Adhyaya 183
Udyoga ParvaAdhyaya 18326 Versesकुरुक्षेत्र-युद्ध नहीं; यह पूर्व-प्रसंगीय द्वन्द्व है जिसमें पलड़ा किसी एक का स्थिर नहीं—अस्त्र-प्रतिअस्त्र से संघर्ष चरम पर है।

Adhyaya 183

Bhīṣma’s Recollection of the Duel: Charioteer’s Fall, Brahmin Protection, and Portents after Rāma’s Collapse

Upa-parva: Bhīṣma–Paraśurāma Yuddha-smṛti (Embedded Recollection Episode)

Bhīṣma recounts that at dawn the duel with Bhārgava Rāma resumes. Rāma, standing on a disturbed chariot, releases dense volleys of arrows; Bhīṣma’s charioteer—described as a friend—is struck down, falls into the chariot, and soon dies from the pressure of Rāma’s arrows. With Bhīṣma’s attention impaired by grief and disorientation, Rāma sends lethal, death-measured shafts and strikes Bhīṣma forcefully; an arrow lands at Bhīṣma’s collar-region and both combatants descend toward the ground. Assuming Bhīṣma is slain, Rāma exults loudly with his followers, while nearby Kauravas and spectators experience acute distress at Bhīṣma’s fall. Bhīṣma then perceives eight radiant brāhmaṇas who encircle and physically support him mid-battle; guarded by them, he does not touch the earth and is reassured repeatedly with blessings and “do not fear.” Revived by their words, Bhīṣma rises and sees the great river (personified as his mother) stationed with his chariot; she has secured his horses and equipment. After honoring her, Bhīṣma remounts and personally manages the swift horses. When fighting resumes, Bhīṣma releases a powerful arrow that pierces Rāma’s heart; Rāma drops to the ground, releases his bow, and faints. Extraordinary portents follow: clouds shed blood, meteors fall with noise and trembling, the sun is obscured (Svarbhānu imagery), harsh winds blow, the earth shakes, scavenger birds circle, ominous cries and unstruck drums resound. As dusk arrives with dust-hazed sunset and cool night winds, the combatants suspend hostilities; the narrative notes that this pattern of daily engagement and withdrawal continues for a specified sequence of days.

Chapter Arc: रात्रि बीतते ही भीष्म अपने ही मुख से उस अद्भुत प्रसंग का सूत्र पकड़ते हैं—कैसे परशुराम के साथ उनका युद्ध छिड़ा, ऐसा युद्ध जो समस्त प्राणियों के रोंगटे खड़े कर दे। → परशुराम बाणों की घनघोर वर्षा करते हैं; भीष्म शरजाल से उसे रोकते हैं। क्रोध बढ़ता जाता है—तपस्वी भार्गव बार-बार प्रचण्ड अस्त्रों का संधान करते हैं, और रणभूमि में दिव्य तेज का विस्तार होने लगता है। → परशुराम कालान्तक-कोपम बाण का संधान करते हैं; प्रत्युत्तर में भीष्म चेत में आते ही जामदग्न्य पर ‘विमला शक्ति’ (इन्द्राशनि-सम स्पर्श, यमदण्ड-सम प्रभा) का प्रक्षेप करते हैं—क्षण भर में आकाश-दिशाएँ धूमायमान, जगत में हाहाकार, और अस्त्र-तेज से लोक काँप उठता है। → अध्याय का समापन इस बोध के साथ होता है कि भीष्म ने ‘प्रस्वापनास्त्र’ (प्रस्वापनासत्र) की प्राप्ति/उपयोग-प्रसंग तक कथा को पहुँचा दिया है—अस्त्रविद्या की चरम सीमा पर दोनों महाबलियों का संघर्ष टिक गया है। → भीष्म ‘उपयुक्त अवसर’ मानकर प्रस्वापनास्त्र छोड़ने को उद्यत होते हैं; आकाश प्रज्वलित है, दिशाएँ धूमायमान—अब यह अस्त्र किसे, कैसे, और किस परिणाम तक ले जाएगा?

Shlokas

Verse 1

ऑपन-माज बछ। ्-ज:डि चतुरशीरत्याधेकशततमो< ध्याय: भीष्म तथा परशुरामजीका एक-दूसरेपर शक्ति और ब्रह्मास्त्रका प्रयोग भीष्म उवाच ततो रात्रौ व्यतीतायां प्रतिबुद्धो5स्मि भारत । ततः संचिन्त्य वै स्वप्रमवापं हर्षमुत्तमम्‌,भीष्मजी कहते हैं--भारत! तदनन्तर रात बीतनेपर जब मेरी नींद खुली, तब उस स्वप्रकी बातको सोचकर मुझे बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ରାତି ଅତିବାହିତ ହେବା ପରେ ମୁଁ ଜାଗ୍ରତ ହେଲି; ତାପରେ ସେହି ସ୍ୱପ୍ନକୁ ସ୍ମରଣ କରି ମୋତେ ସର୍ବୋତ୍ତମ ହର୍ଷ ଲାଭ ହେଲା।

Verse 2

ततः: समभवद्‌ युद्ध मम तस्य च भारत । तुमुलं सर्वभूतानां लोमहर्षणमद्भुतम्‌,भारत! तदनन्तर मेरा और परशुरामजीका भयंकर युद्ध छिड़ गया, जो समस्त प्राणियोंके रोंगटे खड़े कर देनेवाला और अद्भुत था

ତତ୍ପରେ, ହେ ଭାରତ! ମୋ ଓ ତାଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଭୟଙ୍କର ଯୁଦ୍ଧ ଉଦ୍ଭବ ହେଲା—ଏମିତି ତୁମୁଳ ଓ ଅଦ୍ଭୁତ ସଂଘର୍ଷ, ଯାହା ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କର ରୋମାଞ୍ଚ ଜଗାଇଦେଲା।

Verse 3

ततो बाणमयं वर्ष ववर्ष मयि भार्गव: । न्यवारयमहं तच्च शरजालेन भारत,उस समय भृगुनन्दन परशुरामजीने मुझपर बाणोंकी झड़ी लगा दी। भारत! तब मैंने अपने सायकसमूहोंसे उस बाणवर्षाको रोक दिया

ସେତେବେଳେ ଭୃଗୁନନ୍ଦନ ପରଶୁରାମ ମୋ ଉପରେ ବାଣବର୍ଷା କଲେ। ହେ ଭାରତ! ମୁଁ ମୋର ଶରଜାଳ ଦ୍ୱାରା ସେ ବାଣବର୍ଷାକୁ ରୋକିଦେଲି।

Verse 4

ततः परमसंक्रुद्ध: पुनरेव महातपा: । ह्ास्तनेन च कोपेन शर्ति वै प्राहिणोन्मयि,तब महातपस्वी परशुराम पुनः मुझपर अत्यन्त कुपित हो गये। पहले दिनका भी कोप था ही। उससे प्रेरित होकर उन्होंने मेरे ऊपर शक्ति चलायी

ତେବେ ମହାତପସ୍ବୀ ପରଶୁରାମ ପୁନର୍ବାର ପରମ କ୍ରୋଧରେ ଜ୍ୱଳିଉଠିଲେ; ପୂର୍ବଦିନର କୋପ ମଧ୍ୟ ଶମିତ ହୋଇନଥିଲା। ସେଇ ଆବେଗରେ ସେ ମୋ ଉପରେ ଶକ୍ତି-ଅସ୍ତ୍ର ନିକ୍ଷେପ କଲେ।

Verse 5

इन्द्राशनिसमस्पर्शा यमदण्डसमप्र भाम्‌ । ज्वलन्तीमग्निवत्‌ संख्ये लेलिहानां समनन्‍्तत:,उसका स्पर्श इन्द्रके वज़्के समान भयंकर था। उसकी प्रभा यमदण्डके समान थी और उस संग्राममें अग्निके समान प्रज्वलित हुई वह शक्ति मानो सब ओरसे रक्त चाट रही थी

ତାହାର ସ୍ପର୍ଶ ଇନ୍ଦ୍ରର ବଜ୍ର ସମ ଭୟଙ୍କର ଥିଲା; ତାହାର ପ୍ରଭା ଯମଦଣ୍ଡ ସଦୃଶ। ଯୁଦ୍ଧମଧ୍ୟରେ ଅଗ୍ନି ପରି ଜ୍ୱଳି ଉଠି, ସେ ଶକ୍ତି ମାନୋ ସମସ୍ତ ଦିଗରୁ ରକ୍ତ ଚାଟୁଥିଲା।

Verse 6

ततो भरतशार्दूल धिष्ण्यमाकाशगं यथा । स मामभ्यवधीत्‌ तूर्ण जन्रुदेशे कुरूद्धह,भरतश्रेष्ठ! कुरुकुलरत्न! फिर आकाशवर्ती नक्षत्रके समान प्रकाशित होनेवाली उस शक्तिने तुरंत आकर मेरे गलेकी हँसलीपर आघात किया

ତାପରେ, ହେ ଭରତଶାର୍ଦୂଳ! ହେ କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଆକାଶେ ଗତି କରୁଥିବା ନକ୍ଷତ୍ର ପରି ଦୀପ୍ତ ସେଇ ଶକ୍ତି ତୁରନ୍ତ ଆସି ମୋର ଗ୍ରୀବା-ପ୍ରଦେଶରେ ଆଘାତ କଲା।

Verse 7

अथास्रमस्रवद्‌ घोरं गिरेगैरिकधातुवत्‌ । रामेण सुमहाबाहो क्षतस्य छतजेक्षण,लाल नेत्रोंवाले महाबाहु दुर्योधन! परशुरामजीके द्वारा किये हुए उस गहरे आघातसे भयंकर रक्तकी धारा बह चली। मानो पर्वतसे गैरिक धातुमिश्रित जलका झरना झर रहा हो

ତେବେ, ଛତ୍ରର ରକ୍ତିମ ଛାୟା ପରି ଲାଲ ନୟନବିଶିଷ୍ଟ ମହାବାହୁ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ! ରାମ (ପରଶୁରାମ)ଙ୍କ ଦ୍ୱାରା କୃତ ସେଇ ଗଭୀର ଘାଉରୁ ଭୟଙ୍କର ରକ୍ତଧାରା ଫୁଟି ପଡ଼ିଲା—ଯେପରି ପର୍ବତରୁ ଗୈରିକଧାତୁରେ ରଞ୍ଜିତ ଜଳସ୍ରୋତ ଝରୁଥାଏ।

Verse 8

ततो<हं जामदग्न्याय भृशं क्रोधसमन्वित: । चिक्षेप मृत्युसंकाशं बाणं सर्पविषोपमम्‌,तब मैंने भी अत्यन्त कुपित हो सर्पविषके समान भयंकर मृत्युतुल्य बाण लेकर परशुरामजीके ऊपर चलाया

ତାପରେ ମୁଁ ମଧ୍ୟ ଅତ୍ୟନ୍ତ କ୍ରୋଧାବେଶରେ ଜାମଦଗ୍ନ୍ୟ (ପରଶୁରାମ)ଙ୍କ ଉପରେ ସର୍ପବିଷ ସଦୃଶ ଭୟଙ୍କର, ମୃତ୍ୟୁସମ ଦିଶୁଥିବା ଏକ ବାଣ ଛାଡ଼ିଲି।

Verse 9

स तेनाभिहतो वीरो ललाटे द्विजसत्तम: । अशोभत महाराज सशज़् इव पर्वत:,उस बाणने विप्रवर वीर परशुरामजीके ललाटमें चोट पहुँचायी। महाराज! उसके कारण वे शिखरयुक्त पर्वतके समान शोभा पाने लगे

ସେଇ ବାଣରେ ଆହତ ହୋଇ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୀର ପରଶୁରାମଙ୍କ ଲଲାଟରେ ଘାଉ ହେଲା। ହେ ମହାରାଜ! ସେଇ ଚିହ୍ନ ସହିତ ସେ ଶିଖରଯୁକ୍ତ ପର୍ବତ ପରି ଶୋଭିତ ହେଲେ।

Verse 10

स संरब्ध: समावृत्य शरं कालान्तकोपमम्‌ | संदधे बलवत्‌ कृष्य घोर शत्रुनिबर्हणम्‌,तब उन्होंने भी रोषमें आकर काल और यमके समान भयंकर शत्रुनाशक बाणको हाथमें ले धनुषको बलपूर्वक खींचकर उसके ऊपर रखा

ତେବେ ସେ ମଧ୍ୟ କ୍ରୋଧାବେଶରେ କାଳାନ୍ତକ ସଦୃଶ ଭୟଙ୍କର ଶତ୍ରୁନାଶକ ବାଣ ଉଠାଇ, ଧନୁଷକୁ ବଳପୂର୍ବକ ଟାଣି ସେଇ ଘୋର ଶରକୁ ସନ୍ଧାନ କଲେ।

Verse 11

स वक्षसि पपातोग्र: शरो व्याल इव श्वसन्‌ | महीं राज॑स्ततश्चाहमगमं रुधिराविल:,राजन्‌! उनका चलाया हुआ वह भयंकर बाण फुफकारते हुए सर्पके समान सनसनाता हुआ मेरी छातीपर आकर लगा। उससे लहूलुहान होकर मैं पृथ्वीपर गिर पड़ा

ହେ ରାଜନ! ତାଙ୍କ ଛାଡ଼ା ସେଇ ଉଗ୍ର ବାଣ ଫୁତ୍କାର କରୁଥିବା ସର୍ପ ପରି ସନସନାଇ ମୋ ବକ୍ଷସ୍ଥଳରେ ଆସି ଲାଗିଲା। ତାପରେ ରକ୍ତରେ ଲଥପଥ ହୋଇ ମୁଁ ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଗଲି।

Verse 12

सम्प्राप्य तु पुन: संज्ञां जामदग्न्याय धीमते । प्राहिण्वं विमलां शक्ति ज्वलन्तीमशनीमिव,पुनः चेतमें आनेपर मैंने बुद्धिमान्‌ परशुरामजीके ऊपर प्रज्वलित वज़्के समान एक उज्ज्वल शक्ति चलायी

ପୁନର୍ବାର ସଞ୍ଜ୍ଞା ପ୍ରାପ୍ତ କରି ମୁଁ ଧୀମାନ୍ ଜାମଦଗ୍ନ୍ୟ ପରଶୁରାମଙ୍କ ଉପରେ ବଜ୍ରସଦୃଶ ଜ୍ୱଳନ୍ତ, ନିର୍ମଳ ଓ ଦୀପ୍ତିମାନ ଶକ୍ତି ନିକ୍ଷେପ କଲି।

Verse 13

सा तस्य द्विजमुख्यस्य निपपात भुजान्तरे | विद्वलश्चाभवद्‌ राजन्‌ वेपथुश्नैनमाविशत्‌,वह शक्ति उन ब्राह्णशिरोमणिकी दोनों भुजाओंके ठीक बीचमें जाकर लगी। राजन! इससे वे विह्नल हो गये और उनके शरीरमें कँपकँपी आ गयी

ସେ ଶକ୍ତି ସେହି ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠଙ୍କ ଦୁଇ ଭୁଜାର ମଧ୍ୟଭାଗରେ ଯାଇ ପଡ଼ିଲା। ରାଜନ୍! ସେ ବିହ୍ୱଳ ହେଲେ ଏବଂ ତାଙ୍କ ଶରୀରକୁ କମ୍ପନ ଆବର୍ତ୍ତିଲା।

Verse 14

तत एनं परिष्वज्य सखा विप्रो महातपा: । अकृतदत्रण: शुभैर्वाक्यैराश्वासयदनेकथा,तब उनके महातपस्वी मित्र अकृतब्रणने उन्हें हृदयसे लगाकर सुन्दर वचनोंद्वारा अनेक प्रकारसे आश्वासन दिया

ତାପରେ ମହାତପସ୍ୱୀ ବିପ୍ର ସଖା ଅକୃତବ୍ରଣ ତାଙ୍କୁ ପରିଷ୍ୱଜ୍ୟ କରି, ଶୁଭ ବାକ୍ୟରେ ନାନା ପ୍ରକାରେ ଆଶ୍ୱାସନ ଦେଲେ।

Verse 15

समाश्च॒स्तस्ततो राम: क्रोधामर्षसमन्वित: । प्रादुश्चके तदा ब्राह्में परमास्त्र महाव्रत:,तदनन्तर महाव्रती परशुरामजी धैर्ययुक्त हो क्रोध और अमर्षमें भर गये और उन्होंने परम उत्तम ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया

ତଦନନ୍ତରେ ମହାବ୍ରତୀ ରାମ (ପରଶୁରାମ) ସମାଶ୍ୱସ୍ତ ହୋଇ କ୍ରୋଧ ଓ ଅମର୍ଷରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହେଲେ ଏବଂ ସେତେବେଳେ ପରମ ବ୍ରାହ୍ମାସ୍ତ୍ର ପ୍ରାଦୁର୍ଭାବ କରି ପ୍ରୟୋଗ କଲେ।

Verse 16

ततस्तत्प्रतिघातार्थ ब्राह्ममेवास्त्रमुत्तमम्‌ । मया प्रयुक्त जज्वाल युगान्तमिव दर्शयत्‌,तब उस अस्त्रका निवारण करनेके लिये मैंने भी उत्तम ब्रह्मास्त्रका ही प्रयोग किया। मेरा वह अस्त्र प्रलयकालका-सा दृश्य उपस्थित करता हुआ प्रज्वलित हो उठा

ତାପରେ ସେହି ପ୍ରହାରକୁ ପ୍ରତିଘାତ କରିବା ପାଇଁ ମୁଁ ମଧ୍ୟ ଉତ୍ତମ ବ୍ରାହ୍ମାସ୍ତ୍ରକୁ ହିଁ ପ୍ରୟୋଗ କଲି। ମୋ ଦ୍ୱାରା ପ୍ରୟୁକ୍ତ ସେ ଅସ୍ତ୍ର ଯୁଗାନ୍ତ ସଦୃଶ ଦୃଶ୍ୟ ଦେଖାଇ ଜ୍ୱଳି ଉଠିଲା।

Verse 17

तयोरब्रह्यास्त्रयोरासीदन्‍्तरा वै समागम: । असम्प्राप्यैव राम॑ं च मां च भारतसत्तम,भरतवंशशिरोमणे! वे दोनों ब्रह्मास्त्र मेरे तथा परशुरामजीके पास न पहुँचकर बीचमें ही एक-दूसरेसे भिड़ गये

ସେଇ ଦୁଇ ବ୍ରହ୍ମାସ୍ତ୍ରର ମଧ୍ୟରେ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ସଂଘର୍ଷ ହେଲା। ହେ ଭାରତଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଭରତବଂଶଶିରୋମଣି! ରାମ (ପରଶୁରାମ) କିମ୍ବା ମୋ ପାଖକୁ ପହଞ୍ଚିବା ପୂର୍ବରୁ ମଧ୍ୟପଥରେ ଏକାପରେ ଏକା ଧକ୍କା ଖାଇ ପରସ୍ପରକୁ ନିଷ୍ଫଳ କରିଦେଲେ।

Verse 18

ततो व्योम्नि प्रादुरभूत्‌ तेज एव हि केवलम्‌ । भूतानि चैव सर्वाणि जम्मुरारतिं विशाम्पते,प्रजानाथ! फिर तो आकाशमें केवल आगकी ही ज्वाला प्रकट होने लगी। इससे समस्त प्राणियोंको बड़ी पीड़ा हुई

ତାପରେ ଆକାଶରେ କେବଳ ଦହୁଥିବା ତେଜ ମାତ୍ର ପ୍ରକଟ ହେଲା। ହେ ପ୍ରଜାନାଥ, ହେ ବିଶାମ୍ପତେ! ତାହାରେ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀ ଭୟଙ୍କର ଆର୍ତ୍ତିରେ ପଡ଼ିଲେ।

Verse 19

ऋषयश्च सगन्धर्वा देवताश्वैव भारत । संतापं परमं जग्मुरस्त्रतेजोडभिपीडिता:,भारत! जन ब्रह्मास्त्रोंक तेजसे पीड़ित होकर ऋषि, गन्धर्व तथा देवता भी अत्यन्त संतप्त हो उठे

ହେ ଭାରତ! ଅସ୍ତ୍ରତେଜରେ ପୀଡ଼ିତ ହୋଇ ଋଷିମାନେ, ଗନ୍ଧର୍ବମାନେ ଏବଂ ଦେବତାମାନେ ମଧ୍ୟ ପରମ ସନ୍ତାପକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ।

Verse 20

ततश्वचाल पृथिवी सपर्वतवनद्रुमा । संतप्तानि च भूतानि विषादं जग्मुरुत्तमम्‌,फिर तो पर्वत, वन और वृक्षोंसहित सारी पृथ्वी डोलने लगी। भूतलके समस्त प्राणी संतप्त हो अत्यन्त विषाद करने लगे

ତାପରେ ପର୍ବତ, ବନ ଓ ବୃକ୍ଷ ସହିତ ପୃଥିବୀ କମ୍ପି ଉଠିଲା। ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀ ତାପରେ ଦଗ୍ଧ ହୋଇ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବିଷାଦରେ ଲୀନ ହେଲେ।

Verse 21

राजन! उस समय आकाश जल रहा था। सम्पूर्ण दिशाओंमें धूम व्याप्त हो रहा था। आकाशचारी प्राणी भी आकाशमें ठहर न सके

ହେ ରାଜନ୍! ସେ ସମୟରେ ଆକାଶ ଯେନ ଜଳୁଥିଲା। ସମସ୍ତ ଦିଗରେ ଧୂମ ବ୍ୟାପିଗଲା। ଆକାଶଚାରୀ ପ୍ରାଣୀମାନେ ମଧ୍ୟ ଆକାଶରେ ରହିପାରିଲେ ନାହିଁ।

Verse 22

ततो हाहाकृते लोके सदेवासुरराक्षसे । इदमन्तरमित्येवं मोक्तुकामो5स्मि भारत

ତେବେ ଦେବ, ଅସୁର ଓ ରାକ୍ଷସ ସହିତ ସମଗ୍ର ଲୋକରେ ହାହାକାର ମଚିଗଲା। ହେ ଭାରତ! “ଏହିଁ ଯଥୋଚିତ ସୁଯୋଗ” ବୋଲି ଭାବି, ଏହି କ୍ଷଣିକ ଅବକାଶକୁ ଧରି ମୁଁ ଏବେ କହିବାକୁ (କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ଦେଖାଇବାକୁ) ଉଦ୍ୟତ ହେଉଛି।

Verse 23

प्रस्वापमस्त्रं त्वरितो वचनाद्‌ ब्रह्मवादिनाम्‌ । विचित्र च तदस्त्रं मे मनसि प्रत्यभात्‌ तदा

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ— ବ୍ରହ୍ମବାଦୀ ଋଷିମାନଙ୍କ ବଚନାନୁସାରେ ମୁଁ ତୁରନ୍ତ ପ୍ରସ୍ୱାପନାସ୍ତ୍ର ପ୍ରୟୋଗ କଲି। ସେଇ କ୍ଷଣରେ ସେ ଅଦ୍ଭୁତ ଅସ୍ତ୍ରଟି ମୋ ମନରେ ସ୍ପଷ୍ଟ ଭାବେ ପ୍ରକାଶିତ ହେଲା।

Verse 183

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें भीष्यको प्रस्वापनासत्रका प्राप्तिविषयक एक सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତ ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଅମ୍ବୋପାଖ୍ୟାନପର୍ବରେ ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ପ୍ରସ୍ୱାପନାସତ୍ର-ପ୍ରାପ୍ତିବିଷୟକ ଏକଶେ ତେରାଶିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 184

तदनन्तर देवता, असुर तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण जगत्‌में हाहाकार मच गया। भारत! “यही उपयुक्त अवसर है” ऐसा मानकर मैंने तुरंत ही प्रस्वापनास्त्रको छोड़नेका विचार किया। फिर तो उन ब्रह्मवादी वसुओंके कथनानुसार उस विचित्र अस्त्रका मेरे मनमें स्मरण हो आया ।। इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि परस्परब्रद्मास्त्रप्रयोगे चतुरशीत्यधिकशततमो<ध्याय:

ତଦନନ୍ତର ଦେବ, ଅସୁର ଓ ରାକ୍ଷସ ସହିତ ସମଗ୍ର ଜଗତରେ ହାହାକାର ମଚିଗଲା। ହେ ଭାରତ! “ଏହିଁ ଯଥୋଚିତ ସମୟ” ବୋଲି ଭାବି ମୁଁ ତୁରନ୍ତ ପ୍ରସ୍ୱାପନାସ୍ତ୍ର ଛାଡ଼ିବାକୁ ନିଶ୍ଚୟ କଲି। ପରେ ବ୍ରହ୍ମବାଦୀ ବସୁମାନଙ୍କ ବଚନାନୁସାରେ ସେଇ ବିଚିତ୍ର ଅସ୍ତ୍ରର ସ୍ମୃତି ମୋ ମନରେ ପୁନଃ ଫେରିଆସିଲା। ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତେ ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବଣି ଅମ୍ବୋପାଖ୍ୟାନପର୍ବଣି ପରସ୍ପରବ୍ରହ୍ମାସ୍ତ୍ରପ୍ରୟୋଗେ ଚତୁରଶୀତ୍ୟଧିକଶତତମୋऽଧ୍ୟାୟଃ।

Verse 231

प्रजज्वाल नभो राजन्‌ धूमायन्ते दिशो दश । न स्थातुमन्तरिक्षे च शेकुराकाशगास्तदा

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ— ହେ ରାଜନ୍! ଆକାଶ ଅଗ୍ନିପରି ପ୍ରଜ୍ୱଳିତ ହେଲା, ଦଶଦିଗ ଧୂଆଁରେ ଭରିଗଲା। ସେତେବେଳେ ଆକାଶରେ ଗତି କରୁଥିବାମାନେ ମଧ୍ୟ ଅନ୍ତରିକ୍ଷରେ ଠିଆ ରହିପାରିଲେ ନାହିଁ।

Frequently Asked Questions

The chapter dramatizes duty under destabilization: Bhīṣma must reassert disciplined action after personal loss (the charioteer’s death) and physical injury, balancing grief with the obligations of a vow-bound warrior role.

Agency can be restored through composure, supportive counsel, and re-grounding in duty: once steadied by protective interlocutors, Bhīṣma regains operational control (horses, posture, aim) and changes the engagement’s trajectory.

No explicit phalaśruti appears in this passage; instead, meta-significance is conveyed indirectly through utpāta imagery and the structured pause at nightfall, marking the episode as morally and cosmologically consequential within the recollection.