
भीष्मधृतराष्ट्रसंवादः — पाण्डवबलप्रशंसा (Bhishma–Dhritarashtra Dialogue: Appraisal of Pandava Strength)
Upa-parva: Sanjaya–Bhishma Force-Appraisal Discourse (Udyoga Parva: Adhyaya 166 context)
The chapter opens with Bhīṣma addressing a heavy, long-contemplated burden connected to the impending Dhārtarāṣṭra–Pāṇḍava confrontation, while warning against divisive provocation within the Kuru court. He asserts his own martial steadiness by recalling prior exploits (including the Kāśī princess episode and resistance to formidable opponents), framing his authority to evaluate war readiness. Dhṛtarāṣṭra then requests a renewed and detailed account of enemy strength, noting that engagement is imminent. Bhīṣma responds by enumerating and characterizing Pāṇḍava capabilities: Yudhiṣṭhira’s leadership, Bhīma’s extraordinary force, and the twin sons of Mādrī as radiant, skilled charioteers. He emphasizes their disciplined formation, ascetic training, and exceptional physical presence, and warns that ordinary fighters cannot withstand their weapons or tempo. Bhīṣma links their battlefield intensity to remembered grievances—especially Draupadī’s suffering and the harsh speech at the dice-game—suggesting heightened resolve. He culminates with a focused appraisal of Arjuna’s unparalleled chariot configuration: Kṛṣṇa as charioteer, the Gāṇḍīva bow, divine armor, inexhaustible quivers, and multiple celestial weapons, asserting that only a top-tier responder (Bhīṣma or Droṇa) can credibly meet him. Saṃjaya closes by noting the court’s disturbed reaction upon hearing this assessment.
Chapter Arc: भीष्म धृतराष्ट्र के सम्मुख कौरव-पक्ष के रथी, महारथी और अतिरथियों का क्रमशः वर्णन आरम्भ करते हैं—मानो युद्ध से पहले शक्ति का लेखा-जोखा, जिससे सभा का श्वास भी गिनती में बदल जाए। → शकुनि की दुर्धर्ष सेना की गति, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा की अद्भुत धनुर्विद्या, और अनेक राजाओं-वीरों की क्षमता का विस्तार होता जाता है; पर साथ ही भीष्म कुछ योद्धाओं के भीतर छिपे ‘महान दोष’ की ओर संकेत कर वातावरण को और भारी कर देते हैं। → भीष्म का निर्णायक आकलन उभरता है—कुछ वीर क्रोध में युगान्ताग्नि समान हैं, कुछ गुरु-आचार्य होकर भी रण में सर्वनाश की सामर्थ्य रखते हैं; द्रोण की दिव्यास्त्र-शक्ति और भगदत्त का गज-स्कन्ध-युद्ध कौशल जैसे चित्रों से कौरव-सेना का भयावह शिखर सामने आता है। → वर्णन एक सूची नहीं रहता—वह कौरव-पक्ष की संगठित मारक-क्षमता का प्रमाण बन जाता है; अध्याय ‘रथातिरथसंख्यान’ की परम्परा में योद्धाओं की श्रेणियाँ और उनकी सीमाएँ/दोष स्पष्ट कर समापन की ओर बढ़ता है। → यह सामर्थ्य-गणना सुनकर प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है—इतने पराक्रम के होते हुए भी क्या अधर्म का पक्ष टिक पाएगा, या यही शक्ति अंततः विनाश का कारण बनेगी?
Verse 1
भीकम (2 अमान सप्तषष्ट्याधेकशततमो< ध्याय: कौरवपक्षके रथी, महारथी और अतिरथियोंका वर्णन भीष्म उवाच शकुनिर्मातुलस्तेड्सौ रथ एको नराधिप । प्रयुज्य पाण्डवैवैर योत्स्यते नात्र संशय:,भीष्मने कहा--नरेश्वर! यह तुम्हारा मामा शकुनि भी एक रथी है। यह पाण्डवोंसे वैर बाँधकर युद्ध करेगा, इसमें संशय नहीं है
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ନରାଧିପ! ତୁମ ମାମା ଶକୁନି ଜଣେ ରଥୀ। ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ବୈର ବାନ୍ଧି ସେ ଯୁଦ୍ଧ କରିବ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।
Verse 2
एतस्य सेना दुर्धर्षा समरे प्रतियायिन: । विकृतायुधभूयिष्ठा वायुवेगसमा जवे,युद्धमें डटकर शत्रुओंका सामना करनेवाले इस शकुनिकी सेना दुर्धर्ष है। इसका वेग वायुके समान है तथा यह विविध आकारवाले अनेक आयुधोंसे विभूषित है
ଏହାର ସେନା ଯୁଦ୍ଧରେ ଶତ୍ରୁଙ୍କୁ ସାମ୍ନା କରି ଆଗେଇଯାଏ; ତାହାକୁ ରୋକିବା ଦୁର୍ଧର୍ଷ। ତାଙ୍କର ବେଗ ବାୟୁ ସମାନ, ଏବଂ ବିଚିତ୍ର ଆକାରର ଅନେକ ଆୟୁଧରେ ସେମାନେ ପ୍ରଚୁର ସୁସଜ୍ଜିତ।
Verse 3
द्रोणपुत्रो महेष्वास: सवनिवाति धन्विनः । समरे चित्रयोधी च दृढास्त्रश्न महारथ:,महाधनुर्धर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा तो सभी धनुर्धरोंसे बढ़कर है। वह युद्धमें विचित्र ढंगसे शत्रुओंका सामना करनेवाला, सुदृढ़ अस्त्रोंसे सम्पन्न तथा महारथी है
ଦ୍ରୋଣପୁତ୍ର ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା ମହାଧନୁର୍ଧର; ସମସ୍ତ ଧନୁର୍ଧରମାନଙ୍କୁ ଅତିକ୍ରମ କରିଥିବା। ସମରରେ ସେ ବିଚିତ୍ର ରୀତିରେ ଯୁଦ୍ଧ କରେ; ଦୃଢ଼ ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ରରେ ସମ୍ପନ୍ନ ଏବଂ ମହାରଥୀ।
Verse 4
एतस्य हि महाराज यथा गाण्डीवधन्वन: । शरासनविनिर्मुक्ता: संसक्ता यान्ति सायका:,महाराज! गाण्डीवधारी अर्जुनकी भाँति इसके धनुषसे एक साथ छूटे हुए बहुत-से बाण भी परस्पर सटे हुए ही लक्ष्यतक पहुँचते हैं
ମହାରାଜ! ଯେପରି ଗାଣ୍ଡୀବଧାରୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ଧନୁଷରୁ ଏକାସାଥି ଛୁଟିଥିବା ଅନେକ ବାଣ ପରସ୍ପର ଲଗା ଲଗି ଥିବା ପରି ଏକ ଶ୍ରେଣୀରେ ଲକ୍ଷ୍ୟ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପହଞ୍ଚେ, ସେପରି ଏହାର ବାଣମାନେ ମଧ୍ୟ ଲକ୍ଷ୍ୟକୁ ଧାଉଛନ୍ତି।
Verse 5
नैष शक्यो मया वीर: संख्यातुं रथसत्तम: । निर्दहेदपि लोकांस्त्रीनिच्छन्नेष महारथ:,रथियोंमें श्रेष्ठ इस वीर पुरुषके महत्त्वकी गणना नहीं की जा सकती। यह महारथी चाहे, तो तीनों लोकोंको दग्ध कर सकता है
ରଥୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଏହି ବୀରଙ୍କ ମହତ୍ତ୍ୱକୁ ମୁଁ ଗଣନା କରିପାରେ ନାହିଁ। ଏହି ମହାରଥୀ ଇଚ୍ଛା କଲେ ତିନି ଲୋକକୁ ମଧ୍ୟ ଦହିଦେଇପାରିବ—ଏମିତି ତାଙ୍କର ପ୍ରଭାବ।
Verse 6
क्रोधस्तेजश्न॒ तपसा सम्भूतो55श्रमवासिनाम् | द्रोणेनानुगृहीतश्न दिव्यैरस्त्रैरुदारधी:,इसमें क्रोध है, तेज है और आश्रमवासी महर्षियोंके योग्य तपस्या भी संचित है। इसकी बुद्धि उदार है। द्रोणाचार्यने सम्पूर्ण दिव्यास्त्रोंका ज्ञान देकर इसपर महान् अनुग्रह किया है
ଏହାରେ କ୍ରୋଧ ଅଛି, ତେଜ ଅଛି, ଏବଂ ଆଶ୍ରମବାସୀ ମହର୍ଷିମାନଙ୍କ ତପସ୍ୟାରୁ ଜନ୍ମିଥିବା ତପୋବଳ ମଧ୍ୟ ସଞ୍ଚିତ ଅଛି। ଏହାର ବୁଦ୍ଧି ଉଦାର; ଦ୍ରୋଣାଚାର୍ଯ୍ୟ କୃପା କରି ଏହାକୁ ଦିବ୍ୟାସ୍ତ୍ରମାନଙ୍କ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଜ୍ଞାନ ଦେଇଛନ୍ତି।
Verse 7
दोषस्त्वस्य महानेको येनैव भरतर्षभ | न मे रथो नातिरथो मतः पार्थिवसत्तम,किंतु भरतश्रेष्ठ! नृपशिरोमणे! इसमें एक ही बहुत बड़ा दोष है, जिससे मैं इसे न तो अतिरथी मानता हूँ और न रथी ही
କିନ୍ତୁ ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ, ନୃପଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏହାରେ ଗୋଟିଏ ମାତ୍ର ମହାଦୋଷ ଅଛି; ସେହି କାରଣରୁ ମୁଁ ଏହାକୁ ନ ରଥୀ ମାନେ, ନ ଅତିରଥୀ।
Verse 8
जीवितं प्रियमत्यर्थमायुष्काम: सदा द्विज: । न हास्य सदृश: कश्चिदुभयो: सेनयोरपि,इस ब्राह्मणको अपना जीवन बहुत प्रिय है, अतः यह सदा दीर्घायु बना रहना चाहता है (यही इसका दोष है)। अन्यथा दोनों सेनाओंमें इसके समान शक्तिशाली कोई नहीं है
ଏହି ଦ୍ୱିଜ ନିଜ ଜୀବନକୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରିୟ ମାନେ; ତେଣୁ ସେ ସଦା ଦୀର୍ଘାୟୁ ହେବାକୁ ଚାହେ—ଏହିଏ ତାହାର ଦୋଷ। ନଚେତ୍ ଉଭୟ ସେନାରେ ତାହା ସମାନ ଶକ୍ତିଶାଳୀ କେହି ନାହିଁ।
Verse 9
हन्यादेकरथेनैव देवानामपि वाहिनीम् । वपुष्मांस्तलघोषेण स्फोटयेदपि पर्वतान्,यह एकमात्र रथका सहारा लेकर देवताओंकी सेनाका भी संहार कर सकता है। इसका शरीर हृष्ट-पुष्ट एवं विशाल है। यह अपनी तालीकी आवाजसे पर्वतोंको भी विदीर्ण कर सकता है
ସେ ଏକାକୀ, କେବଳ ଗୋଟିଏ ରଥର ଭରସାରେ, ଦେବମାନଙ୍କ ସେନାକୁ ମଧ୍ୟ ସଂହାର କରିପାରିବ। ତାହାର ଦେହ ବଳିଷ୍ଠ ଓ ବିଶାଳ; ତାଳିର ଗର୍ଜନରେ ପର୍ବତମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଭେଦିଦେଇପାରିବ।
Verse 10
असंख्येयगुणो वीर: प्रहर्ता दारुणद्ुति: । दण्डपाणिरिवासहा: कालवत् प्रचरिष्यति,इस वीरमें असंख्य गुण हैं। यह प्रहार करनेमें कुशल और भयंकर तेजसे सम्पन्न है; अतः दण्डधारी कालके समान असह्ा होकर युद्धभूमिमें विचरण करेगा
ଏହି ବୀରରେ ଅସଂଖ୍ୟ ଗୁଣ ଅଛି। ସେ ପ୍ରହାରରେ ନିପୁଣ ଏବଂ ଭୟଙ୍କର ତେଜରେ ଦୀପ୍ତ; ଦଣ୍ଡଧାରୀ କାଳ ପରି ଅସହ୍ୟ ହୋଇ ରଣଭୂମିରେ ବିଚରିବ।
Verse 11
युगान्ताग्निसम: क्रोधात् सिंहग्रीवो महाद्युतिः । एष भारतयुद्धस्य पृष्ठ संशमयिष्यति,क्रोधमें यह प्रलयकालकी अग्निके समान जान पड़ता है। इसकी ग्रीवा सिंहके समान है। यह महातेजस्वी अश्वत्थामा महाभारत-युद्धके शेषभागका शमन करेगा
କ୍ରୋଧରେ ସେ ଯୁଗାନ୍ତର ଅଗ୍ନି ସମାନ ପ୍ରତୀତ ହୁଏ। ସିଂହସଦୃଶ ଗ୍ରୀବା ଓ ମହାଦ୍ୟୁତିରେ ଦୀପ୍ତ—ଏହି ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା ଭାରତଯୁଦ୍ଧର ଶେଷ ଅଂଶକୁ ଶମନ କରି ଅନ୍ତ କରିଦେବ।
Verse 12
पिता त्वस्य महातेजा वृद्धो5पि युवभिर्वर: । रणे कर्म महत् कर्ता अत्र मे नास्ति संशय:,अश्वत्थामाके पिता द्रोणाचार्य महान् तेजस्वी हैं। ये बूढ़े होनेपर भी नवयुवकोंसे अच्छे हैं। इस युद्धमें ये अपना महान् पराक्रम प्रकट करेंगे, इसमें मुझे संशय नहीं है
ତାହାର ପିତା ମହାତେଜସ୍ବୀ ଦ୍ରୋଣାଚାର୍ଯ୍ୟ। ସେ ବୃଦ୍ଧ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଯୁବମାନଙ୍କଠାରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ। ଏହି ଯୁଦ୍ଧରେ ସେ ମହତ୍ କର୍ମ କରିବେ—ଏଥିରେ ମୋର କୌଣସି ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।
Verse 13
अस्त्रवेगानिलोद्धूत: सेनाकक्षेन्धनोत्थित: । पाण्डुपुत्रस्य सैन्यानि प्रधक्ष्यति रणे धृत:,समरभूमिमें डटे हुए द्रोणाचार्य अग्निके समान हैं। अस्त्रवेगरूपी वायुका सहारा पाकर ये उद्दीप्त होंगे और सेनारूपी घास-फ़ूस तथा ईंधनोंको पाकर प्रज्वलित हो उठेंगे। इस प्रकार ये प्रज्वलित होकर पाण्डुपुत्र युधिष्टरिकी सेनाओंको जलाकर भस्म कर डालेंगे
ରଣଭୂମିରେ ଅଟୁଟ ଦ୍ରୋଣାଚାର୍ଯ୍ୟ ଅଗ୍ନି ସମାନ। ଅସ୍ତ୍ରର ବେଗ-ରୂପୀ ବାୟୁରେ ଉଦ୍ଦୀପ୍ତ ହୋଇ, ସେନା-ରୂପୀ କକ୍ଷ ଓ ଇନ୍ଧନ ପାଇଲେ ସେ ପ୍ରଜ୍ୱଳିତ ହେବେ; ଏବଂ ପ୍ରଜ୍ୱଳିତ ହୋଇ ରଣରେ ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରଙ୍କ ସେନାମାନଙ୍କୁ ଦହିଦେବେ।
Verse 14
रथयूथपयूथानां यूथपो<यं नरर्षभ: । भारद्वाजात्मज: कर्ता कर्म तीव्र हितं तव,ये नरश्रेष्ठ भरद्वाजनन्दन रथयूथपतियोंके समुदायके भी यूथपति हैं। ये तुम्हारे हितके लिये तीव्र पराक्रम प्रकट करेंगे
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏହି ଭାରଦ୍ୱାଜପୁତ୍ର ରଥଦଳନାୟକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ ନାୟକ। ତୁମ ହିତ ପାଇଁ ସେ ତୀବ୍ର ଓ ନିର୍ଣ୍ଣାୟକ କାର୍ଯ୍ୟ କରିବ।
Verse 15
सर्वमूर्धाभिषिक्तानामाचार्य: स्थविरो गुरु: । गच्छेदन्तं सूंजयानां प्रियस्त्वस्यथ धनंजय:,सम्पूर्ण मूर्धाभिषिक्त राजाओंके ये आचार्य एवं वृद्ध गुरु हैं। ये सृंजयवंशी क्षत्रियोंका विनाश कर डालेंगे; परंतु अर्जुन इन्हें बहुत प्रिय हैं
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ସମସ୍ତ ମୂର୍ଧାଭିଷିକ୍ତ ରାଜାମାନଙ୍କର ସେ ଆଚାର୍ଯ୍ୟ ଓ ବୃଦ୍ଧ ଗୁରୁ। ସେ ସୃଞ୍ଜୟମାନଙ୍କୁ ଅନ୍ତକୁ ନେଇଯିବ; ତଥାପି ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ତାଙ୍କ ପ୍ରିୟ।
Verse 16
नैष जातु महेष्वास: पार्थमक्लिष्टकारिणम् | हन्यादाचार्यकं दीप्तं संस्मृत्य गुणनिर्जितम्,महाधनुर्धर द्रोणाचार्यका समुज्ज्वल आचार्यभाव अर्जुनके गुणोंद्वारा जीत लिया गया है। उसका स्मरण करके ये अनायास ही महान् कर्म करनेवाले कुन्तीपुत्र अर्जुनको कदापि नहीं मारेंगे
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ମହେଷ୍ୱାସ ଦ୍ରୋଣ କେବେ ମଧ୍ୟ ଅକ୍ଳିଷ୍ଟକର୍ମା ପାର୍ଥକୁ ହତ୍ୟା କରିବେ ନାହିଁ। ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ଗୁଣରେ ଜିତା ଏହି ଦୀପ୍ତ ଗୁରୁ-ଶିଷ୍ୟ ସମ୍ବନ୍ଧକୁ ସ୍ମରଣ କରି ସେ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ରଙ୍କୁ ବଧ କରିପାରିବେ ନାହିଁ।
Verse 17
श्लाघते5यं सदा वीर पार्थस्य गुणविस्तरै: । पुत्रादभ्यधिकं चैनं भारद्वाजोडनुपश्यति,वीर! ये आचार्य द्रोण अर्जुनके गुणोंका विस्तारपूर्वक उल्लेख करते हुए सदा उनकी प्रशंसा करते हैं और उन्हें पुत्रसे भी अधिक प्रिय मानते हैं
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ବୀର! ସେ ସଦା ପାର୍ଥଙ୍କ ଗୁଣମାନଙ୍କୁ ବିସ୍ତାରରେ କହି ପ୍ରଶଂସା କରନ୍ତି; ଏହି ଭାରଦ୍ୱାଜ (ଦ୍ରୋଣ) ତାଙ୍କୁ ନିଜ ପୁତ୍ରଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଅଧିକ ପ୍ରିୟ ମନେ କରନ୍ତି।
Verse 18
हन्यादेकरथेनैव देवगन्धर्वमानुषान् । एकीभूतानपि रणे दिव्यैरस्त्रै: प्रतापवान्
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ସେ ପ୍ରତାପବାନ୍ ଯୋଦ୍ଧା ଏକମାତ୍ର ରଥରେ ଥାଇ ମଧ୍ୟ, ରଣରେ ଏକତ୍ରିତ ଦେବ, ଗନ୍ଧର୍ବ ଓ ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କୁ ଦିବ୍ୟ ଅସ୍ତ୍ରଦ୍ୱାରା ବଧ କରିପାରିବ।
Verse 19
प्रतापी द्रोणाचार्य एकमात्र रथका ही आश्रय ले रणभूमिमें एकत्र एवं एकीभूत हुए सम्पूर्ण देवताओं, गन्धर्वों और मनुष्योंको अपने दिव्यास्त्रोंद्वारा नष्ट कर सकते हैं ।। पौरवो राजशार्दूलस्तव राजन् महारथ: । मतो मम रथोदार: परवीररथारुज:,राजन! तुम्हारी सेनामें जो नृपश्रेष्ठ पौरव हैं, वे मेरे मतमें रथियोंमें उदार महारथी हैं। वे विपक्षके वीर रथियोंको पीड़ा देनेमें समर्थ हैं
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ— ପ୍ରତାପୀ ଦ୍ରୋଣାଚାର୍ଯ୍ୟ ଯଦି ଏକା ଏକମାତ୍ର ରଥର ଆଶ୍ରୟ ନେବେ, ତଥାପି ରଣଭୂମିରେ ଏକତ୍ର ଓ ଏକୀଭୂତ ହୋଇଥିବା ସମସ୍ତ ଦେବ, ଗନ୍ଧର୍ବ ଓ ମନୁଷ୍ୟଙ୍କୁ ନିଜ ଦିବ୍ୟାସ୍ତ୍ରବଳରେ ନଶ୍ଟ କରିପାରିବେ। ଏବଂ, ରାଜନ, ତୁମ ସେନାରେ ଥିବା ପୌରବ—ରାଜଶାର୍ଦୂଳ—ମୋ ମତରେ ଉଦାର ମହାରଥୀ; ସେ ପ୍ରତିପକ୍ଷର ବୀର ରଥୀମାନଙ୍କୁ ପୀଡ଼ା ଦେଇ ଭାଙ୍ଗିଦେବାରେ ସମର୍ଥ।
Verse 20
स्वेन सैन्येन महता प्रतपन् शत्रुवाहिनीम् । प्रधक्ष्यति स पञज्चालान् कक्षमग्निगतिर्यथा,राजा पौरव अपनी विशाल सेनाके द्वारा शत्रुवाहिनीको संतप्त करते हुए पांचालोंको उसी प्रकार भस्म कर डालेंगे, जैसे आग घास-फूसको
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ— ନିଜ ବିଶାଳ ସେନାଦ୍ୱାରା ଶତ୍ରୁବାହିନୀକୁ ଦହାଇ ଦେଇ ସେ ପୌରବ ରାଜା ପାଞ୍ଚାଳମାନଙ୍କୁ ଅଗ୍ନି ଶୁଖିଲା ଝାଡ଼-ଘାସକୁ ଭସ୍ମ କରେ ଯେପରି, ସେପରି ଭସ୍ମ କରିଦେବ।
Verse 21
सत्यश्रवा रथस्त्वेको राजपुत्रो बृहद्धल: । तव राजन् रिपुबले कालवत् प्रचरिष्यति,राजन! राजकुमार बृहद्वधल भी एक रथी हैं। संसारमें उनकी सच्ची कीर्तिका विस्तार हुआ है। वे तुम्हारे शत्रुओंकी सेनामें कालके समान विचरेंगे
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ— ରାଜନ, ରାଜପୁତ୍ର ବୃହଦ୍ଧଲ ଏକ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ରଥୀ; ସତ୍ୟକୀର୍ତ୍ତିରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ। ସେ ତୁମ ଶତ୍ରୁସେନାରେ କାଳ ସମାନ ଭାବେ ବିଚରିବ।
Verse 22
एतस्य योधा राजेन्द्र विचित्रकवचायुधा: । विचरिष्यन्ति संग्रामे निघ्नन्तः शात्रवांस्तव,राजेन्द्र! उनके सैनिक विचित्र कवच और अस्त्र-शस्त्र धारण करके तुम्हारे शत्रुओंका संहार करते हुए संग्रामभूमिमें विचरण करेंगे
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ— ରାଜେନ୍ଦ୍ର, ତାଙ୍କର ଯୋଧାମାନେ ବିଚିତ୍ର କବଚ ଓ ବିଭିନ୍ନ ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ର ଧାରଣ କରି ସଙ୍ଗ୍ରାମରେ ବିଚରିବେ ଏବଂ ତୁମ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ନିହତ କରିବେ।
Verse 23
वृषसेनो रथस्ते5ग्र्य: कर्णपुत्रो महारथ: । प्रधक्ष्यति रिपूर्णां ते बल॑ं तु बलिनां वर:,कर्णका पुत्र वृषसेन भी तुम्हारी सेनाका एक श्रेष्ठ रथी है। इसे महारथी भी कह सकते हैं। बलवानोंमें श्रेष्ठ वृषसेन तुम्हारे वैरियोंकी विशाल वाहिनीको भस्म कर डालेगा
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ— କର୍ଣ୍ଣପୁତ୍ର ବୃଷସେନ ତୁମ ସେନାର ଅଗ୍ର ରଥୀ; ସେ ନିଶ୍ଚୟ ମହାରଥୀ। ବଳବାନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସେ ବୃଷସେନ ତୁମ ବୈରୀମାନଙ୍କର ବିଶାଳ ବାହିନୀକୁ ଦହାଇ ଭସ୍ମ କରିଦେବ।
Verse 24
जलसंधो महातेजा राजन् रथवरस्तव । त्यक्ष्यते समरे प्राणान् माधव: परवीरहा,राजन! शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले मधुवंशी महातेजस्वी जलसंध तुम्हारी सेनामें श्रेष्ठ रथी हैं। ये तुम्हारे लिये युद्धमें अपने प्राणतक दे डालेंगे
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ମହାତେଜସ୍ବୀ ଜଲସନ୍ଧ ତୁମ ସେନାରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ରଥୀ। ଶତ୍ରୁବୀର-ସଂହାରୀ ଏହି ମାଧବ ତୁମ ପାଇଁ ସମରେ ପ୍ରାଣ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ତ୍ୟାଗ କରିବ।
Verse 25
एष योत्स्यति संग्रामे गजस्कन्धविशारद: | रथेन वा महाबाहु: क्षपयन् शत्रुवाहिनीम्,महाबाहु जलसंध रथ अथवा हाथीकी पीठपर बैठकर युद्ध करनेमें कुशल हैं। ये संग्राममें शत्रुसेनाका संहार करते हुए लड़ेंगे
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ମହାବାହୁ ଜଲସନ୍ଧ ଗଜସ୍କନ୍ଧରୁ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାରେ ପାରଙ୍ଗତ। ରଥରେ ହେଉ କି ହାତୀପିଠିରେ, ସେ ସମରେ ଶତ୍ରୁବାହିନୀକୁ କ୍ଷୟ କରି ଧ୍ୱଂସ କରି ଯୁଦ୍ଧ କରିବ।
Verse 26
रथ एष महाराज मतो मे राजसत्तम । त्वदर्थ त्यक्ष्यते प्राणान् सहसैन्यो महारणे,महाराज! नृपश्रेष्ठ! ये मेरे मतमें रथी ही हैं और इस महायुद्धमें तुम्हारे लिये अपनी सेनासहित प्राणत्याग करेंगे
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ମହାରାଜ! ହେ ନୃପଶ୍ରେଷ୍ଠ! ମୋ ମତରେ ଏ ନିଶ୍ଚୟ ରଥୀ। ଏହି ମହାରଣେ ତୁମ ପାଇଁ ସେ ନିଜ ସେନା ସହିତ ପ୍ରାଣ ତ୍ୟାଗ କରିବ।
Verse 27
एष विक्रान्तयोधी च चित्रयोधी च सड़रे । वीतभीश्वापि ते राजन् शत्रुभि: सह योत्स्यते,राजन! ये समरांगणमें महान् पराक्रम प्रकट करते हुए विचित्र ढंगसे युद्ध करनेवाले हैं। ये तुम्हारे शत्रुओंके साथ निर्भय होकर युद्ध करेंगे
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଏ ସମରେ ବିକ୍ରାନ୍ତ ଯୋଦ୍ଧା, ଏବଂ ବିଚିତ୍ର କୌଶଳରେ ଯୁଦ୍ଧ କରୁଥିବା ଯୋଦ୍ଧା ମଧ୍ୟ। ହେ ରାଜନ୍! ଭୟଶୂନ୍ୟ ହୋଇ ସେ ତୁମ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବ।
Verse 28
बाह्लीको5तिरथश्लैव समरे चानिवर्तन: । मम राजन मतो युद्धे शूरो वैवस्वतोपम:,बाह्नलीक अतिरथी वीर हैं। ये युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते हैं। राजन्! मैं समरभूमिमें इन्हें यमराजके समान शूरवीर मानता हूँ
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ବାହ୍ଲୀକ ନିଶ୍ଚୟ ଅତିରଥୀ ବୀର, ଏବଂ ସମରେ କେବେ ପଛୁଆ ହୁଏନା। ହେ ରାଜନ୍! ମୋ ମତରେ ଯୁଦ୍ଧରେ ସେ ବୈବସ୍ୱତ (ଯମ) ସମ ଶୂର।
Verse 29
न होष समर प्राप्य निवर्तेत कथठ्चन । यथा सततगो राजन् स हि हन्यात् परान् रणे,ये रणक्षेत्रमें पहुँचकर किसी तरह पीछे पैर नहीं हटा सकते। राजन! ये वायुके समान वेगसे रणभूमिमें शत्रुओंको मारेंगे
ରଣକ୍ଷେତ୍ରକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ ସେ କେବେ ମଧ୍ୟ କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ପଛକୁ ଫେରିବ ନାହିଁ। ରାଜନ୍! ପବନ ସମ ଅବିଚ୍ଛିନ୍ନ ବେଗରେ ଗତି କରି ସେ ଯୁଦ୍ଧରେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ନିହତ କରିବ।
Verse 30
सेनापतिर्महाराज सत्यवांस्ते महारथ: । रणेष्वद्भधुतकर्मा च रथी पररथारुज:,महाराज! रथारूढ हो युद्धमें अद्भुत पराक्रम दिखाने और शत्रुपक्षके रथियोंकों मार भगानेवाले तुम्हारे सेनापति सत्यवान् भी महारथी हैं
ମହାରାଜ! ଆପଣଙ୍କ ସେନାପତି ସତ୍ୟବାନ୍ ମହାରଥୀ। ଯୁଦ୍ଧରେ ସେ ଅଦ୍ଭୁତ କର୍ମ କରେ, ଏବଂ ରଥାରୂଢ ହୋଇ ଶତ୍ରୁପକ୍ଷର ରଥୀମାନଙ୍କ ରଥକୁ ଭଙ୍ଗ କରି ସେମାନଙ୍କୁ ପଛକୁ ହଟାଏ।
Verse 31
एतस्य समर दृष्टवा न व्यथास्ति कथज्चन । उत्स्मयन्नुत्पतत्येष परान् रथपथे स्थितान्,युद्ध देखकर इनके मनमें किसी प्रकार भी भय एवं दुःख नहीं होता। ये रथके मार्ममें खड़े हुए शत्रुओंपर हँसते-हँसते कूद पड़ते हैं
ଯୁଦ୍ଧମଧ୍ୟରେ ତାକୁ ଦେଖିଲେ ମଧ୍ୟ ତାହାର ମନରେ କୌଣସି ପ୍ରକାର ଭୟ କିମ୍ବା ବ୍ୟଥା ନାହିଁ। ସେ ହସିହସି ରଥପଥରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଉପରେ ଝାପି ପଡ଼େ।
Verse 32
एष चारिषु विक्रान्त: कर्म सत्पुरुषोचितम् | कर्ता विमर्दे सुमहत् त्वदर्थे पुरुषोत्तम:,पुरुषश्रेष्ठ सत्यवान् शत्रुओंपर महान् पराक्रम दिखाते हैं। ये युद्धमें तुम्हारे लिये श्रेष्ठ पुरुषोंके योग्य महान् कर्म करेंगे
ଏହି ବ୍ୟକ୍ତି ଯୁଦ୍ଧବ୍ୟୂହରେ ମଧ୍ୟ ବିକ୍ରାନ୍ତ, ଏବଂ ସତ୍ପୁରୁଷଙ୍କୁ ଯୋଗ୍ୟ ଏମିତି କର୍ମ କରେ। ପୁରୁଷୋତ୍ତମ! ଯୁଦ୍ଧର ଘମାସାନରେ ସେ ଆପଣଙ୍କ ପାଇଁ ମହାନ କାର୍ଯ୍ୟ ସାଧିବ।
Verse 33
अलम्बुषो राक्षसेन्द्र: क्रूरकर्मा महारथ: । हनिष्यति परान् राजन पूर्ववैरमनुस्मरन्,क्रूरकर्मा राक्षसराज अलम्बुष भी महारथी है। राजन! यह पहलेके वैरको याद करके शत्रुओंका संहार करेगा
ରାଜନ୍! କ୍ରୂରକର୍ମା ରାକ୍ଷସେନ୍ଦ୍ର ଅଲମ୍ବୁଷ ମଧ୍ୟ ମହାରଥୀ। ପୂର୍ବବୈରକୁ ସ୍ମରଣ କରି ସେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ନିହତ କରିବ।
Verse 34
एष राक्षससैन्यानां सर्वेषां रथसत्तम: । मायावी दृढवैरश्न समरे विचरिष्यति,मायावी, वैरभावको दृढ़तापूर्वक सुरक्षित रखनेवाला तथा समस्त राक्षस सैनिकोंमें श्रेष्ठ रथी यह अलम्बुष संग्रामभूमिमें (निर्भय होकर) विचरेगा
ଏ ରାକ୍ଷସସେନାର ସମସ୍ତଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ରଥୀ—ମାୟାବୀ ଓ ବୈରରେ ଦୃଢ। ସମରରେ ସେ ନିର୍ଭୟ ହୋଇ ରଣଭୂମିରେ ବିଚରିବ।
Verse 35
प्राग्ज्योतिषाधिपो वीरो भगदत्त: प्रतापवान् | गजाड्कुशधरश्रेष्ठोी रथे चैव विशारद:,प्राग्ज्योतिषपुरके राजा भगदत्त बड़े वीर और प्रतापी हैं। हाथमें अंकुश लेकर हाथियोंको काबूमें रखनेवाले वीरोंमें इनका सबसे ऊँचा स्थान है। ये रथयुद्धमें भी कुशल हैं
ପ୍ରାଗ୍ଜ୍ୟୋତିଷର ଅଧିପତି ବୀର ଓ ପ୍ରତାପବାନ୍ ଭଗଦତ୍ତ। ଗଜାଙ୍କୁଶ ଧରି ଯୁଦ୍ଧହାତୀକୁ ବଶ କରିବାରେ ସେ ଅଗ୍ରଗଣ୍ୟ; ରଥଯୁଦ୍ଧରେ ମଧ୍ୟ ସେ ବିଶାରଦ।
Verse 36
एतेन युद्धम भवत् पुरा गाण्डीवधन्वन: । दिवसान् सुबहून् राजन्नुभयोर्जयगृद्धिनो:,राजन्! पहले इनके साथ गाण्डीवधारी अर्जुनका युद्ध हुआ था। उस संग्राममें दोनों अपनी-अपनी विजय चाहते हुए बहुत दिनोंतक लड़ते रहे
ରାଜନ୍, ପୂର୍ବେ ଗାଣ୍ଡୀବଧାରୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ସହ ଏହାର ଯୁଦ୍ଧ ହୋଇଥିଲା। ସେହି ସଂଗ୍ରାମରେ ଉଭୟ ପକ୍ଷ ଜୟଲୋଭରେ ବହୁ ଦିନ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଯୁଦ୍ଧ କରିଥିଲେ।
Verse 37
ततः सखायं गान्धारे मानयन् पाकशासनम् । अकरोत् संविदं तेन पाण्डवेन महात्मना,गान्धारीकुमार! कुछ दिनों बाद भगदत्तने अपने सखा इन्द्रका सम्मान करते हुए महात्मा पाण्डुनन्दन अर्जुनके साथ संधि कर ली थी
ତତଃ ଗାନ୍ଧାରଦେଶରେ, ନିଜ ସଖା ପାକଶାସନ (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ କରି, ସେ ମହାତ୍ମା ପାଣ୍ଡବ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ସହ ସନ୍ଧି କରିଥିଲା।
Verse 38
एष योत्स्यति संग्रामे गजस्कन्धविशारद: | ऐरावतगतो राजा देवानामिव वासव:,राजा भगदत्त हाथीकी पीठपर बैठकर युद्ध करनेमें अत्यन्त कुशल हैं। ये ऐरावतपर बैठे हुए देवराज इन्द्रके समान संग्राममें तुम्हारे शत्रुओंके साथ युद्ध करेंगे
ଏ ରାଜା ଗଜସ୍କନ୍ଧରୁ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବିଶାରଦ। ଐରାବତ ଉପରେ ଆରୂଢ ହୋଇ, ଦେବମାନଙ୍କର ବାସବ (ଇନ୍ଦ୍ର) ପରି, ସମରରେ ତୁମ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବ।
Verse 166
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत रथातिरथसंख्यानपर्वमें एक सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ‘ରଥାତିରଥସଂଖ୍ୟାନପର୍ବ’ରେ ଏକଶ ଛଅଷଠିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 167
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि रथातिरथसंख्यानपर्वणि सप्तषष्टयधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत रथातिरथसंख्यानपर्वमें एक सौ सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ‘ରଥାତିରଥସଂଖ୍ୟାନପର୍ବ’ରେ ଏକଶ ସଡ଼ଷଠିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
The dilemma is whether court leadership should proceed under illusion and bravado or accept sober counsel that acknowledges the opponent’s capability and the ethical consequences of earlier wrongdoing that now magnifies risk.
Strategic decisions must be grounded in truthful assessment and restraint; ignoring credible intelligence and the moral psychology of grievance can convert a manageable dispute into an irreversible systemic crisis.
No explicit phalaśruti appears in this unit; its meta-function is archival and diagnostic—preserving the advisory record that frames later outcomes as proceeding from informed warnings rather than unforeseeable events.