Śuka’s Guṇa-Transcendence and Vyāsa’s Consolation (शुकगति-वर्णनम्)
न च कामसमायुक्ते युक्ते5प्यस्ति त्रिदण्डके । न रक्ष्यते त्वया चेदं न मुक्तस्यास्ति गोपना,मनुष्य योगयुक्त होकर भी यदि कामभोगमें आसक्त हो जाय तो उसका त्रिदण्ड धारण करना अनुचित एवं व्यर्थ है। आप अपने इस बर्तावद्वारा संन्यास-आश्रमके नियमकी रक्षा नहीं कर रही हैं। यदि अपने स्वरूपको छिपानेके लिये आपने ऐसा किया हो तो जीवन्मुक्त पुरुषके लिये आत्मगोपन आवश्यक नहीं है
na ca kāmasamāyukte yukte ’py asti tridaṇḍake | na rakṣyate tvayā cedaṃ na muktasyāsti gopanā ||
ଯଦି କେହି ଯୋଗଯୁକ୍ତ ହୋଇ ମଧ୍ୟ କାମଭୋଗରେ ଆସକ୍ତ ହୁଏ, ତେବେ ତାହାର ତ୍ରିଦଣ୍ଡଧାରଣ ଅନୁଚିତ ଓ ବ୍ୟର୍ଥ। ତୁମ ଏହି ଆଚରଣରେ ସନ୍ନ୍ୟାସାଶ୍ରମର ନିୟମ ରକ୍ଷିତ ହେଉନାହିଁ। ଏହା ଯଦି ନିଜ ସ୍ୱରୂପ ଲୁଚାଇବା ପାଇଁ କରାଯାଇଥାଏ, ତେବେ ଜାଣ—ସତ୍ୟ ମୁକ୍ତଙ୍କ ପାଇଁ ଆତ୍ମଗୋପନ ଆବଶ୍ୟକ ନୁହେଁ।
जनक उवाच