Adhyaya 74
Sabha ParvaAdhyaya 7429 Verses

Adhyaya 74

Chapter Arc: इन्द्रप्रस्थ लौट चुके पाण्डवों के पीछे हस्तिनापुर के भीतर फिर वही पुराना विष जाग उठता है—दुर्योधन धृतराष्ट्र के पास जाकर अर्जुन की बढ़ती वीरता और पाण्डव-वैभव का भय दिखाकर पुनः द्यूतक्रीड़ा के लिए उन्हें बुलाने का आग्रह करवाता है। → धृतराष्ट्र की अनुमति का संकेत पाते ही दुःशासन शीघ्रता से दुर्योधन के पास पहुँचता है और सभा में यह विचार उभरता है कि पाण्डवों के धन से राजाओं का सत्कार कर के फिर उन्हें जुए में फँसाया जाए; पर साथ ही चेतावनी भी उठती है कि यदि पाण्डव क्रुद्ध हुए तो वे विषधर सर्पों की भाँति सबका नाश कर देंगे। अर्जुन के कवचधारी, गाण्डीव उठाए, बार-बार साँस लेते हुए चारों ओर देखते हुए निकलने का वर्णन भय को मूर्त कर देता है। → द्यूत की नई शर्त का कठोर प्रस्ताव सामने आता है—जो हारे, वह बारह वर्ष वन में मृगचर्म धारण कर निवास करे; यह शर्त केवल खेल नहीं, राज्य-भाग्य और कुल-धर्म को दाँव पर लगाने वाली घोषणा बन जाती है। → धृतराष्ट्र पुत्रमोह में, सुहृदों की अनिच्छा और हितदृष्टि के बावजूद, पाण्डवों को पुनः बुलाने की दिशा में कदम बढ़ाता है; दुर्योधन-पक्ष को राजाज्ञा का सहारा मिल जाता है और अनुद्यूत का द्वार खुलता है। → दूत-प्रेषण और पाण्डवों के प्रत्याह्वान की प्रक्रिया आरम्भ—क्या युधिष्ठिर फिर उसी जाल में प्रवेश करेंगे, और क्या अर्जुन का उग्र संकेत इस बार सभा को भय से रोक पाएगा?

Shlokas

Verse 1

अपने-आप बछ। अर: (अनुद्यूतपर्व) चतु:सप्ततितमो< ध्याय: दुर्योधनका धृतराष्ट्रसे अर्जुनकी वीरता बतलाकर पुनः द्यूतक्रीड़ाके लिये पाण्डवोंको बुलानेका अनुरोध और उनकी स्वीकृति जनमेजय उवाच अनुज्ञातांस्तान्‌ विदित्वा सरत्नधनसंचयान्‌ । पाण्डवान्‌ धार्तराष्ट्राणां कथमासीन्मनस्तदा,जनमेजयने पूछा--ब्रह्मन! जब कौरवोंको यह मालूम हुआ कि पाण्डवोंको रथ और धनके संग्रहसहित खाण्डवप्रस्थ जानेकी आज्ञा मिल गयी, तब उनके मनकी अवस्था कैसी हुई?

ଜନମେଜୟ କହିଲେ—ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ! ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ ଯେତେବେଳେ ଜାଣିଲେ ଯେ ପାଣ୍ଡବମାନେ ସଞ୍ଚିତ ଧନ, ରତ୍ନ ଓ ସମ୍ପଦ ସହ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରିବାକୁ ଅନୁମତି ପାଇଛନ୍ତି, ସେତେବେଳେ ତାଙ୍କ ମନସ୍ଥିତି କେମିତି ଥିଲା?

Verse 2

वैशम्पायन उवाच अनुज्ञातांस्तान्‌ विदित्वा धृतराष्ट्रेण धीमता । राजन्‌ दुःशासन: क्षिप्रं जगाम भ्रातरं प्रति,वैशम्पायनजीने कहा--भरतकुलभूषण जनमेजय! परम बुद्धिमान्‌ राजा धूृतराष्ट्रने पाण्डवोंको जानेकी आज्ञा दे दी, यह जानकर दुःशासन शीघ्र ही अपने भाई भरतश्रेष्ठ दुर्योधनके पास, जो अपने मन्त्रियों (कर्ण एवं शकुनि)-के साथ बैठा था, गया और दु:ःखसे पीड़ित होकर इस प्रकार बोला

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ବୁଦ୍ଧିମାନ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ତାଙ୍କୁ ଯିବାକୁ ଅନୁମତି ଦେଇଛନ୍ତି ବୋଲି ଜାଣି, ଦୁଃଶାସନ ଶୀଘ୍ରେ ନିଜ ଭାଇଙ୍କ ପାଖକୁ ଗଲା।

Verse 3

दुर्योधनं समासाद्य सामात्यं भरतर्षभ । दुःखारतों भरतश्रेष्ठमिदं वचनमब्रवीत्‌,वैशम्पायनजीने कहा--भरतकुलभूषण जनमेजय! परम बुद्धिमान्‌ राजा धूृतराष्ट्रने पाण्डवोंको जानेकी आज्ञा दे दी, यह जानकर दुःशासन शीघ्र ही अपने भाई भरतश्रेष्ठ दुर्योधनके पास, जो अपने मन्त्रियों (कर्ण एवं शकुनि)-के साथ बैठा था, गया और दु:ःखसे पीड़ित होकर इस प्रकार बोला

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଦୁଃଖାର୍ତ୍ତ ହୋଇ ସେ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହ ବସିଥିବା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ସମୀପ କରି, ଭରତକୁଳର ଅଗ୍ରଣୀଙ୍କୁ ଏହି କଥା କହିଲା।

Verse 4

दुःशासन उवाच दुःखेनैतत्‌ समानीतं स्थविरों नाशयत्यसौ । शत्रुसाद्‌ गमयद्‌ द्रव्यं तद्‌ बुध्यध्वं महारथा:,दुःशासनने कहा--महारथियो! आपलोगोंको यह मालूम होना चाहिये कि हमने बड़े दुःखसे जिस धनराशिको प्राप्त किया था, उसे हमारा बूढ़ा बाप नष्ट कर रहा है। उसने सारा धन शत्रुओंके अधीन कर दिया

ଦୁଃଶାସନ କହିଲା—ହେ ମହାରଥୀମାନେ! ଆମେ ବହୁ କଷ୍ଟରେ ଯେ ଧନ ସଂଗ୍ରହ କରିଥିଲୁ, ସେହି ଧନକୁ ସେ ବୃଦ୍ଧ ନଷ୍ଟ କରୁଛି। ସେ ଏହି ସମ୍ପତ୍ତିକୁ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଅଧୀନକୁ ଦେଇଦେଇଛି—ଏହା ଭଲଭାବେ ବୁଝ।

Verse 5

अथ दुर्योधन: कर्ण: शकुनिश्चापि सौबल: । मिथ: संगम्य सहिता: पाण्डवान्‌ प्रति मानिन:,यह सुनकर दुर्योधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि, जो बड़े ही अभिमानी थे, पाण्डवोंसे बदला लेनेके लिये परस्पर मिलकर सलाह करने लगे। फिर उन सबने बड़ी उतावलीके साथ विचित्रवीर्यनन्दन मनीषी राजा धृतराष्ट्रके पास जाकर मधुर वाणीमें कहा

ତାପରେ ଅଭିମାନୀ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ, କର୍ଣ୍ଣ ଓ ସୁବଳପୁତ୍ର ଶକୁନି—ତିନିଜଣ ପରସ୍ପର ମିଶି ଗୋପନରେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ବିରୋଧରେ ପରାମର୍ଶ କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ।

Verse 6

वैचित्रवीर्य राजानं धृतराष्ट्रं मनीषिणम्‌ | अभिगम्य त्वरायुक्ता: श्लक्ष्णं वचनमन्रुवन्‌,यह सुनकर दुर्योधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि, जो बड़े ही अभिमानी थे, पाण्डवोंसे बदला लेनेके लिये परस्पर मिलकर सलाह करने लगे। फिर उन सबने बड़ी उतावलीके साथ विचित्रवीर्यनन्दन मनीषी राजा धृतराष्ट्रके पास जाकर मधुर वाणीमें कहा

ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ତ୍ୱରାସହିତ ବୈଚିତ୍ରବୀର୍ୟନନ୍ଦନ ମନୀଷୀ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ ମୃଦୁ ଓ ଚାଟୁକାରୀ ବଚନ କହିଲେ।

Verse 7

(दुर्योधन उवाच अर्जुनेन समो वीर्ये नास्ति लोके धनुर्धर: । योअरर्जुनेनार्जुनस्तुल्यो द्विबाहुर्बहुबाहुना ।। दुर्योधन बोला--पिताजी! संसारमें अर्जुनके समान पराक्रमी धनुर्धर दूसरा कोई नहीं है। ये दो बाहुवाले अर्जुन सहस्र भुजाओंवाले कार्तवीर्य अर्जुनके समान शक्तिशाली हैं। शृणु राजन्‌ पुराचिन्त्यानर्जुनस्य च साहसान्‌ । अर्जुनो धन्विनां श्रेष्ठो दुष्कृतं कृतवान्‌ पुरा ।। ट्रुपदस्य पुरे राजन द्रौपद्याश्व स्वयंवरे । महाराज! अर्जुनने पहले जो-जो अचिन्त्य साहसपूर्ण कार्य किये हैं, उनका वर्णन करता हूँ, सुनिये। राजन्‌! पहले राजा ट्रुपदके नगरमें द्रौपदीके स्वयंवरके समय धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ अर्जुनने वह पराक्रम कर दिखाया था, जो दूसरोंके लिये अत्यन्त कठिन है। स दृष्टवा पार्थिवान्‌ सर्वान्‌ क्रुद्धान्‌ पार्थो महाबल: ।। वारयित्वा शरैस्तीक्ष्णरजयत्‌ तत्र स स्वयम्‌ । जित्वा तु तान्‌ महीपालान्‌ सर्वान्‌ कर्णपुरोगमान्‌ ।। लेभे कृष्णां शुभां पार्थो युद्ध्वा वीर्यबलात्‌ तदा । सर्वक्षत्रसमूहेषु अम्बां भीष्मो यथा पुरा ।। उस समय महाबली अर्जुनने सब राजाओंको कुपित देख तीखे बाणोंके प्रहारसे उन्हें जहाँके तहाँ रोक दिया और स्वयं ही सबपर विजय पायी। कर्ण आदि सभी राजाओंको अपने बल और पराक्रमसे युद्धमें जीतकर कुन्तीकुमार अर्जुनने उस समय शुभलक्षणा द्रौपदीको प्राप्त किया; ठीक वैसे ही, जैसे पूर्वकालमें भीष्मजीने सम्पूर्ण क्षत्रियसमुदायमें अपने बल-पराक्रमसे काशिराजकी कन्या अम्बा आदिको प्राप्त किया था। ततः कदाचिद्‌ बीभत्सुस्तीर्थयात्रां ययौ स्वयम्‌ । अथोलूपीं शुभां जातां नागराजसुतां तदा ।। नागेष्ववाप चाग्रयेषु प्रार्थितोडथ यथातथम्‌ । ततो गोदावरीं वेण्णां कावेरीं चावगाहत । तदनन्तर अर्जुन किसी समय स्वयं तीर्थयात्राके लिये गये। उस यात्रामें ही उन्होंने नागलोकमें पहुँचकर परम सुन्दरी नागराजकन्या उलूपीको उसके प्रार्थना करनेपर विधिपूर्वक पत्नीरूपमें ग्रहण किया। फिर क्रमश: अन्य तीथर्थोमें भ्रमण करते हुए दक्षिणदिशामें जाकर गोदावरी, वेण्णा तथा कावेरी आदि नदियोंमें स्नान किया। स दक्षिणं समुद्रान्तं गत्वा चाप्सरसां च वै कुमारीतीर्थमासाद्य मोक्षयामास चार्जुन: ।। ग्राहरूपान्विता: पजच अतिशौर्येण वै बलात्‌ | दक्षिणसमुद्रके तटपर कुमारीतीर्थमें पहुँचकर अर्जुनने अत्यन्त शौर्यका परिचय देते हुए ग्राहरूपधारिणी पाँच अप्सराओंका बलपूर्वक उद्धार किया। कन्यातीर्थं समभ्येत्य ततो द्वारवतीं ययौ ।। तत्र कृष्णनिदेशात्‌ स सुभद्रां प्राप्प फाल्गुन: । तामारोप्य रथोपस्थे प्रययौ स्वपुरीं प्रति ।। तत्पश्चात्‌ कन्याकुमारीतीर्थकी यात्रा करके वे दक्षिणसे लौट आये और अनेक तीथोमें भ्रमण करते हुए द्वारकापुरी जा पहुँचे। वहाँ भगवान्‌ श्रीकृष्णके आदेशसे अर्जुनने सुभद्राको लेकर रथपर बिठा लिया और अपनी नगरी इन्द्रप्रस्थकी ओर प्रस्थान किया। भूय: शृणु महाराज फाल्गुनस्य तु साहसम्‌ | ददौ च वट्ढेबीभत्सु: प्रार्थितं खाण्डवं वनम्‌ ।। लब्धमात्रे तु तेनाथ भगवान्‌ हव्यवाहन: । भक्षितुं खाण्डवं राज॑स्तत: समुपचक्रमे ।। महाराज! अर्जुनके साहसका और भी वर्णन सुनिये; उन्होंने अग्निदेवको उनके माँगनेपर खाण्डववन समर्पित किया था। राजन! उनके द्वारा उपलब्ध होते ही भगवान्‌ अग्निदेवने उस वनको अपना आहार बनाना आरम्भ किया। ततस्तं भक्षयन्तं वै सव्यसाची विभावसुम्‌ । रथी धन्वी शरान्‌ गृह्य स कलापयुत: प्रभु: ।। पालयामास राजेन्द्र स्ववीर्येण महाबल: ।। राजेन्द्र! जब अग्निदेव खाण्डववनको जलाने लगे, उस समय (अग्निदेवसे) रथ, धनुष, बाण और कवच आदि लेकर महान्‌ बल तथा प्रभावसे युक्त सव्यसाची अर्जुन अपने पराक्रमसे उसकी रक्षा करने लगे। ततः श्रुत्वा महेन्द्रस्तं मेघांस्तान्‌ संदिदेश ह । तेनोक्ता मेघसड्घास्ते ववर्षुरतिवृष्टिभि: ।। खाण्डववनके दाहका समाचार सुनकर देवराज इन्द्रने मेघोंको आग बुझानेकी आज्ञा दी। उनकी प्रेरणासे मेघोंने बड़ी भारी वर्षा प्रारम्भ की। ततो मेघगणान्‌ पार्थ: शरव्रातैः समन्‍्ततः । खगमैववरियामास तदाश्चर्यमिवा भवत्‌ ।। यह देख अर्जुनने आकाशगामी बाणसमूहोंद्वारा सब ओरसे बादलोंको रोक दिया। वह एक अद्भुत-सी घटना हुई। वारितान्‌ मेघसड्घांश्र श्रुत्वा क्रुद्ध: पुरंदर: । पाण्डरं गजमास्थाय सर्वदेवगणैर्वृत: ।। ययौ पार्थन संयोद्धुं रक्षार्थ खाण्डवस्य च ।। मेघोंको रोका गया सुनकर इन्द्रदेव कुपित हो उठे। श्वेतवर्णवाले ऐरावत हाथीपर आरूढ हो वे समस्त देवताओंके साथ खाण्डववनकी रक्षाके निमित्त अर्जुनसे युद्ध करनेके लिये गये। रुद्राश्न मरुतश्नैव वसवश्चाश्रिनौ तदा । आदित्याश्रैव साध्याश्र विश्वेदेवाश्न भारत ।। गन्धर्वाश्वैव सहिता अन्ये सुरगणाश्च ये । ते सर्वे शस्त्रसम्पन्ना दीप्यमाना: स्वतेजसा । धनंजयं जिधघांसन्त: प्रपेतुर्विबुधाधिपा: ।। भारत! उस समय रुद्र, मरुदगण, वसु, अश्विनीकुमार, आदित्य, साध्यगण, विश्वेदेव, गन्धर्व तथा अन्य देवगण अपने-अपने तेजसे देदीप्यमान एवं अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो युद्धके लिये गये। वे सभी देवेश्वर अर्जुनको मार डालनेकी इच्छासे उनपर टूट पड़े। ततो देवगणा: सर्वे युद्ध्वा पार्थेन वै मुहुः । रणे जेतुमशक्यं तं॑ ज्ञात्वा ते भरतर्षभ ।। शान्तास्ते विबुधा: सर्वे पार्थबाणाभिपीडिता: । भरतश्रेष्ठ! कुन्तीकुमार अर्जुनके साथ बारंबार युद्ध करके जब देवताओंने यह समझ लिया कि इन्हें समरांगणमें पराजित करना असम्भव है, तब वे अर्जुनके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण युद्धसे विरत हो गये (भाग खड़े हुए)। युगान्ते यानि दृश्यन्ते निमित्तानि महान्त्यपि । सर्वाणि तत्र दृश्यन्ते सुघधोराणि महीपते ।। महाराज! प्रलयकालमें जो विनाशसूचक अत्यन्त भयंकर अपशकुन दिखायी देते हैं, वे सभी उस समय प्रत्यक्ष दीखने लगे। ततो देवगणा: सर्वे पार्थ समभिदुद्रुवु: । असम्भ्रान्तस्तु तान्‌ दृष्टवा स तां देवमयीं चमूम्‌ । त्वरित: फाल्गुनो गृह तीक्ष्णांस्तानाशुगांस्तदा ।। शक्रं देवांश्व॒ सम्प्रेक्ष्य तस्थौ काल इवात्यये ।। तदनन्तर सब देवताओंने एक साथ अर्जुनपर धावा किया; परंतु उस देवसेनाको देखकर अर्जुनके मनमें घबराहट नहीं हुई। वे तुरंत ही तीखे बाण हाथमें लेकर इन्द्र और देवताओंकी ओर देखते हुए प्रलयकालमें सर्वसंहारक कालकी भाँति अविचलभावसे खड़े हो गये। ततो देवगणा: सर्वे बीभत्सुं सपुरंदरा: | अवाकिरज्छरव्रातैर्मानुषं तं॑ महीपते ।। राजन! अर्जुनको मानव समझकर इन्द्रसहित सब देवता उनपर बाणसमूहोंकी बौछार करने लगे। ततः पार्थों महातेजा गाण्डीवं गृहा[ सत्वर: ।। वारयामास देवानां शख्रातै: शरांस्तदा । परंतु महातेजस्वी पार्थने शीघ्रतापूर्वक गाण्डीव धनुष लेकर अपने बाणसमूहोंकी वर्षासे देवताओंके बाणोंको रोक दिया। पुन: क्रुद्धा: सुरा: सर्वे मर्त्य संख्ये महाबला: ।। नानाशस्त्रैर्ववर्षुस्तं सव्यसाचिं महीपते ।। पिताजी! यह देख समस्त महाबली देवता पुनः कुपित हो गये और उस युद्धमें मरणधर्मा अर्जुनपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी बौछार करने लगे। तान्‌ पार्थ: शस्त्रवर्षान्‌ वै विसृष्टान्‌ विबुधैस्तदा । द्विधा त्रिधा च चिच्छेद ख एव निशितै: शरै: ।। अर्जुनने अपने तीखे बाणोंद्वारा देवताओंके छोड़े हुए उन अस्त्र-शस्त्रोंके आकाशमें ही दो-दो तीन-तीन टुकड़े कर दिये। पुनश्च पार्थ: संक्रुद्धो मण्डलीकृतकार्मुक: । देवसड्घाउछरैस्ती क्ष्णैरार्पयद्‌ वै समन्तत: ।। फिर अधिक क्रोधमें भरकर अर्जुनने अपने धनुषको इस प्रकार खींचा कि वह मण्डलाकार दिखायी देने लगा और उसके द्वारा सब ओर तीखे सायकोंकी वृष्टि करके सब देवताओंको घायल कर दिया। विद्रुतान्‌ देवसड्घांस्तान्‌ रणे दृष्टवा पुरंदर: । ततः क्रुद्धो महातेजा: पार्थ बाणैरवाकिरत्‌ ।। देवताओंको युद्धसे भागा हुआ देख महातेजस्वी इन्द्रने अत्यन्त कुपित हो पार्थपर बाणोंकी झड़ी लगा दी। पार्थोडपि शक्रं विव्याध मानुषो विबुधाधिपम्‌ ।। ततः सो5श्ममयं वर्ष व्यसृूजद्‌ विबुधाधिप: । तच्छरैरर्जुनो वर्ष प्रतिजघ्ने5त्यमर्षण: ।। अथ संवर्धयामास तद्‌ वर्ष देवराडपि | भूय एव तदा वीर्य जिज्ञासु: सव्यसाचिन: ।। पार्थने मनुष्य होकर भी देवताओंके स्वामी इन्द्रको अपने सायकोंसे बींध डाला। तब देवेश्वरने अर्जुनपर पत्थरोंकी वर्षा आरम्भ की। यह देख अर्जुन अत्यन्त अमर्षमें भर गये और अपने बाणोंद्वारा उन्होंने इन्द्रकी उस पाषाण-वर्षाका निवारण कर दिया। तदनन्तर देवराज इन्द्रने सव्यसाची अर्जुनके पराक्रमकी परीक्षा लेनेके लिये पुन: उस पाषाण-वर्षाको पहलेसे भी अधिक बढ़ा दिया। सो<श्मवर्ष महावेगमिषुभि: पाण्डवोडपि च | विलयं गमयामास हर्षयन्‌ पाकशासनम्‌ ।। यह देख पाण्डुनन्दन अर्जुनने इन्द्रका हर्ष बढ़ाते हुए उस अत्यन्त वेगशालिनी पाषाणवर्षाको अपने बाणोंसे विलीन कर दिया। उपादाय तु पाणिभ्यामड्डदं नाम पर्वतम्‌ । सद्रुमं व्यसृजच्छक्रो जिघांसु: श्वेतवाहनम्‌ ।। ततोअर्जुनो वेगवद्धिज्वलमानैरजिद्दागै: । बाणैर्विध्वंसयामास गिरिराजं सहस्रश: ।। शक्रं च वारयामास शरै: पार्थो बलाद्‌ युधि । तब इन्द्रने श्वेतवाहन अर्जुनको कुचल डालनेकी इच्छासे वृक्षोंसहित अंगद नामक पर्वत (जो मन्दराचलका एक शिखर है)-को दोनों हाथोंसे उठाकर उनके ऊपर छोड़ दिया। यह देख अर्जुनने अग्निके समान प्रज्वलित और सीधे लक्ष्यतक पहुँचनेवाले सहस्रों वेगशाली बाणोंद्वारा उस पर्वतराजको खण्ड-खण्ड कर दिया। साथ ही पार्थने उस युद्धमें बलपूर्वक बाण मारकर इन्द्रको स्तब्ध कर दिया। तत: शक्रो महाराज रणे वीरं धनंजयम्‌ ।। ज्ञात्वा जेतुमशक्यं तं तेजोबलसमन्वितम्‌ ।। परां प्रीतिं ययौ तत्र पुत्रशौर्येण वासव: । महाराज! तदनन्तर तेज और बलसे सम्पन्न वीर धनंजयको युद्धमें जीतना असम्भव जानकर इन्द्रको अपने पुत्रके पराक्रमसे वहाँ बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई। तदा तत्र न तस्यासीद्‌ दिवि कश्चिन्महायशा: ।। समर्थों निर्जये राजन्नपि साक्षात्‌ प्रजापति: ।। राजन्‌! उस समय वहाँ स्वर्गका कोई भी महायशस्वी वीर, चाहे साक्षात्‌ प्रजापति ही क्यों न हों, ऐसा नहीं था, जो अर्जुनको जीतनेमें समर्थ हो सके। ततः पार्थ: शरै्हत्वा यक्षराक्षसपन्नगान्‌ | दीप्ते चाग्नी महातेजा: पातयामास संततम्‌ ।। प्रतिप्रेक्षयितुं पार्थ न शेकुस्तत्र केचन । दृष्टवा निवारितं शक्रं दिवि देवगणै: सह ।। तदनन्तर महातेजस्वी अर्जुन अपने बाणोंसे यक्ष, राक्षमस और नागोंको मारकर उन्हें लगातार प्रज्वलित अग्निमें गिराने लगे। स्वर्गवासी देवताओंसहित इन्द्रको अर्जुनने युद्धसे विरत कर दिया, यह देख उस समय कोई भी उनकी ओर दृष्टिपात नहीं कर पाते थे। यथा सुपर्ण: सोमार्थ विबुधानजयत्‌ पुरा । तथा जित्वा सुरान्‌ पार्थस्तर्पपामास पावकम्‌ ।। ततोडर्जुन: स्ववीर्येण तर्पयित्वा विभावसुम्‌ । रथं ध्वजं हयांश्रैव दिव्यास्त्राणि सभां च वै ।। गाण्डीवं च धनु:श्रेष्ठ तूणी चाक्षयसायकौ । एतान्यवाप बीभत्सुलेंभे कीर्ति च भारत ।। भारत! जैसे पूर्वकालमें गरुड़ने अमृतके लिये देवताओंको जीत लिया था, उसी प्रकार कुन्तीपुत्र अर्जुनने भी देवताओंको जीतकर खाण्डववनके द्वारा अग्निदेवको तृप्त किया। इस प्रकार पार्थने अपने पराक्रमसे अग्निदेवको तृप्त करके उनसे रथ, ध्वजा, अश्व, दिव्यास्त्र, उत्तम धनुष गाण्डीव तथा अक्षय बाणोंसे भरे हुए दो तूणीर प्राप्त किये। इनके सिवा अनुपम यश और मयासुरसे एक सभाभवन भी उन्हें प्राप्त हुआ। भूयोडपि शृणु राजेन्द्र पार्थो गत्वोत्तरां दिशम्‌ । विजित्य नववर्षाश्व सपुरांश्च॒ सपर्वतान्‌ ।। जम्बूद्वीपं वशे कृत्वा सर्व तद्‌ भरतर्षभ । बलाज्जित्वा नृपान्‌ सर्वान्‌ करे च विनिवेश्य च ।। रत्नान्यादाय सर्वाणि गत्वा चैव पुनः पुरीम्‌ ततो ज्येष्ठं महात्मानं धर्मराजं युधिष्ठिरम्‌ ।। राजसू[यं क्रतुश्रेष्ठ कारयामास भारत ।। राजेन्द्र! अर्जुनके पराक्रमकी कथा अभी और सुनिये। उन्होंने उत्तरदिशामें जाकर नगरों और पर्वतोंसहित जम्बूद्वीपके नौ वर्षोपर विजय पायी। भरतश्रेष्ठ! उन्होंने समस्त जम्बूद्वीपको वशमें करके सब राजाओंको बलपूर्वक जीत लिया और सबपर कर लगाकर उनसे सब प्रकारके रत्नोंकी भेंट ले वे पुन: अपनी पुरीको लौट आये। भारत! तदनन्तर अर्जुनने अपने बड़े भाई महात्मा धर्मराज युधिष्ठिरसे क्रतुश्रेष्ठ राजसूयका अनुष्ठान करवाया। स तान्यन्यानि कर्माणि कृतवानर्जुन: पुरा | अर्जुनेन समो वीर्ये नास्ति लोके पुमान्‌ क्वचित्‌ ।। पिताजी! इस प्रकार अर्जुनने पूर्वकालमें ये तथा और भी बहुत-से पराक्रम कर दिखाये हैं। संसारमें कहीं कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो बल और पराक्रममें अर्जुनकी समानता कर सके। देवदानवयक्षाश्ष पिशाचोरगराक्षसा: । भीष्मद्रोणादय: सर्वे कुरवश्च महारथा: ।। लोके सर्वनृपाश्चैव वीराश्चान्ये धनुर्धरा: । एते चान्ये च बहव: परिवार्य महीपते ।। एकं पार्थ रणे यत्ता: प्रतियोद्धुं न शक्नुयु: ।। देवता, दानव, यक्ष, पिशाच, नाग, राक्षस एवं भीष्म, द्रोण आदि समस्त कौरव महारथी, भूमण्डलके सम्पूर्ण नरेश तथा अन्य धनुर्धर वीर--ये तथा अन्य बहुत-से शूरवीर युद्धभूमिमें अकेले अर्जुनको चारों ओरसे घेरकर पूरी सावधानीके साथ खड़े हो जायेँ तो भी उनका सामना नहीं कर सकते। अहं हि नित्यं कौरव्य फाल्गुनं प्रति सत्तमम्‌ । अनिशं चिन्तयित्वा त॑ समुद्विग्नोडस्मि तद्भयात्‌ ।। कुरुश्रेष्ठ! मैं साधुशिरोमणि अर्जुनके विषयमें नित्य-निरन्तर चिन्तन करते हुए उनके भयसे अत्यन्त उद्विग्न हो जाता हूँ। गृहे गृहे च पश्यामि तात पार्थमहं सदा । शरगाण्डीवसंयुक्तं पाशहस्तमिवान्तकम्‌ ।। अपि पार्थसहस्राणि भीत: पश्यामि भारत । पार्थभूतमिदं सर्व नगरं प्रतिभाति मे ।। पिताजी! मुझे प्रत्येक घरमें सदा हाथमें पाश लिये यमराजकी भाँति गाण्डीव धनुषपर बाण चढ़ाये अर्जुन दिखायी देते हैं। भारत! मैं इतना डर गया हूँ कि मुझे सहस्रों अर्जुन दृष्टिगोचर होते हैं। यह सारा नगर मुझे अर्जुनरूप ही प्रतीत होता है। पार्थमेव हि पश्यामि रहिते तात भारत । दृष्टवा स्वप्नगतं पार्थमुद्भ्रमामि हृचेतन: ।। भारत! मैं एकान्तमें अर्जुनको ही देखता हूँ। स्वप्चमें भी अर्जुनको देखकर मैं अचेत और उदशभ्रान्त हो उठता हूँ। अकारादीनि नामानि अर्जुनत्रस्तचेतस: । अश्रवश्षार्था हाजाश्रैव त्रासं संजनयन्ति मे ।। मेरा हृदय अर्जुनसे इतना भयभीत हो गया है कि अश्व, अर्थ और अज आदि अकारादि नाम मेरे मनमें त्रास उत्पन्न कर देते हैं। नास्ति पार्थादृते तात परवीरादू भयं मम । प्रह्नादं वा बलिं वापि हन्याद्धि विजयो रणे ।। तस्मात्‌ तेन महाराज युद्धमस्मज्जनक्षयम्‌ | अहं तस्य प्रभावज्ञो नित्यं दुःखं वहामि च ।। तात! अर्जुनके सिवा शत्रुपक्षके दूसरे किसी वीरसे मुझे डर नहीं लगता है। महाराज! मेरा विश्वास है कि अर्जुन युद्धमें प्रह्नमाद अथवा बलिको भी मार सकते हैं; अत: उनके साथ किया हुआ युद्ध हमारे सैनिकोंके ही संहारका कारण होगा। मैं अर्जुनके प्रभावको जानता हूँ। इसीलिये सदा दुःखके भारसे दबा रहता हूँ। पुरा हि दण्डकारण्ये मारीचस्य यथा भयम्‌ | भवेद्‌ रामे महावीर्ये तथा पार्थे भयं मम ।। जैसे पूर्वकालमें दण्डकारण्यवासी महापराक्रमी श्रीरामचन्द्रजीसे मारीचको भय हो गया था, उसी प्रकार अर्जुनसे मुझे भय हो रहा है। धृतराष्ट उवाच जानाम्येव महद्‌ वीर्य जिष्णोरेतद्‌ दुरासदम्‌ | तात वीरस्य पार्थस्य मा कार्षीस्त्वं तु विप्रियम्‌ ।। द्यूतं वा शस्त्रयुद्ध वा दुर्वाक्यं वा कदाचन । एतेष्वेवं कृते तस्य विग्रहश्चैव वो भवेत्‌ ।। तस्मात्‌ त्वं पुत्र पार्थेन नित्यं स्नेहेन वर्तय ।। यश्न पार्थेन सम्बन्धाद्‌ वर्तते च नरो भुवि । तस्य नास्ति भयं किंचित्‌ त्रिषु लोकेषु भारत ।। तस्मात्‌ त्वं जिष्णुना वत्स नित्यं स्नेहेन वर्तय ।। धृतराष्ट्र बोले--बेटा! अर्जुनके महान्‌ पराक्रमको तो मैं जानता ही हूँ। उनके इस पराक्रमका सामना करना अत्यन्त कठिन है। अत: तुम वीर अर्जुनका कोई अपराध न करो। उनके साथ द्यूतक्रीड़ा, शस्त्रयुद्ध अथवा कटु वचनका प्रयोग कभी न करो; क्योंकि इन्हींके कारण उनका तुमलोगोंके साथ विवाद हो सकता है। अतः बेटा! तुम अर्जुनके साथ सदा स्नेहपूर्ण बर्ताव करो। भारत! जो मनुष्य इस पृथ्वीपर अर्जुनके साथ प्रेमपूर्ण सम्बन्ध रखते हुए उनसे सद्व्यवहार करता है, उसे तीनों लोकोंमें तनिक भी भय नहीं है; अतः वत्स! तुम अर्जुनके साथ सदा स्नेहपूर्ण बर्ताव करो। दुर्योधन उवाच द्यूते पार्थस्य कौरव्य मायया निकृति: कृता । तस्माद्धि तं जहि सदा त्वन्योपायेन नो भवेत्‌ ।। दुर्योधन बोला--कुरुश्रेष्ठ! जूएमें हमलोगोंने अर्जुनके प्रति छल-कपटका बर्ताव किया था, अतः आप किसी दूसरे उपायसे उन्हें मार डालें। इसीसे हमलोगोंका सदा भला होगा। धृतराष्ट्र रवाच उपायश्च न कर्तव्य: पाण्डवान्‌ प्रति भारत । पार्थान्‌ प्रति पुरा वत्स बहूपाया: कृतास्त्वया ।। तानुपायान्‌ हि कौन्तेया बहुशो व्यतिचक्रमु: ।। तस्माद्धितं जीविताय न: कुलस्य जनस्य च । त्वं चिकीर्षसि चेद्‌ वत्स समित्र: सहबान्धव: । सभ्रातृकस्त्व॑ं पार्थेन नित्यं स्नेहेन वर्तय ।। धृतराष्ट्रने कहा--भारत! पाण्डवोंके प्रति किसी अनुचित उपायका प्रयोग नहीं करना चाहिये। बेटा! तुमने उन सबको मारनेके लिये पहले बहुत-से उपाय किये हैं। कुन्तीके पुत्र तुम्हारे उन सभी प्रयत्नोंका उल्लंघन करके बहुत बार आगे बढ़ गये हैं; अतः वत्स! यदि तुम अपने कुल और आत्मीयजनोंकी जीवनरक्षाके लिये किसी हितकर उपायका अवलम्बन करना चाहते हो तो मित्र, बन्धु-बान्धव तथा भाइयोंसहित तुम अर्जुनके साथ सदा स्नेहपूर्ण बर्ताव करो। वैशम्पायन उवाच धृतराष्ट्रवच: श्रुत्वा राजा दुर्योधनस्तदा । चिन्तयित्वा मुहूर्त तु विधिना चोदितो<ब्रवीत्‌ ।॥।) वैशम्पायनजी कहते हैं--धृतराष्ट्रकी यह बात सुनकर राजा दुर्योधन दो घड़ीतक कुछ सोच-विचार करके विधातासे प्रेरित हो इस प्रकार बोला। दुर्योधन उवाच न त्वयेदं श्रुत राजन्‌ यज्जगाद बृहस्पति: । शक्रस्य नीतिं प्रवदन्‌ विद्वान्‌ देवपुरोहित:,दुर्योधन बोला--राजन्‌! देवगुरु विद्वान्‌ बृहस्पतिजीने इन्द्रको नीतिका उपदेश करते हुए जो बात कही है, उसे शायद आपने नहीं सुना है

ଦୁର୍ୟୋଧନ କହିଲା—ପିତାଜୀ! ଲୋକରେ ଅର୍ଜୁନ ସମ ପରାକ୍ରମୀ ଧନୁର୍ଧର ଆଉ କେହି ନାହିଁ। ଏହି ଦ୍ୱିବାହୁ ଅର୍ଜୁନ ବହୁବାହୁ କାର୍ତ୍ତବୀର୍ୟ ଅର୍ଜୁନ ସମାନ।

Verse 8

सर्वोपायैर्निहन्तव्या: शत्रव: शत्रुसूदन | पुरा युद्धाद्‌ बलाद्‌ वापि प्रकुर्वन्ति तवाहितम्‌,शत्रुसूदन! जो आपका अहित करते हैं, उन शत्रुओंको बिना युद्धके अथवा युद्ध करके --सभी उपायोंसे मार डालना चाहिये

ଶତ୍ରୁସୂଦନ! ଯେ ଶତ୍ରୁମାନେ ତୁମର ଅହିତ କରନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କୁ ଯୁଦ୍ଧ ପୂର୍ବରୁ କିମ୍ବା ଯୁଦ୍ଧରେ ବଳଦ୍ୱାରା—ସମସ୍ତ ଉପାୟରେ ନିହତ କରିବା ଉଚିତ।

Verse 9

ते वयं पाण्डवधनै: सर्वान्‌ सम्पूज्य पार्थिवान्‌ यदि तान्‌ योधयिष्याम: किं वै नः परिहास्यति,महाराज! यदि हम पाण्डवोंके धनसे सब राजाओंका सत्कार करके उन्हें साथ ले पाण्डवोंसे युद्ध करें, तो हमारा क्या बिगड़ जायगा?

ମହାରାଜ! ଯଦି ଆମେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଧନରେ ସମସ୍ତ ରାଜାମାନଙ୍କୁ ସମ୍ମାନିତ କରି ସେମାନଙ୍କୁ ସାଥୀ କରି ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବା, ତେବେ ଆମର କ’ଣ ଅନିଷ୍ଟ ହେବ? ପରେ ଆମକୁ କିଏ ପରିହାସ କରିବ?

Verse 10

अहीनाशीविषान्‌ क्रुद्धानूु नाशाय समुपस्थितान्‌ | कृत्वा कण्ठे च पूछे च कः समुत्स्रष्टमर्हति,क्रोधमें भरकर काटनेके लिये उद्यत हुए विषधर सर्पोंको अपने गलेमें लटकाकर अथवा पीठपर चढ़ाकर कौन मनुष्य उन्हें उसी अवस्थामें छोड़ सकता है?

କ୍ରୋଧରେ ଫୁସୁଫୁସୁ କରୁଥିବା, ଦଂଶନ ପାଇଁ ଉଦ୍ୟତ ଏବଂ ବିନାଶକୁ ଆସିଥିବା ବିଷଧର ସର୍ପମାନଙ୍କୁ ଗଳାରେ ଝୁଲାଇ କିମ୍ବା ପିଠିରେ ଚଢ଼ାଇ କେଉଁ ମଣିଷ ସେମାନଙ୍କୁ ସେହି ଅବସ୍ଥାରେ ଛାଡ଼ି ଦେବ?

Verse 11

आत्तशस्त्रा रथगता: कुपितास्तात पाण्डवा: । निःशेषं व: करिष्यन्ति क्रुद्धा ह्ााशीविषा इव,तात! अस्त्र-शस्त्रोंको लेकर रथमें बैठे हुए पाण्डव कुपित होकर क़ुद्ध विषधर सर्पोकी भाँति आपके कुलका संहार कर डालेंगे

ତାତ! ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ର ଧାରଣ କରି ରଥାରୂଢ ପାଣ୍ଡବମାନେ ଭୟଙ୍କର କ୍ରୋଧିତ। କ୍ରୁଦ୍ଧ ବିଷଧର ସର୍ପମାନଙ୍କ ପରି ସେମାନେ ତୁମ କୁଳକୁ ନିଃଶେଷ ଧ୍ୱଂସ କରିଦେବେ।

Verse 12

संनद्धो हार्जुनो याति विधृत्य परमेषुधी । गाण्डीवं मुहुरादत्ते नि:श्वसंश्व निरीक्षते,हमने सुना है, अर्जुन कवच धारण करके दो उत्तम तूणीर पीठपर लटकाये हुए जाते हैं। वे बार-बार गाण्डीव धनुष हाथमें लेते हैं और लम्बी साँसें खींचकर इधर-उधर देखते हैं। इसी प्रकार भीमसेन शीघ्र ही अपना रथ जोतकर भारी गदा उठाये बड़ी उतावलीके साथ यहाँसे निकलकर गये हैं

ଆମେ ଶୁଣିଛୁ—ଅର୍ଜୁନ କବଚ ପିନ୍ଧି, ଦୁଇ ଉତ୍ତମ ତୂଣୀର ଧାରଣ କରି ଅଗ୍ରସର ହେଉଛି। ସେ ପୁନଃପୁନଃ ଗାଣ୍ଡୀବ ଧନୁ ଧରେ ଏବଂ ଦୀର୍ଘ ନିଶ୍ୱାସ ନେଇ ସମସ୍ତ ଦିଗକୁ ନିରୀକ୍ଷଣ କରେ।

Verse 13

गदां गुर्वी समुद्यम्य त्वरितश्न॒ वृकोदर: । स्वरथं योजयित्वा55शु निर्यात इति न: श्रुतम्‌,हमने सुना है, अर्जुन कवच धारण करके दो उत्तम तूणीर पीठपर लटकाये हुए जाते हैं। वे बार-बार गाण्डीव धनुष हाथमें लेते हैं और लम्बी साँसें खींचकर इधर-उधर देखते हैं। इसी प्रकार भीमसेन शीघ्र ही अपना रथ जोतकर भारी गदा उठाये बड़ी उतावलीके साथ यहाँसे निकलकर गये हैं

ଆମେ ଶୁଣିଛୁ—ବୃକୋଦର (ଭୀମ) ଭାରୀ ଗଦା ଉଠାଇ, ନିଜ ରଥକୁ ଶୀଘ୍ର ଯୋଗାଇ, ସତ୍ୱରେ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରିଛି।

Verse 14

नकुल: खड्गमादाय चर्म चाप्यर्धचन्द्रवत्‌ । सहदेवश्न राजा च चक्कुराकारमिड्डितै:,नकुल अर्धचन्द्रविभूषित ढाल एवं तलवार लेकर जा रहे हैं। सहदेव तथा राजा युधिष्ठिरने भी विभिन्न चेष्टाओंद्वारा यह व्यक्त कर दिया है कि वे लोग क्‍या करना चाहते हैं?

ନକୁଳ ଖଡ୍ଗ ଓ ଅର୍ଧଚନ୍ଦ୍ରଚିହ୍ନିତ ଢାଳ ଧରିଛି। ସହଦେବ ଓ ରାଜା (ଯୁଧିଷ୍ଠିର) ମଧ୍ୟ ନାନା ଚେଷ୍ଟା-ସଙ୍କେତରେ ସ୍ପଷ୍ଟ କରିଦେଇଛନ୍ତି ଯେ ସେମାନେ କ’ଣ କରିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ।

Verse 15

ते त्वास्थाय रथान्‌ सर्वे बहुशस्त्रपरिच्छदान्‌ । अभिष्नन्तो रथव्रातान्‌ सेनायोगाय निर्ययु:,वे सब लोग अनेक शस्त्र आदि सामग्रियोंसे सम्पन्न रथोंपर बैठकर शत्रुपक्षके रथियोंका संहार करनेके उद्देश्यसे सेना एकत्र करनेके लिये गये हैं

ତାପରେ ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ବହୁ ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ର ଓ ସାମଗ୍ରୀସମ୍ପନ୍ନ ରଥରେ ଆରୂଢ ହେଲେ। ଶତ୍ରୁପକ୍ଷର ରଥୀମାନଙ୍କ ଦଳକୁ ଆଘାତ କରି ସଂହାର କରିବା ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ସେନାକୁ ସଂଗ୍ରହ ଓ ବିନ୍ୟାସ କରିବା ପାଇଁ ସେମାନେ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।

Verse 16

न क्ष॑स्यन्ते तथास्माभिर्जातु विप्रकृता हि ते । द्रौपद्याश्न॒ परिक्लेशं कस्तेषां क्षन्तुमहति,हमने उनका तिरस्कार किया है, अतः वे इसके लिये हमें कभी क्षमा न करेंगे। द्रौपदीको जो कष्ट दिया गया है, उसे उनमेंसे कौन चुपचाप सह लेगा?

ଦୁର୍ୟୋଧନ କହିଲା—ଆମେ ସେମାନଙ୍କୁ ଭୟଙ୍କର ଭାବେ ଅପମାନ କରିଛୁ; ତେଣୁ ସେମାନେ ଆମକୁ କେବେ ମାଫ କରିବେ ନାହିଁ। ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କୁ ଯେ କଷ୍ଟ ଦିଆଯାଇଛି, ସେଥିକୁ ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ କିଏ ନିରବରେ ସହିପାରିବ?

Verse 17

पुनर्दीव्याम भद्रं ते वनवासाय पाण्डवै: । एवमेतान्‌ वशे कर्तु शक्ष्याम: पुरुषर्षभ,पुरुषश्रेष्ठू आपका भला हो, हम चाहते हैं कि वनवासकी शर्त रखकर पाण्डवोंके साथ फिर एक बार जूआ खेलें। इस प्रकार इन्हें हम अपने वशमें कर सकेंगे

ଦୁର୍ୟୋଧନ କହିଲା—ତୁମର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ; ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପାଇଁ ବନବାସକୁ ପଣ କରି ପୁଣିଥରେ ପାଶା ଖେଳିବା। ଏଭଳି, ହେ ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଆମେ ସେମାନଙ୍କୁ ଆମ ବଶରେ କରିପାରିବୁ।

Verse 18

ते वा द्वादश वर्षाणि वयं वा द्यूतनिर्जिता: । प्रविशेम महारण्यमजिनै: प्रतिवासिता:,जूएमें हार जानेपर वे या हम मृगचर्म धारण करके महान्‌ वनमें प्रवेश करें और बारह वर्षतक वनमें ही निवास करें

ଦୁର୍ୟୋଧନ କହିଲା—ପାଶା ଖେଳରେ ଯେ ହାରିବ, ସେମାନେ ହେଉନ୍ତୁ କି ଆମେ, ମୃଗଚର୍ମ ପିନ୍ଧି ମହାଅରଣ୍ୟରେ ପ୍ରବେଶ କରି ବାରୋ ବର୍ଷ ସେଠାରେ ରହିବା।

Verse 19

त्रयोदशं च सजने अज्ञाता: परिवत्सरम्‌ | ज्ञाताश्न पुनरन्यानि वने वर्षाणि द्वादश

ଦୁର୍ୟୋଧନ କହିଲା—ତ୍ରୟୋଦଶ ବର୍ଷରେ ସେମାନେ ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଏକ ପୂର୍ଣ୍ଣ ବର୍ଷ ଅଜ୍ଞାତ ରହିବେ; ଯଦି ଚିହ୍ନଟ ହେବେ, ତେବେ ପୁଣି ବନରେ ଆଉ ବାରୋ ବର୍ଷ ରହିବେ।

Verse 20

निवसेम वयं ते वा तथा द्ूतं प्रवर्तताम्‌ । अक्षानुप्त्वा पुनर्यूतमिदं कुर्वन्तु पाण्डवा:

ଦୁର୍ୟୋଧନ କହିଲା—ଆମେ ତୁମ ସହ ରହୁ କି ତୁମେ ଆମ ସହ—ତଥାସ୍ତୁ; କିନ୍ତୁ ପାଶା ଖେଳ ଚାଲୁ ରହୁ। ପାଶା ପୁଣି ଉଠାଇ ପାଣ୍ଡବମାନେ ଏହି ଖେଳଟି ଆଉଥରେ କରୁନ୍ତୁ।

Verse 21

तेरहवें वर्षमें लोगोंकी जानकारीसे दूर किसी नगरमें रहें। यदि तेरहवें वर्ष किसीकी जानकारीमें आ जाये तो फिर दुबारा बारह वर्षतक वनवास करें। हम हारें तो हम ऐसा करें और उनकी हार हो तो वे। इसी शर्तपर फिर जूएका खेल आरम्भ हो। पाण्डव पासे फेंककर जूआ खेलें ।। एतत्‌ कृत्यतमं राजन्नस्माकं भरतर्षभ । अयं हि शकुनिर्वेद सविद्यामक्षसम्पदम्‌,भरतकुलभूषण महाराज! यही हमारा सबसे महान्‌ कार्य है। ये शकुनि मामा विद्यासहित पासे फेंकनेकी कलाको अच्छी तरह जानते हैं

ଦୁର୍ୟୋଧନ କହିଲା—ପାଣ୍ଡବମାନେ ବାରୋ ବର୍ଷ ବନବାସ କରନ୍ତୁ, ଏବଂ ତେରୋତିଏ ବର୍ଷ ଲୋକଙ୍କ ଜ୍ଞାନରୁ ଦୂରେ କୌଣସି ନଗରରେ ଅଜ୍ଞାତବାସ କରନ୍ତୁ। ଯଦି ସେଇ ତେରୋତିଏ ବର୍ଷରେ କେହି ତାଙ୍କୁ ଚିହ୍ନି ନେଇଥାଏ, ତେବେ ସେମାନେ ପୁଣି ବାରୋ ବର୍ଷ ବନବାସ କରିବେ। ଏହି ନିୟମ ଉଭୟ ପକ୍ଷ ପାଇଁ ସମାନ—ମୁଁ ହାରିଲେ ମଧ୍ୟ ମାନିବି; ସେମାନେ ହାରିଲେ ସେମାନେ ମାନିବେ। ଏହି ସର୍ତ୍ତରେ ପାଶକ୍ରୀଡା ପୁଣି ଆରମ୍ଭ ହେଉ; ପାଣ୍ଡବମାନେ ପାଶା ଫେଙ୍ଗନ୍ତୁ। ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ ରାଜନ! ଏହା ଆମର ସବୁଠୁ ନିର୍ଣ୍ଣାୟକ କାର୍ଯ୍ୟ; କାରଣ ଶକୁନି ମାମା ବିଦ୍ୟାସହିତ ପାଶାର କୌଶଳ ଓ କପଟନୀତି ଭଲଭାବେ ଜାଣନ୍ତି।

Verse 22

दृढमूला वयं राज्ये मित्राणि परिगृह्म॒ च । सारवद्‌ विपुलं सैन्यं सत्कृत्य च दुरासदम्‌,(हमारी विजय होनेपर) हमलोग बहुत-से मित्रोंका संग्रह करके बलशाली, दुर्धर्ष एवं विशाल सेनाका पुरस्कार आदिके द्वारा सत्कार करते हुए इस राज्यपर अपनी जड़ जमा लेंगे

ଦୁର୍ୟୋଧନ କହିଲା—ଏହି ରାଜ୍ୟରେ ଆମେ ଦୃଢ଼ ଭାବେ ମୂଳ ଗାଢ଼ିବୁ। ଅନେକ ମିତ୍ରକୁ ସଂଗ୍ରହ କରି, ଶକ୍ତିଶାଳୀ, ବିପୁଳ ଓ ଦୁର୍ଧର୍ଷ ସେନାକୁ ସମ୍ମାନ ଓ ପୁରସ୍କାର ଦେଇ ସତ୍କାର କରି, ଆମ ସ୍ଥିତିକୁ ଅଚଳ କରିଦେବୁ।

Verse 23

ते च त्रयोदशं वर्ष पारयिष्यन्ति चेद्‌ व्रतम्‌ । जेष्यामस्तान्‌ वयं राजन्‌ रोचतां ते परंतप,यदि वे तेरहवें वर्षके अज्ञातवासकी प्रतिज्ञा पूर्ण कर लेंगे तो हम उन्हें युद्धमें परास्त कर देंगे। शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! आप हमारे इस प्रस्तावको पसंद करें

ଯଦି ସେମାନେ ତେରୋତିଏ ବର୍ଷର ଅଜ୍ଞାତବାସ ବ୍ରତ ପୂରଣ କରି ନେବେ ମଧ୍ୟ, ରାଜନ, ଆମେ ସେମାନଙ୍କୁ ଯୁଦ୍ଧରେ ପରାଜିତ କରିବୁ। ହେ ଶତ୍ରୁ-ସନ୍ତାପକ! ଆପଣଙ୍କୁ ଆମ ଏହି ପ୍ରସ୍ତାବ ରୁଚୁ।

Verse 24

धृतराष्ट उवाच तूर्ण प्रत्यानयस्वैतान्‌ कामं॑ व्यध्वगतानपि । आगच्छन्तु पुनर्ययूतमिदं कुर्वन्तु पाण्डवा:,धृतराष्ट्रने कहा--बेटा! पाण्डवलोग दूर चले गये हों, तो भी तुम्हारी इच्छा हो, तो उन्हें तुरंत बुला लो। समस्त पाण्डव यहाँ आयें और इस नये दाँवपर फिर जूआ खेलें

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ବତ୍ସ! ସେମାନେ ଦୂରକୁ ଚାଲିଗଲେ ମଧ୍ୟ, ତୋର ଇଚ୍ଛା ଥିଲେ ସେମାନଙ୍କୁ ତୁରନ୍ତ ଫେରାଇ ଆଣ। ସମସ୍ତ ପାଣ୍ଡବ ପୁଣି ଏଠାକୁ ଆସନ୍ତୁ ଏବଂ ଏହି ନୂଆ ଦାଉରେ ପୁଣି ପାଶକ୍ରୀଡା କରନ୍ତୁ।

Verse 25

वैशम्पायन उवाच ततो द्रोण: सोमदत्तो बाह्लीकश्नैव गौतम: । विदुरो द्रोणपुत्रश्न वैश्यापुत्रश्न वीर्यवान्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तब द्रोणाचार्य, सोमदत्त, बाह्नीक, कृपाचार्य, विदुर, अश्व॒त्थामा, पराक्रमी युयुत्सु, भूरिश्रवा, पितामह भीष्म तथा महारथी विकर्ण सबने एक स्वरसे इस निर्णयका विरोध करते हुए कहा--'अब जूआ नहीं होना चाहिये, तभी सर्वत्र शान्ति बनी रह सकती है”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ତାପରେ ଦ୍ରୋଣ, ସୋମଦତ୍ତ, ବାହ୍ଲୀକ, ଗୌତମ (କୃପ), ବିଦୁର, ଦ୍ରୋଣପୁତ୍ର ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା ଏବଂ ପରାକ୍ରମୀ ବୈଶ୍ୟପୁତ୍ର (ଯୁୟୁତ୍ସୁ), ଭୂରିଶ୍ରବା, ପିତାମହ ଭୀଷ୍ମ ଓ ମହାରଥୀ ବିକର୍ଣ୍ଣ—ସମସ୍ତେ ଏକ ସ୍ୱରରେ ସେଇ ନିଷ୍ପତ୍ତିକୁ ବିରୋଧ କରି କହିଲେ—“ଏବେ ପାଶକ୍ରୀଡା ହେବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ; ତେବେ ହିଁ ସର୍ବତ୍ର ଶାନ୍ତି ରହିପାରିବ।”

Verse 26

भूरिश्रवा: शान्तनवो विकर्णश्व॒ महारथ: । मा द्यूतमित्यभाषन्त शमो<स्त्विति च सर्वश:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तब द्रोणाचार्य, सोमदत्त, बाह्नीक, कृपाचार्य, विदुर, अश्व॒त्थामा, पराक्रमी युयुत्सु, भूरिश्रवा, पितामह भीष्म तथा महारथी विकर्ण सबने एक स्वरसे इस निर्णयका विरोध करते हुए कहा--'अब जूआ नहीं होना चाहिये, तभी सर्वत्र शान्ति बनी रह सकती है”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଶାନ୍ତନୁଙ୍କ ପୁତ୍ର ଭୂରିଶ୍ରବା ଓ ମହାରଥୀ ବିକର୍ଣ୍ଣ ସମସ୍ତଙ୍କ ସହ ଏକସ୍ୱରେ କହିଲେ—“ଏବେ ଦ୍ୟୂତ ହେଉ ନାହିଁ; ତେବେ ହିଁ ସର୍ବତ୍ର ଶାନ୍ତି ସ୍ଥାପିତ ହେବ।”

Verse 27

अकामानां च सर्वेषां सुहृदामर्थदर्शिनाम्‌ । अकरोत्‌ पाण्डवाद्दानं धृतराष्ट्र: सुतप्रिय:,भावी अर्थकों देखने और समझनेवाले सुहृद्‌ अपनी अनिच्छा प्रकट करते ही रह गये; किंतु दुर्योधनादि पुत्रोंके प्रेममें आकर धुृतराष्ट्रने पाण्डवोंको बुलानेका आदेश दे ही दिया

ଭବିଷ୍ୟତ ପରିଣାମ ଦେଖିପାରୁଥିବା ସୁହୃଦମାନେ ଅନିଚ୍ଛା ମାତ୍ର ପ୍ରକାଶ କରି ରହିଗଲେ; କିନ୍ତୁ ପୁତ୍ରପ୍ରେମରେ ବନ୍ଧା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଡାକିବାକୁ ଆଦେଶ ଦେଇଦେଲେ।

Verse 73

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापव॑के अन्तर्गत झ्यूतपर्वमें धृतराष्ट्रवरदानपूर्वक युधिष्ठिरका इन्द्रप्रस्थगमनविषयक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ବରଦାନ ପରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଇନ୍ଦ୍ରପ୍ରସ୍ଥଗମନ ବିଷୟକ ତ୍ରିସପ୍ତତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 74

इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि युधिष्ठिरप्रत्यानयने चतु:सप्ततितमो<ध्याय:

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବରେ ଅନୁଦ୍ୟୂତପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଯୁଧିଷ୍ଠିର-ପ୍ରତ୍ୟାନୟନ (ପୁନଃ ଆଣିବା) ବିଷୟକ ଚତୁଃସପ୍ତତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।