Chapter 59: Baladeva’s Censure, Keśava’s Restraint, and Yudhiṣṭhira’s Moral Accounting
कथं द्रक्ष्यामि विधवा वधू: शोकपरिप्लुता: । “भला, मैं भाइयों और पुत्रोंकी उन शोकविह्नलला और दु:खमें डूबी हुई विधवा बहुओंको कैसे देख सकूँगा
kathaṁ drakṣyāmi vidhavā vadhūḥ śokapariplutāḥ |
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—“ଶୋକରେ ଡୁବିଥିବା, ବିଧବା ହୋଇପଡ଼ିଥିବା ସେଇ ବଧୂମାନଙ୍କୁ ମୁଁ କିପରି ଦେଖିପାରିବି?”
संजय उवाच