
Chapter Arc: द्यूत-अपमान और द्रौपदी-पराभव के बाद सभा में एक अप्रत्याशित मोड़ आता है—धृतराष्ट्र, वृद्ध और अंधे होते हुए भी, युधिष्ठिर को ‘सहधन’ लौटाकर कुशल-क्षेम के साथ विदा करने का आदेश देते हैं। → धृतराष्ट्र का उपदेश केवल औपचारिक नहीं रहता; वह युधिष्ठिर को कटुवचन न रखने, आर्य-मर्यादा न तोड़ने, और दुर्योधन के पारुष्य को हृदय में न बसाने की सीख देता है—पर भीतर-भीतर यह भय भी धड़कता है कि यह शांति क्षणिक है और दुर्योधन की विष-वृत्ति फिर सिर उठाएगी। → धृतराष्ट्र का निर्णायक वचन—‘अनुज्ञाता: सहधना: स्वराज्यमनुशासत’—युधिष्ठिर को धन सहित अपने राज्य का शासन करने और इन्द्रप्रस्थ लौटने की आज्ञा; साथ ही दुर्योधन के कठोर व्यवहार को क्षमा कर देने का आग्रह। → युधिष्ठिर, भ्राताओं और द्रौपदी सहित, मेघ-निनाद करते रथों पर प्रसन्न-मन से इन्द्रप्रस्थ की ओर प्रस्थान करते हैं; सभा का तत्कालिक संकट शांत होता दिखता है। → यह विदाई उपदेश की शांति में लिपटी हुई है, पर दुर्योधन के अपमान और अधर्म की स्मृति भविष्य के संघर्ष का बीज छोड़ जाती है।
Verse 1
ऑपन-माज (_) अऑ-आकऋााज त्रिसप्ततितमो< ध्याय: धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरको सारा धन लौटाकर एवं समझा- बुझाकर इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश देना युधिछिर उवाच राजन् कि करवामस्ते प्रशाध्यस्मांस्त्वमी श्वर: । नित्यं हि स्थातुमिच्छामस्तव भारत शासने,युधिष्ठिर बोले--राजन्! आप हमारे स्वामी हैं। आज्ञा दीजिये, हम कया करें। भारत! हमलोग सदा आपकी आज्ञाके अधीन रहना चाहते हैं
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—“ହେ ରାଜନ, ଆପଣ ଆମର ଈଶ୍ୱର; ଆଜ୍ଞା କରନ୍ତୁ, ଆମେ ଆପଣଙ୍କ ପାଇଁ କ’ଣ କରିବୁ? ହେ ଭାରତ, ଆମେ ସଦା ଆପଣଙ୍କ ଶାସନାଧୀନ ରହିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛୁ।”
Verse 2
धृतराष्ट्र रवाच अजाततशत्रो भद्र|ं ते अरिष्टं स्वस्ति गच्छत । अनुज्ञाता: सहधना: स्वराज्यमनुशासत,धृतराष्ट्रने कहा--अजातशत्रो! तुम्हारा कल्याण हो। तुम मेरी आज्ञासे हारे हुए धनके साथ बिना किसी विषघ्न-बाधाके कुशलपूर्वक अपनी राजधानीको जाओ और अपने राज्यका शासन करो
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ଅଜାତଶତ୍ରୁ! ତୋର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। ମୋର ଅନୁମତିରେ ହାରିଥିବା ଧନ ସହ, କୌଣସି ବିଘ୍ନ-ବାଧା ବିନା କୁଶଳରେ ନିଜ ରାଜଧାନୀକୁ ଯାଇ ନିଜ ରାଜ୍ୟ ଶାସନ କର।
Verse 3
इदं चैवावबोद्धव्यं वृद्धस्य मम शासनम् । मया निगदितं सर्व पथ्यं नि:श्रेयसं परम्,मुझ वृद्धकी यही आज्ञा है। एक बात और है, उसपर भी ध्यान देना। मेरी कही हुई सारी बातें तुम्हारे हित और परम मंगलके लिये होंगी
ଏହା ମଧ୍ୟ ସ୍ପଷ୍ଟଭାବେ ବୁଝି ରଖ—ଏହା ବୃଦ୍ଧ ମୋର ଶାସନ। ମୁଁ ଯାହା କହିଛି, ସେ ସବୁ ତୋର ହିତ ଓ ପରମ ଶ୍ରେୟସ ପାଇଁ ପଥ୍ୟ ଉପଦେଶ।
Verse 4
वेत्थ त्वं तात धर्माणां गतिं सूक्ष्मां युधिष्ठिर । विनीतो$सि महाप्राज्ञ वृद्धानां पर्युपासिता
ବତ୍ସ ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ତୁ ଧର୍ମର ସୂକ୍ଷ୍ମ ଗତିକୁ ଜାଣୁଛୁ। ମହାପ୍ରାଜ୍ଞ! ତୁ ଵିନୀତ; ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କୁ ସମ୍ମାନରେ ସେବା-ଉପାସନା କରିଛୁ।
Verse 5
तात युधिष्ठिर! तुम धर्मकी सूक्ष्म गतिको जानते हो। महामते! तुममें विनय है। तुमने बड़े-बूढ़ोंकी उपासना की है ।। यतो बुद्धिस्ततः शान्ति: प्रशमं गच्छ भारत । नादारुणि पतेच्छस्त्रं दारुण्येतन्निपात्यते,जहाँ बुद्धि है, वहीं शान्ति है। भारत! तुम शान्त हो जाओ। (जो कुछ हुआ है, उसे भूल जाओ।) पत्थर या लोहेपर कुल्हाड़ी नहीं पड़ती। लोग उसे लकड़ीपर ही चलाते हैं
ବତ୍ସ ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ତୁ ଧର୍ମର ସୂକ୍ଷ୍ମ ଗତିକୁ ଜାଣୁଛୁ। ମହାମତେ! ତୋର ଵିନୟ ଅଛି; ତୁ ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କୁ ସେବା-ଉପାସନା କରିଛୁ। ଯେଉଁଠି ବୁଦ୍ଧି, ସେଉଁଠି ଶାନ୍ତି; ତେଣୁ, ହେ ଭାରତ, ପ୍ରଶମକୁ ଯା—ମନର ଉତ୍ତେଜନା ଛାଡ଼। ଶସ୍ତ୍ର ପଥର କିମ୍ବା ଲୋହା ଉପରେ ପଡ଼େ ନାହିଁ; ତାହା କାଠ ଉପରେ ହିଁ ଚାଲେ।
Verse 6
न वैराण्यभिजानन्ति गुणान् पश्यन्ति नागुणान् । विरोधं नाधिगच्छन्ति ये त उत्तमपूरुषा:,जो पुरुष वैरको याद नहीं रखते, गुणोंको ही देखते हैं, अवगुणोंको नहीं तथा किसीसे विरोध नहीं रखते, वे ही उत्तम पुरुष कहे गये हैं। साधु पुरुष दूसरोंके सत्कर्मों (उपकारादि)- को ही याद रखते हैं, उनके किये हुए वैरको नहीं। वे दूसरोंकी भलाई तो करते हैं; परंतु उनसे बदला लेनेकी भावना नहीं रखते
ଯେମାନେ ବୈରକୁ ସ୍ମରଣ କରନ୍ତି ନାହିଁ, ଦୋଷ ନୁହେଁ—ଗୁଣକୁ ହିଁ ଦେଖନ୍ତି, ଏବଂ କାହା ସହିତ ବିରୋଧରେ ପ୍ରବେଶ କରନ୍ତି ନାହିଁ—ସେମାନେ ହିଁ ଉତ୍ତମ ପୁରୁଷ।
Verse 7
स्मरन्ति सुकृतान्येव न वैराणि कृतान्यपि । सन्त: परार्थ कुर्वाणा नावेक्षन्ते प्रतिक्रियाम्,जो पुरुष वैरको याद नहीं रखते, गुणोंको ही देखते हैं, अवगुणोंको नहीं तथा किसीसे विरोध नहीं रखते, वे ही उत्तम पुरुष कहे गये हैं। साधु पुरुष दूसरोंके सत्कर्मों (उपकारादि)- को ही याद रखते हैं, उनके किये हुए वैरको नहीं। वे दूसरोंकी भलाई तो करते हैं; परंतु उनसे बदला लेनेकी भावना नहीं रखते
ସଜ୍ଜନମାନେ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ସୁକୃତ୍ୟକୁ ମାତ୍ର ସ୍ମରଣ କରନ୍ତି; କୃତ ବୈରକୁ ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ। ପରହିତରେ ଲଗ୍ନ ହୋଇ ସେମାନେ ପ୍ରତିଶୋଧ କିମ୍ବା ପ୍ରତିକ୍ରିୟା ଆଶା କରନ୍ତି ନାହିଁ।
Verse 8
संवादे परुषाण्याहुर्युधिष्ठिर नराधमा: । प्रत्याहुर्मध्यमास्त्वेतेडनुक्ता: परुषमुत्तरम्,युधिष्ठिर! नीच मनुष्य साधारण बातचीतमें भी कटुवचन बोलने लगते हैं। जो स्वयं पहले कटु वचन न कहकर प्रत्युत्तरमें कठोर बातें कहते हैं, वे मध्यम श्रेणीके पुरुष हैं। परंतु जो धीर एवं श्रेष्ठ पुरुष हैं, वे किसीके कटुवचन बोलने या न बोलनेपर भी अपने मुखसे कभी कठोर एवं अहितकर बात नहीं निकालते
ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ସାଧାରଣ ସମ୍ବାଦରେ ଯେମାନେ ପ୍ରଥମେ କଠୋର ବାକ୍ୟ କହନ୍ତି ସେମାନେ ଅଧମ। ଯେମାନେ ଆରମ୍ଭ କରନ୍ତି ନାହିଁ, କିନ୍ତୁ ଉତ୍ତେଜିତ ହେଲେ କଠୋର ଉତ୍ତର ଦିଅନ୍ତି ସେମାନେ ମଧ୍ୟମ।
Verse 9
नचोक्ता नैव चानुक्तास्त्वहिता: परुषा गिर: | प्रतिजल्पन्ति वै धीरा: सदा तूत्तमपूरुषा:,युधिष्ठिर! नीच मनुष्य साधारण बातचीतमें भी कटुवचन बोलने लगते हैं। जो स्वयं पहले कटु वचन न कहकर प्रत्युत्तरमें कठोर बातें कहते हैं, वे मध्यम श्रेणीके पुरुष हैं। परंतु जो धीर एवं श्रेष्ठ पुरुष हैं, वे किसीके कटुवचन बोलने या न बोलनेपर भी अपने मुखसे कभी कठोर एवं अहितकर बात नहीं निकालते
ଧୀର ଓ ଉତ୍ତମ ପୁରୁଷମାନେ ନ ପ୍ରଥମେ, ନ ପ୍ରତିଉତ୍ତରରେ—ଅହିତକର କଠୋର ବାକ୍ୟ କହନ୍ତି। ଅନ୍ୟେ କଟୁ କହୁନ୍ତୁ କି ନ କହୁନ୍ତୁ, ସେମାନଙ୍କ ମୁଖରୁ କ୍ରୂର ଓ ହାନିକର ବାଣୀ ବାହାରେ ନାହିଁ।
Verse 10
स्मरन्ति सुकृतान्येव न वैराणि कृतान्यपि । सन्त: प्रतिविजानन्तो लब्ध्वा प्रत्ययमात्मन:,महात्मा पुरुष अपने अनुभवको सामने रखकर दूसरोंके सुख-दुःखको भी अपने समान जानते हुए उनके अच्छे बर्तावोंको ही याद रखते हैं, उनके द्वारा किये हुए वैर-विरोधको नहीं
ସଜ୍ଜନମାନେ ସୁକୃତ୍ୟକୁ ମାତ୍ର ସ୍ମରଣ କରନ୍ତି; କୃତ ବୈରକୁ ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ। ନିଜ ଅନୁଭବରୁ ଆତ୍ମନିଶ୍ଚୟ ଲାଭ କରି ସେମାନେ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ସୁଖ-ଦୁଃଖକୁ ନିଜ ସମାନ ଜାଣି, ଲୋକଙ୍କ ସଦାଚାରକୁ ମାତ୍ର ମନେ ରଖନ୍ତି—ବୈର-ବିରୋଧକୁ ନୁହେଁ।
Verse 11
असम्भधिन्नार्थमर्यादा: साधव: प्रियदर्शना: । तथा चरितमार्येण त्वयास्मिन् सत्समागमे,सत्पुरुष आर्यमर्यादाको कभी भंग नहीं करते। उनके दर्शनसे सभी लोग प्रसन्न हो जाते हैं। युधिष्ठि!! कौरव-पाण्डवोंके समागममें तुमने श्रेष्ठ पुरुषोंके समान ही आचरण किया है
ସାଧୁମାନେ ଅର୍ଥ ଓ ମର୍ଯ୍ୟାଦାର ସୀମା ଭଙ୍ଗ କରନ୍ତି ନାହିଁ; ତାଙ୍କ ଦର୍ଶନରେ ସମସ୍ତେ ପ୍ରସନ୍ନ ହୁଅନ୍ତି। ଏହି ସତ୍ସମାଗମରେ ତୁମେ ମଧ୍ୟ ଆର୍ୟଜନୋଚିତ ଆଚରଣ କରିଛ।
Verse 12
दुर्योधनस्य पारुष्यं तत् तात हृदि मा कृथा: । मातरं चैव गान्धारीं मां च त्वं गुणकाड्क्षया
ବତ୍ସ, ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ କଠୋରତାକୁ ହୃଦୟରେ ଧରିବା ନାହିଁ। ସଦ୍ଗୁଣ ଓ ଶୀଳର ମର୍ଯ୍ୟାଦାରେ ମୋ ମାତା ଗାନ୍ଧାରୀଙ୍କୁ—ଏବଂ ମୋତେ ମଧ୍ୟ—ଆଦର କର।
Verse 13
प्रेक्षापूर्व मया द्यूतमिदमासीदुपेक्षितम्
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ: ଏହି ଦ୍ୟୂତକ୍ରୀଡାକୁ ମୁଁ ପୂର୍ବରୁ ବିଚାରପୂର୍ବକ ଦେଖିଥିଲି; ତଥାପି ଏହା ଉପେକ୍ଷିତ ହୋଇଗଲା—ଏବଂ ଏହାର ବିପଦ ଉପରେ ମୋର ସତର୍କତା ଢିଲା ପଡ଼ିଲା।
Verse 14
मित्राणि द्रष्टकामेन पुत्राणां च बलाबलम् | अशोच्या: कुरवो राजन् येषां त्वमनुशासिता
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ: ହେ ରାଜନ, ମିତ୍ରମାନଙ୍କ ନିଷ୍ଠା ଦେଖିବାକୁ ଇଚ୍ଛା ହେଉ କି ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ବଳାବଳ ପରୀକ୍ଷା କରିବାକୁ—ଯେ କୁରୁମାନେ ତୁମ ଅନୁଶାସନରେ ଚାଲିଛନ୍ତି, ସେମାନେ ଶୋକଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ।
Verse 15
मन्त्री च विदुरो धीमान् सर्वशास्त्रविशारद: । मैंने सोच-समझकर भी इस जूएकी इसलिये उपेक्षा कर दी--उसे रोकनेकी चेष्टा नहीं की कि मैं मित्रों और सुहृदोंसे मिलना चाहता था और अपने पुत्रोंक बलाबलको देखना चाहता था। राजन! जिनके तुम शासक हो और सब शास्त्रोंमें निपुण परम बुद्धिमान् विदुर जिनके मन्त्री हैं, वे कुरुवंशी कदापि शोकके योग्य नहीं हैं ।। त्वयि धर्मोडर्जुने धैर्य भीमसेने पराक्रम:,तुममें धर्म है, अर्जुनमें धैर्य है, भीमसेनमें पराक्रम है और नरश्रेष्ठ नकुल-सहदेवमें श्रद्धा एवं विशुद्ध गुरुसेवाका भाव है। अजातशत्रो! तुम्हारा भला हो। अब तुम खाण्डवप्रस्थको जाओ । दुर्योधन आदि बन्धुओंके प्रति तुम्हें अच्छे भाईका-सा स्नेहभाव रहे और तुम्हारा मन सदा धर्ममें लगा रहे
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ: ଏବଂ ଆମର ମନ୍ତ୍ରୀ ବିଦୁର—ଧୀମାନ, ବିବେକୀ, ସମସ୍ତ ଶାସ୍ତ୍ରରେ ପାରଙ୍ଗତ।
Verse 16
श्रद्धा च गुरुशुश्रूषा यमयो: पुरुषाग्रययो: । अजाततगशत्रो भद्र|ं ते खाण्डवप्रस्थमाविश । भ्रातृभिस्ते<स्तु सौश्षात्रं धर्मे ते धीयतां मन:,तुममें धर्म है, अर्जुनमें धैर्य है, भीमसेनमें पराक्रम है और नरश्रेष्ठ नकुल-सहदेवमें श्रद्धा एवं विशुद्ध गुरुसेवाका भाव है। अजातशत्रो! तुम्हारा भला हो। अब तुम खाण्डवप्रस्थको जाओ । दुर्योधन आदि बन्धुओंके प्रति तुम्हें अच्छे भाईका-सा स्नेहभाव रहे और तुम्हारा मन सदा धर्ममें लगा रहे
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ: ସେହି ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ ଯମଜମାନଙ୍କ (ନକୁଳ-ସହଦେବ) ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରଦ୍ଧା ଅଛି ଏବଂ ଗୁରୁସେବାର ନିର୍ମଳ ଭାବ ଅଛି। ହେ ଅଜାତଶତ୍ରୁ, ତୁମର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ—ଏବେ ଖାଣ୍ଡବପ୍ରସ୍ଥରେ ପ୍ରବେଶ କର। ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଆଦି ଭ୍ରାତୃବନ୍ଧୁମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ତୁମ ମନରେ ସତ୍ୟ ସୌହାର୍ଦ୍ୟ ରହୁ, ଏବଂ ତୁମର ମନ ସଦା ଧର୍ମରେ ନିବିଷ୍ଟ ରହୁ।
Verse 17
वैशम्पायन उवाच इत्युक्तो भरतश्रेष्ठ धर्मराजो युधिष्ठिर: । कृत्वा5<र्यसमयं सर्व प्रतस्थे भ्रातृभि: सह,वैशम्पायनजी कहते हैं--भरतश्रेष्ठ! राजा धृतराष्ट्रके इस प्रकार कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिर पूज्यवर धृतराष्ट्रकरे आदेशको स्वीकार करके भाइयोंके सहित वहाँसे विदा हो गये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଏପରି କହିବା ପରେ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ପୂଜ୍ୟ ବୃଦ୍ଧଙ୍କ ଆଜ୍ଞାକୁ ଯଥାବିଧି ଗ୍ରହଣ କରି, ଆର୍ୟମର୍ଯ୍ୟାଦା ପୂରଣ କରି, ଭ୍ରାତୃମାନଙ୍କ ସହ ସେଠାରୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 18
ते रथान् मेघसंकाशानास्थाय सह कृष्णया । प्रययुहष्टमनस इन्द्रप्रस्थं पुरोत्तमम्
ସେମାନେ ମେଘସଦୃଶ ରଥମାନେ ଆରୋହଣ କରି, କୃଷ୍ଣା (ଦ୍ରୌପଦୀ) ସହ, ହୃଷ୍ଟମନେ ନଗରଶ୍ରେଷ୍ଠ ଇନ୍ଦ୍ରପ୍ରସ୍ଥକୁ ପ୍ରୟାଣ କଲେ।
Verse 72
इस प्रकार श्रीमह्ााभारत सभापव॑के अन्तर्गत झ्यूतपर्वमें भीमसेनका क्रोधविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ଭୀମସେନଙ୍କ କ୍ରୋଧବିଷୟକ ବହତ୍ତରତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 73
वे मेघके समान शब्द करनेवाले रथोंपर द्रौपदीके साथ बैठकर प्रसन्नमनसे नगरोंमें उत्तम इन्द्रप्रसथ्थको चल दिये ।। इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि धृतराष्ट्रवरप्रदानपूर्वकमिन्द्रप्रस्थं प्रति युधिष्ठिरगमने त्रिसप्ततितमो5ध्याय:
ସେମାନେ ମେଘଗର୍ଜନା ସଦୃଶ ଶବ୍ଦ କରୁଥିବା ରଥରେ ଦ୍ରୌପଦୀ ସହ ବସି, ପ୍ରସନ୍ନମନେ ନଗରଶ୍ରେଷ୍ଠ ଇନ୍ଦ୍ରପ୍ରସ୍ଥ ପ୍ରତି ପ୍ରୟାଣ କଲେ। ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଵରଦାନ ପରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଇନ୍ଦ୍ରପ୍ରସ୍ଥଗମନ ବର୍ଣ୍ଣନାକାରୀ ତ୍ରିସପ୍ତତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 126
उपस्थितं वृद्धमन्धं पितरं पश्य भारत । तात! दुर्योधनने जो कठोर बर्ताव किया है, उसे तुम अपने हृदयमें मत लाना। भारत! तुम तो उत्तम गुण ग्रहण करनेकी इच्छासे अपनी माता गान्धारी तथा यहाँ बैठे हुए मुझ अंधे बूढ़े ताऊकी ओर देखो
ହେ ଭାରତ! ସମ୍ମୁଖରେ ଉପସ୍ଥିତ ତୁମ ବୃଦ୍ଧ ଓ ଅନ୍ଧ ପିତାଙ୍କୁ ଦେଖ। ତାତ! ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଯେ କଠୋର ବ୍ୟବହାର କରିଛି, ତାହାକୁ ହୃଦୟରେ ଧରି ରଖନି। ହେ ଭାରତ! ଉତ୍ତମ ଗୁଣ ଗ୍ରହଣ କରିବା ଇଚ୍ଛାରେ ତୁମ ମାତା ଗାନ୍ଧାରୀଙ୍କୁ ଓ ଏଠାରେ ବସିଥିବା ମୋତେ—ତୁମ ଅନ୍ଧ ବୃଦ୍ଧ ପିତୃବ୍ୟଙ୍କୁ—ଦୃଷ୍ଟି ଦିଅ।