
Chapter Arc: द्यूत-सभा की धूल अभी बैठी भी नहीं कि धृतराष्ट्र का संदेश फिर आता है—“आओ, पाण्डव! फिर पासा खेलो,” और युधिष्ठिर के सामने वही द्वार पुनः खुलता है, जिसके भीतर विनाश पहले ही दिख चुका है। → युधिष्ठिर विधाता-नियोग का तर्क रखकर कहता है कि शुभ-अशुभ फल प्राणियों को प्राप्त होते हैं और उनसे निवृत्ति नहीं—अतः ‘देवितव्यं’ है; वह शकुनि की माया जानते हुए भी भाइयों सहित लौट पड़ता है। सभा में भीष्म, द्रोण, विदुर, कृप, संजय, युयुत्सु, गान्धारी और कुन्ती जैसे वरिष्ठ उसे रोकते हैं; पर लोक-प्रवाद, राज-आज्ञा और ‘धर्म-संयोग’ का दबाव उसे पुनः द्यूत की ओर धकेलता है। → वनवास की शर्त पर ‘एक ही उछाल’ का निर्णायक दाँव—युधिष्ठिर ग्लह स्वीकार करता है, शकुनि पासा फेंकता है और तत्काल घोषणा करता है: “जितम्”—पाण्डवों पर वनवास का निर्णय गिर पड़ता है। → युधिष्ठिर पराजय स्वीकार कर लेता है; सभा के भीतर रोकने वालों की वाणी निष्फल रह जाती है और द्यूत का परिणाम अब विधिवत् राजकीय आदेश का रूप ले लेता है—पाण्डवों के लिए निर्वासन का मार्ग निश्चित होता है। → वनवास की अवधि और उसके बाद की शर्तें (अज्ञातवास/पुनरागमन) पाण्डवों के भविष्य को किस प्रकार बाँधेंगी—यह प्रश्न अगले प्रसंग की ओर कथा को धकेल देता है।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें गान्धारीवाक्यविषयक पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ७५ ॥। ऑपनआ प्रात बछ। आर: 2 षट्सप्ततितमो< ध्याय: सबके मना करनेपर भी धृतराष्ट्रकी आज्ञासे युधिष्ठिरका पुनः जूआ खेलना और हारना वैशम्पायन उवाच ततो व्यध्वगतं पार्थ प्रातिकामी युधिष्ठिरम् । उवाच वचनाद् राज्ञो धृतराष्ट्रस्य धीमत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! धर्मराज युधिष्ठछिर इन्द्रप्रस्थके मार्गमें बहुत दूरतक चले गये थे। उस समय बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रकी आज्ञासे प्रातिकामी उनके पास गया और इस प्रकार बोला--
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ପୃଥାପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ପଥରେ ବହୁଦୂର ଅଗ୍ରସର ହୋଇଯାଇଥିଲେ। ସେତେବେଳେ ବୁଦ୍ଧିମାନ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ପ୍ରାତିକାମୀ ତାଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ ସନ୍ଦେଶ କହିଲା।
Verse 2
ऐ उपास्तीर्णा सभा राजन्नक्षानुप्त्वा युधिष्ठिर । एहि पाण्डव दीव्येति पिता त्वाहेति भारत,“भरतकुलभूषण पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर! आपके पिता राजा धृतराष्ट्रने यह आदेश दिया है कि तुम लौट आओ। हमारी सभा फिर सदस्योंसे भर गयी है और तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है। तुम पासे फेंककर जूआ खेलो'
ହେ ରାଜନ୍! ସଭା ପୁନଃ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇଛି। ହେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ପାଶା ନେଇ ଆସ—ହେ ପାଣ୍ଡବ—ଏବଂ ଖେଳ। ହେ ଭାରତ, ତୋ ପିତା ଏହି ଆଜ୍ଞା ଦେଇଛନ୍ତି।
Verse 3
युधिष्ठिर उदाच धातुर्नियोगाद् भूतानि प्राप्रुवन्ति शुभाशुभम् । न निवृत्तिस्तयोरस्ति देवितव्यं पुनर्यदि,युधिष्ठिरने कहा--समस्त प्राणी विधाताकी प्रेरणासे शुभ और अशुभ फल प्राप्त करते हैं। उन्हें कोई टाल नहीं सकता। जान पड़ता है, मुझे फिर जूआ खेलना पड़ेगा
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ବିଧାତାଙ୍କ ନିୟୋଗରେ ପ୍ରାଣୀମାନେ ଶୁଭ ଓ ଅଶୁଭ ଫଳ ପାଆନ୍ତି; ସେଥିରୁ କାହାରି ନିବୃତ୍ତି ନାହିଁ। ତେଣୁ ଯଦି ଏହିପରି ହେବାକୁ ଥାଏ, ମୋତେ ପୁନର୍ବାର ପାଶା ଖେଳିବାକୁ ପଡ଼ିବ।
Verse 4
अक्षयूते समाद्दानं नियोगात् स्थविरस्थ च । जानन्नपि क्षयकरं नातिक्रमितुमुत्सहे,वृद्ध राजा धृतराष्ट्रकी आज्ञासे जूएके लिये यह बुलावा हमारे कुलके विनाशका कारण है, यह जानते हुए भी मैं उनकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं कर सकता
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ବୃଦ୍ଧ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ମୁଁ ଏହି ଅକ୍ଷକ୍ରୀଡ଼ାର ଆହ୍ୱାନ ଗ୍ରହଣ କରିଛି। ଏହା ବିନାଶକାରୀ ବୋଲି ଜାଣିଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ତାଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ଅତିକ୍ରମ କରିବାକୁ ମୋର ସାହସ ନାହିଁ।
Verse 5
वैशम्पायन उवाच असम्भवे हेममयस्य जन्तो- स्तथापि रामो लुलुभे मृगाय । प्रायः समासन्नपरा भवाणां धियो विपर्यस्ततरा भवन्ति,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! किसी जानवरका शरीर सुवर्णका हो, यह सम्भव नहीं; तथापि श्रीराम स्वर्णमय प्रतीत होनेवाले मृगके लिये लुभा गये। जिनका पतन या पराभव निकट होता है, उनकी बुद्धि प्राय: अत्यन्त विपरीत हो जाती है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! କୌଣସି ପ୍ରାଣୀର ଦେହ ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ହେବା ଅସମ୍ଭବ; ତଥାପି ସୁବର୍ଣ୍ଣସଦୃଶ ମୃଗକୁ ଦେଖି ରାମ ମୋହିତ ହେଲେ। ଯାହାଙ୍କ ପତନ ସମୀପ, ସେମାନଙ୍କ ବୁଦ୍ଧି ପ୍ରାୟଃ ଅଧିକ ବିପରୀତ ହୋଇଯାଏ।
Verse 6
इति ब्रुवन् निववृते भ्रातृभि: सह पाण्डव: । जानंश्व शकुनेर्मायां पार्थो द्यूतमियात् पुन:,ऐसा कहते हुए पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर भाइयोंके साथ पुनः लौट पड़े। वे शकुनिकी मायाको जानते थे, तो भी जूआ खेलनेके लिये चले आये
ଏପରି କହି ପାଣ୍ଡବ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଭାଇମାନଙ୍କ ସହିତ ପୁନଃ ଫେରିଲେ। ଶକୁନିର ମାୟା ଜାଣିଥିଲେ ମଧ୍ୟ ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ର ପୁନର୍ବାର ଦ୍ୟୂତକ୍ରୀଡ଼ାକୁ ଗଲେ।
Verse 7
विविशुस्ते सभां तां तु पुनरेव महारथा: । व्यथयन्ति सम चेतांसि सुहृदां भरतर्षभा:,महारथी भरतश्रेष्ठ पाण्डव पुनः उस सभामें प्रविष्ट हुए। उन्हें देखकर सुहृदोंके मनमें बड़ी पीड़ा होने लगी। प्रारब्धके वशीभूत हुए कुन्तीकुमार सम्पूर्ण लोकोंके विनाशके लिये पुनः द्यूतक्रीड़ा आरम्भ करनेके उद्देश्यसे चुपचाप वहाँ जाकर बैठ गये
ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ସେଇ ମହାରଥୀ ପାଣ୍ଡବମାନେ ପୁନର୍ବାର ସେହି ସଭାଗୃହରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ। ସେମାନଙ୍କୁ ଫେରିଆସୁଥିବା ଦେଖି ସୁହୃଦମାନଙ୍କ ହୃଦୟ ଗଭୀର ବେଦନାରେ ବ୍ୟଥିତ ହେଲା।
Verse 8
यथोपजोषमासीना: पुनर्द्यूतप्रवृत्तये सर्वलोकविनाशाय दैवेनोपनिपीडिता:,महारथी भरतश्रेष्ठ पाण्डव पुनः उस सभामें प्रविष्ट हुए। उन्हें देखकर सुहृदोंके मनमें बड़ी पीड़ा होने लगी। प्रारब्धके वशीभूत हुए कुन्तीकुमार सम्पूर्ण लोकोंके विनाशके लिये पुनः द्यूतक्रीड़ा आरम्भ करनेके उद्देश्यसे चुपचाप वहाँ जाकर बैठ गये
ଦୈବରେ ଚାପି ପଡ଼ିଥିବା ପାଣ୍ଡବମାନେ ନିରବରେ ଯଥାସ୍ଥାନେ ବସିଗଲେ ଏବଂ ପୁନର୍ବାର ଦ୍ୟୂତକ୍ରୀଡ଼ା ଆରମ୍ଭ କରିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ହେଲେ—ଯେନ ସମସ୍ତ ଲୋକଙ୍କ ବିନାଶ ପାଇଁ।
Verse 9
शकुनिरुवाच अमुज्चत् स्थविरो यद् वो धनं पूजितमेव तत् । महाधन ग्लहं त्वेक॑ शूणु भो भरतर्षभ
ଶକୁନି କହିଲା—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଆମ ବୃଦ୍ଧ ମହାରାଜ ଯେ ଧନ ତୁମମାନଙ୍କୁ ଫେରାଇଦେଲେ, ସେଇ ଧନକୁ ତୁମେ ପୂର୍ବରୁ ଯଥାବିଧି ସମ୍ମାନ କରି ଗ୍ରହଣ କରିଥିଲ। ଏବେ, ହେ ଭରତବୃଷଭ, ମହାଧନର ଏକମାତ୍ର ପଣ ଶୁଣ।
Verse 10
शकुनिने कहा--राजन्! भरतश्रेष्ठ! हमारे बूढ़े महाराजने आपको जो सारा धन लौटा दिया है, वह बहुत अच्छा किया है। अब जूएके लिये एक ही दाँव रखा जायगा उसे सुनिये -- ९ || वयं वा द्वादशाब्दानि युष्माभिर्यूतनिर्जिता: । प्रविशेम महारण्यं रौरवाजिनवासस:,“यदि आपने हमलोगोंको जूएमें हरा दिया तो हम मृगचर्म धारण करके महान् वनमें प्रवेश करेंगे
ଶକୁନି କହିଲା—ରାଜନ୍! ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଆମ ବୃଦ୍ଧ ମହାରାଜ ତୁମମାନଙ୍କୁ ସମସ୍ତ ଧନ ଫେରାଇଦେଲେ—ଏହା ଭଲ ହେଲା। ଏବେ ଦ୍ୟୂତ ପାଇଁ ଏକମାତ୍ର ଶେଷ ପଣ ଧରାଯାଉଛି—ଶୁଣ। ଯଦି ତୁମେ ଖେଳରେ ଆମକୁ ହରାଇବ, ତେବେ ଆମେ ରୌରବ ମୃଗଚର୍ମ ପିନ୍ଧି ବାରହ ବର୍ଷ ମହାବନକୁ ପ୍ରବେଶ କରିବୁ।
Verse 11
त्रयोदशं च सजने अज्ञाता: परिवत्सरम् | ज्ञाताश्न पुनरन्यानि वने वर्षाणि द्वादश,“और बारह वर्ष वहाँ रहेंगे एवं तेरहवाँ वर्ष हम जनसमूहमें लोगोंसे अज्ञात रहकर पूरा करेंगे और यदि हम तेरहवें वर्षमें लोगोंकी जानकारीमें आ जायाँ तो फिर दुबारा बारह वर्ष वनमें रहेंगे
ଏବଂ ତ୍ରୟୋଦଶ ବର୍ଷ ଆମେ ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅଜ୍ଞାତ ରହି ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ କରିବୁ। କିନ୍ତୁ ସେଇ ତ୍ରୟୋଦଶ ବର୍ଷରେ ଯଦି ଆମେ ଚିହ୍ନଟ ହେଉ, ତେବେ ପୁଣି ଆଉ ବାରହ ବର୍ଷ ବନରେ ରହିବାକୁ ପଡିବ।
Verse 12
अस्माभिनििर्जिता यूय॑ं वने द्वादश वत्सरान् | वसध्वं कृष्णया सार्धमजिनै: प्रतिवासिता:,“यदि हम जीत गये तो आपलोग द्रौपदीके साथ बारह वर्षोतक मृगचर्म धारण करते हुए वनमें रहें
ଯଦି ତୁମେ ଆମ ହାତରେ ପରାଜିତ ହେଉ, ତେବେ ତୁମେ କୃଷ୍ଣା (ଦ୍ରୌପଦୀ) ସହ ବାରହ ବର୍ଷ ବନରେ ବସ—ନିର୍ବାସିତ ହୋଇ, ମୃଗଚର୍ମ ପିନ୍ଧି।
Verse 13
त्रयोदशं च सजने अज्ञाता: परिवत्सरम् | ज्ञाताश्न पुनरन्यानि वने वर्षाणि द्वादश,“आपको भी तेरहवाँ वर्ष जनसमूहमें लोगोंसे अज्ञात रहकर व्यतीत करना पड़ेगा और यदि ज्ञात हो गये तो फिर दुबारा बारह वर्ष वनमें रहना होगा
ଏବଂ ତୁମମାନେ ମଧ୍ୟ ତ୍ରୟୋଦଶ ବର୍ଷ ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅଜ୍ଞାତ ରହି କାଟିବାକୁ ପଡିବ। ଯଦି ସେ ବର୍ଷରେ ଚିହ୍ନଟ ହେଉ, ତେବେ ପୁଣି ଆଉ ବାରହ ବର୍ଷ ବନରେ ରହିବାକୁ ହେବ।
Verse 14
त्रयोदशे च निर्वत्ते पुनरेव यथोचितम् । स्वराज्यं प्रतिपत्तव्यमितरैरथवेतरै:,“तेरहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर हम या आप फिर वनसे आकर यथोचित रीतिसे अपना- अपना राज्य प्राप्त कर सकते हैं"
ତ୍ରୟୋଦଶ ବର୍ଷ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହେଲେ, ବନରୁ ପୁନଃ ଫେରି, ଆମେ କିମ୍ବା ତୁମେ—ଯଥୋଚିତ ଓ ଧର୍ମସମ୍ମତ ଭାବେ—ନିଜ ନିଜ ସ୍ୱରାଜ୍ୟ ପୁନର୍ଲାଭ କରିବା ଉଚିତ।
Verse 15
अनेन व्यवसायेन सहास्माभिरययुधिष्ठिर । अक्षानुप्त्वा पुनर्यूतमेहि दीव्यस्व भारत,भरतवंशी युधिष्ठटिर! इसी निश्चयके साथ आप आइये और पुनः पासा फेंककर हमलोगोंके साथ जूआ खेलिये
ହେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ଏହି ନିଶ୍ଚୟ ସହିତ ଆମ ସହ ପୁନଃ ଆସ; ପାଶା ଛାଡ଼ି ପୁନର୍ବାର ଦ୍ୟୂତକ୍ରୀଡାରେ ପ୍ରବେଶ କରି ଖେଳ, ହେ ଭାରତ।
Verse 16
अथ सभ्या: सभामध्ये समुच्छितकरास्तदा । ऊचुरुद्धिग्नमनस: संवेगात् सर्व एव हि
ତେବେ ସଭାମଧ୍ୟରେ ସଭ୍ୟମାନେ ହାତ ଉଠାଇ, ଉଦ୍ବିଗ୍ନ ମନରେ, ହଠାତ୍ ଆସିଥିବା ଆତଙ୍କରେ—ସମସ୍ତେ—କହି ଉଠିଲେ।
Verse 17
यह सुनकर सब सभासदोंने सभामें अपने हाथ ऊपर उठाकर अत्यन्त उद्विग्नचित्त हो बड़ी घबराहटके साथ कहा ।। सभ्या ऊचु: अहो धिग बान्धवा नैनं बोधयन्ति महद् भयम् । बुद्धया बुध्येन्न वा बुध्येदयं वै भरतर्षभ:,सभासद् बोले--अहो धिक््कार है! ये भाई-बन्धु भी युधिष्ठिरको उनके ऊपर आनेवाले महान् भयकी बात नहीं समझाते। पता नहीं, ये भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर अपनी बुद्धिके द्वारा इस भयको समझें या न समझें
ସଭ୍ୟମାନେ କହିଲେ—“ଆହା, ଧିକ୍! ବାନ୍ଧବମାନେ ମଧ୍ୟ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଆସନ୍ନ ମହାଭୟ ବିଷୟରେ ବୋଧ କରାଉନାହାନ୍ତି। ଏହି ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ ନିଜ ବୁଦ୍ଧିରେ ସେ ଆପଦକୁ ବୁଝିବେ କି ନାହିଁ—ଅନିଶ୍ଚିତ।”
Verse 18
वैशम्पायन उवाच जनप्रवादान् सुबहूज्छूण्वन्नपि नराधिप: । दिया च धर्मसंयोगात् पार्थों द्यूतमियात् पुन:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! लोगोंकी तरह-तरहकी बातें सुनते हुए भी राजा युधिष्ठिर लज्जाके कारण तथा धृतराष्ट्रके आज्ञापालनरूप धर्मकी दृष्टिसे पुनः: जूआ खेलनेके लिये उद्यत हो गये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ଲୋକମାନଙ୍କର ବହୁ ପ୍ରକାର କଥାବାର୍ତ୍ତା ଶୁଣୁଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ରାଜା ପାର୍ଥ (ଯୁଧିଷ୍ଠିର) ଲଜ୍ଜାର କାରଣରୁ ଏବଂ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ପାଳନ ଧର୍ମ—ଏହି ଧର୍ମସଂଯୋଗରୁ—ପୁନଃ ଦ୍ୟୂତକ୍ରୀଡାକୁ ଯିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ହେଲେ।
Verse 19
जानन्नपि महाबुद्धि: पुनर्दयतमवर्तयत् । अप्यासन्नो विनाश: स्यात् कुरूणामिति चिन्तयन्,परम बुद्धिमान् युधिष्ठिर जूएका परिणाम जानते थे, तो भी यह सोचकर कि सम्भवतः कुरुकुलका विनाश बहुत निकट है, वे द्यूतक्रीड़ामें प्रवृत्त हो गये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାବୁଦ୍ଧିମାନ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ପରିଣାମ ଜାଣିଥିଲେ ମଧ୍ୟ ପୁନର୍ବାର ଦ୍ୟୂତକ୍ରୀଡାରେ ପ୍ରବୃତ୍ତ ହେଲେ; ‘କୁରୁମାନଙ୍କ ବିନାଶ ସମ୍ଭବତଃ ଅତ୍ୟନ୍ତ ସନ୍ନିକଟ’ ବୋଲି ମନେ ଚିନ୍ତା କରୁଥିଲେ।
Verse 20
युधिछिर उवाच कथं वै मद्विधो राजा स्वधर्ममनुपालयन् | आहूतो विनिवर्तेत दीव्यामि शकुने त्वया,युधिष्ठिर बोले--शकुने! स्वधर्मपालनमें संलग्न रहनेवाला मेरे-जैसा राजा जूएके लिये बुलाये जानेपर कैसे पीछे हट सकता था, अतः मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଶକୁନି! ସ୍ୱଧର୍ମ ପାଳନରେ ନିଷ୍ଠ ମୋ ପରି ରାଜା, ବିଧିପୂର୍ବକ ଆହ୍ୱାନ ହେଲେ କିପରି ପଛୁଆ ହେବ? ତେଣୁ ମୁଁ ତୁମ ସହ ଦ୍ୟୂତ ଖେଳିବି।
Verse 21
शकुनिने कहा--राजन्! हमलोगोंके पास बैल, घोड़े और बहुत-सी दुधारू गौएँ हैं। भेड़ और बकरियोंकी तो गिनती ही नहीं है। हाथी, खजाना, दास-दासी तथा सुवर्ण सब कुछ हैं
ଶକୁନି କହିଲା—ରାଜନ୍! ଆମ ପାଖରେ ବହୁ ବୃଷଭ ଓ ଅଶ୍ୱ ଅଛନ୍ତି, ଅନେକ ଦୁଧାରୁ ଗାଈ ଅଛି; ଭେଡ଼ା-ଛେଳି ତ ଗଣନାତୀତ। ହାତୀ, ଖଜାନା, ସୁବର୍ଣ୍ଣ, ଦାସ-ଦାସୀ—ସବୁକିଛି ଆମ ହାତରେ।
Verse 22
एष नो ग्लह एवैको वनवासाय पाण्डवा: । यूयं वयं वा विजिता वसेम वनमाश्रिता:,फिर भी (इन्हें छोड़कर) एकमात्र वनवासका निश्चय ही हमारा दाँव है। पाण्डवो! आपलोग या हम, जो भी हारेंगे, उन्हें वनमें जाकर रहना होगा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ପାଣ୍ଡବମାନେ! ଆମର ଦାଉ ଏକମାତ୍ର—ବନବାସ। ତୁମେ କିମ୍ବା ଆମେ, ଯେଉଁ ପକ୍ଷ ପରାଜିତ ହେବ, ସେ ବନକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ସେଠାରେ ବସିବ।
Verse 23
(वैशग्पायन उवाच एवं देवबलाविष्टो धर्मराजो युधिष्ठिर: । भीष्मद्रोणैर्वार्यमाणो विदुरेण च धीमता ।। युयुत्सुना कृपेणाथ सञठ्जयेन च भारत । गान्धार्या पृथया चैव भीमार्जुनयमैस्तथा ।। विकर्णेन च वीरेण द्रौपद्या द्रौणिना तथा । सोमदत्तेन च तथा बाह्लीकेन च धीमता ।। वार्यमाणोडपि सततं न च राजा नियच्छति ।) वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! उस समय धर्मराज युधिष्ठिर प्रारब्धके वशीभूत हो गये थे। महाराज! उन्हें भीष्म, द्रोण और बुद्धिमान् विदुरजी दुबारा जूआ खेलनेसे रोक रहे थे। युयुत्सु, कृपाचार्य तथा संजय भी मना कर रहे थे। गान्धारी, कुन्ती, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, वीर विकर्ण, द्रौपदी, अश्वत्थामा, सोमदत्त तथा बुद्धिमान् बाह्नीक भी बारंबार रोक रहे थे तो भी राजा युधिष्ठिर भावीके वश होनेके कारण जूएसे नहीं हटे। शकुनिरुवाच गवाश्चव॑ं बहुधेनूकमपर्यन्तमजाविकम् । गजा: कोशो हिरण्यं च दासीदासाक्ष सर्वश:,त्रयोदशं च वै वर्षमज्ञाता: सजने तथा । अनेन व्यवसायेन दीव्याम पुरुषर्षभा: केवल तेरहवें वर्ष हमें किसी जनसमूहमें अज्ञात-भावसे रहना होगा। नरश्रेष्ठरण! हम इसी निश्चयके साथ जूआ खेलें
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ (ଜନମେଜୟ)! ସେ ସମୟରେ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦୈବବଳରେ ଆବିଷ୍ଟ ହୋଇପଡ଼ିଥିଲେ। ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣ ଓ ବୁଦ୍ଧିମାନ ବିଦୁର ତାଙ୍କୁ ପୁନଃପୁନଃ ରୋକୁଥିଲେ; ଯୁଯୁତ୍ସୁ, କୃପ ଓ ସଞ୍ଜୟ ମଧ୍ୟ ନିଷେଧ କରୁଥିଲେ। ଗାନ୍ଧାରୀ, ପୃଥା (କୁନ୍ତୀ), ଭୀମ, ଅର୍ଜୁନ, ନକୁଳ-ସହଦେବ; ବୀର ବିକର୍ଣ୍ଣ, ଦ୍ରୌପଦୀ, ଦ୍ରୋଣପୁତ୍ର ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା, ସୋମଦତ୍ତ ଓ ବୁଦ୍ଧିମାନ ବାହ୍ଲୀକ—ସମସ୍ତେ ବାରମ୍ବାର ସତର୍କ କରିଥିଲେ; ତଥାପି ରାଜା ଭବିତବ୍ୟର ବଶରେ ଦ୍ୟୂତରୁ ନ ହଟିଲେ। ତାପରେ ଶକୁନି କହିଲା—ଗାଈ ଓ ଘୋଡ଼ା, ଅନେକ ଦୁଧାରୁ ଗାଈ, ଗଣନାତୀତ ଭେଡ଼ା-ଛେଳି; ହାତୀ, ଖଜାନା, ସୁବର୍ଣ୍ଣ, ଦାସ-ଦାସୀ—ସବୁ; ଏବଂ ତ୍ରୟୋଦଶ ବର୍ଷ ଆମେ ଜନସମୂହରେ ଅଜ୍ଞାତଭାବେ ରହିବାକୁ ପଡ଼ିବ—ନରଶ୍ରେଷ୍ଠମାନେ! ଏହି ନିଶ୍ଚୟ ସହିତ ଖେଳିବା।
Verse 24
समुत्क्षेपण चैकेन वनवासाय भारत | प्रतिजग्राह त॑ पार्थो ग्लहं जग्राह सौबल: । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत,भारत! वनवासकी शर्त रखकर केवल एक ही बार पासा फेंकनेसे जूएका खेल पूरा हो जायगा। युधिष्ठिरने उसकी बात स्वीकार कर ली। तत्पश्चात् सुबलपुत्र शकुनिने पासा हाथमें उठाया और उसे फेंककर युधिष्ठिस्से कहा--मैरी जीत हो गयी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ଶକୁନି କହିଲା—ବନବାସର ଶର୍ତ୍ତରେ ମାତ୍ର ଗୋଟିଏଥର ପାଶା ଫେଙ୍କିଲେ ସମଗ୍ର ଦ୍ୟୂତ ସମାପ୍ତ ହେବ। ପାର୍ଥ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସେହି ପଣ ଗ୍ରହଣ କଲେ। ତାପରେ ସୌବଳ ଶକୁନି ପାଶା ହାତରେ ନେଇ ଫେଙ୍କି ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ କହିଲା—“ମୁଁ ଜିତିଲି।”
Verse 76
इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि पुनर्युधिष्ठटिरपरा भवे षट्सप्ततितमो<्ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବର ଅନୁଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପୁନଃ ପରାଜୟ ବର୍ଣ୍ଣନାକରୁଥିବା ଛଅସତ୍ତରିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।