Adhyaya 114
Udyoga ParvaAdhyaya 11423 Verses

Adhyaya 114

Haryaśva’s Agreement with Gālava and the Birth of Vasumanā (Nārada’s narration)

Upa-parva: Gālava–Mādhavī Upākhyāna (embedded exemplum within Udyoga Parva)

Nārada recounts how King Haryaśva, reflecting with concern for progeny, evaluates Mādhavī’s auspicious qualities and requests that the sage specify an appropriate śulka (bride-price) consistent with his resources. Gālava stipulates a precise payment: eight hundred exceptional horses characterized as moon-white with dark ears, rare and region-bred. Haryaśva admits he possesses only two hundred of the required type, while additional horses are dispersed. He proposes to beget a single son through Mādhavī and asks Gālava to complete his objective by this partial fulfillment. Mādhavī then discloses a boon granted by a brahma-vādin: after each childbirth she will return to maidenhood; hence she can be given successively to multiple kings so that, from four rulers, the full complement of horses will be obtained, and she will bear four sons. Gālava accepts this plan and instructs Haryaśva to accept Mādhavī for one-quarter of the śulka. In due time, Haryaśva fathers a son, Vasumanā, described as radiant and generous. When Gālava returns, Haryaśva—committed to truth—hands Mādhavī back despite the scarcity of such horses. Mādhavī relinquishes royal splendor, resumes maidenhood by the boon, and departs with Gālava to approach the next king, Divodāsa, leaving the acquired horses temporarily with Haryaśva.

Chapter Arc: नारद गालव-चरित्र को आगे बढ़ाते हैं—गरुड़ (ताक्ष्य) गालव को यथार्थ का उपदेश देकर ययाति के द्वार तक ले आता है, जहाँ कन्या-दान की असाधारण शर्तें और ‘शुल्क’ का प्रश्न उठता है। → ययाति अपनी कीर्ति, यज्ञ-दान और प्रभुत्व के बावजूद स्वीकार करता है कि उसका धन क्षीण हो चुका है; फिर भी वह ‘याचक को निराश लौटाना’ पाप मानकर गालव की सहायता का मार्ग खोजता है। कन्या के ‘शुल्क’ की चर्चा होते ही यह स्पष्ट होता है कि यह मूल्य साधारण नहीं—राज्य तक देने को राजा तैयार हो सकते हैं, तो घोड़ों का मूल्य कितना भारी होगा। → ययाति निर्णायक रूप से अपनी कन्या को गालव को सौंप देता है और संकेत देता है कि इस कन्या के ‘शुल्क’ के बदले राजा लोग राज्य तक दे सकते हैं—यानी गालव का लक्ष्य (श्यामकर्ण अश्व) अब ‘दान’ से अधिक ‘राजनीतिक सौदे’ और ‘राज-प्रतिष्ठा’ की कसौटी बन जाता है। → गरुड़ के प्रस्थान के बाद गालव कन्या सहित विभिन्न राजाओं के पास ‘शुल्क’ के रूप में अपेक्षित साधन जुटाने निकल पड़ता है; वह अयोध्या-नरेश हर्यश्व के पास जाकर प्रस्ताव रखता है—कन्या को पत्नी रूप में स्वीकार करें, और बदले में निर्धारित ‘शुल्क’ दें। → हर्यश्व गालव के प्रस्ताव पर क्या निर्णय करेगा—क्या वह कन्या-स्वीकार कर ‘शुल्क’ देगा, या गालव को आगे और कठिन द्वारों पर भटकना पड़ेगा?

Shlokas

Verse 1

अपना छा अर: पञ्चदशाधिकशततमो< ध्याय: राजा ययातिका गालवको अपनी कन्या देना और गालवका उसे लेकर अयोध्यानरेशके यहाँ जाना नारद उवाच एवमुक्त: सुपर्णेन तथ्यं वचनमुत्तमम्‌ । विमृश्यावहितो राजा निनश्चित्य च पुन: पुन:,नारदजी कहते हैं--गरुड़ने जब इस प्रकार यथार्थ और उत्तम बात कही, तब सहस्रों यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले, दाता, दानपति, प्रभावशाली तथा राजोचित तेजसे प्रकाशित होनेवाले सम्पूर्ण नरेशोंके स्वामी महाराज ययातिने सावधानीके साथ बारंबार विचार करके एक निश्चयपर पहुँचकर इस प्रकार कहा

ନାରଦ କହିଲେ—ଗରୁଡ ଏପରି ସତ୍ୟ ଓ ଉତ୍ତମ ବଚନ କହିବା ପରେ, ରାଜା ସାବଧାନ ହୋଇ ପୁନଃପୁନଃ ବିଚାର କରି ଦୃଢ଼ ନିଷ୍ପତ୍ତିକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ।

Verse 2

यष्टा क्रतुसहस्राणां दाता दानपति: प्रभु: । ययाति: सर्वकाशीश इदं वचनमत्रवीत्‌,नारदजी कहते हैं--गरुड़ने जब इस प्रकार यथार्थ और उत्तम बात कही, तब सहस्रों यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले, दाता, दानपति, प्रभावशाली तथा राजोचित तेजसे प्रकाशित होनेवाले सम्पूर्ण नरेशोंके स्वामी महाराज ययातिने सावधानीके साथ बारंबार विचार करके एक निश्चयपर पहुँचकर इस प्रकार कहा

ନାରଦ କହିଲେ—ସହସ୍ର କ୍ରତୁର ଯଜ୍ଞକର୍ତ୍ତା, ଦାତା, ଦାନାଧିପତି, ପ୍ରଭୁ, ରାଜତେଜରେ ଦୀପ୍ତ ଏବଂ ନରେଶମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଯୟାତି, ପୁନଃପୁନଃ ବିଚାର କରି ଦୃଢ଼ ସଙ୍କଳ୍ପ ସହ ଏହି ବଚନ କହିଲେ।

Verse 3

दृष्टवा प्रियसखं ताक्ष्य गालवं च द्विजर्षभम्‌ । निदर्शनं च तपसो भिक्षां श्लाघ्यां च कीर्तिताम्‌,राजाने पहले अपने प्रिय मित्र गरुड़ तथा तपस्याके मूर्तिमान्‌ स्वरूप विप्रवर गालवको अपने यहाँ उपस्थित देख और उनकी बतायी हुई स्पृहणीय भिक्षाकी बात सुनकर मनमें इस प्रकार विचार किया-- 'ये दोनों सूर्यवंशमें उत्पन्न हुए दूसरे अनेक राजाओंको छोड़कर मेरे पास आये हैं।' ऐसा विचारकर वे बोले---

ନାରଦ କହିଲେ—ପ୍ରିୟ ସଖା ତାକ୍ଷ୍ୟ (ଗରୁଡ) ଓ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ ଗାଲବ—ତପସ୍ୟାର ଜୀବନ୍ତ ନିଦର୍ଶନ—ତାଙ୍କୁ ଦେଖି, ଏବଂ ସେମାନେ କହିଥିବା ଶ୍ଲାଘ୍ୟ ଭିକ୍ଷା (ଯାଚନା) ଶୁଣି, ରାଜା ମନେମନେ ବିଚାର କଲେ।

Verse 4

अतीत्य च नृपानन्यानादित्यकुलसम्भवान्‌ | मत्सकाशमनुप्राप्तावेतां बुद्धिमवेक्ष्य च,राजाने पहले अपने प्रिय मित्र गरुड़ तथा तपस्याके मूर्तिमान्‌ स्वरूप विप्रवर गालवको अपने यहाँ उपस्थित देख और उनकी बतायी हुई स्पृहणीय भिक्षाकी बात सुनकर मनमें इस प्रकार विचार किया-- 'ये दोनों सूर्यवंशमें उत्पन्न हुए दूसरे अनेक राजाओंको छोड़कर मेरे पास आये हैं।' ऐसा विचारकर वे बोले---

ନାରଦ କହିଲେ—ଆଦିତ୍ୟକୁଳସମ୍ଭବ ଅନ୍ୟ ନୃପମାନଙ୍କୁ ଅତିକ୍ରମ କରି ସେ ଦୁଇଜଣ ମୋ ପାଖକୁ ଆସିଛନ୍ତି—ତାଙ୍କର ଏହି ଅଭିପ୍ରାୟ ଦେଖି ରାଜା ମନେମନେ ବିଚାର କରି ପରେ କହିଲେ।

Verse 5

अद्य मे सफलं जन्म तारितं चाद्य मे कुलम्‌ । अद्यायं तारितो देशो मम तार्क्ष्य त्वयानघ,“निष्पाप गरुड़| आज मेरा जन्म सफल हो गया। आज मेरे कुलका उद्धार हो गया और आज आपने मेरे इस सम्पूर्ण देशको भी तार दिया

ନାରଦ କହିଲେ—“ହେ ଅନଘ ତାର୍କ୍ଷ୍ୟ (ଗରୁଡ)! ଆଜି ମୋର ଜନ୍ମ ସଫଳ ହେଲା; ଆଜି ମୋର କୁଳ ଉଦ୍ଧରିତ ହେଲା; ଆଜି ମୋର ଏହି ଦେଶ ମଧ୍ୟ ତୁମ ଦ୍ୱାରା ତାରିତ ହେଲା।”

Verse 6

वक्तुमिच्छामि तु सखे यथा जानासि मां पुरा । न तथा वित्तवानस्मि क्षीणं वित्तं च मे सखे,'सखे! फिर भी मैं एक बात कहना चाहता हूँ। आप पहलेसे मुझे जैसा धनवान्‌ समझते हैं, वैसा धनसम्पन्न अब मैं नहीं रह गया हूँ। मित्र! मेरा वैभव इन दिनों क्षीण हो गया है

ସଖେ! ମୁଁ ଗୋଟିଏ କଥା କହିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି। ପୂର୍ବେ ତୁମେ ମୋତେ ଯେପରି ଧନବାନ୍‌ ଭାବେ ଜାଣୁଥିଲ, ଏବେ ମୁଁ ସେପରି ନୁହେଁ; ମିତ୍ର, ଏହି ଦିନଗୁଡ଼ିକରେ ମୋର ଧନ-ବୈଭବ କ୍ଷୀଣ ହୋଇଯାଇଛି।

Verse 7

न च शक्तो5स्मि ते कर्तु मोघमागमनं खग । न चाशामस्य विदप्रर्षेवितथीकर्तुमुत्सहे,“आकाशचारी गरुड़! इस दशामें भी मैं आपके आगमनको निष्फल करनेमें असमर्थ हूँ और इन ब्रह्मर्षिकी आशाको भी मैं विफल करना नहीं चाहता

ଆକାଶଚାରୀ ଖଗ! ତୁମ ଆଗମନକୁ ନିଷ୍ଫଳ କରିବାକୁ ମୁଁ ସମର୍ଥ ନୁହେଁ; ଏହି ବ୍ରହ୍ମର୍ଷିଙ୍କ ଆଶାକୁ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ବିଫଳ କରିବାକୁ ଚାହେଁ ନାହିଁ।

Verse 8

तत्‌ तु दास्यामि यत्‌ कार्यमिदं सम्पादयिष्यति । अभिगम्य हताशो हि निवृत्तो दहते कुलम्‌,“अतः मैं एक ऐसी वस्तु दूँगा, जो इस कार्यका सम्पादन कर देगी। अपने पास आकर कोई याचक हताश हो जाय तो वह लौटनेपर आशा भंग करनेवाले राजाके समूचे कुलको दग्ध कर देता है

ଏହେତୁ ମୁଁ ତୁମକୁ ଏମିତି ଗୋଟିଏ ବସ୍ତୁ ଦେବି, ଯାହା ଏହି କାର୍ଯ୍ୟକୁ ସମ୍ପାଦନ କରିଦେବ। କାରଣ ଯଦି କୌଣସି ଯାଚକ ରାଜାଙ୍କ ପାଖକୁ ଆସି ହତାଶ ହୋଇ ଫେରିଯାଏ, ତେବେ ସେ ଫେରି ଆଶାଭଙ୍ଗ କରିଥିବା ରାଜାଙ୍କ ସମଗ୍ର କୁଳକୁ ଦହିଦିଏ।

Verse 9

नात: परं वैनतेय किंचित्‌ पापिष्ठमुच्यते । यथाशानाशनालल्‍लोके देहि नास्तीति वा वच:,“विनतानन्दन! लोकमें कोई “दीजिये” कहकर कुछ माँगे और उससे यह कह दिया जाय कि जाओ मेरे पास नहीं है, इस प्रकार याचककी आशाको भंग करनेसे जितना पाप लगता है, इससे बढ़कर पापकी दूसरी कोई बात नहीं कही जाती है

ବୈନତେୟ! ଏହାଠାରୁ ଅଧିକ ପାପ ଆଉ କିଛି କୁହାଯାଏ ନାହିଁ—ଲୋକରେ କେହି ଆଶା ନେଇ ‘ଦିଅ’ ବୋଲି ମାଗିଲେ, ତାକୁ ‘ଯାଅ, ମୋ ପାଖରେ କିଛି ନାହିଁ’ ବୋଲି କହିବା। ଏଭଳି ଯାଚକଙ୍କ ଆଶା ଭଙ୍ଗ କରିବା ମହାପାପ।

Verse 10

हताशो हााकृतार्थ: सन्‌ हतः सम्भावितो नर: । हिनस्ति तस्य पुत्रांश्व पौत्रांश्चाकुर्वतो हितम्‌,“कोई श्रेष्ठ मनुष्य जब कहीं याचना करके हताश एवं असफल होता है, तब वह मरे हुएके समान हो जाता है और अपना हित न करनेवाले धनीके पुत्रों तथा पौत्रोंका नाश कर डालता है

ଯୋଗ୍ୟ ମନୁଷ୍ୟ ଯେତେବେଳେ ସହାୟତା ମାଗି ଯାଇ ହତାଶ ଓ ଅକୃତାର୍ଥ ହୋଇ ଫେରେ, ସେ ମୃତସମାନ ହୋଇଯାଏ—ତାହାର ମର୍ଯ୍ୟାଦା ଭଙ୍ଗ ହୁଏ। ତେବେ ଯିଏ ତାହାର ହିତ କରିଲା ନାହିଁ, ସେଇ ଧନବାନଙ୍କ ପୁତ୍ର ଓ ପୌତ୍ରମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ସେ ନାଶ କରେ।

Verse 11

तस्माच्चतुर्णा वंशानां स्थापयित्री सुता मम । इयं सुरसुतप्रख्या सर्वधर्मोपचायिनी,“अतः मेरी जो यह पुत्री है, यह चार कुलोंकी स्थापना करनेवाली है। इसकी कान्ति देवकन्याके समान है। यह सम्पूर्ण धर्मोंकी वृद्धि करनेवाली है

ଏହେତୁ ମୋର ଏହି କନ୍ୟା ଚାରି ବଂଶର ସ୍ଥାପନାକାରିଣୀ। ତାହାର କାନ୍ତି ଦେବକନ୍ୟା ସମାନ, ଏବଂ ସେ ସମସ୍ତ ଧର୍ମର ବୃଦ୍ଧି କରାଇବାଳି।

Verse 12

सदा देवमनुष्याणामसुराणां च गालव । काड्क्षिता रूपतो बाला सुता मे प्रतिगृह्यताम्‌,“गालव! इसके रूप-सौन्दर्यसे आकृष्ट होकर देवता, मनुष्य तथा असुर सभी लोग सदा इसे पानेकी अभिलाषा रखते हैं; अतः आप मेरी इस पुत्रीको ही ग्रहण कीजिये

ହେ ଗାଲବ! ତାହାର ରୂପ-ସୌନ୍ଦର୍ୟରେ ଆକୃଷ୍ଟ ହୋଇ ଦେବ, ମନୁଷ୍ୟ ଓ ଅସୁର—ସମସ୍ତେ ସଦା ତାକୁ ପାଇବାକୁ ଆକାଙ୍କ୍ଷା କରନ୍ତି; ତେଣୁ ମୋର ଏହି କନ୍ୟାକୁ ଗ୍ରହଣ କର।

Verse 13

अस्या: शुल्कं प्रदास्यन्ति नृपा राज्यमपि ध्रुवम्‌ । कि पुन: श्यामकर्णानां हयानां द्वे चतु:ःशते,“इसके शुल्कके रूपमें राजालोग निश्चय ही अपना राज्य भी आपको दे देंगे; फिर आठ सौ श्यामकर्ण घोड़ोंकी तो बात ही क्‍या है?

ତାହାର ଶୁଲ୍କରୂପେ ରାଜାମାନେ ନିଶ୍ଚୟ ନିଜ ରାଜ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଦେଇଦେବେ; ତେବେ ଶ୍ୟାମକର୍ଣ୍ଣ ଆଠଶେ ଘୋଡ଼ାର କଥା କ’ଣ!

Verse 14

स भवान प्रतिगृह्नातु ममैतां माधवीं सुताम्‌ । अहं दौहित्रवान्‌ स्यां वै वर एष मम प्रभो,“अतः प्रभो! आप मेरी इस पुत्री माधवीको ग्रहण करें और मुझे यह वर दें कि मैं दौहित्रवान्‌ (नातियोंसे युक्त) होऊँ”

ଏହେତୁ, ପ୍ରଭୋ! ମୋର ଏହି କନ୍ୟା ମାଧବୀକୁ ଗ୍ରହଣ କର; ମୋତେ ଏହି ବର ଦିଅ—ମୁଁ ଦୌହିତ୍ରବାନ୍, ଅର୍ଥାତ୍ କନ୍ୟାପୁତ୍ର (ନାତି) ଯୁକ୍ତ ହେଉଁ।

Verse 15

प्रतिगृह्य च तां कन्‍्यां गालव: सह पक्षिणा । पुनर्द्रक्ष्याव इत्युक्त्वा प्रतस्थे सह कन्‍्यया

ସେ କନ୍ୟାକୁ ଗ୍ରହଣ କରି ଗାଲବ ପକ୍ଷୀ ସହ—“ପୁନଃ ଦେଖିବୁ” ବୋଲି କହି, କନ୍ୟା ସହିତ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲା।

Verse 16

तब गरुड़सहित गालवने उस कन्याको लेकर कहा--“अच्छा, हम फिर कभी मिलेंगे।” राजासे ऐसा कहकर गालव मुनि कन्याके साथ वहाँसे चल दिये ।। उपलब्धमिदं द्वारमश्वानामिति चाण्डज: । उक्त्वा गालवमापृच्छय जगाम भवनं स्वकम्‌,तदनन्तर गरुड़ भी यह कहकर कि अब तुम्हें घोड़ोंकी प्राप्तिका यह द्वार प्राप्त हो गया, गालवसे विदा ले अपने घरको चले गये

ତେବେ ଗରୁଡ ସହିତ ଗାଲବ ମୁନି ସେଇ କନ୍ୟାକୁ ନେଇ କହିଲେ—“ଭଦ୍ର ହେଉ; ପୁଣି ଆମେ ମିଳିବୁ।” ରାଜାଙ୍କୁ ଏହିପରି କହି ଗାଲବ ମୁନି କନ୍ୟା ସହିତ ସେଠାରୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ। ତାପରେ ବିନତାପୁତ୍ର ପକ୍ଷିରାଜ ଗରୁଡ କହିଲେ—“ଏବେ ତୁମେ ଅଶ୍ୱପ୍ରାପ୍ତିର ଏହି ଦ୍ୱାର ପାଇଲା।” ଏହିପରି କହି ଗାଲବଙ୍କୁ ବିଦାୟ ଦେଇ ସେ ନିଜ ଧାମକୁ ଫେରିଗଲେ।

Verse 17

गते पतगराजे तु गालव: सह कनन्‍्यया । चिन्तयान: क्षमं दाने राज्ञां वै शुल्कतोडगमत्‌

ପକ୍ଷିରାଜ ଚାଲିଯିବା ପରେ ଗାଲବ ମୁନି କନ୍ୟା ସହିତ ଚିନ୍ତା କଲେ—ରାଜାମାନଙ୍କ ଦାନରେ କ’ଣ ଯଥୋଚିତ ଓ ଗ୍ରାହ୍ୟ। ଚାହିତା ଶୁଳ୍କକୁ ଧର୍ମସମ୍ମତ ଭାବେ ସଂଗ୍ରହ କରିବା ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ସେ ଶୁଳ୍କତୋଡ଼ାଙ୍କ ନିକଟକୁ ଗଲେ।

Verse 18

पक्षिराज गरुड़के चले जानेपर गालव उस कनन्‍्याके साथ यह सोचते हुए चल दिये कि राजाओंमेंसे कौन ऐसा नरेश है, जो इस कन्याका शुल्क देनेमें समर्थ हो ।। सो<गच्छन्मनसेक्ष्वाकुं हर्यश्नं राजसत्तमम्‌ । अयोध्यायां महावीर्य चतुरड्रबलान्वितम्‌,वे मन-ही-मन विचार करके अयोध्यामें इक्ष्वाकुवंशी नृपतिशिरोमणि महापराक्रमी हर्यश्वके पास गये, जो चतुरंगिणी सेनासे सम्पन्न थे

ପକ୍ଷିରାଜ ଗରୁଡ ଚାଲିଯିବା ପରେ ଗାଲବ ମୁନି ସେଇ କନ୍ୟା ସହିତ ଚାଲିଲେ; ରାଜାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ କିଏ ଏହି କନ୍ୟାର ଶୁଳ୍କ ଦେବାକୁ ସମର୍ଥ—ଏହି ଚିନ୍ତାରେ। ଯାତ୍ରାକାଳେ ସେ ମନେମନେ ଅଯୋଧ୍ୟାବାସୀ ଇକ୍ଷ୍ୱାକୁବଂଶର ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ମହାବୀର୍ୟବାନ ଓ ଚତୁରଙ୍ଗ ସେନାସମ୍ପନ୍ନ ହର୍ୟଶ୍ୱଙ୍କୁ ନିଶ୍ଚୟ କରି ତାଙ୍କ ପାଖକୁ ଗଲେ।

Verse 19

कोशधान्यबलोपेतं प्रियपौरं द्विजप्रियम्‌ । प्रजाभिकामं शाम्यन्तं कुर्वाणं तप उत्तमम्‌,वे कोष, धन-धान्य और सैनिकबल--सबसे सम्पन्न थे। पुरवासी प्रजा उन्हें बहुत ही प्रिय थी। ब्राह्मणोंके प्रति उनका अधिक प्रेम था। वे प्रजावर्गके हितकी इच्छा रखते थे। उनका मन भोगोंसे विरक्त एवं शान्त था। वे उत्तम तपस्यामें लगे हुए थे

ସେ କୋଷ, ଧନ-ଧାନ୍ୟ ଓ ସେନାବଳରେ ସମ୍ପନ୍ନ ଥିଲେ। ନଗରବାସୀଙ୍କ ପ୍ରିୟ ଏବଂ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ନିକଟରେ ବିଶେଷ ପ୍ରିୟ ଥିଲେ। ପ୍ରଜାହିତକାମୀ, ମନରେ ଶାନ୍ତ ଓ ଭୋଗାସକ୍ତିରୁ ମୁକ୍ତ; ସେ ଉତ୍ତମ ତପସ୍ୟାରେ ଲୀନ ଥିଲେ।

Verse 20

तमुपागम्य विप्र: स हर्यश्वंं गालवोडब्रवीत्‌ । कन्येयं मम राजेन्द्र प्रसवैः: कुलवर्धिनी,राजा हर्यश्वके पास जाकर विप्रवर गालवने कहा--'राजेन्द्र! मेरी यह कन्या अपनी संतानोंद्वारा वंशकी वृद्धि करनेवाली है। तुम शुल्क देकर इसे अपनी पत्नी बनानेके लिये ग्रहण करो। हर्यश्व! मैं तुम्हें पहले इसका शुल्क बताऊँगा। उसे सुनकर तुम अपने कर्तव्यका निश्चय करो'

ରାଜା ହର୍ୟଶ୍ୱଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ ବିପ୍ରଶ୍ରେଷ୍ଠ ଗାଲବ କହିଲେ—“ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ମୋର ଏହି କନ୍ୟା ସନ୍ତାନଦ୍ୱାରା କୁଳବୃଦ୍ଧି କରିବ। ଶୁଳ୍କ ଦେଇ ଏହାକୁ ପତ୍ନୀରୂପେ ଗ୍ରହଣ କର। ପ୍ରଥମେ ମୁଁ ତୁମକୁ ଏହାର ଶୁଳ୍କ କହୁଛି; ତାହା ଶୁଣି ତୁମ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ନିଶ୍ଚୟ କର।”

Verse 21

इयं शुल्केन भार्यार्थ हर्यश्व प्रतिगृह्मताम्‌ शुल्कं ते कीर्तयिष्यामि तच्छूत्वा सम्प्रधार्यताम्‌,राजा हर्यश्वके पास जाकर विप्रवर गालवने कहा--'राजेन्द्र! मेरी यह कन्या अपनी संतानोंद्वारा वंशकी वृद्धि करनेवाली है। तुम शुल्क देकर इसे अपनी पत्नी बनानेके लिये ग्रहण करो। हर्यश्व! मैं तुम्हें पहले इसका शुल्क बताऊँगा। उसे सुनकर तुम अपने कर्तव्यका निश्चय करो'

ନାରଦ କହିଲେ—“ହେ ହର୍ୟଶ୍ୱ! ଏହି କନ୍ୟାକୁ ଶୁଳ୍କ ଦେଇ ପତ୍ନୀରୂପେ ଗ୍ରହଣ କର। ପ୍ରଥମେ ମୁଁ ତୋତେ ସେଇ ଶୁଳ୍କ କହିଦେବି; ତାହା ଶୁଣି ସୁଭଳି ଚିନ୍ତା କରି ଯାହା ଉଚିତ ତାହା ନିଷ୍ପତ୍ତି କର।”

Verse 114

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें गालव चरित्रविषयक एक यौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ଗାଲବଚରିତ ବିଷୟକ ଏକଶେ ଚୌଦହତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 115

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गालवचरिते पजञ्चदशाधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें गालवचरित्रविषयक एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ଗାଲବଚରିତ ବିଷୟକ ଏକଶେ ପନ୍ଦରତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Frequently Asked Questions

Haryaśva faces the tension between limited resources and binding ethical exchange: he cannot immediately meet the full horse requirement yet must decide whether to enter an agreement that obligates him to return Mādhavī after securing progeny.

The chapter frames social order as sustained by truthful contracts and proportional solutions—partial fulfillment paired with continued effort—while showing how personal desire (for an heir) is ethically regulated by promises and intermediated consent.

No explicit phalaśruti is stated in these verses; the meta-significance is narrative-exemplary: the episode models how dharma operates through vows, negotiated exchange, and the reputational consequences of honoring agreements.