Adhyaya 11
Udyoga ParvaAdhyaya 1130 Verses

Adhyaya 11

Nahuṣa Abhiṣeka and the Crisis of Restraint (नहुषाभिषेकः—दमभ्रंशः)

Upa-parva: Nahushopākhyāna (Exemplum of Nahuṣa and Indrāṇī) — Udyoga Parva embedded narrative

Śalya recounts an exemplum in which devas and ṛṣis collectively propose Nahuṣa’s consecration as deva-rāja in Indra’s absence. Nahuṣa initially demurs, citing weakness and inability to protect them, but the assembly assures him that their tapas will empower him and that he will gain tejas by beholding various classes of beings. Installed in sovereignty, he enjoys celestial pleasures—gardens, mountains, music, gandharvas and apsarases—until a marked ethical reversal occurs: having obtained a rare boon and high station, the previously dharmic Nahuṣa becomes governed by kāma. Seeing Indra’s queen Indrāṇī, he publicly demands her attendance, declaring himself Indra and ordering Śacī brought at once. Indrāṇī, distressed, seeks refuge with Bṛhaspati, reminding him of his prior assurances regarding her protection and marital integrity. Bṛhaspati affirms the truth of his word, promises Indra’s swift return, and urges her not to fear. On hearing that Indrāṇī has taken shelter with Bṛhaspati, Nahuṣa becomes angry, signaling the escalation from personal desire to antagonism against institutional counsel.

Chapter Arc: स्वर्ग में इन्द्र के लुप्त हो जाने से अराजकता फैलती है; देवता और ऋषि मिलकर पृथ्वीपति नहुष के पास आते हैं और लोक-हित के लिए उसे इन्द्र-पद पर अभिषिक्त करने का प्रस्ताव रखते हैं। → नहुष इन्द्रासन पाकर तेजस्वी-यशस्वी होकर भी भोग-विलास में डूबता जाता है; गन्धर्व-अप्सराएँ, ऋतुएँ और सुखशीतल सुगन्धित वायु तक उसके ऐश्वर्य को पुष्ट करते हैं, पर भीतर अहंकार बढ़ता है—वह स्वयं को देवलोकों का स्वामी मानकर शची के न आने पर क्रुद्ध होता है। → नहुष सभा में आदेश देता है कि शची शीघ्र उसके निवास में लाई जाए; इन्द्र की महिषी को अपने अधिकार में लेने की उसकी दुष्ट आकांक्षा देव-व्यवस्था और मर्यादा पर सीधा आघात बन जाती है। → शची मन-ही-मन व्याकुल होकर बृहस्पति के पास जाती है और संरक्षण/उपाय माँगती है; देवगुरु के वचनों को सत्य करने का आग्रह (वाणी की प्रतिष्ठा) कथा को आगे की युक्ति और परिणति की ओर मोड़ देता है। → क्या बृहस्पति शची की रक्षा हेतु ऐसा उपाय बताएँगे जिससे नहुष का मद टूटे और इन्द्र-पद की मर्यादा पुनः स्थापित हो?

Shlokas

Verse 1

अपन का छा ] अतप+डऑफाा<ज एकादशोब< ध्याय: देवताओं तथा ऋषियोंके अनुरोधसे राजा नहुषका इन्द्रके पदपर अभिषिक्त होना एवं काम-भोगमें आसक्त होना और चिन्तामें पड़ी हुई इन्द्राणीको बृहस्पतिका आश्वासन शल्य उवाच ऋषयो<थाब्रुवन्‌ सर्वे देवाश्न त्रिदिवेश्वरा: । अयं वै नहुष: श्रीमान्‌ देवराज्येडभिषिच्यताम्‌

ଶଲ୍ୟ କହିଲେ— ତେବେ ସମସ୍ତ ଋଷି ଏବଂ ତ୍ରିଦିବର ଅଧିପତି ଦେବତାମାନେ କହିଲେ— “ଏହି ଶ୍ରୀମାନ୍ ନହୁଷଙ୍କୁ ଦେବରାଜ୍ୟ ପଦରେ ଅଭିଷିକ୍ତ କରାଯାଉ।”

Verse 2

तेजस्वी च यशस्वी च धार्मिकश्नैव नित्यदा । शल्य कहते हैं--युधिष्ठिर! इस प्रकार (स्वर्गमें अराजकता हो जानेपर) ऋषियों, सम्पूर्ण देवताओं एवं देवेश्वरोंने परस्पर मिलकर कहा--'ये जो श्रीमान्‌ नहुष हैं, इन्हींको देवराजके पदपर अभिषिक्त किया जाय; क्योंकि ये तेजस्वी, यशस्वी तथा नित्य-निरन्तर धर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं! ।। १ इ ।। ते गत्वा त्वब्रुवन्‌ सर्वे राजा नो भव पार्थिव,ऐसा निश्चय करके वे सब लोग राजा नहुषके पास जाकर बोले--'पृथिवीपते! आप हमारे राजा होइये'--राजन्‌! तब नहुषने पितरोंसहित उन देवताओं तथा ऋषियोंसे अपने हितकी इच्छासे कहा--

ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ଋଷିମାନେ, ସମସ୍ତ ଦେବତା ଓ ଦେବେଶ୍ୱର ପରସ୍ପର ମିଶି କହିଲେ—‘ଏହି ଶ୍ରୀମାନ୍ ନହୁଷଙ୍କୁ ଦେବରାଜ ପଦରେ ଅଭିଷିକ୍ତ କରାଯାଉ; କାରଣ ସେ ତେଜସ୍ୱୀ, ଯଶସ୍ୱୀ ଏବଂ ସଦା ଧର୍ମରେ ଅଟୁଟ।’

Verse 3

स तानुवाच नहुषो देवानृषिगणांस्तथा । पितृभि: सहितान्‌ राजन्‌ परीप्सन्‌ हितमात्मन:,ऐसा निश्चय करके वे सब लोग राजा नहुषके पास जाकर बोले--'पृथिवीपते! आप हमारे राजा होइये'--राजन्‌! तब नहुषने पितरोंसहित उन देवताओं तथा ऋषियोंसे अपने हितकी इच्छासे कहा--

ହେ ରାଜନ୍, ତେବେ ନହୁଷ ପିତୃମାନଙ୍କ ସହିତ ସେହି ଦେବତା ଓ ଋଷିଗଣଙ୍କୁ—ନିଜ ହିତ ଭାବି—ପ୍ରତିଉତ୍ତର ଦେଲେ।

Verse 4

] दुर्बलो5हं न मे शक्तिर्भवतां परिपालने । बलवागञ्जायते राजा बलं शक्रे हि नित्यदा,“'मैं तो दुर्बल हूँ, मुझमें आपलोगोंकी रक्षा करनेकी शक्ति नहीं है। बलवान्‌ पुरुष ही राजा होता है। इन्द्रमें ही बलकी नित्य सत्ता है”

‘ମୁଁ ଦୁର୍ବଳ; ତୁମମାନଙ୍କୁ ପାଳନ କରିବାକୁ ମୋର ଶକ୍ତି ନାହିଁ। ବଳବାନ୍‌ ଲୋକ ହିଁ ରାଜା ହୁଏ; ନିତ୍ୟ ବଳ ତ ଶକ୍ର—ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କଠାରେ ଅଛି।’

Verse 5

तमन्लुवन्‌ पुनः सर्वे देवा ऋषिपुरोगमा: । अस्माकं तपसा युक्त: पाहि राज्यं त्रिविष्टपे,यह सुनकर सम्पूर्ण देवता तथा ऋषि पुनः उनसे बोले--'राजेन्द्र! आप हमारी तपस्यासे संयुक्त हो स्वर्गके राज्यका पालन कीजिये। हमलोगोंमें प्रत्येकको एक-दूसरेसे घोर भय बना रहता है, इसमें संशय नहीं है। अतः आप अपना अभिषेक कराइये और स्वर्गके राजा होइये

ଏହା ଶୁଣି ଋଷିମାନଙ୍କ ଅଗ୍ରଗାମୀତ୍ୱରେ ସମସ୍ତ ଦେବତା ପୁନର୍ବାର କହିଲେ—‘ଆମ ତପସ୍ୟାର ଶକ୍ତିରେ ଯୁକ୍ତ ହୋଇ ତ୍ରିବିଷ୍ଟପ (ସ୍ୱର୍ଗ) ରାଜ୍ୟକୁ ରକ୍ଷା କରି ପାଳନ କର।’

Verse 6

परस्परभयं घोरमस्माकं हि न संशय: । अभिषिच्यस्व राजेन्द्र भव राजा त्रिविष्टपे,यह सुनकर सम्पूर्ण देवता तथा ऋषि पुनः उनसे बोले--'राजेन्द्र! आप हमारी तपस्यासे संयुक्त हो स्वर्गके राज्यका पालन कीजिये। हमलोगोंमें प्रत्येकको एक-दूसरेसे घोर भय बना रहता है, इसमें संशय नहीं है। अतः आप अपना अभिषेक कराइये और स्वर्गके राजा होइये

‘ଆମମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପରସ୍ପର ଘୋର ଭୟ ଅଛି—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ। ତେଣୁ, ରାଜେନ୍ଦ୍ର, ତୁମେ ଅଭିଷେକ ଗ୍ରହଣ କରି ତ୍ରିବିଷ୍ଟପ (ସ୍ୱର୍ଗ) ର ରାଜା ହେଉ।’

Verse 7

देवदानवयक्षाणामृषीणां रक्षसां तथा । पितृगन्धर्वभूतानां चक्षुविषयवर्तिनाम्‌,“देवता, दानव, यक्ष, ऋषि, राक्षस, पितर, गन्धर्व और भूत--जो भी आपके नेत्रोंके सामने आ जायूँगे, उन्हें देखते ही आप उनका तेज हर लेंगे और बलवान हो जायूँगे। अतः सदा धर्मको सामने रखते हुए आप सम्पूर्ण लोकोंके अधिपति होइये

ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ଦେବ, ଦାନବ, ଯକ୍ଷ, ଋଷି, ରାକ୍ଷସ, ପିତୃ, ଗନ୍ଧର୍ବ ଓ ଭୂତ—ଯେ କେହି ତୁମ ଦୃଷ୍ଟିସୀମାରେ ପଡ଼ିବେ, ସେମାନଙ୍କୁ ଦେଖିମାତ୍ରେ ତୁମେ ସେମାନଙ୍କ ତେଜ ହରିନେବ ଏବଂ ବଳବାନ ହେବ। ତେଣୁ ସଦା ଧର୍ମକୁ ଅଗ୍ରେ ରଖି ସମସ୍ତ ଲୋକର ଅଧିପତି ହେଅ।

Verse 8

तेज आदास्यसे पश्चन्‌ बलवांश्व भविष्यसि । धर्म पुरस्कृत्य सदा सर्वलोकाधिपो भव,“देवता, दानव, यक्ष, ऋषि, राक्षस, पितर, गन्धर्व और भूत--जो भी आपके नेत्रोंके सामने आ जायूँगे, उन्हें देखते ही आप उनका तेज हर लेंगे और बलवान हो जायूँगे। अतः सदा धर्मको सामने रखते हुए आप सम्पूर्ण लोकोंके अधिपति होइये

ତାପରେ ତୁମେ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ତେଜ ହରିନେବ ଏବଂ ବଳବାନ ହେବ। ସଦା ଧର୍ମକୁ ଅଗ୍ରେ ରଖି ସମସ୍ତ ଲୋକର ସର୍ବାଧିପତି ହେଅ।

Verse 9

ब्रह्मर्षश्षापि देवांश्व गोपायस्व त्रिविष्टपे अभिषिक्त: स राजेन्द्र ततो राजा त्रिविष्टपे,“आप स्वर्गमें रहकर ब्रह्मर्षियों तथा देवताओंका पालन कीजिये।” युधिष्ठिर! तदनन्तर राजा नहुषका स्वर्ममें इन्द्रके पदपर अभिषेक हुआ

“ସ୍ୱର୍ଗରେ ବସି ବ୍ରହ୍ମର୍ଷିମାନଙ୍କୁ ଓ ଦେବମାନଙ୍କୁ ରକ୍ଷା କର।” ଏହି ଉପଦେଶ ପାଇ, ହେ ରାଜଶ୍ରେଷ୍ଠ, ତ୍ରିବିଷ୍ଟପରେ ସେଠାରେ ତାଙ୍କର ଅଭିଷେକ ହେଲା; ଏବଂ ପରେ ରାଜା ନହୁଷ ସ୍ୱର୍ଗରେ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ପଦରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ ହେଲେ।

Verse 10

इस प्रकार श्रीमह्माभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोट्रोगपर्वमें वृत्रवधके प्रसंगमें इन्द्रविजयविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ,धर्म पुरस्कृत्य तदा सर्वलोकाधिपो5भवत्‌ | सुदुर्लभं वरं लब्ध्वा प्राप्य राज्यं त्रिविष्टपे

ସେତେବେଳେ ଧର୍ମକୁ ଅଗ୍ରେ ରଖି ସେ ସମସ୍ତ ଲୋକର ଅଧିପତି ହେଲା। ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁର୍ଲଭ ବର ପାଇ ତ୍ରିବିଷ୍ଟପ (ସ୍ୱର୍ଗ)ରେ ରାଜ୍ୟ ପ୍ରାପ୍ତ କଲା।

Verse 11

देवोद्यानेषु सर्वेषु नन्दनोपवनेषु च,देवराज नहुष सम्पूर्ण देवोद्यानोंमें, नन्दनवनके उपवनोंमें, कैलासमें, हिमालयके शिखरपर, मन्दराचल, श्वेतगिरि, सहा, महेन्द्र तथा मलयपर्वतपर एवं समुद्रों और सरिताओंमें, अप्सराओं तथा देवकन्याओंके साथ भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करते थे, कानों और मनको आकर्षित करनेवाली नाना प्रकारकी दिव्य कथाएँ सुनते थे तथा सब प्रकारके वाद्यों और मधुर स्वरसे गाये जानेवाले गीतोंका आनन्द लेते थे

ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ଦିବ୍ୟ ସମୃଦ୍ଧିରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ରାଜା ନହୁଷ ସମସ୍ତ ଦେବୋଦ୍ୟାନରେ—ବିଶେଷକରି ନନ୍ଦନ ଓ ତାହାର ଉପବନଗୁଡ଼ିକରେ—କୈଲାସରେ, ହିମାଳୟର ଶିଖରମାନେ, ମନ୍ଦର, ଶ୍ୱେତଗିରି, ସହ୍ୟ, ମହେନ୍ଦ୍ର ଓ ମଲୟ ପର୍ବତରେ; ଏହିପରି ସମୁଦ୍ରମାନେ ଓ ନଦୀ-ସରିତାମାନଙ୍କ ତଟରେ ମଧ୍ୟ କ୍ରୀଡ଼ା କରୁଥିଲେ। ଅପ୍ସରା ଓ ଦେବକନ୍ୟାମାନଙ୍କ ସହ ନାନା ପ୍ରକାର ବିହାର ଉପଭୋଗ କରୁଥିଲେ; କାନ ଓ ମନକୁ ମୋହିତ କରୁଥିବା ବିଭିନ୍ନ ଦିବ୍ୟ କଥା ଶୁଣୁଥିଲେ; ଏବଂ ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ବାଦ୍ୟର ନାଦ ଓ ମଧୁର ସ୍ୱରରେ ଗାଯାଇଥିବା ଗୀତର ଆନନ୍ଦ ନେଉଥିଲେ।

Verse 12

कैलासे हिमवत्पृष्ठे मन्दरे श्वेतपर्वते । सहो महेन्द्रे मलये समुद्रेषु सरित्सु च,देवराज नहुष सम्पूर्ण देवोद्यानोंमें, नन्दनवनके उपवनोंमें, कैलासमें, हिमालयके शिखरपर, मन्दराचल, श्वेतगिरि, सहा, महेन्द्र तथा मलयपर्वतपर एवं समुद्रों और सरिताओंमें, अप्सराओं तथा देवकन्याओंके साथ भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करते थे, कानों और मनको आकर्षित करनेवाली नाना प्रकारकी दिव्य कथाएँ सुनते थे तथा सब प्रकारके वाद्यों और मधुर स्वरसे गाये जानेवाले गीतोंका आनन्द लेते थे

ଶଲ୍ୟ କହିଲେ— କୈଲାସରେ, ହିମବତର ଉଚ୍ଚ ଶିଖରରେ, ମନ୍ଦର ଓ ଶ୍ୱେତପର୍ବତରେ, ସହ୍ୟ, ମହେନ୍ଦ୍ର ଓ ମଲୟ ପର୍ବତରେ, ଏବଂ ସମୁଦ୍ର ଓ ନଦୀନଦମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ—ଦେବରାଜ ନହୁଷ ଦେବୋଦ୍ୟାନମାନଙ୍କ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଐଶ୍ୱର୍ୟ ଓ ନନ୍ଦନବନର ଉପବନମାନେ ମଧ୍ୟରେ ଅପ୍ସରା ଓ ଦେବକନ୍ୟାମାନଙ୍କ ସହ ନାନାପ୍ରକାର କ୍ରୀଡ଼ା କରୁଥିଲେ। କାନ ଓ ମନକୁ ମୋହିତ କରୁଥିବା ବହୁ ଦିବ୍ୟ କଥା ଶୁଣି, ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ବାଦ୍ୟ ସହ ମଧୁର ସ୍ୱରରେ ଗାଯାଉଥିବା ଗୀତର ଆନନ୍ଦ ନେଉଥିଲେ।

Verse 13

अप्सतेभि: परिवृतो देवकन्यासमावृतः । नहुषो देवराजो<थ क्रीडन्‌ बहुविधं तदा,देवराज नहुष सम्पूर्ण देवोद्यानोंमें, नन्दनवनके उपवनोंमें, कैलासमें, हिमालयके शिखरपर, मन्दराचल, श्वेतगिरि, सहा, महेन्द्र तथा मलयपर्वतपर एवं समुद्रों और सरिताओंमें, अप्सराओं तथा देवकन्याओंके साथ भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करते थे, कानों और मनको आकर्षित करनेवाली नाना प्रकारकी दिव्य कथाएँ सुनते थे तथा सब प्रकारके वाद्यों और मधुर स्वरसे गाये जानेवाले गीतोंका आनन्द लेते थे

ଅପ୍ସରାମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପରିବୃତ ଓ ଦେବକନ୍ୟାମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଆବୃତ, ସେ ନହୁଷ—ଯେତେବେଳେ ଦେବରାଜ ଥିଲେ—ତେବେ ନାନାପ୍ରକାର କ୍ରୀଡ଼ାରେ ରମଣ କରୁଥିଲେ।

Verse 14

शृण्वन्‌ दिव्या बहुविधा: कथा: श्रुतिमनोहरा: । वादित्राणि च सर्वाणि गीत॑ च मधुरस्वनम्‌,देवराज नहुष सम्पूर्ण देवोद्यानोंमें, नन्दनवनके उपवनोंमें, कैलासमें, हिमालयके शिखरपर, मन्दराचल, श्वेतगिरि, सहा, महेन्द्र तथा मलयपर्वतपर एवं समुद्रों और सरिताओंमें, अप्सराओं तथा देवकन्याओंके साथ भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करते थे, कानों और मनको आकर्षित करनेवाली नाना प्रकारकी दिव्य कथाएँ सुनते थे तथा सब प्रकारके वाद्यों और मधुर स्वरसे गाये जानेवाले गीतोंका आनन्द लेते थे

କାନ ଓ ମନକୁ ମୋହିତ କରୁଥିବା ବହୁ ଦିବ୍ୟ କଥା ଶୁଣି, ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ବାଦ୍ୟ ସହ ମଧୁର ସ୍ୱରରେ ଗାଯାଉଥିବା ଗୀତର ଆନନ୍ଦ ନେଉଥିଲେ।

Verse 15

विश्वावसुनरिदश्न गन्धर्वाप्सरसां गणा: । ऋतव: षट्‌ च देवेन्द्रं मूर्तिमन्त उपस्थिता:,विश्वावसु, नारद, गन्धर्वों और अप्सराओंके समुदाय तथा छहों ऋतुएँ शरीर धारण करके देवेन्द्रकी सेवामें उपस्थित होती थीं

ବିଶ୍ୱାବସୁ, ନାରଦ, ଗନ୍ଧର୍ବ ଓ ଅପ୍ସରାମାନଙ୍କ ସମୂହ, ଏବଂ ଛଅ ଋତୁ ମଧ୍ୟ ମୂର୍ତ୍ତିମାନ ହୋଇ ଦେବେନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ସେବାରେ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲେ।

Verse 16

मारुत: सुरभिववाति मनोज्ञ: सुखशीतल: । एवं च क्रीडतस्तस्य नहुषस्य दुरात्मन:

ସୁଗନ୍ଧିତ ପବନ ବହୁଥିଲା—ମନୋହର, ସୁଖଦ ଓ ଶୀତଳ। ଏଭଳି ସୁଖରେ କ୍ରୀଡ଼ା କରୁଥିବା ସେ ଦୁରାତ୍ମା ନହୁଷଙ୍କ (କାଳ ଆଗକୁ ବଢ଼ୁଥିଲା)।

Verse 17

सतां संदृश्य दुष्टात्मा प्राह सर्वानू सभासद:,आगच्छतु शची महां क्षिप्रमद्य निवेशनम्‌ । उन्हें देखकर दुष्टात्मा नहुषने समस्त सभासदोंसे कहा--“इन्द्रकी महारानी शची मेरी सेवामें क्यों नहीं उपस्थित होतीं? मैं देवताओंका इन्द्र हूँ और सम्पूर्ण लोकोंका अधीदश्वर हूँ। अतः शचीदेवी आज मेरे महलमें शीघ्र पधारें!

ସଜ୍ଜନମାନଙ୍କ ସଭାକୁ ଦେଖି ଦୁଷ୍ଟାତ୍ମା ନହୁଷ ସମସ୍ତ ସଭାସଦଙ୍କୁ କହିଲା— “ଶଚୀ ଆଜି ଶୀଘ୍ର ମୋ ନିବାସକୁ ଆସୁ। ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ମହିଷୀ ଦେବୀ କାହିଁକି ମୋ ସେବାରେ ଉପସ୍ଥିତ ହୁଅନାହିଁ? ମୁଁ ଦେବମାନଙ୍କ ଇନ୍ଦ୍ର ଏବଂ ସମସ୍ତ ଲୋକର ଅଧୀଶ୍ୱର; ତେଣୁ ଶଚୀଦେବୀ ତୁରନ୍ତ ମୋ ପ୍ରାସାଦକୁ ଆସୁ।”

Verse 18

इन्द्रस्य महिषी देवी कस्मान्मां नोपतिष्ठति । अहमिन्द्रोडस्मि देवानां लोकानां च तथेश्वर:

ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ମହିଷୀ ଦେବୀ କାହିଁକି ମୋ ସେବାରେ ଉପସ୍ଥିତ ହୁଅନାହିଁ? କାରଣ ମୁଁ ଦେବମାନଙ୍କ ଇନ୍ଦ୍ର ଏବଂ ଲୋକମାନଙ୍କର ମଧ୍ୟ ଅଧୀଶ୍ୱର।

Verse 19

तच्छुत्वा दुर्मना देवी बृहस्पतिमुवाच ह,यह सुनकर शचीदेवी मन-ही-मन बहुत दुःखी हुईं और बृहस्पतिसे बोलीं--'ब्रह्मन! मैं आपकी शरणमें आयी हूँ, आप नहुषसे मेरी रक्षा कीजिये। विप्रवर! आप मुझसे कहा करते हैं कि तुम समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, देवराज इन्द्रकी प्राणवल्लभा, अत्यन्त सुखभागिनी, सौभाग्यवती, एकपत्नी और पतिव्रता हो जब राजा नहुषने सुना कि इन्द्राणी अंगिराके पुत्र बृहस्पतिकी शरणमें गयी है, तब वे बहुत कुपित हुए ।। इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि इन्द्राणीभये एकादशो<5ध्याय: ।। ११ |। इस प्रकार श्रीमह़्ा भारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोट्रोगपर्वमें इन्द्राणीभयविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହା ଶୁଣି ଦେବୀ ଶଚୀ ମନେ ଦୁଃଖିତ ହୋଇ ବୃହସ୍ପତିଙ୍କୁ କହିଲେ— “ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ! ମୁଁ ଆପଣଙ୍କ ଶରଣକୁ ଆସିଛି; ନହୁଷଠାରୁ ମୋତେ ରକ୍ଷା କରନ୍ତୁ।”

Verse 20

रक्ष मां नहुषाद्‌ ब्रह्मंस्त्वामस्मि शरणं गता । सर्वलक्षणसम्पन्नां ब्रह्मुंस्त्वं मां प्रभाषसे,यह सुनकर शचीदेवी मन-ही-मन बहुत दुःखी हुईं और बृहस्पतिसे बोलीं--'ब्रह्मन! मैं आपकी शरणमें आयी हूँ, आप नहुषसे मेरी रक्षा कीजिये। विप्रवर! आप मुझसे कहा करते हैं कि तुम समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, देवराज इन्द्रकी प्राणवल्लभा, अत्यन्त सुखभागिनी, सौभाग्यवती, एकपत्नी और पतिव्रता हो

“ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ! ମୁଁ ଆପଣଙ୍କ ଶରଣକୁ ଆସିଛି; ନହୁଷଠାରୁ ମୋତେ ରକ୍ଷା କରନ୍ତୁ। ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ! ଆପଣ ମୋତେ ସମସ୍ତ ଶୁଭ ଲକ୍ଷଣରେ ସମ୍ପନ୍ନ ବୋଲି କହନ୍ତି।”

Verse 21

देवराजस्य दयितामत्यन्तं सुखभागिनीम्‌ । अवैधव्येन युक्तां चाप्येकपत्नीं पतिव्रताम्‌,यह सुनकर शचीदेवी मन-ही-मन बहुत दुःखी हुईं और बृहस्पतिसे बोलीं--'ब्रह्मन! मैं आपकी शरणमें आयी हूँ, आप नहुषसे मेरी रक्षा कीजिये। विप्रवर! आप मुझसे कहा करते हैं कि तुम समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, देवराज इन्द्रकी प्राणवल्लभा, अत्यन्त सुखभागिनी, सौभाग्यवती, एकपत्नी और पतिव्रता हो

“ସେ ଦେବରାଜଙ୍କ ଦୟିତା, ଅତ୍ୟନ୍ତ ସୁଖଭାଗିନୀ; ଅବୈଧବ୍ୟ-ଯୋଗରେ ଯୁକ୍ତ, ଏକପତ୍ନୀ ଓ ପତିବ୍ରତା।”

Verse 22

उक्तवानसि मां पूर्वमृतां तां कुरु वै गिरम्‌ । नोक्तपूर्व च भगवन्‌ वृथा ते किंचिदीश्वर

ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—“ଆପଣ ପୂର୍ବେ ମୋତେ ଯାହା କହିଥିଲେ, ସେହି କଥାକୁ ସତ୍ୟ କରନ୍ତୁ; ସେ ପୂର୍ବବଚନ ପୂରଣ କରନ୍ତୁ। ଏବଂ ହେ ଭଗବନ୍, ହେ ଈଶ୍ୱର! ପୂର୍ବେ ନ କହା ନିରାଧାର କଥା କହିବେ ନାହିଁ; ହେ ନରେଶ୍ୱର, ଆପଣଙ୍କ ବଚନ ବ୍ୟର୍ଥ ନ ହେଉ।”

Verse 23

गए हु जज्क्ज्खट गण ै हि! हा ८2 252 ८ ६ / हि | 6) |] हे ४ ८८८ / | ६] रह ५00 /$ ॥ बृहस्पतिरथोवाच शक्राणीं भयमोहिताम्‌,यह सुनकर बृहस्पतिने भयसे व्याकुल हुई इन्द्राणीसे कहा--*देवि! मैंने तुमसे जो कुछ कहा है, वह सब अवश्य सत्य होगा। तुम शीघ्र ही देवराज इन्द्रको यहाँ आया हुआ देखोगी। नहुषसे तुम्हें डरना नहीं चाहिये। मैं सच्ची बात कहता हूँ, थोड़े ही दिनोंमें तुम्हें इन्द्रसे मिला दूँगा'

ଭୟ ଓ ମୋହରେ ବିହ୍ୱଳ ଶକ୍ରାଣୀଙ୍କୁ ବୃହସ୍ପତି କହିଲେ—“ଦେବି! ମୁଁ ତୁମକୁ ଯାହା କହିଛି, ସେ ସବୁ ନିଶ୍ଚୟ ସତ୍ୟ ହେବ। ଶୀଘ୍ର ତୁମେ ଦେବରାଜ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ଏଠାରେ ଫେରିଆସିଥିବା ଦେଖିବ। ନହୁଷକୁ ଭୟ କରନି। ମୁଁ ସତ୍ୟ କହୁଛି—କିଛି ଦିନ ମଧ୍ୟରେ ମୁଁ ତୁମକୁ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ସହିତ ପୁନଃ ମିଳାଇଦେବି।”

Verse 24

यदुक्तासि मया देवि सत्यं तद्‌ भविता ध्रुवम्‌ द्रक्ष्य्से देवराजानमिन्द्रं शीघ्रमिहागतम्‌,यह सुनकर बृहस्पतिने भयसे व्याकुल हुई इन्द्राणीसे कहा--*देवि! मैंने तुमसे जो कुछ कहा है, वह सब अवश्य सत्य होगा। तुम शीघ्र ही देवराज इन्द्रको यहाँ आया हुआ देखोगी। नहुषसे तुम्हें डरना नहीं चाहिये। मैं सच्ची बात कहता हूँ, थोड़े ही दिनोंमें तुम्हें इन्द्रसे मिला दूँगा'

ବୃହସ୍ପତି କହିଲେ—“ଦେବି! ମୁଁ ତୁମକୁ ଯାହା କହିଛି, ସେ ନିଶ୍ଚୟ ସତ୍ୟ ହେବ। ଶୀଘ୍ର ତୁମେ ଦେବରାଜ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ଏଠାରେ ଆସିଥିବା ଦେଖିବ। ନହୁଷକୁ ଭୟ କରନି; ମୁଁ ସତ୍ୟ କହୁଛି—ଅଳ୍ପ ସମୟରେ ମୁଁ ତୁମକୁ ପୁନଃ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ସହିତ ମିଳାଇଦେବି।”

Verse 25

न भेतव्यं च नहुषात्‌ सत्यमेतद्‌ ब्रवीमि ते । समानयिष्ये शक्रेण न चिराद्‌ भवतीमहम्‌,यह सुनकर बृहस्पतिने भयसे व्याकुल हुई इन्द्राणीसे कहा--*देवि! मैंने तुमसे जो कुछ कहा है, वह सब अवश्य सत्य होगा। तुम शीघ्र ही देवराज इन्द्रको यहाँ आया हुआ देखोगी। नहुषसे तुम्हें डरना नहीं चाहिये। मैं सच्ची बात कहता हूँ, थोड़े ही दिनोंमें तुम्हें इन्द्रसे मिला दूँगा'

“ନହୁଷକୁ ଭୟ କରନି; ଏହି କଥା ମୁଁ ତୁମକୁ ସତ୍ୟ କହୁଛି। ଅଧିକ ବିଳମ୍ବ ନୁହେଁ—ମୁଁ ନିଜେ ତୁମକୁ ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କ ସହିତ ମିଳାଇଦେବି।”

Verse 26

अथ शुश्राव नहुष: शक्राणीं शरणं गताम्‌ | बृहस्पतेरज्ञिरसश्लुक्रोध स नृपस्तदा

ତାପରେ ନହୁଷ ଶୁଣିଲେ ଯେ ଶକ୍ରାଣୀ (ଇନ୍ଦ୍ରାଣୀ) ଶରଣ ଗ୍ରହଣ କରିଛନ୍ତି; ଏବଂ ସେହି ସମୟରେ ସେ ରାଜା ବୃହସ୍ପତି ଓ ଆଙ୍ଗିରସ ଋଷିମାନଙ୍କ କ୍ରୋଧର ପାତ୍ର ହେଲେ।

Verse 106

धर्मात्मा सततं भूत्वा कामात्मा समपद्यत | धर्मको आगे रखकर उस समय राजा नहुष सम्पूर्ण लोकोंके अधिपति हो गये। वे परम दुर्लभ वर पाकर स्वर्गके राज्यको हस्तगत करके निरन्तर धर्मपरायण रहते हुए भी कामभोगमें आसक्त हो गये

ଧର୍ମାତ୍ମା ହୋଇ ସଦା ଥିଲେ ମଧ୍ୟ ରାଜା ନହୁଷ କାମବଶ ହେଲେ। ଧର୍ମକୁ ଆଗରେ ରଖି ସେ ସମସ୍ତ ଲୋକଙ୍କ ଅଧିପତି ହେଲେ; କିନ୍ତୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁର୍ଲଭ ବର ପାଇ ସ୍ୱର୍ଗରାଜ୍ୟ ହସ୍ତଗତ କରି, ନିତ୍ୟ ଧର୍ମପରାୟଣ ଦେଖାଯାଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ ବିଷୟଭୋଗରେ ଆସକ୍ତ ହେଲେ।

Verse 166

सम्प्राप्ता दर्शन देवी शक्रस्य महिषी प्रिया । उनके लिये वायु मनोहर, सुखद, शीतल और सुगन्धित होकर बहते थे। इस प्रकार क्रीड़ा करते हुए दुरात्मा राजा नहुषकी दृष्टि एक दिन देवराज इन्द्रकी प्यारी महारानी शचीपर पड़ी

ତେବେ ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କ ପ୍ରିୟ ମହିଷୀ ଦେବୀ ଶଚୀ ଦୃଷ୍ଟିଗୋଚର ହେଲେ। ତାଙ୍କ ପାଇଁ ପବନ ମନୋହର, ସୁଖଦ, ଶୀତଳ ଓ ସୁଗନ୍ଧିତ ହୋଇ ବହିଲା। ଏଭଳି ସ୍ୱେଚ୍ଛାଭୋଗରେ କ୍ରୀଡ଼ା କରୁଥିବା ଦୁରାତ୍ମା ନହୁଷଙ୍କ ଦୃଷ୍ଟି ଗୋଟିଏ ଦିନ ଦେବରାଜ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ପ୍ରିୟ ମହାରାଣୀ ଶଚୀ ଉପରେ ପଡ଼ିଲା।

Verse 183

आगच्छतु शची महां क्षिप्रमद्य निवेशनम्‌ । उन्हें देखकर दुष्टात्मा नहुषने समस्त सभासदोंसे कहा--“इन्द्रकी महारानी शची मेरी सेवामें क्यों नहीं उपस्थित होतीं? मैं देवताओंका इन्द्र हूँ और सम्पूर्ण लोकोंका अधीदश्वर हूँ। अतः शचीदेवी आज मेरे महलमें शीघ्र पधारें!

“ଶଚୀ ଆଜି ଶୀଘ୍ର ମୋ ନିବାସକୁ ଆସୁନ୍।” ତାଙ୍କୁ ଦେଖି ଦୁଷ୍ଟାତ୍ମା ନହୁଷ ସମସ୍ତ ସଭାସଦଙ୍କୁ କହିଲେ—“ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ମହିଷୀ ଶଚୀ ମୋ ସେବାରେ କାହିଁକି ଉପସ୍ଥିତ ହୁଅନ୍ତି ନାହିଁ? ମୁଁ ଦେବତାମାନଙ୍କ ଇନ୍ଦ୍ର ଏବଂ ସମସ୍ତ ଲୋକଙ୍କ ଅଧୀଶ୍ୱର। ତେଣୁ ଶଚୀଦେବୀ ଆଜି ଶୀଘ୍ର ମୋ ପ୍ରାସାଦକୁ ଆସୁନ୍।”

Verse 226

तस्मादेतद्‌ भवेत्‌ सत्य त्वयोक्त द्विजसत्तम । 'भगवन्‌! आपने पहले जो वैसी बातें कही हैं, अपनी उन वाणियोंको सत्य कीजिये। देवगुरो! आपके मुखसे पहले कभी कोई व्यर्थ या असत्य वचन नहीं निकला है, अतः द्विजश्रेष्ठी आपका यह पूर्वोक्त वचन भी सत्य होना चाहिये”

ଏହେତୁ, ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଆପଣ କହିଥିବା କଥା ସତ୍ୟ ହେଉ। ଭଗବନ, ଆପଣ ପୂର୍ବେ ଯେପରି କହିଥିଲେ, ଏବେ ତାହାକୁ କାର୍ଯ୍ୟରେ ସତ୍ୟ କରନ୍ତୁ। ଦେବଗୁରୋ, ଆପଣଙ୍କ ମୁଖରୁ କେବେ ବ୍ୟର୍ଥ କିମ୍ବା ଅସତ୍ୟ ବଚନ ବାହାରିନାହିଁ; ତେଣୁ ଆପଣଙ୍କ ସେହି ପୂର୍ବୋକ୍ତ ବଚନ ମଧ୍ୟ ସତ୍ୟ ହେବା ଉଚିତ।

Frequently Asked Questions

The dilemma is how a ruler, even when legitimately empowered, must restrain desire and speech; Nahuṣa’s claim over Indrāṇī shows the collapse of rāja-dharma when authority is treated as personal entitlement.

Power amplified by external support (tapas, appointment, acclaim) requires internal discipline; without self-governance, sovereignty becomes ethically unstable and turns against both subjects and advisory institutions.

No explicit phalaśruti appears in these verses; the chapter functions as an instructive exemplum embedded in counsel-narrative, where the ‘fruit’ is interpretive—recognizing how dharma deteriorates through unrestrained kāma and anger.