Śuka’s Guṇa-Transcendence and Vyāsa’s Consolation (शुकगति-वर्णनम्)
सा यदि त्वं स्वकार्येण यद्यन्यस्य महीपते: । तत् त्वं सत्रप्रतिच्छन्ना मयि नाहसि गूहितुम्,यदि आप अपने कार्यसे या किसी दूसरे राजाके कार्यसे यहाँ वेष बदलकर आयी हों तो अब आपके लिये यथार्थ बातको गुप्त रखना उचित नहीं है
sā yadi tvaṁ svakāryeṇa yady anyasya mahīpateḥ | tat tvaṁ satrapraticchannā mayi nāhasi gūhitum ||
ଯଦି ତୁମେ ନିଜ କାର୍ଯ୍ୟ ପାଇଁ କିମ୍ବା ଅନ୍ୟ କୌଣସି ରାଜାଙ୍କ କାର୍ଯ୍ୟ ପାଇଁ ଏଠାକୁ ବେଶ ବଦଳାଇ ଆସିଛ, ତେବେ ଏବେ ସତ୍ୟ କଥାକୁ ଗୁପ୍ତ ରଖିବା ତୁମ ପାଇଁ ଉଚିତ ନୁହେଁ।
जनक उवाच