Adhyaya 111
Udyoga ParvaAdhyaya 11124 Verses

Adhyaya 111

Śāṇḍilī–Suparṇa Saṃvāda (Conduct, Intention, and Restoration)

Upa-parva: Galava–Suparna–Shandili Episode (Upākhyāna within Udyoga Parva)

Nārada narrates how Suparṇa and Gālava arrive at Ṛṣabha’s peak and meet the ascetic brāhmaṇī Śāṇḍilī. After respectful greeting, she offers them prepared food accompanied by ritual formulae; they eat, become satisfied, and sleep. On waking, Suparṇa—intending to depart—finds his body altered and diminished, prompting Gālava to question what mental act or ethical fault caused this result and how long they must remain. Suparṇa explains that he had contemplated taking the accomplished Śāṇḍilī to the realm where Prajāpati, Mahādeva, Viṣṇu, dharma, and yajña abide, and he asks her forgiveness for the unintended impropriety. Śāṇḍilī responds with reassurance yet states that she does not tolerate disparagement; she frames her attainment as grounded in ācāra, articulating that conduct yields dharma, wealth, and prosperity, and removes misfortune. She permits Suparṇa to go, instructing that women are not to be censured, and Suparṇa’s strength and wings are restored. They proceed, and Viśvāmitra later addresses Gālava about the timing and completion of Gālava’s pledged obligation, leading Suparṇa to propose further counsel so the vow may be fulfilled.

Chapter Arc: गरुड़ की पीठ पर आरूढ़ गालव पूर्व दिशा की ओर तीव्र वेग से उड़ते हुए देव-सान्निध्य और धर्म-सत्य के दर्शन की आकांक्षा करता है। → गरुड़ का वेग असह्य होता जाता है; दिशाएँ, आकाश और सूर्य तक दृष्टि से ओझल पड़ते हैं—गालव को केवल अन्धकार दिखता है और वह भय व व्याकुलता में गरुड़ से वेग घटाने का आग्रह करता है। → गालव स्पष्ट कह देता है कि इस यात्रा से उसका कोई प्रयोजन नहीं; वह गरुड़ के वेग को सह नहीं सकता और लौट चलने की प्रार्थना करता है—साथ ही ‘ब्रह्महत्या’ जैसे पाप-भय का स्मरण कर सावधानी की चेतावनी देता है। → गरुड़ समुद्र-समीप ‘ऋषभ’ पर्वत का संकेत करता है—वहीं विश्राम और भोजन कर दोनों लौटने का निश्चय करते हैं, जिससे गालव की व्याकुलता शांत होती है।

Shlokas

Verse 1

न२्च्स्स्न्तािस्सि हु ल्डड्जन्प्ट् द्वादर्शाधिकशततमो< ध्याय: गरुड़की पीठपर बैठकर पूर्व दिशाकी ओर जाते हुए गालवका उनके वेगसे व्याकुल होना गालव उवाच गरुत्मन्‌ भुजगेन्द्रारे सुपर्ण विनतात्मज । नय मां तार्क्ष्य पूर्वेण यत्र धर्मस्य चक्षुषी,गालवने कहा--गरुत्मन्‌! भुजगराजशत्रो! सुपर्ण! विनतानन्दन! तार्क्ष्य! तुम मुझे पूर्व दिशाकी ओर ले चलो, जहाँ धर्मके नेत्रस्वरूप सूर्य और चन्द्रमा प्रकाशित होते हैं

ଗାଲବ କହିଲେ—ହେ ଗରୁତ୍ମାନ୍! ଭୁଜଗେନ୍ଦ୍ରଶତ୍ରୁ! ହେ ସୁପର୍ଣ୍ଣ, ବିନତାପୁତ୍ର! ହେ ତାର୍କ୍ଷ୍ୟ! ମୋତେ ପୂର୍ବଦିଗକୁ ନେଇ ଚାଲ; ଯେଉଁଠି ଧର୍ମର ଦୁଇ ଚକ୍ଷୁ—ସୂର୍ଯ୍ୟ ଓ ଚନ୍ଦ୍ର—ପ୍ରକାଶିତ ହୁଅନ୍ତି।

Verse 2

पूर्वमेतां दिशं गच्छ या पूर्व परिकीर्तिता । देवतानां हि सांनिध्यमत्र कीर्तितवानसि

ପ୍ରଥମେ ସେଇ ଦିଗକୁ ଯାଅ, ଯାହାକୁ ‘ପୂର୍ବ’ ବୋଲି କୁହାଯାଏ; କାରଣ ଏହି ଦିଗରେ ଦେବତାମାନଙ୍କର ବିଶେଷ ସାନ୍ନିଧ୍ୟ ଅଛି ବୋଲି ତୁମେ ନିଜେ କହିଛ।

Verse 3

अत्र सत्यं च धर्मश्न त्वया सम्यक्‌ प्रकीर्तित: । इच्छेयं तु समागन्तुं समस्तैर्देवतैरहम्‌ । भूयश्व तान्‌ सुरान्‌ द्रष्टमिच्छेयमरुणानुज

ଏଠାରେ ତୁମେ ସତ୍ୟ ଓ ଧର୍ମକୁ ଭଲଭାବେ ପ୍ରକାଶ କରିଛ, ହେ ଧର୍ମଜ୍ଞ! କିନ୍ତୁ ମୁଁ ସମସ୍ତ ଦେବତାଙ୍କ ସହ ସଭାରେ ଏକତ୍ର ହେବାକୁ ଚାହୁଁଛି; ଏବଂ ହେ ଅରୁଣାନୁଜ, ମୁଁ ପୁନର୍ବାର ସେଇ ସୁରମାନଙ୍କୁ ଦେଖିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି।

Verse 4

जिस दिशाका तुमने सबसे पहले वर्णन किया है, उसी दिशाकी ओर पहले चलो; क्योंकि उस दिशामें तुमने देवताओंका सांनिध्य बताया है तथा वहीं सत्य और धर्मकी स्थितिका भी भलीभाँति प्रतिपादन किया है। अरुणके छोटे भाई गरुड़! मैं सम्पूर्ण देवताओंसे मिलना और पुन: उन सबका दर्शन करना चाहता हूँ ।। नारद उवाच तमाह विनतासूनुरारोहस्वेति वै द्विजम्‌ । आरुरोहाथ स मुनिर्गरुडं गालवस्तदा,नारदजी कहते हैं--तब विनतानन्दन गरुड़ने विप्रवर गालवसे कहा--“तुम मेरे ऊपर चढ़ जाओ।” तब गालव मुनि गरुड़की पीठपर जा बैठे

ନାରଦ କହିଲେ—ତାପରେ ବିନତାପୁତ୍ର ଗରୁଡ ସେଇ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କୁ କହିଲେ, “ମୋ ଉପରେ ଆରୋହଣ କର।” ତେବେ ଗାଲବ ମୁନି ସେତେବେଳେ ଗରୁଡଙ୍କ ପିଠିରେ ଚଢ଼ିଲେ।

Verse 5

गालव उवाच क्रममाणस्य ते रूप॑ दृश्यते पन्नगाशन । भास्करस्थेव पूर्वाह्ने सहस्रांशोर्विवस्वत:,गालवने कहा--सर्वभोजी गरुड़! पूर्वह्लकालमें सहस्र किरणोंसे सुशोभित भुवनभास्कर सूर्यका स्वरूप जैसा दिखायी देता है, आकाशमें उड़ते समय तुम्हारा स्वरूप भी वैसा ही दृष्टिगोचर होता है

ଗାଲବ କହିଲେ—ହେ ପନ୍ନଗାଶନ (ସର୍ପଭକ୍ଷକ) ଗରୁଡ! ତୁମେ ଆକାଶପଥେ ଗତି କରୁଥିବାବେଳେ ତୁମ ରୂପ ଏମିତି ଦିଶେ, ଯେପରି ପୂର୍ବାହ୍ନେ ସହସ୍ର କିରଣଧାରୀ ବିବସ୍ୱାନ ସୂର୍ଯ୍ୟ ଆକାଶେ ସ୍ଥିତ ହୋଇ ଦୀପ୍ତିମାନ।

Verse 6

पक्षवातप्रणुन्नानां वृक्षाणामनुगामिनाम्‌ | प्रस्थितानामिव सम॑ पश्यामीह गतिं खग,खेचर! तुम्हारे पंखोंकी हवासे उखड़कर ये वृक्ष पीछे-पीछे चले आ रहे हैं। मैं इनकी भी ऐसी तीव्र गति देख रहा हूँ, मानो ये भी हमलोगोंके साथ चलनेके लिये प्रस्थित हुए हों

ହେ ଖଗଖେଚର! ତୁମ ପକ୍ଷବାତରେ ଉଖଡ଼ି ପଡ଼ିଥିବା ଏହି ବୃକ୍ଷଗୁଡ଼ିକ ପଛେ ପଛେ ଅନୁସରଣ କରୁଥିବା ପରି ଲାଗୁଛି। ଏଠାରେ ମୁଁ ତାଙ୍କର ଗତିକୁ ମଧ୍ୟ ଆମ ସମାନ ଦେଖୁଛି—ମନେ ହୁଏ ସେମାନେ ମଧ୍ୟ ଆମ ସହ ଯାତ୍ରାକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରିଛନ୍ତି।

Verse 7

ससागरवनामुर्वी सशैलवनकाननाम्‌ | आकर्षन्निव चाभासि पक्षवातेन खेचर,आकाशचारी गरुड़! तुम अपने पंखोंके वेगसे उठी हुई वायुद्वारा समुद्रकी जलराशि, पर्वत, वन और काननोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वीको अपनी ओर खींचते-से जान पड़ते हो

ହେ ଆକାଶଚାରୀ ଗରୁଡ଼! ତୁମ ପକ୍ଷବେଗରେ ଉଠିଥିବା ବାୟୁଦ୍ୱାରା ସମୁଦ୍ର, ପର୍ବତ, ବନ ଓ କାନନ ସହିତ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ତୁମେ ନିଜ ପାଖକୁ ଟାଣୁଥିବା ପରି ଦେଖାଯାଉଛ।

Verse 8

समीननागनक्रं च खमिवारोप्यते जलम्‌ | वायुना चैव महता पक्षवातेन चानिशम्‌,पाँखोंके हिलानेसे निरन्तर उठती हुई प्रचण्ड वायुके वेगसे मत्स्य, जलहस्ती तथा मगरोंसहित समुद्रका जल तुम्हारे द्वारा मानो आकाशमें उछाल दिया जाता है

ପକ୍ଷଗତିର ନିରନ୍ତର ଆଘାତରୁ ଉଠୁଥିବା ପ୍ରଚଣ୍ଡ ବାୟୁବେଗରେ, ମତ୍ସ୍ୟ, ଜଳହସ୍ତୀ ଓ ନକ୍ର ସହିତ ସମୁଦ୍ରଜଳ ତୁମ ଦ୍ୱାରା ମନେ ହୁଏ ଆକାଶକୁ ଛିଟକି ଉଠୁଛି।

Verse 9

तुल्यरूपाननान्‌ मत्स्यांस्तथा तिमितिमिंगिलान | नागाश्वनरवक्त्रांश्व॒ पश्याम्युन्मथितानिव,जिनके आकार और मुख एक-से हैं ऐसे मत्स्योंको, तिमि और तिमिंगिलोंको तथा हाथी, घोड़े और मनुष्योंके समान मुखवाले जल-जन्तुओंको मैं उन्‍्मथित हुए-से देखता हूँ

ଯାହାଙ୍କର ଆକାର ଓ ମୁଖ ଏକେ ପରି ଅଛି ସେହି ମତ୍ସ୍ୟମାନଙ୍କୁ, ତଥା ତିମି ଓ ତିମିଙ୍ଗିଲମାନଙ୍କୁ, ଏବଂ ହାତୀ, ଘୋଡ଼ା ଓ ମନୁଷ୍ୟ ସଦୃଶ ମୁଖବିଶିଷ୍ଟ ଜଳଜନ୍ତୁମାନଙ୍କୁ ମୁଁ ଉନ୍ମଥିତ ହୋଇଥିବା ପରି ଦେଖୁଛି।

Verse 10

महार्णवस्य च रवै: श्रोत्रे मे बधिरे कृते । न शृणोमि न पश्यामि नात्मनो वेझि कारणम्‌,महासागरकी इन भीषण गर्जनाओंने मेरे कान बहरे कर दिये हैं। मैं न तो सुन पाता हूँ, न देख पाता हूँ और न अपने बचावका कोई उपाय ही समझ पाता हूँ

ମହାସାଗରର ଏହି ଭୟଙ୍କର ଗର୍ଜନା ମୋ କାନକୁ ବଧିର କରିଦେଇଛି। ମୁଁ ନ ଶୁଣିପାରୁଛି, ନ ଦେଖିପାରୁଛି, ଏବଂ ନିଜ ରକ୍ଷାର କୌଣସି ଉପାୟ ମଧ୍ୟ ବୁଝିପାରୁନାହିଁ।

Verse 11

शनै: स तु भवान्‌ यातु ब्रह्म॒वध्यामनुस्मरन्‌ । न दृश्यते रविस्तात न दिशो न च खं खग,तात गरुड़! तुमसे कहीं ब्रह्महत्या न हो जाय, इसका ध्यान रखते हुए धीरे-धीरे चलो। मुझे इस समय न तो सूर्य दिखायी देते हैं, न दिशाएँ सूझती हैं और न आकाश ही दृष्टिगोचर होता है

ହେ ଖଗ! ବ୍ରାହ୍ମଣହତ୍ୟାର ପାପଭୟ ସ୍ମରଣ କରି ଧୀରେ ଧୀରେ ଯାଅ। ଏବେ, ପ୍ରିୟ, ସୂର୍ଯ୍ୟ ଦିଶୁନାହିଁ; ଦିଗମାନେ ମଧ୍ୟ ବୁଝାଯାଉନାହିଁ; ଆକାଶ ମଧ୍ୟ ଦୃଶ୍ୟ ନୁହେଁ।

Verse 12

तम एव तु पश्यामि शरीर ते न लक्षये । मणीव जात्यौ पश्यामि चक्षुषी तेडहमण्डज,मुझे केवल अन्धकार ही दिखायी देता है। मैं तुम्हारे शरीरको नहीं देख पाता हूँ। अण्डज! तुम्हारी दोनों आँखें मुझे उत्तम जातिकी दो मणियोंके समान चमकती दिखायी देती हैं

ମୁଁ କେବଳ ସେଇ ଅନ୍ଧକାରକୁ ଦେଖୁଛି; ତୁମ ଶରୀର ମୋତେ ଚିହ୍ନଟ ହେଉନାହିଁ। ହେ ଅଣ୍ଡଜ! ତୁମ ଦୁଇ ଚକ୍ଷୁ ଉତ୍ତମ ଜାତିର ଦୁଇ ମଣି ପରି ଜ୍ଵଳମାନ ଦିଶୁଛି।

Verse 13

शरीरं तु न पश्यामि तव चैवात्मनश्व ह । पदे पदे तु पश्यामि शरीरादग्निमुत्थितम्‌,मैं न तो तुम्हारे शरीरको देखता हूँ और न अपने शरीरको। मुझे पग-पगपर तुम्हारे अंगोंसे आगकी लपटें उठती दिखायी देती हैं

ମୁଁ ନ ତୁମ ଶରୀରକୁ ଦେଖୁଛି, ନ ନିଜ ଶରୀରକୁ। କିନ୍ତୁ ପଦେ ପଦେ ତୁମ ଅଙ୍ଗମାନଙ୍କୁ ଠାରୁ ଅଗ୍ନିଶିଖା ଉଠୁଥିବା ପରି ମୋତେ ଦିଶୁଛି।

Verse 14

स मे निर्वाप्प सहसा चक्षुषी शाम्य ते पुनः । तन्नियच्छ महावेगं गमने विनतात्मज,विनतानन्दन! तुम उस आगको सहसा बुझाकर पुनः अपने दोनों नेत्रोंको भी शान्त करो और तुम्हारी गतिमें जो इतना महान्‌ वेग है, इसे रोको

ହେ ବିନତାତ୍ମଜ! ମୋ ପାଇଁ ସେଇ ଅଗ୍ନିକୁ ହଠାତ୍ ନିବାଇ ଦିଅ ଏବଂ ତୁମ ଦୁଇ ଚକ୍ଷୁକୁ ପୁନଃ ଶାନ୍ତ କର। ତଥା ଗମନରେ ଯେ ଏତେ ମହାବେଗ, ତାହାକୁ ନିୟନ୍ତ୍ରଣ କର।

Verse 15

न मे प्रयोजनं किंचिद्‌ गमने पन्नगाशन । संनिवर्त महाभाग न वेग॑ं विषहामि ते,गरुड़ इस यात्रासे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है, अत: लौट चलो। महाभाग! मैं तुम्हारे वेगको नहीं सह सकता

ହେ ପନ୍ନଗାଶନ! ଏହି ଯାତ୍ରାରେ ମୋର କିଛି ପ୍ରୟୋଜନ ନାହିଁ; ତେଣୁ ଫେରି ଚାଲ। ହେ ମହାଭାଗ! ତୁମ ବେଗକୁ ମୁଁ ସହି ପାରୁନାହିଁ।

Verse 16

गुरवे संश्रुतानीह शतान्यष्टौ हि वाजिनाम्‌ | एकत: श्यामकर्णानां शुभ्राणां चन्द्रवर्चसाम्‌,मैंने गुरुको ऐसे आठ सौ घोड़े देनेकी प्रतिज्ञा की है, जो चन्द्रमाके समान उज्ज्वल कान्तिसे युक्त हों और जिनके कान एक ओरसे श्याम रंगके हों

ଗାଲବ କହିଲେ—ମୁଁ ଏଠାରେ ଗୁରୁଙ୍କୁ ଆଠଶେ ଘୋଡ଼ା ଦେବାକୁ ପ୍ରତିଜ୍ଞା କରିଛି—ଚନ୍ଦ୍ରମା ପରି ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ଶୁଭ୍ର, ଏବଂ ଯାହାଙ୍କ କାନର ଗୋଟିଏ ପାର୍ଶ୍ୱରେ ଶ୍ୟାମ ବର୍ଣ୍ଣର ଚିହ୍ନ ଅଛି।

Verse 17

तेषां चैवापवर्गाय मार्ग पश्यामि नाण्डज | ततो<यं जीवितत्यागे दृष्टो मार्गो मया55त्मन:,किंतु अण्डज! उन घोड़ोंके दिये जानेका कोई मार्ग मुझे नहीं दिखायी देता है। इसीलिये मैंने अपने जीवनके परित्यागका ही मार्ग चुना है

ଗାଲବ କହିଲେ—ହେ ଅଣ୍ଡଜ! ସେଇ ଘୋଡ଼ାଗୁଡ଼ିକୁ ମିଳାଇ ଦେଇ ମୋର ପ୍ରତିଜ୍ଞା ପୂରଣ କରିବାର କୌଣସି ମାର୍ଗ ମୁଁ ଦେଖୁନାହିଁ। ତେଣୁ ମୋ ପାଇଁ ମୁଁ ଗୋଟିଏ ମାତ୍ର ପଥ ଦେଖିଛି—ଜୀବନତ୍ୟାଗ।

Verse 18

नैव मे5स्ति धनं किंचिन्न धनेनान्वित: सुह्ृत्‌ । न चार्थेनापि महता शक्‍्यमेतदू व्यपोहितुम्‌,मेरे पास थोड़ा भी धन नहीं है, कोई धनी मित्र भी नहीं है और यह कार्य ऐसा है कि प्रचुर धनराशिका व्यय करनेसे भी सिद्ध नहीं हो सकता

ଗାଲବ କହିଲେ—ମୋ ପାଖରେ କିଛିମାତ୍ର ଧନ ନାହିଁ, ଧନୀ ସୁହୃଦ୍‌ ମଧ୍ୟ ନାହିଁ; ଏହି କାର୍ଯ୍ୟ ଏମିତି ଯେ ବହୁତ ଧନ ବ୍ୟୟ କଲେ ମଧ୍ୟ ଏହାକୁ ଟାଳିହେବ ନାହିଁ।

Verse 19

नारद उवाच एवं बहु च दीनं च ब्रुवाणं गालवं तदा । प्रत्युवाच व्रजन्नेव प्रहसन्‌ विनतात्मज:,नारदजी कहते हैं--इस प्रकार बहुत दीन वचन बोलते हुए महर्षि गालवसे विनतानन्दन गरुड़ने चलते हुए ही हँसकर कहा--

ନାରଦ କହିଲେ—ସେତେବେଳେ ଗାଲବ ଏଭଳି ଅନେକ ଦୀନ ବଚନ କହୁଥିବାବେଳେ, ବିନତାପୁତ୍ର ଗରୁଡ ଚାଲୁଥିବା ସମୟରେ ହସି ଉତ୍ତର ଦେଲେ।

Verse 20

नातिप्रज्ञोडसि विप्रर्षे यो55त्मान॑ त्यक्तुमिच्छसि । न चापि कृत्रिम: काल: कालो हि परमेश्वर:,“ब्रह्मर्ष! यदि तुम अपने प्राणोंका परित्याग करना चाहते हो तो विशेष बुद्धिमान्‌ नहीं हो; क्योंकि मृत्यु कृत्रिम नहीं होती (उसका अपनी इच्छासे निर्माण नहीं किया जा सकता)। वह तो परमेश्वरका ही स्वरूप है

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ବ୍ରହ୍ମର୍ଷି! ଯେ ନିଜ ପ୍ରାଣ ତ୍ୟାଗ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରେ, ସେ ଅତି ପ୍ରଜ୍ଞାବାନ ନୁହେଁ। ଏବଂ କାଳ କୃତ୍ରିମ ନୁହେଁ—ମନୁଷ୍ୟ ନିଜ ଇଚ୍ଛାରେ ତାହାକୁ ଗଢ଼ି ପାରେ ନାହିଁ; କାଳ ହିଁ ପରମେଶ୍ୱର।

Verse 21

किमहं पूर्वमेवेह भवता नाभिचोदित: । उपायोअत्र महानस्ति येनैतदुपपद्यते,“तुमने पहले ही मुझसे यह बात क्यों नहीं कह दी? मेरी दृष्टिमें एक महान्‌ उपाय है, जिससे यह कार्य सिद्ध हो सकता है

ତୁମେ ପୂର୍ବରୁ ମୋତେ ଏହି କଥା କାହିଁକି କହିଲ ନାହିଁ? ମୋ ଦୃଷ୍ଟିରେ ଏଠାରେ ଏକ ମହାନ ଉପାୟ ଅଛି, ଯାହାଦ୍ୱାରା ଏହି କାର୍ଯ୍ୟ ସିଦ୍ଧ ହୋଇପାରିବ।

Verse 22

तदेष ऋषभो नाम पर्वत: सागरान्तिके । अत्र विश्रम्य भुक्‍्त्वा च निवर्तिष्याव गालव,“गालव! समुद्रके निकट यह ऋषभ नामक पर्वत है, जहाँ विश्राम और भोजन करके हम दोनों लौट चलेंगे”

ଗାଲବ! ସମୁଦ୍ରତଟ ସମୀପରେ ‘ଋଷଭ’ ନାମକ ଏହି ପର୍ବତ ଅଛି। ଏଠାରେ ବିଶ୍ରାମ କରି ଭୋଜନ କରି ଆମେ ଦୁହେଁ ଫେରିଯିବା।

Verse 111

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें गालवचरित्रविषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ଗାଲବଚରିତ୍ରବିଷୟକ ଏକଶେ ଏଗାରତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 112

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गालवचरिते दादशाधिकशततमो<ध्याय:

ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତ ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବର ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ଗାଲବଚରିତ୍ରର ଏକଶେ ବାରତମ ଅଧ୍ୟାୟ।

Frequently Asked Questions

The chapter frames a dharma-sankat around whether a powerful agent may “elevate” an accomplished ascetic by relocating her without consent—showing how even well-meant intention can become ethically improper when it overrides autonomy and social regard.

Śāṇḍilī asserts the primacy of ācāra: disciplined conduct generates dharma, material stability, and social flourishing, while also counteracting misfortune; ethical speech and non-disparagement function as practical safeguards of order.

No explicit phalaśruti is stated; the meta-commentary is implicit in the narrative causality—moral intention, speech, and respect produce immediate worldly consequences, reinforcing the epic’s instructional method through exemplified outcomes.