Adhyaya 35
Sabha ParvaAdhyaya 3522 Verses

Adhyaya 35

Śiśupāla-nigraha-prastāva: Yudhiṣṭhira’s Conciliation and Bhīṣma’s Defense of Kṛṣṇa (Book 2, Chapter 35)

Upa-parva: Rājasūya–Arghyārhaṇāsaṃvāda (Discourse on Arghya Honor during the Rājasūya)

Vaiśaṃpāyana reports that Yudhiṣṭhira approaches Śiśupāla after his harsh remarks and addresses him with measured, conciliatory speech. Yudhiṣṭhira argues that Śiśupāla’s words are improper for a king, ethically defective (adharma), and needlessly abrasive; he urges patience by pointing to the presence of many senior rulers who tolerate the assembly’s decision to honor Kṛṣṇa. He further notes that Bhīṣma, as a preeminent elder, understands Kṛṣṇa’s true stature in a way Śiśupāla does not. Bhīṣma then rejects appeasement: one who refuses honor to the most eminent should not be soothed. He frames Kṛṣṇa as worthy of reverence not only for the Pandavas but for all worlds, citing Kṛṣṇa’s martial supremacy, excellence in knowledge and strength, and a comprehensive catalog of virtues. Bhīṣma escalates the claim into a cosmological register, presenting Kṛṣṇa as the ground of elements, directions, luminaries, and worldly order. He concludes that Śiśupāla’s dissent reflects immaturity and misrecognition of dharma, and that the assembly is justified in proceeding with the contested honor.

Chapter Arc: राजसूय-दीक्षा के तेज में युधिष्ठिर पितामह भीष्म और गुरु द्रोण सहित समस्त वरिष्ठों का प्रत्युद्गमन कर विनयपूर्वक उनसे यज्ञ-कार्य में अनुग्रह और सहभागिता की याचना करते हैं। → युधिष्ठिर अपने महान धन-वैभव को ‘प्रणय’ (स्नेह-निवेदन) बनाकर सबको इच्छानुसार ग्रहण करने का आग्रह करते हैं और फिर यथायोग्य अधिकारों में सबको नियुक्त करते हैं—यज्ञ की व्यवस्था, अतिथि-सत्कार, दान-वितरण और सभा की शोभा एक साथ बढ़ती जाती है। → दूर-दूर से आए राजाओं की दृष्टि धर्मराज और उनकी सभा पर टिकती है; कोई भी सत्कार में कमी नहीं रहने देता—‘यज्ञ’ के नाम पर प्रतिस्पर्धा करते हुए प्रत्येक राजा बहुसंख्यक रत्न-धन अर्पित करता है, और युधिष्ठिर का वैभव तथा यज्ञ की श्री चरम पर पहुँचती है। → सभा रत्नों, समृद्ध राजाओं और संतुष्ट ब्राह्मणों/वर्णों से परिपूर्ण होकर देवताओं-सा तृप्ति-भाव रचती है; दक्षिणा, अन्न और महाधन से सब प्रसन्न होते हैं और राजसूय-यज्ञ का आयोजन सुव्यवस्थित रूप से आगे बढ़ता है। → प्रतिस्पर्धी दान और बढ़ती हुई ‘श्री’ के बीच यह संकेत उभरता है कि इतना वैभव और प्रतिष्ठा आगे चलकर ईर्ष्या/द्वेष को भी आमंत्रित कर सकती है।

Shlokas

Verse 1

ऑफ -ण क्र पज्चत्रिशो5 ध्याय: राजसूययज्ञका वर्णन वैशम्पायन उवाच पितामहं गुरुं चैव प्रत्युद्गम्य युधिष्ठिर: । अभिवाद्य ततो राजन्निदं वचनमत्रवीत्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! पितामह भीष्म तथा गुरु द्रोणाचार्य आदिकी अगवानी करके युधिष्ठिरने उनके चरणोंमें प्रणाम किया और भीष्म, द्रोण, कृप, अश्व॒त्थामा, दुर्योधन और विविंशतिसे कहा--“'इस यज्ञमें आपलोग सब प्रकारसे मुझपर अनुग्रह करें

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍ ଜନମେଜୟ! ଯୁଧିଷ୍ଠିର ପିତାମହ ଭୀଷ୍ମ ଓ ଗୁରୁ ଦ୍ରୋଣାଚାର୍ଯ୍ୟଙ୍କୁ ପ୍ରତ୍ୟୁଦ୍ଗମନ କରି, ପ୍ରଣାମ କରି, ପରେ ଏହି ବଚନ କହିଲେ।

Verse 2

भीष्म द्रोणं कृप॑ द्रौणिं दुर्योधनविविंशती । अस्मिन्‌ यज्ञे भवन्तों मामनुगृह्नन्तु सर्वश:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! पितामह भीष्म तथा गुरु द्रोणाचार्य आदिकी अगवानी करके युधिष्ठिरने उनके चरणोंमें प्रणाम किया और भीष्म, द्रोण, कृप, अश्व॒त्थामा, दुर्योधन और विविंशतिसे कहा--“'इस यज्ञमें आपलोग सब प्रकारसे मुझपर अनुग्रह करें

ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣ, କୃପ, ଦ୍ରୌଣି (ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା), ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଓ ବିବିଂଶତିଙ୍କୁ ଉଦ୍ଦେଶି ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—“ଏହି ଯଜ୍ଞରେ ଆପଣମାନେ ସର୍ବପ୍ରକାରେ ମୋତେ ଅନୁଗ୍ରହ କରନ୍ତୁ।”

Verse 3

इदं व: सुमहच्चैव यदिहास्ति धनं मम । प्रणयन्तु भवन्तो मां यथेष्टमभिमन्त्रिता:,यहाँ मेरा जो यह महान्‌ धन है, उसे आपलोग मेरी प्रार्थना मानकर इच्छानुसार सत्कर्मोमें लगाइये

ଏଠାରେ ମୋର ଯେ ଏହି ମହାଧନ ଅଛି, ତାହା ଆପଣମାନଙ୍କ ପାଇଁ; ମୋର ପ୍ରାର୍ଥନା ଗ୍ରହଣ କରି, ଆପଣମାନେ ଯେପରି ଯଥୋଚିତ ଭାବନ୍ତି, ସେପରି ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ଏହାକୁ ଧର୍ମକାର୍ଯ୍ୟରେ ନିଯୁକ୍ତ କରନ୍ତୁ ଏବଂ ମୋତେ ସ୍ନେହରେ ଗ୍ରହଣ କରନ୍ତୁ।

Verse 4

एवमुक्‍त्वा स तानू सर्वान्‌ दीक्षित: पाण्डवाग्रज: । युयोज स यथायोगमधिकारेष्वनन्तरम्‌,यज्ञदीक्षित युधिष्ठिरने ऐसा कहकर उन सबको यथायोग्य अधिकारोंमें लगाया

ଏପରି କହି, ଯଜ୍ଞଦୀକ୍ଷିତ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଅଗ୍ରଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସେମାନଙ୍କୁ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ତୁରନ୍ତ ଯୋଗ୍ୟତାନୁସାରେ ଯଥୋଚିତ ଅଧିକାର ଓ କର୍ତ୍ତବ୍ୟରେ ନିଯୁକ୍ତ କଲେ।

Verse 5

भक्ष्यभोज्याधिकारेषु दःशासनमयोजयत्‌ | परिग्रहे ब्राह्मणानामश्च॒त्थामानमुक्तवान्‌,भक्ष्य-भोज्य आदि सामग्रीकी देख-रेख तथा उसके बाँटने परोसनेकी व्यवस्थाका अधिकार दुःशासनको दिया। ब्राह्मणोंके स्वागत-सत्कारका भार उन्होंने अश्वत्थामाको सौंप दिया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଭକ୍ଷ୍ୟ-ଭୋଜ୍ୟ ସାମଗ୍ରୀର ରକ୍ଷା, ଦେଖାଶୁଣା, ବଣ୍ଟନ ଓ ପରିବେଶନର ଅଧିକାର ସେ ଦୁଃଶାସନଙ୍କୁ ଦେଲେ। ଏବଂ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କର ସ୍ୱାଗତ-ସତ୍କାର ଓ ସମ୍ମାନର ଭାର ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମାଙ୍କୁ ସମର୍ପଣ କଲେ।

Verse 6

राज्ञां तु प्रतिपूजार्थ संजयं स न्ययोजयत्‌ | कृताकृतपरिज्ञाने भीष्मद्रोणी महामती,राजाओंकी सेवा और सत्कारके लिये धर्मराजने संजयको नियुक्त किया। कौन काम हुआ और कौन नहीं हुआ, इसकी देख-रेखका काम महाबुद्धिमान्‌ भीष्म और द्रोणाचार्यको मिला

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସମବେତ ରାଜାମାନଙ୍କର ସେବା ଓ ଯଥୋଚିତ ସତ୍କାର ପାଇଁ ସେ ସଞ୍ଜୟଙ୍କୁ ନିଯୁକ୍ତ କଲେ। ଏବଂ କେଉଁ କାମ ହୋଇଛି, କେଉଁଟି ଅବଶିଷ୍ଟ—ଏହାର ନିରୀକ୍ଷଣ ମହାମତି ଭୀଷ୍ମ ଓ ଦ୍ରୋଣଙ୍କୁ ଦିଆଗଲା।

Verse 7

हिरण्यस्य सुवर्णस्य रत्नानां चान्ववेक्षणे | दक्षिणानां च वै दाने कृपं राजा न्‍न्ययोजयत्‌,उत्तम वर्णके स्वर्ण तथा रत्नोंको परखने, रखने और दक्षिणा देनेके कार्यमें राजाने कृपाचार्यकी नियुक्ति की। इसी प्रकार दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ पुरुषोंको यथायोग्य भिन्न-भिन्न कार्योमें लगाया। नकुलके द्वारा सम्मानपूर्वक बुलाकर लाये हुए बाह्लिक, धृतराष्ट्र, सोमदत्त और जयद्रथ वहाँ घरके मालिककी तरह सुखपूर्वक रहने और इच्छानुसार विचरने लगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହିରଣ୍ୟ, ଉତ୍ତମ ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଓ ରତ୍ନମାନଙ୍କର ପରୀକ୍ଷା-ନିରୀକ୍ଷଣ, ରକ୍ଷା ଏବଂ ଦକ୍ଷିଣା-ଦାନର କାର୍ଯ୍ୟରେ ରାଜା କୃପାଚାର୍ଯ୍ୟଙ୍କୁ ନିଯୁକ୍ତ କଲେ। ଏହିପରି ଅନ୍ୟ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପୁରୁଷମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ଭିନ୍ନ-ଭିନ୍ନ କାର୍ଯ୍ୟରେ ଲଗାଇଲେ। ନକୁଳ ଯେଉଁମାନଙ୍କୁ ସମ୍ମାନପୂର୍ବକ ଡାକି ଆଣିଥିଲେ—ସେହି ବାହ୍ଲୀକ, ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର, ସୋମଦତ୍ତ ଓ ଜୟଦ୍ରଥ ସେଠାରେ ଗୃହସ୍ୱାମୀଙ୍କ ପରି ସୁଖରେ ରହି, ଇଚ୍ଛାମତେ ବିଚରଣ କଲେ।

Verse 8

तथान्यान्‌ पुरुषव्याप्रांस्तस्मिंस्तस्मिन्‌ न्‍्ययोजयत्‌ । बाह्निको धृतराष्ट्रश्न सोमदत्तो जयद्रथ: । नकुलेन समानीता: स्वामिवत् तत्र रेमिरे,उत्तम वर्णके स्वर्ण तथा रत्नोंको परखने, रखने और दक्षिणा देनेके कार्यमें राजाने कृपाचार्यकी नियुक्ति की। इसी प्रकार दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ पुरुषोंको यथायोग्य भिन्न-भिन्न कार्योमें लगाया। नकुलके द्वारा सम्मानपूर्वक बुलाकर लाये हुए बाह्लिक, धृतराष्ट्र, सोमदत्त और जयद्रथ वहाँ घरके मालिककी तरह सुखपूर्वक रहने और इच्छानुसार विचरने लगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେହିପରି ରାଜା ଅନ୍ୟ ସମର୍ଥ ପୁରୁଷମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କ-ତାଙ୍କ କାର୍ଯ୍ୟରେ ନିଯୁକ୍ତ କଲେ। ନକୁଳ ଯେଉଁମାନଙ୍କୁ ସମ୍ମାନପୂର୍ବକ ଆଣିଥିଲେ—ସେହି ବାହ୍ଲୀକ, ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର, ସୋମଦତ୍ତ ଓ ଜୟଦ୍ରଥ ସେଠାରେ ସ୍ୱାମୀଙ୍କ ପରି ସୁଖରେ ରହିଲେ।

Verse 9

क्षत्ता व्ययकरस्त्वासीद्‌ विदुर: सर्वधर्मवित्‌ । दुर्योधनस्त्वर्हणानि प्रतिजग्राह सर्वश:,सम्पूर्ण धर्मोके ज्ञाता विदुरजी धनको व्यय करनेके कार्यमें नियुक्त किये गये थे तथा राजा दुर्योधन कर देनेवाले राजाओंसे सब प्रकारकी भेंट स्वीकार करने और व्यवस्थापूर्वक रखनेका काम सँभाल रहे थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସର୍ବଧର୍ମବିତ୍ କ୍ଷତ୍ତା ବିଦୁରଙ୍କୁ ବ୍ୟୟ-ବ୍ୟବସ୍ଥାର କାର୍ଯ୍ୟରେ ନିଯୁକ୍ତ କରାଗଲା। ଏବଂ କରଦ ରାଜାମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଦିଆଯାଇଥିବା ଅର୍ଘ୍ୟ ଓ ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ଭେଟ-ଉପହାର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ସବୁଭାବେ ଗ୍ରହଣ କରି, ସେଗୁଡ଼ିକୁ ଯଥାବିଧି ସଜାଇ ରଖିବାର ଦାୟିତ୍ୱ ନେଲେ।

Verse 10

चरणक्षालने कृष्णो ब्राह्मणानां स्वयं हाभूत्‌ । सर्वलोकसमावृत्त: पिप्रीषु: फलमुत्तमम्‌,सब लोगोंसे घिरे हुए भगवान्‌ श्रीकृष्ण सबको संतुष्ट करनेकी इच्छासे स्वयं ही ब्राह्मणोंके चरण पखारनेमें लगे थे, जिससे उत्तम फलकी प्राप्ति होती है

ସେଠାରେ ସମସ୍ତ ଲୋକେ ଘେରି ରହିଥିବାବେଳେ, ସମସ୍ତଙ୍କୁ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ କରି ଉତ୍ତମ ଫଳ ପାଇବା ଇଚ୍ଛାରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ସ୍ୱୟଂ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କର ପାଦ ପ୍ରକ୍ଷାଳନ ସେବାରେ ଲାଗିଲେ।

Verse 11

द्रष्टकामा: सभां चैव धर्मराजं युधिष्ठिरम्‌ । न कश्चिदाहरत्‌ तत्र सहस्रावरमर्हणम्‌,धर्मराज युधिष्ठिरको और उनकी सभाको देखनेकी इच्छासे आये हुए राजाओंमेंसे कोई भी ऐसा नहीं था, जो एक हजार स्वर्णमुद्राओंसे कम भेंट लाया हो

ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଓ ତାଙ୍କ ସଭାକୁ ଦେଖିବା ଇଚ୍ଛାରେ ଆସିଥିବା ରାଜାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ, ସେଠାରେ ହଜାର ସୁବର୍ଣ୍ଣମୁଦ୍ରାଠାରୁ କମ୍ ମୂଲ୍ୟର ଉପହାର ଆଣିଥିବା କେହି ନଥିଲେ।

Verse 12

रत्नैश्व बहुभिस्तत्र धर्मराजमवर्धयत्‌ । कथं तु मम कौरव्यो रत्नदानै: समाप्नुयात्‌

ସେଠାରେ ଅନେକ ରତ୍ନ ଦ୍ୱାରା ସେ ଧର୍ମରାଜଙ୍କର ମର୍ଯ୍ୟାଦା ବଢ଼ାଇଲା; କିନ୍ତୁ କୌରବ (ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ) ମନେ ଭାବିଲା—‘କେବଳ ରତ୍ନଦାନରେ ମୋର ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ କିପରି ସିଦ୍ଧ ହେବ?’

Verse 13

भवनै: सविमानाग्रै: सोदर्कर्बलसंवृतैः

ସେ ସ୍ଥାନ ଉଚ୍ଚ ଉଚ୍ଚ ବିମାନାଗ୍ରଯୁକ୍ତ ଭବନମାନେ ଭରିଥିଲା ଏବଂ ଦୃଢ଼ ପ୍ରାଚୀର ଓ କିଲ୍ଲାବନ୍ଦୀ ଦ୍ୱାରା ସୁରକ୍ଷିତ ଭାବେ ଘେରା ଥିଲା।

Verse 14

लोकराजविमानैश्व ब्राह्मणावसथै: सह । कृतैरावसर्थ्दिव्यर्विमानप्रतिमैस्तथा

ସେଠାରେ ଲୋକରାଜମାନଙ୍କ ବିମାନ ସଦୃଶ ରାଜଭବନମାନଙ୍କ ସହ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଆବାସ ମଧ୍ୟ ଥିଲା; ଏବଂ ଦିବ୍ୟ, ବିମାନପ୍ରତିମ ଭବ୍ୟ ନିବାସମାନେ ମଧ୍ୟ ନିର୍ମିତ ଥିଲେ।

Verse 15

विचित्रै रत्नवद्धिश्व ऋद्धवा परमया युतै: । राजभिश्च समावृत्तैरतीव श्रीसमृद्धिभि: । अशोभत सदो राजन्‌ कौन्तेयस्य महात्मन:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ମହାତ୍ମା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ସଭା ଅଦ୍ଭୁତ ରତ୍ନଖଚିତ ଧନ-ସମ୍ପଦ ଓ ପରମ ଐଶ୍ୱର୍ୟରେ ଶୋଭିତ ଥିଲା; ଅତ୍ୟଧିକ ଶ୍ରୀସମୃଦ୍ଧ ରାଜାମାନଙ୍କ ଭିଡ଼ରେ ଘେରା ହୋଇ ସେ ସଭା ଅତି ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ଦିଶୁଥିଲା।

Verse 16

राजन्‌ ! जिनके शिखर यज्ञ देखनेके लिये आये हुए देवताओंके विमानोंका स्पर्श कर रहे थे, जो जलाशयोंसे परिपूर्ण और सेनाओंसे घिरे हुए थे, उन सुन्दर भवनों, इन्द्रादि लोकपालोंके विमानों, ब्राह्मणोंके निवासस्थानों तथा परम समृद्धिसे सम्पन्न रत्नोंसे परिपूर्ण चित्र एवं विमानके तुल्य बने हुए दिव्य गृहोंसे, समागत राजाओंसे तथा असीम श्रीसमृद्धियोंसे महात्मा कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी वह सभा बड़ी शोभा पा रही थी ।। १३-- १५ || ऋद्धया तु वरुण देवं स्पर्थमानो युधिष्ठिर: । षडग्निनाथ यज्ञेन सोडयजद्‌ दक्षिणावता,महाराज युधिष्ठिर अपनी अनुपम समृद्धिद्वारा वरुणदेवताकी बराबरी कर रहे थे। उन्होंने यज्ञमें छः अग्नियोंकी- स्थापना करके पर्याप्त दक्षिणा देकर उस यज्ञके द्वारा भगवान्‌का यजन किया

ହେ ରାଜନ୍! ଯେ ସୁନ୍ଦର ଭବନମାନଙ୍କର ଶିଖର ଯଜ୍ଞ ଦେଖିବାକୁ ଆସିଥିବା ଦେବତାମାନଙ୍କ ବିମାନକୁ ସ୍ପର୍ଶ କରୁଥିଲା, ଯେଗୁଡ଼ିକ ଜଳାଶୟରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଓ ସେନାଦ୍ୱାରା ଘେରା ଥିଲା—ସେହି ଭବନ, ଇନ୍ଦ୍ରାଦି ଲୋକପାଳଙ୍କ ବିମାନସଦୃଶ ଦିବ୍ୟ ଗୃହ, ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ନିବାସ, ପରମ ସମୃଦ୍ଧିରେ ରତ୍ନପୂର୍ଣ୍ଣ ଚିତ୍ରବିଚିତ୍ର ବିମାନତୁଲ୍ୟ ପ୍ରାସାଦ, ସମାଗତ ରାଜାମାନେ ଓ ଅସୀମ ଶ୍ରୀବୈଭବ—ଏସବୁ ଦ୍ୱାରା ମହାତ୍ମା କୁନ୍ତୀନନ୍ଦନ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ସଭା ଅତ୍ୟନ୍ତ ଶୋଭା ପାଇଥିଲା। ନିଜ ଅନୁପମ ସମୃଦ୍ଧିରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ବରୁଣଦେବଙ୍କ ସମକକ୍ଷ ଦିଶୁଥିଲେ; ସେ ଛଅ ଅଗ୍ନି ସ୍ଥାପନ କରି, ପ୍ରଚୁର ଦକ୍ଷିଣା ସହିତ ଯଜ୍ଞ କରି, ସେହି ଯଜ୍ଞଦ୍ୱାରା ଭଗବାନଙ୍କୁ ଯଜନ କଲେ।

Verse 17

सवञ्जनान्‌ सर्वकामै: समृद्धैः समतर्पयत्‌ । अन्नवान्‌ बहुभक्ष्यश्न भुक्तवज्जनसंवृत: । रत्नोपहारसम्पन्नो बभूव स समागम:,राजाने उस यज्ञमें आये हुए सब लोगोंको उनकी सभी कामनाएँ पूर्ण करके संतुष्ट किया। वह यज्ञसमारोह अन्नसे भरापूरा था, उसमें खाने-पीनेकी सब सामग्रियाँ पर्याप्त मात्रामें सदा प्रस्तुत रहती थीं। वह यज्ञ खा-पीकर तृप्त हुए लोगोंसे ही पूर्ण था। वहाँ कोई भूखा नहीं रहने पाता था तथा उस उत्सवसमारोहमें सब ओर रत्नोंका ही उपहार दिया जाता था

ରାଜା ସେହି ଯଜ୍ଞରେ ଆସିଥିବା ସମସ୍ତଙ୍କୁ ତାଙ୍କର ଜନମାନଙ୍କ ସହିତ, ସମୃଦ୍ଧ ସାମଗ୍ରୀ ଦ୍ୱାରା ସମସ୍ତ କାମନା ପୂରଣ କରି ସନ୍ତୁଷ୍ଟ କଲେ। ସେ ସମାଗମ ଅନ୍ନ ଓ ନାନା ପ୍ରକାର ଭକ୍ଷ୍ୟରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା; ଭୋଜନ କରି ତୃପ୍ତ ଲୋକମାନେ ତାହାକୁ ଭରି ରଖିଥିଲେ। ସେ ମହୋତ୍ସବ ସବୁଦିଗରେ ରତ୍ନୋପହାରରେ ସମ୍ପନ୍ନ ହୋଇଥିଲା।

Verse 18

इडाज्यहोमाहुतिभिमन्त्रशिक्षाविशारदै: । तस्मिन्‌ हि ततृपुर्देवास्तते यज्ञे महर्षिभि:,मन्त्रशिक्षामें निपुण महर्षियोंद्वारा विस्तारपूर्वक किये जानेवाले उस यज्ञमें इडा (मन्त्र- पाठ एवं स्तुति), घृतहोम तथा तिल आदि शाकल्य पदार्थोंकी आहुतियोंसे देवतालोग तृप्त हो गये

ମନ୍ତ୍ରଶିକ୍ଷାରେ ପାରଙ୍ଗତ ମହର୍ଷିମାନେ ବିଧିପୂର୍ବକ ବିସ୍ତାରରେ କରିଥିବା ସେହି ଯଜ୍ଞରେ, ଇଡା (ମନ୍ତ୍ରପାଠ ଓ ସ୍ତୁତି), ଘୃତହୋମ ଏବଂ ନାନା ପ୍ରକାର ଆହୁତି ଦ୍ୱାରା ଦେବତାମାନେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ତୃପ୍ତ ହେଲେ।

Verse 19

यथा देवास्तथा विप्रा दक्षिणान्नमहा धनै: । ततृपुः सर्ववर्णाश्व॒ तस्मिन्‌ यज्ञे मुदान्विता:,जिस प्रकार देवता तृप्त हुए उसी प्रकार दक्षिणामें अन्न और महान्‌ धन पाकर ब्राह्मण भी तृप्त हो गये। अधिक क्या कहा जाय, उस यज्ञमें सभी वर्णके लोग बड़े प्रसन्न थे, सबको पूर्ण तृप्ति मिली थी

ଯେପରି ଦେବତାମାନେ ତୃପ୍ତ ହେଲେ, ସେପରି ଦକ୍ଷିଣାରେ ଅନ୍ନ ଓ ମହାଧନ ପାଇ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ମଧ୍ୟ ତୃପ୍ତ ହେଲେ। ଅଧିକ କ’ଣ କହିବା? ସେହି ଯଜ୍ଞରେ ସମସ୍ତ ବର୍ଣ୍ଣର ଲୋକ ଆନନ୍ଦରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲେ; ସମସ୍ତଙ୍କୁ ପୂର୍ଣ୍ଣ ସନ୍ତୋଷ ମିଳିଥିଲା।

Verse 34

इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत राजस्‌यपर्वमें निमन्त्रित राजाओंका आगमनविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ରାଜସୂୟପର୍ବରେ ଆମନ୍ତ୍ରିତ ରାଜମାନଙ୍କ ଆଗମନବିଷୟକ ଚଉତ୍ରିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 35

इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि राजसूयपर्वणि यज्ञकरणे पज्चत्रिंशो डध्याय:

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବର ରାଜସୂୟପର୍ବରେ ଯଜ୍ଞକରଣବିଷୟକ ପଞ୍ଚତ୍ରିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 126

यज्ञमित्येव राजान: स्पर्धमाना ददुर्धनम्‌ प्रत्येक राजा बहुसंख्यक रत्नोंकी भेंट देकर धर्मराज युधिष्ठिरके धनकी वृद्धि करने लगा। सभी राजा यह होड़ लगाकर धन दे रहे थे कि कुरुनन्दन युधिष्ठिर किसी प्रकार मेरे ही दिये हुए रत्नोंके दानसे अपना यज्ञ सम्पूर्ण करें

‘ଯଜ୍ଞ, ଯଜ୍ଞ’—ଏହି ନାମରେ ରାଜମାନେ ପ୍ରତିସ୍ପର୍ଧା କରି ଧନ ଦେବାକୁ ଲାଗିଲେ। ପ୍ରତ୍ୟେକ ରାଜା ଅନେକ ରତ୍ନ ଭେଟି ଦେଇ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଧନବୃଦ୍ଧି କରୁଥିଲେ। ସମସ୍ତ ରାଜା ହୋଡ଼ ଲଗାଇ ଧନ ଦେଉଥିଲେ—ଯେ କୁରୁନନ୍ଦନ ଯୁଧିଷ୍ଠିର କିପରି ହେଉ ମୋର ଦିଆ ରତ୍ନଦାନରେ ନିଜ ଯଜ୍ଞ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ କରନ୍ତୁ।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether a public insult in a formal assembly should be met with conciliatory tolerance (to preserve decorum) or with firm correction (to protect dharma, protocol, and the legitimacy of collective honor).

Public institutions are sustained by disciplined speech and calibrated authority: patience is virtuous, but legitimizing baseless harshness corrodes dharma; honor is framed as guṇa- and order-based rather than merely personal or factional.

No explicit phalaśruti appears in this excerpt; the meta-function is doctrinal and institutional—establishing a normative rationale for precedence, reverence, and corrective speech within the sabhā.