Akṣara–Kṣara Viveka: Vasiṣṭha–Karāla-Janaka Saṃvāda (अक्षर-क्षर विवेकः)
सेवा55श्रितेन मनसा वृत्तिहीनस्य शस्यते । द्विजातिहस्तान्निर्वत्ता न तु तुल्यात् परस्परात्,जो मनुष्य इन्द्रियोंकी बाह्य वृत्तिसे रहित (अन्तर्मुख) होकर ईश्वरकी शरणमें गये हुए मनके द्वारा उनकी उपासना करता है, उसकी वह उपासना श्रेष्ठ समझी जाती है। ऐसी उपासना किसी विद्दान् एवं भक्त ब्राह्मणके वरद हस्तसे ही उपलब्ध होती है। समान योग्यतावाले आपसके लोगोंसे उसकी प्राप्ति नहीं होती
parāśara uvāca | sevāśritena manasā vṛttihīnasya śasyate | dvijātihastān nirvṛttā na tu tulyāt parasparāt ||
ପରାଶର କହିଲେ—ଇନ୍ଦ୍ରିୟମାନଙ୍କର ବାହ୍ୟବୃତ୍ତିରୁ ନିବୃତ୍ତ ହୋଇ, ସେବାରେ ଆଶ୍ରିତ ମନ ଦ୍ୱାରା ଯେ ଈଶ୍ୱରଙ୍କୁ ଉପାସନା କରେ, ତାହାର ଉପାସନା ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୋଲି ପ୍ରଶଂସିତ। ଏହି ଉପାସନା ବିଦ୍ୱାନ ଓ ଭକ୍ତ ଦ୍ୱିଜଙ୍କର ବରଦ ହସ୍ତରୁ ହିଁ ଲଭ୍ୟ; ସମାନ ଯୋଗ୍ୟତାବାନଙ୍କ ପରସ୍ପର ସଙ୍ଗରୁ ନୁହେଁ।
पराशर उवाच