Adhyaya 71
Sabha ParvaAdhyaya 7138 Verses

Adhyaya 71

पाण्डवानां वनप्रस्थानवर्णनम् / The Pāṇḍavas’ Departure for the Forest (Vidura’s Report and Portents)

Upa-parva: Vanaprasthāna / Pāṇḍavānāṃ Vanagamana (Departure for the Forest) — within Sabhā Parva’s exile sequence

Dhṛtarāṣṭra asks the sūta/ministerial attendant (kṣattṛ), Vidura, to describe in detail how Yudhiṣṭhira, Bhīma, Arjuna, the twins (Nakula and Sahadeva), Draupadī, and the priest Dhaumya proceed after losing kingdom and wealth. Vidura reports that Yudhiṣṭhira covers his face, explaining it as ethical self-restraint so that his angered gaze does not harm the populace; Bhīma walks displaying his powerful arms, interpreted as a sign of latent force and intent to act appropriately against adversaries in due time; Arjuna follows scattering sand, allegorized as a token of future unimpeded volleys of arrows; Sahadeva smears his face so none can recognize him; Nakula covers himself with dust to avoid attracting attention, especially from women, despite his renowned beauty; Draupadī follows in visible distress, lamenting the humiliation and forecasting a future in which women of the city will suffer analogous grief when retribution arrives. Dhaumya walks ahead carrying kuśa grass and singing yāmya/raudra Sāmans, framing the departure with ritualized sound and ominous tone. The citizens cry out in sorrow as the Pāṇḍavas leave for the forest. The text then records extraordinary portents—earth tremors, lightning without clouds, eclipse-like events, inauspicious meteors, and cries of scavenger birds—interpreted as signs of impending calamity arising from poor counsel. Nārada appears in the assembly, prophesies the Kauravas’ destruction after fourteen years due to Duryodhana’s fault and the strength of Bhīma and Arjuna, and departs. Subsequently, Droṇa speaks pragmatically: he will not abandon the Dhārtarāṣṭras who sought his protection, yet he acknowledges the Pāṇḍavas’ lawful exile and warns that their disciplined austerity will return as formidable opposition. Dhṛtarāṣṭra, hearing Droṇa, instructs Vidura to attempt to bring the Pāṇḍavas back or at least ensure they depart honored and properly equipped.

Chapter Arc: सभामण्डप में अपमान की धूल अभी बैठी भी नहीं कि कर्ण और दुर्योधन द्रौपदी को ‘दासी’ ठहराकर उसे राजपरिवार की सेवा में झुकाने का आदेश देते हैं—विजय के मद में धर्म का गला घोंटा जाता है। → द्रौपदी के चारों ओर वचन-बाण चलने लगते हैं: ‘धृतराष्ट्र-पुत्र ही अब तुम्हारे स्वामी हैं, पाण्डव नहीं’; ‘नया पति चुन लो’—ऐसी निर्लज्ज सलाहें दी जाती हैं। इसी बीच विदुर और गान्धारी अपशकुनों को देखकर राजा को भयावह परिणामों की चेतावनी देते हैं, पर सभा का अहंकार चेतावनी को दबाने लगता है। → धृतराष्ट्र, भीतर से काँपते हुए भी, द्रौपदी को वर देने को बाध्य होते हैं—और द्रौपदी उसी क्षण अपने अपमान को वर में बदलकर पहले युधिष्ठिर की मुक्ति, फिर अन्य पाण्डवों की मुक्ति (और प्रसंगानुसार स्वयं की स्थिति) सुनिश्चित करती है; साथ ही भीम का प्रतिशोध-स्वर (प्रतिज्ञा) सभा के ऊपर बिजली की तरह गिरता है। → राजा द्रौपदी के विवेक और सभा में उठे अनिष्ट-संकेतों से दबकर वरदान देता है; पाण्डव दासत्व के बन्धन से बाहर आते हैं। विदुर की चेतावनी कथा को नैतिक दिशा देती है—यह मुक्ति केवल देह की नहीं, धर्म की पुकार भी है। → अपमान का घाव भरता नहीं: कौरव-पक्ष का दर्प और पाण्डव-पक्ष की प्रतिज्ञा भविष्य के विनाश का बीज बनकर रह जाती है—सभा से निकले हुए ये वचन आगे कुरुक्षेत्र तक गूँजेंगे।

Shlokas

Verse 1

/ है ० बक। है २ एकसप्ततितमो<्ध्याय: कर्ण और दुर्योधनके वचन, भीमसेनकी प्रतिज्ञा, विदुरकी चेतावनी और द्रौपदीको धृतराष्ट्रसे वरप्राप्ति कर्ण उवाच त्रयः किलेमे हधना भवन्ति दास: पुत्रश्नास्वतन्त्रा च नारी । दासस्य पत्नी त्वधनस्य भग्रे हीनेश्वरा दासधनं च सर्वम्‌,कर्ण बोला--भद्रे द्रौपदी! दास, पुत्र और सदा पराधीन रहनेवाली स्त्री--ये तीनों धनके स्वामी नहीं होते। जिसका पति अपने ऐश्वर्यसे भ्रष्ट हो गया है, ऐसी निर्धन दासकी पत्नी और दासका सारा धन--इन सबपर उस दासके स्वामीका ही अधिकार होता है

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲା—“ଭଦ୍ରେ ଦ୍ରୌପଦୀ! ଦାସ, ପୁତ୍ର ଓ ସଦା ପରାଧୀନ ନାରୀ—ଏ ତିନିଜଣଙ୍କର ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର ଧନାଧିକାର ନାହିଁ ବୋଲି କୁହାଯାଏ। ଭଦ୍ରେ! ଯାହାର ସ୍ୱାମୀ ଐଶ୍ୱର୍ୟଭ୍ରଷ୍ଟ ହୋଇ ହୀନ ହୋଇପଡ଼ିଛି, ସେହି ଦରିଦ୍ର ଦାସର ସ୍ତ୍ରୀ ଓ ଦାସର ସମସ୍ତ ଧନ—ଏ ସବୁ ଉପରେ ସେହି ଦାସର ମାଲିକଙ୍କର ହିଁ ଅଧିକାର ଥାଏ।”

Verse 2

प्रविश्य राज्ञ: परिवारं भजस्व तत्‌ ते कार्य शिष्टमादिश्यतेडत्र ईशास्तु सर्वे तव राजपुत्रि भवन्ति वै धार्तराष्ट्रा न पार्था: 4 २ ॥। राजकुमारी! अतः अब तुम राजा दुर्योधनके परिवारमें जाकर सबकी सेवा करो। यही कार्य तुम्हारे लिये शेष बचा है, जिसके लिये तुम्हें यहाँ आदेश दिया जा रहा है। आजसे धृतराष्ट्रके समस्त पुत्र ही तुम्हारे स्वामी हैं, कुन्तीके पुत्र नहीं

“ରାଜକୁମାରୀ! ଏବେ ରାଜଗୃହରେ ପ୍ରବେଶ କରି ସେଠାରେ ସେବା କର; ତୁମ ପାଇଁ ଅବଶିଷ୍ଟ କାର୍ଯ୍ୟ ଏହିଟି—ଏଠାରେ ତୁମକୁ ଏହି ଆଦେଶ ଦିଆଯାଉଛି। ଆଜିଠାରୁ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ସମସ୍ତ ପୁଅମାନେ ହିଁ ତୁମ ସ୍ୱାମୀ; ପୃଥାଙ୍କ ପୁଅମାନେ ନୁହେଁ।”

Verse 3

अन्यं वृणीष्व पतिमाशु भाविनि यस्माद्‌ दास्‍्यं न लभसि देवनेन । अवाच्या वै पतिषु कामवृत्ति- नित्यं दास्ये विदितं तत्‌ तवास्तु,सुन्दरी। अब तुम शीघ्र ही दूसरा पति चुन लो, जिससे झद्यूतक्रीड़ाके द्वारा तुम्हें फिर किसीकी दासी न बनना पड़े। पतियोंके प्रति इच्छानुसार बर्ताव तुम-जैसी स्त्रीके लिये निन्दनीय नहीं है। दासीपनमें तो स्त्रीकी स्वेच्छाचारिता प्रसिद्ध है ही, अत: यह दास्यभाव ही तुम्हें प्राप्त हो

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—ସୁନ୍ଦରୀ! ଶୀଘ୍ର ଅନ୍ୟ ପତି ବାଛ, ଯେଣୁ ଦ୍ୟୂତକ୍ରୀଡ଼ାରେ ତୁମେ ପୁଣି କାହାର ଦାସୀ ନ ହେବ। ତୁମ ପରି ନାରୀ ପାଇଁ ପତିମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ଆଚରଣ ନିନ୍ଦନୀୟ ନୁହେଁ। ଦାସ୍ୟାବସ୍ଥାରେ ନାରୀର ସ୍ୱେଚ୍ଛାଚାର ପ୍ରସିଦ୍ଧ—ଅତଏବ ଏହି ଦାସ୍ୟଭାବ ତୁମକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେଉ।

Verse 4

पराजितो नकुलो भीमसेनो युधिष्ठिर: सहदेवार्जुनौ च दासीभूता त्वं हि वै याज्ञसेनि पराजितास्ते पतयो नैव सन्ति,यज्ञसेनकुमारी! नकुल हार गये, भीमसेन, युधिष्ठिर, सहदेव तथा अर्जुन भी पराजित होकर दास बन गये। अब तुम दासी हो चुकी हो। वे हारे हुए पाण्डव अब तुम्हारे पति नहीं हैं

ନକୁଳ ପରାଜିତ ହେଲା; ଭୀମସେନ, ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ସହଦେବ ଓ ଅର୍ଜୁନ ମଧ୍ୟ ହାରି ଦାସ ହେଲେ। ଯାଜ୍ଞସେନୀ, ତୁମେ ମଧ୍ୟ ଦାସୀ ହୋଇଗଲ। ଯଜ୍ଞସେନକୁମାରୀ, ପରାଜିତ ସେ ପତିମାନେ ଏବେ ତୁମ ପତି ନୁହେଁ।

Verse 5

प्रयोजनं जन्मनि कि न मन्यते पराक्रमं पौरुषं चैव पार्थ: । पाज्चाल्यस्य द्रुपदस्यात्मजामिमां सभामध्ये यो व्यदेवीद्‌ ग्लहेषु,क्या कुन्तीकुमार युधिष्ठिर इस जीवनमें पराक्रम और पुरुषार्थकी आवश्यकता नहीं समझते, जिन्होंने सभामें इस द्रुपदराजकुमारी कृष्णाको दाँवपर लगाकर जूएका खेल किया?

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—ପାର୍ଥ (ଯୁଧିଷ୍ଠିର) ଏହି ଜୀବନରେ ପ୍ରୟୋଜନ, ପରାକ୍ରମ ଓ ପୁରୁଷାର୍ଥର ଆବଶ୍ୟକତା ବୁଝୁନାହାନ୍ତି କି? ଯିଏ ସଭାମଧ୍ୟରେ ପାଞ୍ଚାଳରାଜ ଦ୍ରୁପଦଙ୍କ କନ୍ୟା କୃଷ୍ଣାକୁ ଦ୍ୟୂତର ଦାଉରେ ରଖିଥିଲେ!

Verse 6

वैशम्पायन उवाच तद्‌ वै श्रुत्वा भीमसेनो त्यमर्षी भृशं निशश्वास तदा5अ$र्तरूप: । राजानुगो धर्मपाशानुबद्धो दहन्निवैनं क्रोधसंरक्तदृष्टि:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कर्णकी वह बात सुनकर अत्यन्त अमर्षमें भरे हुए भीमसेन बड़ी वेदनाका अनुभव करते हुए उस समय जोर-जोरसे उच्छवास लेने लगे। वे राजा युधिष्ठिरके अनुगामी होकर धर्मके पाशमें बँधे हुए थे। क्रोधसे उनके नेत्र रक्तवर्ण हो रहे थे। वे युधिष्ठिरको दग्ध करते हुए-से बोले

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! କର୍ଣ୍ଣର ସେ କଥା ଶୁଣି ଅସହ୍ୟ ଅମର୍ଷରେ ଭୀମସେନ ଭରିଉଠିଲେ; ବେଦନାରେ ମୁହଁ ବିକୃତ ହୋଇ ସେ ସମୟରେ ପୁନଃପୁନଃ ଗଭୀର ନିଶ୍ୱାସ ଛାଡ଼ିଲେ। କିନ୍ତୁ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଅନୁଗାମୀ ଥିବାରୁ ଧର୍ମପାଶରେ ବନ୍ଧିତ ରହିଲେ। କ୍ରୋଧରେ ତାଙ୍କ ଦୃଷ୍ଟି ରକ୍ତବର୍ଣ୍ଣ ହେଲା; ଯେନେ ଶବ୍ଦରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଦହନ କରୁଛନ୍ତି—ଏମିତି ସେ କହିଉଠିଲେ।

Verse 7

भीम उवाच नाहं कुप्ये सूतपुत्रस्य राज- न्रेष सत्यं दासधर्म: प्रदिष्ट: । किं विद्विषो वै मामेवं व्याहरेयु- नदिवीस्त्वं यद्यनया नरेन्द्र,भीमसेनने कहा--राजन्‌! मुझे सूतपुत्र कर्णपर क्रोध नहीं आता। सचमुच ही दासधर्म वही है, जो उसने बताया है। महाराज! यदि आप इस द्रौपदीको दाँवपर लगाकर जूआ न खेलते तो क्या ये शत्रु हमलोगोंसे ऐसी बातें कह सकते थे?

ଭୀମ କହିଲେ—ରାଜନ୍! ସୂତପୁତ୍ର କର୍ଣ୍ଣ ଉପରେ ମୋର କ୍ରୋଧ ନାହିଁ। ସେ ଯାହା କହିଛି, ସେଇଟା ନିଶ୍ଚୟ ଦାସଧର୍ମ। ନରେନ୍ଦ୍ର! ଯଦି ଆପଣ ଏହି ଦ୍ରୌପଦୀକୁ ଦାଉରେ ରଖି ଦ୍ୟୂତ ଖେଳିନଥାନ୍ତେ, ତେବେ ଶତ୍ରୁମାନେ ଆମ ସହ ଏପରି କଥା କହିବାକୁ ସାହସ କରିପାରିଥାନ୍ତେ କି?

Verse 8

वैशम्पायन उवाच भीमसेनवच: श्रुत्वा राजा दुर्योधनस्तदा । युधिष्ठिरमुवाचेदं तूष्णीम्भूतमचेतनम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--भीमसेनका यह कथन सुनकर उस समय राजा दुर्योधनने मौन एवं अचेतकी-सी दशामें बैठे हुए युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा--

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଭୀମସେନଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି ସେ ସମୟରେ ରାଜା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ନିରବ, ଯେନ ଅଚେତନ ହୋଇ ବସିଥିବା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଏଭଳି କହିଲେ।

Verse 9

भीमार्जुनौ यमौ चैव स्थितौ ते नृप शासने । प्रश्न॑ ब्रूहि च कृष्णां त्वमजितां यदि मन्यसे,“नरेश! भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव आपकी आज्ञाके अधीन हैं। आप ही द्रौपदीके प्रश्नपर कुछ बोलिये। क्या आप कृष्णाको हारी हुई नहीं मानते हैं?”

ହେ ନୃପ! ଭୀମ, ଅର୍ଜୁନ ଏବଂ ଯମଜ ଭାଇ (ନକୁଳ–ସହଦେବ) ତୁମ ଶାସନାଧୀନ ଅଛନ୍ତି। ତେଣୁ ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କ ପ୍ରଶ୍ନର ଉତ୍ତର ତୁମେ ଦିଅ; ଯଦି କୃଷ୍ଣାକୁ ‘ଅଜିତା’—ଜିତାଯାଇନଥିବା—ବୋଲି ଭାବୁଛ, ତେବେ କହ।

Verse 10

एवमुक्‍त्वा तु कौन्तेयमपोह् वसनं स्वकम्‌ । स्मयन्नवेक्ष्य पाज्चालीमैश्वर्यमदमोहित:,कुन्तीकुमार युधिष्ठिस्से ऐसा कहकर ऐश्वर्यमदसे मोहित हुए दुर्योधनने इशारेसे राधानन्दन कर्णको बढ़ावा देते और भीमसेनका तिरस्कार-सा करते हुए अपनी जाँघका वस्त्र हटाकर द्रौपदीकी ओर मुसकराते हुए देखा। उसने केलेके खंभेके समान मोटी, समस्त लक्षणोंसे सुशोभित, हाथीकी सूँडके सदृश चढ़ाव-उतारवाली और वज्रके समान कठोर अपनी बायीं जाँघ द्रौपदीकी दृष्टिके सामने करके दिखायी

କୌନ୍ତେୟ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଏଭଳି କହି, ଐଶ୍ୱର୍ୟମଦରେ ମୋହିତ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ନିଜ ବସ୍ତ୍ର ହଟାଇ, ହସିହସି ପାଞ୍ଚାଳୀଙ୍କୁ ଦେଖିଲା।

Verse 11

कदलीस्तम्भसदृशं सर्वलक्षणसंयुतम्‌ । गजहस्तप्रतीकाशं वज्रप्रतिमगौरवम्‌,कुन्तीकुमार युधिष्ठिस्से ऐसा कहकर ऐश्वर्यमदसे मोहित हुए दुर्योधनने इशारेसे राधानन्दन कर्णको बढ़ावा देते और भीमसेनका तिरस्कार-सा करते हुए अपनी जाँघका वस्त्र हटाकर द्रौपदीकी ओर मुसकराते हुए देखा। उसने केलेके खंभेके समान मोटी, समस्त लक्षणोंसे सुशोभित, हाथीकी सूँडके सदृश चढ़ाव-उतारवाली और वज्रके समान कठोर अपनी बायीं जाँघ द्रौपदीकी दृष्टिके सामने करके दिखायी

ସେ ନିଜ ବାମ ଜଂଘା ଦେଖାଇଲା—କଦଳୀସ୍ତମ୍ଭ ପରି ମୋଟ, ସମସ୍ତ ଲକ୍ଷଣରେ ଯୁକ୍ତ, ଗଜହସ୍ତ ପରି ଉଠାନ-ପତନ ଥିବା, ଏବଂ ବଜ୍ର ପରି ଭାରୀ ଓ କଠୋର।

Verse 12

अभ्युत्स्मयित्वा राधेयं भीममाधर्षयन्निव | द्रौपद्या: प्रेक्षमाणाया: सव्यमूरुमदर्शयत्‌,कुन्तीकुमार युधिष्ठिस्से ऐसा कहकर ऐश्वर्यमदसे मोहित हुए दुर्योधनने इशारेसे राधानन्दन कर्णको बढ़ावा देते और भीमसेनका तिरस्कार-सा करते हुए अपनी जाँघका वस्त्र हटाकर द्रौपदीकी ओर मुसकराते हुए देखा। उसने केलेके खंभेके समान मोटी, समस्त लक्षणोंसे सुशोभित, हाथीकी सूँडके सदृश चढ़ाव-उतारवाली और वज्रके समान कठोर अपनी बायीं जाँघ द्रौपदीकी दृष्टिके सामने करके दिखायी

ଅହଂକାରରେ ହସି, ଯେନ ରାଧେୟ କର୍ଣ୍ଣକୁ ଉକ୍ସାଉଛି ଓ ଭୀମକୁ ଅପମାନ କରୁଛି—ଦ୍ରୌପଦୀ ଦେଖୁଥିବାବେଳେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ନିଜ ବାମ ଜଂଘା ଦେଖାଇଲା।

Verse 13

भीमसेनस्तमालोक्य नेत्रे उत्फाल्य लोहिते । प्रोवाच राजमध्ये तं॑ सभां विश्रावयन्निव,उसे देखकर भीमसेनकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। वे आँखें फाड़-फाड़कर देखते और सारी सभाको सुनाते हुए-से राजाओंके बीचमें बोले--

ତାକୁ ଦେଖି ଭୀମସେନଙ୍କ ଚକ୍ଷୁ କ୍ରୋଧରେ ରକ୍ତିମ ହୋଇ ଫାଟିଯିବା ପରି ଲାଗିଲା। ରାଜମଧ୍ୟରେ ସେ ଏମିତି କହିଲେ, ଯେନେ ସମଗ୍ର ସଭାକୁ ଶୁଣାଉଛନ୍ତି।

Verse 14

पितृभि: सह सालोक्यं मा सम गच्छेद्‌ वृकोदर: । यद्येतमूरुं गदया न भिन्द्यां ते महाहवे,“दुर्योधन! यदि महासमरमें तेरी इस जाँघको मैं अपनी गदासे न तोड़ डालूँ तो मुझ भीमसेनको अपने पूर्वजोंके साथ उन्हींके समान पुण्यलोकोंकी प्राप्ति न हो”

“ଦୁର୍ୟୋଧନ! ମହାସମରରେ ମୋ ଗଦାଦ୍ୱାରା ତୋର ଏହି ଜଂଘାକୁ ଯଦି ମୁଁ ଭାଙ୍ଗି ନ ଦେଉ, ତେବେ ବୃକୋଦର ଭୀମ ପିତୃମାନଙ୍କ ସମାନ ପୁଣ୍ୟଲୋକ ପାଇବାରୁ ବଞ୍ଚିତ ହେଉ।”

Verse 15

क़ुद्धस्प तस्य सर्वेभ्य: स्रोतोभ्य: पावकर्चिष: । वृक्षस्येव विनिश्चेरु: कोटरेभ्य: प्रदह्यत:,उस समय क्रोधमें भरे हुए भीमसेनके रोम-रोमसे आगकी चिनगारियाँ निकल रही थीं; ठीक उसी तरह, जैसे जलते हुए वृक्षके कोटरोंसे आगकी लपटें निकलती दिखायी देती हैं

ସେତେବେଳେ କ୍ରୋଧରେ ଦଗ୍ଧ ଭୀମସେନଙ୍କ ଦେହର ସମସ୍ତ ସ୍ରୋତରୁ ଯେନେ ଅଗ୍ନିର ଚିଙ୍ଗାରି ବାହାରୁଥିଲା; ଯେପରି ଜଳୁଥିବା ଗଛର କୋଟରରୁ ଶିଖା ଫୁଟିଉଠେ।

Verse 16

विदुर उवाच परं भयं पश्यत भीमसेनात्‌ तद्‌ बुध्यध्वं धृतराष्ट्रस्य पुत्रा: । दैवेरितो नूनमयं पुरस्तात्‌ परो5नयो भरतेषूदपादि,विदुरजीने कहा--धृतराष्ट्रके पुत्रो! देखो, भीमसेनसे यह बड़ा भारी भय उपस्थित हो गया है। इसपर ध्यान दो। निश्चय ही प्रारब्धकी प्रेरणासे ही भरतवंशियोंके समक्ष यह महान्‌ अन्याय उत्पन्न हुआ है

ବିଦୁର କହିଲେ—“ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ! ଦେଖ, ଭୀମସେନଙ୍କ ଠାରୁ ଭୟଙ୍କର ଆପଦ ଉପସ୍ଥିତ ହୋଇଛି; ଏହାକୁ ବୁଝ। ନିଶ୍ଚୟ ଦୈବପ୍ରେରଣାରେ ଭରତମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଏହି ମହା ଅନ୍ୟାୟ ପ୍ରକଟ ହୋଇଛି।”

Verse 17

अतिद्यूतं कृतमिदं धार्तराष्ट्र यस्मात्‌ स्त्रियं विवदध्वं सभायाम्‌ । योगक्षेमौ नश्यतो वः समग्रौ पापान्‌ मन्त्रान्‌ कुरवो मन्त्रयन्ति,धृतराष्ट्रके पुत्रों! तुमलोगोंने मर्यादाका उल्लंघन करके यह जूएका खेल किया है। तभी तो तुम भरी सभामें स्त्रीको लाकर उसके लिये विवाद कर रहे हो। तुम्हारे योग और क्षेम दोनों पूर्णतया नष्ट हो रहे हैं। आज सब लोगोंको मालूम हो गया कि कौरव पापपूर्ण मन्त्रणा ही करते हैं

ବିଦୁର କହିଲେ—“ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ! ଏହା ଅତିଦ୍ୟୂତ—ସୀମା ଛାଡ଼ି ଅଧର୍ମର ଜୁଆ; ତେଣୁ ତୁମେ ସଭାମଧ୍ୟରେ ଜଣେ ନାରୀକୁ ଆଣି ତା’କୁ ସମ୍ପତ୍ତି ପରି କରି ବିବାଦ କରୁଛ। ଏହାରେ ତୁମର ଯୋଗ ଓ କ୍ଷେମ—ଦୁହେଁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ନଷ୍ଟ ହେଉଛି; ଆଜି ସମସ୍ତଙ୍କୁ ସ୍ପଷ୍ଟ ହୋଇଗଲା ଯେ କୁରୁମାନେ ପାପମୟ ମନ୍ତ୍ରଣା ହିଁ କରନ୍ତି।”

Verse 18

इमं धर्म कुरवो जानताशु ध्वस्ते धर्मे परिषत्‌ सम्प्रदुष्येत्‌ । इमां चेत्‌ पूर्व कितवोडग्लहिष्य- दीशो5भविष्यदपराजितात्मा,कौरवो! तुम धर्मकी इस महत्ताको शीघ्र ही समझ लो; क्योंकि धर्मका नाश होनेपर सारी सभाको दोष लगता है। यदि जूआ खेलनेवाले राजा युधिष्ठिर अपने शरीरको हारे बिना पहले ही इस द्रौपदीको दाँवपर लगाते तो वे ऐसा करनेके अधिकारी हो सकते थे

ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ କୁରୁମାନେ, ଏହି ଧର୍ମତତ୍ତ୍ୱକୁ ଶୀଘ୍ର ବୁଝ; ଧର୍ମ ନଷ୍ଟ ହେଲେ ସମଗ୍ର ରାଜସଭା ଦୋଷରେ କଳୁଷିତ ହୁଏ। ଯଦି ଜୁଆରି ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ନିଜ ଦେହକୁ ହାରିବା ପୂର୍ବରୁ ଏହି ସ୍ତ୍ରୀକୁ ଦାଉରେ ରଖିଥାନ୍ତେ, ତେବେ, ହେ କୌରବ, ସେ ଆତ୍ମସ୍ୱାମୀ—ଅପରାଜିତ—ରହିଥାନ୍ତେ ଏବଂ ସେହି କାର୍ଯ୍ୟରେ ଅଧିକାରୀ ହୋଇଥାନ୍ତେ।

Verse 19

स्वप्ने यथैतद्‌ विजितं धन स्या- देवं मनन्‍्ये यस्य दीव्यत्यनीश: । गान्धारराजस्य वचो निशम्य धर्मादस्मात्‌ कुरवो मापयात,(परंतु जब वे पहले अपनेको हारकर उसे दाँवपर लगानेका अधिकार ही खो बैठे थे, तब उसका मूल्य ही क्या रहा?) अनधिकारी पुरुष जिस धनको दाँवपर लगाता है, उसकी हार-जीत मैं वैसी ही मानता हूँ जैसे कोई स्वप्रमें किसी धनको हारता या जीतता है। कौरवो! तुमलोग गान्धारराज शकुनिकी बात सुनकर अपने धर्मसे भ्रष्ट न होओ

ବିଦୁର କହିଲେ—ସ୍ୱପ୍ନରେ ଯେପରି ଧନ ଜିତା-ହାରା ହୁଏ, ସେପରି ଯାହାର ଉପରେ ଅଧିକାର ନାହିଁ ସେ ଯେ ଧନ ଦାଉରେ ରଖେ, ତାହାର ଜୟ-ପରାଜୟକୁ ମୁଁ ସେହିପରି ମାନେ। ଗାନ୍ଧାରରାଜ ଶକୁନିଙ୍କ କଥା ଶୁଣି, ହେ କୁରୁମାନେ, ଏହି ଧର୍ମରୁ ଭ୍ରଷ୍ଟ ହେଉନାହିଁ।

Verse 20

दुर्योधन उवाच भीमस्य वाकये तद्वदेवार्जुनस्य स्थितो<हं वै यमयोश्वैवमेव । युधिष्ठिरं ते प्रवदन्त्वनीश- मथो दास्यान्मोक्ष्यसे याज्ञसेनि,दुर्योधन बोला--द्रौपदी! मैं भीम, अर्जुन एवं नकुल-सहदेवकी बात माननेके लिये तैयार हूँ। ये सब लोग कह दें कि युधिष्ठिरको तुम्हें हारनेका कोई अधिकार नहीं था, फिर तुम दासीपनसे मुक्त कर दी जाओगी

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ମୁଁ ଭୀମଙ୍କ କଥାକୁ, ସେହିପରି ଅର୍ଜୁନଙ୍କ କଥାକୁ, ଏବଂ ଯମଜ ଭାଇମାନଙ୍କ କଥାକୁ ମଧ୍ୟ ମାନିବାକୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ। ଯଦି ସେମାନେ ସମସ୍ତେ କହନ୍ତି ଯେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ତୁମକୁ, ଦ୍ରୌପଦୀ, ଦାଉରେ ରଖିବାର ଅଧିକାର ନଥିଲା, ତେବେ, ହେ ଯାଜ୍ଞସେନୀ, ତୁମେ ଦାସ୍ୟରୁ ମୁକ୍ତ ହେବ।

Verse 21

अजुन उवाच ईशो राजा पूर्वमासीद्‌ ग्लहे नः कुन्तीसुतो धर्मराजो महात्मा । ईशस्त्वयं कस्य पराजितात्मा तज्जानी ध्वं कुरव: सर्व एव,अर्जुनने कहा--कुन्तीनन्दन महात्मा धर्मराज राजा युधिष्ठिर पहले तो हमें दाँवपर लगानेके अधिकारी थे ही, किंतु जब वे अपने शरीरको ही हार गये, तब किसके स्वामी रहे? इस बातपर सब कौरव विचार करें

ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—ଏହି ଖେଳରେ ପୂର୍ବେ ମହାତ୍ମା କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଆମର ସ୍ୱାମୀ ଥିଲେ; ତେଣୁ ଆମକୁ ଦାଉରେ ରଖିବାର ଅଧିକାର ତାଙ୍କର ଥିଲା। କିନ୍ତୁ ଯେତେବେଳେ ସେ ନିଜ ଦେହକୁ ହାରିଲେ, ସେତେବେଳେ ସେ କାହାର ସ୍ୱାମୀ ରହିଲେ? ଏହି କଥା ଉପରେ ସମସ୍ତ କୁରୁ ବିଚାର କରନ୍ତୁ।

Verse 22

वैशम्पायन उवाच ततो राज्ञो धृतराष्ट्रस्य गेहे गोमायुरुच्चैव्याहरदग्निहोत्रे । त॑ रासभा: प्रत्यभाषन्त राजन्‌ समन्तत: पक्षिणश्नैव रौद्रा:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तत्पश्चात्‌ राजा धृतराष्ट्रकी अग्निशालाके भीतर एक गीदड़ आकर जोर-जोरसे हुँआ-हुँआ करने लगा। उस शब्दको लक्ष्य करके सब ओर गदहे रेंकने लगे तथा गृधप्र आदि भयंकर पक्षी भी चारों ओर अशुभसूचक कोलाहल करने लगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜା ଜନମେଜୟ, ତାପରେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଗୃହରେ, ଅଗ୍ନିହୋତ୍ର-ସ୍ଥାନର ଭିତରେ, ଗୋଟିଏ ଗିଦଡ଼ ଉଚ୍ଚ ସ୍ୱରରେ ହୁଆଁ-ହୁଆଁ କରି ଡାକିଲା। ସେହି ଧ୍ୱନିକୁ ନିମିତ୍ତ କରି ଚାରିଦିଗରେ ଗଦାହା ରେଁକିଲେ, ଏବଂ ଭୟଙ୍କର ପକ୍ଷୀମାନେ ମଧ୍ୟ ସର୍ବତ୍ର ଅଶୁଭ କୋଲାହଳ କଲେ।

Verse 23

तं वै शब्दं विदुरस्तत्त्ववेदी शुश्राव घोरं सुबलात्मजा च | भीष्मो द्रोणो गौतमश्नापि विद्वान्‌ स्वस्ति स्वस्तीत्यपि चैवाहुरुच्चै:,तत्त्वज्ञानी विदुर तथा सुबलपुत्री गान्धारीने भी उस भयानक शब्दको सुना। भीष्म, द्रोण और गौतमवंशीय विद्वान्‌ कृपाचार्यके कानोंमें भी वह अमंगलकारी शब्द सुन पड़ा। फिर तो वे सभी लोग उच्च स्वरसे “स्वस्ति', 'स्वस्ति” ऐसा कहने लगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତତ୍ତ୍ୱଜ୍ଞ ବିଦୁର ସେଇ ଭୟଙ୍କର ଶବ୍ଦ ଶୁଣିଲେ, ଏବଂ ସୁବଳଙ୍କ କନ୍ୟା ଗାନ୍ଧାରୀ ମଧ୍ୟ ଶୁଣିଲେ। ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣ ଓ ଗୌତମବଂଶୀ ବିଦ୍ୱାନ କୃପାଚାର୍ଯ୍ୟ ମଧ୍ୟ ସେଇ ଅମଙ୍ଗଳ ଧ୍ୱନି ଶୁଣିଲେ। ତାପରେ ସମସ୍ତେ ଉଚ୍ଚ ସ୍ୱରରେ “ସ୍ୱସ୍ତି, ସ୍ୱସ୍ତି” ବୋଲି କଲ୍ୟାଣ ଆହ୍ୱାନ କଲେ।

Verse 24

ततो गान्धारी विदुरश्षापि विद्वां- स्तमुत्पातं घोरमालक्ष्य राजे । निवेदयामासतुरार्तवत्‌ तदा ततो राजा वाक्यमिदं बभाषे,तदनन्तर गान्धारी और दविद्वान्‌ विदुरने उस उत्पात-सूचक भयंकर शब्दको लक्ष्य करके अत्यन्त दुःखी हो राजा धुृतराष्ट्रसे उसके विषयमें निवेदन किया, तब राजाने इस प्रकार कहा

ତାପରେ ଗାନ୍ଧାରୀ ଓ ବିଦ୍ୱାନ ବିଦୁର ସେଇ ଘୋର ଉତ୍ପାତ-ସୂଚକ ଲକ୍ଷଣକୁ ଦେଖି ଅତ୍ୟନ୍ତ ଆର୍ତ୍ତ ହୋଇ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ ନିବେଦନ କଲେ। ତାହାପରେ ରାଜା ଏହି ବଚନ କହିଲେ।

Verse 25

धृतराष्टर उवाच हतो<सि दुर्योधन मन्दबुद्धे यस्त्वं सभायां कुरुपुज्गवानाम्‌ | स्त्रियं समाभाषसि दुर्विनीत विशेषतो द्रौपदी धर्मपत्नीम्‌,धृतराष्ट्र बोले--रे मन्दबुद्धि दुर्योधन! तू तो जीता ही मारा गया। दुर्विनीत! तू श्रेष्ठ कुरुवंशियोंकी सभामें अपने ही कुलकी महिला एवं विशेषतः पाण्डवोंकी धर्मपत्नीको ले आकर उससे पापपूर्ण बातें कर रहा है

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ହେ ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ! ତୁ ତ ହତ ହୋଇଗଲୁ ବୋଲି ଜାଣ; କାରଣ କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠମାନଙ୍କ ସଭାରେ, ହେ ଦୁର୍ବିନୀତ, ତୁ ଏକ ନାରୀଙ୍କୁ—ବିଶେଷତଃ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଧର୍ମପତ୍ନୀ ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କୁ—ନିର୍ଲଜ୍ଜ ବଚନ କହୁଛୁ।

Verse 26

एवमुकक्‍्त्वा धृतराष्ट्रो मनीषी हितान्वेषी बान्धवानामपायात्‌ | कृष्णां पाञ्चालीमब्रवीत्‌ सानन्‍्त्वपूर्व विमृश्यैतत्‌ प्रज्ञया तत्त्वबुद्धि:,ऐसा कहकर बन्धु-बान्धवोंको विनाशसे बचाकर उनके हितकी इच्छा रखनेवाले तत्त्वदर्शी एवं मेधावी राजा धृतराष्ट्रने अपनी बुद्धिसे इस दुःखद प्रसंगपर विचार करके पांचालराजकुमारी कृष्णाको सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा--

ଏପରି କହି, ବାନ୍ଧବମାନଙ୍କ ହିତ ଚାହୁଁଥିବା ଓ ତାଙ୍କର ବିନାଶ ଟାଳିବାକୁ ଇଚ୍ଛୁକ ବୁଦ୍ଧିମାନ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଏହି ଦୁଃଖଦ ପ୍ରସଙ୍ଗକୁ ପ୍ରଜ୍ଞାରେ ବିଚାର କଲେ। ପରେ ପାଞ୍ଚାଳୀ କୃଷ୍ଣାଙ୍କୁ ସାନ୍ତ୍ୱନା ଦେଇ ଏପରି କହିଲେ।

Verse 27

धृतराष्ट उवाच वरं वृणीष्व पाज्चालि मत्तो यदभिवाञ्छसि । वधूनां हि विशिष्टा मे त्वं धर्मपरमा सती,धृतराष्ट्रने कहा--बहू द्रौपदी! तुम मेरी पुत्रवधुओंमें सबसे श्रेष्ठ एवं धर्मपरायणा सती हो। तुम्हारी जो इच्छा हो, उसके अनुसार मुझसे वर माँग लो

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ହେ ପାଞ୍ଚାଳୀ! ମୋ ପାଖରୁ ତୁମେ ଯାହା ସତ୍ୟରେ ଇଚ୍ଛା କର, ସେଇ ବର ଚାହ। ମୋର ପୁତ୍ରବଧୂମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ତୁମେ ସର୍ବଶ୍ରେଷ୍ଠ—ଧର୍ମପରାୟଣ ସତୀ।

Verse 28

द्रौपहुुवाच ददासि चेद्‌ वरं महां वृणोमि भरतर्षभ । सर्वधर्मानुग: श्रीमानदासो<सस्‍्तु युधिछिर:

ଦ୍ରୌପଦୀ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଯଦି ଆପଣ ମୋତେ ବର ଦେବେ, ତେବେ ମୁଁ ଏହି ମହାବର ଚାହୁଁଛି—ସମସ୍ତ ଧର୍ମକୁ ଅନୁସରଣ କରୁଥିବା ଶ୍ରୀମାନ୍ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦାସତ୍ୱ ଅବସ୍ଥାରୁ ମୁକ୍ତ ହେଉନ୍ତୁ।

Verse 29

मनस्विनमजानन्तो मैवं ब्रूयु: कुमारका: । एष वै दासपुत्रो हि प्रतिविन्ध्यं ममात्मजम्‌

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ମନସ୍ବୀ ପୁରୁଷର ସତ୍ୟ ମୂଲ୍ୟ ନ ଜାଣି କୁମାରମାନେ ଏପରି କଥା କହୁନ୍ତୁ ନାହିଁ। ଏହା ନିଶ୍ଚୟ ଦାସପୁତ୍ର; କିନ୍ତୁ ପ୍ରତିବିନ୍ଧ୍ୟ ମୋର ନିଜ ପୁତ୍ର।

Verse 30

द्रौपदी बोली--भरतवंशशिरोमणे! यदि आप मुझे वर देते हैं तो मैं यही माँगती हूँ कि सम्पूर्ण धर्मका आचरण करनेवाले राजा युधिष्ठिर दासभावसे मुक्त हो जायेँ। जिससे मेरे मनस्वी पुत्र प्रतिविन्ध्यको अज्ञानवश दूसरे राजकुमार ऐसा न कह सकें कि यह “दासपुत्र' है।। राजपुत्र: पुरा भूत्वा यथा नान्य: पुमान्‌ क्वचित्‌ | राजभिललितस्यथास्य न युक्ता दासपुत्रता,जैसे पहले राजकुमार होकर फिर कोई मनुष्य कभी दासपुत्र नहीं हुआ है, उसी प्रकार राजाओंके द्वारा जिसका लालन-पालन हुआ है, उस मेरे पुत्र प्रतिविन्ध्यका दासपुत्र होना कदापि उचित नहीं है

ଦ୍ରୌପଦୀ କହିଲେ—ହେ ଭରତବଂଶଶିରୋମଣି! ଯଦି ଆପଣ ମୋତେ ବର ଦେବେ, ତେବେ ମୁଁ ଏହି ଅନୁରୋଧ କରୁଛି—ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଧର୍ମାଚରଣରେ ନିଷ୍ଠ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦାସତ୍ୱ ଅବସ୍ଥାରୁ ମୁକ୍ତ ହେଉନ୍ତୁ। ତେବେ ମୋର ମନସ୍ବୀ ପୁତ୍ରମାନେ, ବିଶେଷକରି ପ୍ରତିବିନ୍ଧ୍ୟ, ଅଜ୍ଞାନବଶ ଅନ୍ୟ ରାଜକୁମାରମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ‘ଦାସପୁତ୍ର’ ବୋଲି ଉପହାସିତ ହେବେ ନାହିଁ। ଯେପରି ଏକଥର ରାଜପୁତ୍ର ହୋଇଥିବା ମଣିଷ କେବେ ‘ଦାସଜନ୍ମ’ ବୋଲି ପରିଚିତ ହୁଏ ନାହିଁ, ସେପରି ରାଜମାନଙ୍କ ଲାଳନ-ପାଳନରେ ବଢ଼ିଥିବା ମୋର ପୁତ୍ର ପ୍ରତିବିନ୍ଧ୍ୟଙ୍କୁ ‘ଦାସପୁତ୍ର’ କୁହାଯିବା ସର୍ବଥା ଅଯୋଗ୍ୟ।

Verse 31

धृतराष्ट्र रवाच एवं भवतु कल्याणि यथा त्वमभिभाषसे । द्वितीयं ते वरं भद्रे ददानि वरयस्व ह । मनो हि मे वितरति नैकं त्वं वरमहसि,धृतराष्ट्रने कहा--कल्याणि! तुम जैसा कहती हो, वैसे ही हो। भद्रे! अब मैं तुम्हें दूसरा वर देता हूँ, वह भी माँग लो। मेरा मन मुझे वर देनेके लिये प्रेरित कर रहा है कि तुम एक ही वर पानेके योग्य नहीं हो

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—କଲ୍ୟାଣୀ! ତୁମେ ଯେପରି କହିଛ, ସେପରି ହେଉ। ଭଦ୍ରେ! ମୁଁ ତୁମକୁ ଦ୍ୱିତୀୟ ବର ଦେଉଛି; ତାହା ମାଗ। ମୋର ମନ ଦାନକୁ ପ୍ରେରିତ; ତୁମେ କେବଳ ଗୋଟିଏ ବର ନୁହେଁ, ଅଧିକ ବର ପାଇବାକୁ ଯୋଗ୍ୟ।

Verse 32

द्रौपहुुवाच सरथौ सथनुष्कौ च भीमसेनधनंजयौ । यमौ च वरये राजन्नदासान्‌ स्ववशानहम्‌,द्रौपदी बोली--राजन्‌! मैं दूसरा वर यह माँगती हूँ कि भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव अपने रथ और धनुष-बाणसहित दासभावसे रहित एवं स्वतन्त्र हो जाये

ଦ୍ରୌପଦୀ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ଦ୍ୱିତୀୟ ବର ଭାବେ ମୁଁ ଏହା ଚାହୁଁଛି—ଭୀମସେନ ଓ ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ), ଏବଂ ଯମଜ ନକୁଳ-ସହଦେବ ମଧ୍ୟ, ନିଜ ରଥ ଓ ଧନୁଷ ସହିତ, ଦାସତ୍ୱରୁ ମୁକ୍ତ ହୋଇ ସ୍ୱାଧୀନ ହେଉନ୍ତୁ।

Verse 33

धृतराष्ट उवाच तथास्तु ते महाभागे यथा त्वं नन्दिनीच्छसि । तृतीयं वरयास्मत्तो नासि द्वाभ्यां सुसत्कृता । त्वं हि सर्वस्नुषाणां मे श्रेयसी धर्मचारिणी,धृतराष्ट्रने कहा--महाभागे! तुम अपने कुलको आनन्द प्रदान करनेवाली हो। तुम जैसा चाहती हो, वैसा ही हो। अब तुम तीसरा वर और माँगो। तुम मेरी सब पुत्रवधुओंमें श्रेष्ठ एवं धर्मका पालन करनेवाली हो। मैं समझता हूँ, केवल दो वरोंसे तुम्हारा पूरा सत्कार नहीं हुआ

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ— “ମହାଭାଗେ! ତୁମେ ଯେପରି ଇଚ୍ଛା କର, ସେପରି ହେଉ; ଆନନ୍ଦଦାୟିନୀ! ମୋଠାରୁ ତୃତୀୟ ବର ମଧ୍ୟ ଚୟନ କର; କେବଳ ଦୁଇ ବରରେ ତୁମର ପୂର୍ଣ୍ଣ ସତ୍କାର ହୋଇନାହିଁ। ମୋର ସମସ୍ତ ପୁତ୍ରବଧୂମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ତୁମେ ଶ୍ରେଷ୍ଠା, ଧର୍ମାଚାରିଣୀ; ଦୁଇ ବରରେ ତୁମର ଯଥୋଚିତ ସମ୍ମାନ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇନାହିଁ ବୋଲି ମୁଁ ମନେ କରେ।”

Verse 34

द्रौपहुुवाच लोभो धर्मस्य नाशाय भगवन्‌ नाहमुत्सहे । अनर्ां वरमादातुं तृतीयं राजसत्तम

ଦ୍ରୌପଦୀ କହିଲେ— “ଭଗବନ୍! ଲୋଭ ଧର୍ମର ନାଶ କରେ; ମୁଁ ତୃତୀୟ ବର ଗ୍ରହଣ କରିବାକୁ ସାହସ କରୁନାହିଁ। ରାଜସତ୍ତମ! ତୃତୀୟ ବର ନେବା ଅନର୍ଥକାରୀ ହେବ।”

Verse 35

द्रौपदी बोली--भगवन्‌! लोभ धर्मका नाशक होता है, अतः अब मेरे मनमें वर माँगनेका उत्साह नहीं है। राजशिरोमणे! तीसरा वर लेनेका मुझे अधिकार भी नहीं है ।। एकमाहुर्वैश्यवरं द्वौ तु क्षत्रस्त्रिया वरी त्रयस्तु राज्ञो राजेन्द्र ब्राह्मणस्य शतं वरा:

ଦ୍ରୌପଦୀ କହିଲେ— “ଭଗବନ୍! ଲୋଭ ଧର୍ମର ନାଶକ; ତେଣୁ ଏବେ ମୋ ମନେ ବର ମାଗିବାର ଉତ୍ସାହ ନାହିଁ। ରାଜଶିରୋମଣି! ତୃତୀୟ ବର ନେବାର ଅଧିକାର ମଧ୍ୟ ମୋର ନାହିଁ। କୁହାଯାଏ— ବୈଶ୍ୟ ପାଇଁ ଗୋଟିଏ ବର, କ୍ଷତ୍ରିୟ-ସ୍ତ୍ରୀ ପାଇଁ ଦୁଇ; ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ରାଜା ପାଇଁ ତିନି, ଏବଂ ବ୍ରାହ୍ମଣ ପାଇଁ ଶତ ବର।”

Verse 36

राजेन्द्र! वैश्यको एक वर माँगनेका अधिकार बताया गया है, क्षत्रियकी स्त्री दो वर माँग सकती है, क्षत्रियको तीन वर तथा ब्राह्मणको सौ वर लेनेका अधिकार है ।। पापीयांस इमे भूत्वा संतीर्णा: पतयो मम । वेत्स्यन्ति चैव भद्राणि राजन्‌ पुण्येन कर्मणा,राजन! ये मेरे पति दासभावको प्राप्त होकर भारी विपत्तिमें फँस गये थे। अब उससे पार हो गये। इसके बाद पुण्यकर्मोंके अनुष्ठानद्वारा ये लोग स्वयं कल्याण प्राप्त कर लेंगे

ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ବୈଶ୍ୟ ପାଇଁ ଗୋଟିଏ ବର, କ୍ଷତ୍ରିୟ-ସ୍ତ୍ରୀ ପାଇଁ ଦୁଇ, କ୍ଷତ୍ରିୟ ପାଇଁ ତିନି ଏବଂ ବ୍ରାହ୍ମଣ ପାଇଁ ଶତ ବର ନେବାର ଅଧିକାର ଘୋଷିତ। ରାଜନ୍! ମୋର ପତିମାନେ ଦାସଭାବକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୋଇ ଘୋର ବିପଦରେ ଫସିଥିଲେ; ଏବେ ସେମାନେ ତାହାରୁ ପାର ହୋଇଛନ୍ତି। ପରେ ପୁଣ୍ୟକର୍ମର ଅନୁଷ୍ଠାନ ଦ୍ୱାରା ସେମାନେ ନିଜେ ନିଜ କଲ୍ୟାଣ ପ୍ରାପ୍ତ କରିବେ।

Verse 70

इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत झ्यूतपर्वमें भीमवाक्यविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ଭୀମବାକ୍ୟବିଷୟକ ସତ୍ତରିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 71

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि द्रौपदीवरलाभे एकसप्ततितमो<ध्याय: ।। ७१ || इस प्रकार श्रीमह्ा भारत सभापरववके अन्तर्गत झ्यूतपर्वमें द्रीपदीवरलाभविषयक इकठद्वत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ଦ୍ରୌପଦୀ-ବରଲାଭ ବିଷୟକ ଏକସପ୍ତତିତମ (ଏକହତ୍ତରତମ) ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Frequently Asked Questions

The dilemma is how to contain justified anger after injustice without causing collateral harm; Vidura frames the covered face as restraint so the king’s wrathful gaze does not “burn” ordinary people.

Embodied conduct can serve as ethical communication: each figure signals restraint, preparedness, or privacy, indicating that dharma includes managing one’s power and public impact even when wronged.

Yes: the portents, Nārada’s explicit fourteen-year forecast, and Droṇa’s warning collectively function as interpretive framing that the exile is not a resolution but a deferred reckoning shaped by counsel, conduct, and time.