
भीष्मद्रोणयोर्दुर्योधनं प्रति शमोपदेशः | Bhīṣma and Droṇa’s Counsel of Conciliation to Duryodhana
Upa-parva: Bhīṣma–Droṇa Anunaya (Conciliatory Counsel to Duryodhana)
Vaiśaṃpāyana reports that, after hearing Kuntī’s pointed and dharmically framed message spoken in Kṛṣṇa’s presence, the senior warriors Bhīṣma and Droṇa address Duryodhana with admonitory counsel. They affirm the coherence and moral seriousness of Kuntī’s words and warn that the Pāṇḍavas, aligned with Vāsudeva’s intent, will not be pacified without a substantive political resolution. They recall prior humiliations inflicted upon the Pāṇḍavas and Draupadī, implying that accumulated grievance now has strategic consequences. The elders emphasize the Pāṇḍavas’ proven capability—Arjuna’s martial achievements and alliances, Bhīma’s force, and Kṛṣṇa’s support—arguing that expecting their capitulation is unrealistic. They outline a ritualized pathway for reconciliation: approach Yudhiṣṭhira, remove wrongdoing, exchange respectful greetings and embraces with each brother, and restore fraternity. The discourse then pivots to preventative statecraft: ‘enough of war,’ since warfare predicts widespread kṣatriya destruction. A catalogue of ominous signs (hostile celestial indications, alarming animal behavior, unsettling city and camp phenomena) is presented as corroborating evidence of impending calamity. The chapter closes with a direct governance imperative: Duryodhana’s choice determines either peace or exertion/war, and refusal will lead to suffering when confronting the Pāṇḍava forces and their distinctive battle-sounds (Bhīma’s roar and the resonance of Gāṇḍīva).
Chapter Arc: कुन्ती श्रीकृष्ण से कहती है—अर्जुन के पास मेरा संदेश ले जाओ; उसके जन्म-क्षण की दिव्य वाणी और भविष्यवाणी उसे फिर स्मरण कराओ, ताकि उसका संकल्प अडिग हो। → कुन्ती अर्जुन के भीतर उठ सकने वाले मोह, करुणा और संदेह के विरुद्ध ‘धर्म’ का आवाहन करती है; वह बताती है कि भीम का क्रोध शत्रुओं का अंत किये बिना शांत नहीं होगा, और क्षत्रिय-धर्म का निर्णायक काल आ पहुँचा है। → कुन्ती का कठोर-करुण आदेश: अर्जुन को दिव्य आकाशवाणी का वचन सुनाकर कहो—वह समस्त कौरवों को संग्राम में जीतेगा, भीम के साथ रहकर लोक-धर्म की रक्षा करेगा; और द्यूत-सभा में द्रौपदी के अपमान को पुनः स्मरण कराकर उसे प्रतिज्ञा-बल से जगा दो। → श्रीकृष्ण कुन्ती के वचन स्वीकार कर विदा लेते हैं; वे शीघ्रगामी पक्षियों-से वेग से उपप्लव्य नगर की ओर प्रस्थान करते हैं, जहाँ पाण्डवों के साथ आगे की नीति-योजना और दूत-कार्य का क्रम बढ़ेगा। → कृष्ण उपप्लव्य पहुँचकर अर्जुन को कुन्ती का संदेश कैसे सुनाएँगे—क्या यह स्मरण उसे युद्ध के लिए पूर्णतः दृढ़ करेगा, या भीतर का द्वंद्व और तीव्र होगा?
Verse 1
अत-#--#क्रत सप्तत्रिशर्दाधिकशततमोब< ध्याय: कुन्तीका पाण्डवोंके लिये संदेश देना और श्रीकृष्णका उनसे विदा लेकर उपप्लव्य नगरमें जाना कुन्त्युवाच अर्जुन केशव ब्रूयास्त्वयि जाते सम सूतके । उपोपविष्टा नारीभिराश्रमे परिवारिता,कुन्ती बोली--केशव! तुम अर्जुनसे जाकर कहना, तुम्हारे जन्मके समय जब मैं नारियोंसे घिरी हुई आश्रमके सूतिकागारमें बैठी थी, उसी समय आकाशमें यह दिव्यरूपा मनोरम वाणी सुनायी दी--“कुन्ती! तेरा यह पुत्र इन्द्रके समान पराक्रमी होगा
ତଦନନ୍ତର ଛତ୍ରିଶ ଅଧିକ ଏକଶ ଛତ୍ରିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ଆରମ୍ଭ ହୁଏ। ଏଠାରେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପାଇଁ କୁନ୍ତୀଙ୍କ ସନ୍ଦେଶ ଏବଂ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ତାଙ୍କୁ ବିଦାୟ ଦେଇ ଉପପ୍ଲବ୍ୟ ନଗରକୁ ଗମନ ବର୍ଣ୍ଣିତ। କୁନ୍ତୀ କହିଲେ—“କେଶବ! ତୁମେ ଯିବାବେଳେ ଅର୍ଜୁନକୁ ଏହି କଥା କହିବ: ତୁମ ଜନ୍ମ ସମୟରେ ମୁଁ ଆଶ୍ରମର ସୂତିକାଗାରରେ ନାରୀମାନଙ୍କ ଘେରାରେ ବସିଥିଲି; ସେଇ ସମୟରେ ଆକାଶରୁ ଏକ ଦିବ୍ୟ, ମନୋହର ବାଣୀ ଶୁଣାଗଲା—‘କୁନ୍ତୀ! ତୋର ଏହି ପୁତ୍ର ଇନ୍ଦ୍ର ସମାନ ପରାକ୍ରମୀ ହେବ।’”
Verse 2
अथान्तरिक्षे वागासीद् दिव्यरूपा मनोरमा । सहस्राक्षसम: कुन्ति भविष्यत्येष ते सुत:,कुन्ती बोली--केशव! तुम अर्जुनसे जाकर कहना, तुम्हारे जन्मके समय जब मैं नारियोंसे घिरी हुई आश्रमके सूतिकागारमें बैठी थी, उसी समय आकाशमें यह दिव्यरूपा मनोरम वाणी सुनायी दी--“कुन्ती! तेरा यह पुत्र इन्द्रके समान पराक्रमी होगा
ତେବେ ଅନ୍ତରିକ୍ଷରେ ଏକ ଦିବ୍ୟରୂପା, ମନୋହର ବାଣୀ ହେଲା—“କୁନ୍ତୀ! ତୋର ଏହି ପୁତ୍ର ସହସ୍ରାକ୍ଷ (ଇନ୍ଦ୍ର) ସମାନ ହେବ।”
Verse 3
एष जेष्यति संग्रामे कुरून् सर्वान् समागतान् । भीमसेनद्धितीयश्नव लोकमुद्धर्तयिष्पति,“यह भीमसेनके साथ रहकर युद्धमें आये हुए समस्त कौरवोंको जीत लेगा और शत्रु समुदायको व्याकुल कर देगा
ଏହିଜଣ ଯୁଦ୍ଧରେ ସମାଗତ ସମସ୍ତ କୁରୁମାନଙ୍କୁ ଜୟ କରିବ। ଭୀମସେନକୁ ଦ୍ୱିତୀୟ କରି ଶତ୍ରୁସେନାକୁ ବ୍ୟାକୁଳ କରି, ନିଜ ପକ୍ଷକୁ ବିପଦରୁ ଉଦ୍ଧାର କରିବ।
Verse 4
पुत्रस्ते पृथिवीं जेता यशश्नास्य दिवं स्पृशेत् । हत्वा कुरूंश्व॒ संग्रामे वासुदेवसहायवान्,“तेरा यह पुत्र भगवान् श्रीकृष्णके साथ रहकर इस भूमण्डलको जीत लेगा, इसका यश स्वर्गलेकतक फैल जायगा और यह संग्राममें विपक्षी कौरवोंको मारकर अपने पैतृक राज्यभागका पुनरुद्धार करेगा। यह शोभासम्पन्न बालक अपने भाइयोंके साथ तीन अश्वमेधयज्ञोंका अनुष्ठान करेगा”
ତୋର ଏହି ପୁତ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ଜୟ କରିବ, ତାହାର ଯଶ ସ୍ୱର୍ଗ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପହଞ୍ଚିବ। ବାସୁଦେବ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ)ଙ୍କୁ ସହାୟ କରି ସେ ସଙ୍ଗ୍ରାମରେ କୁରୁମାନଙ୍କୁ ବଧ କରିବ।
Verse 5
पित्र्यमंशं प्रणष्टं च पुनरप्युद्धरिष्यति । भ्रातृभि: सहित: श्रीमांस्त्रीन् मेधानाहरिष्यति,“तेरा यह पुत्र भगवान् श्रीकृष्णके साथ रहकर इस भूमण्डलको जीत लेगा, इसका यश स्वर्गलेकतक फैल जायगा और यह संग्राममें विपक्षी कौरवोंको मारकर अपने पैतृक राज्यभागका पुनरुद्धार करेगा। यह शोभासम्पन्न बालक अपने भाइयोंके साथ तीन अश्वमेधयज्ञोंका अनुष्ठान करेगा”
ପିତୃଅଂଶର ଯେ ଭାଗ ନଷ୍ଟ ହୋଇଛି, ସେ ତାହା ପୁନର୍ବାର ଉଦ୍ଧାର କରିବ। ଭ୍ରାତୃମାନଙ୍କ ସହିତ ସେ ଶ୍ରୀମାନ୍ ତିନିଟି ଅଶ୍ୱମେଧ ଯଜ୍ଞ ସମ୍ପାଦନ କରିବ।
Verse 6
स सत्यसंधो बीभत्सु: सव्यसाची यथाच्युत । तथा त्वमेव जानासि बलवन्तं दुरासदम्,अच्युत! सव्यसाची अर्जुन जैसा सत्यप्रतिज्ञ है तथा उसमें जितना बल एवं दुर्जय शक्ति है, उसे तुम्हीं जानते हो
ହେ ଅଚ୍ୟୁତ! ସତ୍ୟସଙ୍କଳ୍ପୀ, ଭୟଙ୍କର ଯୋଦ୍ଧା, ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନ—ତୁମେ ଯେପରି ଜାଣ, ସେପରି ହିଁ। ତାହାର ବଳ ଓ ଦୁର୍ଜୟତାର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ପରିମାଣ ତୁମେ ଏକା ଜାଣ।
Verse 7
तथा तदस्तु दाशा्ह यथा वागभ्यभाषत । धर्मश्नेदस्ति वाष्णेय तथा सत्यं भविष्यति
ହେ ଦାଶାର୍ହ! ଯେପରି ବାକ୍ୟ କୁହାଯାଇଛି, ସେପରି ହେଉ। ହେ ବୃଷ୍ଣେୟ! ଯଦି ଧର୍ମ ଅଛି, ତେବେ ସେହି ସତ୍ୟରୂପେ ନିଶ୍ଚୟ ଘଟିବ।
Verse 8
दशाहईकुलनन्दन श्रीकृष्ण! आकाशवाणीने जैसा कहा है, वैसा ही हो, यही मेरी भी इच्छा है। वृष्णिनन्दन! यदि धर्मकी सत्ता है तो वह सब उसी रूपमें सत्य होगा ।। त्वं चापि तत् तथा कृष्ण सर्व सम्पादयिष्यसि । नाहं तदभ्यसूयामि यथा वागभ्यभाषत,श्रीकृष्ण! तुम स्वयं भी वह सब कुछ उसी रूपमें पूर्ण करोगे। आकाशवाणीने जैसा कहा है, उसमें मैं किसी दोषकी उद्धावना नहीं करती हूँ
ହେ କୃଷ୍ଣ! ତୁମେ ମଧ୍ୟ ସେ ସମସ୍ତକୁ ଘୋଷିତ ରୂପରେ ହିଁ ସମ୍ପାଦନ କରିବ। ଆକାଶବାଣୀ ଯେପରି କହିଛି, ତାହାରେ ମୁଁ କୌଣସି ଦୋଷ ଦେଖୁନି; ଯଦି ଜଗତରେ ଧର୍ମର ସାର୍ବଭୌମ ଶକ୍ତି ଅଛି, ତେବେ ସେହି ବାକ୍ୟ ସେହି ରୂପରେ ସତ୍ୟ ହେବ।
Verse 9
नमो धर्माय महते धर्मो धारयति प्रजा: । एतद् धनंजयो वाच्यो नित्योद्युक्तो वृकोदर:,मैं तो उस महान् धर्मको नमस्कार करती हूँ, क्योंकि धर्म ही समस्त प्रजाको धारण करता है। तुम अर्जुनसे तथा युद्धके लिये सदा उद्यत रहनेवाले भीमसेनसे भी जाकर कहना -- क्षत्राणी जिसके लिये पुत्रको जन्म देती है, उसका यह उपयुक्त अवसर आ गया है। श्रेष्ठ मनुष्य किसीसे वैर ठन जानेपर उत्साहहीन नहीं होते”
ମୁଁ ସେଇ ମହାଧର୍ମକୁ ନମସ୍କାର କରୁଛି, କାରଣ ଧର୍ମ ହିଁ ସମସ୍ତ ପ୍ରଜାକୁ ଧାରଣ କରେ। ଏହି ସନ୍ଦେଶ ଧନଞ୍ଜୟ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ଓ ସଦା କାର୍ଯ୍ୟୋଦ୍ୟତ ବୃକୋଦର ଭୀମଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ କହ—ଯେ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ କ୍ଷତ୍ରାଣୀ ପୁତ୍ରକୁ ଜନ୍ମ ଦିଏ, ସେହି ଯୋଗ୍ୟ ସମୟ ଆସିପହଞ୍ଚିଛି; ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପୁରୁଷମାନେ ବୈର ଠାପି ହେଲେ ଉତ୍ସାହ ହରାନ୍ତି ନାହିଁ।
Verse 10
यदर्थ क्षत्रिया सूते तस्य कालोडयमागत: । न हि वैरं समासाद्य सीदन्ति पुरुषर्षभा:,मैं तो उस महान् धर्मको नमस्कार करती हूँ, क्योंकि धर्म ही समस्त प्रजाको धारण करता है। तुम अर्जुनसे तथा युद्धके लिये सदा उद्यत रहनेवाले भीमसेनसे भी जाकर कहना -- क्षत्राणी जिसके लिये पुत्रको जन्म देती है, उसका यह उपयुक्त अवसर आ गया है। श्रेष्ठ मनुष्य किसीसे वैर ठन जानेपर उत्साहहीन नहीं होते”
ଯେ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ପାଇଁ କ୍ଷତ୍ରିୟା ନାରୀ ପୁତ୍ରକୁ ଜନ୍ମ ଦିଏ, ସେହି ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟର ସମୟ ଏବେ ଆସିପହଞ୍ଚିଛି। ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପୁରୁଷମାନେ ବୈର ଗ୍ରହଣ କରିଲେ ପରେ ମନୋବଳ ହାରନ୍ତି ନାହିଁ; ଧର୍ମସମ୍ମତ ଶତ୍ରୁତାରେ ପ୍ରବେଶ କରି ସେମାନେ ନିରୁତ୍ସାହରେ ଡୁବନ୍ତି ନାହିଁ।
Verse 11
विदिता ते सदा बुद्धिर्भीमस्य न स शाम्यति । यावदन्तं न कुरुते शत्रूणां शत्रुकर्शन,शत्रुदमन श्रीकृष्ण! तुम्हें भीमसेनका विचार तो सदासे ज्ञात ही है, वह जबतक शत्रुओंका अन्त नहीं कर लेगा, तबतक शान्त नहीं होगा
ଭୀମଙ୍କ ବୁଦ୍ଧି ଓ ସଙ୍କଳ୍ପ ତୁମକୁ ସଦାରୁ ଜଣା; ସେ ଶାନ୍ତ ହୁଏ ନାହିଁ। ଯେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ସେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କର ଅନ୍ତ କରିନାହିଁ, ହେ ଶତ୍ରୁକର୍ଷଣ, ସେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ତାଙ୍କୁ ଶାନ୍ତି ମିଳିବ ନାହିଁ।
Verse 12
सर्वधर्मविशेषज्ञां स्नुषां पाण्डोर्महात्मन: । ब्रूया माधव कल्याणीं कृष्ण कृष्णां यशस्विनीम्,माधव! श्रीकृष्ण! तुम सब धर्मोको विशेषरूपसे जाननेवाली महात्मा पाण्डुकी पुत्रवधू कल्याणमयी, यशस्विनी द्रौपदीसे कहना--“बेटी! तू परम सौभाग्यशाली यशस्वी कुलमें उत्पन्न हुई है। तूने मेरे सभी पुत्रोंके साथ जो धर्मानुसार यथोचित बर्ताव किया है, यह तेरे ही योग्य है!
ହେ ମାଧବ! ମହାତ୍ମା ପାଣ୍ଡୁଙ୍କ ପୁତ୍ରବଧୂ, ସମସ୍ତ ଧର୍ମବିଶେଷ ଜାଣୁଥିବା, କଲ୍ୟାଣମୟୀ ଓ ଯଶସ୍ୱିନୀ କୃଷ୍ଣା—ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କୁ ମୋ କଥା କହିଦିଅ।
Verse 13
युक्तमेतन्महा भागे कुले जाते यशस्विनि । यन्मे पुत्रेषु सर्वेषु यथावत् त्वमवर्तिथा:,माधव! श्रीकृष्ण! तुम सब धर्मोको विशेषरूपसे जाननेवाली महात्मा पाण्डुकी पुत्रवधू कल्याणमयी, यशस्विनी द्रौपदीसे कहना--“बेटी! तू परम सौभाग्यशाली यशस्वी कुलमें उत्पन्न हुई है। तूने मेरे सभी पुत्रोंके साथ जो धर्मानुसार यथोचित बर्ताव किया है, यह तेरे ही योग्य है!
ହେ ମହାଭାଗେ, ଯଶସ୍ୱିନୀ, ପ୍ରସିଦ୍ଧ କୁଳରେ ଜନ୍ମିତେ! ମୋ ସମସ୍ତ ପୁତ୍ରଙ୍କ ପ୍ରତି ତୁମେ ଧର୍ମାନୁସାରେ ଯଥାଯଥ ଆଚରଣ କରିଛ; ଏହା ସର୍ବଥା ଯୁକ୍ତ।
Verse 14
माद्रीपुत्रौ च वक्तव्यौ क्षत्रधर्मरतावुभौ । विक्रमेणार्जितान् भोगान् वृणीतं जीवितादपि,पुरुषोत्तम! तदनन्तर क्षत्रियधर्ममें तत्पर रहनेवाले दोनों माद्रीकुमारोंसे भी मेरा यह संदेश कहना--“वीरो! तुम प्राणोंकी बाजी लगाकर भी अपने पराक्रमसे प्राप्त हुए भोगोंका ही उपभोग करो। क्षत्रियधर्मसे निर्वाह करनेवाले मनुष्यके मनको पराक्रमद्वारा प्राप्त किये हुए पदार्थ ही सदा संतुष्ट रखते हैं
ମାଦ୍ରୀଙ୍କ ଦୁଇ ପୁତ୍ରଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ କହିବ—ଦୁହେଁ କ୍ଷତ୍ରଧର୍ମରେ ରତ—‘ହେ ବୀରମାନେ! ନିଜ ପରାକ୍ରମରେ ଅର୍ଜିତ ଭୋଗକୁ, ପ୍ରାଣ ଯାଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ବାଛି ଭୋଗ କର।’
Verse 15
विक्रमाधिगता हार्था: क्षत्रधर्मेण जीवत: । मनो मनुष्यस्य सदा प्रीणन्ति पुरुषोत्तम,पुरुषोत्तम! तदनन्तर क्षत्रियधर्ममें तत्पर रहनेवाले दोनों माद्रीकुमारोंसे भी मेरा यह संदेश कहना--“वीरो! तुम प्राणोंकी बाजी लगाकर भी अपने पराक्रमसे प्राप्त हुए भोगोंका ही उपभोग करो। क्षत्रियधर्मसे निर्वाह करनेवाले मनुष्यके मनको पराक्रमद्वारा प्राप्त किये हुए पदार्थ ही सदा संतुष्ट रखते हैं
ହେ ପୁରୁଷୋତ୍ତମ! କ୍ଷତ୍ରଧର୍ମରେ ଜୀବନ ନିର୍ବାହ କରୁଥିବା ମନୁଷ୍ୟର ହୃଦୟକୁ ସଦା ଆନନ୍ଦିତ କରେ ତାହାର ନିଜ ପରାକ୍ରମରେ ଅର୍ଜିତ ଲାଭମାନେ। ତେଣୁ ପରେ ମାଦ୍ରୀଙ୍କ ଦୁଇ ପୁତ୍ର—ଯେମାନେ ସଦା କ୍ଷାତ୍ରଧର୍ମରେ ତତ୍ପର—ତାଙ୍କୁ ମୋର ଏହି ସନ୍ଦେଶ କହ: “ହେ ବୀରମାନେ! ପ୍ରାଣକୁ ମଧ୍ୟ ପଣ କରି, ନିଜ ପରାକ୍ରମରେ ପ୍ରାପ୍ତ ଭୋଗକୁ ମାତ୍ର ଭୋଗ କର। କ୍ଷତ୍ରଧର୍ମରେ ଜୀବନ ଯାପନ କରୁଥିବା ପୁରୁଷର ମନ ପରାକ୍ରମାର୍ଜିତ ସମ୍ପଦରେ ହିଁ ସତ୍ୟ ତୃପ୍ତି ପାଏ।”
Verse 16
यच्च व: प्रेक्षमाणानां सर्वधर्मोपचायिनाम् । पाज्चाली परुषाप्युक्ता को नु तत् क्षन्तुमहति,'पाण्डवो! सब प्रकारसे धर्मकी वृद्धि करनेवाले तुम सब लोगोंके देखते-देखते पांचालराजकुमारी द्रौपदीको जो कटुवचन सुनाये गये हैं, उन्हें कौन वीर क्षमा कर सकता है?”
ଏହା ସହ, ତୁମେ—ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ଧର୍ମର ବୃଦ୍ଧି କରୁଥିବା—ତୁମମାନଙ୍କ ଦେଖୁଥିବାବେଳେ ପାଞ୍ଚାଳୀଙ୍କୁ କଟୁବଚନ କୁହାଗଲା; ତାହାକୁ କିଏ ହିଁ କ୍ଷମା କରିପାରିବ?
Verse 17
न राज्यहरणं दु:खं द्यूते चापि पराजय: । प्रत्राजनं सुतानां वा न मे तद् दुःखकारणम्,श्रीकृष्ण! मुझे राज्यके छिन जानेका उतना दुःख नहीं है। जुएमें हारने और पुत्रोंके वनवास होनेका भी मेरे मनमें उतना महान् दुःख नहीं है, परंतु भरी सभामें मेरी सुन्दरी युवती पुत्रवधू द्रौपदीने रोते हुए जो दुर्योधनके कटुवचन सुने थे, वही मेरे लिये महान् दुःखका कारण बन गया है
ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! ରାଜ୍ୟ ହରାଇବା ମୋର ସର୍ବାଧିକ ଦୁଃଖ ନୁହେଁ; ନ ଦ୍ୟୁତରେ ପରାଜୟ, ନ ମୋ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କର ବନବାସ—ଏଗୁଡ଼ିକ ମୋ ଶୋକର ମୂଳ କାରଣ ନୁହେଁ। ମୋର ମହାଦୁଃଖ ଏହିଯେ, ଭରିଥିବା ସଭାରେ କାନ୍ଦୁଥିବା ମୋର ଯୁବତୀ, ସୁନ୍ଦର ପୁତ୍ରବଧୂ ଦ୍ରୌପଦୀ ଦୁର୍ଯୋଧନଙ୍କ କଟୁ ଓ ଅପମାନଜନକ ବଚନ ଶୁଣିବାକୁ ବାଧ୍ୟ ହେଲେ।
Verse 18
यत्र सा बृहती श्यामा सभायां रुदती तदा । अश्रौषीत् परुषा वाचस्तन्मे दुःखतरं महत्,श्रीकृष्ण! मुझे राज्यके छिन जानेका उतना दुःख नहीं है। जुएमें हारने और पुत्रोंके वनवास होनेका भी मेरे मनमें उतना महान् दुःख नहीं है, परंतु भरी सभामें मेरी सुन्दरी युवती पुत्रवधू द्रौपदीने रोते हुए जो दुर्योधनके कटुवचन सुने थे, वही मेरे लिये महान् दुःखका कारण बन गया है
ଯେତେବେଳେ ସେ ଦୀର୍ଘାଙ୍ଗୀ ଶ୍ୟାମା ନାରୀ ସଭାରେ କାନ୍ଦୁଥିଲେ, ସେତେବେଳେ ତାଙ୍କୁ କଟୁବଚନ ଶୁଣିବାକୁ ପଡ଼ିଲା—ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! ସେଇ ମୋ ପାଇଁ ସର୍ବାଧିକ ଓ ଅସହ୍ୟ ଦୁଃଖ।
Verse 19
स्त्रीधर्मिणी वरारोहा क्षत्रधर्मरता सदा । नाध्यगच्छत् तदा नाथं कृष्णा नाथवती सती,क्षत्रियधर्ममें सदा तत्पर रहनेवाली मेरी सर्वाग-सुन्दरी सती-साध्वी बहू कृष्णा उन दिनों रजस्वला अवस्थामें थी। वह सब प्रकारसे सनाथ थी, तो भी उस दिन कौरवसभामें उसे कोई रक्षक नहीं मिला (वह अनाथ-सी रोती हुई अपमान सह रही थी)
ସ୍ତ୍ରୀଧର୍ମରେ ନିଷ୍ଠ, ଉଚ୍ଚକୁଳଜାତ, ଏବଂ ସଦା କ୍ଷାତ୍ରଧର୍ମରେ ରତ ସେଇ ସତୀ କୃଷ୍ଣା (ଦ୍ରୌପଦୀ) ସେତେବେଳେ କୌଣସି ରକ୍ଷକ ପାଇଲେ ନାହିଁ। ରକ୍ଷକ ଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ସେ ଦିନ କୌରବସଭାରେ ତାଙ୍କ ପାଇଁ କେହି ଆଶ୍ରୟ ହେଲେ ନାହିଁ; ସେ ଅନାଥା ପରି ଅପମାନ ସହିଲେ।
Verse 20
त॑ वै ब्रूहि महाबाहो सर्वशस्त्रभृतां वरम् । अर्जुन पुरुषव्याप्रं द्रौपद्या: पदवीं चर,महाबाहो! समस्त शणस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ पुरुषसिंह अर्जुनसे कहना कि “तुम द्रौपदीके इच्छित पथपर चलो”
ହେ ମହାବାହୋ! ତୁମେ ଯାଇ ସମସ୍ତ ଶସ୍ତ୍ରଧାରୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ପୁରୁଷବ୍ୟାଘ୍ର ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ କୁହ—ଦ୍ରୌପଦୀ ଇଚ୍ଛିତ ପଥରେ ସେ ଅଗ୍ରସର ହେଉ।
Verse 21
विदितं हि तवात्यन्तं क्रुद्धाविव यमान्तकौ । भीमार्जुनी नयेतां हि देवानपि परां गतिम्,श्रीकृष्ण! तुम तो अच्छी तरह जानते ही हो कि भीमसेन और अर्जुन कुपित हो जायाँ तो वे यमराज तथा अन्तकके समान भयंकर हो जाते हैं और देवताओंको भी यमलोक पहुँचा सकते हैं
ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! ତୁମେ ଭଲଭାବେ ଜାଣ—ଭୀମସେନ ଓ ଅର୍ଜୁନ କ୍ରୋଧିତ ହେଲେ ସେମାନେ ଯମ ଓ ଅନ୍ତକ ସମ ଭୟଙ୍କର ହୁଅନ୍ତି; ଦେବତାମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପରମଗତି (ମୃତ୍ୟୁ) କୁ ପଠାଇପାରନ୍ତି।
Verse 22
तयोश्वैतदवज्ञानं यत् सा कृष्णा सभागता । दुःशासनश्व यद् भीम॑ कटुकान्यभ्यभाषत
ସେ ଦୁଇଜଣଙ୍କ ପ୍ରତି ଏହି ଅବଜ୍ଞା ହୋଇଥିଲା—କୃଷ୍ଣା (ଦ୍ରୌପଦୀ)କୁ ସଭାକୁ ଟାଣି ଆଣାଗଲା; ଏବଂ ଦୁଃଶାସନ ଭୀମଙ୍କୁ କଟୁ, ତୀକ୍ଷ୍ଣ ବଚନ କହିଲା।
Verse 23
पाण्डवान् कुशल पृच्छे: सपुत्रान् कृष्णया सह,जनार्दन! तुम मेरी ओरसे द्रौपदी और पुत्रोंसहित पाण्डवोंसे कुशल पूछना और फिर मुझे भी सकुशल बताना। जाओ, तुम्हारा मार्ग मंगलमय हो, मेरे पुत्रोंकी रक्षा करना
ହେ ଜନାର୍ଦନ! ମୋ ପକ୍ଷରୁ କୃଷ୍ଣା (ଦ୍ରୌପଦୀ) ଓ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହିତ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ କୁଶଳ ପଚାର; ତାପରେ ସେମାନେ ମଧ୍ୟ ସୁକୁଶଳରେ ଅଛନ୍ତି ବୋଲି ମୋତେ ଜଣାଇବ।
Verse 24
मां च कुशलिनी ब्रूयास्तेषु भूयो जनार्दन । अरिए्टं गच्छ पन्थान पुत्रान् मे प्रतिपालय,जनार्दन! तुम मेरी ओरसे द्रौपदी और पुत्रोंसहित पाण्डवोंसे कुशल पूछना और फिर मुझे भी सकुशल बताना। जाओ, तुम्हारा मार्ग मंगलमय हो, मेरे पुत्रोंकी रक्षा करना
ହେ ଜନାର୍ଦନ! ସେମାନଙ୍କୁ ପୁନଃ କୁହ—ମୁଁ ମଧ୍ୟ କୁଶଳରେ ଅଛି। ନିରାପଦ, ନିର୍ବିଘ୍ନ ପଥରେ ଯାଅ; ମୋ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ପ୍ରତିପାଳନ କର।
Verse 25
वैशम्पायन उवाच अभिवाद्याथ तां कृष्ण: कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् । निश्चक्राम महाबाहु: सिंहखेलगतिस्ततः,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर महाबाहु श्रीकृष्णने कुन्तीदेवीको प्रणाम करके उनकी परिक्रमा भी की और फिर सिंहके समान मस्तानी चालसे वहाँसे निकल गये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ତା’ପରେ ମହାବାହୁ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କୁନ୍ତୀଦେବୀଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କରି ତାଙ୍କର ପ୍ରଦକ୍ଷିଣା କଲେ, ଏବଂ ସିଂହ ସଦୃଶ ଗର୍ବିତ ଗତିରେ ସେଠାରୁ ବାହାରିଗଲେ।
Verse 26
ततो विसर्जयामास भीष्मादीन् कुरुपुड्रवान् । आरोप्याथ रथे कर्ण प्रायात् सात्यकिना सह,फिर भीष्म आदि प्रधान कुरुवंशियोंको उन्होंने विदा कर दिया और कर्णको रथपर बिठाकर सात्यकिके साथ वहाँसे प्रस्थान किया
ତା’ପରେ ସେ ଭୀଷ୍ମ ଆଦି ପ୍ରଧାନ କୁରୁବଂଶୀୟମାନଙ୍କୁ ବିଦାୟ କଲେ। ତାପରେ କର୍ଣ୍ଣଙ୍କୁ ରଥରେ ବସାଇ ସାତ୍ୟକି ସହିତ ସେଠାରୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 27
ततः प्रयाते दाशाहें कुरव: संगता मिथ: । जजल्पुर्महदाश्चर्य केशवे परमाद्भुतम्,दशाहईकुलभूषण श्रीकृष्णके चले जानेपर सब कौरव आपसमें मिले और उनके अत्यन्त अद्भुत एवं महान् आश्चर्यजनक बल-वैभवकी चर्चा करने लगे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଦାଶାର୍ହକୁଳଭୂଷଣ କେଶବ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରିବା ପରେ କୌରବମାନେ ପରସ୍ପର ଏକତ୍ର ହେଲେ ଏବଂ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କର ପରମ ଅଦ୍ଭୁତ, ମହାଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟକର ଶକ୍ତି-ବୈଭବ ବିଷୟରେ ଆଲୋଚନା କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ।
Verse 28
प्रमूढा पृथिवी सर्वा मृत्युपाशवशीकृता । दुर्योधनस्य बालिश्यान्नैतदस्तीति चाब्रुवन्,वे बोले--“यह सारी पृथ्वी मृत्युपाशमें आबद्ध हो मोहाच्छन्न हो गयी है। जान पड़ता है, दुर्योधनकी मूर्खतासे इसका विनाश हो जायगा”
ସେମାନେ କହିଲେ—“ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀ ମୋହାଚ୍ଛନ୍ନ ହୋଇ ମୃତ୍ୟୁପାଶରେ ବଶୀଭୂତ ହୋଇପଡ଼ିଛି। ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କର ବାଲିଶତାରୁ ଏହାର ବିନାଶ ହେବ”—ତଥାପି ସେମାନେ କହୁଥିଲେ—“ଏହା ହେବ ନାହିଁ।”
Verse 29
ततो निर्याय नगरात् प्रययौ पुरुषोत्तम: । मन्त्रयामास च तदा कर्णेन सुचिरं सह,उधर पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण जब नगरसे निकलकर उपप्लव्यकी ओर चले, तब उन्होंने दीर्घकालतक कर्णके साथ मन्त्रणा की
ତା’ପରେ ପୁରୁଷୋତ୍ତମ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ନଗରରୁ ବାହାରି ଉପପ୍ଲବ୍ୟ ଦିଗକୁ ପ୍ରୟାଣ କଲେ। ସେହି ସମୟରେ ସେ କର୍ଣ୍ଣଙ୍କ ସହ ଦୀର୍ଘକାଳ ଗମ୍ଭୀର ମନ୍ତ୍ରଣା କଲେ।
Verse 30
विसर्जयित्वा राधेयं सर्वयादवनन्दन: । ततो जवेन महता तूर्णमश्वानचोदयत्,फिर राधानन्दन कर्णको विदा करके सम्पूर्ण यदुकुलको आनन्दित करनेवाले श्रीकृष्णने तुरंत ही बड़े वेगसे अपने रथके घोड़े हँकवाये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ରାଧେୟ (କର୍ଣ୍ଣ) କୁ ବିଦାୟ ଦେଇ, ସମସ୍ତ ଯାଦବଙ୍କ ଆନନ୍ଦ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍ ମହାବେଗରେ ରଥର ଅଶ୍ୱମାନଙ୍କୁ ହାଙ୍କିଲେ।
Verse 31
ते पिबन्त इवाकाशं दारुकेण प्रचोदिता: । हया जम्मुर्महावेगा मनोमारुतरंहस:,दारुकके हाँकनेपर वे महान् वेगशाली अश्व मन और वायुके समान तीव्र गतिसे आकाशको पीते हुए-से चले
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଦାରୁକଙ୍କ ପ୍ରେରଣାରେ ସେହି ମହାବେଗୀ ଅଶ୍ୱମାନେ ମନ ଓ ପବନ ସମ ତୀବ୍ର ଗତିରେ ଧାଇଲେ; ଯେନେ ଆକାଶକୁ ପିଇ ନେଉଛନ୍ତି।
Verse 32
ते व्यतीत्य महाध्वान क्षिप्रं श्येना इवाशुगा: । उच्चैर्जग्मुरुपप्लव्यं शार्डधन्वानमावहन्,उन्होंने शीघ्रगामी बाज पक्षीकी भाँति उस विशाल पथको तुरंत ही तै कर लिया और शार्ज््धनुष धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णको उपप्लव्य नगरमें पहुँचा दिया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେମାନେ ଶୀଘ୍ରଗାମୀ ଶ୍ୟେନ ପକ୍ଷୀ ପରି ସେହି ବିଶାଳ ପଥକୁ ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍ ଅତିକ୍ରମ କରି, ଶାର୍ଙ୍ଗଧନୁ ଧାରୀ ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଉପପ୍ଲବ୍ୟ ନଗରକୁ ପହଞ୍ଚାଇଲେ।
Verse 136
इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वनें विदुलाके द्वारा पुत्रको दिये जानेवाले उपदेशका समाप्तिविषयक एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ବିଦୁଳାଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପୁତ୍ରଙ୍କୁ ଦିଆଯାଇଥିବା ଉପଦେଶ-ପ୍ରସଙ୍ଗର ଏକଶ ଛତ୍ରିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 137
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि कुन्तीवाक्ये सप्तत्रिंशदधिकशततमो<ध्याय:
ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ କୁନ୍ତୀବାକ୍ୟ-ପ୍ରସଙ୍ଗର ଏକଶ ସତ୍ତତ୍ରିଶତମ (୧୩୭ତମ) ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ।
Verse 226
पश्यतां कुरुवीराणां तच्च संस्मारये: पुनः । जुएके समय द्रौपदीको जो सभामें जाना पड़ा और कौरव वीरोंके सामने ही दुर्योधन और दु:शासनने जो उसे गालियाँ दीं, वह सब भीमसेन और अर्जुनका ही तिरस्कार है। मैं पुन: उसकी याद दिला देती हूँ
କୁରୁବୀରମାନଙ୍କ ଦୃଷ୍ଟି ସାମ୍ନାରେ ମୁଁ ସେଇ କଥାକୁ ପୁଣିଥରେ ତୁମକୁ ସ୍ମରଣ କରାଉଛି। ଏକ ସମୟରେ ଦ୍ରୌପଦୀକୁ ବାଧ୍ୟ କରି ରାଜସଭାକୁ ନେଇଯାଇଥିଲେ; ଏବଂ ସେଇ କୌରବ ଯୋଦ୍ଧାମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଓ ଦୁଃଶାସନ ତାକୁ ଅପମାନଜନକ ଗାଳି ଦେଇଥିଲେ। ସେଇ ଅତ୍ୟାଚାର ପ୍ରକୃତରେ ଭୀମସେନ ଓ ଅର୍ଜୁନଙ୍କର ମଧ୍ୟ ତିରସ୍କାର ଥିଲା। ତେଣୁ ମୁଁ ସେ ସ୍ମୃତିକୁ ପୁଣି ଜାଗ୍ରତ କରୁଛି।
Whether Duryodhana will accept corrective settlement and reconciliation—acknowledging wrongdoing and restoring political balance—or persist in pride-driven escalation that predictably harms kin, polity, and the wider kṣatriya order.
Treat peace as a duty of governance: heed well-wisher counsel, recognize the limits of coercion against wronged parties, and choose reconciliation procedures (respectful approach, greetings, embraces, and restitution) to prevent avoidable systemic loss.
No explicit phalaśruti appears in the provided verses; the chapter’s meta-function is pragmatic-ethical—positioning conciliation as rājadharma and framing omens as cautionary prompts rather than offering a direct mokṣa-oriented commendation.