Adhyaya 144
Udyoga ParvaAdhyaya 14413 Versesयुद्ध आरम्भ से पूर्व कूटनीति और अंतःसंघर्ष का चरण; एक व्यक्ति का निर्णय भविष्य के रक्तपात की दिशा बदल सकता है।

Adhyaya 144

कुन्ती–कर्णसंवादः (Kuntī–Karṇa Dialogue: Loyalty, Fate, and Constrained Assurance)

Upa-parva: Kuntī–Karṇa Saṃvāda (Kuntī-Karṇa Dialogue Episode)

Vaiśaṃpāyana narrates that Karṇa hears a formidable, affectionate appeal associated with Bhāskara (Sūrya), framed as paternal in force. The appeal urges him to accept Kuntī’s truthful words and act in accordance with maternal counsel for his welfare. Karṇa’s resolve does not waver: he challenges the credibility and timing of Kuntī’s claim, stating that her earlier actions deprived him of due kṣatriya rites and social standing, and that the present appeal appears self-interested. He argues that shifting sides now would damage his honor and the expectations of those who rely on him; he frames loyalty to the Dhārtarāṣṭras as a duty, even at personal risk, and critiques betrayal as ethically ruinous. He affirms he will fight for Dhṛtarāṣṭra’s sons, yet offers a limited concession: he will not kill Yudhiṣṭhira, Bhīma, or the twins, reserving his decisive rivalry for Arjuna; thus, whichever outcome occurs, Kuntī will not be left without five renowned sons (either with Karṇa surviving among them or Arjuna). Kuntī, distressed, acknowledges the force of destiny (daiva) and asks him to reaffirm his assurance regarding her other sons; the exchange ends with formal well-wishing and separation.

Chapter Arc: युद्ध की छाया घनी है; उसी संध्या कुन्ती अकेले कर्ण के पास पहुँचती है और एक वाक्य में उसके जीवन की जड़ हिला देती है—“तू राधेय नहीं, कौन्तेय है।” → कुन्ती अपने गुप्त मातृत्व का उद्घाटन करती है: कन्यावस्था में सूर्यदेव से उत्पन्न प्रथम पुत्र, जिसे लोकलज्जा से त्यागना पड़ा। वह कर्ण को उसके वास्तविक भ्रातृत्व से परिचित कराती है और धृतराष्ट्र-पक्ष की सेवा को ‘मोह’ कहकर रोकती है। साथ ही वह उसे पाण्डवों की ‘यौधिष्ठिरी श्री’—धर्मसम्मत राज्यलक्ष्मी—का भागी बनने का प्रलोभन नहीं, अधिकार बताती है। → कुन्ती का निर्णायक आग्रह: कर्ण पाँचों भाइयों से घिरकर वैसे शोभित होगा जैसे यज्ञवेदी पर देवों से घिरा ब्रह्मा; ‘सूतपुत्र’ का कलंक मिटेगा—वह वीर्यवान पार्थ है, ज्येष्ठ है, श्रेष्ठ बन्धुओं में श्रेष्ठ है। → कुन्ती कर्ण के सामने जन्म-सत्य, देव-जन्य तेज, और धर्मपक्ष का स्पष्ट विकल्प रख देती है—पाण्डवों के साथ आकर भ्रातृधर्म निभाने का मार्ग। → कर्ण इस सत्य और प्रस्ताव पर क्या उत्तर देगा—मातृत्व की पुकार मानेगा या दुर्योधन-ऋण? (उत्तर अगले अध्याय की देहरी पर ठहरता है।)

Shlokas

Verse 1

अत-#-#कत पजञज्चचत्वारिशर्दाधिकशततमो< ध्याय: कुन्तीका कर्णको अपना प्रथम पुत्र बताकर उससे पाण्डवपक्षमें मिल जानेका अनुरोध कर्ण उवाच राधेयो5हमाधिरथि: कर्णस्त्वामभिवादये । प्राप्ता किमर्थ भवती ब्रूहि किं करवाणि ते,कर्ण बोला--देवि! मैं राधा तथा अधिरथका पुत्र कर्ण हूँ और आपके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ। आपने किसलिये यहाँतक आनेका कष्ट किया है? बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—ଦେବୀ! ମୁଁ ରାଧେୟ, ଅଧିରଥଙ୍କ ପୁତ୍ର—କର୍ଣ୍ଣ। ଆପଣଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କରୁଛି। ଆପଣ କେଉଁ କାରଣରେ ଏଠାକୁ ଆସିଛନ୍ତି? କହନ୍ତୁ, ମୁଁ ଆପଣଙ୍କ କେଉଁ ସେବା କରିବି?

Verse 2

कुन्त्युवाच कौन्तेयस्त्वं न राधेयो न तवाधिरथ: पिता । नासि सूतकुले जात: कर्ण तद्‌ विद्धि मे वच:,कुन्तीने कहा--कर्ण! तुम राधाके नहीं, कुन्तीके पुत्र हो। तुम्हारे पिता अधिरथ नहीं हैं और तुम सूतकुलमें नहीं उत्पन्न हुए हो। मेरी इस बातको ठीक मानो

କୁନ୍ତୀ କହିଲେ—କର୍ଣ୍ଣ! ତୁମେ ରାଧାଙ୍କ ପୁତ୍ର ନୁହ; ତୁମେ କୁନ୍ତୀଙ୍କ ପୁତ୍ର। ତୁମ ପିତା ଅଧିରଥ ନୁହନ୍ତି, ଏବଂ ତୁମେ ସୂତକୁଳରେ ଜନ୍ମ ନେଇନାହ। ମୋ ଏହି କଥାକୁ ସତ୍ୟ ବୋଲି ଜାଣ।

Verse 3

कानीनस्त्वं मया जात: पूर्वज: कुक्षिणा धृतः । कुन्तिराजस्य भवने पार्थस्त्वमसि पुत्रक,तुम कन्यावस्थामें मेरे गर्भसे उत्पन्न हुए प्रथम पुत्र हो। महाराज कुन्तिभोजके घरमें रहते समय मैंने तुम्हें गर्भभें धारण किया था; अतः बेटा! तुम पार्थ हो

ତୁମେ ମୋର କାନୀନ ପୁତ୍ର—ମୁଁ କନ୍ୟାବସ୍ଥାରେ ଥିବାବେଳେ ମୋ ଗର୍ଭରୁ ଜନ୍ମିଥିବା ମୋର ପ୍ରଥମ ସନ୍ତାନ। କୁନ୍ତିଭୋଜ ରାଜାଙ୍କ ଭବନରେ ରହୁଥିବା ସମୟରେ ମୁଁ ତୁମକୁ ଗର୍ଭେ ଧାରଣ କରିଥିଲି; ତେଣୁ, ପୁତ୍ର, ତୁମେ ପାର୍ଥ।

Verse 4

प्रकाशकर्मा तपनो यो<यं देवो विरोचन: । अजीजनत त्वां मय्येष कर्ण शस्त्रभृतां वरम्‌

ଯେ ଆଲୋକକୁ ନିଜ କାର୍ଯ୍ୟ କରିଥିବା, ତାପ ଦାନକାରୀ ଦେବ ବିରୋଚନ (ସୂର୍ଯ୍ୟ), ସେଇ—ହେ କର୍ଣ୍ଣ—ମୋ ମଧ୍ୟରେ ତୁମକୁ ଜନ୍ମ ଦେଇଛନ୍ତି, ଶସ୍ତ୍ରଧାରୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଭାବେ।

Verse 5

कर्ण! ये जो जगतमें प्रकाश और उष्णता प्रदान करनेवाले भगवान्‌ सूर्यदेव हैं, इन्होंने शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ तुम-जैसे वीर पुत्रको मेरे गर्भसे उत्पन्न किया है ।। कुण्डली बद्धकवचो देवगर्भ: श्रिया वृतः । जातस्त्वमसि दुर्धर्ष मया पुत्र पितुर्गहे,दुर्धर्ष पुत्र! मैंने पिताके घरमें तुम्हें जन्म दिया था। तुम जन्मकालसे ही कुण्डल और कवच धारण किये देवबालकके समान शोभासम्पन्न रहे हो

ଜଗତକୁ ଆଲୋକ ଓ ତାପ ଦେଇଥିବା ସୂର୍ଯ୍ୟଦେବ ମୋ ଗର୍ଭ ମାଧ୍ୟମରେ ତୁମକୁ—ଶସ୍ତ୍ରଧାରୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ—ଜନ୍ମ ଦେଇଛନ୍ତି। ହେ ଦୁର୍ଧର୍ଷ ପୁତ୍ର! ମୁଁ ତୁମକୁ ତୁମ ପିତାଙ୍କ ଘରେ ଜନ୍ମ ଦେଇଥିଲି। ଜନ୍ମକ୍ଷଣରୁ ତୁମେ କୁଣ୍ଡଳ ଓ ସହଜ କବଚ ଧାରଣ କରି, ଦେବଶିଶୁ ପରି ତେଜ ଓ ଶ୍ରୀରେ ଆବୃତ ଥିଲ।

Verse 6

स त्वं भ्रातृनसम्बु्धा मोहाद्‌ यदुपसेवसे । धार्तराष्ट्रानू न तद्‌ युक्त त्वयि पुत्र विशेषत:,बेटा! तुम जो अपने भाइयोंसे अपरिचित रहकर मोहवश धृतराष्ट्रके पुत्रोंकी सेवा कर रहे हो, वह तुम्हारे लिये कदापि योग्य नहीं है

କିନ୍ତୁ ତୁମେ ନିଜ ଭାଇମାନଙ୍କୁ ନ ଚିହ୍ନି, ମୋହବଶେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସେବା କରୁଛ; ସେ ପଥ ତୁମ ପାଇଁ କେବେ ଯୁକ୍ତ ନୁହେଁ—ବିଶେଷକରି, ମୋ ପୁତ୍ର ତୁମ ପାଇଁ।

Verse 7

एतदू धर्मफल पुत्र नराणां धर्मनिश्चये । यत्‌ तुष्यन्त्यस्य पितरो माता चाप्येकदर्शिनी,बेटा! धर्मशास्त्रमें मनुष्योंके लिये यही धर्मका उत्तम फल बताया गया है कि उनके पिता आदि गुरुजन तथा एकमात्र पुत्रपर ही दृष्टि रखनेवाली माता उनसे संतुष्ट रहें

ପୁତ୍ର, ଧର୍ମ ନିର୍ଣ୍ଣୟ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛୁକ ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଧର୍ମଶାସ୍ତ୍ରରେ ଏହିଏ ଧର୍ମର ସର୍ବୋତ୍ତମ ଫଳ କୁହାଯାଇଛି—ଯେ ପିତୃମାନେ ଓ ଅନ୍ୟ ପୂଜ୍ୟ ଗୁରୁଜନ, ଏବଂ ନିଜ ଏକମାତ୍ର ପୁତ୍ର ଉପରେ ଦୃଷ୍ଟି ନିବେଶ କରିଥିବା ମାତା—ସେମାନେ ତାହାରେ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ରୁହନ୍ତି।

Verse 8

अर्जुनेनार्जितां पूर्व हृतां लोभादसा धुभि: । आच्चिद्य धार्तराष्ट्रेभ्यो भुड़क्ष्य यौधिष्ठिरी श्रियम्‌,अर्जुनने पूर्वकालमें जिसका उपार्जन किया था और दुष्टोंने लोभवश जिसे हर लिया है, युधिष्ठिरकी उस राज्यलक्ष्मीको तुम धृतराष्ट्रपुत्रोंसे छीनकर भाइयोंसहित उसका उपभोग करो

ଅର୍ଜୁନ ପୂର୍ବେ ଯେ ରାଜଲକ୍ଷ୍ମୀ ଅର୍ଜନ କରିଥିଲେ ଏବଂ ଦୁଷ୍ଟମାନେ ଲୋଭରେ ଯାହା ହରଣ କରିଛନ୍ତି, ସେଇ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ରାଜଶ୍ରୀକୁ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରମାନଙ୍କଠାରୁ ଛିନି ନେଇ, ଭାଇମାନଙ୍କ ସହ ଧର୍ମପୂର୍ବକ ଭୋଗ କର।

Verse 9

अद्य पश्यन्ति कुरव: कर्णार्जुनसमागमम्‌ | सौभ्रात्रेण समालक्ष्य संनमन्‍न्तामसाधव:,आज उत्तम बन्धुजनोचित स्नेहके साथ कर्ण और अर्जुनका मिलन कौरवलोग देखें और इसे देखकर दुष्टलोग नतमस्तक हों

ଆଜି କୁରୁମାନେ କର୍ଣ୍ଣ ଓ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ସମାଗମ ଦେଖୁନ୍ତୁ; ଏହା ଉତ୍ତମ ଭ୍ରାତୃସ୍ନେହରେ ଚିହ୍ନିତ ବୋଲି ଦେଖି ଦୁଷ୍ଟମାନେ ମସ୍ତକ ନମାଉନ୍ତୁ।

Verse 10

कर्णार्जुनौ वै भवेतां यथा रामजनार्दनौ | असाध्यं कि तु लोके स्याद्‌ युवयो: संहितात्मनो:,कर्ण और अर्जुन दोनों मिलकर वैसे ही बलशाली हैं जैसे बलराम और श्रीकृष्ण। बेटा! तुम दोनों हृदयसे संगठित हो जाओ तो इस जगत्‌में तुम्हारे लिये कौन-सा कार्य असाध्य होगा?

କର୍ଣ୍ଣ ଓ ଅର୍ଜୁନ ଦୁହେଁ ବଳରାମ ଓ ଜନାର୍ଦ୍ଦନ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ପରି ଏକତ୍ର ହେଉନ୍ତୁ। ପୁତ୍ର! ତୁମେ ଦୁଇଜଣ ଯଦି ହୃଦୟରେ ଏକ ହେଉ, ତେବେ ଏହି ଲୋକରେ ତୁମ ପାଇଁ କେଉଁ କାର୍ଯ୍ୟ ଅସାଧ୍ୟ ରହିବ?

Verse 11

कर्ण शोभिष्यसे नूनं पञ्चभिय्भ्रातृभिर्वृत: । देवै: परिवृतो ब्रह्मा वेद्यामिव महाध्वरे,कर्ण! जिस प्रकार महान्‌ यज्ञकी वेदीपर देवगणोंसे घिरे हुए ब्रह्माजी सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार अपने पाँचों भाइयोंसे घिरे हुए तुम भी शोभा पाओगे

ହେ କର୍ଣ୍ଣ! ମହାଯଜ୍ଞର ବେଦୀରେ ଦେବମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପରିବୃତ ବ୍ରହ୍ମା ଯେପରି ଶୋଭା ପାଆନ୍ତି, ସେପରି ତୁମେ ମଧ୍ୟ ତୁମ ପାଞ୍ଚ ଭାଇଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଘେରା ହୋଇ ନିଶ୍ଚୟ ଶୋଭା ପାଇବ।

Verse 12

उपपन्नो गुणै: सर्वर्ज्येष्ठ: श्रेष्ठेषु बन्धुषु । सूतपुत्रेति मा शब्द: पार्थस्त्वमसि वीर्यवान्‌,अपने श्रेष्ठ स्वभाववाले बन्धुओंके बीचमें तुम सर्वगुणसम्पन्न ज्येष्ठ भ्राता परम पराक्रमी कुन्तीपुत्र कर्ण हो। तुम्हारे लिये सूतपुत्र शब्दका प्रयोग नहीं होना चाहिये

ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସ୍ୱଭାବର ବନ୍ଧୁମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ତୁମେ ସର୍ବଗୁଣସମ୍ପନ୍ନ ଜ୍ୟେଷ୍ଠ ଭ୍ରାତା; ତୁମେ ବୀର୍ୟବାନ ପାର୍ଥ—କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର। ତୁମ ପାଇଁ ‘ସୂତପୁତ୍ର’ ବୋଲି ଶବ୍ଦ ଚାଲିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।

Verse 145

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि कुन्तीकर्णसमागमे पज्चचत्वारिंशदधिकशततमो<ध्याय:

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବରେ, ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ କୁନ୍ତୀ-କର୍ଣ୍ଣ-ସମାଗମ ପ୍ରସଙ୍ଗରେ ଏକଶେ ପଞ୍ଚଚାଳିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether biological kinship and maternal appeal can override established loyalties, public honor, and patronage-debts when a conflict is imminent—especially when the appeal is perceived as delayed and strategically timed.

The passage emphasizes that ethical life in political contexts is shaped by time-sensitive duties: delayed acknowledgment can create irreversible social harm, and later truth-claims may not ethically dissolve prior commitments; it also frames destiny (daiva) as a force that can outweigh personal preference.

No explicit phalaśruti is stated; the meta-significance is narrative-ethical: the chapter functions as a formal record of Karṇa’s constraints and assurances, clarifying moral accountability and foreshadowing how vows structure subsequent outcomes.