
अक्षदेवन-प्रवर्तनम् | Commencement of the Dice Game
Upa-parva: Dyūta-Āhvāna (Dice-Invitation) Episode
Chapter 53.0 is a tightly structured dialogue that transitions from invitation to enacted contest. Śakuni announces the assembly is prepared and urges Yudhiṣṭhira to begin play, implying timeliness and readiness as justifications. Yudhiṣṭhira responds with an ethical critique: gambling is framed as sinful deception (nikṛti), lacking kṣātra valor and stable nīti; he warns against victory achieved by cruel or crooked means. Śakuni counters by redefining competence in dice as knowledge of procedure and calculation, normalizing endurance of the game’s processes. Yudhiṣṭhira cites ascetic authority (Asita Devala) to argue that righteous victory belongs to straightforward combat rather than trick-based play, and he emphasizes non-deceptive conduct as a satpuruṣa-vrata. Despite this, he accepts participation due to a vow not to withdraw when challenged and attributes events to overpowering destiny (diṣṭa/vidhi). Duryodhana declares himself the provider of wealth and jewels for the wagering while appointing Śakuni as his agent-player. The narrative frame (Vaiśaṃpāyana) then depicts the court’s convening—Bhīṣma, Droṇa, Kṛpa, Vidura, and other kings—followed by the first wager of ornaments and Śakuni’s immediate declaration of Yudhiṣṭhira’s loss, establishing the chapter’s theme: ethical warning voiced, procedure activated, and institutional witnessing enabling escalation.
Chapter Arc: दुर्योधन धृतराष्ट्र के सम्मुख युधिष्ठिर के राजसूय-अभिषेक का वैभव गिनाने लगता है—कौन-कौन सत्यसंध, महाव्रती, यशस्वी राजा उनके चरणों में उपस्थित थे। → वह एक-एक कर उपहारों और सेवाओं का वर्णन करता है: असंख्य गौएँ, स्वर्ण-विभूषित रथ, श्वेत काम्बोज अश्व, दक्षिणात्य वस्त्र-आभूषण, मगध की सामग्री, गजेन्द्र, जल-कलश, और विविध प्रदेशों की राजकीय भेंटें—यह सब सुनाते-सुनाते उसका स्वर प्रशंसा से जलन में बदलता जाता है। → वैभव की सूची अचानक विषाद-घोष में फट पड़ती है: ‘यह युग मानो अन्धे विधाता से बँधा है—कनीयान बढ़ते हैं, ज्येष्ठ घटते हैं’; युधिष्ठिर की उन्नति देखकर वह स्वयं को कृश, विवर्ण और शोकाकुल बताता है। → धृतराष्ट्र के सामने दुर्योधन का ‘अभिषेक-वर्णन’ वस्तुतः ‘संताप-वर्णन’ बन जाता है—युधिष्ठिर की समृद्धि को वह अपने अपमान और हानि के रूप में अनुभव करता है, और यही भाव आगे की नीति-चालों का बीज बनता है। → दुर्योधन का यह संताप अब किस उपाय में बदलेगा—क्या वह इसे सहन करेगा या छल-प्रपंच का मार्ग चुनेगा?
Verse 1
मिस अल ह्यु हि त्रिपज्चाशत्तमो<ध्याय: दुर्योधनद्वारा युधिष्ठिरके अभिषेकका वर्णन दुर्योधन उवाच आयंस्तु ये वै राजान: सत्यसंधा महाव्रता: । पर्याप्तविद्या वक्तारो वेदोक्तावभूथप्लुता:
ଦୁର୍ୟୋଧନ କହିଲା—ଏଠାକୁ ଯେ ରାଜାମାନେ ଆସିଛନ୍ତି, ସେମାନେ ସତ୍ୟସଙ୍କଳ୍ପୀ, ମହାବ୍ରତଧାରୀ, ବିଦ୍ୟାରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ, ବକ୍ତୃତ୍ୱରେ ନିପୁଣ ଏବଂ ବେଦୋକ୍ତ ମନ୍ତ୍ର-ବିଧାନରେ ପାରଙ୍ଗତ।
Verse 2
धृतिमन्तो दह्वीनिषेवा धर्मात्मानो यशस्विन: । मूर्धाभिषिक्तास्ते चैनं राजान: पर्युपासते
ସେମାନେ ଧୈର୍ୟବାନ, ଅଗ୍ନିସେବାରେ ନିଷ୍ଠାବାନ, ଧର୍ମାତ୍ମା ଓ ଯଶସ୍ବୀ; ରାଜ୍ୟାଭିଷେକରେ ଅଭିଷିକ୍ତ ସେହି ରାଜାମାନେ ଏହି ରାଜାଙ୍କୁ ଘେରି ଶ୍ରଦ୍ଧାରେ ଉପାସନା କରୁଛନ୍ତି।
Verse 3
दक्षिणार्थ समानीता राजभि: कांस्यदोहना: । आरण्या बहुसाहस्रा अपश्यंस्तत्र तत्र गा:
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—“ପିତା! ଦକ୍ଷିଣାର୍ଥେ ରାଜାମାନେ କାଂସ୍ୟ ଦୁଗ୍ଧପାତ୍ରରେ ଦୋହନ ହେବା ଗାଈ ଆଣିଛନ୍ତି; କିନ୍ତୁ ମୁଁ ଏଠି-ସେଠି ଅରଣ୍ୟରେ ମୁକ୍ତ ଚରୁଥିବା ଅନେକ ହଜାର ଗାଈ ଦେଖୁଛି।”
Verse 4
दुर्योधन बोला--पिताजी! जो राजा आर्य, सत्यप्रतिज्ञ, महाव्रती, विद्वान, वक्ता, वेदोक्त यज्ञोंके अन्तमें अवभूथ-स्नान करनेवाले, धैर्यवानू, लज्जाशील, धर्मात्मा, यशस्वी तथा मूर्धाभिषिक्त थे, वे सभी इन धर्मराज युधिष्ठिरकी उपासना करते थे। राजाओंने दक्षिणामें देनेके लिये जो गौएँ मँगवायी थीं, उन सबको मैंने जहाँ-तहाँ देखा। उनके दुग्धपात्र काँसेके थे। वे सब-की-सब जंगलोंमें खुली चरनेवाली थीं तथा उनकी संख्या कई हजार थी।। आजहुस्तत्र सत्कृत्य स्वयमुद्यम्य भारत | अभिषेकार्थमव्यग्रा भाण्डमुच्चावचं नूपा:,भारत! राजालोग युधिष्ठिरके अभिषेकके लिये स्वयं ही प्रयत्न करके शान्तचित्त हो सत्कारपूर्वक छोटे-बड़े पात्र उठा-उठाकर ले आये थे। बाह्नीकनरेश रथ ले आये, जो सुवर्णसे सजाया गया था। सुदक्षिणने उस रथमें काम्बोजदेशके सफेद घोड़े जोत दिये
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—“ପିତା! ଯେ ସମସ୍ତ ରାଜା ଆଚରଣରେ ଆର୍ଯ୍ୟ, ପ୍ରତିଜ୍ଞାରେ ସତ୍ୟନିଷ୍ଠ, ବ୍ରତରେ ମହାନ, ପଣ୍ଡିତ ଓ ବକ୍ତା—ବେଦୋକ୍ତ ଯଜ୍ଞ ସମାପ୍ତ କରି ଶେଷରେ ଅବଭୃଥ-ସ୍ନାନ କରିଥିବା—ଧୈର୍ଯ୍ୟବାନ, ଲଜ୍ଜାଶୀଳ, ଧର୍ମାତ୍ମା, ଯଶସ୍ବୀ ଏବଂ ମୂର୍ଧାଭିଷିକ୍ତ ଶାସକ—ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଉପାସନା କରୁଥିଲେ। ଦକ୍ଷିଣାର୍ଥେ ରାଜାମାନେ ଆଣିଥିବା ଗାଈମାନଙ୍କୁ ମୁଁ ଏଠି-ସେଠି ଛିଟିଯାଇଥିବା ଦେଖିଲି; ସେମାନଙ୍କର ଦୁଗ୍ଧପାତ୍ର କାଂସ୍ୟର, ସେମାନେ ଅରଣ୍ୟରେ ମୁକ୍ତ ଚରୁଥିଲେ, ଏବଂ ସଂଖ୍ୟା ଅନେକ ହଜାର। ଆଜି ମଧ୍ୟ, ହେ ଭାରତ! ସେମାନେ ନିଜେ ଶାନ୍ତଚିତ୍ତ ହୋଇ ସତ୍କାରପୂର୍ବକ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଅଭିଷେକ ପାଇଁ ପ୍ରୟତ୍ନ କରି, ଛୋଟ-ବଡ଼ ନାନା ପାତ୍ର ଉଠାଇ ଆଣିଲେ। ବାହ୍ଲୀକ ରାଜା ସୁବର୍ଣ୍ଣାଲଙ୍କୃତ ରଥ ଆଣିଲେ, ଏବଂ ସୁଦକ୍ଷିଣ ସେହି ରଥରେ କାମ୍ବୋଜଦେଶୀୟ ଶ୍ୱେତ ଅଶ୍ୱ ଯୋଡ଼ିଲେ।”
Verse 5
बाह्लीको रथमाहार्षीज्जाम्बूनदविभूषितम् । सुदक्षिणस्तु युयुजे श्वेतैः काम्बोजजै्हयै:,भारत! राजालोग युधिष्ठिरके अभिषेकके लिये स्वयं ही प्रयत्न करके शान्तचित्त हो सत्कारपूर्वक छोटे-बड़े पात्र उठा-उठाकर ले आये थे। बाह्नीकनरेश रथ ले आये, जो सुवर्णसे सजाया गया था। सुदक्षिणने उस रथमें काम्बोजदेशके सफेद घोड़े जोत दिये
“ବାହ୍ଲୀକ ରାଜା ଜାମ୍ବୂନଦ ସୁବର୍ଣ୍ଣରେ ବିଭୂଷିତ ରଥ ଆଣିଲେ; ଏବଂ ସୁଦକ୍ଷିଣ ସେହି ରଥରେ କାମ୍ବୋଜଦେଶଜ ଶ୍ୱେତ ଅଶ୍ୱ ଯୋଡ଼ିଲେ।”
Verse 6
सुनीथ:ः प्रीतिमांश्वैव हानुकर्ष महाबल: । ध्वजं चेदिपतिश्वैवमहार्षीत् स्वयमुद्यतम्,महाबली सुनीथने बड़ी प्रसन्नताके साथ उसमें अनुकर्ष (रथके नीचे लगनेयोग्य काष्ठ) लगा दिया। चेदिराजने स्वयं उस रथमें ध्वजा फहरा दी। दक्षिणदेशके राजाने कवच दिया। मगधनरेशने माला और पगड़ी प्रस्तुत की। महान् धनुर्धर वसुदानने साठ वर्षकी अवस्थाका एक गजराज उपस्थित कर दिया। मत्स्यनरेशने सुवर्णजटित धुरी ला दी। एकलव्यने पैरोंके समीप जूते लाकर रख दिये। अवन्तीनरेशने अभिषेकके लिये अनेक प्रकारका जल एकत्र कर दिया। चेकितानने तृूणीर और काशिराजने धनुष अर्पित किया। शल्यने अच्छी मूठवाली तलवार तथा छींकेपर रखा हुआ सुवर्णभूषित कलश प्रदान किया
“ମହାବଳୀ ସୁନୀଥ ଆନନ୍ଦରେ ସେହି ରଥରେ ହାନୁକର୍ଷ (ତଳେ ଲଗାଯିବା କାଠ ଅଂଶ) ଲଗାଇଦେଲେ; ଏବଂ ଚେଦିରାଜ ନିଜେ, ପୂର୍ବରୁ ଉଠାଇ ପ୍ରସ୍ତୁତ ଥିବା ଧ୍ୱଜକୁ, ସ୍ଥାପନ କଲେ।”
Verse 7
दाक्षिणात्य: संनहनं स्रगुष्णीषे च मागध: । वसुदानो महेष्वासो गजेन्द्रं षष्टिहायनम्,महाबली सुनीथने बड़ी प्रसन्नताके साथ उसमें अनुकर्ष (रथके नीचे लगनेयोग्य काष्ठ) लगा दिया। चेदिराजने स्वयं उस रथमें ध्वजा फहरा दी। दक्षिणदेशके राजाने कवच दिया। मगधनरेशने माला और पगड़ी प्रस्तुत की। महान् धनुर्धर वसुदानने साठ वर्षकी अवस्थाका एक गजराज उपस्थित कर दिया। मत्स्यनरेशने सुवर्णजटित धुरी ला दी। एकलव्यने पैरोंके समीप जूते लाकर रख दिये। अवन्तीनरेशने अभिषेकके लिये अनेक प्रकारका जल एकत्र कर दिया। चेकितानने तृूणीर और काशिराजने धनुष अर्पित किया। शल्यने अच्छी मूठवाली तलवार तथा छींकेपर रखा हुआ सुवर्णभूषित कलश प्रदान किया
“ଦକ୍ଷିଣଦେଶର ରାଜା ସଂନହନ (ସଜ୍ଜା/କବଚବନ୍ଧନ) ଦେଲେ; ମାଗଧ ରାଜା ମାଳା ଓ ଉଷ୍ଣୀଷ (ପଗଡ଼ି) ଅର୍ପଣ କଲେ। ମହାଧନୁର୍ଧର ବସୁଦାନ ଷଷ୍ଟିବର୍ଷୀୟ ଗଜେନ୍ଦ୍ରକୁ ଆଣି ଉପସ୍ଥାପନ କଲେ।”
Verse 8
मत्स्यस्त्वक्षान् हेमनद्धानेकलव्य उपानहौ । आव्न्त्यस्त्वभिषेकार्थमापो बहुविधास्तथा,महाबली सुनीथने बड़ी प्रसन्नताके साथ उसमें अनुकर्ष (रथके नीचे लगनेयोग्य काष्ठ) लगा दिया। चेदिराजने स्वयं उस रथमें ध्वजा फहरा दी। दक्षिणदेशके राजाने कवच दिया। मगधनरेशने माला और पगड़ी प्रस्तुत की। महान् धनुर्धर वसुदानने साठ वर्षकी अवस्थाका एक गजराज उपस्थित कर दिया। मत्स्यनरेशने सुवर्णजटित धुरी ला दी। एकलव्यने पैरोंके समीप जूते लाकर रख दिये। अवन्तीनरेशने अभिषेकके लिये अनेक प्रकारका जल एकत्र कर दिया। चेकितानने तृूणीर और काशिराजने धनुष अर्पित किया। शल्यने अच्छी मूठवाली तलवार तथा छींकेपर रखा हुआ सुवर्णभूषित कलश प्रदान किया
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା— “ମତ୍ସ୍ୟରାଜ ସୁବର୍ଣ୍ଣରେ ବନ୍ଧା ପାଶା ଆଣିଛନ୍ତି। ଏକଲବ୍ୟ ମୋ ପାଦ ପାଖେ ପାଦୁକା ରଖିଛି। ଅବନ୍ତୀର ରାଜା ଅଭିଷେକ ପାଇଁ ନାନା ପ୍ରକାର ଜଳ ସଂଗ୍ରହ କରିଛନ୍ତି।”
Verse 9
चेकितान उपासड्ले धनु: काश्य उपाहरत् । असिं च सुत्सरुं शल्य: शैक्यं काउ्चनभूषणम्,महाबली सुनीथने बड़ी प्रसन्नताके साथ उसमें अनुकर्ष (रथके नीचे लगनेयोग्य काष्ठ) लगा दिया। चेदिराजने स्वयं उस रथमें ध्वजा फहरा दी। दक्षिणदेशके राजाने कवच दिया। मगधनरेशने माला और पगड़ी प्रस्तुत की। महान् धनुर्धर वसुदानने साठ वर्षकी अवस्थाका एक गजराज उपस्थित कर दिया। मत्स्यनरेशने सुवर्णजटित धुरी ला दी। एकलव्यने पैरोंके समीप जूते लाकर रख दिये। अवन्तीनरेशने अभिषेकके लिये अनेक प्रकारका जल एकत्र कर दिया। चेकितानने तृूणीर और काशिराजने धनुष अर्पित किया। शल्यने अच्छी मूठवाली तलवार तथा छींकेपर रखा हुआ सुवर्णभूषित कलश प्रदान किया
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା— “ଚେକିତାନ ଆଗକୁ ଆସି ଧନୁ ଉପହାର ଦେଲା; କାଶୀରାଜ ମଧ୍ୟ ଧନୁ ଅର୍ପଣ କଲେ। ଶଲ୍ୟ ଉତ୍ତମ ମୁଠିଯୁକ୍ତ ତଳୱାର ଓ ଥାଳି ଉପରେ ରଖା ସୁବର୍ଣ୍ଣଭୂଷିତ କଳଶ ପ୍ରଦାନ କଲେ।”
Verse 10
अभ्यषिज्चत् ततो धौम्यो व्यासश्न सुमहातपा: । नारदं च पुरस्कृत्य देवलं चासितं मुनिम्,तदनन्तर धौम्य तथा महातपस्वी व्यासने देवर्षि नारद, देवल और असित मुनिको आगे करके युधिष्ठिरका अभिषेक किया
ତାପରେ ଧୌମ୍ୟ ଓ ମହାତପସ୍ବୀ ବ୍ୟାସ, ଦେବର୍ଷି ନାରଦଙ୍କୁ ଅଗ୍ରେ ରଖି, ଦେବଲ ଓ ଅସିତ ମୁନିଙ୍କ ସହିତ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଅଭିଷେକ କଲେ।
Verse 11
परशुरामजीके साथ वेदके पारंगत दूसरे विद्वान् महर्षियोंने बड़ी प्रसन्नताके साथ राजा युधिष्ठिरका अभिषेक किया
ପରଶୁରାମଙ୍କ ସହିତ ବେଦପାରଙ୍ଗତ ଅନ୍ୟ ବିଦ୍ୱାନ ମହର୍ଷିମାନେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ହର୍ଷରେ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଅଭିଷେକ କଲେ।
Verse 12
अभिमजममुर्महात्मानो मन्त्रवद् भूरिदक्षिणम् । महेन्द्रमिव देवेन्द्र दिवि सप्तर्षयो यथा
ସେହି ମହାତ୍ମା ଋଷିମାନେ ମନ୍ତ୍ରସହିତ, ବହୁ ଦକ୍ଷିଣାଯୁକ୍ତ ଯଜ୍ଞ ପରି, ତାଙ୍କ ସେବାରେ ଲଗିଲେ—ଯେପରି ସ୍ୱର୍ଗରେ ସପ୍ତର୍ଷି ଦେବରାଜ ମହେନ୍ଦ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କୁ ସେବନ କରନ୍ତି।
Verse 13
प्रीतिमन्त उपातिष्न्नभिषेकं महर्षय: । जामदग्न्येन सहितास्तथान्ये वेदपारगा:,जैसे स्वर्गमें देवराज इन्द्रके पास सप्तर्षि पधारते हैं, उसी प्रकार पर्याप्त दक्षिणा देनेवाले महाराज युधिष्ठिरके पास बहुत-से महात्मा मन्त्रोच्चारण करते हुए पधारे थे ।। अधारयच्छत्रमस्य सात्यकि: सत्यविक्रम: । धनंजयश्न व्यजने भीमसेनश्षू पाण्डव:
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ଯେପରି ସ୍ୱର୍ଗରେ ଦେବରାଜ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ପାଖକୁ ସପ୍ତର୍ଷିମାନେ ଆସନ୍ତି, ସେପରି ପର୍ଯ୍ୟାପ୍ତ ଦକ୍ଷିଣା ଦେଇଥିବା ମହାରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଅଭିଷେକକୁ ଜାମଦଗ୍ନ୍ୟ (ପରଶୁରାମ) ସହ ବେଦପାରଗ ଅନେକ ମହର୍ଷି ମନ୍ତ୍ରୋଚ୍ଚାରଣ କରି କରି ଆସିଲେ। ସେଇ ସମାରୋହରେ ସତ୍ୟବିକ୍ରମୀ ସାତ୍ୟକି ତାଙ୍କ ଉପରେ ରାଜଛତ୍ର ଧରିଲା; ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ଓ ପାଣ୍ଡବ ଭୀମସେନ ବ୍ୟଜନ ଡୁଲାଇ ସେବା କଲେ।
Verse 14
सत्यपराक्रमी सात्यकिने युधिष्ठिरके लिये छत्र धारण किया तथा अर्जुन और भीमसेनने व्यजन डुलाये ।। चामरे चापि शुद्धे द्वे यमौ जगृहतुस्तथा । उपागृह्नाद् यमिन्द्राय पुराकल्पे प्रजापति:
ସତ୍ୟପରାକ୍ରମୀ ସାତ୍ୟକି ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପାଇଁ ଛତ୍ର ଧରିଲା, ଏବଂ ଅର୍ଜୁନ ଓ ଭୀମସେନ ବ୍ୟଜନ ଡୁଲାଇଲେ। ସେହିପରି ଯମଜ ଭାଇ (ନକୁଳ–ସହଦେବ) ଦୁଇଟି ନିର୍ମଳ ଚାମର ମଧ୍ୟ ହାତେ ନେଲେ। କୁହାଯାଏ, ପୂର୍ବକଳ୍ପରେ ପ୍ରଜାପତି ନିଜେ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ପାଇଁ ଏମିତି ବ୍ୟଜନ ଧରିଥିଲେ।
Verse 15
तमस्मै शड्खमाहार्षीद् वारुणं कलशोदधि: । शैक्यं निष्कसहस्रेण सुकृतं विश्वकर्मणा
ତାଙ୍କ ପାଇଁ ସମୁଦ୍ର—ବରୁଣଙ୍କ ଜଳନିଧିର ଭଣ୍ଡାର—ଏକ ଶଙ୍ଖ ଆଣିଦେଲା। ସେ ଶଙ୍ଖ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଶୋଭନ ଓ ସୁନିର୍ମିତ; ବିଶ୍ୱକର୍ମାଙ୍କ ନିର୍ମାଣ, ଏବଂ ତାହାର ମୂଲ୍ୟ ଥିଲା ହଜାର ନିଷ୍କ।
Verse 16
तेनाभिषिक्त: कृष्णेन तत्र मे कश्मलो5भवत् | तथा नकुल और सहदेवने दो विशुद्ध चँवर हाथमें ले लिये। पूर्वकालमें प्रजापतिने इन्द्रके लिये जिस शंखको धारण किया था, वही वरुणदेवताका शंख समुद्रने युधिष्ठिरको भेंट किया था। विश्वकर्माने एक हजार स्वर्णमुद्राओंसे जिस शैक्यपात्र (छींकेपर रखे हुए सुवर्णकलश)-का निर्माण किया था, उसमें स्थित समुद्रजलको शंखमें लेकर श्रीकृष्णने युधिष्ठिरका अभिषेक किया। उस समय वहाँ मुझे मूर्च्छा आ गयी थी ।। गच्छन्ति पूर्वादपरं समुद्र चापि दक्षिणम्
ସେଠାରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଯେତେବେଳେ ତାଙ୍କୁ ଅଭିଷେକ କଲେ, ସେତେବେଳେ ମୋତେ ଭୟଙ୍କର କ୍ଳେଶ ଆବରଣ କଲା। ତା’ପରେ ନକୁଳ ଓ ସହଦେବ ଦୁଇଟି ନିର୍ମଳ ଚାମର ହାତେ ନେଲେ। ପୂର୍ବକାଳରେ ପ୍ରଜାପତି ଯେ ଶଙ୍ଖଟି ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ପାଇଁ ଧରିଥିଲେ—ସେଇ ବରୁଣଙ୍କ ଶଙ୍ଖ—ସମୁଦ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଭେଟ ଦେଲା। ବିଶ୍ୱକର୍ମା ହଜାର ନିଷ୍କ ଖର୍ଚ୍ଚରେ ତିଆରି କରିଥିବା ଶୈକ୍ୟପାତ୍ରର ସୁବର୍ଣ୍ଣକଳଶରେ ଥିବା ସମୁଦ୍ରଜଳକୁ ଶଙ୍ଖରେ ନେଇ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଅଭିଷେକ କଲେ। ସେଇ ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ ମୁଁ ସେଠାରେ ମୂର୍ଛିତ ହୋଇ ପଡ଼ିଲି।
Verse 17
पिताजी! लोग जल लानेके लिये पूर्वसे पश्चिम समुद्रतक जाते हैं, दक्षिण समुद्रकी भी यात्रा करते हैं ।। उत्तरं तु न गच्छन्ति विना तात पतत्त्रिभि: | तत्र सम दध्मु: शतश: शड्खान् मज़्लकारकान्,परंतु उत्तर समुद्रतक पक्षियोंके सिवा और कोई नहीं जाता; (किंतु वहाँ भी अर्जुन पहुँच गये।) वहाँ अभिषेकके समय सैकड़ों मंगलकारी शंख एक साथ ही जोर-जोरसे बजने लगे, जिससे मेरे रोंगटे खड़े हो गये। उस समय वहाँ जो तेजोहीन भूपाल थे, वे भयके मारे मूर्च्छित होकर गिर पड़े
ପିତାଜୀ! ଲୋକେ ଜଳ ଆଣିବାକୁ ପୂର୍ବରୁ ପଶ୍ଚିମ ସମୁଦ୍ର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଯାଆନ୍ତି, ଦକ୍ଷିଣ ସମୁଦ୍ରକୁ ମଧ୍ୟ ଯାତ୍ରା କରନ୍ତି। କିନ୍ତୁ ଉତ୍ତର ସମୁଦ୍ରକୁ ପକ୍ଷୀ ଛଡ଼ା କେହି ଯାଆନ୍ତି ନାହିଁ—ତଥାପି ଅର୍ଜୁନ ସେଠାକୁ ମଧ୍ୟ ପହଞ୍ଚିଗଲା। ସେଠାରେ ଅଭିଷେକ ସମୟରେ ଶତଶଃ ମଙ୍ଗଳକାରୀ ଶଙ୍ଖ ଏକାସାଥିରେ ଭୟଙ୍କର ଧ୍ୱନିରେ ବାଜିଉଠିଲା; ତାହାରେ ମୋର ରୋମାଞ୍ଚ ହେଲା। ଏବଂ ସେଠାରେ ଯେ ତେଜୋହୀନ ଭୂପାଳ ଥିଲେ, ସେମାନେ ଭୟରେ ମୂର୍ଛିତ ହୋଇ ପଡ଼ିଲେ।
Verse 18
प्राणदन्त समाध्मातास्ततो रोमाणि मे5हषन् । प्रापतन् भूमिपालाश्न ये तु हीना: स्वतेजसा,परंतु उत्तर समुद्रतक पक्षियोंके सिवा और कोई नहीं जाता; (किंतु वहाँ भी अर्जुन पहुँच गये।) वहाँ अभिषेकके समय सैकड़ों मंगलकारी शंख एक साथ ही जोर-जोरसे बजने लगे, जिससे मेरे रोंगटे खड़े हो गये। उस समय वहाँ जो तेजोहीन भूपाल थे, वे भयके मारे मूर्च्छित होकर गिर पड़े
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ତେବେ ଶଙ୍ଖଗୁଡ଼ିକ ପୂର୍ଣ୍ଣ ବେଗରେ ଫୁଙ୍କାଯିବା ସହିତ ମୋର ରୋମାଞ୍ଚ ଉଠିଲା। ଯେ ଭୂପାଳମାନେ ନିଜ ତେଜ ଓ ସାହସରେ ହୀନ ଥିଲେ, ସେମାନେ ଭୟରେ ମୂର୍ଛିତ ହୋଇ ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଗଲେ।
Verse 19
धृष्टद्युम्न: पाण्डवाश्व॒ सात्यकि: केशवोडष्टम: । सत्त्वस्था वीर्यसम्पन्ना हाुन्योन्यप्रियदर्शना:,धष्टद्युम्न, पाँचों पाण्डव, सात्यकि और आठवें श्रीकृष्ण--ये ही धैर्यपूर्वक स्थिर रहे। ये सभी पराक्रमसम्पन्न तथा एक-दूसरेका प्रिय करनेवाले हैं
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ, ପାଞ୍ଚ ପାଣ୍ଡବ, ସାତ୍ୟକି ଏବଂ ଅଷ୍ଟମ ଭାବେ କେଶବ (କୃଷ୍ଣ)—ଏମାନେ ମାତ୍ର ଧୈର୍ଯ୍ୟରେ ଅଚଳ ରହିଲେ। ସମସ୍ତେ ବୀର୍ଯ୍ୟସମ୍ପନ୍ନ ଏବଂ ପରସ୍ପର ପ୍ରତି ସ୍ନେହ-ସଦ୍ଭାବ ରଖୁଥିଲେ।
Verse 20
विसंज्ञान् भूमिपान् दृष्टवा मां च ते प्राहसंस्तदा । ततः प्रह्ृष्टो बीभत्सु: प्रादाद्धेमविषाणिनाम्,वे मुझे तथा अन्य राजाओंको अचेत हुए देखकर उस समय जोर-जोरसे हँस रहे थे। भारत! तदनन्तर अर्जुनने प्रसन्न होकर पाँच सौ बैलोंको, जिनके सींगोंमें सोना मँढ़ा हुआ था, मुख्य-मुख्य ब्राह्मणोंमें बाँ- दिया। पिताजी! न रन्तिदेव, न नाभाग, न मान्धाता, न मनु, न वेननन्दन राजा पृथु, न भगीरथ, न ययाति और न नहुष ही वैसे ऐश्वर्यसम्पन्न सम्राट थे, जैसे कि आज राजा युधिष्छिर हैं
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ମୋତେ ଓ ଅନ୍ୟ ରାଜମାନଙ୍କୁ ଭୂମିରେ ଅଚେତ ଦେଖି ସେମାନେ ସେତେବେଳେ ଉଚ୍ଚସ୍ୱରେ ହସିଲେ। ତାପରେ ପ୍ରହୃଷ୍ଟ ବୀଭତ୍ସୁ ଅର୍ଜୁନ ସୁବର୍ଣ୍ଣମଣ୍ଡିତ ଶିଙ୍ଗ ଥିବା ପାଞ୍ଚଶେ ଷାଣ୍ଡକୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ଦାନ କଲେ।
Verse 21
शतान्यनडुहां पज्च द्विजमुख्येषु भारत । न रन्तिदेवो नाभागो यौवनाश्वो मनुर्न च,वे मुझे तथा अन्य राजाओंको अचेत हुए देखकर उस समय जोर-जोरसे हँस रहे थे। भारत! तदनन्तर अर्जुनने प्रसन्न होकर पाँच सौ बैलोंको, जिनके सींगोंमें सोना मँढ़ा हुआ था, मुख्य-मुख्य ब्राह्मणोंमें बाँ- दिया। पिताजी! न रन्तिदेव, न नाभाग, न मान्धाता, न मनु, न वेननन्दन राजा पृथु, न भगीरथ, न ययाति और न नहुष ही वैसे ऐश्वर्यसम्पन्न सम्राट थे, जैसे कि आज राजा युधिष्छिर हैं
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ହେ ଭାରତ! ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପାଞ୍ଚଶେ ଷାଣ୍ଡ ବଣ୍ଟନ ହେଲା। ରନ୍ତିଦେବ, ନାଭାଗ, ଯୌବନାଶ୍ୱ, ମନୁ—କାହାର ପାଖରେ ମଧ୍ୟ ଆଜିର ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପରି ଏପରି ରାଜସମୃଦ୍ଧି ଥିଲା ନାହିଁ।
Verse 22
न च राजा पृथुर्वैन्यो न चाप्पासीद् भगीरथ: । ययातिर्नहुषो वापि यथा राजा युधिष्ठिर:,वे मुझे तथा अन्य राजाओंको अचेत हुए देखकर उस समय जोर-जोरसे हँस रहे थे। भारत! तदनन्तर अर्जुनने प्रसन्न होकर पाँच सौ बैलोंको, जिनके सींगोंमें सोना मँढ़ा हुआ था, मुख्य-मुख्य ब्राह्मणोंमें बाँ- दिया। पिताजी! न रन्तिदेव, न नाभाग, न मान्धाता, न मनु, न वेननन्दन राजा पृथु, न भगीरथ, न ययाति और न नहुष ही वैसे ऐश्वर्यसम्पन्न सम्राट थे, जैसे कि आज राजा युधिष्छिर हैं
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ବେନପୁତ୍ର ରାଜା ପୃଥୁ, ଭଗୀରଥ, ଯୟାତି କିମ୍ବା ନହୁଷ—କାହାର ପାଖରେ ମଧ୍ୟ ଆଜିର ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପରି ରାଜ୍ୟବୈଭବ ଓ ତେଜ ଥିଲା ନାହିଁ।
Verse 23
यथातिमात्र कौन्तेय: श्रिया परमया युतः । राजसूयमवाप्यैवं हरिश्नन्द्र इव प्रभु:,कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर राजसूययज्ञ पूर्ण करके अत्यन्त उच्चकोटिकी राजलक्ष्मीसे सम्पन्न हो गये हैं। ये शक्तिशाली महाराज हरिश्वन्द्रकी भाँति सुशोभित होते हैं
କୁନ୍ତୀନନ୍ଦନ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ରାଜସୂୟ ଯଜ୍ଞ ପ୍ରାପ୍ତ କରି ଅତିଶୟ ଉଚ୍ଚ ରାଜଲକ୍ଷ୍ମୀରେ ଅପରିମିତ ଭାବେ ସମ୍ପନ୍ନ ହୋଇଛନ୍ତି। ସେଇ ପ୍ରବଳ ପ୍ରଭୁ ରାଜା ହରିଶ୍ଚନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ ହୋଇ ଶୋଭା ପାଉଛନ୍ତି।
Verse 24
एतां दृष्टवा श्रियं पार्थे हरिश्वन्द्रे यथा विभो । कथं तु जीवितं श्रेयो मम पश्यसि भारत,भारत! हरिश्वन्द्रकी भाँति कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी इस राजलक्ष्मीको देखकर मेरा जीवित रहना आप किस दृष्टिसे अच्छा समझते हैं?
ହେ ଭାରତ! ହରିଶ୍ଚନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ପରି ପାର୍ଥ (ଯୁଧିଷ୍ଠିର)ଙ୍କ ଏହି ରାଜଶ୍ରୀକୁ ଦେଖି, ମୋର ବଞ୍ଚି ରହିବାକୁ ତୁମେ କିପରି ଶ୍ରେୟସ୍କର ବୋଲି ଭାବୁଛ?
Verse 25
अन्धेनेव युगं॑ नद्धं विपर्यस्तं नराधिप । कनीयांसो विवर्धन्ते ज्येष्ठा हीयन्त एव च,राजन! यह युग अंधे विधातासे बँधा हुआ है। इसीलिये इसमें सब बातें उलटी हो रही हैं। छोटे बढ़ रहे हैं और बड़े हीन दशामें गिरते जा रहे हैं
ହେ ନରାଧିପ! ଏହି ଯୁଗ ମନେ ଅନ୍ଧ ବିଧାତାଙ୍କ ହାତରେ ବାନ୍ଧା ପଡ଼ିଛି; ତେଣୁ ସବୁ କଥା ଓଲଟା ହେଉଛି। କନିଷ୍ଠମାନେ ବଢ଼ୁଛନ୍ତି, ଜ୍ୟେଷ୍ଠମାନେ ତ ନିତ୍ୟ କ୍ଷୟ ପାଉଛନ୍ତି।
Verse 26
एवं दृष्टवा नाभिविन्दामि शर्म समीक्षमाणो<पि कुरुप्रवीर । तेनाहमेवं कृशतां गतश्न विवर्णतां चैव सशोकतां च,कुरुप्रवीर! ऐसा देखकर अच्छी तरह विचार करनेपर भी मुझे चैन नहीं पड़ता। इसीसे मैं दुर्बल, कान्तिहीन और शोकमग्न हो रहा हूँ
ହେ କୁରୁପ୍ରବୀର! ଏହା ସବୁ ଦେଖି ଭଲଭାବେ ବିଚାର କରିଲେ ମଧ୍ୟ ମୋତେ ଶାନ୍ତି ମିଳୁନାହିଁ। ସେହିକାରଣେ ମୁଁ କୃଶ ହୋଇପଡ଼ିଛି; ମୋର ବର୍ଣ୍ଣ-କାନ୍ତି ମଲିନ ହୋଇଛି, ଏବଂ ମୁଁ ଶୋକରେ ଡୁବିଛି।
Verse 53
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे त्रिपठ्चाशत्तमो5ध्याय: ।। ५३ || इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापरववके अन्तर्गत झ्टूतपर्वमें दुर्योधनयंतापविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ-ସନ୍ତାପ ବିଷୟକ ତ୍ରିପଞ୍ଚାଶତ୍ତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Yudhiṣṭhira must choose between his ethical judgment that dyūta is deceptive and socially corrosive, and his vow-bound commitment to not refuse a formal challenge, especially in a public sabhā setting where withdrawal is treated as dishonor.
The chapter illustrates how adharma can operate through socially sanctioned procedures: when institutions prioritize form over fairness, ethical clarity may be expressed yet still fail to prevent harmful outcomes.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-commentary functions narratively through Vaiśaṃpāyana’s court-description, showing that collective witnessing and elite participation confer legitimacy on a process even when its morality is contested.