Adhyaya 46
Sabha ParvaAdhyaya 4636 Verses

Adhyaya 46

Dyūta-kathā-praśnaḥ — Inquiry into the Dice-Game Calamity

Upa-parva: Dyūta-prastāva (Prelude to the Dice-Game)

Janamejaya requests a detailed account of the dice-game that became a major calamity for the brothers (Pāṇḍavas) and asks which kings were present, who supported the event, and who opposed it (1–3). The narrative relay is marked: Sauti introduces Vaiśaṃpāyana’s response to the king’s query (4–5). Dhṛtarāṣṭra, having understood Vidura’s position, speaks privately to Duryodhana, urging restraint and aligning Vidura’s counsel with authoritative instruction (Bṛhaspati) and with a pragmatic warning: gambling generates division, and division leads to the ruin of the kingdom (6–12). Dhṛtarāṣṭra further argues that Duryodhana already possesses inherited sovereignty, education, security, and abundance, and therefore should identify the true root of his distress (13–17). Duryodhana replies with a psychology of status injury: he is not satisfied by “common” prosperity, suffers upon seeing Yudhiṣṭhira’s expansive influence, and recounts humiliating incidents in the sabhā—misrecognitions, laughter by Bhīma and others, a fall into water mistaken for stone, and subsequent mockery—culminating in burning resentment (18–34). He also notes the overwhelming display of rare jewels and tribute, intensifying his sense of exclusion and comparative loss (23–35). The chapter thus anatomizes the shift from ethical counsel to grievance-driven strategy, establishing the motivational substrate for the dice-game initiation.

Chapter Arc: द्यूत के अनिष्ट की छाया पहले ही उतर आती है—धर्मराज युधिष्ठिर के मन में अनजानी चिन्ता उठती है, और उसी समय महर्षि व्यास का आगमन होता है। → युधिष्ठिर भाइयों सहित व्यास का सत्कार करते हैं; व्यास सुवर्णासन पर बैठकर भविष्यसूचक वाणी कहते हैं—राजा को स्वप्न में वृषध्वज, नीलकण्ठ, त्रिपुरान्तक शिव के दर्शन होंगे, और यह संकेत किसी महान् अनर्थ की ओर है। युधिष्ठिर के भीतर यह भय गहराता है कि कहीं समस्त क्षत्रिय-विनाश का कारण वे स्वयं न बन जाएँ। → व्यास की वाणी सुनकर युधिष्ठिर का मन ‘मरणे निश्चिता मति’ जैसा कठोर हो उठता है—वे अपने ही भाग्य-बंधन को देख लेते हैं और यह स्वीकारने लगते हैं कि यदि सर्वक्षत्र-निधन का हेतु बनना ही लिखा है तो वह उनके ही द्वारा होगा; यह आत्म-आरोप और नियति-बोध अध्याय का शिखर है। → युधिष्ठिर व्यास-वचन पर विचार कर भाइयों से परामर्श करते हैं; व्यास विदा लेने की अनुमति माँगते हैं और युधिष्ठिर उन्हें प्रणाम कर विदा करते हैं। विदाई के बाद भी युधिष्ठिर के मन में एक भारी संशय शेष रहता है—जिसका समाधान वे व्यास के अतिरिक्त किसी से नहीं मानते। → व्यास के चले जाने पर युधिष्ठिर का ‘भारी संशय’ खुलकर सामने आता है—आगे वही संशय द्यूत-आह्वान और धर्म-संकट की ओर कथा को धकेलता है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४२ श्लोक मिलाकर कुल ११० श्लोक हैं) नशा (0) आज अत न (द्यूतपर्व) षट्चत्वारिशो< ध्याय: व्यासजीकी भविष्यवाणीसे युधिछिरकी चिन्ता और समत्वपूर्ण बर्ताव करनेकी प्रतिज्ञा वैशम्पायन उवाच समाप्ते राजसूये तु क्रतुश्रेष्ठे सुदुर्लभे । शिष्यै: परिवृतो व्यास: पुरस्तात्‌ समपद्यत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यज्ञोंमें श्रेष्ठ परम दुर्लभ राजसूययज्ञके समाप्त हो जानेपर शिष्योंसे घिरे हुए भगवान्‌ व्यास राजा युधिष्ठिरके पास आये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ଯଜ୍ଞମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଓ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁର୍ଲଭ ରାଜସୂୟ ଯଜ୍ଞ ସମାପ୍ତ ହେବା ପରେ, ଶିଷ୍ୟମାନେ ଘେରିଥିବା ଭଗବାନ ବ୍ୟାସ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ସମ୍ମୁଖକୁ ଆସିଲେ।

Verse 2

सो<भ्ययादासनात्‌ तूर्ण भ्रातृभि: परिवारित: । पाद्येनासनदानेन पितामहमपूजयत्‌,उन्हें देखकर भाइयोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठटिर तुरंत आसनसे उठकर खड़े हो गये और आसन एवं पाद्य आदि समर्पण करके उन्होंने पितामह व्यासजीका यथावत्‌ पूजन किया

ତାଙ୍କୁ ଦେଖି ଭାଇମାନଙ୍କ ଘେରାରେ ଥିବା ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ତୁରନ୍ତ ଆସନରୁ ଉଠି ଦାଁଡ଼ିଲେ ଏବଂ ପାଦ୍ୟ ଓ ଆସନ ଅର୍ପଣ କରି ପିତାମହ ବ୍ୟାସଙ୍କୁ ଯଥାବିଧି ପୂଜା କଲେ।

Verse 3

अथोपविश्य भगवान्‌ काञ्चने परमासने । आस्यतामिति चोवाच धर्मराजं युधिष्ठिरम्‌,तत्पश्चात्‌ सुवर्णमय उत्तम आसनपर बैठकर भगवान्‌ व्यासने धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा --बैठ जाओ”

ତାପରେ ଭଗବାନ ବ୍ୟାସ ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଆସନରେ ବସି ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ କହିଲେ—“ବସ।”

Verse 4

अथोपविष्ट राजानं भ्रातृभि: परिवारितम्‌ | उवाच भगवान्‌ व्यासस्तत्तद्वाक्यविशारद:,भाइयोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिरके बैठ जानेपर बातचीतमें कुशल भगवान्‌ व्यासने उनसे कहा--

ଭାଇମାନଙ୍କ ଘେରାରେ ଥିବା ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ବସିଗଲାପରେ, ସମୟୋଚିତ ବାକ୍ୟରେ ପାରଦର୍ଶୀ ଭଗବାନ ବ୍ୟାସ ତାଙ୍କୁ କହିଲେ—

Verse 5

दिष्ट्या वर्धसि कौन्तेय साम्राज्य प्राप्य दुर्लभम्‌ | वर्धिता: कुरव: सर्वे त्वया कुरुकुलोद्वह,“कुन्तीनन्दन! बड़े आनन्दकी बात है कि तुम परम दुर्लभ सम्राट्का पद पाकर सदा उन्नतिशील हो रहे हो। कुरुकुलका भार वहन करनेवाले नरेश! तुमने समस्त कुरुवंशियोंको समृद्धिशाली बना दिया

“କୌନ୍ତେୟ! ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁର୍ଲଭ ସାମ୍ରାଜ୍ୟ ପଦ ପାଇ ତୁମେ ଉନ୍ନତି କରୁଛ—ଏହା ମହାସୌଭାଗ୍ୟ। କୁରୁକୁଳୋଦ୍ୱହ! ତୁମ ଦ୍ୱାରା ସମସ୍ତ କୁରୁବଂଶୀ ସମୃଦ୍ଧ ହୋଇଛନ୍ତି।”

Verse 6

आपूृच्छे त्वां गमिष्यामि पूजितो5स्मि विशाम्पते । एवमुक्त: स कृष्णेन धर्मराजो युधिष्ठिर:

“ହେ ବିଶାମ୍ପତେ! ମୁଁ ତୁମଠାରୁ ବିଦାୟ ନେଉଛି; ଏବେ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରିବି। ମୋତେ ଯଥୋଚିତ ସମ୍ମାନ ମିଳିଛି।” ଏପରି କୁହାଯାଇଲାପରେ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଉତ୍ତର ଦେଲେ।

Verse 7

युधिछिर उवाच संशयो द्विपदां श्रेष्ठ ममोत्पन्न: सुदुर्लभ:

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ଦ୍ୱିପଦଶ୍ରେଷ୍ଠ! ମୋ ମନରେ ଏକ ସନ୍ଦେହ ଉଦ୍ଭବିଛି; ତାହା ନିର୍ଣ୍ଣୟ କରିବା ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁର୍ଲଭ।

Verse 8

उत्पातांस्त्रिविधान्‌ प्राह नारदो भगवानृषि:

ତେବେ ଭଗବାନ ଋଷି ନାରଦ କହିଲେ—ଉତ୍ପାତ ତିନି ପ୍ରକାର।

Verse 9

दिव्यांश्ैवान्तरिक्षांश्व॒ पार्थिवांश्व पितामह । अपि चैट्यस्य पतनाच्छन्नमौत्पातिकं महत्‌

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ପିତାମହ! କିଛି ଉତ୍ପାତ ଦିବ୍ୟ, କିଛି ଅନ୍ତରିକ୍ଷରେ, ଆଉ କିଛି ପୃଥିବୀରେ ଉଦ୍ଭବେ। ଏହି ଚୈତ୍ୟର ପତନରୁ ମଧ୍ୟ ଏକ ମହାନ—ଗୁପ୍ତ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଗମ୍ଭୀର ଅର୍ଥବହ—ଅପଶକୁନ ପ୍ରକଟ ହୋଇଛି।

Verse 10

पितामह! देवर्षि भगवान्‌ नारदने स्वर्ग, अन्तरिक्ष और पृथ्वीविषयक तीन प्रकारके उत्पात बताये हैं। क्या शिशुपालके मारे जानेसे वे महान्‌ उत्पात शान्त हो गये? ।। वैशम्पायन उवाच राज्ञस्तु वचन श्रुत्वा पराशरसुत: प्रभु: । कृष्णद्वैपायनो व्यास इदं वचनमबत्रवीत्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजा युधिष्ठिरका यह प्रश्न सुनकर पराशरनन्दन कृष्णद्वैपायन भगवान्‌ व्यासने इस प्रकार कहा--

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ଯୁଧିଷ୍ଠିର ପଚାରିଲେ—“ପିତାମହ! ଦେବର୍ଷି ଭଗବାନ ନାରଦ ସ୍ୱର୍ଗ, ଅନ୍ତରିକ୍ଷ ଓ ପୃଥିବୀ-ସମ୍ବନ୍ଧୀୟ ତିନି ପ୍ରକାର ଉତ୍ପାତ ବର୍ଣ୍ଣନା କରିଛନ୍ତି। ଶିଶୁପାଳ ବଧ ପରେ ସେଇ ମହାନ ଉତ୍ପାତଗୁଡ଼ିକ ଶାନ୍ତ ହୋଇଗଲା କି?” ରାଜାଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି ପରାଶରପୁତ୍ର, ପ୍ରଭୁ କୃଷ୍ଣଦ୍ୱୈପାୟନ ବ୍ୟାସ ଏହିପରି କହିଲେ।

Verse 11

त्रयोदश समा राजन्ुत्पातानां फलं महत्‌ | सर्वक्षत्रविनाशाय भविष्यति विशाम्पते,“राजन! उत्पातोंका महान्‌ फल तेरह वर्षोतक हुआ करता है। इस समय जो उत्पात प्रकट हुआ था, वह समस्त क्षत्रियोंका विनाश करनेवाला होगा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ଉତ୍ପାତର ମହାନ ଫଳ ତେର ବର୍ଷରେ ପକ୍କ ହୁଏ ବୋଲି କୁହାଯାଏ। ହେ ପ୍ରଜାପତି! ଏବେ ଯେ ଅପଶକୁନ ପ୍ରକଟ ହୋଇଛି, ସେ ସମସ୍ତ କ୍ଷତ୍ରିୟଙ୍କ ବିନାଶ ଘଟାଇବ।

Verse 12

त्वामेक॑ कारणं कृत्वा कालेन भरतर्षभ | समेत पार्थिव क्षत्रं क्षयं यास्यति भारत । दुर्योधनापराधेन भीमार्जुनबलेन च,“भरतकुलतिलक! एकमात्र तुम्हींको निमित्त बनाकर यथासमय समस्त भूमिपालोंका समुदाय आपसमें लड़कर नष्ट हो जायगा। भारत! क्षत्रियोंका यह विनाश दुर्योधनके अपराधसे तथा भीमसेन और अर्जुनके पराक्रमद्वारा सम्पन्न होगा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! କେବଳ ତୁମକୁ ନିମିତ୍ତ କରି, ଯଥାକାଳେ ସମବେତ ରାଜା ଓ କ୍ଷତ୍ରିୟସମୂହ ବିନାଶକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେବ। ହେ ଭାରତବଂଶଜ! ଏହି କ୍ଷତ୍ରିୟନାଶ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ଅପରାଧରୁ ଏବଂ ଭୀମ-ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ବଳପରାକ୍ରମରୁ ସଂପନ୍ନ ହେବ।

Verse 13

स्वप्रे द्रक्ष्यसि राजेन्द्र क्षपान्ते त्वं वृषध्वजम्‌ | नीलकण्ठं भवं स्थाणुं कपालिं त्रिपुरान्तकम्‌,'राजेन्द्र! तुम रातके अन्तमें स्वप्नमें उन वृषभध्वज भगवान्‌ शंकरका दर्शन करोगे, जो नीलकण्ठ, भव, स्थाणु, कपाली, त्रिपुरान्तक, उग्र, रुद्र, पशुपति, महादेव, उमापति, हर, शर्व, वृष, शूली, पिनाकी तथा कृत्तिवासा कहलाते हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ରାତିର ଶେଷେ ତୁମେ ସ୍ୱପ୍ନରେ ବୃଷଧ୍ୱଜ ଭଗବାନ ଶିବଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ କରିବ— ଯିଏ ନୀଳକଣ୍ଠ, ଭବ, ସ୍ଥାଣୁ, କପାଳୀ ଓ ତ୍ରିପୁରାନ୍ତକ ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ।

Verse 14

उग्र रुद्रे पशुपतिं महादेवमुमापतिम्‌ | हरं शर्व वृषं शूलं पिनाकि कृत्तिवाससम्‌,'राजेन्द्र! तुम रातके अन्तमें स्वप्नमें उन वृषभध्वज भगवान्‌ शंकरका दर्शन करोगे, जो नीलकण्ठ, भव, स्थाणु, कपाली, त्रिपुरान्तक, उग्र, रुद्र, पशुपति, महादेव, उमापति, हर, शर्व, वृष, शूली, पिनाकी तथा कृत्तिवासा कहलाते हैं

ଉଗ୍ର, ରୁଦ୍ର, ପଶୁପତି, ମହାଦେବ, ଉମାପତି; ହର, ଶର୍ବ; ବୃଷଧ୍ୱଜ, ଶୂଳଧାରୀ, ପିନାକଧାରୀ ଓ କୃତ୍ତିବାସ— ଏପରି ଶିବଙ୍କୁ (ତୁମେ ସ୍ୱପ୍ନରେ) ଦର୍ଶନ କରିବ। ହେ ରାଜାଧିରାଜ! ରାତିର ଶେଷେ ତୁମେ ତାଙ୍କୁ ସ୍ୱପ୍ନରେ ଦେଖିବ।

Verse 15

कैलासकूटप्रतिमं वृषभे5वस्थितं शिवम्‌ । निरीक्षमाणं सततं पितृराजाश्रितां दिशम्‌,“उन भगवान्‌ शिवकी कान्ति कैलासशिखरके समान उज्ज्वल होगी। वे वृषभपर आरूढ़ हुए सदा दक्षिण दिशाकी ओर देख रहे होंगे

ତୁମେ ଶିବଙ୍କୁ କୈଲାସଶିଖର ସଦୃଶ ଦୀପ୍ତିମାନ, ବୃଷଭାରୂଢ ଦେଖିବ; ସେ ସଦା ପିତୃରାଜ ଯମଙ୍କ ଅଧୀନ ଦିଗ— ଦକ୍ଷିଣ ଦିଗ— ପ୍ରତି ଦୃଷ୍ଟି ରଖିଥିବେ।

Verse 16

एवमीदृशकं स्वप्न द्रक्ष्यसि त्वं विशाम्पते । मा तत्कृते हानुध्याहि कालो हि दुरतिक्रम:,“राजन! तुम्हें इस प्रकार ऐसा स्वप्न दिखायी देगा, किंतु उसके लिये तुम्हें चिन्ता नहीं करनी चाहिये; क्योंकि काल सबके लिये दुर्लडघ है

ହେ ପ୍ରଜାପତେ! ତୁମେ ଏହିପରି ସ୍ୱପ୍ନ ଦେଖିବ। କିନ୍ତୁ ତାହା ପାଇଁ ଚିନ୍ତା କରନି; କାରଣ କାଳକୁ ଅତିକ୍ରମ କରିବା କାହା ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଦୁର୍ଲଭ।

Verse 17

स्वस्ति ते5स्तु गमिष्यामि कैलासं पर्वतं प्रति । अप्रमत्त: स्थितो दान्त: पृथिवीं परिपालय,“तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं कैलासपर्वतपर जाऊँगा। तुम सावधान एवं जितेन्द्रिय होकर पृथ्वीका पालन करो”

ତୁମର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। ଏବେ ମୁଁ କୈଲାସ ପର୍ବତ ପ୍ରତି ପ୍ରସ୍ଥାନ କରୁଛି। ତୁମେ ସତର୍କ, ଦୃଢ଼ ଓ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ-ନିଗ୍ରହୀ ହୋଇ ପୃଥିବୀର ପାଳନ କର।

Verse 18

वैशम्पायन उवाच एवमुक्‍्त्वा स भगवान्‌ कैलासं पर्वतं ययौ । कृष्णद्वैपायनो व्यास: सह शिष्यै: श्रुतानुगै:,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! ऐसा कहकर भगवान्‌ कृष्ण द्वैपायन व्यास वेदमार्गका अनुसरण करनेवाले अपने शिष्योंके साथ कैलासपर्वतपर चले गये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ଏପରି କହି ଭଗବାନ କୃଷ୍ଣଦ୍ୱୈପାୟନ ବ୍ୟାସ, ବେଦଶ୍ରୁତି-ମାର୍ଗାନୁଗାମୀ ନିଜ ଶିଷ୍ୟମାନଙ୍କ ସହ କୈଲାସ ପର୍ବତକୁ ଗଲେ।

Verse 19

गते पितामहे राजा चिन्ताशोकसमन्वित: । निःश्वसन्नुष्णमसकृत्‌ तमेवार्थ विचिन्तयन्‌,अपने पितामह व्यासजीके चले जानेपर चिन्ता और शोकसे युक्त राजा युधिष्छिर बारंबार गरम साँसें लेते हुए उसी बातका चिन्तन करते रहे। अहो! दैवका विधान पुरुषार्थसे किस प्रकार टाला जा सकता है? महर्षिने जो कुछ कहा है, वह निश्चय ही होगा

ପିତାମହ ଚାଲିଯିବା ପରେ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଚିନ୍ତା ଓ ଶୋକରେ ଆବୃତ ହେଲେ। ସେ ବାରମ୍ବାର ଉଷ୍ଣ ନିଶ୍ୱାସ ଛାଡ଼ି ଏକେ କଥାକୁ ମନେ ମନେ ଚିନ୍ତନ କରୁଥିଲେ।

Verse 20

कथं तु दैवं शक्येत पौरुषेण प्रबाधितुम्‌ । अवश्यमेव भविता यदुक्तं परमर्षिणा,अपने पितामह व्यासजीके चले जानेपर चिन्ता और शोकसे युक्त राजा युधिष्छिर बारंबार गरम साँसें लेते हुए उसी बातका चिन्तन करते रहे। अहो! दैवका विधान पुरुषार्थसे किस प्रकार टाला जा सकता है? महर्षिने जो कुछ कहा है, वह निश्चय ही होगा

ପୁରୁଷାର୍ଥ ଦ୍ୱାରା ଦୈବକୁ କିପରି ରୋକାଯାଇପାରିବ? ପରମର୍ଷି ଯାହା କହିଛନ୍ତି, ତାହା ନିଶ୍ଚୟ ଘଟିବ।

Verse 21

ततोअब्रवीन्महातेजा: सर्वान्‌ भ्रातृन्‌ युधिष्ठिर: । श्रुतं वै पुरुषव्याप्रा यन्मां द्वैधवायनो5ब्रवीत्‌

ତାପରେ ମହାତେଜସ୍ବୀ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସମସ୍ତ ଭ୍ରାତାଙ୍କୁ କହିଲେ—“ହେ ପୁରୁଷବ୍ୟାଘ୍ରମାନେ! ଦ୍ୱୈଧବାୟନ ମୋତେ ଯାହା କହିଥିଲେ, ମୁଁ ତାହା ଶୁଣିଛି।”

Verse 22

तदा तद्वचन श्रुत्वा मरणे निश्चिता मति: । सर्वक्षत्रस्य निधने यद्य॒हं हेतुरीप्सित:

ସେଇ କଥା ଶୁଣି ତାଙ୍କର ମନ ମୃତ୍ୟୁରେ ଦୃଢ଼ ହେଲା—“ଯଦି ସମସ୍ତ କ୍ଷତ୍ରିୟଙ୍କ ବିନାଶର କାରଣ ଭାବେ ମୋତେ ହିଁ ଇଚ୍ଛା କରାଯାଇଛି, ତେବେ ତାହା ହେଉ।”

Verse 23

कालेन निर्मितस्तात को ममार्थो5स्ति जीवत: । एवं ब्रुवन्तं राजानं फाल्गुन: प्रत्यभाषत

“ତାତ! ସବୁକିଛି କାଳ ଦ୍ୱାରା ନିର୍ମିତ ଓ ନିୟନ୍ତ୍ରିତ ହେଲେ, ମୋର ଜୀବିତ ରହିବାର କ’ଣ ପ୍ରୟୋଜନ?” ଏଭଳି କହୁଥିବା ରାଜାଙ୍କୁ ଫାଲ୍ଗୁନ (ଅର୍ଜୁନ) ପ୍ରତିଉତ୍ତର ଦେଲେ।

Verse 24

यही सोचते-सोचते महातेजस्वी युधिष्ठिरने अपने सब भाइयोंसे कहा--'पुरुषसिंहो! महर्षि व्यासने मुझसे जो कहा है, उसे तुमलोगोंने सुना है न? उनकी वह बात सुनकर मैंने मरनेका निश्चय कर लिया है। तात! यदि समस्त क्षत्रियोंके विनाशमें विधाताने मुझे ही निमित्त बनानेकी इच्छा की है, कालने मुझे ही इस अनर्थका कारण बनाया है तो मेरे जीवनका क्‍या प्रयोजन है?” राजाकी ऐसी बातें सुनकर अर्जुनने उत्तर दिया-- || २१-- २३ || मा राजन्‌ कश्मलं घोर प्रविशो बुद्धिनाशनम्‌ । सम्प्रधार्य महाराज यत्‌ क्षेमं तत्‌ समाचर,“राजन्‌! इस भयंकर मोहमें न पड़िये, यह बुद्धिको नष्ट करनेवाला है। महाराज! अच्छी तरह सोच-विचारकर आपको जो कल्याणप्रद जान पड़े, वह कीजिये”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଏଭଳି ଚିନ୍ତା କରୁଥିବା ମହାତେଜସ୍ବୀ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସମସ୍ତ ଭାଇଙ୍କୁ କହିଲେ—“ପୁରୁଷସିଂହମାନେ! ମହର୍ଷି ବ୍ୟାସ ମୋତେ ଯାହା କହିଥିଲେ, ତୁମେ ଶୁଣିଛ। ସେ କଥା ଶୁଣି ମୁଁ ମୃତ୍ୟୁକୁ ନିଶ୍ଚୟ କରିଛି। ପ୍ରିୟମାନେ! ଯଦି ବିଧାତା ସମସ୍ତ କ୍ଷତ୍ରିୟଙ୍କ ବିନାଶରେ ମୋତେ ହିଁ ନିମିତ୍ତ କରିବାକୁ ଚାହାନ୍ତି, ଯଦି କାଳ ମୋତେ ହିଁ ଏହି ଅନର୍ଥର କାରଣ କରିଛି, ତେବେ ମୋ ଜୀବନର କ’ଣ ପ୍ରୟୋଜନ?” ରାଜାଙ୍କ ଏହି କଥା ଶୁଣି ଅର୍ଜୁନ ଉତ୍ତର ଦେଲେ—“ରାଜନ! ବୁଦ୍ଧିନାଶକ ଏହି ଭୟଙ୍କର ବିଷାଦରେ ପ୍ରବେଶ କରନ୍ତୁ ନାହିଁ। ମହାରାଜ! ଭଲଭାବେ ବିଚାର କରି ଯାହା କ୍ଷେମକର, ସେହି କରନ୍ତୁ।”

Verse 25

ततोअब्रवीत्‌ सत्यधृतिर्भ्रातृन्‌ सर्वान्‌ युधिष्ठिर: । द्वैपायनस्य वचन होवं समनुचिन्तयन्‌,तब सत्यवादी युधिष्ठिरने अपने सब भाइयोंसे व्यासजीकी बातोंपर विचार करते हुए कहा--

ତାପରେ ସତ୍ୟରେ ଦୃଢ଼ ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ଦ୍ୱୈପାୟନ (ବ୍ୟାସ)ଙ୍କ ବଚନକୁ ଭଲଭାବେ ଚିନ୍ତା କରି, ସମସ୍ତ ଭାଇଙ୍କୁ ସମ୍ବୋଧନ କଲେ।

Verse 26

अद्यप्रभृति भद्रें वः प्रतिज्ञां मे निबोधत । त्रयोदश समास्तात को ममार्थो5स्ति जीवत:,“तात! तुमलोगोंका कल्याण हो, भाइयोंके विनाशका कारण बननेके लिये मुझे तेरह वर्षोतक जीवित रहनेसे क्या लाभ? यदि जीना ही है तो आजसे मेरी यह प्रतिज्ञा सुन लो --

“ଆଜିଠାରୁ, ଭଦ୍ରମାନେ, ମୋର ପ୍ରତିଜ୍ଞା ଜାଣ। ତାତ! ଯଦି ମୋର ଜୀବିତ ରହିବା ଭାଇମାନଙ୍କ ବିନାଶର କାରଣ ହୁଏ, ତେବେ ତେର ବର୍ଷ ଜୀବିତ ରହିବାରେ ମୋର କ’ଣ ଲାଭ?”

Verse 27

न प्रवक्ष्यामि परुषं भ्रातृनन्यांश्व पार्थिवान्‌ । स्थितो निदेशे ज्ञातीनां योक्ष्ये तत्‌ समुदाहरन्‌,“मैं अपने भाइयों तथा दूसरे राजाओंसे कभी कड़वी बात नहीं बोलूँगा। बन्धु- बान्धवोंकी आज्ञामें रहकर प्रसन्नतापूर्वक उनकी मुँहमाँगी वस्तुएँ लानेमें संलग्न रहूँगा'

ମୁଁ ମୋ ଭାଇମାନଙ୍କୁ କିମ୍ବା ଅନ୍ୟ ରାଜାମାନଙ୍କୁ କେବେ ମଧ୍ୟ କଠୋର କଥା କହିବି ନାହିଁ। ନିଜ ଜ୍ଞାତିମାନଙ୍କ ନିର୍ଦ୍ଦେଶରେ ରହି, ସେମାନେ ଯାହା ଚାହିବେ ତାହା ଆଣି ଯୋଗାଇବାରେ ଆନନ୍ଦରେ ଲାଗି ରହିବି।

Verse 28

एवं मे वर्तमानस्य स्वसुतेष्वितरेषु च । भेदो न भविता लोके भेदमूलो हि विग्रह:,“इस प्रकार समतापूर्ण बर्ताव करते हुए मेरा अपने पुत्रों तथा दूसरोंके प्रति भेदभाव न होगा; क्योंकि जगतमें लड़ाई-झगड़ेका मूल कारण भेदभाव ही है

ଏଭଳି ସମଭାବରେ ଚାଲିଲେ ମୋର ନିଜ ପୁଅମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଓ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ପ୍ରତି କୌଣସି ପକ୍ଷପାତ ରହିବ ନାହିଁ; କାରଣ ଏହି ଲୋକରେ ବିବାଦ-କଳହର ମୂଳ କାରଣ ହେଉଛି ଭେଦଭାବ।

Verse 29

विग्रहं दूरतो रक्षन्‌ प्रियाण्येव समाचरन्‌ | वाच्यतां न गमिष्यामि लोकेषु मनुजर्षभा:,“नररत्नो! विग्रह या वैर-विरोधको अपनेसे दूर ही रखकर सबका प्रिय करते हुए मैं संसारमें निन्दाका पात्र नहीं हो सकूँगा”

ହେ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ! ବିଗ୍ରହ-ବୈରକୁ ଦୂରେ ରଖି, ସମସ୍ତଙ୍କୁ ପ୍ରିୟ ଲାଗେ ଏମିତି ଆଚରଣ କଲେ, ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମୁଁ ନିନ୍ଦାର ପାତ୍ର ହେବି ନାହିଁ।

Verse 30

भ्रातुर्ज्येष्स्य वचनं पाण्डवा: संनिशम्य तत्‌ | तमेव समवर्तन्त धर्मराजहिते रता:,अपने बड़े भाईकी वह बात सुनकर सब पाण्डव उन्हींके हितमें तत्पर हो सदा उनका ही अनुसरण करने लगे

ଜ୍ୟେଷ୍ଠ ଭାଇଙ୍କ ସେହି କଥା ଶୁଣି ସମସ୍ତ ପାଣ୍ଡବ ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ହିତରେ ରତ ହୋଇ, କେବଳ ତାଙ୍କୁ ହିଁ ଅନୁସରଣ କରିଲେ।

Verse 31

संसत्सु समयं कृत्वा धर्मराड्‌ भ्रातृभि: सह | पितृंस्तर्प्प यथान्यायं देवताश्न विशाम्पते,राजन! धर्मराजने अपने भाइयोंके साथ भरी सभामें यह प्रतिज्ञा करके देवताओं तथा पितरोंका विधिपूर्वक तर्पण किया

ହେ ରାଜନ୍! ଭରା ସଭାରେ ପ୍ରତିଜ୍ଞା କରି, ଧର୍ମରାଜ ଭାଇମାନଙ୍କ ସହିତ ବିଧିମତେ ଦେବତାମାନଙ୍କୁ ଓ ପିତୃମାନଙ୍କୁ ତର୍ପଣ କଲେ।

Verse 32

कृतमड़लकल्याणो भ्रातृभि: परिवारित: । गतेषु क्षत्रियेन्द्रेषु सर्वेषु भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ जनमेजय! समस्त क्षत्रियोंक चले जानेपर कल्याणमय मांगलिक कृत्य पूर्ण करके भाइयोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिरने मन्त्रियोंक साथ अपने उत्तम नगरमें प्रवेश किया। महाराज! दुर्योधन तथा सुबलपुत्र शकुनि ये दोनों उस रमणीय सभामें ही रह गये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ସମସ୍ତ ପ୍ରଧାନ କ୍ଷତ୍ରିୟ ରାଜାମାନେ ଚାଲିଯାଇଥିବା ପରେ, ମଙ୍ଗଳମୟ କ୍ରିୟା ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ କରି ଭାଇମାନଙ୍କ ଘେରାରେ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହିତ ନିଜ ଉତ୍ତମ ନଗରକୁ ପ୍ରବେଶ କଲେ। କିନ୍ତୁ ମହାରାଜ! ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଓ ସୁବଳପୁତ୍ର ଶକୁନି ସେଇ ରମଣୀୟ ସଭାଗୃହରେ ହିଁ ରହିଗଲେ—ବାହ୍ୟ ଶୁଭାଚାର ପଛରେ ଅନ୍ତର୍ନିହିତ ଅଭିସନ୍ଧିର ଅଶୁଭ ଇଙ୍ଗିତ ଭଳି।

Verse 33

युधिष्ठिर: सहामात्य: प्रविवेश पुरोत्तमम्‌ दुर्योधनो महाराज शकुनिश्चापि सौबल: । सभायां रमणीयायां तत्रैवास्ते नराधिप,भरतश्रेष्ठ जनमेजय! समस्त क्षत्रियोंक चले जानेपर कल्याणमय मांगलिक कृत्य पूर्ण करके भाइयोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिरने मन्त्रियोंक साथ अपने उत्तम नगरमें प्रवेश किया। महाराज! दुर्योधन तथा सुबलपुत्र शकुनि ये दोनों उस रमणीय सभामें ही रह गये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯୁଧିଷ୍ଠିର ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହିତ ନିଜ ଉତ୍ତମ ନଗରକୁ ପ୍ରବେଶ କଲେ। କିନ୍ତୁ ମହାରାଜ! ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଓ ସୌବଳ ଶକୁନି ସେଇ ରମଣୀୟ ସଭାରେ ହିଁ ସେଠାରେ ରହିଗଲେ। ଧର୍ମସମ୍ମତ ଶାସନକୁ ଫେରୁଥିବା ରାଜାଙ୍କ ଗତି ଓ ଶୀଘ୍ର ଏହି ସଭାକୁ ଛଳ-ପତନର ମଞ୍ଚ କରିବା ଲୋକମାନଙ୍କ ଅଟକିଥିବା ଉପସ୍ଥିତି—ଏହି ଦୁଇଟିର ନିରବ ବିରୋଧ ଏଠାରେ ଦେଖାଯାଏ।

Verse 46

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि युधिष्ठिरसमये षट्चत्वारिंशो5ध्याय: ।। ४६ || इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत झ्वूतपर्वमें युधिष्ठिर-प्रतिज्ञाविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର-ପ୍ରସଙ୍ଗ ବିଷୟକ ଛୟାଳିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 66

अभिवाद्योपसंगृह्‌ पितामहमथाब्रवीत्‌ । “राजन! अब मैं जाऊँगा। इसके लिये तुम्हारी अनुमति चाहता हूँ। तुमने मेरा अच्छी तरह सम्मान किया है।' महात्मा कृष्णद्वैपायन व्यासके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्छिरने उन पितामहके दोनों चरणोंको पकड़कर प्रणाम किया और कहा

ତାପରେ ପିତାମହ (ବ୍ୟାସ)ଙ୍କୁ ଅଭିବାଦନ କରି ସମୀପକୁ ଯାଇ ସେ କହିଲେ—“ରାଜନ! ଏବେ ମୁଁ ଯିବାକୁ ଚାହୁଁଛି; ତାହା ପାଇଁ ଆପଣଙ୍କ ଅନୁମତି ଚାହୁଁଛି। ଆପଣ ମୋତେ ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ସତ୍କାର କରିଛନ୍ତି।” ମହାତ୍ମା କୃଷ୍ଣଦ୍ୱୈପାୟନ ବ୍ୟାସ ଏପରି କହିବା ସହିତ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ପିତାମହଙ୍କ ଦୁଇ ପାଦ ଧରି ପ୍ରଣାମ କରି କହିଲେ—

Verse 73

तस्य नान्यो<स्ति वक्ता वै त्वामृते द्विजपुड़व । युधिष्ठिर बोले--नरश्रेष्ठ! मेरे मनमें एक भारी संशय उत्पन्न हो गया है। विप्रवर! आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो उसका समाधान कर सके

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ମୋ ମନରେ ଏକ ଗୁରୁତର ସନ୍ଦେହ ଉଦ୍ଭବ ହୋଇଛି। ହେ ବ୍ରହ୍ମର୍ଷିଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଆପଣ ବ୍ୟତୀତ ଏଠାରେ ଅନ୍ୟ କେହି ନାହିଁ, ଯେ କଥାଦ୍ୱାରା ତାହାର ସମାଧାନ କରିପାରିବେ।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether state leadership should privilege prudent counsel and social cohesion by rejecting dyūta, or permit a prestige-driven contest that predictably produces factional division and institutional harm.

The chapter teaches that envy and reputational injury, when ungoverned, can override welfare-oriented reasoning; wise counsel is identifiable by its long-term, stability-centered orientation rather than by its alignment with immediate desires.

No explicit phalaśruti appears in this excerpt; the meta-function is causal and diagnostic—positioning dyūta and unrestrained resentment as roots of systemic collapse within the epic’s broader dharma inquiry.