगे; पर यह सब ‘आकलन’ और ‘अहंकार’ के रूप में रह जाता है—युद्ध अभी आरम्भ नहीं, केवल मनोबल की माप-तौल है। → कर्ण की डींग और अर्जुन-वासुदेव की जोड़ी का संकेत—आगामी महायुद्ध में निर्णायक टकराव की छाया डाल देता है।

Shlokas

Verse 1

[दाक्षिणात्य अधिक पाठका ह “लोक मिलाकर कुल ७० ६ “लोक हैं।] नशा (0) आज अत न त्रिनवर्त्याधिकशततमोब<् ध्याय: दुर्योधनके पूछनेपर भीष्म आदिके द्वारा अपनी-अपनी शक्तिका वर्णन संजय उवाच प्रभातायां तु शर्वर्या पुनरेव सुतस्तव । मध्ये सर्वस्य सैन्यस्थ पितामहमपृच्छत,संजय कहते हैं--राजन्‌! जब रात बीती और प्रभात हुआ, उस समय आपके पुत्र दुर्योधनने सारी सेनाके बीचमें पुनः पितामह भीष्मसे पूछा--

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ରାଜନ୍! ରାତି ଅତିତ ହୋଇ ପ୍ରଭାତ ହେଲାବେଳେ, ଆପଣଙ୍କ ପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ସମଗ୍ର ସେନାର ମଧ୍ୟରେ ଦାଁଡ଼ି ପୁନର୍ବାର ପିତାମହ ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ପଚାରିଲେ।

Verse 2

पाण्डवेयस्य गाज़ेय यदेतत्‌ सैन्यमुद्यतम्‌ । प्रभूतनरनागाश्चं महारथसमाकुलम्‌,“गंगानन्दन! यह जो पाण्डवोंकी सेना युद्धके लिये उद्यत है। इसमें बहुत-से पैदल, हाथीसवार और घुड़सवार भरे हुए हैं। यह सेना बड़े-बड़े महारथियों एवं उनके विशाल रथोंसे व्याप्त है। लोकपालोंके समान महापराक्रमी एवं महाधनुर्धर भीमसेन, अर्जुन और धृष्टद्युम्न आदि वीर इस सेनाकी रक्षा करते हैं। यह उछलती हुई तरंगोंसे युक्त समुद्रकी भाँति दुर्धर्ष प्रतीत होती है। इसे आगे बढ़नेसे रोकना असम्भव है तथा बड़े-बड़े देवता भी इस महान्‌ युद्धमें इस सैन्य-समुद्रको क्षुब्ध नहीं कर सकते

ଗାଙ୍ଗେୟ! ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଉଦ୍ୟତ ଥିବା ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଏହି ସେନାରେ ପ୍ରଚୁର ପଦାତି, ଗଜ ଓ ଅଶ୍ୱ ଅଛନ୍ତି; ଏହା ମହାରଥୀମାନଙ୍କରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ।

Verse 3

भीमार्जुनप्र भृतिभिममहेष्वासैर्महाबलै: । लोकपालसमैर्गुप्तं घृष्टद्युम्नपुरोगमै:,“गंगानन्दन! यह जो पाण्डवोंकी सेना युद्धके लिये उद्यत है। इसमें बहुत-से पैदल, हाथीसवार और घुड़सवार भरे हुए हैं। यह सेना बड़े-बड़े महारथियों एवं उनके विशाल रथोंसे व्याप्त है। लोकपालोंके समान महापराक्रमी एवं महाधनुर्धर भीमसेन, अर्जुन और धृष्टद्युम्न आदि वीर इस सेनाकी रक्षा करते हैं। यह उछलती हुई तरंगोंसे युक्त समुद्रकी भाँति दुर्धर्ष प्रतीत होती है। इसे आगे बढ़नेसे रोकना असम्भव है तथा बड़े-बड़े देवता भी इस महान्‌ युद्धमें इस सैन्य-समुद्रको क्षुब्ध नहीं कर सकते

ଏହି ସେନା ଭୀମ, ଅର୍ଜୁନ ଆଦି ମହାବଳୀ ମହାଧନୁର୍ଧରମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା—ଲୋକପାଳ ସମାନ—ରକ୍ଷିତ; ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ ଏହାର ଅଗ୍ରଭାଗରେ ଅଛନ୍ତି।

Verse 4

अप्रधृष्यमनावार्यमुद्धूतमिव सागरम्‌ । सेनासागरमक्षोभ्यमपि देवैर्महाहवे,“गंगानन्दन! यह जो पाण्डवोंकी सेना युद्धके लिये उद्यत है। इसमें बहुत-से पैदल, हाथीसवार और घुड़सवार भरे हुए हैं। यह सेना बड़े-बड़े महारथियों एवं उनके विशाल रथोंसे व्याप्त है। लोकपालोंके समान महापराक्रमी एवं महाधनुर्धर भीमसेन, अर्जुन और धृष्टद्युम्न आदि वीर इस सेनाकी रक्षा करते हैं। यह उछलती हुई तरंगोंसे युक्त समुद्रकी भाँति दुर्धर्ष प्रतीत होती है। इसे आगे बढ़नेसे रोकना असम्भव है तथा बड़े-बड़े देवता भी इस महान्‌ युद्धमें इस सैन्य-समुद्रको क्षुब्ध नहीं कर सकते

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଗଙ୍ଗାନନ୍ଦନ! ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସେନା ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଉଦ୍ୟତ; ଉଛଳୁଥିବା ସମୁଦ୍ର ପରି ଦୁର୍ଧର୍ଷ, ଅପ୍ରଧୃଷ୍ୟ ଓ ଅବାର୍ୟ। ଏହା ସେନା-ସମୁଦ୍ର; ମହାଯୁଦ୍ଧରେ ଦେବତାମାନେ ମଧ୍ୟ ଏହାକୁ କ୍ଷୁବ୍ଧ କରିପାରିବେ ନାହିଁ।

Verse 5

केन कालेन गाड़्ेय क्षपयेथा महाद्युते । आचार्यो वा महेष्वास: कृपो वा सुमहाबल:,“महातेजस्वी गंगानन्दन! आप कितने समयमें इस सारी सेनाका विध्वंस कर सकते हैं? महाधनुर्धर द्रोणाचार्य, अत्यन्त बलशाली कृपाचार्य, युद्धकी स्पृहा रखनेवाले कर्ण अथवा द्विजश्रेष्ठ अश्वत्थामा कितने समयमें शत्रुसेनाका संहार कर सकते हैं; क्योंकि मेरी सेनामें आप ही सब लोग दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता हैं

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ମହାଦ୍ୟୁତିମାନ ଗାଙ୍ଗେୟ! କେତେ ସମୟରେ ଆପଣ ଏହି ସମଗ୍ର ସେନାକୁ ଧ୍ୱଂସ କରିପାରିବେ? ମହାଧନୁର୍ଧର ଆଚାର୍ୟ ଦ୍ରୋଣ କିମ୍ବା ଅତିବଳବାନ କୃପ—ସେମାନେ କେତେ ସମୟରେ ଶତ୍ରୁସେନାକୁ ସଂହାର କରିପାରିବେ?

Verse 6

कर्णो वा समरश्लाघी द्रौणिरर्वा द्विजसत्तम: । दिव्यास्त्रविदुष: सर्वे भवन्तो हि बले मम,“महातेजस्वी गंगानन्दन! आप कितने समयमें इस सारी सेनाका विध्वंस कर सकते हैं? महाधनुर्धर द्रोणाचार्य, अत्यन्त बलशाली कृपाचार्य, युद्धकी स्पृहा रखनेवाले कर्ण अथवा द्विजश्रेष्ठ अश्वत्थामा कितने समयमें शत्रुसेनाका संहार कर सकते हैं; क्योंकि मेरी सेनामें आप ही सब लोग दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता हैं

ସମରଶ୍ଲାଘୀ କର୍ଣ୍ଣ ହେଉ କି ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦ୍ରୋଣପୁତ୍ର ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା—ମୋ ସେନାରେ ଆପଣମାନେ ସମସ୍ତେ ଦିବ୍ୟାସ୍ତ୍ରବିଦ।

Verse 7

एतदिच्छाम्यहं ज्ञातुं परं कौतूहलं हि मे । ह्ृदि नित्यं महाबाहो वक्तुमहसि तन्‍्मम,“महाबाहो! मैं यह जानना चाहता हूँ, इसके लिये मेरे हृदयमें सदा अत्यन्त कौतूहल बना रहता है। आप मुझे यह बतानेकी कृपा करें”

ମୁଁ ଏହା ଜାଣିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି; ମୋ ହୃଦୟରେ ଏ ବିଷୟରେ ସଦା ପରମ କୌତୁହଳ ରହେ। ମହାବାହୋ, ଆପଣ ମୋତେ ତାହା କହିବା ଉଚିତ।

Verse 8

भीष्म उवाच अनुरूप कुरुश्रेष्ठ त्वय्येतत्‌ पृथिवीपते । बलाबलममित्राणां तेषां यदिह पृच्छसि,भीष्मजीने कहा--कुरुश्रेष्ठ! पृथ्वीपते! तुम जो यहाँ शत्रुओंके बलाबलके विषयमें पूछ रहे हो, यह तुम्हारे योग्य ही है

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ, ପୃଥିବୀପତି! ଏଠାରେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ବଳାବଳ ବିଷୟରେ ତୁମେ ଯାହା ପଚାରୁଛ, ସେହିଟା ତୁମ ପାଇଁ ଯଥାଯଥ।

Verse 9

शृणु राजन्‌ मम रणे या शक्ति: परमा भवेत्‌ | शस्त्रवीर्य रणे यच्च भुजयोश्व॒ महाभुज,राजन! महाबाहो! युद्धमें जो मेरी सबसे अधिक शक्ति है, मेरे अस्त्र-शस्त्रोंका तथा दोनों भुजाओंका जितना बल है, वह सब बताता हूँ, सुनो

ହେ ରାଜନ୍, ଶୁଣ—ରଣରେ ମୋର ଯେ ପରମ ଶକ୍ତି, ଯୁଦ୍ଧରେ ମୋର ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ରର ବୀର୍ୟ ଓ ମୋର ଦୁଇ ଭୁଜାର ବଳ ଯେତେ, ହେ ମହାବାହୁ, ସେ ସବୁ ମୁଁ ତୁମକୁ କହୁଛି।

Verse 10

आर्जवेनैव युद्धेन योद्धव्य इतरो जन: । मायायुद्धेन मायावी इत्येतद्‌ धर्मनिश्चय:,साधारण लोगोंके साथ सरलभावसे ही युद्ध करना चाहिये। जो लोग मायावी हैं, उनका सामना मायायुद्धसे ही करना चाहिये। यही धर्मशास्त्रोंका निश्चय है

ସାଧାରଣ ଲୋକଙ୍କ ସହ ସରଳ ଓ ଖୋଲା ଯୁଦ୍ଧରେ ଯୁଦ୍ଧ କରିବା ଉଚିତ; କିନ୍ତୁ ଯେ ମାୟାବୀ, ତାହାକୁ ମାୟାଯୁଦ୍ଧରେ ହିଁ ପ୍ରତିଉତ୍ତର ଦେବା ଉଚିତ—ଏହି ଧର୍ମନିଶ୍ଚୟ।

Verse 11

हन्यामहं महाभाग पाण्डवानामनीकिनीम्‌ | दिवसे दिवसे कृत्वा भागं प्रागाह्लिकं मम,महाभाग! मैं प्रतिदिन पाण्डवोंकी सेनाको पहले अपने दैनिक भागमें विभक्त करके उसका वध करूँगा

ହେ ମହାଭାଗ! ମୁଁ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସେନାକୁ ସଂହାର କରିବି। ପ୍ରତିଦିନ ପ୍ରାତଃକାଳେ ମୋର ନିୟତ ଦୈନିକ ଭାଗକୁ ପ୍ରଥମେ ନିର୍ଦ୍ଧାରଣ କରି, ଦିନେ ଦିନେ ମୁଁ ତାଙ୍କୁ ନିହତ କରିବି।

Verse 12

योधानां दशसाहसंं कृत्वा भागं महाद्युते । सहस्र॑ं रथिनामेकमेष भागो मतो मम

ହେ ମହାଦ୍ୟୁତେ! ଦଶହଜାର ଯୋଧାକୁ ଗୋଟିଏ ଭାଗ ଭାବେ ଧରି, ଗୋଟିଏ ରଥୀକୁ ହଜାରଙ୍କ ସମାନ ଗଣିବା—ମୋ ମତରେ ଏହିଏ ଭାଗର ମାପ।

Verse 13

महाद्युते! दस-दस हजार योद्धाओंका तथा एक हजार रथियोंका समूह मेरा एक भाग मानना चाहिये ।। अनेनाहं विधानेन संनद्ध: सततोत्थित: । क्षपयेयं महत्‌ सैन्यं कालेनानेन भारत,भारत! इस विधानसे मैं सदा उद्यत और संनद्ध होकर उस विशाल सेनाको इतने ही समयमें नष्ट कर सकता हूँ

ହେ ମହାଦ୍ୟୁତେ! ଦଶ-ଦଶ ହଜାର ଯୋଧା ଓ ହଜାର ରଥୀଙ୍କ ସମୂହକୁ ମୋର ଗୋଟିଏ ଭାଗ ଭାବେ ମାନିବା ଉଚିତ। ହେ ଭାରତ! ଏହି ବିଧାନରେ ମୁଁ ସଦା ସନ୍ନଦ୍ଧ ଓ ଉଦ୍ୟତ ରହି, ଏହି ନିୟତ କାଳମଧ୍ୟରେ ସେଇ ବିଶାଳ ସେନାକୁ କ୍ଷୟ କରି ନଷ୍ଟ କରିପାରିବି।

Verse 14

मुज्चेयं यदि वास्त्राणि महान्ति समरे स्थित: । शतसाहस््रघातीनि हन्यां मासेन भारत,भारत! यदि मैं युद्धमें स्थित होकर लाखों वीरोंका संहार करनेवाले अपने महान्‌ अस्त्रोंका प्रयोग करने लगूँ तो एक मासमें पाण्डवोंकी सारी सेनाको नष्ट कर सकता हूँ

ହେ ଭାରତ! ଯଦି ମୁଁ ଯୁଦ୍ଧରେ ଦୃଢ଼ଭାବେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହୋଇ, ଶତସହସ୍ରଙ୍କୁ ନିହତ କରିପାରୁଥିବା ମୋର ମହାସ୍ତ୍ରଗୁଡ଼ିକୁ ପ୍ରୟୋଗ କରେ, ତେବେ ଏକ ମାସ ମଧ୍ୟରେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସମଗ୍ର ସେନାକୁ ଧ୍ୱଂସ କରିଦେଇପାରିବି।

Verse 15

संजय उवाच श्रुत्वा भीष्मस्य तद्‌ वाक्‍्यं राजा दुर्योधनस्तत: । पर्यपृच्छत राजेन्द्र द्रोणमज्निरसां वरम्‌,संजय बोले--राजेन्द्र! भीष्मका यह वचन सुनकर राजा दुर्योधनने आंगिरस ब्राह्मणोंमें सबसे श्रेष्ठ द्रोणाचार्यससे पूछा--“आचार्य/ आप कितने समयमें पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके सैनिकोंका संहार कर सकते हैं?” यह प्रश्न सुनकर द्रोणाचार्य हँसते हुए-से बोले --

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ସେହି ବଚନ ଶୁଣି ରାଜା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍ ଆଙ୍ଗିରସ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦ୍ରୋଣାଚାର୍ଯ୍ୟଙ୍କୁ ପ୍ରଶ୍ନ କଲେ।

Verse 16

आचार्य केन कालेन पाण्डुपुत्रस्य सैनिकान्‌ | निहन्या इति तं द्रोण: प्रत्युवाच हसन्निव,संजय बोले--राजेन्द्र! भीष्मका यह वचन सुनकर राजा दुर्योधनने आंगिरस ब्राह्मणोंमें सबसे श्रेष्ठ द्रोणाचार्यससे पूछा--“आचार्य/ आप कितने समयमें पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके सैनिकोंका संहार कर सकते हैं?” यह प्रश्न सुनकर द्रोणाचार्य हँसते हुए-से बोले --

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଦ୍ରୋଣାଚାର୍ଯ୍ୟଙ୍କୁ ପଚାରିଲେ—“ଆଚାର୍ଯ୍ୟ! ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ର (ଯୁଧିଷ୍ଠିର)ଙ୍କ ସେନାନୀମାନଙ୍କୁ ଆପଣ କେତେ ସମୟରେ ନିହତ କରିପାରିବେ?” ଏହା ଶୁଣି ଦ୍ରୋଣ ହସିବା ପରି କରି ପ୍ରତ୍ୟୁତ୍ତର ଦେଲେ।

Verse 17

स्थविरो5स्मि महाबाहो मन्दप्राणविचेष्टित: । शस्त्राग्निना निर्दहेयं पाण्डवानामनीकिनीम्‌

“ହେ ମହାବାହୋ! ମୁଁ ବୃଦ୍ଧ; ମୋର ପ୍ରାଣଶକ୍ତି ଓ ଚେଷ୍ଟା ମନ୍ଦ ହୋଇଯାଇଛି। ତଥାପି ଶସ୍ତ୍ରାଗ୍ନିରେ ମୁଁ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସେନାକୁ ଦହିଦେବି।”

Verse 18

“महाबाहो! अब तो मैं बूढ़ा हो गया, मेरी प्राणशक्ति और चेष्टा कम हो गयी, तो भी अपने अस्त्र-शस्त्रोंकी अग्निसे पाण्डवोंकी विशाल वाहिनीको भस्म कर दूँगा ।। यथा भीष्म: शान्तनवो मासेनेति मतिर्मम । एषा मे परमा शक्तिरेतन्मे परमं बलम्‌,“जैसे शान्तनुनन्दन भीष्म एक मासमें पाण्डव-सेनाका विनाश कर सकते हैं, उसी प्रकार और उतने ही समयमें मैं भी कर सकता हूँ, ऐसा मेरा विश्वास है। यही मेरी सबसे बड़ी शक्ति है और यही मेरा अधिक-से-अधिक बल है'

“ହେ ମହାବାହୋ! ଏବେ ମୁଁ ବୃଦ୍ଧ ହୋଇଗଲି; ମୋର ପ୍ରାଣଶକ୍ତି ଓ ପ୍ରୟାସଶକ୍ତି କ୍ଷୀଣ ହୋଇଛି। ତଥାପି ମୋର ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ରର ଅଗ୍ନିରେ ମୁଁ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ବିଶାଳ ବାହିନୀକୁ ଭସ୍ମ କରିଦେବି। ଶାନ୍ତନୁନନ୍ଦନ ଭୀଷ୍ମ ଯେପରି ଏକ ମାସରେ ପାଣ୍ଡବ-ସେନାକୁ ଧ୍ୱଂସ କରିପାରନ୍ତି, ସେହିପରି ଏକେ ଅବଧିରେ ମୁଁ ମଧ୍ୟ କରିପାରିବି—ଏହା ମୋର ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟ। ଏହାହିଁ ମୋର ପରମ ଶକ୍ତି; ଏହାହିଁ ମୋର ପରମ ବଳ।”

Verse 19

द्वाभ्यामेव तु मासाभ्यां कृप: शारद्वतो5बवीत्‌ । द्रौणिस्तु दशरात्रेण प्रतिजज्ञे बलक्षयम्‌,कृपाचार्यने दो महीनोंमें पाण्डव-सेनाके संहारकी बात कही; परंतु अश्वत्थामाने दस ही दिनोंमें शत्रुसेनाके संहारकी प्रतिज्ञा कर ली

ଶାରଦ୍ୱତପୁତ୍ର କୃପ କହିଲେ—ମାତ୍ର ଦୁଇ ମାସରେ ପାଣ୍ଡବସେନାର ସଂହାର ସମ୍ଭବ; କିନ୍ତୁ ଦ୍ରୋଣପୁତ୍ର ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା ଦଶ ରାତିରେ ଶତ୍ରୁବଳକ୍ଷୟ କରିବାକୁ ପ୍ରତିଜ୍ଞା କଲା।

Verse 20

कर्णस्तु पड्चरात्रेण प्रतिजज्ञे महास्त्रवित्‌ । तच्छुत्वा सूतपुत्रस्य वाक्यं सागरगासुतः,बड़े-बड़े अस्त्रोंके ज्ञाता कर्णने पाँच ही दिनोंमें पाण्डवसेनाको नष्ट करनेकी प्रतिज्ञा की। सूतपुत्रका यह कथन सुनकर गंगानन्दन भीष्मजी ठहाका मारकर हँस पड़े और यह वचन बोले--'राधापुत्र! जबतक युद्धभूमिमें शंख, बाण और धनुष धारण करनेवाले श्रीकृष्णसहित अर्जुनको तुम एक ही रथसे आते हुए नहीं देखते और जबतक उनके साथ तुम्हारी मुठभेड़ नहीं होती, तभीतक ऐसा अभिमान प्रकट करते हो, तुम इच्छानुसार और भी ऐसी बहुत-सी बहकी-बहकी बातें कह सकते हो”

ମହାସ୍ତ୍ରବିଦ୍ କର୍ଣ୍ଣ ପାଞ୍ଚ ରାତିରେ ପାଣ୍ଡବସେନାକୁ ନଷ୍ଟ କରିବାକୁ ପ୍ରତିଜ୍ଞା କଲା। ସୂତପୁତ୍ରର ଏହି କଥା ଶୁଣି ଗଙ୍ଗାପୁତ୍ର ଭୀଷ୍ମ ଉଚ୍ଚସ୍ୱରେ ହସିଲେ।

Verse 21

जहास सस्वनं हासं वाक्‍्यं चेदमुवाच ह । न हि यावद्‌ रणे पार्थ बाणशड्खधनुर्धरम्‌,बड़े-बड़े अस्त्रोंके ज्ञाता कर्णने पाँच ही दिनोंमें पाण्डवसेनाको नष्ट करनेकी प्रतिज्ञा की। सूतपुत्रका यह कथन सुनकर गंगानन्दन भीष्मजी ठहाका मारकर हँस पड़े और यह वचन बोले--'राधापुत्र! जबतक युद्धभूमिमें शंख, बाण और धनुष धारण करनेवाले श्रीकृष्णसहित अर्जुनको तुम एक ही रथसे आते हुए नहीं देखते और जबतक उनके साथ तुम्हारी मुठभेड़ नहीं होती, तभीतक ऐसा अभिमान प्रकट करते हो, तुम इच्छानुसार और भी ऐसी बहुत-सी बहकी-बहकी बातें कह सकते हो”

ଭୀଷ୍ମ ଗୁଞ୍ଜିତ ହାସରେ ଠହାକା ମାରି ଏହି କଥା କହିଲେ—“ହେ ପାର୍ଥ! ଯେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ରଣଭୂମିରେ ବାଣ, ଶଙ୍ଖ ଓ ଧନୁ ଧାରଣ କରୁଥିବା ତାହାକୁ ତୁମେ ଦେଖୁନାହ…”

Verse 22

वासुदेवसमायुक्त रथेनायान्तमाहवे । समागच्छसि राधेय तेनैवमभिमन्यसे । शक्यमेवं च भूयश्न त्वया वक्तुं यथेष्टत:,बड़े-बड़े अस्त्रोंके ज्ञाता कर्णने पाँच ही दिनोंमें पाण्डवसेनाको नष्ट करनेकी प्रतिज्ञा की। सूतपुत्रका यह कथन सुनकर गंगानन्दन भीष्मजी ठहाका मारकर हँस पड़े और यह वचन बोले--'राधापुत्र! जबतक युद्धभूमिमें शंख, बाण और धनुष धारण करनेवाले श्रीकृष्णसहित अर्जुनको तुम एक ही रथसे आते हुए नहीं देखते और जबतक उनके साथ तुम्हारी मुठभेड़ नहीं होती, तभीतक ऐसा अभिमान प्रकट करते हो, तुम इच्छानुसार और भी ऐसी बहुत-सी बहकी-बहकी बातें कह सकते हो”

ବାସୁଦେବ ସହିତ ଏକେ ରଥରେ ଆହବେ ଆସୁଥିବା ତାହା ସହ—ହେ ରାଧେୟ—ଯେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ତୁମର ସାକ୍ଷାତ୍ ସମ୍ମୁଖୀନ ହେବା ହୁଏନାହିଁ, ସେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ତୁମେ ଏଭଳି ଅଭିମାନ କର; ଇଚ୍ଛା କଲେ ଏପରି ଆଉ ଅନେକ କଥା ମଧ୍ୟ କହିପାର।

Verse 193

इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि भीष्मादिशक्तिकथने त्रिनवत्यधिकशततमो<ध्याय

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବର ଅମ୍ବୋପାଖ୍ୟାନପର୍ବରେ ଭୀଷ୍ମାଦି ଶକ୍ତିକଥନ-ପ୍ରସଙ୍ଗର ଏକଶେ ତିରାନବ୍ବେତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ।

Frequently Asked Questions

A conflict between dynastic-political necessity (maintaining a marriage alliance and preventing war) and the ethical weight of concealment regarding identity; the chapter frames how a prior decision made under fear and social pressure becomes a state-level security risk.

Political stability is sustained through layered responsibility: counsel, protective planning, and culturally legitimate rites must converge, while individuals may assume burdens to prevent collective harm—yet such solutions carry moral residue when founded on secrecy.

No explicit phalaśruti is stated in the provided passage; the chapter’s meta-function is etiological—explaining causal conditions behind later battlefield dynamics and Bhīṣma’s narrative reasoning—rather than offering a formal recitation-benefit formula.