Adhyaya 149
Udyoga ParvaAdhyaya 14922 Versesयुद्ध आरम्भ नहीं; पर कौरव-पक्ष की ग्यारह अक्षौहिणियों का संकेन्द्रण और कुरुक्षेत्र-प्रस्थान की आज्ञा से संघर्ष अपरिहार्य रूप से युद्ध की ओर बह रहा है।

Adhyaya 149

सेनापति-निर्णयः तथा पाण्डवसेनायाः कुरुक्षेत्रगमनम् (Decision on Command and the Pandavas’ March to Kurukshetra)

Upa-parva: Senāpati-nirṇaya & Vāhinī-vyūha (Pandava command deliberation and mobilization)

Vaiśaṃpāyana narrates that, after hearing Kṛṣṇa’s counsel, Yudhiṣṭhira addresses his brothers in Kṛṣṇa’s presence, confirming that the assembly proceedings and Kṛṣṇa’s words are understood. He requests a formal division of the army: seven akṣauhiṇīs with seven renowned leaders (Drupada, Virāṭa, Dhṛṣṭadyumna, Śikhaṇḍin, Sātyaki, Cekitāna, Bhīmasena). Yudhiṣṭhira specifically asks Sahadeva for an assessment of who is fit to serve as senāpati capable of sustaining engagement against Bhīṣma. Sahadeva argues for Virāṭa’s strength and readiness; Nakula argues for Drupada, emphasizing lineage, discipline, and hostility toward Droṇa; Arjuna extols Dhṛṣṭadyumna as divinely purposed for Droṇa’s defeat and able to withstand Bhīṣma’s assault; Bhīma highlights Śikhaṇḍin’s unique strategic relevance against Bhīṣma. Yudhiṣṭhira resolves that the one recommended by Kṛṣṇa should be commander, treating that choice as decisive for success or reversal. Kṛṣṇa affirms the competence of all named leaders and notes the failure of conciliation due to Dhṛtarāṣṭra’s misjudgment of strength. The narrative then shifts to mobilization: the army’s loud movement, conch and drum signals, marching order, inclusion of support staff and supplies, and the establishment of a fortified camp at Kurukṣetra. The text details careful camp placement—avoiding cremation grounds and sacred sites—digging a protective trench, distributing provisions, arranging separate royal pavilions, and the arrival of allied kings in support of the Pandavas’ campaign.

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र को कुरुसभा का वृत्तान्त सुनाते हैं—कृष्ण का दूत-धर्म निभाते हुए साम, दान और भेद की नीति से शान्ति-प्रयत्न, और उसके सामने दुर्योधन का कठोर, अविवेकी प्रतिरोध। → दुर्योधन क्रोध से लाल नेत्र किये सभा की अवहेलना कर उठ पड़ता है और साथ आये राजाओं को बार-बार आज्ञा देता है कि पुष्य-नक्षत्र के दिन कुरुक्षेत्र की ओर प्रस्थान करें; उधर कौरव-पक्ष की ग्यारह अक्षौहिणियाँ एकत्र होने लगती हैं और भीष्म ध्वज-केतु की भाँति अग्रणी दीखते हैं। → कृष्ण का निर्णायक वचन उभरता है—जब दुष्टात्मा दुर्योधन किसी भी प्रकार राज्य-भाग नहीं छोड़ता, तब नीति के तीन उपाय विफल होकर ‘दण्ड’ ही शेष रहता है; स्पष्ट घोषणा होती है कि कौरव बिना युद्ध के राज्य नहीं देंगे और विनाश-हेतु बनकर मृत्यु के सम्मुख खड़े हैं। → संजय यह सब धृतराष्ट्र के सामने रखकर संकेत करते हैं कि अब निर्णय का भार राजा पर है—जो उचित जानें, वही करें; शान्ति का द्वार संकुचित हो चुका है और युद्ध की तैयारी ठोस रूप ले चुकी है। → अमानुष, घोर और दारुण अपशकुनों/अद्भुत कर्मों का संकेत भविष्य की विभीषिका पर परदा उठाता है—मानो कुरुक्षेत्र स्वयं बुला रहा हो।

Shlokas

Verse 1

अपन हू< बक। है २ >> पजञज्चाशर्दाधिकशततमोब ध्याय: श्रीकृष्णका कौरवोंके प्रति साम, दान और भेदनीतिके प्रयोगकी असफलता बताकर दण्डके प्रयोगपर जोर देना वायुदेव उवाच एवमुक्ते तु भीष्मेण द्रोणेन विदुरेण च । गान्धार्या धृतराष्ट्रेण न वै मन्दो<न्वबुद्धयत,भगवान्‌ श्रीकृष्ण कहते हैं--राजन्‌! भीष्म, द्रोण, विदुर, गान्धारी तथा धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर भी मन्दबुद्धि दुर्योधनको तनिक भी चेत नहीं हुआ

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣ, ବିଦୁର, ଗାନ୍ଧାରୀ ଓ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଏପରି କହିଥିଲେ ମଧ୍ୟ ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ କିଛିମାତ୍ର ବୋଧ ହେଲା ନାହିଁ।

Verse 2

अवधूयोत्थितो मन्द: क्रोधसंरक्तलोचन: । अन्वद्रवन्त त॑ पश्चाद्‌ राजानस्त्यक्तजीविता:,वह मूर्ख क्रोधसे लाल आँखें किये उन सबकी अवहेलना करके सभासे उठकर चला गया। उसीके पीछे अन्य राजा भी अपने जीवनका मोह छोड़कर सभासे उठकर चल दिये

ସେ ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି ମୂର୍ଖ କ୍ରୋଧରେ ରକ୍ତଚକ୍ଷୁ ହୋଇ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଅବହେଳା କରି ସଭାରୁ ଉଠି ଚାଲିଗଲା। ତାହାର ପଛେ ପଛେ ଅନ୍ୟ ରାଜାମାନେ ମଧ୍ୟ ଯେନେ ପ୍ରାଣମୋହ ତ୍ୟାଗ କରି ସଭାରୁ ଉଠି ଚାଲିଗଲେ।

Verse 3

आज्ञापयच्च राज्ञस्तान्‌ पार्थिवान्‌ नष्टचेतस: । प्रयाध्व॑ वै कुरुक्षेत्रं पुष्योडद्येति पुन: पुन:,ज्ञात हुआ है, दुर्योधनने उन विवेकशून्य राजाओं-को यह बार-बार आज्ञा दे दी कि तुम सब लोग कुरुक्षेत्रको चलो। आज पुष्य नक्षत्र है

ଏବଂ ସେ ଚେତନାହୀନ ସେହି ପାର୍ଥିବ ରାଜାମାନଙ୍କୁ ପୁନଃ ପୁନଃ ଆଜ୍ଞା ଦେଲା—“ତୁମେ ସମସ୍ତେ କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କର; ଆଜି ପୁଷ୍ୟ ନକ୍ଷତ୍ରର ଉଦୟ।”

Verse 4

ततस्ते पृथिवीपाला: प्रययु: सहसैनिका: । भीष्मं सेनापतिं कृत्वा संहृष्टाः कालचोदिता:,तदनन्तर वे सभी भूपाल कालसे प्रेरित हो भीष्मको सेनापति बनाकर बड़े हर्षके साथ सैनिकों-सहित वहाँसे चल दिये हैं

ତାପରେ ସେହି ସମସ୍ତ ପୃଥିବୀପାଳ ନିଜ-ନିଜ ସେନା ସହିତ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ। କାଳର ପ୍ରେରଣାରେ, ସଙ୍କଳ୍ପରେ ହର୍ଷିତ ହୋଇ, ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ସେନାପତି କରି ସେଠାରୁ ଚାଲିଗଲେ—ଯେଉଁଠାରୁ ଯୁଦ୍ଧଦିଗକୁ ଭାଗ୍ୟର ଧାରା ମୁହଁ ଫେରାଇଲା।

Verse 5

अक्षौहिण्यो दशैका च कौरवाणां समागता: । तासां प्रमुखतो भीष्मस्तालकेतुर्व्यरोचत,कौरवोंकी ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएँ आ गयी हैं। उन सबमें प्रधान हैं भीष्मजी, जो अपने तालध्वजके साथ सुशोभित हो रहे हैं

କୌରବମାନଙ୍କର ଏଗାର ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ଏକତ୍ର ହେଲା। ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତଙ୍କ ଅଗ୍ରଭାଗରେ ତାଳଧ୍ୱଜଧାରୀ ଭୀଷ୍ମ ତେଜସ୍ବୀ ଭାବେ ଶୋଭିତ ହେଲେ।

Verse 6

यदत्र युक्त प्राप्त च तद्‌ विधत्स्व विशाम्पते । उक्त भीष्मेण यद्‌ वाक्‍्यं द्रोणेन विदुरेण च,प्रजानाथ! अब तुम्हें भी जो उचित जान पड़े, वह करो। भारत! कौरवसभामें भीष्म, द्रोण, विदुर, गान्धारी तथा धृतराष्ट्रने मेरे सामने जो बातें कही थीं, वे सब आपको सुना दीं। राजन! यही वहाँका वृत्तान्त है

ହେ ପ୍ରଜାନାଥ! ଏହି ପରିସ୍ଥିତିରେ ଯାହା ଯୁକ୍ତ ଓ ଆବଶ୍ୟକ, ସେହି କର। କୌରବସଭାରେ ମୋ ସମ୍ମୁଖରେ ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣ, ବିଦୁର (ଏବଂ ଗାନ୍ଧାରୀ, ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର) ଯାହା କହିଥିଲେ, ସେ ସବୁ ମୁଁ ତୁମକୁ କହିଦେଲି। ହେ ଭାରତ! ସେଠାରେ ଘଟିଥିବା ବୃତ୍ତାନ୍ତ ଏହି; ଏବେ ଧର୍ମସମ୍ମତ ଯାହା ତୁମକୁ ଠିକ୍ ଲାଗେ, ସେହିପରି ନିଷ୍ପତ୍ତି କର।

Verse 7

गान्धार्या धृतराष्ट्रेण समक्ष मम भारत । एतत्‌ ते कथितं राजन्‌ यद्‌ वृत्तं कुरुसंसदि,प्रजानाथ! अब तुम्हें भी जो उचित जान पड़े, वह करो। भारत! कौरवसभामें भीष्म, द्रोण, विदुर, गान्धारी तथा धृतराष्ट्रने मेरे सामने जो बातें कही थीं, वे सब आपको सुना दीं। राजन! यही वहाँका वृत्तान्त है

ହେ ଭାରତ! ଗାନ୍ଧାରୀ ଓ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ କୁରୁସଭାରେ ଯାହା ଘଟିଲା, ହେ ରାଜନ, ସେ ସବୁ ମୁଁ ତୁମକୁ କହିଦେଲି। ଏବେ ହେ ପ୍ରଜାନାଥ! ଯାହା ତୁମକୁ ଯୁକ୍ତ ଲାଗେ, ସେହି କର।

Verse 8

साम्यमादौ प्रयुक्त मे राजन्‌ सौश्रात्रमिच्छता । अभेदायास्य वंशस्य प्रजानां च विवृद्धये,राजन! मैंने सब भाइयोंमें उत्तम बन्धुजनोचित प्रेम बने रहनेकी इच्छासे पहले सामनीतिका प्रयोग किया था, जिससे इस वंशमें फूट न हो और प्रजाजनोंकी निरन्तर उन्नति होती रहे

ହେ ରାଜନ! ଭାଇମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଉତ୍ତମ ବନ୍ଧୁଜନୋଚିତ ସ୍ନେହ ଅଟୁଟ ରହୁ—ଏହି ଇଚ୍ଛାରେ ମୁଁ ପ୍ରଥମେ ସାମନୀତିର ପ୍ରୟୋଗ କରିଥିଲି; ଯେପରି ଏହି ବଂଶରେ ଭେଦ ନ ହେଉ ଏବଂ ପ୍ରଜାମାନଙ୍କର ନିରନ୍ତର ବିକାଶ ହୋଇ ଚାଲୁ।

Verse 9

पुनर्भेदश्न मे युक्तो यदा साम न गृहाते । कर्मानुकीर्तनं चैव देवमानुषसंहितम्‌,जब वे सामनीति न ग्रहण कर सके, तब मैंने भेदनीतिका प्रयोग किया (उनमें फूट डालनेकी चेष्टा की)। पाण्डवोंके देव-मनुष्योचित कर्मोंका बारंबार वर्णन किया

ଯେତେବେଳେ ମୋର ସାମନୀତି ଗ୍ରହଣ ହେଲା ନାହିଁ, ସେତେବେଳେ ମୁଁ ଭେଦନୀତିର ଆଶ୍ରୟ ନେଲି। ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଦେବ-ମାନବୋଚିତ କର୍ମକୁ ମୁଁ ପୁନଃପୁନଃ ବର୍ଣ୍ଣନା କଲି, ଯେପରି ତାଙ୍କର ଶ୍ରେଷ୍ଠତା ଓ ଧର୍ମାଚରଣ ସ୍ପଷ୍ଟ ହୁଏ।

Verse 10

यदा नाद्रियते वाक्‍्यं सामपूर्व सुयोधन: । तदा मया समानीय भेदिता: सर्वपार्थिवा:,जब मैंने देखा दुर्योधन मेरे सान्त्वनापूर्ण वचनोंका पालन नहीं कर रहा है, तब मैंने सब राजाओंको बुलाकर उनमें फ़ूट डालनेका प्रयत्न किया

ଯେତେବେଳେ ମୁଁ ଦେଖିଲି ଯେ ସୁୟୋଧନ (ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ) ସାମଭାବରେ କହିଥିବା ମୋର ସାନ୍ତ୍ୱନାପୂର୍ଣ୍ଣ ବାକ୍ୟକୁ ଆଦର କରୁନାହିଁ, ସେତେବେଳେ ମୁଁ ସମସ୍ତ ରାଜାଙ୍କୁ ଏକତ୍ର କରି ତାଙ୍କ ମନରେ ଭେଦ ସୃଷ୍ଟି କରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କଲି, ଯେପରି ତାହାର ହଠ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଏକ ଧ୍ୱଂସାତ୍ମକ ପଥରେ ନେଇ ନଯାଏ।

Verse 11

भारत! वहाँ मैंने बहुत-से अद्भुत, भयंकर, निछ्ठर एवं अमानुषिक कर्मोका प्रदर्शन किया

ହେ ଭାରତ! ସେଠାରେ ମୁଁ ଅନେକ ଅଦ୍ଭୁତ ଓ ଭୟଙ୍କର, ନିଷ୍ଠୁର ଏବଂ ମାନବସୀମାତୀତ କର୍ମ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିଥିଲି।

Verse 12

निर्भर्त्सयित्वा राज्ञस्तांस्तृणीकृत्य सुयोधनम्‌ । राधेयं भीषयित्वा च सौबलं च पुन: पुनः:,समस्त राजाओंको डाँट बताकर दुर्योधनको तिनकेके समान समझकर तथा राधानन्दन कर्ण और सुबलपुत्र शकुनिको बार-बार डराकर जूएसे धृतराष्ट्रपुत्रोंकी निन्दा करके वाणी तथा गुप्त मन्त्रणाद्वारा सब राजाओंके मनमें अनेक बार भेद उत्पन्न करनेके पश्चात्‌ फिर सामसहित दानकी बात उठायी, जिससे कुरुवंशकी एकता बनी रहे और अभीष्ट कार्यकी सिद्धि हो जाय

ସେହି ରାଜାମାନଙ୍କୁ ତିରସ୍କାର କରି, ସୁୟୋଧନକୁ ତୃଣସମ ତୁଚ୍ଛ ଭାବି, ରାଧେୟ (କର୍ଣ୍ଣ) ଓ ସୌବଳ (ଶକୁନି)କୁ ପୁନଃପୁନଃ ଭୟଭୀତ କରି—ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ନିନ୍ଦା କରୁଥିବାବେଳେ—ମୁଁ ବାଣୀ ଓ ଗୁପ୍ତ ମନ୍ତ୍ରଣାଦ୍ୱାରା ସଭାସ୍ଥ ରାଜାମାନଙ୍କ ମନରେ ଅନେକଥର ଭେଦ ସୃଷ୍ଟି କଲି; ପରେ କୁରୁବଂଶର ଏକତା ରହୁ ଓ ଅଭୀଷ୍ଟ ସିଦ୍ଧି ହେଉ ବୋଲି ସାମ ସହିତ ଦାନର ପ୍ରସ୍ତାବ ଉଠାଇଲି।

Verse 13

द्यूततो धार्तराष्ट्राणां निन्‍्दां कृत्वा तथा पुनः । भेदयित्वा नृपान्‌ सर्वान्‌ वाम्भिर्मन्त्रेण चासकृत्‌,समस्त राजाओंको डाँट बताकर दुर्योधनको तिनकेके समान समझकर तथा राधानन्दन कर्ण और सुबलपुत्र शकुनिको बार-बार डराकर जूएसे धृतराष्ट्रपुत्रोंकी निन्दा करके वाणी तथा गुप्त मन्त्रणाद्वारा सब राजाओंके मनमें अनेक बार भेद उत्पन्न करनेके पश्चात्‌ फिर सामसहित दानकी बात उठायी, जिससे कुरुवंशकी एकता बनी रहे और अभीष्ट कार्यकी सिद्धि हो जाय

ଜୁଆ ଦ୍ୱାରା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ନିନ୍ଦା କରି, ଏବଂ ପୁନଃ ବାଣୀ ଓ ଗୁପ୍ତ ମନ୍ତ୍ରଣାଦ୍ୱାରା ସମସ୍ତ ରାଜାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପୁନଃପୁନଃ ଭେଦ ସୃଷ୍ଟି କରି, ସେ ଆଗକୁ ବଢ଼ିଲା।

Verse 14

पुनः सामाभिसंयुक्तं सम्प्रदानमथाब्रुवम्‌ । अभेदात्‌ कुरुवंशस्य कार्ययोगात्‌ तथैव च,समस्त राजाओंको डाँट बताकर दुर्योधनको तिनकेके समान समझकर तथा राधानन्दन कर्ण और सुबलपुत्र शकुनिको बार-बार डराकर जूएसे धृतराष्ट्रपुत्रोंकी निन्दा करके वाणी तथा गुप्त मन्त्रणाद्वारा सब राजाओंके मनमें अनेक बार भेद उत्पन्न करनेके पश्चात्‌ फिर सामसहित दानकी बात उठायी, जिससे कुरुवंशकी एकता बनी रहे और अभीष्ट कार्यकी सिद्धि हो जाय

ତାପରେ ମୁଁ ପୁଣି ସାମନୀତି ସହିତ ଯୁକ୍ତ ହୋଇ ସମାଧାନଦାନର କଥା କହିଲି—ଯେପରି କୁରୁବଂଶରେ ଭେଦ ନ ହେଉ ଏବଂ ଇଚ୍ଛିତ କାର୍ଯ୍ୟ ସିદ્ધ ହେଉ।

Verse 15

ते शूरा धृतराष्ट्रस्य भीष्मस्य विदुरस्य च । तिष्ठेयु: पाण्डवा: सर्वे हित्वा मानमधश्चरा:,मैंने कहा--नृपश्रेष्ठ! यद्यपि पाण्डव शौर्यसे सम्पन्न हैं, तथापि वे सब-के-सब अभिमान छोड़कर भीष्म, धृतराष्ट्र और विदुरके नीचे रह सकते हैं। वे अपना राज्य भी तुम्हींको दे दें और सदा तुम्हारे अधीन होकर रहें। राजा धृतराष्ट्र, भीष्म और विदुरजीने तुम्हारे हितके लिये जैसी बात कही है, वैसा ही करो। सारा राज्य तुम्हारे ही पास रहे। तुम पाण्डवोंको पाँच ही गाँव दे दो; क्योंकि तुम्हारे पिताके लिये पाण्डवोंका भरण-पोषण करना भी परम आवश्यक है

ସେଇ ଶୂର ପାଣ୍ଡବମାନେ ଅଭିମାନ ତ୍ୟାଗ କରି ନମ୍ରତାରେ ରହି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର, ଭୀଷ୍ମ ଓ ବିଦୁରଙ୍କ ଅଧୀନରେ ମଧ୍ୟ ରହିପାରିବେ। ତେଣୁ ନିଜ ହିତ ପାଇଁ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର, ଭୀଷ୍ମ ଓ ବିଦୁର ଯାହା କହିଛନ୍ତି ସେହିପରି କର—ରାଜ୍ୟ ତୋର ପାଖରେ ରହୁ; ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଜୀବିକା ପାଇଁ କେବଳ ପାଞ୍ଚଟି ଗାଁ ଦେ।

Verse 16

प्रयच्छन्तु च ते राज्यमनीशास्ते भवन्तु च | यथा<55ह राजा गाड़ेयो विदुरश्ष हितं तव,मैंने कहा--नृपश्रेष्ठ! यद्यपि पाण्डव शौर्यसे सम्पन्न हैं, तथापि वे सब-के-सब अभिमान छोड़कर भीष्म, धृतराष्ट्र और विदुरके नीचे रह सकते हैं। वे अपना राज्य भी तुम्हींको दे दें और सदा तुम्हारे अधीन होकर रहें। राजा धृतराष्ट्र, भीष्म और विदुरजीने तुम्हारे हितके लिये जैसी बात कही है, वैसा ही करो। सारा राज्य तुम्हारे ही पास रहे। तुम पाण्डवोंको पाँच ही गाँव दे दो; क्योंकि तुम्हारे पिताके लिये पाण्डवोंका भरण-पोषण करना भी परम आवश्यक है

ସେମାନେ ନିଜ ରାଜ୍ୟ ମଧ୍ୟ ତୋତେ ଦେଇ, ନିରଧିକାର ହୋଇ ତୋର ଅଧୀନରେ ରହିପାରନ୍ତି। ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର, ଭୀଷ୍ମ ଓ ବିଦୁର ତୋର ହିତ ପାଇଁ ଯାହା କହିଛନ୍ତି ସେହିପରି କର—ସମସ୍ତ ରାଜ୍ୟ ତୋର ପାଖରେ ରହୁ; ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ କେବଳ ପାଞ୍ଚଟି ଗାଁ ଦେ, କାରଣ ପିତାଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ପୋଷଣ କରିବା ମଧ୍ୟ ଧର୍ମ।

Verse 17

सर्व भवतु ते राज्यं पञ्च ग्रामान्‌ विसर्जय । अवश्यं भरणीया हि पितुस्ते राजसत्तम,मैंने कहा--नृपश्रेष्ठ! यद्यपि पाण्डव शौर्यसे सम्पन्न हैं, तथापि वे सब-के-सब अभिमान छोड़कर भीष्म, धृतराष्ट्र और विदुरके नीचे रह सकते हैं। वे अपना राज्य भी तुम्हींको दे दें और सदा तुम्हारे अधीन होकर रहें। राजा धृतराष्ट्र, भीष्म और विदुरजीने तुम्हारे हितके लिये जैसी बात कही है, वैसा ही करो। सारा राज्य तुम्हारे ही पास रहे। तुम पाण्डवोंको पाँच ही गाँव दे दो; क्योंकि तुम्हारे पिताके लिये पाण्डवोंका भरण-पोषण करना भी परम आवश्यक है

ସମସ୍ତ ରାଜ୍ୟ ତୋର ହେଉ; କେବଳ ପାଞ୍ଚଟି ଗାଁ ଛାଡ଼ିଦେ। କାରଣ, ରାଜଶ୍ରେଷ୍ଠ, ସେମାନଙ୍କୁ ପୋଷଣ କରିବା ତୋର ପିତାଙ୍କ ପାଇଁ ନିଶ୍ଚୟ ଅନିବାର୍ୟ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ।

Verse 18

एवमुक्तो5पि दुष्टात्मा नैव भागं व्यमुज्चत । दण्डं चतुर्थ पश्यामि तेषु पापेषु नान्यथा,मेरे इस प्रकार कहनेपर भी उस दुष्टात्माने राज्यका कोई भाग तुम्हारे लिये नहीं छोड़ा अर्थात्‌ देना नहीं स्वीकार किया। अब तो मैं उन पापियोंपर चौथे उपाय दण्डके प्रयोगकी ही आवश्यकता देखता हूँ, अन्यथा उन्हें मार्गपर लाना असम्भव है

ମୁଁ ଏପରି କହିଲେ ମଧ୍ୟ ସେ ଦୁଷ୍ଟାତ୍ମା କୌଣସି ଭାଗ ଛାଡ଼ିଲା ନାହିଁ। ତେଣୁ ସେଇ ପାପୀମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ମୋତେ ଚତୁର୍ଥ ଉପାୟ—ଦଣ୍ଡ—ଛଡ଼ା ଅନ୍ୟ କିଛି ଦିଶୁନାହିଁ; ନହେଲେ ସେମାନଙ୍କୁ ସନ୍ମାର୍ଗରେ ଆଣିବା ଅସମ୍ଭବ।

Verse 19

निर्याताश्न विनाशाय कुरुक्षेत्र नराधिपा: । एतत्‌ ते कथितं राजन्‌ यद्‌ वृत्तं कुरुसंसदि,सब राजा अपने विनाशके लिये कुरक्षेत्रको प्रस्थान कर चुके हैं। राजन्‌! कौरव-सभामें जो कुछ हुआ था, वह सारा वृत्तान्त मैंने तुमसे कह सुनाया

ରାଜନ୍! ସମସ୍ତ ନରାଧିପ ନିଜ ନିଜ ବିନାଶ ପାଇଁ କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରିସାରିଛନ୍ତି। କୁରୁସଭାରେ ଯାହା ଘଟିଥିଲା, ସେ ସମଗ୍ର ବୃତ୍ତାନ୍ତ ମୁଁ ତୁମକୁ କହିଶୁଣାଇଲି।

Verse 20

नते राज्यं प्रयच्छन्ति विना युद्धेन पाण्डव । विनाशहेतव: सर्वे प्रत्युपस्थितमृत्यव:,पाण्डुनन्दन! वे कौरव बिना युद्ध किये तुम्हें राज्य नहीं देंगे। उन सबके विनाशका कारण जुट गया है और उनका मृत्युकाल भी आ पहुँचा है

ହେ ପାଣ୍ଡବ! ଯୁଦ୍ଧ ବିନା ସେମାନେ ତୁମକୁ ରାଜ୍ୟ ଦେବେ ନାହିଁ। ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ନିଜ ବିନାଶର କାରଣ ହୋଇପଡ଼ିଛନ୍ତି, ଏବଂ ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ! ସେମାନଙ୍କର ମୃତ୍ୟୁକାଳ ମଧ୍ୟ ସମୀପରେ ଆସିପହଞ୍ଚିଛି।

Verse 131

अद्भुतानि च घोराणि दारुणानि च भारत | अमानुषाणि कर्माणि दर्शितानि मया विभो

ହେ ଭାରତ! ମୁଁ ତୁମକୁ ଅଦ୍ଭୁତ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଘୋର ଓ ଦାରୁଣ—ମାନବ ସୀମାର ପରେ ଥିବା—କର୍ମ ଓ ଲକ୍ଷଣ ଦେଖାଇଛି, ହେ ବିଭୋ!

Verse 150

इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि श्रीकृष्णवाक्ये पजञ्चाशदधिकशततमो<ध्याय:

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବର ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣବାକ୍ୟବିଷୟକ ଏକଶ ପଚାଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ।

Frequently Asked Questions

The dilemma is how to choose military leadership ethically when conflict appears unavoidable: whether selection should follow personal valor claims, lineage and seniority, strategic necessity (countering Bhīṣma/Droṇa), or the authoritative judgment of a trusted counselor (Kṛṣṇa) who is positioned as knowing the broader balance of outcomes.

Competence in action must be integrated with legitimacy and counsel: decisions with collective consequences are best stabilized through transparent deliberation, deference to qualified ethical strategy, and disciplined preparation that includes protection, provisioning, and respect for social-sacral boundaries.

No explicit phalaśruti appears here; the chapter’s meta-level emphasis is practical-ethical—how dharma is operationalized through command structure, morale signaling, and responsible encampment—framing preparedness itself as a form of duty.