Adhyaya 154
Udyoga ParvaAdhyaya 15436 Versesयुद्ध आरम्भ नहीं; कौरव-पक्ष की सैन्य-तैयारी और नेतृत्व-स्थापन से शक्ति-प्रदर्शन कौरवों के पक्ष में प्रतीत होता है।

Adhyaya 154

पाण्डवसेनानायकाभिषेकः तथा बलरामागमन-उपदेशः | Appointment of Pandava Commanders and Balarama’s Counsel

Upa-parva: Sainyābhiseka (Appointment and Consecration of Commanders) — Pandava Command Structure

Janamejaya inquires about the response of Yudhiṣṭhira and others upon hearing that Bhīṣma—praised as exemplary in intellect, forbearance, gravity, stability, and martial capacity—has undertaken a long war consecration. Vaiśaṃpāyana recounts that Yudhiṣṭhira, skilled in dharma under crisis, gathers his brothers and Vāsudeva and urges disciplined readiness and the selection of leaders for the seven divisions. Kṛṣṇa approves the timing and recommends appointing seven commanders. Yudhiṣṭhira then installs Drupada, Virāṭa, Dhṛṣṭadyumna, Dhṛṣṭaketu, Śikhaṇḍin, and Sahadeva of Magadha (as listed) as the seven division leaders, appointing Dhṛṣṭadyumna as overall commander-in-chief, and designating Arjuna (Dhanaṃjaya) as a superior coordinating leader over the assembled commanders; Kṛṣṇa serves as Arjuna’s charioteer and controller of the horses. Balarāma arrives with prominent Vṛṣṇis, is honored by the gathered kings, and addresses Kṛṣṇa: he foresees unavoidable mass destruction, wishes for the safe survival of kinsmen, and advises Kṛṣṇa to maintain even-handed conduct toward relatives, noting the Pāṇḍavas and Duryodhana are equally related. He also states he cannot bear to witness the Kuru destruction and will depart on a Sarasvatī pilgrimage; with Pāṇḍava permission, he leaves, having urged Kṛṣṇa toward balanced engagement.

Chapter Arc: वैशम्पायन दुर्योधन की उस घड़ी का वर्णन करते हैं जब वह युद्ध को निकट जानकर अपनी समस्त सेना को सुव्यवस्थित करने बैठता है—पैदल, हाथी, रथ और अश्व, सबका ‘सार’ चुनकर। → अक्षौहिणियों का क्रमबद्ध विभाजन होता है; रथों पर रक्षक, घोड़ों की उत्कृष्टता, पदातियों के विविध कवच-शस्त्र और स्वर्णालंकार—यह सब एक ऐसे नगर-समूह की तरह दिखता है जो शत्रु के लिए दुर्गम हो। साथ ही, सेनापतियों का पृथक्-पृथक् अभिषेक कर दुर्योधन अपने पक्ष को अनुशासन और गर्व से बाँध देता है। → दुर्योधन द्वारा प्रमुख महारथियों/राजाओं को उनके-उनके दलों का नेतृत्व सौंपना—कृप, द्रोण, अश्वत्थामा, शल्य, जयद्रथ, सुदक्षिण, कृतवर्मा, कर्ण, भूरिश्रवा, शकुनि आदि—और उनके अनुयायियों का भी यथायोग्य स्थानों पर नियोजन; यही क्षण कौरव-सेना को एक ‘यंत्र’ की तरह चालू कर देता है। → सेना, वाहिनी, पृतना, ध्वजिनी, चमू, वरूथिनी, अक्षौहिणी—इन सैन्य-रचनाओं की परिभाषात्मक स्पष्टता के साथ कौरव-बल का संगठन पूर्ण होता है; दुर्योधन की आज्ञा-व्यवस्था स्थापित हो जाती है। → अब जब कौरव-पक्ष की सैन्य-रचना और सेनापति-क्रम निश्चित हो गया, अगला प्रश्न यही है—पाण्डव-पक्ष इस विराट व्यवस्था के सामने कैसी प्रतिरचना करेगा?

Shlokas

Verse 1

भीकम (2 अमान पञ्चपञ्चाशर्दाधिकशततमो& ध्याय: दुर्योधनके द्वारा सेनाओंका विभाजन और पृथक्‌-पृथक्‌ अक्षौहिणियोंके सेनापतियोंका अभिषेक वैशम्पायन उवाच व्युष्टायां वै रजन्यां हि राजा दुर्योधनस्तत: । व्यभजत्‌ तान्यनीकानि दश चैकं च भारत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! रात बीतनेपर जब सबेरा हुआ, तब राजा दुर्योधनने अपनी ग्यारह अक्षौहिणी सेनाओंका विभाग किया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ରାତି ଶେଷ ହୋଇ ପ୍ରଭାତ ହେବା ପରେ, ହେ ଭାରତ, ରାଜା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ସେଇ ଦଶ ଓ ଏକ—ମୋଟ ଏଗାର—ସେନାବ୍ୟୂହକୁ ବିଭାଜନ କଲେ।

Verse 2

नरहस्तिरथाश्चानां सारं मध्यं च फल्गु च । सर्वेष्वेतेष्वनीकेषु संदिदेश नराधिप:,राजा दुर्योधनने पैदल, हाथी, रथ और घुड़सवार--इन सभी सेनाओंमेंसे उत्तम, मध्यम और निकृष्ट श्रेणियोंकोी पृथक्‌-पृथक्‌ करके उन्हें यथास्थान नियुक्त कर दिया

ପଦାତି, ହସ୍ତୀ, ରଥ ଓ ଅଶ୍ୱାରୋହୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ମଧ୍ୟମ ଓ ନିକୃଷ୍ଟକୁ ପୃଥକ୍ କରି ରାଜା ସମସ୍ତ ଦଳରେ ସେମାନଙ୍କୁ ଯଥାସ୍ଥାନେ ନିଯୁକ୍ତ କଲେ।

Verse 3

सानुकर्षा: सतूणीरा: सवरूथा: सतोमरा: । सोपासड्रा: सशक्तीका: सनिषड़ा: सहर्शय:,वे सब वीर अनुकर्ष (रथकी मरम्मतके लिये उसके नीचे बाँधा हुआ काष्ठ), तरकस, वरूथ (रथको ढकनेका बाघ आदिका चमड़ा), उपासंग (जिन्हें हाथी या घोड़े उठा सकें, ऐसे तरकस), तोमर, शक्ति, निषंग (पैदलों-द्वारा ले जाये जानेवाले तरकस), ऋष्टि (एक प्रकारकी लोहेकी लाठी), ध्वजा, पताका, धनुष-बाण, तरह-तरहकी रस्सियाँ, पाश, बिस्तर, कचग्रह-विक्षेप (बाल पकड़कर गिरानेका यन्त्र), तेल, गुड़, बालू, विषधर सर्पोंके घड़े, रालका चूरा, घण्टफलक ([घुँघचुरुओंवाली ढाल), खड्गादि लोहेके शस्त्र, औंटा हुआ गुड़का पानी, ढेले, साल, भिन्दिपाल (गोफियाँ), मोम चुपड़े हुए मुद्गर, काँटीदार लाठियाँ, हल विष लगे हुए बाण, सूप तथा टोकरियाँ, दरात, अंकुश, तोमर, काँटेदार कवच, बसूले, आरे आदि, बाघ और गैंड़ेके चमड़ेसे मढ़े हुए रथ, ऋष्टि, सींग, प्रास, भाँति-भाँतिके आयुध कुठार, कुदाल, तेलमें भींगे हुए रेशमी वस्त्र तथा घी लिये हुए थे

ସେ ସମସ୍ତ ବୀର ଅନୁକର୍ଷ, ତୂଣୀର, ରଥାବରଣ, ତୋମର; ଉପାସଙ୍ଗ, ଶକ୍ତି, ନିଷଙ୍ଗ ଓ ଋଷ୍ଟି—ଏହି ସମସ୍ତ ଆୟୁଧରେ ସୁସଜ୍ଜିତ ଥିଲେ।

Verse 4

सध्वजा: सपताकाश्न सशरासनतोमरा: । रज्जुभिश्न विचित्राभि: सपाशा: सपरिच्छदा:,वे सब वीर अनुकर्ष (रथकी मरम्मतके लिये उसके नीचे बाँधा हुआ काष्ठ), तरकस, वरूथ (रथको ढकनेका बाघ आदिका चमड़ा), उपासंग (जिन्हें हाथी या घोड़े उठा सकें, ऐसे तरकस), तोमर, शक्ति, निषंग (पैदलों-द्वारा ले जाये जानेवाले तरकस), ऋष्टि (एक प्रकारकी लोहेकी लाठी), ध्वजा, पताका, धनुष-बाण, तरह-तरहकी रस्सियाँ, पाश, बिस्तर, कचग्रह-विक्षेप (बाल पकड़कर गिरानेका यन्त्र), तेल, गुड़, बालू, विषधर सर्पोंके घड़े, रालका चूरा, घण्टफलक ([घुँघचुरुओंवाली ढाल), खड्गादि लोहेके शस्त्र, औंटा हुआ गुड़का पानी, ढेले, साल, भिन्दिपाल (गोफियाँ), मोम चुपड़े हुए मुद्गर, काँटीदार लाठियाँ, हल विष लगे हुए बाण, सूप तथा टोकरियाँ, दरात, अंकुश, तोमर, काँटेदार कवच, बसूले, आरे आदि, बाघ और गैंड़ेके चमड़ेसे मढ़े हुए रथ, ऋष्टि, सींग, प्रास, भाँति-भाँतिके आयुध कुठार, कुदाल, तेलमें भींगे हुए रेशमी वस्त्र तथा घी लिये हुए थे

ସେମାନେ ଧ୍ୱଜ ଓ ପତାକା ସହିତ, ଧନୁଷ-ବାଣ ଓ ତୋମର ସହିତ, ବିଚିତ୍ର ପ୍ରକାର ରଜ୍ଜୁ ସହିତ, ପାଶ ସହିତ ଏବଂ ସମସ୍ତ ପରିଚ୍ଛଦ-ପରିକର ସହିତ ସୁସଜ୍ଜିତ ଥିଲେ।

Verse 5

सकचग्रहविक्षेपा: सतैलगुडवालुका: । साशीविषघटा: सर्वे ससर्जरसपांसव:,वे सब वीर अनुकर्ष (रथकी मरम्मतके लिये उसके नीचे बाँधा हुआ काष्ठ), तरकस, वरूथ (रथको ढकनेका बाघ आदिका चमड़ा), उपासंग (जिन्हें हाथी या घोड़े उठा सकें, ऐसे तरकस), तोमर, शक्ति, निषंग (पैदलों-द्वारा ले जाये जानेवाले तरकस), ऋष्टि (एक प्रकारकी लोहेकी लाठी), ध्वजा, पताका, धनुष-बाण, तरह-तरहकी रस्सियाँ, पाश, बिस्तर, कचग्रह-विक्षेप (बाल पकड़कर गिरानेका यन्त्र), तेल, गुड़, बालू, विषधर सर्पोंके घड़े, रालका चूरा, घण्टफलक ([घुँघचुरुओंवाली ढाल), खड्गादि लोहेके शस्त्र, औंटा हुआ गुड़का पानी, ढेले, साल, भिन्दिपाल (गोफियाँ), मोम चुपड़े हुए मुद्गर, काँटीदार लाठियाँ, हल विष लगे हुए बाण, सूप तथा टोकरियाँ, दरात, अंकुश, तोमर, काँटेदार कवच, बसूले, आरे आदि, बाघ और गैंड़ेके चमड़ेसे मढ़े हुए रथ, ऋष्टि, सींग, प्रास, भाँति-भाँतिके आयुध कुठार, कुदाल, तेलमें भींगे हुए रेशमी वस्त्र तथा घी लिये हुए थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଶତ୍ରୁକୁ ଧରି ଛାଡ଼ିଦେବା ଯନ୍ତ୍ର, ତେଲ, ଗୁଡ଼ ଓ ବାଲିର ସାମଗ୍ରୀ ସହ ସୁସଜ୍ଜିତ ଥିଲେ; ବିଷଧର ସର୍ପଭରା ଘଡ଼ା ଓ ରାଳମିଶ୍ରିତ ଧୂଳି ମଧ୍ୟ ବହନ କରୁଥିଲେ—ଆଗାମୀ ସଂଗ୍ରାମରେ ଯୁକ୍ତି, ଅବରୋଧ ଓ ହାନି ପାଇଁ ସଂଗୃହୀତ ଉପକରଣ।

Verse 6

सघण्टफलका: सर्वे सायोगुडजलोपला: । सशालभिन्दिपालाश्न समधूच्छिष्टमुद्गरा:,वे सब वीर अनुकर्ष (रथकी मरम्मतके लिये उसके नीचे बाँधा हुआ काष्ठ), तरकस, वरूथ (रथको ढकनेका बाघ आदिका चमड़ा), उपासंग (जिन्हें हाथी या घोड़े उठा सकें, ऐसे तरकस), तोमर, शक्ति, निषंग (पैदलों-द्वारा ले जाये जानेवाले तरकस), ऋष्टि (एक प्रकारकी लोहेकी लाठी), ध्वजा, पताका, धनुष-बाण, तरह-तरहकी रस्सियाँ, पाश, बिस्तर, कचग्रह-विक्षेप (बाल पकड़कर गिरानेका यन्त्र), तेल, गुड़, बालू, विषधर सर्पोंके घड़े, रालका चूरा, घण्टफलक ([घुँघचुरुओंवाली ढाल), खड्गादि लोहेके शस्त्र, औंटा हुआ गुड़का पानी, ढेले, साल, भिन्दिपाल (गोफियाँ), मोम चुपड़े हुए मुद्गर, काँटीदार लाठियाँ, हल विष लगे हुए बाण, सूप तथा टोकरियाँ, दरात, अंकुश, तोमर, काँटेदार कवच, बसूले, आरे आदि, बाघ और गैंड़ेके चमड़ेसे मढ़े हुए रथ, ऋष्टि, सींग, प्रास, भाँति-भाँतिके आयुध कुठार, कुदाल, तेलमें भींगे हुए रेशमी वस्त्र तथा घी लिये हुए थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଘଣ୍ଟାଲଗା ଫଳକ-ଢାଳ, ଛାଡ଼ିବା ପାଇଁ ପଥର-ଢେଲା, ଏବଂ ଶାଳକାଠ ଗୋଳି ସହ ଭିନ୍ଦିପାଳ (ଗୋଫଣୀ) ନେଇଥିଲେ; ମଧୁର ଅବଶେଷ ଓ ମୋମ ଲେପିତ ମୁଦ୍ଗର ମଧ୍ୟ ଥିଲା—ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ବିଭିନ୍ନ ଆୟୁଧରେ ସେମାନେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସଜ୍ଜ ଥିଲେ।

Verse 7

सकाण्डदण्डका: सर्वे ससीरविषतोमरा: । सशूर्पपिटका: सर्वे सदात्राड॒कुशतोमरा:,वे सब वीर अनुकर्ष (रथकी मरम्मतके लिये उसके नीचे बाँधा हुआ काष्ठ), तरकस, वरूथ (रथको ढकनेका बाघ आदिका चमड़ा), उपासंग (जिन्हें हाथी या घोड़े उठा सकें, ऐसे तरकस), तोमर, शक्ति, निषंग (पैदलों-द्वारा ले जाये जानेवाले तरकस), ऋष्टि (एक प्रकारकी लोहेकी लाठी), ध्वजा, पताका, धनुष-बाण, तरह-तरहकी रस्सियाँ, पाश, बिस्तर, कचग्रह-विक्षेप (बाल पकड़कर गिरानेका यन्त्र), तेल, गुड़, बालू, विषधर सर्पोंके घड़े, रालका चूरा, घण्टफलक ([घुँघचुरुओंवाली ढाल), खड्गादि लोहेके शस्त्र, औंटा हुआ गुड़का पानी, ढेले, साल, भिन्दिपाल (गोफियाँ), मोम चुपड़े हुए मुद्गर, काँटीदार लाठियाँ, हल विष लगे हुए बाण, सूप तथा टोकरियाँ, दरात, अंकुश, तोमर, काँटेदार कवच, बसूले, आरे आदि, बाघ और गैंड़ेके चमड़ेसे मढ़े हुए रथ, ऋष्टि, सींग, प्रास, भाँति-भाँतिके आयुध कुठार, कुदाल, तेलमें भींगे हुए रेशमी वस्त्र तथा घी लिये हुए थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଦଣ୍ଡ ଓ ଗଦା, ଏବଂ ବିଷଲେପିତ ଅଗ୍ରଭାଗ ଥିବା ତୋମର ନେଇଥିଲେ; ସହିତ ଶୂର୍ପ ଓ ପିଟକ (ଟୋକରୀ) ଥିଲା, ଏବଂ ଦାତ୍ର, ଅଙ୍କୁଶ, ଭାଲା ମଧ୍ୟ—ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ସଂଗୃହୀତ ବିଭିନ୍ନ ଉପକରଣର ଭଣ୍ଡାର।

Verse 8

सकीलकवचा: सर्वे वासीवृक्षादनान्विता: । व्याप्रचर्मपरीवारा द्वीपिचर्मावृताश्च ते,वे सब वीर अनुकर्ष (रथकी मरम्मतके लिये उसके नीचे बाँधा हुआ काष्ठ), तरकस, वरूथ (रथको ढकनेका बाघ आदिका चमड़ा), उपासंग (जिन्हें हाथी या घोड़े उठा सकें, ऐसे तरकस), तोमर, शक्ति, निषंग (पैदलों-द्वारा ले जाये जानेवाले तरकस), ऋष्टि (एक प्रकारकी लोहेकी लाठी), ध्वजा, पताका, धनुष-बाण, तरह-तरहकी रस्सियाँ, पाश, बिस्तर, कचग्रह-विक्षेप (बाल पकड़कर गिरानेका यन्त्र), तेल, गुड़, बालू, विषधर सर्पोंके घड़े, रालका चूरा, घण्टफलक ([घुँघचुरुओंवाली ढाल), खड्गादि लोहेके शस्त्र, औंटा हुआ गुड़का पानी, ढेले, साल, भिन्दिपाल (गोफियाँ), मोम चुपड़े हुए मुद्गर, काँटीदार लाठियाँ, हल विष लगे हुए बाण, सूप तथा टोकरियाँ, दरात, अंकुश, तोमर, काँटेदार कवच, बसूले, आरे आदि, बाघ और गैंड़ेके चमड़ेसे मढ़े हुए रथ, ऋष्टि, सींग, प्रास, भाँति-भाँतिके आयुध कुठार, कुदाल, तेलमें भींगे हुए रेशमी वस्त्र तथा घी लिये हुए थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେମାନେ ସମସ୍ତେ କୀଳକବଚ ଆଦି ରକ୍ଷା-ଯୋଗାଣ ସହ, କାଠ କାଟିବା ପାଇଁ କୁଠାର ଇତ୍ୟାଦି ଉପକରଣ ସହ ସଜ୍ଜ ଥିଲେ; ସେମାନଙ୍କ ରଥ ଓ ସାମଗ୍ରୀ ବାଘଚର୍ମରେ ଘେରା ଏବଂ ଦ୍ୱୀପିଚର୍ମରେ ମଧ୍ୟ ଆବୃତ ଥିଲା—ଏହା ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଯୁଦ୍ଧସନ୍ନଦ୍ଧତାର ଚିହ୍ନ।

Verse 9

सहर्षय: सश्‌ड्राश्व सप्रासविविधायुधा: । सकुठारा: सकुद्दाला: सतैलक्षौमसर्पिष:,वे सब वीर अनुकर्ष (रथकी मरम्मतके लिये उसके नीचे बाँधा हुआ काष्ठ), तरकस, वरूथ (रथको ढकनेका बाघ आदिका चमड़ा), उपासंग (जिन्हें हाथी या घोड़े उठा सकें, ऐसे तरकस), तोमर, शक्ति, निषंग (पैदलों-द्वारा ले जाये जानेवाले तरकस), ऋष्टि (एक प्रकारकी लोहेकी लाठी), ध्वजा, पताका, धनुष-बाण, तरह-तरहकी रस्सियाँ, पाश, बिस्तर, कचग्रह-विक्षेप (बाल पकड़कर गिरानेका यन्त्र), तेल, गुड़, बालू, विषधर सर्पोंके घड़े, रालका चूरा, घण्टफलक ([घुँघचुरुओंवाली ढाल), खड्गादि लोहेके शस्त्र, औंटा हुआ गुड़का पानी, ढेले, साल, भिन्दिपाल (गोफियाँ), मोम चुपड़े हुए मुद्गर, काँटीदार लाठियाँ, हल विष लगे हुए बाण, सूप तथा टोकरियाँ, दरात, अंकुश, तोमर, काँटेदार कवच, बसूले, आरे आदि, बाघ और गैंड़ेके चमड़ेसे मढ़े हुए रथ, ऋष्टि, सींग, प्रास, भाँति-भाँतिके आयुध कुठार, कुदाल, तेलमें भींगे हुए रेशमी वस्त्र तथा घी लिये हुए थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେମାନେ ଋଷିମାନଙ୍କ ସହ ହର୍ଷିତ ହୋଇ ଆସିଲେ; ଘୋଡ଼ାର ଦଳ, ପ୍ରାସ ଓ ବିଭିନ୍ନ ପ୍ରକାର ଆୟୁଧ ନେଇ ଆସିଲେ। କୁଠାର ଓ କୁଦାଳ ମଧ୍ୟ ଥିଲା; ତେଲ, କ୍ଷୌମବସ୍ତ୍ର ଓ ଘିଅ ମଧ୍ୟ—ମହାଯୁଦ୍ଧରେ ଯୁଦ୍ଧ ସହିତ ରସଦ-ବ୍ୟବସ୍ଥା ମଧ୍ୟ ସମାନ ଭାବେ ଚାଲିବାକୁ ସଜ୍ଜ ଥିଲା।

Verse 10

रुक्मजालप्रतिच्छन्ना नानामणिविभूषिता: । चित्रानीका: सुवपुषो ज्वलिता इव पावका:,वे सभी सैनिक सोनेके जालीदार कवच धारण किये नाना प्रकारके मणिमय आभूषणोंसे विभूषित हो समस्त सेनाको ही विचित्र शोभासे सम्पन्न करते हुए अपने सुन्दर शरीरसे प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे

ସୁବର୍ଣ୍ଣ-ଜାଲ ସଦୃଶ କବଚରେ ଆବୃତ, ନାନା ପ୍ରକାର ମଣିମୟ ଆଭୂଷଣରେ ବିଭୂଷିତ, ବିଚିତ୍ର ବ୍ୟୂହରେ ସଜ୍ଜିତ ଓ ସୁଦେହୀ ସେ ଯୋଦ୍ଧାମାନେ ସମଗ୍ର ସେନାକୁ ଶୋଭାୟିତ କରି ପ୍ରଜ୍ୱଳିତ ଅଗ୍ନି ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ ହେଉଥିଲେ।

Verse 11

तथा कवचिन: शूरा: शस्त्रेषु कृतनिश्चया: । कुलीना हययोनिज्ञा: सारथ्ये विनिवेषिता:,इसी प्रकार जो शस्त्र-विद्याका निश्चित ज्ञान रखनेवाले, कुलीन तथा घोड़ोंकी नस्लको पहचाननेवाले थे, वे कवचधारी शूरवीर ही सारथिके कामपर नियुक्त किये गये थे

ସେହିପରି କବଚଧାରୀ ସେ ଶୂରମାନେ—ଶସ୍ତ୍ରପ୍ରୟୋଗରେ ଦୃଢ଼ନିଶ୍ଚୟୀ ଓ ପାରଙ୍ଗତ, କୁଳୀନ, ଏବଂ ଅଶ୍ୱର ଜାତି-ସ୍ୱଭାବ ଚିହ୍ନିବାରେ ନିପୁଣ—ସାରଥ୍ୟ କାର୍ଯ୍ୟରେ ନିଯୁକ୍ତ ହେଲେ।

Verse 12

बद्धारिष्टा बद्धकक्षा बद्धध्वजपताकिन: । बद्धाभरणनिर्यूहा बद्धचर्मासिपट्टिशा:,उस सेनाके रथोंमें अमंगल निवारणके लिये यन्त्र और ओषधियाँ बाँधी गयी थीं। वे रस्सियोंसे खूब कसे गये थे। उन रथोंपर बँधी हुई ध्वजा-पताकाएँ फहरा रही थीं। उनके ऊपर छोटी-छोटी घंटियाँ बँधी थीं और कँगूरे जोड़े गये थे। उन सबमें ढाल-तलवार और पट्टिश आबद्ध थे

ସେହି ରଥଗୁଡ଼ିକରେ ଅମଙ୍ଗଳ ନିବାରଣ ପାଇଁ ରକ୍ଷାତାବିଜ ବାନ୍ଧାଯାଇଥିଲା; ସମସ୍ତ ବନ୍ଧନ ପଟାରେ ଭଲଭାବେ କସାଯାଇଥିଲା; ଧ୍ୱଜ-ପତାକା ବାନ୍ଧା ଅବସ୍ଥାରେ ଫଡ଼ଫଡ଼ାଉଥିଲା; ଅଳଙ୍କାରର ଶୃଙ୍ଖଳା ଜଡ଼ାଯାଇଥିଲା; ଏବଂ ଢାଳ, ତଳୱାର ଓ ପଟ୍ଟିଶ ମଧ୍ୟ ବାନ୍ଧି ସଜ୍ଜ ରଖାଯାଇଥିଲା।

Verse 13

चतुर्युजो रथा: सर्वे सर्वे चोत्तमवाजिन: । सप्रासऋष्टिका: सर्वे सर्वे शतशरासना:,उन सभी रथोंमें चार-चार घोड़े जुते हुए थे, वे सभी घोड़े अच्छी जातिके थे और सम्पूर्ण रथोंमें प्रास, ऋष्टि एवं सौ-सौ धनुष रखे गये थे

ସମସ୍ତ ରଥ ଚାରି ଅଶ୍ୱଯୁକ୍ତ ଥିଲେ, ଏବଂ ସମସ୍ତ ଘୋଡ଼ା ଉତ୍ତମ ଜାତିର ଥିଲେ। ପ୍ରତ୍ୟେକ ରଥରେ ପ୍ରାସ ଓ ଋଷ୍ଟି ଭଳି ଅସ୍ତ୍ର ଥିଲା, ଏବଂ ପ୍ରତ୍ୟେକରେ ଶତ-ଶତ ଧନୁଷ ମଧ୍ୟ ସଞ୍ଚିତ ଥିଲା।

Verse 14

धुर्ययो्हययोरेकस्त थान्यौ पार्ष्णिसारथी । तौ चापि रथिनां श्रेष्ठी रथी च हयवित्‌ तथा,प्रत्येक रथके दो-दो घोड़ोंपर एक-एक रक्षक नियुक्त था, एक-एक रथके लिये दो चक्ररक्षक नियत किये गये थे। वे दोनों ही रथियोंमें श्रेष्ठ थे तथा रथी भी अश्वसंचालनकी कलामें निपुण थे। सब ओर सुवर्णमालाओंसे अलंकृत हजारों रथ शोभा पाते थे। शत्रुओंके लिये उनका भेदन करना अत्यन्त कठिन था। वे सब-के-सब नगरोंकी भाँति सुरक्षित थे

ପ୍ରତ୍ୟେକ ରଥର ଧୁର୍ୟ ଘୋଡ଼ା-ଯୁଗଳ ପାଇଁ ଜଣେ ଜଣେ ପରିଚାରକ ଓ ଜଣେ ଜଣେ ପାର୍ଷ୍ଣିସାରଥି (ପଶ୍ଚାତ୍-ରକ୍ଷକ ସାରଥି) ନିଯୁକ୍ତ ଥିଲେ। ସେ ଦୁଇଜଣ ମଧ୍ୟ ରଥୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ—ଯୁଦ୍ଧରେ ପାରଙ୍ଗତ ଓ ଅଶ୍ୱଚାଳନାରେ ମଧ୍ୟ ନିପୁଣ; ତେଣୁ ସେହି ରଥଗୁଡ଼ିକ ଶତ୍ରୁଙ୍କ ପାଇଁ ଭେଦିବା କଠିନ, ଦୁର୍ଗ-ନଗର ପରି ସୁରକ୍ଷିତ ଥିଲା।

Verse 15

नगराणीव गुप्तानि दुराधर्षाणि शत्रुभि: । आसन्‌ रथसहस््राणि हेममालीनि सर्वश:,प्रत्येक रथके दो-दो घोड़ोंपर एक-एक रक्षक नियुक्त था, एक-एक रथके लिये दो चक्ररक्षक नियत किये गये थे। वे दोनों ही रथियोंमें श्रेष्ठ थे तथा रथी भी अश्वसंचालनकी कलामें निपुण थे। सब ओर सुवर्णमालाओंसे अलंकृत हजारों रथ शोभा पाते थे। शत्रुओंके लिये उनका भेदन करना अत्यन्त कठिन था। वे सब-के-सब नगरोंकी भाँति सुरक्षित थे

ନଗରମାନଙ୍କ ପରି ସୁରକ୍ଷିତ ଓ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁରାଧର୍ଷ, ସୁବର୍ଣ୍ଣମାଳାରେ ଅଲଙ୍କୃତ ସହସ୍ର ସହସ୍ର ରଥ ସବୁଦିଗରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଥିଲେ। ଏହା କେବଳ ଶୋଭା ନୁହେଁ; ସୁସଂଗଠିତ ଓ ଦୃଢ଼ ରକ୍ଷାବ୍ୟବସ୍ଥା ସହିତ ଗଢ଼ା ଯୁଦ୍ଧବ୍ୟୂହ ଥିଲା।

Verse 16

यथा रथास्तथा नागा बद्धकक्षा: स्वलंकृता: । बभूवु: सप्तपुरुषा रत्नवन्त इवाद्रय:,जिस प्रकार रथ सजाये गये थे, उसी प्रकार हाथियोंको भी स्वर्णमालाओंसे सुसज्जित किया गया था। उन सबको रस्सोंसे कसा गया था। उनपर सात-सात पुरुष बैठे हुए थे, जिससे वे हाथी रत्नयुक्त पर्वतोंके समान जान पड़ते थे

ରଥମାନେ ଯେପରି ସଜାଯାଇଥିଲେ, ସେପରି ଗଜମାନେ ମଧ୍ୟ ସୁବର୍ଣ୍ଣମାଳାରେ ଅଲଙ୍କୃତ ହୋଇ, ବନ୍ଧନ-କଷାରେ ଦୃଢ଼ଭାବେ ବାନ୍ଧାଯାଇଥିଲେ। ପ୍ରତ୍ୟେକ ଗଜ ଉପରେ ସାତଜଣ ପୁରୁଷ ବସିଥିବାରୁ, ସେମାନେ ରତ୍ନଯୁକ୍ତ ପର୍ବତମାନଙ୍କ ପରି ଦିଶୁଥିଲେ।

Verse 17

द्वावड्कुशधरीौ तत्र द्वावुत्तमधनुर्धरी । दौ वरासिधरौ राजन्नेक: शक्तिपिनाकधृक्‌,राजन! उनमेंसे दो पुरुष अंकुश लेकर महावतका काम करते थे, दो उत्तम धनुर्धर योद्धा थे, दो पुरुष अच्छी तलवारें लिये रहते थे और एक पुरुष शक्ति तथा त्रिशूल धारण करता था

ରାଜନ, ସେଠାରେ ଦୁଇଜଣ ଅଙ୍କୁଶଧାରୀ ମହାବତର କାମ କରୁଥିଲେ; ଦୁଇଜଣ ଉତ୍ତମ ଧନୁର୍ଧର; ଦୁଇଜଣ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଖଡ଼୍ଗଧାରୀ; ଏବଂ ଜଣେ ଶକ୍ତି ଓ ପିନାକ (ଶିବାୟୁଧ) ଧାରଣ କରି ସଜ୍ଜ ଥିଲେ।

Verse 18

गजैर्मत्तै: समाकीर्ण सर्वमायुधको शकै: । तद्‌ बभूव बल॑ राजन्‌ कौरव्यस्य महात्मन:,राजन! महामना दुर्योधनकी वह सारी सेना ही अस्त्र-शस्त्रोंके भण्डारसे युक्त मदमत्त गजराजोंसे व्याप्त हो रही थी

ରାଜନ, ମହାତ୍ମା କୌରବଙ୍କ ସେହି ସେନା ମଦମତ୍ତ ଗଜରାଜମାନଙ୍କରେ ଘନଭାବେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇଯାଇଥିଲା ଏବଂ ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ର ଭଣ୍ଡାରରେ ସମୃଦ୍ଧ ଥିଲା। ସେ ଦୃଶ୍ୟ ତାଙ୍କର ଯୁଦ୍ଧସନ୍ନଦ୍ଧତା ଓ କଠୋର ସଙ୍କଳ୍ପକୁ ପ୍ରକାଶ କରୁଥିଲା।

Verse 19

आमुक्तकवचैरयुक्ति: सपताकै: स्वलड्कृतै: । सादिभिश्वोपपन्नास्तु तथा चायुतशो हया:,इसी प्रकार कवचधारी, युद्धके लिये उद्यत, आभूषणोंसे विभूषित तथा पताकाधारी सवारोंसे युक्त हजारों-लाखों घोड़े उस सेनामें मौजूद थे

ରାଜନ, ସେହିପରି କବଚ ପିନ୍ଧି, ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଉଦ୍ୟତ, ଆଭୂଷଣରେ ଭୂଷିତ ଓ ପତାକାଧାରୀ ଅଶ୍ୱାରୋହୀମାନଙ୍କ ସହ ଅୟୁତ ସଂଖ୍ୟାର ଘୋଡ଼ାମାନେ ମଧ୍ୟ ସେହି ସେନାରେ ଥିଲେ। ଏହା ତାହାର ବିଶାଳତା ଓ ପୂର୍ଣ୍ଣ ସନ୍ନଦ୍ଧତାକୁ ପ୍ରକାଶ କରୁଥିଲା।

Verse 20

असंग्राहा: सुसम्पन्ना हेमभाण्डपरिच्छदा: । अनेकशतसाहमस्रा: सर्वे सादिवशे स्थिता:,वे घोड़े उछल-कूद मचाने आदि दोषोंसे रहित होनेके कारण सदा अपने सवारोंके वशमें रहते थे। उन्हें अच्छी शिक्षा मिली थी। वे सुनहरे साजोंसे सुसज्जित थे। उनकी संख्या कई लाख थी

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେ ଘୋଡ଼ାମାନେ ଉଦ୍ଦଣ୍ଡ ଦୋଷରୁ ମୁକ୍ତ, ଭଲଭାବେ ଶିକ୍ଷିତ ଓ ସୁସାଧିତ ଥିଲେ। ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ସାଜସଜ୍ଜାରେ ସେମାନେ ଶୋଭିତ ଥିଲେ। ତାଙ୍କ ସଂଖ୍ୟା ଅନେକ ଶତ-ସହସ୍ର ଥିଲା ଏବଂ ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ନିଜ ଆରୋହୀଙ୍କ ପୂର୍ଣ୍ଣ ବଶରେ ରହୁଥିଲେ।

Verse 21

नानारूपविकाराश्न नानाकवचशस्त्रिण: । पदातिनो नरास्तत्र बभूविहेममालिन:,उस सेनामें जो पैदल मनुष्य थे, वे भी सोनेके हारोंसे अलंकृत थे। उनके रूप-रंग, कवच और अस्त्र-शस्त्र नाना प्रकारके दिखायी देते थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେଠାରେ ପଦାତି ସେନାମାନେ ମଧ୍ୟ ସୁବର୍ଣ୍ଣହାରରେ ଅଲଙ୍କୃତ ଥିଲେ। ତାଙ୍କର ରୂପ-ବର୍ଣ୍ଣ ନାନାପ୍ରକାର; ତାଙ୍କର କବଚ ଓ ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ର ମଧ୍ୟ ବିଭିନ୍ନ ପ୍ରକାର ଥିଲା।

Verse 22

रथस्यासन्‌ दश गजा गजस्य दश वाजिन: । नरा दश हयस्यासन्‌ पादरक्षा: समन्ततः,एक-एक रथके पीछे दस-दस हाथी, एक-एक हाथीके पीछे दस-दस घोड़े और एक- एक घोड़ेके पीछे दस-दस पैदल सैनिक सब ओर पादरक्षक नियुक्त किये गये थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ପ୍ରତ୍ୟେକ ରଥର ପଛେ ଦଶଟି ହାତୀ; ପ୍ରତ୍ୟେକ ହାତୀର ପଛେ ଦଶଟି ଘୋଡ଼ା; ଏବଂ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଘୋଡ଼ାର ପଛେ ଦଶଜଣ ପଦାତି—ସମସ୍ତ ଦିଗରୁ ପାଦରକ୍ଷା ଭାବେ ନିଯୁକ୍ତ ଥିଲେ।

Verse 23

रथस्य नागा: पञ्चाशन्नागस्यथासन्‌ शतं हया: । हयस्य पुरुषा: सप्त भिन्नसंधानकारिण:,एक-एक रथके पीछे पचास-पचास हाथी, एक-एक हाथीके पीछे सौ-सौ घोड़े और एक-एक घोड़ेके साथ सात-सात पैदल सैनिक इस उद्देश्यसे संगठित किये गये थे कि वे समूहसे बिछुड़ी हुई दो सैनिक टुकड़ियोंको परस्पर मिला दें

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ପ୍ରତ୍ୟେକ ରଥର ପଛେ ପଞ୍ଚାଶଟି ହାତୀ; ପ୍ରତ୍ୟେକ ହାତୀର ପଛେ ଶତଟି ଘୋଡ଼ା; ଏବଂ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଘୋଡ଼ା ସହିତ ସାତଜଣ ପଦାତି—ବିଛିନ୍ନ ହୋଇପଡ଼ିଥିବା ଦଳମାନଙ୍କୁ ପୁନଃ ସଂଧାନ କରି ଏକତ୍ର କରିବା ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ଗଠିତ ଥିଲେ।

Verse 24

सेना पञ्चशतं नागा रथास्तावन्त एव च | दश सेना च पृतना पृतना दशवाहिनी,पाँच सौ हाथियों और पाँच सौ रथोंकी एक सेना होती है। दस सेनाओंकी एक पृतना और दस पृतनाओंकी एक वाहिनी होती है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ପାଞ୍ଚଶହ ହାତୀ ଏବଂ ସମାନ ସଂଖ୍ୟାର ରଥ ମିଶି ଏକ ‘ସେନା’ ହୁଏ। ଦଶ ସେନାରେ ଏକ ‘ପୃତନା’ ଏବଂ ଦଶ ପୃତନାରେ ଏକ ‘ବାହିନୀ’ ହୁଏ।

Verse 25

सेना च वाहिनी चैव पृतना ध्वजिनी चमू: । अक्षौहिणीति पर्यायर्निरुक्ता च वरूथिनी,इसके सिवा सेना, वाहिनी, पृतना, ध्वजिनी, चमू, वरूथिनी और अक्षौहिणी--इन पर्यायवाची (समानार्थक) नामोंद्वारा भी सेनाका वर्णन किया गया है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେନାକୁ ଏହି ସମାନାର୍ଥକ ନାମମାନେ ଦ୍ୱାରା ମଧ୍ୟ କୁହାଯାଏ—ସେନା, ବାହିନୀ, ପୃତନା, ଧ୍ୱଜିନୀ, ଚମୂ, ବରୂଥିନୀ ଓ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ।

Verse 26

एवं व्यूढान्यनीकानि कौरवेयेण धीमता । अक्षौहिण्यो दशैका च संख्याता: सप्त चैव ह,इस प्रकार बुद्धिमान्‌ दुर्योधनने अपनी सेनाओंको व्यूहरचनापूर्वक संगठित किया था। कुरक्षेत्रमें यारह और सात मिलकर अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ एकत्र हुईं थीं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଏହିପରି ବୁଦ୍ଧିମାନ କୁରୁବଂଶଜ ଦୁର୍ୟୋଧନ ନିଜ ସେନାକୁ ବ୍ୟୂହବଦ୍ଧ ଭାବେ ସୁସଂଗଠିତ କଲା। କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରରେ ଦଶ ଓ ଏକ, ଏବଂ ସାତ—ମିଶି ମୋଟ ଅଠାର ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସମବେତ ହେଲା।

Verse 27

अक्षौहिण्यस्तु सप्तैव पाण्डवानामभूद्‌ बलम्‌ | अक्षौहिण्यो दशैका च कौरवाणामभूद्‌ बलम्‌,पाण्डवोंकी सेना केवल सात अक्षौहिणी थी और कौरवोंके पक्षमें ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएँ एकत्र हो गयी थीं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ବଳ ସାତ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ମାତ୍ର ଥିଲା; କୌରବମାନଙ୍କ ବଳ ଦଶ ଓ ଏକ—ଅର୍ଥାତ୍ ଏଗାର ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ଥିଲା।

Verse 28

नराणां पञ्चपज्चाशदेषा पत्तिर्विधीयते । सेनामुखं च तिस्रस्ता गुल्म इत्यभिशब्दितम्‌,पचपन पैदलोंकी एक टुकड़ीको पत्ति कहते हैं। तीन पत्तियाँ मिलकर एक सेनामुख कहलाती हैं। सेनामुखका ही दूसरा नाम गुल्म है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ପଞ୍ଚପଞ୍ଚାଶ ଜଣ ପଦାତି ସେନା ମିଶି ଯେ ଦଳ ହୁଏ, ତାହାକୁ ‘ପତ୍ତି’ କୁହାଯାଏ। ଏମିତି ତିନି ପତ୍ତି ମିଶି ‘ସେନାମୁଖ’ ହୁଏ; ଏହି ସେନାମୁଖକୁ ‘ଗୁଲ୍ମ’ ବୋଲି ମଧ୍ୟ କୁହାଯାଏ।

Verse 29

त्रयो गुल्मा गणस्त्वासीद्‌ गणास्त्वयुतशो5भवन्‌ | दुर्योधनस्य सेनासु योत्स्यमाना: प्रहारिण:,तीन गुल्मोंका एक गण होता है। दुर्योधनकी सेनाओंमें युद्ध करनेवाले पैदल योद्धाओंके ऐसे-ऐसे गण दस हजारसे भी अधिक थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତିନି ଗୁଲ୍ମ ମିଶି ଗୋଟିଏ ‘ଗଣ’ ହୁଏ। ଦୁର୍ୟୋଧନଙ୍କ ସେନାରେ ଯୁଦ୍ଧକୁ ଉଦ୍ୟତ, ପ୍ରହାରୀ ପଦାତି ଯୋଦ୍ଧାମାନଙ୍କ ଏମିତି ଗଣ ଅୟୁତଶଃ—ଦଶ-ଦଶ ହଜାରରେ—ଥିଲେ।

Verse 30

तत्र दुर्योधनो राजा शूरान्‌ बुद्धिमतो नरान्‌ । प्रसमीक्ष्य महाबाहुश्नक्रे सेनापतींस्तदा,उस समय वहाँ महाबाहु राजा दुर्योधनने अच्छी तरह सोच-विचारकर बुद्धिमान्‌ एवं शूरवीर पुरुषोंको सेनापति बनाया

ସେଠାରେ ମହାବାହୁ ରାଜା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଶୂର ଓ ବୁଦ୍ଧିମାନ ପୁରୁଷମାନଙ୍କୁ ଭଲଭାବେ ପରୀକ୍ଷା କରି, ସେ ସମୟରେ ସେମାନଙ୍କୁ ସେନାପତି ଭାବେ ନିଯୁକ୍ତ କଲେ।

Verse 31

पृथगक्षौहिणीनां च हा १० [ नरसत्तमान्‌ | विधिवत पूर्वमानीय भ्यषेचयत्‌

ସେ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନାମାନଙ୍କୁ ପୃଥକ୍ ପୃଥକ୍ ଭାବେ ସଜାଇ, ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପୁରୁଷମାନଙ୍କୁ ପ୍ରଥମେ ଆଗକୁ ଆଣି, ବିଧିମତେ ସେମାନଙ୍କର ଅଭିଷେକ କଲେ।

Verse 32

कृपं द्रोणं च शल्यं च सैन्धवं च जयद्रथम्‌ | सुदक्षिणं च काम्बोजं कृतवर्माणमेव च

ସେ କୃପ, ଦ୍ରୋଣ, ଶଲ୍ୟ, ସୈନ୍ଧବ ଜୟଦ୍ରଥ, କାମ୍ବୋଜ ସୁଦକ୍ଷିଣ ଏବଂ କୃତବର୍ମା—ଏମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ (ସେନାନାୟକ ଭାବେ) ନାମିତ କଲେ।

Verse 33

द्रोणपुत्रं च कर्ण च भूरिश्रवसमेव च । शकुनिं सौबलं चैव बाह्लीकं॑ च महाबलम्‌

ଏବଂ ଦ୍ରୋଣପୁତ୍ର ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା, କର୍ଣ୍ଣ, ଭୂରିଶ୍ରବା, ସୁବଳପୁତ୍ର ଶକୁନି ଓ ମହାବଳୀ ବାହ୍ଲୀକ—ଏମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ (ସେ) ନାମିତ କଲେ।

Verse 34

कृपाचार्य, द्रोणाचार्य और अश्वत्थामा--इन श्रेष्ठ पुरुषोंको एवं मद्रराज शल्य, सिंधुराज जयद्रथ, कम्बोज-राज सुदक्षिण, कृतवर्मा, कर्ण, भूरिश्रवा, सुबलपुत्र शकुनि तथा महाबली बाह्नीक--इन राजाओंको पहले अपने सामने बुलाकर उन सबको पृथक्‌-पृथक्‌ एक-एक अक्षौहिणी सेनाका नायक निश्चित करके विधि-पूर्वक उनका अभिषेक किया || ३१-- ३३ ॥।। दिवसे दिवसे तेषां प्रतिवेलं च भारत । चक्रे स विविधा: पूजा: प्रत्यक्ष च पुन: पुन:,भारत! दुर्योधन प्रतिदिन और प्रत्येक वेलामें उन सेनापतियोंका बारंबार विविध प्रकारसे प्रत्यक्ष पूजन करता था

ହେ ଭାରତ! ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଦିନକୁ ଦିନ ଏବଂ ପ୍ରତ୍ୟେକ ବେଳେ, ସେହି ସେନାପତିମାନଙ୍କୁ ପୁନଃପୁନଃ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଭାବେ ବିଭିନ୍ନ ପ୍ରକାର ପୂଜା-ସମ୍ମାନ କରୁଥିଲେ।

Verse 35

तथा विनियता: सर्वे ये च तेषां पदानुगा: । बभूवु: सैनिका राज्ञां प्रियं राज्ञश्चिकीर्षव:,उनके जो अनुयायी थे, उनको भी उसी प्रकार यथायोग्य स्थानोंपर नियुक्त कर दिया गया। वे राजाओंके सैनिक राजा दुर्योधनका प्रिय करनेकी इच्छा रखकर अपने-अपने कार्यमें तत्पर हो गये

ତାଙ୍କର ଯେ ଅନୁଗାମୀମାନେ ଥିଲେ, ସେମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ସେହିପରି ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ସ୍ଥାନରେ ନିଯୁକ୍ତ କରାଗଲା। ରାଜମାନଙ୍କ ସେନାମାନେ ରାଜା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ପ୍ରିୟ କରିବା ଇଚ୍ଛାରେ ନିଜ ନିଜ କାର୍ଯ୍ୟରେ ତତ୍ପର ହେଲେ।

Verse 155

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सैन्यनिर्याणपर्वणि दुर्योधनसैन्यविभागे पडञ्चपञ्चाशदधिकशततमो<ध्याय:

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବରେ, ସୈନ୍ୟନିର୍ୟାଣପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ, ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ସେନାବିଭାଗ-ପ୍ରକରଣର ୧୫୫ତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ।

Frequently Asked Questions

Balarāma articulates a kinship-based ethical tension: remaining aligned with Kṛṣṇa’s intention while maintaining impartial regard for both Pāṇḍavas and Duryodhana as relatives, and choosing withdrawal to avoid witnessing inevitable familial ruin.

The chapter teaches that ethical action in crisis combines institutional clarity (defined leadership and accountability) with relational restraint—avoiding dehumanization of kin and recognizing the moral cost of escalation even when conflict appears unavoidable.

No explicit phalaśruti appears here; the meta-significance is structural—this adhyāya formally establishes the Pāṇḍava command architecture and frames the war as a dharma-laden inevitability, shaping how later actions are interpreted within the epic’s moral economy.