अध्याय ३३७ — ज्ञानमार्ग-वैविध्यप्रश्नः तथा व्यासस्य नारायणोद्भवकथा
Systems of Knowledge and Vyāsa’s Nārāyaṇa-Origin
अहिंस्न: शुचिरक्षुद्रो निराशी: कर्मसंस्तुत: । आरण्यकपदोदभूता भागास्तत्रोपकल्पिता:,वे हिंसाभावसे रहित, पवित्र, उदार तथा कामनाओंसे रहित थे और इसी भावसे कर्ममें प्रवृत्त हुए थे। जंगलमें उत्पन्न हुए फल-मूल आदि पदार्थोंसे ही उस यज्ञमें देवताओंके भाग निश्चित किये गये थे
ahiṃsnaḥ śucir akṣudro nirāśīḥ karmasaṃstutaḥ | āraṇyakapadodbhūtā bhāgās tatropakalpitāḥ ||
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ସେମାନେ ଅହିଂସକ, ପବିତ୍ର, ଉଦାର ଓ କାମନାରହିତ ଥିଲେ; ପ୍ରଶଂସନୀୟ ଭାବରେ କର୍ମରେ ପ୍ରବୃତ୍ତ ହୋଇଥିଲେ। ସେଇ ଯଜ୍ଞରେ ଦେବତାମାନଙ୍କ ଭାଗ ଅରଣ୍ୟଜ ଫଳ-ମୂଳ ଆଦି ଦ୍ରବ୍ୟରେ ହିଁ ବ୍ୟବସ୍ଥିତ କରାଯାଇଥିଲା।
भीष्म उवाच