
Dhṛtarāṣṭra–Saṃjaya Saṃvāda: Anuśocana, Nimittāni, and Vidura’s Warning
Upa-parva: Draupadī-Parikarṣaṇa & Anuśocana (Court Humiliation and Dhṛtarāṣṭra’s Remorse)
Vaiśaṃpāyana reports that after the Pāṇḍavas depart for the forest, Dhṛtarāṣṭra is seized by anxiety. Saṃjaya interrogates the cause of his grief, framing it as the predictable consequence of having expelled formidable allies. Dhṛtarāṣṭra and Saṃjaya articulate a moral psychology of decline: when ruin approaches, discernment is inverted and harmful choices appear attractive; Time need not strike directly—misperception itself becomes Time’s force. The chapter then revisits the court outrage surrounding Draupadī’s coercive summoning despite counsel from Bhīṣma, Droṇa, and Vidura, naming the agents and emphasizing institutional complicity. Social and cosmic disturbances follow: women’s cries, Brahmin anger, ritual interruptions, meteors, eclipsing signs, fires, and collapsing standards—presented as nimitta (portents) of disorder. In response, Dhṛtarāṣṭra offers Draupadī boons; she chooses the release and re-authorization of the Pāṇḍavas. Vidura closes with a strategic-ethical warning: the Pāṇḍavas and their allies will not tolerate further injury, and prudent policy is reconciliation (śama) rather than escalation.
Chapter Arc: सभामध्य में अपमान और द्यूत-पराजय के बाद भीमसेन क्रोध से उबल उठता है; कौरवों के बीच वह ‘अब शत्रुओं का वध’ करने को उद्यत दिखता है। → कर्ण स्त्री-स्वभाव और ‘स्त्रीगति’ जैसी कटु उक्तियों से वातावरण को और विषाक्त करता है; पाण्डव क्रोधाविष्ट हैं, पर द्रौपदी ही उस डूबते हुए पक्ष की ‘नौका’ बनकर धैर्य का आधार बनती है। → वैशम्पायन के कथनानुसार भीमसेन कौरव-सभा में द्रौपदी के विषय में कही गई बातों से व्यथित होकर उग्र प्रतिज्ञा-भाव में फूट पड़ता है; अर्जुन भी कर्ण की परुष वाणी का प्रतिवाद करता है और ‘उत्तम पुरुष’ की मर्यादा का स्मरण कराता है। → युधिष्ठिर अपने बाहुबल से भीम को रोकते हैं—‘मैवम्’ कहकर उसे शांत होकर बैठने का आदेश देते हैं; क्रोध को वश में कर वे तत्काल रक्तपात को टालते हैं। → भीम का दबा हुआ प्रतिशोध और अपमान की ज्वाला भीतर ही भीतर सुलगती रहती है—यह संकेत छोड़कर अध्याय समाप्त होता है कि यह क्रोध आगे चलकर महायुद्ध में प्रलय बनेगा।
Verse 1
अपन का बछ। ] अतपकडफा<ज द्विसप्ततितमो< ध्याय: शत्रुओंको मारनेके लिये उद्यत हुए भीमको युधिष्ठटिरका शान्त करना कर्ण उवाच या नः श्रुता मनुष्येषु स्त्रियो रूपेण सम्मता: । तासामेतादृशं कर्म न कस्याश्वन शुश्रुम,कर्ण बोला--मैंने मनुष्योंमें जिन सुन्दरी स्त्रियोंके नाम सुने हैं, उनमेंसे किसीने भी ऐसा अदभुत कार्य किया हो, यह मेरे सुननेमें नहीं आया
କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ରୂପେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ନାରୀମାନଙ୍କ ବିଷୟରେ ଆମେ ଶୁଣିଛୁ; କିନ୍ତୁ ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ କାହାରୋ ଦ୍ୱାରା ଏପରି କାର୍ଯ୍ୟ ହୋଇଥିବା କଥା ଆମେ କେବେ ଶୁଣିନାହିଁ।
Verse 2
क्रोधाविष्टेषु पार्थषु धार्तराष्ट्रेषु चाप्यति । द्रौपदी पाण्डुपुत्राणां कृष्णा शान्तिरिहा भवत्,कुन्तीके पुत्र तथा धृतराष्ट्रके पुत्र सभी एक-दूसरेके प्रति अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए थे, ऐसे समयमें यह ट्रुपदकुमारी कृष्णा इन पाण्डवोंको परम शान्ति देनेवाली बन गयी
ପାର୍ଥମାନେ ଓ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରମାନେ କ୍ରୋଧାବିଷ୍ଟ ହୋଇଥିବାବେଳେ, ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଦ୍ରୌପଦୀ—କୃଷ୍ଣା—ଏଠାରେ ଶାନ୍ତିର କାରଣ ହେଲେ।
Verse 3
अप्लवे5म्भसि मग्नानामप्रतिछे निमज्जताम् । पाज्चाली पाण्डुपुत्राणां नौरेषा पारगाभवत्,पाण्डवलोग नौका और आधारसे रहित जलनमें गोते खा रहे थे अर्थात् संकटके अथाह सागरमें डूब रहे थे, किंतु यह पांचालराजकुमारी इनके लिये पार लगानेवाली नौका बन गयी
ନୌକାହୀନ ଓ ଆଧାରହୀନ ଜଳରେ ବାରମ୍ବାର ନିମଜ୍ଜିତ ହେଉଥିବା ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଏହି ପାଞ୍ଚାଳୀ ପାର କରାଇଦେବା ନୌକା ହେଲେ।
Verse 4
वैशम्पायन उवाच तद् वै श्रुत्वा भीमसेन: कुरुमध्येउत्यमर्षण: । स्त्रीगति: पाण्डुपुत्राणामित्युवाच सुदुर्मना:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! कौरवोंके बीचमें कर्णकी वह बात सुनकर अत्यन्त असहनशील भीमसेन मन-ही-मन बहुत दुःखी होकर बोले--'हाय! पाण्डवोंको उबारनेवाली एक स्त्री हुई!
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ରାଜନ୍! କୁରୁମଧ୍ୟରେ କର୍ଣ୍ଣଙ୍କ ସେହି କଥା ଶୁଣି, ଅତ୍ୟନ୍ତ ଅସହିଷ୍ଣୁ ଭୀମସେନ ମନରେ ଗଭୀର ଦୁଃଖ ପାଇ କହିଲେ—“ହାୟ! ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ଗତି ଏକ ନାରୀ ଉପରେ ନିର୍ଭର ହେଲା!”
Verse 5
भीम उवाच त्रीणि ज्योतींषि पुरुष इति वै देवलोडब्रवीत् । अपत्यं कर्म विद्या च यतः सृष्टा: प्रजास्तत:,भीमसेनने कहा--महर्षि देवलका कथन है कि पुरुषमें तीन प्रकारकी ज्योतियाँ हैं-- संतान, कर्म और ज्ञान; क्योंकि इन्हींसे सारी प्रजाकी सृष्टि हुई
ଭୀମ କହିଲେ—ମହର୍ଷି ଦେବଳ କହିଛନ୍ତି, ପୁରୁଷରେ ତିନିଟି ଜ୍ୟୋତି ଅଛି—ସନ୍ତାନ, କର୍ମ ଓ ବିଦ୍ୟା; ଏହିମାନଙ୍କୁ ନେଇ ପ୍ରଜାର ସୃଷ୍ଟି ଓ ସମାଜର ପରମ୍ପରା ଚାଲିଥାଏ।
Verse 6
अमेध्ये वै गतप्राणे शून्ये ज्ञातिभिरुज्िते । देहे त्रितयमेवैतत् पुरुषस्योपयुज्यते,जब यह शरीर प्राणरहित होकर शून्य एवं अपवित्र हो जाता है तथा समस्त बन्धु- बान्धव उसे त्याग देते हैं, तब ये ही ज्ञान आदि तीनों ज्योतियाँ (परलोकगत) पुरुषके उपयोगमें आती हैं
ଯେତେବେଳେ ଏହି ଦେହ ପ୍ରାଣହୀନ ହୋଇ ଶୂନ୍ୟ ଓ ଅପବିତ୍ର ହୁଏ, ଏବଂ ନିଜ ଜ୍ଞାତିମାନେ ମଧ୍ୟ ତାହାକୁ ତ୍ୟାଗ କରନ୍ତି, ସେତେବେଳେ ପରଲୋକରେ ପୁରୁଷଙ୍କୁ ଉପକାର କରେ କେବଳ ଏହି ତ୍ରୟ—ସନ୍ତାନ, କର୍ମ ଓ ବିଦ୍ୟା।
Verse 7
तन्नो ज्योतिरभिहतं दाराणामभिमर्शनात् | धनंजय कथंस्वित् स्यादपत्यमभिमृष्टजम्,धनंजय! हमारी धर्मपत्नी द्रौपदीके शरीरका बल-पूर्वक स्पर्श करके दुःशासनने उसे अपवित्र कर दिया है, इससे हमारी संतानरूप ज्योति नष्ट हो गयी। जो पराये पुरुषसे छू गयी, उस स्त्रीसे उत्पन्न संतान किस कामकी होगी?
ଧନଞ୍ଜୟ! ଆମ ଭାର୍ଯ୍ୟାକୁ ବଳପୂର୍ବକ ସ୍ପର୍ଶ କରାଯାଇଥିବାରୁ ଆମର ବଂଶ-ରୂପ ଜ୍ୟୋତି ଆହତ ହୋଇଛି। ପରପୁରୁଷର ସ୍ପର୍ଶରେ କଲୁଷିତ ହୋଇଥିବା ସ୍ତ୍ରୀଠାରୁ ଜନ୍ମିଥିବା ସନ୍ତାନ କି ପ୍ରୟୋଜନର?
Verse 8
अजुन उवाच न चैवोक्ता न चानुक्ता हीनतः परुषा गिर: | भारत प्रतिजल्पन्ति सदा तूत्तमपूरुषा:,अर्जुन बोले--भारत! (द्रौपदी सती है। उसके विषयमें आप ऐसी बात न कहें। दुःशासनने अवश्य नीचता की है, किंतु) श्रेष्ठ पुरुष नीच पुरुषोंद्वारा कही या न कही गयी कड़वी बातोंका कभी उत्तर नहीं देते
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ନୀଚ ଲୋକ କଠୋର କଥା କହୁନ୍ତୁ କି ନ କହୁନ୍ତୁ, ଉତ୍ତମ ପୁରୁଷମାନେ କେବେ ତୁଚ୍ଛ ପ୍ରତିଉତ୍ତରରେ ଲିପ୍ତ ହୁଅନ୍ତି ନାହିଁ; ତିକ୍ତତାକୁ ତିକ୍ତତାରେ ଉତ୍ତର ଦିଅନ୍ତି ନାହିଁ।
Verse 9
स्मरन्ति सुकृतान्येव न वैराणि कृतान्यपि । सन्त: प्रतिविजानन्तो लब्धसम्भावना: स्वयम्,प्रतिशोधका उपाय जानते हुए भी सत्पुरुष दूसरोंके उपकारोंको ही याद रखते हैं, उनके द्वारा किये हुए वैरको नहीं। उन साधु पुरुषोंको स्वयं सबसे सम्मान प्राप्त होता रहता है
ସତ୍ପୁରୁଷମାନେ ପ୍ରତିଶୋଧର ଉପାୟ ଜାଣିଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ଉପକାରକୁ ମାତ୍ର ସ୍ମରଣ କରନ୍ତି; ସେମାନେ କରିଥିବା ବୈରକୁ ନୁହେଁ। ଏହି ଆଚରଣରେ ସେମାନେ ସ୍ୱୟଂ ସର୍ବତ୍ର ସମ୍ମାନ ଲାଭ କରନ୍ତି।
Verse 10
भीम उवाच इहैवैतांस्त्वहं सर्वान् हन्मि शत्रूनू समागतान् | अथ निष्क्रम्य राजेन्द्र समूलान् हन्मि भारत,भीमसेनने (राजा युधिष्ठिरसे) कहा--भरतवंशी राजराजेश्वर! (यदि आपकी आज्ञा हो, तो) यहाँ आये हुए इन सब शत्रुओंको मैं यहीं समाप्त कर दूँ और यहाँसे बाहर निकलकर इनके मूलका भी नाश कर डालूँ
ଭୀମ କହିଲେ—ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର, ଭରତବଂଶଜ! ଆପଣଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ଥିଲେ ଏଠାରେ ସମବେତ ଏହି ସମସ୍ତ ଶତ୍ରୁଙ୍କୁ ମୁଁ ଏଠିଏ ନିହତ କରିଦେବି; ତାପରେ ଏଠାରୁ ବାହାରି ତାଙ୍କର ମୂଳକୁ ମଧ୍ୟ ଉପାଡ଼ି ସମୂଳେ ନାଶ କରିଦେବି।
Verse 11
कि नो विवदितेनेह किमुक्तेन च भारत | अद्यैवैतान् निहन्मीह प्रशाधि पृथिवीमिमाम्
ହେ ଭରତବଂଶଜ! ଏଠାରେ ବିବାଦ କରି କ’ଣ ଲାଭ, ଅଧିକ କଥାରେ କ’ଣ ପ୍ରୟୋଜନ? ଆଜିଏ ମୁଁ ଏମାନଙ୍କୁ ଏଠିଏ ନିହତ କରିଦେବି; ମୋତେ ଆଜ୍ଞା କରନ୍ତୁ ଏବଂ ଏହି ପୃଥିବୀକୁ ଶାସନ କରନ୍ତୁ।
Verse 12
भारत! अब यहाँ विवाद या उत्तर-प्रत्युत्तर करनेकी हमें क्या आवश्यकता है? मैं आज ही इन सबको यमलोक भेज देता हूँ, आप इस सारी पृथ्वीका शासन कीजिये ।। इत्युक्त्वा भीमसेनस्तु कनिष्ठैर्भ्रातृभि: सह । मृगमध्ये यथा सिंहो मुहुर्मुहुरुदैक्षत
ହେ ଭରତବଂଶଜ! ଏଠାରେ ବିବାଦ କିମ୍ବା ଉତ୍ତର-ପ୍ରତ୍ୟୁତ୍ତରର କ’ଣ ଆବଶ୍ୟକ? ଆଜିଏ ମୁଁ ଏମାନଙ୍କୁ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଯମଲୋକକୁ ପଠାଇଦେବି; ଆପଣ ଏହି ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ଶାସନ କରନ୍ତୁ। ଏହିପରି କହି ଭୀମସେନ କନିଷ୍ଠ ଭ୍ରାତାମାନଙ୍କ ସହ, ମୃଗମଧ୍ୟରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ସିଂହ ପରି, ମୁହୁର୍ମୁହୁର୍ ଚାରିଦିଗକୁ ଦେଖୁଥିଲେ।
Verse 13
अपने छोटे भाइयोंके साथ खड़े हुए भीमसेन उपर्युक्त बात कहकर शत्रुओंकी ओर बार-बार देखने लगे; मानो सिंह मृगोंके समूहमें खड़ा हो उन््हींकी ओर देख रहा हो ।। सान्त्व्यमानो वीक्षमाण: पार्थेनाक्लिष्टकर्मणा । खिद्यत्येव महाबाहुरन्तर्दाहिन वीर्यवान्,अनायास ही महान् पराक्रम कर दिखानेवाले अर्जुन शत्रुओंकी ओर देखनेवाले भीमसेनको बार-बार शान्त कर रहे थे, परंतु पराक्रमी महाबाहु भीमसेन अपने भीतर धधकती हुई क्रोधाग्निसे जल रहे थे
ଏହିପରି କହି ଭୀମସେନ କନିଷ୍ଠ ଭ୍ରାତାମାନଙ୍କ ସହ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହୋଇ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଦିଗକୁ ମୁହୁର୍ମୁହୁର୍ ଦେଖୁଥିଲେ—ମୃଗମଧ୍ୟରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ସିଂହ ପରି। ଅକ୍ଲିଷ୍ଟକର୍ମା ଅର୍ଜୁନ ତାଙ୍କୁ ପୁନଃପୁନଃ ସାନ୍ତ୍ୱନା ଦେଉଥିଲେ, ତଥାପି ପରାକ୍ରମୀ ମହାବାହୁ ଭୀମ ଅନ୍ତରେ କ୍ରୋଧାଗ୍ନିରେ ଦହିଯାଉଥିଲେ।
Verse 14
क्ुद्धस्य तस्य स्रोतो भ्य: कर्णादिभ्यो नराधिप । सधूम: सस्फुलिड्रार्चि: पावक: समजायत,राजन! उस समय क्रोधमें भरे हुए भीमसेनकी श्रवणादि इन्द्रियोंके छिद्रों तथा रोमकूपोंसे धूम और चिनगारियोंसहित आगकी लपटें निकल रहीं थीं
ହେ ନରାଧିପ! କ୍ରୋଧରେ ଉଦ୍ଦୀପ୍ତ ସେହି ଭୀମଙ୍କ କର୍ଣ୍ଣାଦି ଇନ୍ଦ୍ରିୟଦ୍ୱାରରୁ ଧୂମ ଓ ସ୍ଫୁଲିଙ୍ଗ ସହିତ ଅଗ୍ନିଜ୍ୱାଳା ଉଦ୍ଭବିତ ହେଲା ପରି ଦିଶୁଥିଲା।
Verse 15
भ्रुकुटीकृतदुष्प्रेक्ष्य्म भवत् तस्य तन्मुखम् | युगान्तकाले सम्प्राप्ते कृतान्तस्येव रूपिण:,भौंहें तनी होनेके कारण प्रलयकालमें मूर्तिमान्ू यमराजकी भाँति उनके भयानक मुखकी ओर देखना भी कठिन हो रहा था
ଭୃକୁଟି କୁଞ୍ଚିତ ହେବାରୁ ତାଙ୍କ ମୁହଁ ଏତେ ଭୟଙ୍କର ହୋଇଉଠିଲା ଯେ ତାହାକୁ ଦେଖିବା ମଧ୍ୟ କଷ୍ଟକର—ଯୁଗାନ୍ତକାଳେ ମୂର୍ତ୍ତିମାନ କୃତାନ୍ତ (ଯମ) ଆସିଥିବା ପରି।
Verse 16
युधिष्ठिरस्तमावार्य बाहुना बाहुशालिनम् | मैवमित्यब्रवीच्चैनं जोषमास्स्वेति भारत,भारत! तब विशाल भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले भीमसेनको अपने एक हाथसे रोकते हुए युधिष्ठिरने कहा--'ऐसा न करो, शान्तिपूर्वक बैठ जाओ'
ସେତେବେଳେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ନିଜ ବାହୁଦ୍ୱାରା ବାହୁଶାଳୀ ଭୀମକୁ ରୋକି କହିଲେ—“ଏମିତି କରନି; ହେ ଭାରତ, ଶାନ୍ତ ହୋଇ ବସ।”
Verse 17
निवार्य च महाबाहुं कोपसंरक्तलोचनम् | पितरं समुपातिष्ठद् धृतराष्ट्र कृताञ्जलि:,उस समय महाबाहु भीमके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे। उन्हें रोककर राजा युधिष्ठिर हाथ जोड़े हुए अपने ताऊ महाराज धृतराष्ट्रके पास गये
କ୍ରୋଧରେ ରକ୍ତବର୍ଣ୍ଣ ନେତ୍ର ଥିବା ମହାବାହୁ ଭୀମକୁ ରୋକି, ଯୁଧିଷ୍ଠିର କୃତାଞ୍ଜଳି ହୋଇ ନିଜ ଜ୍ୟେଷ୍ଠ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ରାଜାଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ ତାଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହେଲେ।
Verse 72
इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि भीमक्रोधे द्विसप्ततितमोडध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବର ଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ‘ଭୀମକ୍ରୋଧ’ ନାମକ ଦ୍ୱିସପ୍ତତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
The dilemma is whether a ruler can preserve dynastic advantage after an unethical court act by treating it as finished business, or whether dharma requires immediate corrective action—acknowledging wrongdoing, preventing repetition, and restoring political balance through restraint.
The chapter teaches that ethical failure often begins as cognitive distortion: when decline is near, harmful options appear beneficial. Therefore, governance must privilege counsel, self-limitation, and repair over factional gratification.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-commentary is embedded as causal instruction—nimittas and social reactions function as diagnostic signals that adharma in public institutions produces compounding consequences.