Adhyaya 181
Udyoga ParvaAdhyaya 18132 Versesसमता/अनिर्णय—भीषण अस्त्र-वृष्टि और उत्पातों के बावजूद निर्णायक विजय किसी की नहीं; धर्म-संयम के कारण विनाश टलता है।

Adhyaya 181

Bhīṣma’s Retrospective of the Jāmadagnya Rāma Encounter (Divyāstra-Pratiyuddha and Twilight Cessation)

Upa-parva: Bhīṣma–Rāma Yuddha-smṛti (Retrospective Account of Bhīṣma’s Engagement with Jāmadagnya Rāma)

Bhīṣma narrates to a Kaurava interlocutor a prior encounter with Jāmadagnya Rāma. After the charioteer removes embedded shafts and the horses are refreshed, combat resumes at dawn. Rāma readies his chariot; Bhīṣma briefly dismounts, offers formal respect, and then re-enters battle. A sustained exchange of arrow volleys follows, with Rāma repeatedly launching projectiles that Bhīṣma severs midair. The engagement escalates into divyāstra use: Bhīṣma deploys the Vāyavya astra, countered by a Guhyaka astra; he deploys the Āgneyā astra, countered by the Vāruṇa astra. Rāma wounds Bhīṣma, prompting a tactical withdrawal and subsequent return to the field. Bhīṣma’s intensified barrage is neutralized; he then releases a single luminous shaft that knocks Rāma down, causing widespread alarm among attendants and ascetics who rush to revive him. Rāma rises and resumes, striking Bhīṣma and his horses; Bhīṣma answers with a rapid astra, producing atmospheric obscuration and heat, after which the arrows fall as ash. The narrative closes with the battle ending at twilight, and the teacher-adversary withdrawing—marking a regulated termination rather than annihilative conclusion.

Chapter Arc: प्रभात होते ही सूर्य के निर्मल प्रकाश में भीष्म अपने व्रत और प्रतिज्ञा की कठोरता के साथ रणभूमि में खड़े हैं; सामने हैं भार्गव राम (परशुराम), जिनका क्रोध तपस्या-तेज की तरह दहक रहा है। → परशुराम अचल पर्वत पर बरसते मेघ की भाँति भीष्म पर शरजालों की वर्षा करते हैं। बाण-वृष्टि की मार से भीष्म का प्रिय सारथि आहत होकर रथोपस्थान से हटने लगता है, जिससे भीष्म के मन में क्षणिक विषाद उठता है—पर प्रतिज्ञा और क्षात्रधर्म उसे फिर स्थिर कर देते हैं। गंगा-जननी का स्मरण और पितृऋण का बोध भीष्म के भीतर एक साथ करुणा और कठोरता जगाते हैं। → दीर्घ, उग्र और असाधारण संग्राम के बीच एक क्षण ऐसा आता है जब परशुराम रण में गिर पड़ते हैं; उसी समय आकाश में रक्त-वर्षा जैसे अपशकुन, प्रचण्ड वायु, धरा का कम्पन, गिद्ध-काकों का मण्डल—समस्त उत्पात भयावह रूप से प्रकट होते हैं। ऋषि करुणा से भर उठते हैं, और क्रोधाविष्ट भार्गव कालानल-तुल्य शर उठाने को उद्यत होते हैं—मानो तपोबल स्वयं विनाश का अस्त्र बन जाए। → ऋषियों के हस्तक्षेप और धर्म-संयम के दबाव से वह प्रलय-शर अंततः रोका/शांत किया जाता है; संध्या के समय-समय पर युद्ध का आवेग उतरता-बढ़ता रहता है, और यह संघर्ष कई दिनों तक खिंचता है—पर निर्णायक वध या पूर्ण पराजय के बिना। → बीस दिनों और आगे भी कुछ दिनों तक चलने वाले इस द्वंद्व का परिणाम तत्काल निर्णीत नहीं होता; प्रश्न शेष रहता है—क्या तपोबल का क्रोध प्रतिज्ञा-बल को तोड़ेगा, या भीष्म का व्रत भार्गव-तेज के सामने अडिग रहेगा?

Shlokas

Verse 1

अपन का बा | अत-#--#क+ द्वयशीर्त्याधेकशततमो< ध्याय: भीष्म और परशुरामका युद्ध भीष्म उवाच ततः प्रभाते राजेन्द्र सूर्ये विमलतां गते । भार्गवस्य मया सार्ध पुनर्युद्धमवर्तत,भीष्मजी कहते हैं--राजेन्द्र! तदनन्तर प्रातः:काल जब सूर्यदेव उदित होकर प्रकाशमें आ गये, उस समय मेरे साथ परशुरामजीका युद्ध पुनः प्रारम्भ हुआ

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ତାପରେ ପ୍ରଭାତେ, ସୂର୍ଯ୍ୟ ଉଦିତ ହୋଇ ଆଲୋକ ନିର୍ମଳ ହେବା ସମୟରେ, ଭାର୍ଗବ ପରଶୁରାମଙ୍କ ସହ ମୋର ପୁନର୍ବାର ଯୁଦ୍ଧ ଆରମ୍ଭ ହେଲା।

Verse 2

ततोअश्रान्ते रथे तिष्ठन्‌ राम: प्रहरतां वर: । ववर्ष शरजालानि मयि मेघ इवाचले,तत्पश्चात्‌ योद्धाओंमें श्रेष्ठ परशुरामजी स्थिर रथपर खड़े हो जैसे मेघ पर्वतपर जलकी बौछार करता है, उसी प्रकार मेरे ऊपर बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे

ତାପରେ ଯୋଦ୍ଧାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ରାମ (ପରଶୁରାମ) ଅଶ୍ରାନ୍ତ ରଥରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହୋଇ, ମୋ ଉପରେ ବାଣଜାଲର ବର୍ଷା କଲେ—ଯେପରି ପର୍ବତ ଉପରେ ମେଘ ବର୍ଷା କରେ।

Verse 3

ततः सूतो मम सुहृच्छरवर्षेण ताडित: । अपयातो रथोपस्थान्मनो मम विषादयन्‌,उस समय मेरा प्रिय सुहद्‌ सारथि बाणवर्षासे पीड़ित हो मेरे मनको विषादमें डालता हुआ रथकी बैठकसे नीचे गिर गया

ସେତେବେଳେ ମୋର ପ୍ରିୟ ସୁହୃଦ ସାରଥି ବାଣବର୍ଷାରେ ଆଘାତ ପାଇ ରଥାସନରୁ ଖସି ପଡ଼ିଲା, ଏବଂ ମୋ ମନକୁ ବିଷାଦରେ ଭରିଦେଲା।

Verse 4

ततः सूतो ममात्यर्थ कश्मलं प्राविशन्महत्‌ । पृथिव्यां च शराघातान्निपपात मुमोह च

ତାପରେ ମୋର ସାରଥି ଅତ୍ୟନ୍ତ ଭୟଙ୍କର କ୍ଳେଶରେ ପଡ଼ିଲା; ବାଣାଘାତରେ ପୃଥିବୀରେ ଲୁଟି ପଡ଼ିଲା ଏବଂ ମୂର୍ଛିତ ହେଲା।

Verse 5

मेरे सारथिको अत्यन्त मोह छा गया था। वह बाणोंके आघातसे पृथ्वीपर गिरा और अचेत हो गया ।। ततः सूतो$जहात्‌ प्राणान्‌ रामबाणप्रपीडित: । मुहूर्तादिव राजेन्द्र मां च भीराविशत्‌ तदा,राजेन्द्र! परशुरामजीके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण दो ही घड़ीमें सूतने प्राण त्याग दिये। उस समय मेरे मनमें बड़ा भय समा गया

ତେବେ ରାମ (ପରଶୁରାମ)ଙ୍କ ବାଣରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପୀଡିତ ହୋଇ ମୋ ସାରଥି ପ୍ରାଣ ତ୍ୟାଗ କଲା। ଏବଂ, ରାଜେନ୍ଦ୍ର, ସେଇ ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ—ନିମେଷମାତ୍ରେ—ମୋ ହୃଦୟରେ ଭୟ ପ୍ରବେଶ କଲା।

Verse 6

ततः सूते हते तस्मिन्‌ क्षिपतस्तस्य मे शरान्‌ | प्रमत्तमनसो राम: प्राहिणोन्मृत्युसम्मितम्‌,उस सारथिके मारे जानेपर मैं असावधान मनसे परशुरामजीके बाणोंको काट रहा था! इतनेहीमें परशुरामजीने मुझपर मृत्युके समान भयंकर बाण छोड़ा

ତାପରେ ସେ ସାରଥି ହତ ହେଲାପରେ, ସେ ମୋ ଉପରେ ଲଗାତାର ଶର ବିକ୍ଷେପ କରୁଥିବାବେଳେ, ମୁଁ କ୍ଷଣମାତ୍ର ଅସାବଧାନ ମନେ ତାଙ୍କ ଶରଗୁଡ଼ିକୁ କାଟୁଥିଲି। ସେଇ ସମୟରେ ରାମ (ପରଶୁରାମ) ମୃତ୍ୟୁସମ ଭୟଙ୍କର ଏକ ଶର ମୋ ଉପରେ ଛାଡ଼ିଲେ।

Verse 7

ततः सूतव्यसनिन विप्लुतं मां स भार्गव: । शरेणाभ्यहनद्‌ गाढं विकृष्य बलवद्धनु:,उस समय मैं सारथिकी मृत्युके कारण व्याकुल था तो भी भृगुनन्दन परशुरामने अपने सुदृढ़ धनुषको जोर-जोरसे खींचकर मुझपर बाणसे गहरा आघात किया

ସେତେବେଳେ ସାରଥିର ବିପତ୍ତିରେ ବ୍ୟାକୁଳ ଓ ବିଚଳିତ ମୋତେ ସେ ଭାର୍ଗବ ନିଜ ବଳବାନ ଧନୁଷକୁ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଟାଣି ଏକ ଶରରେ ଗାଢ଼ ଆଘାତ କଲେ।

Verse 8

स मे भुजान्तरे राजन्‌ निपत्य रुधिराशन: । मयैव सह राजेन्द्र जगाम वसुधातलम्‌,राजेन्द्र! वह रक्त पीनेवाला बाण मेरी दोनों भुजाओंके बीच (वक्ष:स्थलमें) चोट पहुँचाकर मुझे साथ लिये-दिये पृथ्वीपर जा गिरा

ରାଜନ, ସେ ରକ୍ତପାନୀ ଶର ମୋ ଦୁଇ ଭୁଜାର ମଧ୍ୟରେ ପଡ଼ି, ରାଜେନ୍ଦ୍ର, ମୋତେ ସହ ନେଇଥିବା ପରି ବସୁଧାତଳକୁ ଗଲା।

Verse 9

मत्वा तु निहतं रामस्ततो मां भरतर्षभ । मेघवद्‌ विननादोच्चैर्जहषे च पुनः पुन:,भरतश्रेष्ठ] उस समय मुझे मारा गया जानकर परशुरामजी मेघके समान गम्भीर स्वरसे गर्जना करने लगे। उनके शरीरमें बार-बार हर्षजनित रोमांच होने लगा

ତାପରେ, ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ, ମୋତେ ନିହତ ଭାବି ରାମ (ପରଶୁରାମ) ମେଘସଦୃଶ ଗମ୍ଭୀର ସ୍ୱରରେ ଉଚ୍ଚରେ ଗର୍ଜନ କଲେ ଏବଂ ପୁନଃ ପୁନଃ ହର୍ଷରେ ହସିଲେ।

Verse 10

तथा तु पतिते राजन्‌ मयि रामो मुदा युतः । उदक्रोशन्महानादं सह तैरनुयायिभि:,राजन! इस प्रकार मेरे धराशायी होनेपर परशुरामजीको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने अपने अनुयायियोंके साथ महान्‌ कोलाहल मचाया

ହେ ରାଜନ୍! ମୁଁ ପତିତ ହେବା ସହିତ ପରଶୁରାମ (ରାମ) ଆନନ୍ଦରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇ, ନିଜ ଅନୁୟାୟୀମାନଙ୍କ ସହ ମହାନାଦ କରି ବଡ଼ କୋଳାହଳ କଲେ।

Verse 11

मम तत्राभवन्‌ ये तु कुरवः पार्श्चतः स्थिता: । आगता अपि युद्ध तज्जनास्तत्र दिदृक्षव: । आर्ति परमिकां जम्मुस्ते तदा पतिते मयि,वहाँ मेरे पार्श्वभागमें जो कुरुवंशी क्षत्रियगण खड़े थे तथा जो लोग वहाँ युद्ध देखनेकी इच्छासे आये थे, उन सबको मेरे गिर जानेपर बड़ा दुःख हुआ

ସେଠାରେ ମୋ ପାର୍ଶ୍ୱରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ କୁରୁବଂଶୀ କ୍ଷତ୍ରିୟମାନେ ଓ ଯୁଦ୍ଧ ଦେଖିବାକୁ ଆସିଥିବା ଲୋକମାନେ—ମୁଁ ପତିତ ହେବାମାତ୍ରେ ସମସ୍ତେ ପରମ ଦୁଃଖରେ ଆକୁଳ ହେଲେ।

Verse 12

ततो<पश्यं पतितो राजसिंहं द्विजानष्टौ सूर्यहुताशना भान्‌ । ते मां समन्तात्‌ परिवार्य तस्थु: स्वबाहुभि: परिधार्याजिमध्ये,राजसिंह! वहाँ गिरते समय मैंने देखा कि सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी आठ ब्राह्मण आये और संग्रामभूमिमें मुझे सब ओरसे घेरकर अपनी भुजाओंपर ही मेरे शरीरको धारण करके खड़े हो गये

ହେ ରାଜସିଂହ! ମୁଁ ପତିତ ହେବାବେଳେ ଦେଖିଲି—ସୂର୍ଯ୍ୟ ଓ ଅଗ୍ନି ସମ ତେଜସ୍ବୀ ଆଠଜଣ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଆସିଲେ। ସେମାନେ ଯୁଦ୍ଧଭୂମିର ମଧ୍ୟରେ ମୋତେ ସମସ୍ତ ଦିଗରୁ ଘେରି, ନିଜ ଭୁଜାରେ ମୋ ଦେହକୁ ଧାରଣ କରି ଦଣ୍ଡାୟମାନ ରହିଲେ।

Verse 13

रक्ष्यमाणश्ष तैविंप्रै्नाह भूमिमुपास्पृशम्‌ । अन्तरिक्षे धृतो हास्मि तैर्विप्रैबन्धवैरिव,उन ब्राह्मणोंसे सुरक्षित होनेके कारण मुझे धरतीका स्पर्श नहीं करना पड़ा। मेरे सगे भाई-बन्धुओंकी भाँति उन ब्राह्मणोंने मुझे आकाशमें ही रोक लिया था

ସେହି ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ରକ୍ଷାରେ ମୋତେ ଭୂମି ସ୍ପର୍ଶ କରିବାକୁ ପଡ଼ିଲା ନାହିଁ। ସେମାନେ ସଗା ବନ୍ଧୁମାନଙ୍କ ପରି ମୋତେ ଆକାଶରେ ହିଁ ଧରି ରଖିଲେ।

Verse 14

श्वसन्निवान्तरिक्षे च जलबिन्दुभिरुक्षित: । ततस्ते ब्राह्मणा राजन्नब्रुवन्‌ परिगृह माम्‌,राजन! आकाशकमें मैं साँस लेता-सा ठहर गया था। उस समय ब्राह्मणोंने मुझपर जलकी बूँदें छिड़क दीं। फिर वे मुझे पकड़कर बोले

ହେ ରାଜନ୍! ମୁଁ ଆକାଶରେ ଯେନ ଶ୍ୱାସ ନେଉଛି ଭଳି ଥମ୍କି ରହିଥିଲି। ସେତେବେଳେ ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ମୋ ଉପରେ ଜଳବିନ୍ଦୁ ଛିଟାଇଲେ; ପରେ ମୋତେ ଧରି କହିଲେ।

Verse 15

मा भैरिति सम॑ सर्वे स्वस्ति ते5स्त्विति चासकृत्‌ | ततस्तेषामहं वाग्भिस्तर्पित: सहसोत्थित: । मातरं सरितां श्रेष्ठामपश्यं रथमास्थिताम्‌,उन सबने एक साथ ही बार-बार कहा--'तुम्हारा कल्याण हो। तुम भयभीत न हो।' उनके वचनामृतोंसे तृप्त होकर मैं सहसा उठकर खड़ा हो गया और देखा, मेरे रथपर सारथिके स्थानमें सरिताओंमें श्रेष्ठ माता गंगा बैठी हुई हैं

ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଏକ ସ୍ୱରରେ ପୁନଃପୁନଃ କହିଲେ—“ଭୟ କରନି; ତୋର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ।” ସେମାନଙ୍କ ଅମୃତସମ ବଚନରେ ତୃପ୍ତ ହୋଇ ମୁଁ ସହସା ଉଠି ଦାଁଡ଼ାଇଲି; ତାପରେ ଦେଖିଲି—ନଦୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ମାତା ଗଙ୍ଗା ମୋ ରଥରେ ସାରଥିର ସ୍ଥାନରେ ଆସୀନ।

Verse 16

हयाश्व मे संगृहीतास्तयासन्‌ महानद्या संयति कौरवेन्द्र । पादौ जनन्या: प्रतिगृहा चाहं तथा पितृणां रथमभ्यरोहम्‌,कौरवराज! उस युद्धमें महानदी माता गंगाने मेरे घोड़ोंकी बागडोर पकड़ रखी थी। तब मैं माताके चरणोंका स्पर्श करके और पितरोंके उद्देश्यसे भी मस्तक नवाकर उस रथपर जा बैठा

କୌରବେନ୍ଦ୍ର! ସେହି ଯୁଦ୍ଧରେ ମହାନଦୀ ମାତା ଗଙ୍ଗା ମୋ ଘୋଡ଼ାମାନଙ୍କର ବାଗଡୋର ଧରିଥିଲେ। ତାପରେ ମୁଁ ମାତାଙ୍କ ପାଦ ସ୍ପର୍ଶ କରି, ପିତୃମାନଙ୍କ ନିମିତ୍ତେ ଶିର ନମାଇ, ସେହି ରଥରେ ଆରୋହଣ କଲି।

Verse 17

ररक्ष सा मां सरथं हयांशक्षोपस्कराणि च । तामहं प्राञ्जलि भूत्वा पुनरेव व्यसर्जयम्‌,माताने मेरे रथ, घोड़ों तथा अन्यान्य उपकरणोंकी रक्षा की। तब मैंने हाथ जोड़कर पुनः माताको विदा कर दिया

ସେ ମୋତେ ରଥସହ, ଘୋଡ଼ାସହ ଓ ଅନ୍ୟ ଉପକରଣସହ ରକ୍ଷା କଲେ। ତାପରେ ମୁଁ ହାତ ଯୋଡ଼ି ପ୍ରଣାମ କରି, ସେହି ମାତାଙ୍କୁ ପୁନଃ ଶ୍ରଦ୍ଧାରେ ବିଦାୟ ଦେଲି।

Verse 18

ततोऊहं स्वयमुद्यम्य हयांस्तान्‌ वातरंहस: । अयुध्यं जामदग्न्येन निवृत्तेडहनि भारत,भारत! तदनन्तर स्वयं ही उन वायुके समान वेगशाली घोड़ोंको काबूमें करके मैं जमदग्निनन्दन परशुरामजीके साथ युद्ध करने लगा। उस समय दिन प्रायः समाप्त हो चला था

ଭାରତ! ତାପରେ ମୁଁ ନିଜେ ବାୟୁସମ ବେଗଶାଳୀ ସେଇ ଘୋଡ଼ାମାନଙ୍କୁ ନିୟନ୍ତ୍ରଣ କରି, ଜମଦଗ୍ନିନନ୍ଦନ ପରଶୁରାମଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧରେ ପ୍ରବୃତ୍ତ ହେଲି। ସେତେବେଳେ ଦିନ ପ୍ରାୟ ଶେଷ ହେଉଥିଲା।

Verse 19

ततो<हं भरतश्रेष्ठ वेगवन्तं महाबलम्‌ । अमुज्चं समरे बाणं रामाय हृदयच्छिदम्‌,भरतश्रेष्ठ] उस समरभूमिमें मैंने परशुरामजीकी ओर एक प्रबल एवं वेगवान्‌ बाण चलाया, जो हृदयको विदीर्ण कर देनेवाला था

ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ତାପରେ ସେହି ସମରଭୂମିରେ ମୁଁ ରାମ (ପରଶୁରାମ)ଙ୍କ ଦିଗକୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବେଗଶାଳୀ ଓ ମହାବଳୀ ଏକ ବାଣ ଛାଡ଼ିଲି—ଯାହା ହୃଦୟକୁ ଭେଦି ଚିରିଦେବା ପରି ଥିଲା।

Verse 20

ततो जगाम वसुधां मम बाणप्रपीडित: । जानुभ्यां धनुरुत्सृूज्य रामो मोहवशं गत:,मेरे उस बाणसे अत्यन्त पीड़ित हो परशुरामजीने मूच्छाके वशीभूत होकर धनुष छोड़ धरतीपर घुटने टेक दिये

ତେବେ ମୋର ବାଣରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପୀଡିତ ହୋଇ ପରଶୁରାମ (ରାମ) ଧରାପତିତ ହେଲେ। ମୋହବଶରେ ଧନୁଷ ଛାଡ଼ି ଘୁଣ୍ଟି ଟେକି ଭୂମିରେ ବସି ପଡ଼ିଲେ।

Verse 21

अनेक सहखस््र ब्राह्मणोंको बहुत दान करनेवाले परशुरामजीके धराशायी होनेपर अधिकाधिक रक्तकी वर्षा करते हुए बादलोंने आकाशको ढक लिया

ସହସ୍ର ସହସ୍ର ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କୁ ମହାଦାନ ଦେଇ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ପରଶୁରାମ ଧରାପତିତ ହେବାମାତ୍ରେ ମେଘମାଳା ଆକାଶକୁ ଢାକିଦେଲା ଏବଂ ଅଧିକାଧିକ ରକ୍ତବର୍ଷା କରିବାକୁ ଲାଗିଲା।

Verse 22

उल्काश्न शतशः पेतु: सनिर्घाता: सकम्पना: । अर्क च सहसा दीप्तं स्वर्भानुरभिसंवृणोत्‌,बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान सैकड़ों उल्कापात होने लगे। भूकम्प आ गया। अपनी किरणोंसे उद्भासित होनेवाले सूर्यदेवको राहुने सब ओरसे सहसा घेर लिया

ବଜ୍ରଗର୍ଜନ ସଦୃଶ ଶବ୍ଦ ସହିତ ଶତଶଃ ଉଲ୍କାପାତ ହେବାକୁ ଲାଗିଲା; କମ୍ପନ ସହ ଭୂକମ୍ପ ଉଠିଲା। ନିଜ କିରଣରେ ଦୀପ୍ତ ସୂର୍ଯ୍ୟକୁ ସ୍ୱର୍ଭାନୁ (ରାହୁ) ହଠାତ୍ ସବୁଦିଗରୁ ଆବୃତ କରିଦେଲା।

Verse 23

ततस्तस्मिन्‌ निपतिते रामे भूरिसहस्रदे । आवव्रुर्जलदा व्योम क्षरन्तो रुधिरं बहु,ववुश्च वाता: परुषाश्वलिता च वसुन्धरा । गृध्रा बलाश्न कड़काश्च परिपेतुर्मुदा युता: वायु तीव्र वेगसे बहने लगी, धरती डोलने लगी, गीध, कौवे और कंक प्रसन्नतापूर्वक सब ओर उड़ने लगे

ତାପରେ ଅପାର ପରାକ୍ରମଶାଳୀ ରାମ (ପରଶୁରାମ) ପତିତ ହେବା ସହିତ ମେଘମାଳା ଆକାଶକୁ ଢାକି ଅଧିକ ରକ୍ତ ଝରାଇଲା। କଠୋର ପବନ ବହିଲା, ଧରା କମ୍ପିଲା। ଗିଧ, କାଉ ଓ କଙ୍କ ଯେନେ ଆନନ୍ଦିତ ହୋଇ ସବୁଦିଗରେ ଉଡ଼ିବାକୁ ଲାଗିଲେ।

Verse 24

दीप्तायां दिशि गोमायुर्दारुणं मुहुरुन्नदत्‌ । अनाहता दुन्दुभयो विनेदुर्भशनि:स्वना:,दिशाओंमें दाह-सा होने लगा, गीदड़ बार-बार भयंकर बोली बोलने लगा, दुन्दुभियाँ बिना बजाये ही जोर-जोरसे बजने लगीं

ଏକ ଦିଗରେ ଯେନେ ଦାହ ଲାଗିଗଲା ପରି ଦୀପ୍ତି ହେଲା। ଗୋମାୟୁ (ଶିଆଳ) ପୁନଃପୁନଃ ଭୟଙ୍କର ସ୍ୱରରେ ଡାକିଲା, ଏବଂ ଅନାହତ ଦୁନ୍ଦୁଭିମାନେ ବଜ୍ରଗର୍ଜନା ସଦୃଶ ଉଚ୍ଚ ନାଦରେ ଗୁଞ୍ଜି ଉଠିଲେ।

Verse 25

एतदौत्पातिकं सर्व घोरमासीद्‌ भयंकरम्‌ | विसंज्ञकल्पे धरणीं गते रामे महात्मनि,इस प्रकार महात्मा परशुरामके मूर्च्छिंत होकर पृथ्वीपर गिरते ही ये समस्त उत्पातसूचक अत्यन्त भयंकर अपशकुन होने लगे

ମହାତ୍ମା ରାମ (ପରଶୁରାମ) ଯେନ ଅଚେତନ ହୋଇ ଧରାପତିତ ହେଲେ, ସେଇ ମୁହୂର୍ତ୍ତରୁ ସମସ୍ତ ଉତ୍ପାତସୂଚକ ଅପଶକୁନ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଘୋର ଓ ଭୟଙ୍କର ହୋଇଉଠିଲା।

Verse 26

ततो वै सहसोत्थाय रामो मामभ्यवर्तत । पुनर्युद्धाय कौरव्य विद्वल: क्रोधमूरच्च्छित:,कुरुनन्दन! इसी समय परशुरामजी सहसा उठकर क्रोधसे मूर्च्छित एवं विह्नल हो पुनः युद्धके लिये मेरे समीप आये

ତାପରେ ରାମ (ପରଶୁରାମ) ସହସା ଉଠି ପୁନର୍ବାର ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ମୋ ଦିଗକୁ ଅଗ୍ରସର ହେଲେ। ହେ କୌରବ! କ୍ରୋଧରେ ସେ ଯେନ ମୂର୍ଛିତ ଓ ବିହ୍ୱଳ ଥିଲେ।

Verse 27

आददानो महाबाहु: कार्मुकं तालसंनिभम्‌ | ततो मय्याददानं तं राममेव न्यवारयन्‌

ସେ ମହାବାହୁ ତାଳବୃକ୍ଷ-କାଣ୍ଡ ସଦୃଶ ବିଶାଳ ଧନୁଷ ଉଠାଇ, ମୋ ଉପରେ ଲକ୍ଷ୍ୟ କରିବାକୁ ଯେତେବେଳେ ଉଦ୍ୟତ ହେଲେ, ସେତେବେଳେ ରାମ ନିଜେ ତାଙ୍କୁ ନିବାରଣ କଲେ।

Verse 28

महर्षय: कृपायुक्ता: क्रोधाविष्टोडथ भार्गव: । स मे5हरदमेयात्मा शरं कालानलोपमम्‌

କୃପାଯୁକ୍ତ ମହର୍ଷିମାନେ ମଧ୍ୟସ୍ଥ ହେଲେ; କିନ୍ତୁ ସେତେବେଳେ କ୍ରୋଧାବିଷ୍ଟ ଭାର୍ଗବ (ପରଶୁରାମ)—ଅମେୟାତ୍ମା—ମୋ ଠାରୁ କାଳାଗ୍ନି ସଦୃଶ ସେଇ ଶର ନେଇଗଲେ।

Verse 29

परशुराम ताड़के समान विशाल धनुष लिये हुए थे। जब वे मेरे लिये बाण उठाने लगे, तब दयालु महर्षियोंने उन्हें रोक दिया। वह बाण कालाग्निके समान भयंकर था। अमेयस्वरूप भार्गवने कुपित होनेपर भी मुनियोंके कहनेसे उस बाणका उपसंहार कर लिया ।। ततो रविर्मन्दमरीचिमण्डलो जगामास्तं पांसुपुञ्जावगूढ: । निशाव्यगाहत्‌ सुखशीतमारुता ततो युद्ध प्रत्यवहारयाव:,तदनन्तर मन्द किरणोंके पुंजसे प्रकाशित सूर्यदेव युद्धभूमिकी उड़ती हुई धूलोंसे आच्छादित हो अस्ताचलको चले गये। रात्रि आ गयी और सुखद शीतल वायु चलने लगी। उस समय हम दोनोंने युद्ध समाप्त कर दिया

ତାପରେ ଯୁଦ୍ଧଭୂମିରୁ ଉଠୁଥିବା ଧୂଳିର ଢେରରେ ଆବୃତ, ମନ୍ଦ କିରଣମଣ୍ଡଳ ଧାରଣ କରି ସୂର୍ଯ୍ୟ ଅସ୍ତଗତ ହେଲେ। ରାତି ନେମିଆସିଲା, ସୁଖଦ ଶୀତଳ ପବନ ବହିଲା; ତେବେ ଆମେ ଦୁହେଁ ଯୁଦ୍ଧ ବିରତ କଲୁ।

Verse 30

एवं राजन्नवहारो बभूव ततः पुनर्विमले$भूत्‌ सुघोरम्‌ । कल्यं कल्यं विंशतिं वै दिनानि तथैव चान्यानि दिनानि त्रीणि,राजन! इस प्रकार प्रतिदिन संध्याके समय युद्ध बंद हो जाता और प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर पुनः अत्यन्त भयंकर संग्राम छिड़ जाता था। इस प्रकार हम दोनोंके युद्ध करते- करते तेईस दिन बीत गये

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ଏହିପରି ପ୍ରତିଦିନ ସନ୍ଧ୍ୟାବେଳେ ଯୁଦ୍ଧ ବନ୍ଦ ହୋଇଯାଉଥିଲା; ପୁଣି ନିର୍ମଳ ପ୍ରଭାତ ହେଲେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଘୋର ସଙ୍ଗ୍ରାମ ଆରମ୍ଭ ହୁଏ। ଏଭଳି କରି କୁଡ଼ି ଦିନ ଓ ଆଉ ତିନି ଦିନ—ମୋଟେ ତେଇଶ ଦିନ ଆମର ଯୁଦ୍ଧ ଚାଲିଲା।

Verse 181

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अमग्बोपाख्यानपर्वमें एक सौ इकक्‍्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଅମ୍ବୋପାଖ୍ୟାନପର୍ବର ଏକଶେ ଏକାଶୀତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 182

इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि रामभीष्मयुद्धे द्ववशीत्यधिकशततमो<ध्याय:

ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତ ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଅମ୍ବୋପାଖ୍ୟାନପର୍ବରେ ରାମ-ଭୀଷ୍ମଯୁଦ୍ଧପ୍ରସଙ୍ଗର ଏକଶେ ବୟାଶୀତମ ଅଧ୍ୟାୟ।

Frequently Asked Questions

The tension lies between unwavering persistence in a sanctioned duel and the obligation to remain within regulated norms—showing how honor, restraint, and proportional escalation must be balanced in elite conflict.

Competence is depicted as disciplined matching of means to threat: divyāstras are not portrayed as indiscriminate power but as systems requiring correct invocation, counter-measures, and situational judgment.

No explicit phalaśruti is stated in this passage; the meta-commentary is structural—ending the engagement at twilight and noting withdrawal underscores normative limits and the epic’s interest in regulated conflict rather than total destruction.