अव्यक्त-मानस-सृष्टिवादः
Doctrine of Creation from the Unmanifest ‘Mānasa’
वृत्त एष ह॒दि प्रौढो मृत्युरेष मनोभव: । क्रोधो नाम शरीरस्थो देदहिनां प्रोच्यते बुचै:,हृदयसे उत्पन्न होनेवाला यह काम हृदयमें ही पुष्ट होता है, फिर यही मृत्युका रूप धारण कर लेता है। क्योंकि (जब इसकी सिद्धिमें कोई बाधा आती है, तब) दिद्दानोंद्वारा यही प्राणियोंके शरीरके भीतर क्रोधके नामसे पुकारा जाता है
vṛtta eṣa hṛdi prauḍho mṛtyur eṣa manobhavaḥ | krodho nāma śarīrastho dehināṃ procyate budhaiḥ ||
ବ୍ରାହ୍ମଣ କହିଲେ—ମନରୁ ଜନ୍ମିଥିବା କାମ ହୃଦୟରେ ଉଦ୍ଭବ ହୋଇ ସେଠିଏ ଦୃଢ଼ ହୁଏ; ପ୍ରକୃତରେ ସେଇ ମୃତ୍ୟୁର ଏକ ରୂପ ହୋଇଯାଏ। ଯେତେବେଳେ ସେ ଅବରୋଧିତ ହୋଇ ନିଜ ବିଷୟକୁ ପାଇପାରେ ନାହିଁ, ସେତେବେଳେ ଦେହଧାରୀମାନଙ୍କ ଭିତରେ ବସିଥିବା ସେଇ ଶକ୍ତିକୁ ଜ୍ଞାନୀମାନେ ‘କ୍ରୋଧ’ ବୋଲି କହନ୍ତି।
ब्राह्मण उवाच