
Adhyāya 45 — Duryodhana’s Distress, Śakuni’s Counsel, and the Summons for Dyūta
Upa-parva: Dyūta-prastāva (Prelude to the Dice-Game) — Śakuni–Duryodhana Counsel
Vaiśaṃpāyana narrates the post-rājasūya aftermath in which Duryodhana’s visible deterioration is interpreted by Śakuni as the psychosocial effect of witnessing Yudhiṣṭhira’s prosperity. Dhṛtarāṣṭra questions the basis of his son’s grief, listing the privileges and comforts already granted to him. Duryodhana responds with an explicit theory of ambition: contentment and compassion impede attainment, and the sight of a rival’s flourishing produces continuous agitation. He details the scale of Yudhiṣṭhira’s resources—numbers of householders supported, quantities of daily provisions, luxury textiles, animals, and the influx of diverse tribute—culminating in a confession that this abundance prevents him from finding peace. Śakuni then proposes a method to ‘acquire’ that prosperity through a dice match, stressing Yudhiṣṭhira’s fondness for gaming and lack of expertise. Duryodhana requests Dhṛtarāṣṭra’s authorization; Dhṛtarāṣṭra initially invokes Vidura’s advisory role but yields under Duryodhana’s emotional pressure. Orders are issued to prepare a grand hall and gaming arrangements, and Vidura is dispatched to bring Yudhiṣṭhira from Khāṇḍavaprastha, while Vidura internally recognizes the approach of a destructive turning point.
Chapter Arc: राजसूय-यज्ञ की दिव्य सभा में, जहाँ युधिष्ठिर का यश शिखर पर है, वहीं शिशुपाल की कटु वाणी धर्म-सभा को रण-सभा बनाने को उद्यत होती है। → शिशुपाल श्रीकृष्ण को ललकारता है—‘जनार्दन! मेरे साथ युद्ध करो; आज मैं तुम्हें और पाण्डवों को मार दूँगा’—और यह भी कहता है कि पाण्डवों ने अन्य राजाओं को लाँघकर कृष्ण का पूजन कर अपमान किया है। सभा में राजाओं के मन में क्रोध, आश्चर्य और भय एक साथ उठते हैं; कृष्ण की मर्यादा-धारण और सहनशीलता की सीमा पर सबकी दृष्टि टिक जाती है। → शिशुपाल की निरन्तर निन्दा के बाद, क्रुद्ध होकर श्रीकृष्ण सुदर्शन चक्र से उसी क्षण उसका शिरच्छेद कर देते हैं; और सब देखते हैं कि शिशुपाल का तेज/प्राण-तत्त्व पुरुषोत्तम में विलीन हो जाता है—यह दृश्य राजाओं को विस्मित कर देता है। → सभा में ऋषि, ब्राह्मण और नरेश कृष्ण के पराक्रम और न्याय-स्थापन की प्रशंसा करते हैं; राजसूय-यज्ञ की समाप्ति होती है। तत्पश्चात् ब्राह्मणों, राजाओं का सत्कार-विदा होता है और श्रीकृष्ण द्वारका के लिए प्रस्थान करते हैं; पीछे दिव्य सभा में दुर्योधन और शकुनि ठहरते हैं। → कृष्ण के प्रस्थान के बाद दुर्योधन-शकुनि का सभा में ठहरना भविष्य के षड्यन्त्र का बीज बो देता है।
Verse 1
ऑपन--रा_ज छा लॉस: पजञज्चचत्वारिशो< ध्याय: श्रीकृष्णके द्वारा शिशुपालका वध, राजसूययज्ञकी समाप्ति तथा सभी ब्राह्मणों, राजाओं और श्रीकृष्णका स्वदेशगमन वैशम्पायन उवाच ततः श्रुत्वैव भीष्मस्य चेदिराडुरुविक्रम: । युयुत्सुर्वासुदेवेन वासुदेवमुवाच ह,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भीष्मकी यह बात सुनते ही महापराक्रमी चेदिराज शिशुपाल भगवान् वासुदेवके साथ युद्धके लिये उत्सुक हो उनसे इस प्रकार बोला --
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ତାପରେ ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣିମାତ୍ରେ ମହାପରାକ୍ରମୀ ଚେଦିରାଜ ଶିଶୁପାଳ, ବାସୁଦେବଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ଉତ୍ସୁକ ହୋଇ, ବାସୁଦେବଙ୍କୁ ଏହିପରି କହିଲା।
Verse 2
आह्वये त्वां रणं गच्छ मया सार्ध जनार्दन । यावदद्य निहन्मि त्वां सहितं सर्वपाण्डवै:,“'जनार्दन! मैं तुम्हें बुला रहा हूँ आओ, मेरे साथ युद्ध करो, जिससे आज मैं समस्त पाण्डवोंसहित तुम्हें मार डालूँ
ଜନାର୍ଦନ! ମୁଁ ତୁମକୁ ଯୁଦ୍ଧକୁ ଆହ୍ୱାନ କରୁଛି—ମୋ ସହ ରଣକ୍ଷେତ୍ରକୁ ଆସ। ଆଜି ଦିନ ଶେଷ ହେବା ପୂର୍ବରୁ ମୁଁ ତୁମକୁ ସମସ୍ତ ପାଣ୍ଡବ ସହିତ ନିହତ କରିଦେବି।
Verse 3
सह त्वया हि मे वध्या: सर्वथा कृष्ण पाण्डवा: | नृपतीन् समतिक्रम्य यैरराजा त्वमर्चित:,“कृष्ण! तुम्हारे साथ ये पाण्डव भी सर्वथा मेरे वध्य हैं; क्योंकि इन्होंने सब राजाओंकी अवहेलना करके राजा न होनेपर भी तुम्हारी पूजा की
ହେ କୃଷ୍ଣ! ତୁମ ସହିତ ଏହି ପାଣ୍ଡବମାନେ ମଧ୍ୟ ସର୍ବଥା ମୋର ବଧ୍ୟ; କାରଣ ସେମାନେ ସମବେତ ରାଜମାନଙ୍କୁ ଅବହେଳା କରି, ରାଜା ନ ହୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ ତୁମକୁ ପୂଜା କରି ସମ୍ମାନ ଦେଇଥିଲେ।
Verse 4
ये त्वां दासमराजानं बाल्यादर्चन्ति दुर्मतिम् अनर्हमर्हवत् कृष्ण वध्यास्त इति मे मति:,“तुम कंसके दास थे तथा राजा भी नहीं हो, इसीलिये राजोचित पूजाके अनधिकारी हो। तो भी कृष्ण! जो लोग मूर्खतावश तुम-जैसे दुर्बुद्धिकी पूजनीय पुरुषकी भाँति पूजा करते हैं, वे अवश्य ही मेरे वध्य हैं, मैं तो ऐसा ही मानता हूँ”
ହେ କୃଷ୍ଣ! ଯେମାନେ ତୁମକୁ—ଶୈଶବକାଳରୁ ଦାସ ଓ ରାଜା ନୁହେଁ—ଅନର୍ହ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଅର୍ହ ଭାବି ରାଜୋଚିତ ସମ୍ମାନରେ ପୂଜନ କରନ୍ତି, ସେମାନେ ମୋ ମତରେ ବଧ୍ୟ; ଏହି ମୋର ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟ।
Verse 5
एवमुक्तस्तत: कृष्णो मृदुपूर्वमिदं वच: । उवाच पार्थिवान् सर्वान् स समक्ष च वीर्यवान्,शिशुपालके ऐसा कहनेपर अनन्तपराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णने उसके सामने समस्त राजाओंसे मधुर वाणीमें कहा--
ଏପରି କୁହାଯାଇଲା ପରେ ପରାକ୍ରମଶାଳୀ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ପ୍ରଥମେ ମୃଦୁଭାବରେ ଏହି ବଚନ କହିଲେ ଏବଂ ଶିଶୁପାଳଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ହିଁ ସମସ୍ତ ରାଜମାନଙ୍କୁ ସମ୍ବୋଧନ କଲେ।
Verse 6
एष न: शत्रुसत्यन्तं पार्थिवा: सात्वतीसुत: । सात्वतानां नृशंसात्मा न हितोडनपकारिणाम्,'भूमिपालो! यह है तो यदुकुलकी कन्याका पुत्र, परंतु हमलोगोंसे अत्यन्त शत्रुता रखता है। यद्यपि यादवोंने इसका कभी कोई अपराध नहीं किया है, तो भी यह क्रूरात्मा उनके अहितमें ही लगा रहता है
ହେ ରାଜମାନେ! ସାତ୍ୱତୀ-ସୁତ ଏହି ବ୍ୟକ୍ତି ଆମ ପ୍ରତି ଅତ୍ୟନ୍ତ ଶତ୍ରୁତା ଧରିଛି। ସାତ୍ୱତମାନେ (ଯାଦବମାନେ) ଏହାର କୌଣସି ଅପକାର କରିନାହାନ୍ତି, ତଥାପି ନୃଶଂସ ଆତ୍ମା ଏହି ଲୋକ ସେମାନଙ୍କ ଅହିତରେ ହିଁ ଲାଗି ରହେ।
Verse 7
प्राग्ज्योतिषपुरं यातानस्मान् ज्ञात्वा नृशंसकृत् अदहद् द्वारकामेष स्वस्रीय: सन् नराधिपा:,“नरेश्वरो! हम प्राग्ज्योतिषपुरमें गये थे, यह बात जब इसे मालूम हुई, तब इस क्रूरकर्माने मेरे पिताजीका भानजा होकर भी द्वारकामें आग लगवा दी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଆମେ ପ୍ରାଗ୍ଜ୍ୟୋତିଷପୁରକୁ ଯାଇଥିବା କଥା ଜାଣି ସେ ନୃଶଂସ ରାଜା, ମୋ ପିତାଙ୍କ ଭଉଣୀପୁଅ ହେଉଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ଦ୍ୱାରକାରେ ଅଗ୍ନି ଲଗାଇଦେଲା।
Verse 8
क्रीडतो भोजराजस्य एष रैवतके गिरौ | हत्वा बद्ध्वा च तान् सर्वानुपायात् स्वपुरं पुरा,“एक बार भोजराज (उग्रसेन) रैवतक पर्वतपर क्रीड़ा कर रहे थे। उस समय यह वहीं जा पहुँचा और उनके सेवकोंको मारकर तथा शेष व्यक्तियोंको कैद करके उन सबको अपने नगरमें ले गया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଭୋଜରାଜ (ଉଗ୍ରସେନ) ରୈବତକ ପର୍ବତରେ କ୍ରୀଡ଼ା କରୁଥିବାବେଳେ ଏହି ଲୋକ ସେଠାକୁ ଆସିଲା; କିଛି ସେବକଙ୍କୁ ହତ୍ୟା କରି, ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ବାନ୍ଧି, ସମସ୍ତଙ୍କୁ ନିଜ ନଗରକୁ ନେଇଗଲା।
Verse 9
अश्रमेधे हयं मेध्यमुत्सूष्टं रक्षिभि्वृतम् । पितुर्मे यज्ञविघ्नार्थमहरत् पापनिश्चय:,“मेरे पिताजी अश्वमेधयज्ञकी दीक्षा ले चुके थे। उसमें रक्षकोंसे घिरा हुआ पवित्र अश्व छोड़ा गया था। इस पापपूर्ण विचारवाले दुष्टात्माने पिताजीके यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये उस अश्वको भी चुरा लिया था
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମୋ ପିତା ଅଶ୍ୱମେଧ ଯଜ୍ଞରେ ଦୀକ୍ଷିତ ଥିଲେ; ରକ୍ଷୀମାନଙ୍କ ଘେରାରେ ପବିତ୍ର ଅଶ୍ୱଟି ଛାଡ଼ାଯାଇଥିଲା। ତଥାପି ପାପନିଶ୍ଚୟୀ ସେ ଦୁଷ୍ଟ ଯଜ୍ଞରେ ବିଘ୍ନ ପାଇଁ ଅଶ୍ୱଟିକୁ ଅପହରଣ କଲା।
Verse 10
सौवीरान् प्रति यातां च बभ्रोरेष तपस्विन: । भार्यामभ्यहरन्मोहादकामां तामितो गताम्,“इतना ही नहीं, इसने तपस्वी बभ्रुकी पत्नीका, जो यहाँसे द्वारका जाते समय सौवीरदेश पहुँची थी और इसके प्रति जिसके मनमें तनिक भी अनुराग नहीं था, मोहवश अपहरण कर लिया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଏତିକି ନୁହେଁ; ଏଠାରୁ ଦ୍ୱାରକାକୁ ଯାଉଥିବାବେଳେ ସୌବୀରଦେଶକୁ ପହଞ୍ଚିଥିବା ତପସ୍ୱୀ ବଭ୍ରୁଙ୍କ ପତ୍ନୀକୁ—ଯାହାର ମନରେ ଏହା ପ୍ରତି ଲେଶମାତ୍ର କାମନା ନଥିଲା—ସେ ମୋହବଶେ ଅପହରଣ କଲା।
Verse 11
एष मायाप्रतिच्छन्न: करूषार्थ तपस्विनीम् । जहार भद्रां वैशालीं मातुलस्य नृशंसकृत्,“इस क्रूरकर्माने मायासे अपने असली रूपको छिपाकर करूषराजकी प्राप्तिके लिये तपस्या करनेवाली अपने मामा विशालानरेशकी कन्या भद्राका (करूषराजके ही वेषमें उपस्थित हो उसे धोखा देकर) अपहरण कर लिया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମାୟାରେ ନିଜ ସତ୍ୟ ରୂପ ଲୁଚାଇ, ନୃଶଂସକର୍ମୀ ସେ ଲୋକ କରୂଷରାଜଙ୍କ ଲାଭ ପାଇଁ ତପସ୍ୟାରତ ନିଜ ମାମାଙ୍କ କନ୍ୟା ବୈଶାଳୀ ଭଦ୍ରାକୁ ଅପହରଣ କଲା।
Verse 12
पितृष्वसु: कृते दुःखं सुमहन्मर्षयाम्यहम् । दिष्ट्या हीदं सर्वराज्ञां संनिधावद्य वर्तते,“मैं अपनी बुआके संतोषके लिये ही इसके बड़े दुःखद अपराधोंको सहन कर रहा हूँ; सौभाग्यकी बात है कि आज यह समस्त राजाओंके समीप मौजूद है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ମୋ ପିତୃସ୍ୱସା (ବୁଆ)ଙ୍କ ହିତ ପାଇଁ ମୁଁ ଏହି ଅତ୍ୟନ୍ତ ମହାଦୁଃଖ ଓ ଘୋର ଅପରାଧ ସହୁଛି। ଭାଗ୍ୟକ୍ରମେ ଆଜି ଏହି ବିଷୟ ସମସ୍ତ ରାଜାଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଉପସ୍ଥିତ।”
Verse 13
पश्यन्ति हि भवन्तोउद्य मय्यतीव व्यतिक्रमम् । कृतानि तु परोक्ष मे यानि तानि निबोधत,“आप सब लोग देख ही रहे हैं कि इस समय यह मेरे प्रति कैसा अभद्र बर्ताव कर रहा है। इसने परोक्षमें मेरे प्रति जो अपराध किये हैं, उन्हें भी आप अच्छी तरह जान लें
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ଆଜି ସେ ମୋ ପ୍ରତି କେତେ ଭୟଙ୍କର ଅତିକ୍ରମ କରୁଛି, ଆପଣମାନେ ଦେଖୁଛନ୍ତି। ଏବେ ଶୁଣନ୍ତୁ—ମୋ ଅଗୋଚରରେ ସେ ମୋ ବିରୋଧରେ ଯେଉଁ ଅପରାଧ କରିଛି, ସେଗୁଡ଼ିକୁ ମଧ୍ୟ ସ୍ପଷ୍ଟ ଭାବେ ଜାଣନ୍ତୁ।”
Verse 14
इमं॑ त्वस्य न शक्ष्यामि क्षन्तुमद्य व्यतिक्रमम् । अवलेपाद् वधाहईस्य समग्रे राजमण्डले,“परंतु आज इसने अहंकारवश समस्त राजाओंके सामने मेरे साथ जो दुर्व्यवहार किया है, उसे मैं कभी क्षमा न कर सकूँगा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ଆଜି ମୁଁ ତାହାର ଏହି ଅତିକ୍ରମକୁ କ୍ଷମା କରିପାରିବି ନାହିଁ। ଅହଙ୍କାରବଶେ, ସମଗ୍ର ରାଜମଣ୍ଡଳ ସମ୍ମୁଖରେ, ସେ ମୋ ପ୍ରତି ଯେ ଉଦ୍ଧତତା କରିଛି—ସେ ବଧଯୋଗ୍ୟ।”
Verse 15
रुक्मिण्यामस्य मूढस्य प्रार्थना55सीन्मुमूर्षत: । नचतां प्राप्तवान् मूढ:ः शूद्रो वेदश्रुतीमिव,“अब यह मरना ही चाहता है। इस मूर्खने पहले रुक्मिणीके लिये उसके बन्धु- बान्धवोंसे याचना की थी, परंतु जैसे शूद्र वेदकी ऋचाओंको श्रवण नहीं कर सकता, उसी प्रकार इस अज्ञानीको वह प्राप्त न हो सकी'
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ଏହି ମୂଢ ଜଣେ ମରିବାକୁ ହିଁ ଚାହୁଁଥିବା ପରି ଥିଲା। ପୂର୍ବେ ସେ ରୁକ୍ମିଣୀ ପାଇଁ ତାଙ୍କ ସ୍ୱଜନଙ୍କ ନିକଟେ ପ୍ରାର୍ଥନା କରିଥିଲା; କିନ୍ତୁ ସେ ଅଜ୍ଞାନୀ ତାଙ୍କୁ ପାଇଲା ନାହିଁ—ଯେପରି (ପରମ୍ପରାନୁସାରେ) ଶୂଦ୍ର ବେଦଶ୍ରୁତି ଶୁଣିପାରେ ନାହିଁ।”
Verse 16
वैशम्पायन उवाच एवमादि तत: सर्वे सहितास्ते नराधिपा: । वासुदेववच: श्रुत्वा चेदिराज॑ व्यगर्हयन्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णकी ये सब बातें सुनकर उन समस्त राजाओंने एक स्वरसे चेदिराज शिशुपालको धिक्कारा और उसकी निन््दा की
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ଜନମେଜୟ! ତାପରେ ବାସୁଦେବଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି, ସେ ସମସ୍ତ ନରାଧିପ ଏକତ୍ର ହୋଇ ଏକସ୍ୱରରେ ଚେଦିରାଜ (ଶିଶୁପାଳ)ଙ୍କୁ ଗର୍ହା କରି ନିନ୍ଦା କଲେ।”
Verse 17
तस्य तद् वचन श्रुत्वा शिशुपाल: प्रतापवान् | जहास स्वनवद्धासं वाक््यं चेदमुवाच ह,श्रीकृष्णका उपर्युक्त वचन सुनकर प्रतापी शिशुपाल खिलखिलाकर हँसने लगा और इस प्रकार बोला--
ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ସେଇ କଥା ଶୁଣି ପ୍ରତାପୀ ଶିଶୁପାଳ ଉଚ୍ଚସ୍ୱରେ ଉପହାସରେ ହସି ଏପରି କହିଲା—
Verse 18
मत्पूर्वा रुक्मिणीं कृष्ण संसत्सु परिकीर्तयन् | विशेषत: पार्थिवेषु व्रीडां न कुरुषे कथम्,“कृष्ण! तुम इस भरी सभामें, विशेषतः सभी राजाओंके सामने रुक्मिणीको मेरी पहलेकी मनोनीत पत्नी बताते हुए लज्जाका अनुभव कैसे नहीं करते?
“ହେ କୃଷ୍ଣ! ଏହି ପୂର୍ଣ୍ଣ ସଭାରେ—ବିଶେଷତଃ ସମସ୍ତ ରାଜାମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ—ରୁକ୍ମିଣୀକୁ ମୋର ପୂର୍ବରୁ ନିର୍ବାଚିତ ପତ୍ନୀ ବୋଲି କହି ତୁମେ ଲଜ୍ଜା କାହିଁକି ଅନୁଭବ କରୁନାହ?”
Verse 19
मन्यमानो हि कः सत्सु पुरुष: परिकीर्तयेत् । अन्यपूर्वा स्त्रियं जातु त्ववन्यो मधुसूदन,“मधुसूदन! तुम्हारे सिवा दूसरा कौन ऐसा पुरुष होगा, जो अपनी स्त्रीको पहले दूसरेकी वाग्दत्ता पत्नी स्वीकार करते हुए सत्पुरुषोंकी सभामें इसका वर्णन करेगा?
“ହେ ମଧୁସୂଦନ! ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ କେଉଁ ମାନ୍ୟ ପୁରୁଷ କେବେ ଏହା ପ୍ରକାଶ କରିବ—ଯେ ସେ ପୂର୍ବରୁ ଅନ୍ୟଜନଙ୍କୁ ବାଗ୍ଦତ୍ତା ଥିବା ନାରୀକୁ ପତ୍ନୀ ଭାବେ ଗ୍ରହଣ କରିଛି? ତୁମେ ଛଡ଼ା ଆଉ କିଏ କରିବ?”
Verse 20
क्षम वा यदि ते श्रद्धा मा वा कृष्ण मम क्षम | क्रुद्धाद् वापि प्रसन्नाद् वा किं मे त्वत्तो भविष्यति,“कृष्ण! यदि अपनी बुआकी बातोंपर तुम्हें श्रद्धा हो तो मेरे अपराध क्षमा करो या न भी करो, तुम्हारे कुपित होने या प्रसन्न होनेसे मेरा क्या बनने-बिगड़ने-वाला है?”
“ହେ କୃଷ୍ଣ! ଯଦି ତୁମେ ତୁମ ପିତୃଭଗିନୀଙ୍କ କଥାରେ ଶ୍ରଦ୍ଧା ରଖ, ତେବେ ମୋ ଅପରାଧ କ୍ଷମା କର କିମ୍ବା ନ କର; ତୁମେ କ୍ରୁଦ୍ଧ ହେଉ କି ପ୍ରସନ୍ନ—ମୋର କ’ଣ ହେବ?”
Verse 21
तथा ब्रुवत एवास्य भगवान् मधुसूदन: । मनसाचिन्तयच्चक्रं दैत्यवर्गनिष्दनम्,शिशुपाल इस तरहकी बातें कर ही रहा था कि भगवान् मधुसूदनने मन-ही-मन दैत्यवर्गविनाशक सुदर्शन चक्रका स्मरण किया
ଶିଶୁପାଳ ଏପରି କହୁଥିବା ସମୟରେ, ଭଗବାନ ମଧୁସୂଦନ ମନେମନେ ଦୈତ୍ୟବର୍ଗ-ନିଷୂଦନ ସୁଦର୍ଶନ ଚକ୍ରକୁ ସ୍ମରଣ କଲେ।
Verse 22
एतस्मिन्नेव काले तु चक्रे हस्तगते सति । उवाच भगवानुच्चैर्वाक्यं वाक्यविशारद:,चिन्तन करते ही तत्काल चक्र हाथमें आ गया। तब बोलनेमें कुशल भगवान् श्रीकृष्णने उच्च स्वरसे यह वचन कहा--
ସେହି ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ, ଚକ୍ର ତାଙ୍କ ହସ୍ତଗତ ହେବା ସହିତ, ବାକ୍ୟନିପୁଣ ଭଗବାନ୍ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଉଚ୍ଚ ସ୍ୱରରେ ଏହି ବଚନ କହିଲେ।
Verse 23
शृण्वन्तु मे महीपाला येनैतत् क्षमितं मया । अपराधशकतं क्षाम्यं मातुरस्यैव याचने,“यहाँ बैठे हुए सब महीपाल यह सुन लें कि मैंने क्यों अबतक इसके अपराध क्षमा किये हैं? इसीकी माताके याचना करनेपर मैंने उसे यह प्रार्थित वर दिया था कि शिशुपालके सौ अपराध क्षमा कर दूँगा। राजाओ! वे सब अपराध अब पूरे हो गये हैं; अतः आप सभी भूमिपतियोंके देखते-देखते मैं अभी इसका वध किये देता हूँ”
ଏଠାରେ ବସିଥିବା ସମସ୍ତ ମହୀପାଳମାନେ ଶୁଣନ୍ତୁ—ମୁଁ ଏତେଦିନ ଏହାକୁ କାହିଁକି କ୍ଷମା କରିଛି। ଏହାର ମାତାଙ୍କ ଯାଚନାରେ ମୁଁ ବର ଦେଇଥିଲି ଯେ ଶିଶୁପାଳଙ୍କ ଶତ ଅପରାଧ କ୍ଷମା କରିବି।
Verse 24
दत्तं मया याचितं च तानि पूर्णानि पार्थिवा: । अधुना वधयिष्यामि पश्यतां वो महीक्षिताम्,“यहाँ बैठे हुए सब महीपाल यह सुन लें कि मैंने क्यों अबतक इसके अपराध क्षमा किये हैं? इसीकी माताके याचना करनेपर मैंने उसे यह प्रार्थित वर दिया था कि शिशुपालके सौ अपराध क्षमा कर दूँगा। राजाओ! वे सब अपराध अब पूरे हो गये हैं; अतः आप सभी भूमिपतियोंके देखते-देखते मैं अभी इसका वध किये देता हूँ”
ହେ ପାର୍ଥିବମାନେ, ଯାଚନାରେ ମୁଁ ଯେ ବର ଦେଇଥିଲି, ସେହିଟି ଏବେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇଗଲା। ଏବେ ତୁମେ ମହୀକ୍ଷିତମାନେ ଦେଖୁଥିବାବେଳେ ମୁଁ ଏହାକୁ ବଧ କରିବି।
Verse 25
एवमुक्त्वा यदुश्रेष्ठेक्षेदिराजस्य तत्क्षणात् । व्यपाहरच्छिर: क्रुद्धश्षक्रेणामित्रकर्षण:,ऐसा कहकर कुपित हुए शत्रुहन्ता यदुकुलतिलक भगवान् श्रीकृष्णने चक्रसे उसी क्षण चेदिराज शिशुपालका सिर उड़ा दिया
ଏପରି କହି, ଶତ୍ରୁଦମନ କରୁଥିବା ଯଦୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ଭଗବାନ୍ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କ୍ରୋଧରେ ସେହି ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ ଚକ୍ରଦ୍ୱାରା ଚେଦିରାଜଙ୍କ ଶିର ଛେଦ କରିଦେଲେ।
Verse 26
स पपात महाबाहुर्वजाहत इवाचल: । ततश्वेदिपते्देहात् तेजो5ग्रयं ददृशुर्न॒पा:,महाबाहु शिशुपाल वज्रके मारे हुए पर्वत-शिखरकी भाँति धराशायी हो गया। महाराज! तदनन्तर सभी नरेशोंने देखा; चेदिराजके शरीरसे एक उत्कृष्ट तेज निकलकर ऊपर उठ रहा है; मानो आकाशसे सूर्य उदित हुआ हो। नरेश्वर! उस तेजने विश्ववन्दित कमलदललोचन श्रीकृष्णको नमस्कार किया और उसी समय उनके भीतर प्रविष्ट हो गया
ମହାବାହୁ ଶିଶୁପାଳ ଇନ୍ଦ୍ରର ବଜ୍ରାଘାତ ପାଇଥିବା ପର୍ବତଶିଖର ପରି ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଗଲା। ତାପରେ ରାଜାମାନେ ଚେଦିପତିଙ୍କ ଦେହରୁ ଏକ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ତେଜ ଉପରକୁ ଉଠୁଥିବା ଦେଖିଲେ।
Verse 27
उत्पतन्तं महाराज गगनादिव भास्करम् | ततः कमलपत्राक्ष॑ं कृष्ण लोकनमस्कृतम् । ववन्दे तत् तदा तेजो विवेश च नराधिप,महाबाहु शिशुपाल वज्रके मारे हुए पर्वत-शिखरकी भाँति धराशायी हो गया। महाराज! तदनन्तर सभी नरेशोंने देखा; चेदिराजके शरीरसे एक उत्कृष्ट तेज निकलकर ऊपर उठ रहा है; मानो आकाशसे सूर्य उदित हुआ हो। नरेश्वर! उस तेजने विश्ववन्दित कमलदललोचन श्रीकृष्णको नमस्कार किया और उसी समय उनके भीतर प्रविष्ट हो गया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାରାଜ, ତାପରେ ଚେଦିରାଜଙ୍କ ଶରୀରରୁ ଏକ ପରମ ତେଜ ଉପରକୁ ଉଠିଲା, ଯେପରି ଆକାଶରେ ସୂର୍ଯ୍ୟ ଉଦିତ ହେଲା। ସେଇ ତେଜ ଲୋକବନ୍ଦିତ କମଳନୟନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କରି ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍ ତାଙ୍କ ଭିତରେ ପ୍ରବେଶ କଲା।
Verse 28
तदद्धुतममन्यन्त दृष्ट्वा सर्वे महीक्षित: । यद् विवेश महाबाहुं तत् तेज: पुरुषोत्तमम्,यह देखकर सभी राजाओंको बड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि उसका तेज महाबाहु पुरुषोत्तममें प्रविष्ट हो गया
ଏହା ଦେଖି ସମସ୍ତ ରାଜାମାନେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ ହେଲେ; କାରଣ ସେଇ ତେଜ ମହାବାହୁ ପୁରୁଷୋତ୍ତମଙ୍କ ଭିତରେ ପ୍ରବେଶ କରିଥିଲା।
Verse 29
अनश्रे प्रववर्ष द्यौ: पपात ज्वलिताशनि: । कृष्णेन निहते चैद्ये चचाल च वसुंधरा,श्रीकृष्णके द्वारा शिशुपालके मारे जानेपर सारी पृथ्वी हिलने लगी, बिना बादलोंके ही आकाशसे वर्षा होने लगी और प्रज्वलित बिजली टूट-टूटकर गिरने लगी
ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଚେଦିରାଜ ଶିଶୁପାଳଙ୍କୁ ନିହତ କରିବା ସହିତେ ମେଘ ବିନା ଆକାଶରୁ ବର୍ଷା ହେଲା; ଜ୍ୱଳିତ ଅଶନି ପଡ଼ିଲା; ଏବଂ ପୃଥିବୀ କମ୍ପି ଉଠିଲା।
Verse 30
ततः केचिन्महीपाला नाब्रुवंस्तत्र किंचन । अतीतवाक्पथे काले प्रेक्षमाणा जनार्दनम्,वह समय वाणीकी पहुँचके परे था। उसका वर्णन करना कठिन था। उस समय कोई भूपाल वहाँ इस विषयमें कुछ भी न बोल सके--मौन रह गये। वे बार-बार केवल श्रीकृष्णके मुखकी ओर देखते रहे
ତାପରେ କେତେକ ରାଜା ସେଠାରେ କିଛି ମଧ୍ୟ କହିଲେ ନାହିଁ। ସେ ମୁହୂର୍ତ୍ତ ବାଣୀର ସୀମାକୁ ଅତିକ୍ରମ କରିଥିଲା। ସେମାନେ ମୌନ ରହି ପୁନଃପୁନଃ ଜନାର୍ଦନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଦେଖୁଥିଲେ।
Verse 31
हस्तैर्हस्ताग्रमपरे प्रत्यपिंषन्नमर्षिता: । अपरे दशनैरोष्ठानदशन् क्रोधमूर्च्छिता:,कुछ अन्य नरेश अत्यन्त अमर्षमें भरकर हाथोंसे हाथ मसलने लगे तथा दूसरे लोग क्रोधसे मूर्च्छित होकर दाँतोंसे ओठ चबाने लगे
କେତେକ ରାଜା ଅମର୍ଷରେ ଭରି ହାତରେ ହାତ ମସୁଥିଲେ; ଅନ୍ୟ କେତେକ ଜଣ କ୍ରୋଧରେ ମୂର୍ଛିତ ହୋଇ ଦାନ୍ତରେ ଓଠ କାମୁଡ଼ୁଥିଲେ।
Verse 32
रहश्न केचिद् वार्ष्णेयं प्रशशंसुर्नराधिपा: । केचिदेव सुसंरब्धा मध्यस्थास्त्वपरेडभवन्,कुछ राजा एकान्तमें भगवान् श्रीकृष्णकी प्रशंसा करने लगे। कुछ ही भूपाल अत्यन्त क्रोधके वशीभूत हो रहे थे तथा कुछ लोग तटस्थ थे
କେତେକ ରାଜା ଗୁପ୍ତରେ ବାର୍ଷ୍ଣେୟ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ପ୍ରଶଂସା କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ। କେତେକ ଭୂପାଳ ତୀବ୍ର କ୍ରୋଧରେ ଉତ୍ତେଜିତ ହେଲେ, ଆଉ କେତେକ ତଟସ୍ଥ ରହିଲେ।
Verse 33
शिशुपालके वधके लिये भगवान्का हाथमें चक्र ग्रहण करना दुर्योधनका स्थलके भ्रमसे जलमें गिरना प्रह्श: केशवं जग्मु: संस्तुवन्तो महर्षय: । ब्राह्मणाश्न महात्मान: पार्थिवाश्न महाबला:
ହର୍ଷିତ ହୋଇ ମହର୍ଷିମାନେ କେଶବଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଇ ତାଙ୍କୁ ସ୍ତୁତି କଲେ; ସେପରି ମହାତ୍ମା ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଓ ମହାବଳୀ ରାଜାମାନେ ମଧ୍ୟ (ତାଙ୍କୁ) ପ୍ରଶଂସା କଲେ।
Verse 34
पाण्डव्स्त्वब्रवीद् भ्रातून् सत्कारेण महीपतिम्,पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने अपने भाइयोंसे कहा--“दमघोष-पुत्र वीर राजा शिशुपालका अन्त्येष्टि संस्कार बड़े सत्कारके साथ करो, इसमें देर न लगाओ।” पाण्डवोंने भाईकी उस आज्ञाका यथार्थरूपसे पालन किया
ତାପରେ ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଭାଇମାନଙ୍କୁ ସତ୍କାରସହ କହିଲେ—“ଦମଘୋଷପୁତ୍ର ବୀର ଶିଶୁପାଳଙ୍କ ଅନ୍ତ୍ୟେଷ୍ଟି କ୍ରିୟା ଯଥୋଚିତ ସମ୍ମାନରେ, ବିଳମ୍ବ ନ କରି ସମ୍ପନ୍ନ କର।” ପାଣ୍ଡବମାନେ ଭାଇଙ୍କ ଆଜ୍ଞାକୁ ଯଥାର୍ଥ ଭାବେ ପାଳନ କଲେ।
Verse 35
दमघोषात्मजं वीरं संस्कारयत मा चिरम् | तथा च कृतवन्तस्ते भ्रातुर्व शासनं तदा,पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने अपने भाइयोंसे कहा--“दमघोष-पुत्र वीर राजा शिशुपालका अन्त्येष्टि संस्कार बड़े सत्कारके साथ करो, इसमें देर न लगाओ।” पाण्डवोंने भाईकी उस आज्ञाका यथार्थरूपसे पालन किया
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—“ଦମଘୋଷପୁତ୍ର ବୀର ଶିଶୁପାଳଙ୍କ ସଂସ୍କାର ବିଳମ୍ବ ନ କରି, ଯଥୋଚିତ ସତ୍କାରରେ କର।” ତେବେ ପାଣ୍ଡବମାନେ ଭାଇଙ୍କ ବଚନକୁ ଆଦର କରି ସେହିପରି କଲେ।
Verse 36
चेदीनामाधिपत्ये च पुत्रमस्य महीपते: । अभ्यषिज्चत् तदा पार्थ: सह तैर्वसुधाधिपै:,उस समय कुन्तीनन्दन राजा युधिष्छिरने वहाँ आये हुए सभी भूमिपालोंके साथ चेदिदेशके राजसिंहासनपर शिशुपालके पुत्रको अभिषिक्त कर दिया
ସେତେବେଳେ ପାର୍ଥ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସେଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ ସମସ୍ତ ଭୂପାଳମାନଙ୍କ ସହିତ ସେଇ ରାଜା (ଶିଶୁପାଳ)ଙ୍କ ପୁତ୍ରଙ୍କୁ ଚେଦି ରାଜ୍ୟର ଅଧିପତ୍ୟ ପାଇଁ ଅଭିଷେକ କଲେ।
Verse 37
ततः स कुरुराजस्य क्रतुः सर्वसमृद्धिमान् । यूनां प्रीतिकरो राजन् स बभौ विपुलौजस:,तदनन्तर महातेजस्वी कुरुराज युधिष्ठिरका वह सम्पूर्ण समृद्धियोंसे भरा-पूरा राजसूययज्ञ तरुण राजाओंकी प्रसन्नताको बढ़ाता हुआ अनुपम शोभा पाने लगा
ତାପରେ କୁରୁରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ସେଇ ରାଜସୂୟ ଯଜ୍ଞ ସମସ୍ତ ସମୃଦ୍ଧିରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇ, ମହାତେଜରେ ଦୀପ୍ତିମାନ ହେଲା। ହେ ରାଜନ, ତାହା ଯୁବ ନରେଶମାନଙ୍କୁ ପ୍ରସନ୍ନ କରି ଅପୂର୍ବ ମହିମାରେ ଶୋଭିତ ହେଲା।
Verse 38
शान्तविध्न: सुखारम्भ: प्रभूतधनधान्यवान् । अन्नवान् बहुभक्ष्यश्व केशवेन सुरक्षित:,उस यज्ञका विघ्न शान्त हो गया था; अतः उसका सुखपूर्वक आरम्भ हुआ। उसमें अपरिमित धन-धान्यका संग्रह एवं सदुपयोग किया गया था। भगवान् श्रीकृष्णसे सुरक्षित होनेके कारण उस यज्ञमें कभी अन्नकी कमी नहीं होने पायी। उसमें सदा पर्याप्तमात्रामें भक्ष्य-भोज्य आदिकी सामग्री प्रस्तुत रहती थी
ସେଇ ଯଜ୍ଞର ସମସ୍ତ ବିଘ୍ନ ଶାନ୍ତ ହୋଇଗଲା; ତେଣୁ ତାହା ସୁଖପୂର୍ବକ ଆରମ୍ଭ ହେଲା। ତାହା ପ୍ରଚୁର ଧନ-ଧାନ୍ୟରେ ସମ୍ପନ୍ନ ଥିଲା; ଏବଂ କେଶବଙ୍କ ରକ୍ଷାରେ ସେଠାରେ ଅନ୍ନର କେବେ ଅଭାବ ହେଲା ନାହିଁ। ସଦା ଭକ୍ଷ୍ୟ-ଭୋଜ୍ୟର ପ୍ରଚୁର ବ୍ୟବସ୍ଥା ଥିଲା।
Verse 39
(ददृशुस्तं नृपतयो यज्ञस्य विधिमुत्तमम् । उपेन्द्रबुद्धया विहितं सहदेवेन भारत ।। भरतनन्दन! राजाओंने सहदेवके द्वारा विष्णु-बुद्धिसे भगवान् श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये किये जानेवाले उस यज्ञका उत्तम विधि-विधान देखा। ददृशुस्तोरणान्यत्र हेमतालमयानि च । दीप्तभास्करतुल्यानि प्रदीप्तानीव तेजसा । स यज्ञस्तोरणैस्तैश्ष ग्रहैद्यौरिव सम्बभौ ।। उस यज्ञमण्डपमें सुवर्णमय तालके बने हुए फाटक दिखायी देते थे, जो अपनी प्रभासे तेजस्वी सूर्यके समान देदीप्यमान हो रहे थे। उन तेजस्वी द्वारोंसे वह विशाल यज्ञमण्डप ग्रहोंसे आकाशकी भाँति प्रकाशित हो रहा था। शय्यासनविहारां श्व सुबहून् वित्तसम्भूतान् । घटान् पात्री: कटाहानि कलशानि समन्ततः: । न ते किज्चिदसौवर्णमपश्यंस्तत्र पार्थिवा: ।। वहाँ शय्या, आसन और क्रीडाभवनोंकी संख्या बहुत थी। उनके निर्माणमें प्रचुर धन लगा था। चारों ओर घड़े, भाँति भाँतिके पात्र, कड़ाहे और कलश आदि सुवर्णनिर्मित सामान दृष्टिगोचर हो रहे थे। वहाँ राजाओंने कोई ऐसी वस्तु नहीं देखी, जो सोनेकी बनी हुई नहो। ओदनानां विकाराणि स्वादूनि विविधानि च । सुबहूनि च भक्ष्याणि पेयानि मधुराणि च । ददुर्द्धिजानां सततं राजप्रेष्या महाध्वरे ।। उस महान् यज्ञमें राजसेवकगण ब्राह्मणोंके आगे सदा नाना प्रकारके स्वादिष्ट भात तथा चावलकी बनी हुई बहुत-सी दूसरी भोज्य वस्तुएँ परोसते रहते थे। वे उनके लिये मधुर पेय पदार्थ भी अर्पण करते थे। पूर्णे शतसहस्रे तु विप्राणां भुड्जतां तदा । स्थापिता तत्र संज्ञाभूच्छड्खो 5 ध्मायत नित्यश: ।। भोजन करनेवाले ब्राह्मणोंकी संख्या जब एक लाख पूरी हो जाती थी, तब वहाँ प्रतिदिन शंख बजाया जाता था। मुहुर्मुहु: प्रणादस्तु तस्य शड्खस्य भारत । उत्तमं शड्खशब्दं तं श्रुव्वा विस्मपमागता: ।। जनमेजय! दिनमें कई बार इस तरहकी शंख-ध्वनि होती थी। वह उत्तम शंखनाद सुनकर लोगोंको बड़ा विस्मय होता था। एवं प्रवृत्ते यज्ञे तु तुष्टपुष्टजनायुते । अन्नस्य बहवो राजन्नुत्सेधा: पर्वतोपमा: । दधिकुल्याश्न ददृशु: सर्पिषां च हृदाउ्जना: ।। इस प्रकार सहसों हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरे हुए उस यज्ञका कार्य चलने लगा। राजन! उसमें अन्नके बहुत-से ऊँचे ढेर लगाये गये थे, जो पर्वतोंके समान जान पड़ते थे। लोगोंने देखा, वहाँ दहीकी नहरें बह रही थीं तथा घीके कितने ही कुण्ड भरे हुए थे। जम्बूद्वीपो हि सकलो नानाजनपदायुत: । राजन्नदृश्यतैकस्थो राज्ञस्तस्मिन् महाक्रतौ ।। राजन! महाराज युधिष्ठिरके उस महान् यज्ञमें नाना जनपदोंसे युक्त सारा जम्बूद्वीप ही एकत्र हुआ-सा दिखायी देता था। राजानः स्रग्विणस्तत्र सुमृष्टमणिकुण्डला: । विविधान्यन्नपानानि लेह्यानि विविधानि च । तेषां नृपोपभोग्यानि ब्राह्माणे भ्यो ददुः सम ते ।। वहाँ विशुद्ध मणिमय कुण्डल तथा हार धारण किये नरेश ब्राह्मणोंको राजाओंके उपभोगमें आनेयोग्य नाना प्रकारके अन्न-पान और भाँति-भाँतिकी चटनी परोसते थे। एतानि सततं भुक््त्वा तस्मिन् यज्ञे द्विजातय: । परां प्रीतिं ययु: सर्वे मोदमानास्तदा भृशम् ।। उस यज्ञमें निरन्तर उपर्युक्त पदार्थ भोजन करके सब ब्राह्मण आनन्दमग्न हो बड़ी तृप्ति और प्रसन्नताका अनुभव करते थे। एवं समुदितं सर्व बहुगोधनधान्यवत् | यज्ञवार्ट नृपा दृष्टवा विस्मयं परमं ययु: ।। इस प्रकार बहुत-सी गायों तथा धन-धान्यसे सम्पन्न उस समृद्धिशाली यज्ञमण्डपको देखकर सब राजाओंको बड़ा आश्चर्य होता था। ऋत्विजश्न यथाशास्त्रं राजसूयं महाक्रतुम् । पाण्डवस्य यथाकालं जुहुवु: सर्ववाजका: ।। ऋत्विजूलोग शास्त्रीय विधिके अनुसार राजा युधिष्ठिरके उस राजसूय नामक महायज्ञका अनुष्ठान करते थे और समस्त याजक ठीक समयपर अग्निमें आहुतियाँ देते थे। व्यासधौम्यादय: सर्वे विधिवत् षोडशर्त्विज: । स्वस्वकर्माणि चक्कुस्ते पाण्डवस्य महाक्रतौ ।। व्यास और धौम्य आदि जो सोलह ऋत्विज् थे, वे युधिष्ठिरके उस महायज्ञमें विधिपूर्वक अपने-अपने निश्चित कार्योंका सम्पादन करते थे। नाषडड्डविदत्रासीत् सदस्यो नाबहुश्रुतः । नाव्रतो नानुपाध्यायो नपापो नाक्षमो द्विज: ।। उस यज्ञमण्डपमें कोई भी सदस्य ऐसा नहीं था, जो वेदके छहों अंगोंका ज्ञाता, बहुश्रुत, व्रतशील, अध्यापक, पापरहित, क्षमाशील एवं सामर्थ्यशील न हो। न तत्र कृपण: कश्िद् दरिद्रो न बभूव ह । क्षुधितो दुःखितो वापि प्राकृतो वापि मानुष: ।। उस यज्ञमें कोई भी मनुष्य दीन, दरिद्र, दुःखी, भूखा-प्यासा अथवा मूढ़ नहीं था। भोजन भोजनार्थिभ्यो दापयामास सर्वदा | सहदेवो महातेजा: सततं राजशासनात् ।। महातेजस्वी सहदेव महाराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे भोजनार्थियोंको सदा भोजन दिलाया करते थे। सस्तरे कुशलाश्चापि सर्वकर्माणि याजका: । दिवसे दिवसे चक्रुर्यथाशास्त्रार्थचक्षुष: ।। शास्त्रोक्त अर्थपर दृष्टि रखनेवाले यज्ञकुशल याजक प्रतिदिन सब कार्योंको विधिवत् सम्पन्न करते थे। ब्राह्मणा वेदशास्त्रज्ञा: कथाश्षक्रुश्न सर्वदा । रेमिरे च कथान्ते तु सर्वे तस्मिन् महाक्रतौ ।। वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता ब्राह्मण वहाँ सदा कथा-प्रवचन किया करते थे। उस महायज्ञमें सब लोग कथाके अन्तमें बड़े सुखका अनुभव करते थे। देवैरन्यैश्न यक्षेश्ष उरगैर्दिव्यमानुषै: । विद्याधरगणै: कीर्ण: पाण्डवस्य महात्मन: ।। स राजसूय: शुशुभे धर्मराजस्य धीमत: । देवता, असुर, यक्ष, नाग, दिव्य मानव तथा विद्याधरगणोंसे भरा हुआ बुद्धिमान् पाण्डुनन्दन महात्मा धर्मराजका वह राजसूययज्ञ बड़ी शोभा पाता था। गन्धर्वगणसंकीर्ण: शोभितो<प्सरसां गणै: ।। देवैर्मुनिगणैर्यक्षै्देवलोक इवापर: । स किम्पुरुषगीतैश्न किन्नरैरुपशोभित: ।। वह यज्ञमण्डप गन्धर्वों, अप्सरा-समूहों, देवताओं, मुनिगणों तथा यक्षोंसे सुशोभित हो दूसरे देवलोकके समान जान पड़ता था। किम्पुरुषोंके गीत तथा किन्नरगण उस स्थानकी शोभा बढ़ा रहे थे। नारदश्न जगौ तत्र तुम्बुरुश्न महाद्युति: । विश्वावसुश्रित्रसेनस्तथान्ये गीतकोविदा: । रमयन्ति सम तान् सर्वान् यज्ञकर्मान्तरेष्वथ ।। नारद, महातेजस्वी तुम्बुरु, विश्वावसु, चित्रसेन तथा दूसरे गीतकुशल गन्धर्व वहाँ गीत गाकर यज्ञकार्योंके बीच-बीचमें अवकाश मिलनेपर सब लोगोंका मनोरंजन करते थे। इतिहासपुराणानि आख्यानानि च सर्वश: । ऊचुर्व शब्दशास्त्रज्ञा नित्यं कर्मान्तरेष्वथ ।। यज्ञसम्बन्धी कर्मोंके बीचमें अवसर मिलनेपर व्याकरणशास्त्रके ज्ञाता विद्वान् पुरुष इतिहास, पुराण तथा सब प्रकारके उपाख्यान सुनाया करते थे। भेयश्व मुरजाश्वैव मड्डुका गोमुखाश्न ये । शृज्भवंशाम्बुजाश्वैव श्रूयन्ते सम सहस्रश: ।। वहाँ सहस्रों भेरी, मृदंग, मड्डुक, गोमुख, शृंग, वंशी और शंखोंके शब्द सुनायी पड़ते थे। लोके<स्मिन् सर्वविप्राश्च वैश्या: शूद्राश्न॒ सर्वश: । सर्वे म्लेच्छा: सर्ववर्णा: सादिमध्यान्तजास्तथा ।। नानादेशसमुद्धूतीननाजातिभिरागतै: । पर्याप्त इव लोको<यं युधिष्ठिरनिवेशने ।। इस जगत्में रहनेवाले समस्त ब्राह्मण, (क्षत्रिय,) वैश्य, शूद्र, सब प्रकारके म्लेच्छ तथा अग्रज, मध्यज और अन्त्यज आदि सभी वर्णोंके लोग उस यज्ञमें उपस्थित हुए थे। अनेक देशोंमें उत्पन्न विभिन्न जातिके लोगोंके शुभागमनसे युधिष्ठिरके उस राजभवनमें ऐसा जान पड़ता था कि यह समस्त लोक वहाँ उपस्थित हो गया है। भीष्मद्रोणादय: सर्वे कुरव: ससुयोधना: । वृष्णयश्व समग्राश्न पज्चालाश्चापि सर्वशः । यथाहँं सर्वकर्माणि चक्रुर्दासा इव क्रतौ ।। उस राजसूययज्ञमें भीष्म, ट्रोण और दुर्योधन आदि समस्त कौरव, सारे वृष्णिवंशी तथा सम्पूर्ण पांचाल भी सेवकोंकी भाँति यथायोग्य सभी कार्य अपने हाथों करते थे। एवं प्रवृत्तो यज्ञ: स धर्मराजस्य धीमत: । शुशुभे च महाबाहो सोमस्येव क्रतुर्यथा ।। महाबाहु जनमेजय! इस प्रकार बुद्धिमान् युधिष्ठिरका वह यज्ञ चन्द्रमाके राजसूययज्ञकी भाँति शोभा पाता था। वस्त्राणि कम्बलांश्रैव प्रावारांश्नैव सर्वदा | निष्कहेमजभाण्डानि भूषणानि च सर्वश: । प्रददौ तत्र सततं धर्मराजो युधिष्िर: ।। धर्मराज युधिष्ठिर उस यज्ञमें हर समय वस्त्र, कम्बल, चादर, स्वर्णपदक, सोनेके बर्तन और सब प्रकारके आभूषणोंका दान करते रहते थे। यानि तत्र महीपेभ्यो लब्धं वा धनमुत्तमम् । तानि रत्नानि सर्वाणि विप्राणां प्रददौ तदा ।। वहाँ राजाओंसे जो-जो रत्न अथवा उत्तम धन भेंटके रूपमें प्राप्त हुए, उन सबको युधिष्ठिरने ब्राह्मणोंकी सेवामें समर्पित कर दिया। कोटीसहसरं प्रददौ ब्राह्मणानां महात्मनाम् | उन्होंने महात्मा ब्राह्मणोंको दक्षिणाके रूपमें सहस्नर कोटि स्वर्णमुद्राएँ प्रदान कीं। न करिष्यति त॑ लोके कक्षिदन्यो महीपति: ।। याजका: सर्वकामैश्न सततं ततृपुर्धने: । उन्होंने संसारमें वह कार्य किया जिसे दूसरा कोई राजा नहीं कर सकेगा। यज्ञ करानेवाले ब्राह्मण सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तुएँ और प्रचुर धन पाकर सदाके लिये तृप्त हो गये। व्यासं धौम्यं च प्रयतो नारदं च महामतिम् ।। सुमन्तुं जैमिनिं पैलं वैशम्पायनमेव च । याज्ञवल्क्यं कठं चैव कलापं च महौजसम् । सर्वाश्च विप्रप्रवरान् पूजयामास सत्कृतान् ।। फिर राजा युधिष्ठिरने व्यास, धौम्य, महामति नारद, सुमन्तु, जैमिनि, पैल, वैशम्पायन, याज्ञवल्क्य, कठ तथा महातेजस्वी कलाप--इन सब श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका पूर्ण मनोयोगके साथ सत्कार एवं पूजन किया। युधिछिर उवाच युष्मत्प्रभावात् प्राप्तोड्यं राजसूयो महाक्रतुः । जनार्दनप्रभावाच्च सम्पूर्णो मे मनोरथ: ।। युधिष्ठिर उनसे बोले--महर्षियो! आपलोगोंके प्रभावसे यह राजसूय महायज्ञ सांगोपांग सम्पन्न हुआ। भगवान् श्रीकृष्णके प्रतापसे मेरा सारा मनोरथ पूर्ण हो गया। वैशम्पायन उवाच अथ यज्ञ समाप्यान्ते पूजयामास माधवम् | बलदेवं च देवेशं भीष्माद्यांश्व॒ कुरूत्तमान् ।।) वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार यज्ञसमाप्तिके समय राजा युधिष्छिरने अन्तमें लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण, देवेश्वर बलदेव तथा कुरुश्रेष्ठ भीष्म आदिका पूजन किया। समापयामास च त॑ राजसूयं महाक्रतुम् | तं तु यज्ञ महाबाहुरासमाप्तेर्जनार्दन: । ररक्ष भगवाउ्छौरि: शारज्नचक्रगदाधर:,तदनन्तर उस राजसूय महायज्ञको विधिपूर्वक समाप्त किया। शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णने आरम्भसे लेकर अन्ततक उस यज्ञकी रक्षा की
ହେ ଭାରତ! ରାଜମାନେ ସେଇ ଯଜ୍ଞର ଉତ୍ତମ ବିଧି-ବିଧାନ ଦେଖିଲେ—ଯାହା ସହଦେବ ଉପେନ୍ଦ୍ରବୁଦ୍ଧିରେ, ଅର୍ଥାତ୍ ବିଷ୍ଣୁସ୍ୱରୂପ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ପ୍ରସନ୍ନତା ପାଇଁ, ସୁସଂଗଠିତ କରିଥିଲେ।
Verse 40
ततस्त्ववभृथस्नातं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । समस्त॑ पार्थिवं क्षत्रमुपगम्येदमब्रवीत्,तदनन्तर धर्मात्मा युधिष्टरिर जब अवभृथस्नान कर चुके, उस समय समस्त क्षत्रिययजाओंका समुदाय उनके पास जाकर बोला--
ତାପରେ ଧର୍ମାତ୍ମା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଅବଭୃଥ-ସ୍ନାନ ସମାପ୍ତ କରିବା ପରେ, ସମସ୍ତ ରାଜା-କ୍ଷତ୍ରିୟ ସମୁଦାୟ ତାଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ ଏହିପରି କହିଲେ।
Verse 41
दिष्ट्या वर्धसि धर्मज्ञ साम्राज्यं प्राप्तवानसि । आजमीढाजमीढानां यश: संवर्धितं त्वया,“धर्मज्ञ! आपका अभ्युदय हो रहा है, यह बड़े सौभाग्यकी बात है। आपने सम्राट्का पद प्राप्त कर लिया। अजमीढकुलनन्दन राजाधिराज! आपने इस कर्मद्वारा अजमीढवंशी क्षत्रियोंक यशका विस्तार तो किया ही है, महान् धर्मका भी सम्पादन किया है। नरव्याप्र! आपने हमारे लिये सब प्रकारके अभीष्ट पदार्थ सुलभ करके हमारा बड़ा सम्मान किया है। अब हम आपसे जानेकी अनुमति लेना चाहते हैं
“ଧର୍ମଜ୍ଞ! ତୁମର ଅଭ୍ୟୁଦୟ ହେଉଛି—ଏହା ମହା ସୌଭାଗ୍ୟ; ତୁମେ ସାମ୍ରାଜ୍ୟ ପ୍ରାପ୍ତ କରିଛ। ତୁମ ଦ୍ୱାରା ଆଜମୀଢ-ବଂଶଜମାନଙ୍କର ଯଶ ବୃଦ୍ଧି ପାଇଛି।”
Verse 42
कर्मणैतेन राजेन्द्र धर्मश्न सुमहान् कृत: । आपूृच्छामो नरव्यात्र सर्वकामै: सुपूजिता:,“धर्मज्ञ! आपका अभ्युदय हो रहा है, यह बड़े सौभाग्यकी बात है। आपने सम्राट्का पद प्राप्त कर लिया। अजमीढकुलनन्दन राजाधिराज! आपने इस कर्मद्वारा अजमीढवंशी क्षत्रियोंक यशका विस्तार तो किया ही है, महान् धर्मका भी सम्पादन किया है। नरव्याप्र! आपने हमारे लिये सब प्रकारके अभीष्ट पदार्थ सुलभ करके हमारा बड़ा सम्मान किया है। अब हम आपसे जानेकी अनुमति लेना चाहते हैं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର, ହେ ଧର୍ମଜ୍ଞ! ଏହି କର୍ମଦ୍ୱାରା ତୁମେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ମହାନ କାର୍ଯ୍ୟ ସାଧନ କରିଛ। ହେ ନରବ୍ୟାଘ୍ର! ସମସ୍ତ ଇଚ୍ଛିତ ବସ୍ତୁଦ୍ୱାରା ଆମକୁ ସତ୍କାର କରି ବିଶେଷ ସମ୍ମାନ ଦେଇଛ; ଏହେତୁ ଏବେ ଆମେ ପ୍ରସ୍ଥାନ ପାଇଁ ଅନୁମତି ଚାହୁଁଛୁ।
Verse 43
इत्युक्त्वा राजशार्टूलस्तस्थौ गर्जन्ञमर्षण: । ऐसा कहकर क्रोधमें भरा हुआ राजसिंह शिशुपाल दहाड़ता हुआ युद्धके लिये डट गया,स्वराष्ट्राणि गमिष्यामस्तदनुज्ञातुमरहसि । श्रुत्वा तु वचन राज्ञां धर्मराजो युधिछिर: “हम अपने-अपने राष्ट्रको जायँगे, आप हमें आज्ञा दें।। राजाओंका यह वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने उन पूजनीय नरेशोंका यथायोग्य सत्कार करके सब भाइयोंसे कहा--*ये सभी राजा प्रेमसे ही हमारे यहाँ पधारे थे। ये परंतप भूपाल अब मुझसे पूछकर अपने राष्ट्रको जानेके लिये उद्यत हैं। तुमलोगोंका भला हो। तुमलोग अपने राज्यकी सीमातक आदरपूर्वक इन श्रेष्ठ नरपतियोंको पहुँचा आओ'
ଏହିପରି କହି ରାଜଶାର୍ଦୂଳ ଶିଶୁପାଳ କ୍ରୋଧେ ଉଦ୍ଦୀପ୍ତ ହୋଇ ଗର୍ଜନ କରି ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଅଟଳ ଭାବେ ଦଢ଼ି ରହିଲା। ତେବେ ସମସ୍ତ ରାଜା କହିଲେ—“ଆମେ ଆମ-ଆମ ରାଷ୍ଟ୍ରକୁ ଯିବୁ; ଆପଣ ଅନୁମତି ଦିଅନ୍ତୁ।” ସେମାନଙ୍କ କଥା ଶୁଣି ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସେହି ପୂଜ୍ୟ ନୃପତିମାନଙ୍କୁ ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ସତ୍କାର କରି ଭାଇମାନଙ୍କୁ କହିଲେ—“ଏହି ସମସ୍ତ ରାଜା ସ୍ନେହରୁ ଆମ ପାଖକୁ ଆସିଥିଲେ। ଏବେ ଏହି ପରନ୍ତପ ଭୂପାଳମାନେ ମୋର ଅନୁମତି ନେଇ ନିଜ ରାଜ୍ୟକୁ ଫେରିବାକୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ। ତୁମମାନଙ୍କ ମଙ୍ଗଳ ହେଉ; ଏହି ଶ୍ରେଷ୍ଠ ନରପତିମାନଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ ସହିତ ରାଜ୍ୟସୀମା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପହଞ୍ଚାଇ ଆସ।”
Verse 44
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापववके अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वरमें भीष्मवाक्यविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,यथाहईं पूज्य नृपतीन् भ्रातृन् सर्वानुवाच ह । राजान: सर्व एवैते प्रीत्यास्मानू समुपागता: “हम अपने-अपने राष्ट्रको जायँगे, आप हमें आज्ञा दें।। राजाओंका यह वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने उन पूजनीय नरेशोंका यथायोग्य सत्कार करके सब भाइयोंसे कहा--*ये सभी राजा प्रेमसे ही हमारे यहाँ पधारे थे। ये परंतप भूपाल अब मुझसे पूछकर अपने राष्ट्रको जानेके लिये उद्यत हैं। तुमलोगोंका भला हो। तुमलोग अपने राज्यकी सीमातक आदरपूर्वक इन श्रेष्ठ नरपतियोंको पहुँचा आओ'
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସମସ୍ତ ଭାଇଙ୍କୁ ସେହି ପୂଜ୍ୟ ରାଜାମାନଙ୍କ ବିଷୟରେ କହିଲେ। ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ସ୍ନେହରୁ ଆସି କହିଲେ—“ଆମେ ଆମ-ଆମ ରାଜ୍ୟକୁ ଯିବୁ; ଆଜି ଆମକୁ ଅନୁମତି ଦିଅନ୍ତୁ।” ସେମାନଙ୍କ ଅନୁରୋଧ ଶୁଣି ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ସତ୍କାର କରି ପୁଣି ଭାଇମାନଙ୍କୁ କହିଲେ—“ଏମାନେ ସ୍ନେହରୁ ଏଠାକୁ ଆସିଛନ୍ତି; ଏବେ ମୋର ଅନୁମତି ନେଇ ନିଜ ଦେଶକୁ ଯିବାକୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ। ଏହି ଶ୍ରେଷ୍ଠ ନୃପତିମାନଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ ସହିତ ରାଜ୍ୟସୀମା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପହଞ୍ଚାଇ ଆସ।”
Verse 45
प्रस्थिता: स्वानि राष्ट्राणि मामापृच्छय परंतपा: । अनुव्रजत भद्ठरें वो विषयान्तं नृपोत्तमान्,“हम अपने-अपने राष्ट्रको जायँगे, आप हमें आज्ञा दें।। राजाओंका यह वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने उन पूजनीय नरेशोंका यथायोग्य सत्कार करके सब भाइयोंसे कहा--*ये सभी राजा प्रेमसे ही हमारे यहाँ पधारे थे। ये परंतप भूपाल अब मुझसे पूछकर अपने राष्ट्रको जानेके लिये उद्यत हैं। तुमलोगोंका भला हो। तुमलोग अपने राज्यकी सीमातक आदरपूर्वक इन श्रेष्ठ नरपतियोंको पहुँचा आओ' इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि शिशुपालवधे पज्चचत्वारिंशो5 ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापरवके अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वमें शिशुपालवधविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
ସେହି ପରନ୍ତପ ରାଜାମାନେ ମୋ ପାଖରୁ ବିଦାୟ ନେଇ ନିଜ-ନିଜ ରାଜ୍ୟକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ। ତୁମମାନଙ୍କ ମଙ୍ଗଳ ହେଉ—ସେହି ଶ୍ରେଷ୍ଠ ନୃପତିମାନଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ ସହିତ ରାଜ୍ୟସୀମା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଅନୁଗମନ କର।
Verse 46
भ्रातुर्वचनमाज्ञाय पाण्डवा धर्मचारिण: । यथाहँ नृपतीन् स्वनिकैकं॑ समनुव्रजन्,भाईकी बात मानकर वे धर्मात्मा पाण्डव एक-एक करके यथायोग्य सभी राजाओंके साथ गये
ଭାଇଙ୍କ ଆଦେଶ ବୁଝି ଧର୍ମାଚାରୀ ପାଣ୍ଡବମାନେ ଯଥାଯୋଗ୍ୟ କ୍ରମରେ, ନିଜ-ନିଜ ଅନୁଚର ସହ, ଏକେକରି ସେହି ସମସ୍ତ ରାଜାଙ୍କ ସହିତ ଅନୁଗମନ କଲେ।
Verse 47
विराटमन्वयात् तूर्ण धृष्टद्युम्न: प्रतापवान् । धनंजयो यज्ञसेनं महात्मानं महारथम्,प्रतापी धृष्टद्युम्न तुरंत ही राजा विराटके साथ गया। धनंजयने महारथी महात्मा द्रपदका अनुसरण किया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ପ୍ରତାପବାନ୍ ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ ଶୀଘ୍ରେ ରାଜା ବିରାଟଙ୍କୁ ଅନୁସରଣ କଲେ। ଏବଂ ପ୍ରତାପୀ ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ମହାତ୍ମା ମହାରଥୀ ଯଜ୍ଞସେନ (ଦ୍ରୁପଦ)ଙ୍କ ପଛେ ପଛେ ଗଲେ।
Verse 48
भीष्म च धृतराष्ट्रंच भीमसेनो महाबल: । द्रोणं च ससुतं वीर॑ सहदेवो युधाम्पति:,महाबली भीमसेन भीष्म और धुृतराष्ट्रके साथ गये। योद्धाओंमें श्रेष्ठ सहदेवने द्रोणाचार्य तथा उनके वीर पुत्र अश्वत्थामाको पहुँचाया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ମହାବଳୀ ଭୀମସେନ ଭୀଷ୍ମ ଓ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ସହିତ ଗଲେ। ଏବଂ ଯୁଦ୍ଧାମ୍ପତି ସହଦେବ ଦ୍ରୋଣାଚାର୍ଯ୍ୟଙ୍କୁ ତାଙ୍କ ବୀର ପୁତ୍ର ସହିତ ସହଯୋଗ କରି ପହଞ୍ଚାଇଲେ।
Verse 49
नकुल: सुबलं राजन् सहपुत्रं समन्वयात् | द्रौपदेया: ससौभद्रा: पर्वतीयान् महारथान्,राजन! सुबल और उनके पुत्रके साथ नकुल गये। द्रौपदीके पाँच पुत्रों तथा अभिमन्युने पर्वतीय महारथियोंको अपने राज्यकी सीमातक पहुँचाया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ରାଜନ୍! ନକୁଳ ସୁବଳଙ୍କୁ ତାଙ୍କ ପୁତ୍ର ସହିତ ଅନୁସରଣ କଲେ। ଏବଂ ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କ ପାଞ୍ଚ ପୁତ୍ର ଓ ସୌଭଦ୍ର (ଅଭିମନ୍ୟୁ) ପର୍ବତୀୟ ମହାରଥୀମାନଙ୍କୁ ରାଜ୍ୟସୀମା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପହଞ୍ଚାଇଲେ।
Verse 50
अन्वगच्छंस्तथैवान्यान क्षत्रियान् क्षत्रियर्षभा: । एवं सुपूजिता: सर्वे जम्मुर्विप्रा: सहस्रश:,इसी प्रकार अन्य क्षत्रियशिरोमणियोंने दूसरे-दूसरे क्षत्रिय राजाओंका अनुगमन किया। इसी तरह सभी ब्राह्मण भी अत्यन्त पूजित हो सहस्रोंकी संख्यामें वहाँसे विदा हुए। राजाओं तथा ब्राह्मणोंके चले जानेपर प्रतापी भगवान् श्रीकृष्णने युधिषप्ठिससे कहा--
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେହିପରି କ୍ଷତ୍ରିୟଶ୍ରେଷ୍ଠମାନେ ଅନ୍ୟ କ୍ଷତ୍ରିୟ ରାଜାମାନଙ୍କୁ ଅନୁସରଣ କଲେ। ଏବଂ ଏହିପରି ଅତ୍ୟନ୍ତ ସମ୍ମାନରେ ପୂଜିତ ସମସ୍ତ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ମଧ୍ୟ ସହସ୍ର ସଂଖ୍ୟାରେ ସେଠାରୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 51
गतेषु पार्थिवेन्द्रेषु सर्वेषु ब्राह्मणेषु च । युधिष्ठटिरमुवाचेदं॑ वासुदेव: प्रतापवान्,इसी प्रकार अन्य क्षत्रियशिरोमणियोंने दूसरे-दूसरे क्षत्रिय राजाओंका अनुगमन किया। इसी तरह सभी ब्राह्मण भी अत्यन्त पूजित हो सहस्रोंकी संख्यामें वहाँसे विदा हुए। राजाओं तथा ब्राह्मणोंके चले जानेपर प्रतापी भगवान् श्रीकृष्णने युधिषप्ठिससे कहा--
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସମସ୍ତ ପାର୍ଥିବେନ୍ଦ୍ର (ରାଜା) ଓ ସମସ୍ତ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଚାଲିଯାଇଥିବା ପରେ, ପ୍ରତାପବାନ୍ ବାସୁଦେବ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଏହି କଥା କହିଲେ।
Verse 52
आपूृच्छे त्वां गमिष्यामि द्वारकां कुरुनन्दन । राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं दिष्ट्या त्वं प्राप्तानसि,“कुरुनन्दन! मैं आपकी आज्ञा चाहता हूँ, अब मैं द्वारकापुरीको जाऊँगा। सौभाग्यसे आपने सब यज्ञोंमें उत्तम राजसूयका सम्पादन कर लिया”
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “କୁରୁନନ୍ଦନ! ମୁଁ ତୁମଠାରୁ ବିଦାୟ ନେଉଛି; ଏବେ ମୁଁ ଦ୍ୱାରକାକୁ ଯିବି। ଭାଗ୍ୟବଶତଃ ତୁମେ ସମସ୍ତ ଯଜ୍ଞମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ରାଜସୂୟ ଯଜ୍ଞ ପ୍ରାପ୍ତ କରି ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ କରିଛ।”
Verse 53
तमुवाचैवमुक्तस्तु धर्मराजो जनार्दनम् तव प्रसादाद् गोविन्द प्राप्त: क्रतुवरो मया,उनके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्छिर जनार्दनसे बोले--“गोविन्द! आपकी ही कृपासे मैंने यह श्रेष्ठ यज्ञ सम्पन्न किया है
ଏହା ଶୁଣି ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଜନାର୍ଦ୍ଦନଙ୍କୁ କହିଲେ— “ଗୋବିନ୍ଦ! ଆପଣଙ୍କ କୃପାରୁ ମାତ୍ର ମୁଁ ଏହି ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଯଜ୍ଞ ପ୍ରାପ୍ତ କରି ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ କରିଛି।”
Verse 54
क्षत्रं समग्रमपि च त्वत्प्रसादाद् वशे स्थितम् | उपादाय बलिं मुख्यं मामेव समुपस्थितम्,“तथा सारा क्षत्रियमण्डल भी आपके ही प्रसादसे मेरे अधीन हुआ और उत्तमोत्तम रत्नोंकी भेंट ले मेरे पास आया
“ଆପଣଙ୍କ ପ୍ରସାଦରୁ ସମଗ୍ର କ୍ଷତ୍ରିୟ-ଶକ୍ତି ମୋର ବଶରେ ଆସିଛି; ଏବଂ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବଳି (କର) ନେଇ ସେ ନିଜେ ମୋ ସମ୍ମୁଖରେ ଉପସ୍ଥିତ ହୋଇଛି।”
Verse 55
कथं त्वद्गमनार्थ मे वाणी वितरतेडनघ । न हाहं त्वामृते वीर रतिं प्राप्नोमि कर्हिचित्,“अनघ! आपको जानेके लिये मेरी वाणी कैसे कह सकती है? वीर! मैं आपके बिना कभी प्रसन्न नहीं रह सकूँगा
“ଅନଘ! ଆପଣଙ୍କ ଗମନକଥା କହିବାକୁ ମୋର ବାଣୀ କିପରି ପ୍ରବୃତ୍ତ ହେବ? ବୀର! ଆପଣ ବିନା ମୁଁ କେବେ ମଧ୍ୟ ଆନନ୍ଦ ପାଇବି ନାହିଁ।”
Verse 56
अवश्यं चैव गन्तव्या भवता द्वारकापुरी । एवमुक्त: स धर्मात्मा युधिष्ठिससहायवान्,'परंतु आपका द्वारकापुरी जाना भी आवश्यक ही है।' उनके ऐसा कहनेपर महायशस्वी धर्मात्मा श्रीहरि युधिष्ठिरको साथ ले बुआ कुन्तीके पास गये और प्रसन्नतापूर्वक बोले--“बुआजी! तुम्हारे पुत्रोंने अब साम्राज्य प्राप्त कर लिया, उनका मनोरथ पूर्ण हो गया। वे सब-के-सब धन तथा रत्नोंसे सम्पन्न हैं। अब तुम इनके साथ प्रसन्नतापूर्वक रहो। यदि तुम्हारी आज्ञा हो तो मैं द्वारका जाना चाहता हूँ!
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ଆପଣଙ୍କୁ ନିଶ୍ଚୟ ଦ୍ୱାରକାପୁରୀକୁ ଯିବାକୁ ହେବ।” ଏହିପରି କୁହାଯାଇଲାପରେ ଧର୍ମାତ୍ମା ଶ୍ରୀହରି, ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ସହ ନେଇ ହର୍ଷିତ ହୃଦୟରେ କୁନ୍ତୀଙ୍କ ପାଖକୁ ଗଲେ ଏବଂ କହିଲେ— “ପିଶୀମା! ତୁମ ପୁଅମାନେ ଏବେ ସାମ୍ରାଜ୍ୟ ପ୍ରାପ୍ତ କରିଛନ୍ତି; ତାଙ୍କର ମନୋରଥ ସିଦ୍ଧ ହୋଇଛି। ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଧନ ଓ ରତ୍ନରେ ସମୃଦ୍ଧ। ଏବେ ତୁମେ ସେମାନଙ୍କ ସହ ସୁଖରେ ବସ। ଯଦି ତୁମ ଅନୁମତି ଥାଏ, ମୁଁ ଦ୍ୱାରକାକୁ ଯିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି।”
Verse 57
अभिगम्याब्रवीत् प्रीतः पृथां पृथुयशा हरि: । साम्राज्यं समनुप्राप्ता: पुत्रास्तेडद्य पितृष्वस:,'परंतु आपका द्वारकापुरी जाना भी आवश्यक ही है।' उनके ऐसा कहनेपर महायशस्वी धर्मात्मा श्रीहरि युधिष्ठिरको साथ ले बुआ कुन्तीके पास गये और प्रसन्नतापूर्वक बोले--“बुआजी! तुम्हारे पुत्रोंने अब साम्राज्य प्राप्त कर लिया, उनका मनोरथ पूर्ण हो गया। वे सब-के-सब धन तथा रत्नोंसे सम्पन्न हैं। अब तुम इनके साथ प्रसन्नतापूर्वक रहो। यदि तुम्हारी आज्ञा हो तो मैं द्वारका जाना चाहता हूँ!
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ତେବେ ପ୍ରସନ୍ନଚିତ୍ତ ମହାଯଶସ୍ବୀ ହରି (କୃଷ୍ଣ) ପୃଥା (କୁନ୍ତୀ)ଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ କହିଲେ— “ପିଶୀମା! ଆଜି ତୁମ ପୁଅମାନେ ସାମ୍ରାଜ୍ୟ ପାଇଛନ୍ତି; ତାଙ୍କର ଦୀର୍ଘଦିନର ଇଚ୍ଛା ପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇଛି। ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଧନ ଓ ରତ୍ନରେ ସମୃଦ୍ଧ। ଏବେ ତୁମେ ସେମାନଙ୍କ ସହ ଆନନ୍ଦରେ ବସ। ଯଦି ତୁମ ଅନୁମତି ଥାଏ, ମୁଁ ଦ୍ୱାରକାକୁ ଯିବାକୁ ଚାହୁଁଛି।”
Verse 58
सिद्धार्था वसुमन्तश्न सा त्वं प्रीतिमवाप्रुहि । अनुज्ञातस्त्वया चाहं द्वारकां गन्तुमुत्सहे,'परंतु आपका द्वारकापुरी जाना भी आवश्यक ही है।' उनके ऐसा कहनेपर महायशस्वी धर्मात्मा श्रीहरि युधिष्ठिरको साथ ले बुआ कुन्तीके पास गये और प्रसन्नतापूर्वक बोले--“बुआजी! तुम्हारे पुत्रोंने अब साम्राज्य प्राप्त कर लिया, उनका मनोरथ पूर्ण हो गया। वे सब-के-सब धन तथा रत्नोंसे सम्पन्न हैं। अब तुम इनके साथ प्रसन्नतापूर्वक रहो। यदि तुम्हारी आज्ञा हो तो मैं द्वारका जाना चाहता हूँ!
“ତୁମ ଅଭିଷ୍ଟ ସିଦ୍ଧ ହୋଇଛି, ତୁମେ ଧନସମ୍ପଦରେ ସମୃଦ୍ଧ; ତେଣୁ ଶାନ୍ତି ଓ ଆନନ୍ଦ ପାଅ। ଏବଂ ଯଦି ତୁମେ ମୋତେ ଅନୁମତି ଦେଉ, ମୁଁ ମଧ୍ୟ ଦ୍ୱାରକାକୁ ଯିବାକୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ।” ଏହିପରି କହି ଧର୍ମାତ୍ମା ମହାଯଶସ୍ବୀ ଶ୍ରୀହରି ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ସହ ନେଇ କୁନ୍ତୀଙ୍କ ପାଖକୁ ଗଲେ ଏବଂ ସ୍ନେହମୟ ସନ୍ତୋଷରେ ପୁନଃ କହିଲେ— “ପିଶୀମା! ତୁମ ପୁଅମାନେ ସାମ୍ରାଜ୍ୟ ପାଇଛନ୍ତି… ଯଦି ତୁମ ଆଜ୍ଞା ଥାଏ, ମୁଁ ଦ୍ୱାରକାକୁ ଯିବାକୁ ଚାହୁଁଛି।”
Verse 59
सुभद्रां द्रोपदीं चैव सभाजयत केशव: । निष्क्रम्यान्त:पुरात् तस्माद् युधिष्ठिरसहायवान्,कुन्तीकी आज्ञा ले श्रीकृष्ण सुभद्रा और द्रौपदीसे भी मिले और मीठे वचनोंसे उन दोनोंको प्रसन्न किया। तत्पश्चात् वे युधिष्ठिरके साथ अन्तःपुरसे बाहर निकले
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— କେଶବ (କୃଷ୍ଣ) ସୁଭଦ୍ରା ଓ ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଯଥୋଚିତ ସମ୍ମାନ ଜଣାଇ, ମଧୁର ବଚନରେ ଦୁହେଁକୁ ପ୍ରସନ୍ନ କଲେ। ପରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ସହ ସେ ଅନ୍ତଃପୁରରୁ ବାହାରିଲେ।
Verse 60
स््नातश्न कृतजप्यश्ष ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्य च । ततो मेघवपु: प्रख्यं स्यन्दनं च सुकल्पितम् । योजयित्वा महाबाहुर्दारुक: समुपस्थित:,फिर स्नान और जप करके उन्होंने ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया। इसके बाद महाबाहु दारुक मेघके समान नीले रंगका सुन्दर रथ जोतकर उनकी सेवामें उपस्थित हुआ। गरुडध्वजसे सुशोभित उस सुन्दर रथको उपस्थित देख महामना कमलनयन श्रीकृष्णने उसकी दक्षिणावर्त प्रदक्षिणा की और उसपर आखरूढ़ हो वे द्वारकापुरीकी ओर चल पड़े
ସ୍ନାନ କରି ଜପ ସମାପ୍ତ କରି ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ସ୍ୱସ୍ତିବାଚନ କରାଇଲେ। ତା’ପରେ ମେଘସଦୃଶ ଶ୍ୟାମବର୍ଣ୍ଣ, ସୁସଜ୍ଜିତ ସୁନ୍ଦର ରଥ ଯୋଗାଇ ମହାବାହୁ ଦାରୁକ ସେବାରେ ଉପସ୍ଥିତ ହେଲେ।
Verse 61
उपस्थितं रथं दृष्टवा ताक्ष्यप्रवरकेतनम् । प्रदक्षिणमुपावृत्य समारुह्मू महामना:,फिर स्नान और जप करके उन्होंने ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया। इसके बाद महाबाहु दारुक मेघके समान नीले रंगका सुन्दर रथ जोतकर उनकी सेवामें उपस्थित हुआ। गरुडध्वजसे सुशोभित उस सुन्दर रथको उपस्थित देख महामना कमलनयन श्रीकृष्णने उसकी दक्षिणावर्त प्रदक्षिणा की और उसपर आखरूढ़ हो वे द्वारकापुरीकी ओर चल पड़े
ତାକ୍ଷ୍ୟ (ଗରୁଡ)ର ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଧ୍ୱଜଚିହ୍ନରେ ଶୋଭିତ ତିଆରି ରଥକୁ ଦେଖି ମହାମନା ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ପ୍ରଥମେ ଦକ୍ଷିଣାବର୍ତ୍ତ ପ୍ରଦକ୍ଷିଣା କଲେ, ତା’ପରେ ରଥାରୂଢ ହେଲେ।
Verse 62
प्रययौ पुण्डरीकाक्षस्ततो द्वारवतीं पुरीम्,फिर स्नान और जप करके उन्होंने ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया। इसके बाद महाबाहु दारुक मेघके समान नीले रंगका सुन्दर रथ जोतकर उनकी सेवामें उपस्थित हुआ। गरुडध्वजसे सुशोभित उस सुन्दर रथको उपस्थित देख महामना कमलनयन श्रीकृष्णने उसकी दक्षिणावर्त प्रदक्षिणा की और उसपर आखरूढ़ हो वे द्वारकापुरीकी ओर चल पड़े
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ପୁଣ୍ଡରୀକାକ୍ଷ ଭଗବାନ ଦ୍ୱାରବତୀ ପୁରୀକୁ ପ୍ରୟାଣ କଲେ। ସ୍ନାନ ଓ ଜପ ସମାପ୍ତ କରି ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସ୍ୱସ୍ତିବାଚନ କରାଇଲେ। ତାହାପରେ ମହାବାହୁ ଦାରୁକ ମେଘଶ୍ୟାମ, ଗରୁଡଧ୍ୱଜରେ ଶୋଭିତ ସୁନ୍ଦର ରଥଟି ଯୋଗାଇ ସେବାରେ ଉପସ୍ଥିତ ହେଲେ। ସେଇ ଦୀପ୍ତିମାନ ରଥକୁ ଦେଖି ମହାମନା ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଦକ୍ଷିଣାବର୍ତ୍ତ ପ୍ରଦକ୍ଷିଣା କରି ତାହାରେ ଆରୋହଣ କରି ଦ୍ୱାରକାପୁରୀ ଦିଗକୁ ଅଗ୍ରସର ହେଲେ।
Verse 63
(सात्यकि: कृतवर्मा च रथमारुह[ सत्वरौ । वीजयामासतुस्तत्र चामराभ्यां हरिं तथा ।। बलदेवश्न देवेशो यादवाश्ष॒ सहस्रश: । प्रययू राजवत् सर्वे धर्मपुत्रेण पूजिता: । ततः स सम्मतं राजा हित्वा सौवर्णमासनम् ।।) त॑ पद्धयामनुवव्राज धर्मराजो युधिष्ठिर: । भ्रातृभि: सहित: श्रीमान् वासुदेवं महाबलम्,सात्यकि और कृतवर्मा शीघ्रतापूर्वक उस रथपर आरूढ़ हो श्रीहरिकी सेवाके लिये चँवर डुलाने लगे। देवेश्वर बलदेवजी तथा सहस्रों यदुवंशी धर्मपुत्र युधिष्ठिससे पूजित हो राजाकी भाँति वहाँसे विदा हुए। तदनन्तर सोनेके श्रेष्ठ सिंहासनको छोड़कर भाइयोंसहित श्रीमान् धर्मराज युधिष्ठिर पैदल ही महाबली भगवान् वासुदेवके पीछे-पीछे चलने लगे
ସାତ୍ୟକି ଓ କୃତବର୍ମା ଶୀଘ୍ର ରଥରେ ଆରୋହଣ କରି ସେଠାରେ ଶ୍ରୀହରିଙ୍କ ସେବାରେ ଚାମର ଡୁଲାଇଲେ। ଦେବେଶ୍ୱର ବଳଦେବ ଓ ସହସ୍ର ସହସ୍ର ଯାଦବ, ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପୂଜିତ ହୋଇ, ରାଜସମ୍ମାନରେ ସେଠାରୁ ବିଦାୟ ନେଲେ। ତାପରେ ସମ୍ମାନିତ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଆସନ ତ୍ୟାଗ କରି, ଭ୍ରାତୃମାନଙ୍କ ସହ ପାଦଚାରୀ ହୋଇ ମହାବଳୀ ବାସୁଦେବଙ୍କ ପଛେ ପଛେ ଚାଲିଲେ।
Verse 64
ततो मुहूर्त संगृहा स्यन्दनप्रवरं हरि: । अब्रवीत् पुण्डरीकाक्ष: कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम्,तब कमललोचन भगवान् श्रीहरिने दो घड़ीतक अपने श्रेष्ठ रथको रोककर कुन्तीकुमार युधिष्ठिससे कहा--
ତେବେ ପୁଣ୍ଡରୀକାକ୍ଷ ହରି କିଛିକ୍ଷଣ ପାଇଁ ନିଜ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ରଥକୁ ରୋକି କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ କହିଲେ—
Verse 65
अप्रमत्त: स्थितो नित्यं प्रजा: पाहि विशाम्पते । पर्जन्यमिव भूतानि महाद्रुममिव द्विजा:,अन्योन्यं समनुज्ञाप्य जग्मतुः स्वगृहान् प्रति । “राजन! आप सदा सावधान रहकर प्रजाजनोंके पालनमें लगे रहें। जैसे सब प्राणी मेघको, पक्षी महान् वृक्षको और सम्पूर्ण देवता इन्द्रको अपने जीवनका आधार मानकर उनका आश्रय लेते हैं, उसी प्रकार सभी बन्धु-बान्धव जीवन-निर्वाहके लिये आपका आश्रय लें।” श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर आपसमें इस प्रकार बातें करके एक दूसरेकी आज्ञा ले अपने- अपने स्थानको चल दिये
“ହେ ପ୍ରଜାପତି! ତୁମେ ସଦା ସଚେତନ ରହି ପ୍ରଜାଙ୍କୁ ପାଳନ କର। ଯେପରି ଜୀବମାନେ ବର୍ଷାମେଘକୁ, ପକ୍ଷୀମାନେ ମହାବୃକ୍ଷକୁ, ଏବଂ ଦେବମାନେ ଇନ୍ଦ୍ରକୁ ଆଧାର କରନ୍ତି—ସେପରି ସମସ୍ତ ବନ୍ଧୁ-ବାନ୍ଧବ ଜୀବିକା ଓ ସୁରକ୍ଷା ପାଇଁ ତୁମ ଆଶ୍ରୟ ନିଅନ୍ତୁ।” ଏଭଳି ପରସ୍ପର କଥାବାର୍ତ୍ତା କରି ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଓ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଏକାପରକୁ ଅନୁମତି ଦେଇ ନିଜ ନିଜ ଗୃହକୁ ଗଲେ।
Verse 66
बान्धवास्त्वोपजीवन्तु सहस्राक्षमिवामरा: | कृत्वा परस्परेणैवं संविदं कृष्णपाण्डवी
“ତାଙ୍କ ବନ୍ଧୁମାନେ ତାଙ୍କ ଆଶ୍ରୟରେ ଉପଜୀବନ କରୁନ୍ତୁ—ଯେପରି ଦେବମାନେ ସହସ୍ରାକ୍ଷ (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କ ଆଶ୍ରୟରେ ଜୀବନ ଧାରଣ କରନ୍ତି।” ଏଭଳି ପରସ୍ପର ସଂବିଦା କରି କୃଷ୍ଣା (ଦ୍ରୌପଦୀ) ଓ ପାଣ୍ଡବମାନେ ସେହି ବୁଝାପଡ଼ା ଅନୁସାରେ ଅଗ୍ରସର ହେଲେ।
Verse 67
गते द्वारवतीं कृष्णे सात्वतप्रवरे नूप,राजन! यदुवंशशिरोमणि श्रीकृष्णके द्वारका चले जानेपर भी राजा दुर्योधन तथा सुबलपुत्र शकुनि--ये दोनों नरश्रेष्ठ उस दिव्य सभाभवनमें ही रहे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ସାତ୍ୱତପ୍ରବର, ଯଦୁବଂଶ-ଶିରୋମଣି ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଦ୍ୱାରାବତୀ (ଦ୍ୱାରକା) ପ୍ରତି ପ୍ରସ୍ଥାନ କରିଗଲା ପରେ ମଧ୍ୟ, ରାଜା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଓ ସୁବଳପୁତ୍ର ଶକୁନି—ସେଇ ଦୁଇ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ ସେହି ଦିବ୍ୟ ସଭାଗୃହରେ ହିଁ ରହିଲେ।
Verse 68
एको दुर्योधनो राजा शकुनिश्चापि सौबल: । तस्यां सभायां दिव्यायामूषतुस्तो नरर्षभौ,राजन! यदुवंशशिरोमणि श्रीकृष्णके द्वारका चले जानेपर भी राजा दुर्योधन तथा सुबलपुत्र शकुनि--ये दोनों नरश्रेष्ठ उस दिव्य सभाभवनमें ही रहे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ରାଜା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଏକା ଓ ସୁବଳପୁତ୍ର ଶକୁନି ମଧ୍ୟ—ସେଇ ଦୁଇ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଯଦୁବଂଶ-ଶିରୋମଣି ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଦ୍ୱାରକା ପ୍ରତି ପ୍ରସ୍ଥାନ କରିଥିବା ସମୟରେ ମଧ୍ୟ, ସେହି ଦିବ୍ୟ ସଭାରେ ହିଁ ରହିଲେ।
Verse 336
शशंसुर्निर्वता: सर्वे दृष्टवा कृष्णस्य विक्रमम् । बड़े-बड़े ऋषि, महात्मा ब्राह्मणों तथा महाबली भूमिपालोंने भगवान् श्रीकृष्णका वह पराक्रम देखकर अत्यन्त प्रसन्न हो उनकी स्तुति करते हुए उन्हींकी शरण ली
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କୃଷ୍ଣଙ୍କ ବିକ୍ରମ ଦେଖି ସମସ୍ତେ ଆନନ୍ଦରେ ପ୍ରଫୁଲ୍ଲ ହେଲେ। ମହର୍ଷିମାନେ, ମହାତ୍ମା ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଓ ମହାବଳ ଭୂପାଳମାନେ ହୃଷ୍ଟଚିତ୍ତେ ତାଙ୍କୁ ସ୍ତୁତି କରି, ତାଙ୍କରେ ହିଁ ଶରଣ ନେଲେ।
Verse 666
अन्योन्यं समनुज्ञाप्य जग्मतुः स्वगृहान् प्रति । “राजन! आप सदा सावधान रहकर प्रजाजनोंके पालनमें लगे रहें। जैसे सब प्राणी मेघको, पक्षी महान् वृक्षको और सम्पूर्ण देवता इन्द्रको अपने जीवनका आधार मानकर उनका आश्रय लेते हैं, उसी प्रकार सभी बन्धु-बान्धव जीवन-निर्वाहके लिये आपका आश्रय लें।” श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर आपसमें इस प्रकार बातें करके एक दूसरेकी आज्ञा ले अपने- अपने स्थानको चल दिये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ପରସ୍ପରକୁ ଅନୁମତି ଦେଇ ସେମାନେ ନିଜ ନିଜ ଗୃହ ପ୍ରତି ଗଲେ। (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କହିଲେ) “ହେ ରାଜନ! ସଦା ସାବଧାନ ରହି ପ୍ରଜାପାଳନରେ ନିମଗ୍ନ ରୁହ। ଯେପରି ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀ ମେଘକୁ ଆଶ୍ରୟ କରେ, ପକ୍ଷୀମାନେ ମହାବୃକ୍ଷକୁ ଆଶ୍ରୟ କରନ୍ତି, ଏବଂ ସମସ୍ତ ଦେବତା ଇନ୍ଦ୍ରକୁ ଜୀବନାଧାର ମାନି ଭରସା କରନ୍ତି—ସେପରି ତୁମର ସମସ୍ତ ବନ୍ଧୁ-ବାନ୍ଧବ ଓ ସୁହୃଦମାନେ ଜୀବନନିର୍ବାହ ଓ ସୁରକ୍ଷା ପାଇଁ ତୁମ ଆଶ୍ରୟ ନିଅନ୍ତୁ।” ଏଭଳି କଥା କହି ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଓ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ପରସ୍ପରକୁ ବିଦାୟ ଦେଇ ନିଜ ନିଜ ସ୍ଥାନକୁ ଗଲେ।
Dhṛtarāṣṭra faces a governance dilemma: whether to restrain a harmful initiative despite filial pressure and foreknowledge of gambling’s risks, or to authorize it under the guise of formal propriety and fatalistic reasoning—thereby converting private resentment into state policy.
The chapter illustrates how unchecked envy and the rejection of contentment distort judgment; it also models the institutional danger when rulers substitute ‘destiny’ for accountability and sideline prudent counsel in favor of emotionally charged demands.
No explicit phalaśruti is stated here; instead, the narrative functions as meta-commentary by marking the dice-game as a recognizable ‘gateway to ruin,’ underscoring the interpretive lesson that early policy choices can irreversibly shape later outcomes.