
Jarāsandha-nipātana, rāja-mokṣa, and rājasūya-sāhāyya-prārthanā (Jarāsandha’s fall, liberation of kings, and request for support)
Upa-parva: Jārāsandha-vadha (Episode within Sabhā-parva: Liberation of captive kings and rājasūya enablement)
Vaiśaṃpāyana narrates a rapid sequence following the resolve to remove Jarāsandha as an obstacle to imperial rite. Bhīmasena addresses Kṛṣṇa with focused intent to end Jarāsandha’s threat; Kṛṣṇa, urging action, calls upon Bhīma to demonstrate his strength. Bhīma then overpowers Jarāsandha in a forceful display—lifting, whirling, and crushing him—creating a terrifying public tumult in Magadha. With Jarāsandha neutralized, the party exits by night, and Kṛṣṇa organizes departure using Jarāsandha’s chariot. Captive kings are freed; they honor Kṛṣṇa with gifts and formal praise, framing the act as dharma-restoration. Kṛṣṇa then articulates the political-ritual objective: Yudhiṣṭhira intends to perform the rājasūya, and the released rulers are asked to provide assistance. They consent. Jarāsandha’s son Sahadeva (of Magadha) approaches with humility and offerings; Kṛṣṇa grants assurance and installs him, emphasizing orderly succession. Kṛṣṇa returns to Indraprastha, reports success, and is honored by Yudhiṣṭhira and the Pāṇḍavas. The chapter closes with the consolidation of political confidence and the strengthening of the Pāṇḍavas’ standing in preparation for lawful kingship.
Chapter Arc: मगध-सम्राट जरासंध अपने दरबार में ब्राह्मणों के वचनों से उकसता है—‘मैं निरपराध हूँ, फिर मुझे शत्रु क्यों मानते हो?’—और अपने क्षत्रिय-स्वाभिमान को धर्म की भाषा में ढालकर चुनौती की भूमिका बाँधता है। → ब्राह्मण-प्रेषित वाणी उसे रण-धर्म की ओर धकेलती है: जो क्षत्रिय निरपराध पर आक्रमण करता है, वह धर्म-पीड़ा भोगता है; पर जो रण के बाद स्वर्ग का द्वार जानता है, वह युद्ध से कैसे हटे? इसी बीच कृष्ण-भीम-अर्जुन की योजना-छाया स्पष्ट होती जाती है—जरासंध को उसके ही नियमों में बाँधकर निर्णायक संघर्ष तक लाना। → ललकार स्पष्ट हो उठती है—‘मगधराज! हम तुम्हें युद्ध के लिए आह्वान करते हैं; स्थिर होकर युद्ध करो, या सब राजाओं को छोड़ दो, नहीं तो यमलोक को जाओ।’ जरासंध युद्ध-उपस्थित देखकर अपने सेनापति (कौशिक/चित्रसेन) को स्मरण करता है; उधर शौरि कृष्ण ‘अवध्य’ कहे जाने वाले जरासंध के वध हेतु ब्राह्मी आज्ञा को अग्र रखकर संकल्प करते हैं। → अध्याय का अंत तैयारी और संकल्प पर टिकता है: जरासंध अपने बल और प्रतिष्ठा के साथ युद्ध-व्यवस्था में प्रवृत्त होता है, और कृष्ण पक्ष भीतर-भीतर उस ‘अवध्यता’ को भेदने की नीति को दृढ़ करता है—यह संघर्ष केवल बाहुबल नहीं, धर्म-प्रतिज्ञा और नियति का भी है। → अगला क्षण निर्णायक है—क्या जरासंध अपनी शर्तों पर युद्ध चुनेगा, और क्या कृष्ण की ‘ब्राह्मी आज्ञा’ उसे वध-योग्य बनाने का मार्ग खोल देगी?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ५७ श्लोक हैं) ऑपन-मराज बक। डे द्ाविशोद्ध्याय: जरासंध और श्रीकृष्णका संवाद तथा जरासंधकी युद्धके लिये तैयारी एवं जरासंधका श्रीकृष्णके साथ वैर होनेके कारणका वर्णन जरासंध उवाच न स्मरामि कदा वैरं कृतं युष्माभिरित्युत । चिन्तयंश्व न पश्यामि भवतां प्रति वैकृतम्,जरासंध बोला--ब्राह्मणो! मुझे याद नहीं आता कि कब मैंने आपलोगोंके साथ वैर किया है? बहुत सोचनेपर भी मुझे आपके प्रति अपने द्वारा किया हुआ अपराध नहीं दिखायी देता
ଜରାସନ୍ଧ କହିଲା—ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ! ମୁଁ କେବେ ତୁମମାନଙ୍କ ସହିତ ବୈର କରିଥିଲି ବୋଲି ମୋତେ ସ୍ମରଣ ନାହିଁ। ଭଲଭାବେ ଚିନ୍ତା କଲେ ମଧ୍ୟ ତୁମମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ମୋର କୌଣସି ଅପରାଧ ଦେଖୁନି।
Verse 2
वैकृते वासति कं मन्यध्वं मामनागसम् | अरें वै ब्रूत हे विप्रा: सतां समय एष हि,विप्रगण! जब मुझसे अपराध ही नहीं हुआ है, तब मुझ निरपराधको आपलोग शत्रु कैसे मान रहे हैं? यह बताइये। क्या यही साधु पुरुषोंका बर्ताव है?
ଏହି ବିକୃତ ଓ ଅଶାନ୍ତ ପରିସ୍ଥିତିରେ ମୁଁ ଏଠାରେ ରହୁଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ନିର୍ଦୋଷ ମୋତେ ତୁମେ କାହିଁକି ଶତ୍ରୁ ଭାବୁଛ? ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ, ସ୍ପଷ୍ଟ କହ—ଏହା କି ସଜ୍ଜନମାନଙ୍କର ମାନ୍ୟ ଆଚରଣ ଓ ଧର୍ମସମ୍ମତ ସମୟ?
Verse 3
अथ धर्मोपघाताद्धि मन: समुपतप्यते । यो5नागसि प्रसजति क्षत्रियो हि न संशय:,किसीके धर्म (और अर्थ)-में बाधा डालनेसे अवश्य ही मनको बड़ा संताप होता है। जो धर्मज्ञ महारथी क्षत्रिय लोकमें धर्मके विपरीत आचरण करता हुआ किसी निरपराध व्यक्तिपर दूसरोंके धन और धर्मके नाशका दोष लगाता है, वह कष्टमयी गतिको प्राप्त होता है और अपनेको कल्याणसे भी वंचित कर लेता है; इसमें संशय नहीं है
ଅନ୍ୟର ଧର୍ମକୁ ଅବରୋଧ କଲେ ମନ ନିଶ୍ଚୟ ଦହିଯାଏ। ଯେ କ୍ଷତ୍ରିୟ ଅଧର୍ମରେ ପଡ଼ି ନିର୍ଦୋଷଙ୍କୁ ଆକ୍ରମଣ କରେ କିମ୍ବା ଦୋଷାରୋପ କରେ, ସେ ନିଜ ପାଇଁ ଦୁଃଖ ଆଣେ—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।
Verse 4
अतोडन्यथा चरँल्लोके धर्मज्ञ: सन् महारथ: | वृजिनां गतिमाप्रोति श्रेयसो<5प्युपहन्ति च,किसीके धर्म (और अर्थ)-में बाधा डालनेसे अवश्य ही मनको बड़ा संताप होता है। जो धर्मज्ञ महारथी क्षत्रिय लोकमें धर्मके विपरीत आचरण करता हुआ किसी निरपराध व्यक्तिपर दूसरोंके धन और धर्मके नाशका दोष लगाता है, वह कष्टमयी गतिको प्राप्त होता है और अपनेको कल्याणसे भी वंचित कर लेता है; इसमें संशय नहीं है
ଏହେତୁ ଯେ ଧର୍ମଜ୍ଞ ହୋଇ, ମହାରଥୀ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ଲୋକେ ଧର୍ମବିରୋଧୀ ଆଚରଣ କରେ—ଅନ୍ୟର ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥକୁ ଅବରୋଧ କରେ, ଏବଂ ନିର୍ଦୋଷଙ୍କ ଉପରେ ପରଧନ ଓ ପୁଣ୍ୟନାଶର ଦୋଷ ଲାଦେ—ସେ ପାପମୟ, କ୍ଲେଶଦାୟକ ଗତିକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ ଓ ନିଜ ଶ୍ରେୟକୁ ମଧ୍ୟ ନଷ୍ଟ କରେ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।
Verse 5
त्रैलोक्ये क्षत्रधर्मो हि श्रेयान् वै साधुचारिणाम् | नान्यं धर्म प्रशंसन्ति ये च धर्मविदो जना:,सत्कर्म करनेवाले क्षत्रियोंके लिये तीनों लोकोंमें क्षत्रियधर्म ही श्रेष्ठ है। धर्मज्ञ पुरुष क्षत्रियके लिये अन्य धर्मकी प्रशंसा नहीं करते
ତିନି ଲୋକରେ ସଦାଚାରୀ କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କ ପାଇଁ କ୍ଷତ୍ରଧର୍ମ ହିଁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ। ଯେମାନେ ଧର୍ମଜ୍ଞ, ସେମାନେ କ୍ଷତ୍ରିୟ ପାଇଁ ଅନ୍ୟ କୌଣସି ଧର୍ମକୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୋଲି ପ୍ରଶଂସା କରନ୍ତି ନାହିଁ।
Verse 6
तस्य मेडद्य स्थितस्येह स्वधर्मे नियतात्मन: । अनागसं प्रजानां च प्रमादादिव जल्पथ,मैं अपने मनको वशमें रखकर सदा स्वधर्म (क्षत्रियधर्म)-में स्थित रहता हूँ। प्रजाओंका भी कोई अपराध नहीं करता, ऐसी दशामें भी आपलोग प्रमादसे ही मुझे शत्रु या अपराधी बता रहे हैं
ଆଜି ମୁଁ ଏଠାରେ ନିଜ ସ୍ୱଧର୍ମରେ ଦୃଢ଼, ମନକୁ ସଂଯମ କରି ଦାଁଡ଼ାଇଛି। ପ୍ରଜାମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ମଧ୍ୟ ମୁଁ କୌଣସି ଅପରାଧ କରିନାହିଁ। ତଥାପି ତୁମେ ଯେନେ ପ୍ରମାଦବଶତଃ ମୋତେ ଶତ୍ରୁ କିମ୍ବା ଦୋଷୀ ବୋଲି କହୁଛ।
Verse 7
श्रीकृष्ण उवाच कुलकार्य महाबाहो कश्चिदेक: कुलोद्वह: । वहते यस्तन्नियोगाद् वयम भ्युद्यतास्त्वयि,श्रीकृष्णने कहा--महाबाहो! समूचे कुलमें कोई एक ही पुरुष कुलका भार सँभालता है। उस कुलके सभी लोगोंकी रक्षा आदिका कार्य सम्पन्न करता है। जो वैसे महापुरुष हैं, उन्हींकी आज्ञासे हमलोग आज तुम्हें दण्ड देनेको उद्यत हुए हैं
ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କହିଲେ— ମହାବାହୋ! ସମଗ୍ର କୁଳରେ କେବେ କେବେ ଜଣେ ମାତ୍ର କୁଳୋଦ୍ୱହ ଥାଏ, ଯିଏ କୁଳକାର୍ଯ୍ୟର ଭାର ବହେ ଏବଂ ସମସ୍ତଙ୍କର ରକ୍ଷା-କଳ୍ୟାଣ ସମ୍ପାଦନ କରେ। ସେହି ମହାପୁରୁଷଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ଆଜି ଆମେ ତୁମକୁ ଦଣ୍ଡ ଦେବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ହୋଇଛୁ।
Verse 8
त्वया चोपह्नता राजन क्षत्रिया लोकवासिन:ः । तदागः क्रूरमुत्पाद्य मन्यसे किमनागसम्,राजन! तुमने भूलोकनिवासी क्षत्रियोंको कैद कर लिया है। ऐसे क्रूर अपराधका आयोजन करके भी तुम अपनेको निरपराध कैसे मानते हो?
ରାଜନ୍! ତୁମେ ଭୂଲୋକନିବାସୀ କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କୁ ଦମନ କରି ବନ୍ଦୀ କରିଛ। ଏପରି କ୍ରୂର ଅପରାଧ ଘଟାଇ ମଧ୍ୟ ତୁମେ ନିଜକୁ ନିର୍ଦୋଷ କିପରି ଭାବୁଛ?
Verse 9
राजा राज्ञ: कथं साधून् हिंस्यान्नृपतिसत्तम । तद् राज्ञ: संनिगृह्ा त्वं रुद्रायोपजिहीरषसि,नृपश्रेष्ठी एक राजा दूसरे श्रेष्ठ राजाओंकी हत्या कैसे कर सकता है? तुम राजाओंको कैद करके उन्हें रुद्रदेवताकी भेंट चढ़ाना चाहते हो?
ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କହିଲେ— ନୃପଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଜଣେ ରାଜା ଅନ୍ୟ ସାଧୁ-ଶ୍ରେଷ୍ଠ ରାଜାମାନଙ୍କୁ କିପରି ହିଂସା କରିପାରିବ? କିନ୍ତୁ ତୁମେ ରାଜାମାନଙ୍କୁ ଧରି ବନ୍ଦୀ କରି ରୁଦ୍ରଙ୍କୁ ବଳି ଦେବାକୁ ଚାହୁଁଛ।
Verse 10
अस्मांस्तदेनो गच्छेद्धि कृत॑ बार्हद्रथ त्वया । वयं हि शक्ता धर्मस्य रक्षणे धर्मचारिण:,बृहद्रथकुमार! तुम्हारे द्वारा किया हुआ यह पाप हम सब लोगोंपर लागू होगा; क्योंकि हम धर्मकी रक्षा करनेमें समर्थ और धर्मका पालन करनेवाले हैं
ବାର୍ହଦ୍ରଥ! ତୁମେ କରୁଥିବା ଏହି ପାପର ଦୋଷ ଆମ ଉପରେ ମଧ୍ୟ ପଡ଼ିବ; କାରଣ ଆମେ ଧର୍ମର ରକ୍ଷା କରିବାରେ ସମର୍ଥ ଏବଂ ଧର୍ମାଚାରୀ। ତେଣୁ ଅଧର୍ମ ହେଉଥିବା ଦେଖି ଆମେ ନିରବ ରହିପାରିବୁ ନାହିଁ।
Verse 11
मनुष्याणां समालम्भो न च दृष्ट: कदाचन । स कथं मानुषै्देवं यट्टमिच्छसि शंकरम्,किसी देवताकी पूजाके लिये मनुष्योंका वध कभी नहीं देखा गया। फिर तुम कल्याणकारी देवता भगवान् शिवकी पूजा मनुष्योंकी हिंसाद्वारा कैसे करना चाहते हो?
ଦେବପୂଜା ପାଇଁ ମନୁଷ୍ୟବଧ କେବେ ଦେଖାଯାଇନାହିଁ। ତେବେ ତୁମେ କଳ୍ୟାଣକାରୀ ଦେବ ଶଙ୍କରଙ୍କୁ ମନୁଷ୍ୟହିଂସା ଦ୍ୱାରା କିପରି ପୂଜିବାକୁ ଚାହୁଁଛ?
Verse 12
सवर्णो हि सवर्णानां पशुसंज्ञां करिष्यसि । को<न्य एवं यथा हि त्वं जरासंध वृथामति:,जरासंध! तुम्हारी बुद्धि मारी गयी है, तुम भी उसी वर्णके हो, जिस वर्णके वे राजालोग हैं। क्या तुम अपने ही वर्णके लोगोंको पशुनाम देकर उनकी हत्या करोगे? तुम्हारे-जैसा क्रूर दूसरा कौन है?
ଜରାସନ୍ଧ! ତୋର ବୁଦ୍ଧି ନଷ୍ଟ ହୋଇଗଲା। ତୁ ମଧ୍ୟ ସେଇ ବର୍ଣ୍ଣର, ଯେ ବର୍ଣ୍ଣର ସେ ରାଜାମାନେ। ତେବେ କି ନିଜ ବର୍ଣ୍ଣର ଲୋକଙ୍କୁ ‘ପଶୁ’ ବୋଲି ନାମ ଦେଇ ହତ୍ୟା କରିବୁ? ତୋ ପରି କ୍ରୁର ଆଉ କିଏ?
Verse 13
यस्यां यस्यामवस्थायां यद् यत् कर्म करोति यः । तस्यां तस्यामवस्थायां तत् फलं समवाप्नुयात्,जो जिस-जिस अवस्थामें जो-जो कर्म करता है, वह उसी-उसी अवस्थामें उसके फलको प्राप्त करता है
ଯେ ଯେ ଅବସ୍ଥାରେ ଯେ ଯେ କର୍ମ କରେ, ସେ ସେଇ ସେଇ ଅବସ୍ଥାରେ ତାହାର ଫଳ ପାଏ।
Verse 14
ते त्वां ज्ञातिक्षयकरं वयमार्तानुसारिण: । ज्ञातिवद्धिनिमित्तार्थ विनिहन्तुमिहागता:,तुम अपने ही जाति-भाइयोंके हत्यारे हो और हमलोग संकटमें पड़े हुए दीन- दुःखियोंकी रक्षा करनेवाले हैं; अतः सजातीय बन्धुओंकी वृद्धिके उद्देश्यसे हम तुम्हारा वध करनेके लिये यहाँ आये हैं
ତୁ ନିଜ ଜ୍ଞାତିମାନଙ୍କର ନାଶକ; ଆମେ ଆପଦାପନ୍ନ ଦୀନ-ଦୁଃଖୀଙ୍କ ପକ୍ଷରେ ଥାଉ। ତେଣୁ ନିଜ ସ୍ୱଜନଙ୍କର ରକ୍ଷା ଓ ବୃଦ୍ଧି ନିମିତ୍ତେ ତୋତେ ବଧ କରିବାକୁ ଆମେ ଏଠାକୁ ଆସିଛୁ।
Verse 15
नास्ति लोके पुमानन्य: क्षत्रियेष्विति चैव तत् मन्यसे स च ते राजन् सुमहान् बुद्धिविप्लव:,राजन! तुम जो यह मान बैठे हो कि इस जगतके क्षत्रियोंमें मेरे समान दूसरा कोई नहीं है, यह तुम्हारी बुद्धिका बहुत बड़ा भ्रम है
ରାଜନ୍! ଏହି ଲୋକର କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମୋ ପରି ଅନ୍ୟ କେହି ନାହିଁ ବୋଲି ତୁ ଭାବିଥିଲେ, ସେ ତୋର ବୁଦ୍ଧିର ଅତ୍ୟନ୍ତ ବଡ଼ ଭ୍ରମ।
Verse 16
को हि जानन्नभिजनमात्मवान् क्षत्रियो नृप । नाविशेत् स्वर्गमतुलं रणानन्तरमव्ययम्,नरेश्वरर कौन ऐसा स्वाभिमानी क्षत्रिय होगा जो अपने अभिजनको (जातीय बन्धुओंकी रक्षा परम धर्म है, इस बातको) जानते हुए भी युद्ध करके अनुपम एवं अक्षय स्वर्गलोकमें जाना नहीं चाहेगा?
ନରେଶ୍ୱର! ଅଭିଜନଙ୍କ ରକ୍ଷା ପରମ ଧର୍ମ—ଏହା ଜାଣିଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ଯୁଦ୍ଧ ପରେ ଅତୁଲ ଓ ଅକ୍ଷୟ ସ୍ୱର୍ଗରେ ପ୍ରବେଶ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା ନକରୁଥିବା ସ୍ୱାଭିମାନୀ କ୍ଷତ୍ରିୟ କିଏ?
Verse 17
स्वर्ग होव समास्थाय रणयज्ञेषु दीक्षिता: । जयन्ति क्षत्रिया लोकांस्तद् विद्धि मनुजर्षभ,नरश्रेष्ठ! स्वर्गप्राप्तिका ही उद्देश्य रखकर रणयज्ञकी दीक्षा लेनेवाले क्षत्रिय अपने अभीष्ट लोकोंपर विजय पाते हैं, यह बात तुम्हें भलीभाँति जाननी चाहिये
ସ୍ୱର୍ଗକୁ ଲକ୍ଷ୍ୟ କରି ଯେ କ୍ଷତ୍ରିୟମାନେ ରଣଯଜ୍ଞରେ ଦୀକ୍ଷିତ ହୁଅନ୍ତି, ସେମାନେ ନିଜ ଅଭୀଷ୍ଟ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ଜୟ କରନ୍ତି। ଏହା ଭଲଭାବେ ଜାଣ—ହେ ମନୁଜର୍ଷଭ, ହେ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ।
Verse 18
स्वर्गयोनिर्महद् ब्रह्म स्वर्गयोनिर्महद् यश: । स्वर्गयोनिस्तपो युद्धे मृत्यु: सो5व्यभिचारवान्,वेदाध्ययन स्वर्गप्राप्तिका कारण है, परोपकाररूप महान् यश भी स्वर्गका हेतु है, तपस्याको भी स्वर्गलोकका साधन बताया गया है; परंतु क्षत्रियके लिये इन तीनोंकी अपेक्षा युद्धमें मृत्युका वरण करना ही स्वर्गप्राप्तिका अमोघ साधन है
ମହତ୍ ବ୍ରହ୍ମ (ବେଦାଧ୍ୟୟନ) ସ୍ୱର୍ଗର ହେତୁ; ପରୋପକାରରୁ ଲଭ୍ୟ ମହାଯଶ ମଧ୍ୟ ସ୍ୱର୍ଗର କାରଣ; ତପସ୍ୟାକୁ ମଧ୍ୟ ସ୍ୱର୍ଗଲୋକସାଧନ କୁହାଯାଇଛି। କିନ୍ତୁ କ୍ଷତ୍ରିୟ ପାଇଁ—ଏହି ତିନିଟିଠାରୁ ଅଧିକ—ଧର୍ମରୁ ଅବ୍ୟଭିଚାରୀ ହୋଇ ଯୁଦ୍ଧରେ ମୃତ୍ୟୁ ବରଣ କରିବା ସ୍ୱର୍ଗପ୍ରାପ୍ତିର ଅମୋଘ ସାଧନ।
Verse 19
एष हौन्द्रो वैजयन्तो गुणैर्नित्यं समाहित: । येनासुरान् पराजित्य जगत् पाति शतक्रतु:,क्षत्रियका यह युद्धमें मरण इन्द्रका वैजयन्त नामक प्रासाद (राजमहल) है। यह सदा सभी गुणोंसे परिपूर्ण है। इसी युद्धके द्वारा शतक्रतु इन्द्र असुरोंको परास्त करके सम्पूर्ण जगतकी रक्षा करते हैं
ଏହା ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ‘ବୈଜୟନ୍ତ’—ନିତ୍ୟ ଗୁଣରେ ସମାହିତ ଓ ଶୁଭଗୁଣରେ ସମ୍ପନ୍ନ। ଏହି ମାର୍ଗରେ ଶତକ୍ରତୁ ଇନ୍ଦ୍ର ଅସୁରମାନଙ୍କୁ ପରାଜିତ କରି ସମଗ୍ର ଜଗତକୁ ରକ୍ଷା କରନ୍ତି।
Verse 20
स्वर्गमार्गाय कस्य स्याद् विग्रहो वै यथा तव । मागधेरविंपुलै: सैन्यैर्बाहुल्यबलदर्पित:,हमारे साथ जो तुम्हारा युद्ध होनेवाला है, वह तुम्हारे लिये जैसा स्वर्गलोककी प्राप्तिका साधक हो सकता है, वैसा युद्ध और किसको सुलभ है? मेरे पास बहुत बड़ी सेना एवं शक्ति है, इस घमंडमें आकर मगधदेशकी अगणित सेनाओंद्वारा तुम दूसरोंका अपमान न करो। राजन! प्रत्येक मनुष्यमें बल एवं पराक्रम होता है। महाराज! किसीमें तुम्हारे समान तेज है तो किसीमें तुमसे अधिक भी है
ଆମ ସହିତ ତୁମର ଯେ ଯୁଦ୍ଧ ହେବାକୁ ଯାଉଛି, ସେହି ଯୁଦ୍ଧ ତୁମ ପାଇଁ ସ୍ୱର୍ଗମାର୍ଗର ଯେପରି ସହଜ ସାଧନ ହୋଇପାରେ, ଏପରି ଯୁଦ୍ଧ ଆଉ କାହାକୁ ସୁଲଭ? କିନ୍ତୁ ମଗଧର ବିପୁଳ ସେନା ଓ ବଳର ବହୁଳତାର ଦର୍ପରେ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ତିରସ୍କାର ଓ ଅପମାନ କରନି। ରାଜନ, ପ୍ରତ୍ୟେକ ମନୁଷ୍ୟରେ କିଛି ନ କିଛି ବଳ ଓ ପରାକ୍ରମ ଥାଏ; କେତେକରେ ତୁମ ସମାନ ତେଜ ଅଛି, ଆଉ କେତେକରେ ତୁମଠାରୁ ଅଧିକ ମଧ୍ୟ ଅଛି।
Verse 21
इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत जरासंधवधपर्वमें श्रीकृष्णजरासंधरसंवादविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,हमारे साथ जो तुम्हारा युद्ध होनेवाला है, वह तुम्हारे लिये जैसा स्वर्गलोककी प्राप्तिका साधक हो सकता है, वैसा युद्ध और किसको सुलभ है? मेरे पास बहुत बड़ी सेना एवं शक्ति है, इस घमंडमें आकर मगधदेशकी अगणित सेनाओंद्वारा तुम दूसरोंका अपमान न करो। राजन! प्रत्येक मनुष्यमें बल एवं पराक्रम होता है। महाराज! किसीमें तुम्हारे समान तेज है तो किसीमें तुमसे अधिक भी है
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଜରାସନ୍ଧବଧପର୍ବରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ–ଜରାସନ୍ଧ ସଂବାଦବିଷୟକ ଏକବିଂଶ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା। “ଆମ ସହିତ ତୁମର ଯେ ଯୁଦ୍ଧ ହେବାକୁ ଯାଉଛି, ସେହି ଯୁଦ୍ଧ ତୁମ ପାଇଁ ସ୍ୱର୍ଗମାର୍ଗର ଯେପରି ସହଜ ସାଧନ ହୋଇପାରେ, ଏପରି ଯୁଦ୍ଧ ଆଉ କାହାକୁ ସୁଲଭ? କିନ୍ତୁ ମଗଧର ବିପୁଳ ସେନା ଓ ବଳର ଦର୍ପରେ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ତିରସ୍କାର ଓ ଅପମାନ କରନି। ରାଜନ, ପ୍ରତ୍ୟେକ ମନୁଷ୍ୟରେ କିଛି ନ କିଛି ବଳ ଓ ପରାକ୍ରମ ଥାଏ; କେତେକରେ ତୁମ ସମାନ ତେଜ ଅଛି, ଆଉ କେତେକରେ ତୁମଠାରୁ ଅଧିକ ମଧ୍ୟ ଅଛି।”
Verse 22
यावदेतदसम्बुद्धं तावदेव भवेत् तव | विषह्ममेतदस्माकमतो राजन् ब्रवीमि ते,भूपाल! जबतक तुम इस बातको नहीं जानते थे, तभीतक तुम्हारा घमंड बढ़ रहा था। अब तुम्हारा यह अभिमान हमलोगोंके लिये असह्य हो उठा है, इसलिये मैं तुम्हें यह सलाह देता हूँ (जनमेजय उवाच किमर्थ वैरिणावास्तामुभौ तौ कृष्णमागधौ । कथं च निर्जित: संख्ये जरासंधेन माधव: ।। जनमेजयने पूछा--मुने! भगवान् श्रीकृष्ण और मगधराज जरासंध दोनों एक-दूसरेके शत्रु क्यों हो गये थे? तथा जरासंधने यदुकुलतिलक श्रीकृष्णको युद्धमें कैसे परास्त किया?। कश्न कंसो मागधस्य यस्य हेतो: स वैरवान् । एतदाचक्ष्व मे सर्व वैशम्पायन तत्त्वतः ।। कंस मगधराज जरासंधका कौन था, जिसके लिये उसने भगवानसे वैर ठान लिया। वैशम्पायनजी! ये सब बातें मुझे यथार्थरूपसे बताइये। वैशम्पायन उवाच यादवानामन्ववाये वसुदेवो महामति: । उदपद्यत वार्ष्णेयो हाुग्रसेनस्य मन्त्र भूत् ।। वैशम्पायनजीने कहा--राजन्! यदुकुलमें परम बुद्धिमान् वसुदेव उत्पन्न हुए, जो वृष्णिवंशके राजकुमार तथा राजा उग्रसेनके विश्वसनीय मन्त्री थे। उग्रसेनस्य कंसस्तु बभूव बलवान् सुतः । ज्येष्ठो बहूनां कौरव्य सर्वशस्त्रविशारद: ।। उमग्रसेनका पुत्र बलवान् कंस हुआ, जो उनके अनेक पुत्रोंमें सबसे बड़ा था। कुरुनन्दन! कंसने सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंकी विद्यामें निपुणता प्राप्त की थी। जरासंधस्य दुहिता तस्य भार्यातिविश्रुता । राज्यशुल्केन दत्ता सा जरासंधेन धीमता ।। जरासंधकी पुत्री उसकी सुप्रसिद्ध पत्नी थी, जिसे बुद्धिमान् जरासंधने इस शर्तके साथ दिया था कि इसके पतिको तत्काल राजाके पदपर अभिषिक्त किया जाय। तदर्थमुग्रसेनस्य मथुरायां सुतस्तदा । अभिषिक्तस्तदामात्यै: स वै तीव्रपराक्रम: ।। इस शुल्ककी पूर्तिके लिये उग्रसेनके उस दुःसह पराक्रमी पुत्रको मन्त्रियोंने मथुराके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। ऐश्वर्यबलमत्तस्तु स तदा बलमोहित: । निगृहा पितरं भुद्धक्ते तद् राज्यं मन्त्रिभि: सह ।। तब ऐश्वर्यके बलसे उनन््मत्त और शारीरिक शक्तिसे मोहित हो कंस अपने पिताको कैद करके मन्त्रियोंके साथ उनका राज्य भोगने लगा। वसुदेवस्य तत् कृत्यं न शूणोति स मन्दधी: । स तेन सह तदू राज्यं धर्मत: पर्यपालयत् ।। मन्दबुद्धि कंस वसुदेवजीके कर्तव्य-विषयक उपदेशको नहीं सुनता था, तो भी उसके साथ रहकर वसुदेवजी मथुराके राज्यका धर्मपूर्वक पालन करने लगे। प्रीतिमान् स तु दैत्येन्द्रो वसुदेवस्य देवकीम् । उवाह भार्या स तदा दुहिता देवकस्य या ।। दैत्यराज कंसने अत्यन्त प्रसन्न होकर वसुदेवजीके साथ देवकीका ब्याह कर दिया, जो उग्रसेनके भाई देवककी पुत्री थी। तस्यामुद्वाह्ममानायां रथेन जनमेजय । उपारुरोह वार्ष्णेयं कंसो भूमिपतिस्तदा ।। जनमेजय! जब रथपर बैठकर देवकी विदा होने लगी, तब राजा कंस भी उसे पहुँचानेके लिये वृष्णिवंश-विभूषण वसुदेवजीके पास उस रथपर जा बैठा। ततोडन््तरिक्षे वागासीद् देवदूतस्य कस्यचित् । वसुदेवश्च शुश्राव तां वाचं पार्थिवश्च स: ।। इसी समय आकाशमें किसी देवदूतकी वाणी स्पष्ट सुनायी देने लगी। वसुदेवजीने तो उसे सुना ही, राजा कंसने भी सुना। यामेतां वहमानो<द्य कंसोद्वहसि देवकीम् । अस्या यश्चाष्टमो गर्भ: स ते मृत्युर्भविष्यति ।। देवदूत कह रहा था--“कंस! आज तू जिस देवकीको रथपर बिठाकर लिये जा रहा है, उसका आठवाँ गर्भ तेरी मृत्युका कारण होगा”। सो<वतीर्य ततो राजा खड्गमुद्धृत्य निर्मलम् । इयेष तस्या मूर्धानं छेत्तुं परमदुर्मति: ।। यह आकाशवाणी सुनते ही अत्यन्त खोटी बुद्धिवाले राजा कंसने म्यानसे चमचमाती हुई तलवार खींच ली और देवकीका सिर काट लेनेका विचार किया। स सान्त्वयंस्तदा कंसं हसन् क्रोधवशानुगम् । राजन्ननुनयामास वसुदेवो महामति: ।। राजन्! उस समय परम बुद्धिमान वसुदेवजी हँसते हुए क्रोधके वशीभूत हुए कंसको सान्त्वना दे उसकी अनुनय-विनय करने लगे। अहिंस्यां प्रमदामाहु: सर्वधर्मेषु पार्थिव । अकस्मादबलां नारीं हन्तासीमामनागसीम् ।। 'पृथ्वीपते! प्रायः सभी धर्मोमें नारीको अवध्य बताया गया है। क्या तुम इस निर्बल एवं निरपराध नारीको सहसा मार डालोगे?' यच्च ते5त्र भयं राजन् शक््यते बाधितुं त्वया । इयं च शक््या पालयितुं समयश्वैव रक्षितुम् ।। “राजन! इससे जो तुम्हें भय प्राप्त होनेवाला है, उसका तो तुम निवारण कर सकते हो। तुम्हें इसकी रक्षा करनी चाहिये और मुझे इसकी प्राणरक्षाके लिये जो शर्त निश्चित हो, उसका पालन करना चाहिये। अस्यास्त्वमष्टमं गर्भ जातमात्र महीपते । विध्वंसय तदा प्राप्तमेवं परिद्वतं भवेत् ।। “राजन! इसके आठवें गर्भको तुम पैदा होते ही नष्ट कर देना। इस प्रकार तुमपर आयी हुई विपत्ति टल सकती है'। एवं स राजा कथितो वसुदेवेन भारत । तस्य तद् वचन चक्रे शूरसेनाधिपस्तदा ।। ततस्तस्यां सम्बभूवु: कुमारा: सूर्यवर्चस: । जाताज्जातांस्तु तान् सर्वाञ्जघान मधुरेश्वर: ।। भरतनन्दन! वसुदेवजीके ऐसा कहनेपर शूरसेन-देशके राजा कंसने उनकी बात मान ली। तदनन्तर देवकीके गर्भसे सूर्यके समान तेजस्वी अनेक कुमार क्रमशः उत्पन्न हुए। मथुरानरेश कंसने जन्म लेते ही उन सबको मार डालता था। अथ तस्यां समभवद् बलदेवस्तु सप्तम: । याम्यया मायया तं तु यमो राजा विशाम्पते ।। देवक्या गर्भमतुलं रोहिण्या जठरेउक्षिपत् | आकृष्य कर्षणात् सम्यक् संकर्षण इति स्मृत: ।। बलश्रेष्ठतया तस्य बलदेव इति स्मृतः । तदनन्तर देवकीके उदरमें सातवें गर्भके रूपमें बलदेवका आगमन हुआ। राजन! यमराजने यमसम्बन्धिनी मायाके द्वारा उस अनुपम गर्भको देवकीके उदरसे निकालकर रोहिणीकी कुक्षिमें स्थापित कर दिया। आकर्षण होनेके कारण उस बालकका नाम संकर्षण हुआ। बलमें प्रधान होनेसे उसका नाम बलदेव हुआ। पुनस्तस्यां समभवदष्टमो मधुसूदन: । तस्य गर्भस्य रक्षां तु चक्रे सो5भ्यधिकं नृपः ।। तत्पश्चात् देवकीके उदरमें आठवें गर्भके रूपमें साक्षात् भगवान् मधुसूदनका आविर्भाव हुआ। राजा कंसने बड़े यत्नसे उस गर्भकी रक्षा की। ततः काले रक्षणार्थ वसुदेवस्य सात्वत: ।। उग्र: प्रयुक्त: कंसेन सचिव: क्रूरकर्मकृत् । विमूक्रेषु प्रभावेन बालस्योत्तीर्य तत्र वै ।। उपागम्य स घोषे तु जगाम स महाद्युति: । जातमात्र वासुदेवमथाकृष्य पिता ततः ।। उपजद्ठे परिक्रीतां सुतां गोपस्य कस्यचित् | तदनन्तर प्रसवकाल आनेपर सात्वतवंशी वसुदेवपर कड़ी नजर रखनेके लिये कंसने उग्र स्वभाववाले अपने क्रूरकर्मा मन्त्रीको नियुक्त किया। परंतु बालस्वरूप श्रीकृष्णके प्रभावसे रक्षकोंके निद्रासे मोहित हो जानेपर वहाँसे उठकर महातेजस्वी वसुदेवजी बालकके साथ व्रजमें चले गये। नवजात वासुदेवको मथुरासे हटाकर पिता वसुदेवने उसके बदलेमें किसी गोपकी पुत्रीको लाकर कंसको भेंट कर दिया। मुमुक्षमाणस्तं शब्द देवदूतस्य पार्थिव: ।। जघान कंसस्तां कन्यां प्रहसन्ती जगाम सा । आर्येति वाशती शब्दं तस्मादार्येति कीर्तिता ।। देवदूतके कहे हुए पूर्वोक्त शब्दका स्मरण करके उसके भयसे छूटनेकी इच्छा रखनेवाले कंसने उस कन्याको भी पृथ्वीपर दे मारा। परंतु वह कन्या उसके हाथसे छूटकर हँसती और आर्य शब्दका उच्चारण करती हुई वहाँसे चली गयी। इसीलिये उसका नाम “'आर्या' हुआ। एवं त॑ वज्चयित्वा च राजानं स महामति: । वासुदेवं महात्मानं वर्धधामास गोकुले ।। परम बुद्धिमान् वसुदेवने इस प्रकार राजा कंसको चकमा देकर गोकुलमें अपने महात्मा पुत्र वासुदेवका पालन कराया। वासुदेवो5पि गोपेषु ववृधे5ब्जमिवाम्भसि । अज्ञायमान: कंसेन गूढो5ग्निरिव दारुषु ।। वासुदेव भी पानीमें कमलकी भाँति गोपोंमें रहकर बड़े हुए। काठमें छिपी हुई अग्निकी भाँति वे अज्ञातभावसे वहाँ रहने लगे। कंसको उनका पता न चला। विप्रचक्रेथ तान् सर्वान् वल््लवान् मधुरेश्वर: । वर्धमानो महाबाहुस्तेजोबलसमन्वित: ।। मथुरानरेश कंस उन सब गोपोंको बहुत सताया करता था। इधर महाबाहु श्रीकृष्ण बड़े होकर तेज और बलसे सम्पन्न हो गये। ततस्ते क्लिश्यमानास्तु पुण्डरीकाक्षमच्युतम् भयेन कामादपरे गणश: पर्यवारयन् ।। राजाके सताये हुए गोपगण भय तथा कामनासे झुंड-के-झुंड एकत्र हो कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णको घेरकर संगठित होने लगे। सतु लब्ध्वा बल॑ राजन्नुग्रसेनस्य सम्मत: । वसुदेवात्मज: सर्वैर्श्नातृभि: सहित॑ं पुनः ।। निर्जित्य युधि भोजेन्द्रं हत्वा कंसं महाबल: । अभ्यषिज्चत् ततो राज्य उग्रसेनं विशाम्पते ।। राजन्! इस प्रकार बलका संग्रह करके महाबली वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने उग्रसेनकी सम्मतिके अनुसार समस्त भाइयोंसहित भोजराज कंसको मारकर पुनः उम्रसेनको ही मथुराके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। ततः श्रुत्वा जरासंधो माधवेन हत॑ युधि । शूरसेनाधिपं चक्रे कंसपुत्रं तदा नृपः ।। राजन! जरासंधने जब यह सुना कि श्रीकृष्णने कंसको युद्धमें मार डाला है, तब उसने कंसके पुत्रको शूरसेनदेशका राजा बनाया। स सैन्यं महतुत्थाप्य वासुदेवं प्रसह च । अभ्यषिज्चत् सुतं तत्र सुताया जनमेजय ।। जनमेजय! उसने बड़ी भारी सेना लेकर आक्रमण किया और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको हराकर अपनी पुत्रीके पुत्रको वहाँ राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। उग्रसेनं च वृष्णीश्ष महाबलसमन्वित: । स तत्र विप्रकुरुते जरासंध: प्रतापवान् ।। एतद्ू वैरं कौरवेय जरासंधस्य माधवे । जनमेजय! प्रतापी जरासंध महान् बल और सैनिकशक्तिसे सम्पन्न था। वह उग्रसेन तथा वृष्णिवंशको सदा क्लेश पहुँचाया करता था। कुरुनन्दन! जरासंध और श्रीकृष्णके वैरका यही वृत्तान्त है। आशासितार्थ राजेन्द्र संरुरोध विनिर्जितान् । पार्थिवैस्तैर्न॒पतिभिय्यक्ष्यमाण: समृद्धिमान् ।। देवश्रेष्ठ महादेवं कृत्तिवासं त्रियम्बकम् । एतत् सर्व यथा वृत्तं कथितं भरतर्षभ ।। यथा तु स हतो राजा भीमसेनेन तच्छूणु ।) राजेन्द्र! समृद्धिशाली जरासंध कृत्तिवासा और त््यम्बक नामोंसे प्रसिद्ध देवश्रेष्ठ महादेवजीको भूमण्डलके राजाओंकी बलि देकर उनका यजन करना चाहता था और इसी मनोवांछित प्रयोजनकी सिद्धिके लिये उसने अपने जीते हुए समस्त राजाओंको कैदमें डाल रखा था। भरतश्रेष्ठ! यह सब वृत्तान्त तुम्हें यथावत् बताया गया। अब जिस प्रकार भीमसेनने राजा जरासंधका वध किया, वह प्रसंग सुनो। इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि जरासंधवधपर्वणि जरासंधयुद्धोद्योगे द्वाविंशो5ध्याय:
ଯେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ତୁମେ ଏହି କଥା ବୁଝିନଥିଲ, ସେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ତୁମର ଗର୍ବ ବଢ଼ୁଥିଲା। ଏବେ ସେଇ ଅହଂକାର ଆମ ପାଇଁ ଅସହ୍ୟ ହୋଇଯାଇଛି; ତେଣୁ, ହେ ରାଜନ—ହେ ଭୂପାଳ—ମୁଁ ତୁମକୁ ଯଥୋଚିତ ପରାମର୍ଶ ଦେଉଛି।
Verse 23
मावमंस्था: परान् राजन्नस्ति वीर्य नरे नरे । सम॑ तेजस्त्वया चैव विशिष्ट वा नरेश्वर,जहि त्वं सदृशेष्वेव मान॑ दर्प च मागध । मा गम: ससुतामात्य: सबलश्न यमक्षयम् मगधराज! तुम अपने समान वीरोंके साथ अभिमान और घमंड करना छोड़ दो। इस घमंडको रखकर अपने पुत्र, मन्त्री और सेनाके साथ यमलोकमें जानेकी तैयारी न करो
ହେ ରାଜନ, ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ଅବମାନ କରନି; ପ୍ରତ୍ୟେକ ନରରେ ବୀର୍ୟ ଅଛି। ତୁମର ତେଜ ମଧ୍ୟ ସେଇ ପ୍ରକାର—କିମ୍ବା ଅଧିକ ବିଶିଷ୍ଟ, ହେ ନରେଶ୍ୱର। ତେଣୁ, ହେ ମାଗଧ, ନିଜ ସମାନମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ମାନ ଓ ଦର୍ପ ତ୍ୟାଗ କର। ଏମିତି ଅଭିମାନକୁ ଧରି ପୁତ୍ର, ମନ୍ତ୍ରୀ ଓ ସେନା ସହିତ ଯମଲୋକକୁ ଯିବା ପାଇଁ ପ୍ରସ୍ତୁତ ହେଉନି।
Verse 24
दम्भोद्धव: कार्तवीर्य उत्तरश्न बृहद्रथ: । श्रेयसो हवमन्येह विनेशु: सबला नृूपा:,दम्भोद्धव, कार्तवीर्य अर्जुन, उत्तर तथा बृहद्रथ--ये सभी नरेश अपनेसे बड़ोंका अपमान करके अपनी सेनासहित नष्ट हो गये
ଦମ୍ଭୋଦ୍ଧବ, କାର୍ତ୍ତବୀର୍ୟ (ଅର୍ଜୁନ), ଉତ୍ତର ଓ ବୃହଦ୍ରଥ—ଏହି ରାଜାମାନେ ନିଜଠାରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠମାନଙ୍କୁ ଅବମାନ କରି ସେନା ସହିତ ବିନାଶ ପାଇଲେ।
Verse 25
युयुक्षमाणास्त्वत्तो हि न वयं ब्राह्माणा ध्रुवम् । शौरिरस्मि हृषीकेशो नृवीरी पाण्डवाविमौ । अनयोर्मातुलेयं च कृष्णं मां विद्धि ते रिपुम्,तुमसे युद्धकी इच्छा रखनेवाले हमलोग अवश्य ही ब्राह्मण नहीं हैं। मैं वसुदेवपुत्र हृषीकेश हूँ और ये दोनों पाण्डुपुत्र वीरवर भीमसेन और अर्जुन हैं। मैं इन दोनोंके मामाका पुत्र और तुम्हारा प्रसिद्ध शत्रु श्रीकृष्ण हूँ। मुझे अच्छी तरह पहचान लो
ତୁମ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବା ଇଚ୍ଛାରେ ଆମେ ଆସିଛୁ; ତେଣୁ ଆମେ ନିଶ୍ଚୟ ବ୍ରାହ୍ମଣ ନୁହେଁ। ମୁଁ ଶୌରି ହୃଷୀକେଶ; ଏହି ଦୁଇଜଣ ପାଣ୍ଡବ-ବୀର। ଏହି ଦୁଇଜଣଙ୍କ ମାତୁଳପୁତ୍ର ଏବଂ ତୁମର ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଶତ୍ରୁ—ମୁଁ କୃଷ୍ଣ—ମୋତେ ଭଲଭାବେ ଚିହ୍ନ।
Verse 26
त्वामाह्नयामहे राजन् स्थिरो युध्यस्व मागध । मुज्च वा नृपतीन् सर्वान् गच्छ वा त्वं यमक्षयम्,मगधनरेश! हम तुम्हें युद्धके लिये ललकारते हैं। तुम डटकर युद्ध करो। तुम या तो समस्त राजाओंको छोड़ दो अथवा यमलोककी राह लो
ହେ ମାଗଧରାଜ, ଆମେ ତୁମକୁ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଆହ୍ୱାନ କରୁଛୁ। ଦୃଢ଼ ହୋଇ ଯୁଦ୍ଧ କର। ନହେଲେ ଏହି ସମସ୍ତ ରାଜାମାନଙ୍କୁ ମୁକ୍ତ କର; ନଚେତ୍ ଯମଲୋକର ପଥ ଧର।
Verse 27
जरासंध उवाच नाजितान् वै नरपतीनहमाददि कांश्वन । अजित: पर्यवस्थाता को<त्र यो न मया जित:,जरासंधने कहा--श्रीकृष्ण! मैं युद्धमें जीते बिना किन्हीं राजाओंको कैद करके यहाँ नहीं लाता हूँ। यहाँ कौन ऐसा शत्रु राजा है, जो दूसरोंसे अजेय होनेपर भी मेरेद्वारा जीत न लिया गया हो?
ଜରାସନ୍ଧ କହିଲା—ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! ଯୁଦ୍ଧରେ ଜିତିନଥିଲେ ମୁଁ କାହାକୁ ଧରି ଏଠାକୁ ଆଣେନି। ଏଠାରେ ଏମିତି କେଉଁ ଶତ୍ରୁରାଜା ଅଛି, ଯେ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଅଜେୟ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ମୋ ଦ୍ୱାରା ଜିତାଯାଇନାହିଁ?
Verse 28
क्षत्रियस्यैतदेवाहुर्धम्य कृष्णोपजीवनम् । विक्रम्प वशमानीय कामतो यत् समाचरेत्,श्रीकृष्ण! क्षत्रियके लिये तो यह धर्मानुकूल जीविका बतायी गयी है कि वह पराक्रम करके शत्रुको अपने वशमें लाकर फिर उसके साथ मनमाना बर्ताव करे
ଜରାସନ୍ଧ କହିଲା—ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! କ୍ଷତ୍ରିୟ ପାଇଁ ଏହିଟିକୁ ହିଁ ଧର୍ମସଙ୍ଗତ ଜୀବିକା କୁହାଯାଏ—ପରାକ୍ରମ କରି ଶତ୍ରୁକୁ ବଶ କରି, ପରେ ଇଚ୍ଛାମତେ ତାଙ୍କ ସହ ବ୍ୟବହାର କରିବା।
Verse 29
देवतार्थमुपाहृत्य राज्ञ: कृष्ण कथं भयात् । अहमगद्य विमुच्येयं क्षात्रं व्रतमनुस्मरन्,श्रीकृष्ण! मैं क्षत्रियके व्रतकों सदा याद रखता हुआ देवताको बलि देनेके लिये उपहारके रूपमें लाये हुए इन राजाओंको आज तुम्हारे भयसे कैसे छोड़ सकता हूँ?
ଜରାସନ୍ଧ କହିଲା—ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! ଦେବତାଙ୍କ ପାଇଁ ବଳି-ଉପହାର ରୂପେ ଆଣିଥିବା ଏହି ରାଜାମାନଙ୍କୁ, କ୍ଷାତ୍ରବ୍ରତ ସ୍ମରଣ କରି, ଆଜି ତୁମ ଭୟରେ ମୁଁ କିପରି ଛାଡ଼ିଦେବି?
Verse 30
सैन्यं सैन्येन व्यूढेन एक एकेन वा पुनः । द्वाभ्यां त्रिभिरवा योत्स्येडहं युगपत् पृथगेव वा,तुम्हारी सेना मेरी व्यूहरचनायुक्त सेनाके साथ लड़ ले अथवा तुममेंसे कोई एक मुझ अकेलेके साथ युद्ध करे अथवा मैं अकेला ही तुममेंसे दो या तीनोंके साथ बारी-बारीसे या एक ही साथ युद्ध कर सकता हूँ
ତୁମ ସେନା ମୋର ବ୍ୟୂହବଦ୍ଧ ସେନା ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରୁ; କିମ୍ବା ତୁମମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ କେହି ଜଣେ ଏକା ମୋ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରୁ। ମୁଁ ଏକା ହୋଇ ମଧ୍ୟ ତୁମମାନଙ୍କ ଦୁଇଜଣ କିମ୍ବା ତିନିଜଣଙ୍କ ସହ—ପୃଥକ୍ ପୃଥକ୍ କିମ୍ବା ଏକାସାଥି—ଯୁଦ୍ଧ କରିବି।
Verse 31
वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा जरासंध: सहदेवाभिषेचनम् । आज्ञापयत् तदा राजा युयुत्सुर्भीमकर्मभि:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर भयानक कर्म करनेवाले उन तीनों वीरोंके साथ युद्धकी इच्छा रखकर राजा जरासंधने अपने पुत्र सहदेवके राज्याभिषेककी आज्ञा दे दी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ଏଭଳି କହି, ସେ ତିନିଜଣ ବୀରଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ଉତ୍ସୁକ, ଭୀମକର୍ମା ରାଜା ଜରାସନ୍ଧ ସେତେବେଳେ ନିଜ ପୁତ୍ର ସହଦେବଙ୍କ ରାଜ୍ୟାଭିଷେକ ପାଇଁ ଆଜ୍ଞା ଦେଲେ।
Verse 32
स तु सेनापतिं राजा सस्मार भरतर्षभ | कौशिक चित्रसेनं च तस्मिन् युद्ध उपस्थिते,भरतश्रेष्ठ] तदनन्तर मगधनरेशने वह युद्ध उपस्थित होनेपर अपने सेनापति कौशिक और चित्रसेनका स्मरण किया (जो उस समय जीवित नहीं थे)
ଯୁଦ୍ଧ ନିକଟ ହେବା ସମୟରେ, ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ, ରାଜା ନିଜ ସେନାପତିଙ୍କୁ ଏବଂ କୌଶିକ ଓ ଚିତ୍ରସେନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ସ୍ମରଣ କଲେ।
Verse 33
ययोस्ते नामनी राजन् हंसेति डिम्भकेति च । पूर्व संकथितं पुम्भिनलोके लोकसत्कृते,राजन! ये वे ही थे, जिनके नाम पहले तुमसे हंस और डिम्भक बताये हैं। मनुष्यलोकके सभी पुरुष उनके प्रति बड़े आदरका भाव रखते थे
ହେ ରାଜନ୍! ଯାହାଙ୍କ ନାମ ‘ହଂସ’ ଓ ‘ଡିମ୍ଭକ’—ସେ ଦୁଇଜଣଙ୍କ ବିଷୟରେ ତୁମକୁ ପୂର୍ବରୁ କୁହାଯାଇଛି; ମନୁଷ୍ୟଲୋକରେ ସମସ୍ତେ ତାଙ୍କୁ ବହୁତ ସମ୍ମାନ କରୁଥିଲେ।
Verse 34
तं॑ तु राजन विभु: शौरी राजानं बलिनां वरम् | स्मृत्वा पुरुषशार्दूल: शार्टूल्समविक्रमम्,जनमेजय! मनस्वी पुरुषोंमें सर्वश्रेष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ, मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी, वसुदेवपुत्र एवं बलरामके छोटे भाई भगवान् मधुसूदनने दिव्य दृष्टिसे स्मरण करके यह जान लिया था कि सिंहके समान पराक्रमी, बलवानोंमें श्रेष्ठ और भयानक पुरुषार्थ प्रकट करनेवाला यह राजा जरासंध युद्धमें दूसरे वीरका भाग (वध्य) नियत किया गया है। यदुवंशियोंमेंसे किसीके हाथसे उसकी मृत्यु नहीं हो सकती, अतः ब्रह्माजीके आदेशकी रक्षा करनेके लिये उन्होंने स्वयं उसे मारनेकी इच्छा नहीं की
ହେ ଜନମେଜୟ! ସର୍ବଶକ୍ତିମାନ ଶୌରି (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ)—ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବ୍ୟାଘ୍ରସମ—ବଳବାନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଓ ବ୍ୟାଘ୍ରତୁଲ୍ୟ ପରାକ୍ରମୀ ସେଇ ରାଜାଙ୍କୁ ସ୍ମରଣ କଲେ।
Verse 35
सत्यसंधो जरासंधं भुवि भीमपराक्रमम् । भागमन्यस्य निर्दिष्टमवध्यं मधुभिम्मुधे,जनमेजय! मनस्वी पुरुषोंमें सर्वश्रेष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ, मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी, वसुदेवपुत्र एवं बलरामके छोटे भाई भगवान् मधुसूदनने दिव्य दृष्टिसे स्मरण करके यह जान लिया था कि सिंहके समान पराक्रमी, बलवानोंमें श्रेष्ठ और भयानक पुरुषार्थ प्रकट करनेवाला यह राजा जरासंध युद्धमें दूसरे वीरका भाग (वध्य) नियत किया गया है। यदुवंशियोंमेंसे किसीके हाथसे उसकी मृत्यु नहीं हो सकती, अतः ब्रह्माजीके आदेशकी रक्षा करनेके लिये उन्होंने स्वयं उसे मारनेकी इच्छा नहीं की
ହେ ଜନମେଜୟ! ସତ୍ୟସଙ୍କଳ୍ପ ମଧୁସୂଦନ ଦିବ୍ୟଦୃଷ୍ଟିରେ ଜାଣିଲେ ଯେ ଭୂମିରେ ଭୀମସଦୃଶ ପରାକ୍ରମୀ ଜରାସନ୍ଧ ଯୁଦ୍ଧରେ ଅନ୍ୟ ଏକ ବୀରଙ୍କ ‘ଭାଗ’ (ବଧ୍ୟ) ଭାବେ ନିର୍ଦ୍ଦିଷ୍ଟ; ତେଣୁ ସେ ମଧୁସୂଦନଙ୍କ ହାତରେ ଅବଧ୍ୟ।
Verse 36
नात्मना55त्मवतां मुख्य इयेष मधुसूदन: । ब्राह्मीमाज्ञां पुरस्कृत्य हन्तुं हलधरानुज:,जनमेजय! मनस्वी पुरुषोंमें सर्वश्रेष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ, मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी, वसुदेवपुत्र एवं बलरामके छोटे भाई भगवान् मधुसूदनने दिव्य दृष्टिसे स्मरण करके यह जान लिया था कि सिंहके समान पराक्रमी, बलवानोंमें श्रेष्ठ और भयानक पुरुषार्थ प्रकट करनेवाला यह राजा जरासंध युद्धमें दूसरे वीरका भाग (वध्य) नियत किया गया है। यदुवंशियोंमेंसे किसीके हाथसे उसकी मृत्यु नहीं हो सकती, अतः ब्रह्माजीके आदेशकी रक्षा करनेके लिये उन्होंने स्वयं उसे मारनेकी इच्छा नहीं की
ହେ ଜନମେଜୟ! ଆତ୍ମସଂଯମୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ହଲଧର (ବଳରାମ)ଙ୍କ ଅନୁଜ ମଧୁସୂଦନ ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କ ଆଜ୍ଞାକୁ ଅଗ୍ରେ ରଖି ତାଙ୍କୁ ନିଜ ହାତରେ ହନନ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କଲେ ନାହିଁ।
How to remove a coercive power obstructing lawful sovereignty while still preserving social order afterward—resolved by pairing decisive action with liberation, public reassurance, and legitimate succession.
Effective leadership integrates capability (śakti) with responsibility (dharma): the narrative emphasizes not only victory but also protection of detainees, restoration of governance, and alliance-building for a sanctioned ritual aim.
No formal phalaśruti is stated; the meta-significance is implied through narrative validation—public praise, consent of liberated kings, and the stabilization of Magadha—marking the act as dharma-restorative within the epic’s political theology.