Adhyaya 25
Sabha ParvaAdhyaya 2514 Verses

Adhyaya 25

Arjuna’s Northern Conquests: Kimpuruṣa-lands, Hāṭaka, Mānasasaras, and the Harivarṣa Boundary

Upa-parva: Digvijaya (Northern Campaign) — Arjuna’s Uttara-Digvijaya Episode

Vaiśaṃpāyana narrates Arjuna’s northward advance beyond Śvetaparvata into the Kimpuruṣa-associated region guarded by Drumaputra, where Arjuna achieves victory and imposes tribute (kara). He proceeds to a territory named Hāṭaka, described as protected by Guhyakas, and then views the eminent Mānasasaras lake and associated ṛṣi-streams. Near Hāṭaka and the Gandharva-protected zone, Arjuna secures exceptional horses from a Gandharva city. Reaching the northern Harivarṣa region, Arjuna intends to conquer, but powerful gatekeepers warn that entry into the city is impossible for a human body and that one who enters would cease to be human; they commend his achievements and offer compliance. Arjuna states his objective as establishing Yudhiṣṭhira’s paramountcy and requests whatever tribute is feasible. The gatekeepers provide divine garments, ornaments, and special skins as tribute. Arjuna completes extensive northern engagements against kṣatriya and dāsyu groups, collects wealth, gems, and notable horses, and returns with a large fourfold army to Śakraprastha.

Chapter Arc: अर्जुन युधिष्ठिर के सम्मुख अपने सामर्थ्य और उपलब्धियों का निवेदन करता है—धनुष, अस्त्र, बाण, यश और बल जैसे दुर्लभ साधन उसे प्राप्त हो चुके हैं; अब वह राजसूय-यज्ञ के लिए आवश्यक दिग्विजय और कोष-वृद्धि की दिशा में आगे बढ़ने की अनुमति चाहता है। → युधिष्ठिर के राजसूय-संकल्प को सिद्ध करने हेतु व्यावहारिक चुनौती उभरती है—कोष का परिवर्धन, कर-आहार, और चारों दिशाओं में राजाओं को वश में कर समृद्धि तथा अधीनता का प्रमाण जुटाना। आदेश स्पष्ट होता है: ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराकर शुभ मुहूर्त में प्रस्थान। → दिग्विजय का निर्णायक विभाजन होता है—अर्जुन उत्तर दिशा की ओर, भीम पूर्व, सहदेव दक्षिण, और नकुल पश्चिम की ओर प्रस्थान करते हैं; धर्मराज द्वारा पूजित होकर चारों भाई विशाल सेनाओं सहित निकल पड़ते हैं, और अर्जुन को विजय का अटल आश्वासन मिलता है। → खाण्डवप्रस्थ में युधिष्ठिर सुहृदों से घिरे राजलक्ष्मी सहित स्थित रहते हैं, जबकि पाण्डव-सेनाएँ दिशाओं में फैलकर अभियान आरम्भ करती हैं—राजसूय के लिए आवश्यक राजनीतिक-आर्थिक आधार तैयार होने लगता है। → चारों दिशाओं में निकल चुकी सेनाओं के सामने कौन-कौन से राजा झुकेंगे, कौन प्रतिरोध करेगा, और किस दिशा में सबसे कठिन संघर्ष आएगा—यह आगे के अध्यायों के लिए खुला रह जाता है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २६ श्लोक मिलाकर कुल ८६ श्लोक हैं) है ० बकछ। ] अि्ऑशा:<ह - नरकट बेंतकी तरह पोले डंठलका एक पौधा होता है, जो कलम बनानेके काम आता है। (दिग्विजयपर्व) पजञ्चविशो< ध्याय: अर्जुन आदि चारों भाइयोंकी दिग्विजयके लिये यात्रा वैशम्पायन उवाच पार्थ: प्राप्य धनु: श्रेष्ठमक्षय्यौ च महेषुधी । रथं ध्वजं सभां चैव युधिष्ठिरमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! अर्जुन श्रेष्ठ धनुष, दो विशाल एवं अक्षय तूणीर, दिव्य रथ, ध्वज और अद्भुत सभाभवन पहले ही प्राप्त कर चुके थे; अब वे युधिष्ठिरसे बोले इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत दिग्विजयपर्वमें दिग्विजयका संक्षिप्त वर्णनविषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २५ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ९६ श्लोक मिलाकर कुल २०३ श्लोक हैं) नशा (0) आज अत+- षड्विशो<5ध्याय: अर्जुनके द्वारा अनेक देशों, राजाओं तथा भगदत्तकी पराजय जनमेजय उवाच दिशामभिजयं ब्रह्मन्‌ विस्तरेणानुकीर्तय । न हि तृप्यामि पूर्वेषां शृण्वानश्वरितं महत्‌

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ପାର୍ଥ (ଅର୍ଜୁନ) ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଧନୁଷ, ଦୁଇଟି ମହାନ ଓ ଅକ୍ଷୟ ତୂଣୀର, ଦିବ୍ୟ ରଥ, ଧ୍ୱଜ ଏବଂ ଅଦ୍ଭୁତ ସଭାଭବନ ପୂର୍ବରୁ ହିଁ ପ୍ରାପ୍ତ କରିଥିଲେ; ତା’ପରେ ସେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଏଭଳି କହିଲେ।

Verse 2

अर्जुन उवाच धनुरस्त्रं शरा वीर्य पक्षो भूमिर्यशों बलम्‌ | प्राप्तमेतन्‍्मया राजन दुष्प्रापं यदभीप्सितम्‌,अर्जुनने कहा--राजन्‌! मुझे धनुष, अस्त्र, बाण, पराक्रम, श्रीकृष्ण-जैसे सहायक, भूमि (राज्य एवं इन्द्रप्रस्थका दुर्ग, यश और बल--ये सभी दुर्लभ एवं मनोवांछित वस्तुएँ प्राप्त हो चुकी हैं

ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ଧନୁଷ, ଅସ୍ତ୍ର, ବାଣ, ପରାକ୍ରମ, ସହାୟ, ଭୂମି-ରାଜ୍ୟ, ଯଶ ଓ ବଳ—ଯାହା ଦୁର୍ଲଭ ଏବଂ ମୋର ଅଭୀଷ୍ଟ ଥିଲା, ସେ ସବୁ ମୁଁ ପ୍ରାପ୍ତ କରିଛି।

Verse 3

तत्र कृत्यमहं मनन्‍्ये कोशस्य परिवर्धनम्‌ | करमाहारयिष्यामि राज्ञ: सर्वान्‌ नृपोत्तम,नृपश्रेष्ठ अब मैं अपने कोषको बढ़ाना ही आवश्यक कार्य समझता हूँ। मेरी इच्छा है कि समस्त राजाओंको जीतकर उनसे कर वसूल करूँ

ନୃପଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏବେ ମୁଁ କୋଷର ପରିବର୍ଧନକୁ ହିଁ ଆବଶ୍ୟକ କାର୍ଯ୍ୟ ଭାବେ ମନେ କରୁଛି। ହେ ନୃପୋତ୍ତମ! ସମସ୍ତ ରାଜାଙ୍କୁ ଅଧୀନ କରି ତାଙ୍କଠାରୁ କର-ଭେଟି ଆହରଣ କରିବାକୁ ମୋର ଇଚ୍ଛା।

Verse 4

विजयाय प्रयास्थामि दिशं धनदपालिताम्‌ । तिथावथ मुहूर्ते च नक्षत्रे चाभिपूजिते,आपकी आज्ञा हो तो उत्तम तिथि, मुहूर्त और नक्षत्रमें कुबेरद्वारा पालित उत्तर दिशाको जीतनेके लिये प्रस्थान करूँ

ଆପଣଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ଥିଲେ, ମୁଁ ବିଜୟ ପାଇଁ ଧନଦ (କୁବେର) ଦ୍ୱାରା ପାଳିତ ଉତ୍ତର ଦିଗକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରିବି—ଶୁଭ ତିଥି, ମୁହୂର୍ତ୍ତ ଓ ପୂଜିତ ନକ୍ଷତ୍ରରେ।

Verse 5

(एतच्छुत्वा कुरुश्रेष्ठो धर्मराज: सहानुज: । प्रह्दष्टो मन्त्रिभिश्वैव व्यासधौम्यादिभि: सह ।। ततो व्यासो महाबुद्धिरुवाचेदं वचो<र्जुनम्‌ यह सुनकर भाइयोंसहित कुरुश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरको बड़ी प्रसन्नता हुई। साथ ही मन्त्रियों तथा व्यास, धौम्य आदि महर्षियोंको बड़ा हर्ष हुआ। तत्पश्चात्‌ परम बुद्धिमान्‌ व्यासजीने अर्जुनसे कहा। व्यास उवाच साधु साध्विति कौन्तेय दिष्ट्या ते बुद्धिरीदृशी । पृथिवीमखिलां जेतुमेको5ध्यवसितो भवान्‌ ।। व्यासजी बोले--कुन्तीनन्दन! मैं तुम्हें बारंबार साधुवाद देता हूँ। सौभाग्यसे तुम्हारी बुद्धिमें ऐसा संकल्प हुआ है। तुम सारी पृथ्वीको अकेले ही जीतनेके लिये उत्साहित हो रहे हो। धन्य: पाण्डुर्महीपालो यस्य पुत्रस्त्वमीदृश: । सर्व प्राप्स्यति राजेन्द्रो धर्मपुत्रो युधिष्ठिर: ।। त्वद्वीयेण स धर्मात्मा सार्वभौमत्वमेष्यति । राजा पाणए्डु धन्य थे, जिनके पुत्र तुम ऐसे पराक्रमी निकले। तुम्हारे पराक्रमसे धर्मपुत्र धर्मात्मा महाराज युधिष्ठिर सब कुछ पा लेंगे। सार्वभौम सम्राटके पदपर प्रतिष्ठित होंगे। त्वद्वाहुबलमाश्रित्य राजसूयमवाप्स्यति ।। सुनयाद्‌ वासुदेवस्य भीमार्जुनबलेन च । यमयोश्रैव वीर्येण सर्व प्राप्स्पति धर्मराट्‌ ।। तुम्हारे बाहुबलका सहारा पाकर ये राजसूययज्ञ पूर्ण कर लेंगे। भगवान्‌ श्रीकृष्णकी उत्तम नीति, भीम और अर्जुनके बल तथा नकुल और सहदेवके पराक्रमसे धर्मराज युधिष्ठिरको सब कुछ प्राप्त हो जायगा। तस्माद्‌ दिशं देवगुप्तामुदीचीं गच्छ फाल्गुन । शक्तो भवान्‌ सुराज्जित्वा रत्नान्याहर्तुमोजसा ।। इसलिये अर्जुन! तुम तो देवताओंद्वारा सुरक्षित उत्तर दिशाकी यात्रा करो; क्योंकि देवताओंको जीतकर वहाँसे बलपूर्वक रत्न ले आनेमें तुम्हीं समर्थ हो। प्राचीं भीमो बलश्लाघी प्रयातु भरतर्षभ: । याम्यां तत्र दिश॑ यातु सहदेवो महारथ: ।। प्रतीचीं नकुलो गन्‍्ता वरुणेनाभिपालिताम्‌ । एषा मे नैछिकी बुद्धि: क्रियतां भरतर्षभा: ।। अपने बलद्वारा दूसरोंसे होड़ लेनेवाले भरतकुल-भूषण भीमसेन पूर्व दिशाकी यात्रा करें। महारथी सहदेव दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थान करें और नकुल वरुणपालित पश्चिम दिशापर आक्रमण करें। भरतश्रेष्ठ पाण्डवो! मेरी बुद्धिका ऐसा ही निश्चय है। तुमलोग इसका पालन करो। वैशग्पायन उवाच श्रुत्वा व्यासवचो हृष्टास्तमूचु: पाण्डुनन्दना: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! व्यासजीकी यह बात सुनकर पाण्डवोंने बड़े हर्षके साथ कहा। पाण्डवा ऊचु: एवमस्तु मुनिश्रेष्ठ यथा55ज्ञापयसि प्रभो ।) पाण्डव बोले--मुनिश्रेष्ठ आप जैसी आज्ञा देते हैं वैसा ही हो। वैशग्पायन उवाच धनंजयवच: श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिर: । स्निग्धगम्भीरनादिन्या त॑ गिरा प्रत्यभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! अर्जुनकी पूर्वोक्त बात सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर स्नेहयुक्त गम्भीर वाणीमें उनसे इस प्रकार बोले--

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଏହା ଶୁଣି କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଅନୁଜମାନଙ୍କ ସହ ଅତ୍ୟନ୍ତ ହର୍ଷିତ ହେଲେ; ମନ୍ତ୍ରୀମଣ୍ଡଳ ଓ ବ୍ୟାସ, ଧୌମ୍ୟ ଆଦି ମହର୍ଷିମାନେ ମଧ୍ୟ ସମାନ ଆନନ୍ଦିତ ହେଲେ। ତାପରେ ମହାବୁଦ୍ଧିମାନ ବ୍ୟାସ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ କହିଲେ— ବ୍ୟାସ କହିଲେ—“ସାଧୁ, ସାଧୁ, କୁନ୍ତୀନନ୍ଦନ! ସୌଭାଗ୍ୟବଶତଃ ତୋର ବୁଦ୍ଧି ଏପରି ଦୃଢ଼ ସଙ୍କଳ୍ପରେ ନିଶ୍ଚିତ ହୋଇଛି। ତୁ ଏକାହାତେ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀ ଜୟ କରିବାକୁ ନିଷ୍ଠା କରିଛୁ। ଏପରି ପୁତ୍ର ଥିବାରୁ ରାଜା ପାଣ୍ଡୁ ଧନ୍ୟ। ତୋର ପରାକ୍ରମରେ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଧର୍ମାତ୍ମା ରାଜେନ୍ଦ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସବୁକିଛି ପାଇବେ ଏବଂ ସାର୍ବଭୌମତ୍ୱ ପ୍ରାପ୍ତ କରିବେ। ତୋର ବାହୁବଳ ଆଶ୍ରୟ କରି ସେ ରାଜସୂୟ ଯଜ୍ଞ ସମ୍ପନ୍ନ କରିବେ। ବାସୁଦେବଙ୍କ ଉତ୍ତମ ନୀତି, ଭୀମ ଓ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ବଳ, ଏବଂ ଯମଜମାନଙ୍କ ବୀର୍ଯ୍ୟରେ ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ଅଭୀଷ୍ଟ ସବୁ ସିଦ୍ଧ ହେବ। ଏହିପରି, ହେ ଫାଲ୍ଗୁନ, ଦେବମାନେ ରକ୍ଷା କରୁଥିବା ଉତ୍ତର ଦିଗକୁ ଯା; ସେଠାରେ ଦେବମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଜୟ କରି ନିଜ ତେଜରେ ରତ୍ନ ଆଣିବାକୁ ତୁ ସମର୍ଥ। ବଳଗର୍ବୀ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ ଭୀମ ପୂର୍ବ ଦିଗକୁ ଯାଉନ୍ତୁ; ମହାରଥୀ ସହଦେବ ଦକ୍ଷିଣ ଦିଗକୁ ଯାଉନ୍ତୁ; ଏବଂ ବରୁଣରକ୍ଷିତ ପଶ୍ଚିମ ଦିଗକୁ ଅସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟାନିପୁଣ ନକୁଳ ଯାଉନ୍ତୁ। ଏହା ମୋର ଦୃଢ଼ ନିଷ୍ପତ୍ତି—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠମାନେ, ଏହା କାର୍ଯ୍ୟକର କର।” ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ବ୍ୟାସଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନେ ହର୍ଷିତ ହୋଇ କହିଲେ— ପାଣ୍ଡବମାନେ—“ମୁନିଶ୍ରେଷ୍ଠ, ପ୍ରଭୋ! ଆପଣ ଯେପରି ଆଜ୍ଞା ଦେଉଛନ୍ତି, ସେପରି ହେଉ।” ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଧନଞ୍ଜୟଙ୍କ କଥା ଶୁଣି ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସ୍ନେହମୟ ଗମ୍ଭୀର ବାଣୀରେ ତାଙ୍କୁ ପ୍ରତିଉତ୍ତର ଦେଲେ।

Verse 6

स्वस्तिवाच्याहतो विप्रान्‌ प्रयाहि भरतर्षभ । दुर्हदामप्रहर्षाय सुह्ृदां नन्दनाय च,'भरतकुलभूषण! पूजनीय ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर यात्रा करो। तुम्हारी यह यात्रा शत्रुओंका शोक और सुहृदोंका आनन्द बढ़ानेवाली हो

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ପୂଜ୍ୟ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସ୍ୱସ୍ତିବାଚନ କରାଇ ତାପରେ ପ୍ରସ୍ଥାନ କର। ଏହି ଯାତ୍ରା ତୋର ଦୁର୍ହୃଦମାନଙ୍କୁ ଆନନ୍ଦ ନ ଦେଉ, ଏବଂ ସୁହୃଦମାନଙ୍କ ଆନନ୍ଦ ବଢ଼ାଉ।”

Verse 7

इत्युक्त: प्रययौ पार्थ: सैन्येन महता55वृतः,ससैन्या: प्रययु: सर्वे धर्मराजेन पूजिता: । उनके इस प्रकार आदेश देनेपर कुन्तीपुत्र अर्जुन विशाल सेनाके साथ अग्निके दिये हुए 3 तकर्मा दिव्य रथद्वारा वहाँसे प्रस्थित हुए। इसी प्रकार भीमसेन तथा नरश्रेष्ठ नकुल- --इन सभी भाइयोंने धर्मराजसे सम्मानित हो सेनाओंके साथ दिग्विजयके लिये प्रस्थान किया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଏପରି ଆଦେଶ ପାଇ ପାର୍ଥ (ଅର୍ଜୁନ) ବିଶାଳ ସେନାରେ ଘେରା ହୋଇ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ। ସେହିପରି ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସମ୍ମାନିତ ହୋଇ ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତେ ମଧ୍ୟ ନିଜ ନିଜ ସେନା ସହ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।

Verse 8

अन्निदत्तेन दिव्येन रथेनाद्भधुतकर्मणा । तथैव भीमसेनो5पि यमौ च पुरुषर्षभौ

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଅଗ୍ନିଦ୍ୱାରା ଦତ୍ତ, ଅଦ୍ଭୁତ କାର୍ଯ୍ୟଶକ୍ତିସମ୍ପନ୍ନ ଦିବ୍ୟ ରଥରେ ଆରୋହଣ କରି; ସେହିପରି ଭୀମସେନ ଓ ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ ଯମଜଦ୍ୱୟ (ନକୁଳ-ସହଦେବ) ମଧ୍ୟ ଅଗ୍ରସର ହେଲେ।

Verse 9

दिशं धनपतेरिष्टामजयत्‌ पाकशासनि:,राजन! इन्द्रकुमार अर्जुनने कुबेरकी प्रिय उत्तर दिशापर विजय पायी। भीमसेनने पूर्व दिशा, सहदेवने दक्षिण दिशा तथा अस्त्रवेत्ता नकुलने पश्चिम दिशाको जीता

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ପାକଶାସନୀ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ର ଅର୍ଜୁନ ଧନପତି କୁବେରଙ୍କୁ ପ୍ରିୟ ଉତ୍ତର ଦିଗକୁ ଜୟ କଲେ। ଭୀମସେନ ପୂର୍ବ ଦିଗକୁ, ସହଦେବ ଦକ୍ଷିଣ ଦିଗକୁ, ଏବଂ ଅସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟାନିପୁଣ ନକୁଳ ପଶ୍ଚିମ ଦିଗକୁ ବଶ କଲେ।

Verse 10

भीमसेनस्तथा प्राचीं सहदेवस्तु दक्षिणाम्‌ । प्रतीचीं नकुलो राजन्‌ दिशं व्यजयतास्त्रवित्‌,राजन! इन्द्रकुमार अर्जुनने कुबेरकी प्रिय उत्तर दिशापर विजय पायी। भीमसेनने पूर्व दिशा, सहदेवने दक्षिण दिशा तथा अस्त्रवेत्ता नकुलने पश्चिम दिशाको जीता

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ରାଜନ! ଭୀମସେନ ପୂର୍ବ ଦିଗକୁ ଜୟ କଲେ; ସହଦେବ ଦକ୍ଷିଣ ଦିଗକୁ; ଏବଂ ଅସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟାରେ ପାରଙ୍ଗତ ନକୁଳ ପଶ୍ଚିମ ଦିଗକୁ ଜିତିଲେ। ପରେ ଇନ୍ଦ୍ରପୁତ୍ର ଅର୍ଜୁନ କୁବେରଙ୍କ ପ୍ରିୟ ଉତ୍ତର ଦିଗରେ ମଧ୍ୟ ବିଜୟ ଲାଭ କଲେ।

Verse 11

खाण्डवप्रस्थमध्यस्थो धर्मराजो युधिष्ठिर: । आसीत्‌ परमया लक्ष्म्या सुहृदूगणवृत: प्रभु:,केवल धर्मराज युधिष्ठिर सुहृदोंसे घिरे हुए अपनी उत्तम राजलक्ष्मीके साथ खाण्डवप्रस्थमें रह गये थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଖାଣ୍ଡବପ୍ରସ୍ଥର ମଧ୍ୟଭାଗରେ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ରହିଲେ; ସେ ପରମ ରାଜଲକ୍ଷ୍ମୀରେ ସମୃଦ୍ଧ ଥିଲେ ଏବଂ ସୁହୃଦଗଣରେ ଘେରା ଥାଇ ପ୍ରଭୁସମ ଶୋଭିତ ହେଲେ।

Verse 25

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि दिग्विजयसंक्षेपक थने पज्चविंशो<5 ध्याय:

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବରେ ଦିଗ୍ବିଜୟପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଦିଗ୍ବିଜୟ-ସଂକ୍ଷେପକ ଭାଗର ପଞ୍ଚବିଂଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 66

विजयस्ते ध्रुवं पार्थ प्रियं काममवाप्स्यसि । 'पार्थ! तुम्हारी विजय सुनिश्चित है, तुम अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त करोगे”

ହେ ପାର୍ଥ! ତୋର ବିଜୟ ନିଶ୍ଚିତ; ତୁ ତୋର ପ୍ରିୟ ଅଭୀଷ୍ଟକୁ ପ୍ରାପ୍ତ କରିବୁ।

Verse 83

ससैन्या: प्रययु: सर्वे धर्मराजेन पूजिता: । उनके इस प्रकार आदेश देनेपर कुन्तीपुत्र अर्जुन विशाल सेनाके साथ अग्निके दिये हुए 3 तकर्मा दिव्य रथद्वारा वहाँसे प्रस्थित हुए। इसी प्रकार भीमसेन तथा नरश्रेष्ठ नकुल- --इन सभी भाइयोंने धर्मराजसे सम्मानित हो सेनाओंके साथ दिग्विजयके लिये प्रस्थान किया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସମ୍ମାନିତ ହୋଇ ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ସେନାସହିତ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ। ସେ ଏପରି ଆଜ୍ଞା ଦେଇଥିବାବେଳେ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଅର୍ଜୁନ ବିଶାଳ ସେନା ସହ, ଅଗ୍ନିଦତ୍ତ ତିନିଟି ଦିବ୍ୟ ରଥରେ ଆରୋହଣ କରି ସେଠାରୁ ଯାତ୍ରା କଲେ। ଏହିପରି ଭୀମସେନ ଓ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ ନକୁଳ—ଅର୍ଥାତ୍ ସମସ୍ତ ଭାଇ—ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସତ୍କୃତ ହୋଇ ସେନାସହିତ ଦିଗ୍ବିଜୟ ପାଇଁ ବାହାରିଲେ।

Frequently Asked Questions

Arjuna must choose between demonstrating total conquest by forced entry and honoring a boundary where human entry is framed as impermissible; he resolves this by prioritizing political acknowledgment and tribute over escalation.

Political objectives can be fulfilled through calibrated means: recognition, tribute, and diplomacy may accomplish legitimacy goals more appropriately than maximal territorial penetration when constraints are categorical.

No explicit phalaśruti is stated here; the chapter’s significance is contextual—documenting the rājasūya-enabling digvijaya and illustrating boundary-aware sovereignty within the epic’s cosmographic worldview.