Mahabharata Adhyaya 109
Drona ParvaAdhyaya 10946 Versesसात्यकि के आक्रमण से कौरव-पक्ष का व्यूह टूटता है और सेना भयभीत होकर पीछे हटती है; पलड़ा पांडव-पक्ष की ओर झुकता है।

Adhyaya 109

Droṇa-parva Adhyāya 109 — Karṇa–Bhīma Yuddha and Durmukha’s Fall (कर्णभीमयुद्धम्; दुर्मुखवधः)

Upa-parva: Karna–Bhīmasena Saṅgrāma (Tactical Engagement Episode within Droṇa-parva)

Saṃjaya reports that Karṇa, having been defeated and made chariotless by Bhīma, mounts another chariot and immediately strikes the Pāṇḍava warrior. A sustained exchange of arrows follows, described through similes of powerful animals clashing. Bhīma answers Karṇa’s volleys with denser counter-fire, then launches a heavy mace toward the sūtaputra; the mace strike disables Karṇa’s chariot team, and Bhīma further cuts down the standard and strikes the charioteer, leaving Karṇa on a compromised vehicle. The narration marks this as an extraordinary display of Rādheya’s resilience even while chariotless. Observing Karṇa’s predicament, Duryodhana commands Durmukha to bring him a chariot; Durmukha advances and attempts to check Bhīma with arrows. Bhīma sends a chariot toward Durmukha and, in the same moment, dispatches him with nine well-feathered shafts. Karṇa mounts the offered chariot, shines again in battle, then pauses in visible grief upon seeing Durmukha’s body, circumambulates him, and resumes combat. Bhīma and Karṇa exchange fourteen nārācas each; Karṇa’s counter strikes pierce Bhīma’s left arm, causing heavy bleeding. Bhīma retaliates with swift arrows against Karṇa and his charioteer; Karṇa, unsettled by Bhīma’s force, withdraws rapidly from the immediate engagement, while Bhīma remains poised, bow drawn, described as blazing like fire.

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं कि द्रोण-पर्व के रण में केकयराज बृहत्क्षत्र के आगमन से कौरव-सेना में हलचल मचती है, और क्षेमधूर्ति उनके वक्ष पर तीव्र बाण-वर्षा कर युद्ध का द्वार खोल देता है। → क्षेमधूर्ति क्रोध में आकर तीखे भल्ल से बृहत्क्षत्र का धनुष काट देता है; उधर त्रिगर्त-पुत्र निरमित्र कौरव-वाहिनी को व्यथित करता हुआ रथ से गिरता है। युद्ध ‘तुमुल’ और ‘प्रेक्षणीय’ बन जाता है—सिद्ध-चारण तक विस्मित होकर देखते हैं। इसी बीच सात्यकि (युयुधान) अपनी युद्ध-उन्मत्त गति से कौरव-पंक्तियों को तोड़ने लगता है। → सात्यकि के शराघात से मगध-सैनिकों सहित कौरव-व्यूह भंग हो जाता है; भागते हुए शेष सैनिकों को देखकर स्पष्ट होता है कि रण-भूमि में उस क्षण निर्णायक दबाव सात्यकि के पक्ष में चला गया है। → महायशस्वी सात्यकि कौरव-सेना का विनाश कर अपने श्रेष्ठ धनुष को विधुन्वाता हुआ रण में चमकता है; भयभीत और तितर-बितर कौरव-सेना पुनः युद्ध के लिए सामने नहीं आती। → कौरव-पक्ष के बिखरने के बाद अगला प्रश्न यह रह जाता है कि कौन-सा वरिष्ठ योद्धा आगे बढ़कर सात्यकि के वेग को रोकेगा और व्यूह को फिर से बाँधेगा।

Shlokas

Verse 1

/ भीकम (2 अमान सप्ताधिकशततमो< ध्याय: कौरव-सेनाके क्षेमधूर्ति

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ମହାରାଜ! କେକୟଦେଶୀୟ ଦୃଢବିକ୍ରମ ବୀର ବୃହତ୍କ୍ଷତ୍ର ଆଗେଇ ଆସୁଥିବାକୁ ଦେଖି କ୍ଷେମଧୂର୍ତ୍ତି ଶରମାନେ ତାଙ୍କ ଛାତିକୁ ବିଦ୍ଧ କଲା।

Verse 2

संजय कहते हैं--महाराज! तदनन्तर सुदृढ़ पराक्रमी केकयराज बृहत्क्षत्रकों आते देख क्षेमधूर्तिने अनेक बाणोंद्वारा उनकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ।।

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ମହାରାଜ! ତା’ପରେ ଦୃଢ ପରାକ୍ରମୀ କେକୟରାଜ ବୃହତ୍କ୍ଷତ୍ର ଆସୁଥିବାକୁ ଦେଖି କ୍ଷେମଧୂର୍ତ୍ତି ଅନେକ ଶର ଦ୍ୱାରା ତାଙ୍କ ଛାତିରେ ଭୟଙ୍କର ଆଘାତ କଲା। କିନ୍ତୁ ରାଜନ, ଦ୍ରୋଣଙ୍କ ସେନାବ୍ୟୂହକୁ ଭଙ୍ଗ କରିବା ଇଚ୍ଛାରେ ବୃହତ୍କ୍ଷତ୍ର ମଧ୍ୟ ବାଙ୍କା ଗାଠଯୁକ୍ତ ନବ୍ବେ ଶର ତୁରନ୍ତ ଛାଡ଼ି କ୍ଷେମଧୂର୍ତ୍ତିକୁ ଆହତ କଲେ।

Verse 3

क्षेमधूर्तिस्तु संक्रुद्ध: कैकेयस्य महात्मन: । धनुश्चिच्छेद भल्‍लेन पीतेन निशितेन ह,इससे क्षेमधूर्ति अत्यन्त कुपित हो उठा और उसने पानीदार तीखे भल्लसे महामनस्वी केकयराजका धनुष काट डाला

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—କ୍ରୋଧେ ଉଦ୍ଦୀପ୍ତ କ୍ଷେମଧୂର୍ତ୍ତି ମହାତ୍ମା କୈକେୟରାଜଙ୍କୁ ଆଘାତ କରି, ଦୀପ୍ତ ଓ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଭଲ୍ଲଶରରେ ତାଙ୍କର ଧନୁଷକୁ ଦୁଇ ଖଣ୍ଡ କରିଦେଲା।

Verse 4

अथीैनं छिन्नधन्वानं शरेणानतपर्वणा । विव्याध समरे तूर्ण प्रवरं सर्वधन्विनाम्‌,धनुष कट जानेपर समस्त धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ बृहत्क्षत्रकों समरांगणमें झुकी हुई गाँठवाले बाणसे उसने तुरंत ही बींध डाला

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ତାପରେ ଧନୁଷ ଛିନ୍ନ ହୋଇ ଧନୁର୍ବିହୀନ ହୋଇଥିବା ସେ ବୀରଙ୍କୁ, ବାଙ୍କା ଗଠି ଥିବା ଶରଦ୍ୱାରା, ଯୁଦ୍ଧରେ ସେ ତୁରନ୍ତ ବିଦ୍ଧ କଲା—ଯିଏ ସମସ୍ତ ଧନୁର୍ଧରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଗଣ୍ୟ ଥିଲେ।

Verse 5

अथान्यद्‌ धनुरादाय बृहत्क्षत्रो हसन्निव । व्यश्वसूतरथं चक्रे क्षेमधूर्ति महारथम्‌,तदनन्तर बृहत्क्षत्रने दूसरा धनुष हाथमें लेकर हँसते-हँसते महारथी क्षेमधूर्तिको घोड़ों, सारथि और रथसे हीन कर दिया

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ତାପରେ ବୃହତ୍କ୍ଷତ୍ର ଅନ୍ୟ ଧନୁଷ ଧରି, ଯେନେ ହସୁଥିବା ପରି, ମହାରଥୀ କ୍ଷେମଧୂର୍ତ୍ତିଙ୍କୁ ଘୋଡ଼ା, ସାରଥି ଓ ରଥରୁ ବିହୀନ କରିଦେଲେ।

Verse 6

ततो5परेण भल्लेन पीतेन निशितेन च । जहार नृपते: कायाच्छिरो ज्वलितकुण्डलम्‌,इसके बाद दूसरे पानीदार तीखे भल्लसे राजा क्षेमधूर्तिके प्रज्वलित कुण्डलोंवाले मस्तकको धड़से अलग कर दिया

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ତାପରେ ଅନ୍ୟ ଦୀପ୍ତ ଓ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଭଲ୍ଲଶରରେ ସେ ରାଜାଙ୍କ ଜ୍ୱଲନ୍ତ କୁଣ୍ଡଳ-ଶୋଭିତ ଶିରକୁ ଦେହରୁ ବିଚ୍ଛିନ୍ନ କରିଦେଲା।

Verse 7

तच्छिन्नं सहसा तस्य शिर: कुज्चितमूर्थजम्‌ । सकिरीटं महीं प्राप्प बभौ ज्योतिरिवाम्बरात्‌

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସହସା ଛିନ୍ନ ହୋଇଥିବା, କୁଞ୍ଚିତ କେଶଯୁକ୍ତ ସେ ଶିର ମୁକୁଟ ସହିତ ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଲା ଏବଂ ଆକାଶରୁ ଭାଙ୍ଗି ପଡ଼ିଥିବା ଉଲ୍କା ପରି ଦୀପ୍ତ ଦେଖାଗଲା।

Verse 8

त॑ निहत्य रणे हृष्टो बृहत्क्षत्रो महारथः । सहसाभ्यपतत सैन्यं तावकं पार्थकारणात्‌,रणक्षेत्रमें क्षेमधूर्तिका वध करके प्रसन्न हुए महारथी बृहत्क्षत्र यूधिष्ठिरके हितके लिये सहसा आपकी सेनापर टूट पड़े

ରଣରେ ସେମାନଙ୍କୁ ନିହତ କରି ହୃଷ୍ଟ ହୋଇଥିବା ମହାରଥୀ ବୃହତ୍କ୍ଷତ୍ର, ପାର୍ଥପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ହିତାର୍ଥେ, ସହସା ତୁମ ସେନା ଉପରେ ଝାପି ପଡ଼ିଲା।

Verse 9

धृष्टकेतुं तथा5<यान्तं द्रोणहेतो: पराक्रमी । वीरधन्वा महेष्वासो वारयामास भारत,भारत! इसी प्रकार द्रोणाचार्यके हितके लिये महाधनुर्धर पराक्रमी वीरधन्वाने वहाँ आते हुए धृष्टकेतुको रोका

ହେ ଭାରତ! ଏହିପରି ଦ୍ରୋଣଙ୍କ ହିତାର୍ଥେ, ସେଠାକୁ ଆସୁଥିବା ଧୃଷ୍ଟକେତୁଙ୍କୁ ମହାଧନୁର୍ଧର ପରାକ୍ରମୀ ବୀରଧନ୍ୱା ରୋକିଦେଲେ।

Verse 10

तौ परस्परमासाद्य शरदंष्टी तरस्विनौ । शरैरनेकसाहसैरन्योन्यमभिजघध्नतु:,वे दोनों वेगशाली वीर बाणरूपी दाढ़ोंसे युक्त हो परस्पर भिड़कर अनेक सहस्र बाणोंद्वारा एक-दूसरेको चोट पहुँचाने लगे

ସେଇ ଦୁଇ ବେଗଶାଳୀ ବୀର, ଶରରୂପ ଦନ୍ତ ଥିବା ବରାହମାନଙ୍କ ପରି ପରସ୍ପର ମୁହାଁମୁହିଁ ହୋଇ, ଅନେକ ସହସ୍ର ବାଣରେ ଏକାପରକୁ ଆଘାତ କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ।

Verse 11

तावुभौ नरशार्दूलौ युयुधाते परस्परम्‌ । महावने तीव्रमदौ वारणाविव यूथपौ,महान्‌ वनमें तीव्र मदवाले दो यूथपति गजराजोंके समान वे दोनों पुरुषसिंह परस्पर युद्ध करने लगे

ସେଇ ଦୁଇ ନରଶାର୍ଦ୍ଦୂଳ ପରସ୍ପର ସମ୍ମୁଖେ ଯୁଦ୍ଧ କଲେ—ମହାବନରେ ତୀବ୍ର ମଦରେ ମତ୍ତ ଦୁଇ ଯୂଥପତି ଗଜରାଜ ପରି ମୁହାଁମୁହିଁ ହୋଇ।

Verse 12

गिरिगह्वरमासाद्य शार्दूलाविव रोषितौ | युयुधाते महावीर्यों परस्परजिघांसया

ସେଇ ଦୁଇ ମହାବୀର, ପରସ୍ପରକୁ ନିହତ କରିବା ଇଚ୍ଛାରେ କ୍ରୋଧାନ୍ଧ ହୋଇ, ପର୍ବତ ଗହ୍ୱରରେ ମିଳିଥିବା ଦୁଇ କ୍ରୁଦ୍ଧ ଶାର୍ଦ୍ଦୂଳ ପରି ଯୁଦ୍ଧ କଲେ।

Verse 13

तद्‌ युद्धमासीत तुमुल प्रेक्षणीयं विशाम्पते । सिद्धचारणसंघानां विस्मयाद्धुतदर्शनम्‌,प्रजानाथ! उनका वह घमासान युद्ध देखने ही योग्य था। वह सिद्धों और चारणसमूहोंको भी आश्चर्यजनक एवं अद्भुत दिखायी देता था

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ପ୍ରଜାନାଥ! ସେଇ ଯୁଦ୍ଧ ଘୋର ଗର୍ଜନମୟ, ତୁମୁଳ ଓ ଦର୍ଶନୀୟ ହୋଇଉଠିଲା। ସିଦ୍ଧ ଓ ଚାରଣମାନଙ୍କ ସମୁହକୁ ମଧ୍ୟ ସେ ଅଦ୍ଭୁତ ଦୃଶ୍ୟ ଦେଖି ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ ଲାଗିଲା; ବିସ୍ମୟରେ ତାଙ୍କ ଦୃଷ୍ଟି ଯେନ ଅସ୍ଥିର ହୋଇଉଠିଲା।

Verse 14

वीरधन्वा ततः क्रुद्धो धृष्टकेतो: शरासनम्‌ | द्विधा चिच्छेद भल्लेन प्रहसन्निव भारत,भरतनन्दन! तत्पश्चात्‌ वीरधन्वाने कुपित होकर हँसते हुए-से ही एक भल्लद्वारा धृष्टकेतुके धनुषके दो टुकड़े कर दिये

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ଭରତନନ୍ଦନ! ତାପରେ କ୍ରୋଧିତ ବୀରଧନ୍ୱା ହସୁଥିବା ପରି ଭଲ୍ଲବାଣରେ ଧୃଷ୍ଟକେତୁଙ୍କ ଧନୁଷକୁ ଦୁଇ ଖଣ୍ଡ କରିଦେଲା।

Verse 15

तदुत्सज्य धनुश्छिन्नं चेदिराजो महारथ: । शक्ति जग्राह विपुलां हेमदण्डामयस्मयीम्‌,महारथी चेदिराज धृष्टकेतुने उस कटे हुए धनुषको फेंककर एक लोहेकी बनी हुई स्वर्णदण्डविभूषित विशाल शक्ति हाथमें ले ली

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଛିନ୍ନ ହୋଇଥିବା ଧନୁଷକୁ ତ୍ୟାଗ କରି ଚେଦିରାଜ ମହାରଥୀ ଧୃଷ୍ଟକେତୁ ଲୋହାରେ ତିଆରି, ସୁବର୍ଣ୍ଣଦଣ୍ଡରେ ଶୋଭିତ ଏକ ବିଶାଳ ଶକ୍ତି ହାତରେ ଧରିଲେ।

Verse 16

तां तु शक्ति महावीर्या दोर्भ्यामायम्य भारत । चिक्षेप सहसा यत्तो वीरधन्वरथं प्रति,भारत! उस अत्यन्त प्रबल शक्तिको दोनों हाथोंसे उठाकर यत्नशील धृष्टकेतुने सहसा वीरधन्वाके रथपर उसे दे मारा

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ସେଇ ମହାବଳୀ ଶକ୍ତିକୁ ଦୁଇ ହାତରେ ଟାଣି ଉଠାଇ, ଯତ୍ନଶୀଳ ଧୃଷ୍ଟକେତୁ ସହସା ତାହାକୁ ବୀରଧନ୍ୱାଙ୍କ ରଥ ଦିଗକୁ ଛାଡ଼ିଦେଲେ।

Verse 17

तया तु वीरघातिन्या शक्‍त्या त्वभिहतो भूशम्‌ । निर्भिन्नहदयस्तूर्ण निषपपात रथान्महीम्‌,उस वीरघातिनी शक्तिकी गहरी चोट खाकर वीरधन्वाका वक्ष:स्थल विदीर्ण हो गया और वह तुरंत ही रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସେଇ ବୀରଘାତିନୀ ଶକ୍ତିର ଭୟଙ୍କର ଆଘାତରେ ସେ ଭାରି ଆହତ ହେଲା; ହୃଦୟ ଭେଦିତ ହୋଇ ସେ ତୁରନ୍ତ ରଥରୁ ପୃଥିବୀ ଉପରେ ପଡ଼ିଗଲା।

Verse 18

तस्मिन्‌ विनिहते वीरे त्रैगर्तानां महारथे । बल॑ ते5भज्यत विभो पाण्डवेयै: समन्ततः,प्रभो! त्रिगर्तदेशके उस महारथी वीरके मारे जानेपर पाण्डव-सैनिकोंने चारों ओरसे आपकी सेनाको विघटित कर दिया

ତ୍ରିଗର୍ତ୍ତମାନଙ୍କ ସେଇ ମହାରଥୀ ବୀର ନିହତ ହେବା ପରେ, ହେ ପ୍ରଭୋ, ପାଣ୍ଡବ ସେନା ଚାରିଦିଗରୁ ଆକ୍ରମଣ କରି ଆପଣଙ୍କ ସେନାର ବ୍ୟୂହକୁ ଭାଙ୍ଗି ଛିନ୍ନଭିନ୍ନ କରିଦେଲା।

Verse 19

सहदेवे तत: षष्टिं सायकान्‌ दुर्मुखोक्षिपत्‌ । ननाद च महानादं तर्जयन्‌ पाण्डवं रणे,तदनन्तर दुर्मुखने रणक्षेत्रमें सहदेवपर साठ बाण चलाये और उन पाण्डुकुमारको डाँट बताते हुए बड़े जोरसे गर्जना की

ତାପରେ ଦୁର୍ମୁଖ ରଣକ୍ଷେତ୍ରରେ ସହଦେବଙ୍କ ଉପରେ ଷାଠିଏ ଶର ନିକ୍ଷେପ କଲା ଏବଂ ପାଣ୍ଡବଙ୍କୁ ତର୍ଜନା କରି ମହାନାଦ କଲା।

Verse 20

माद्रेयस्तु ततः क्रुद्धो दुर्मुखं च शितैः शरै: । भ्राता भ्रातरमायान्तं विव्याध प्रहसन्निव

ଏହା ଦେଖି ମାଦ୍ରୀପୁତ୍ର ସହଦେବ କ୍ରୁଦ୍ଧ ହେଲେ। ଭ୍ରାତାସମ ଦୁର୍ମୁଖ ନିକଟକୁ ଆସୁଥିବାବେଳେ, ହସୁଥିବା ପରି ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଶରଦ୍ୱାରା ତାକୁ ବିଦ୍ଧ କଲେ।

Verse 21

त॑ रणे रभसं दृष्टवा सहदेवं महाबलम्‌ | दुर्मुखो नवभिर्बाणैस्ताडयामास भारत,भारत! रणक्षेत्रमें महाबली सहदेवका वेग बढ़ता देख दुर्मुखने नौ बाणोंद्वारा उन्हें घायल कर दिया

ହେ ଭାରତ! ରଣକ୍ଷେତ୍ରରେ ମହାବଳୀ ସହଦେବଙ୍କ ଉତ୍କଟ ବେଗ ଦେଖି ଦୁର୍ମୁଖ ନଅଟି ବାଣରେ ତାଙ୍କୁ ଆଘାତ କଲା।

Verse 22

दुर्मुबस्य तु भल्लेन छित्त्वा केतुं महाबल: । जघान चतुरो वाहांश्षतुर्भिनिशितै: शरै:,तब महाबली सहदेवने एक भल्लसे दुर्मुखकी ध्वजा काटकर चार तीखे बाणोंद्वारा उसके चारों घोड़ोंको मार डाला

ତାପରେ ମହାବଳୀ ସହଦେବ ଏକ ଭଲ୍ଲଶରରେ ଦୁର୍ମୁଖର କେତୁ (ଧ୍ୱଜା) କାଟିଦେଲେ ଏବଂ ଚାରିଟି ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଶରରେ ତାଙ୍କର ଚାରି ଘୋଡ଼ାକୁ ନିହତ କଲେ।

Verse 23

अथापरेण भल्लेन पीतेन निशितेन ह । चिच्छेद सारथे: कायाच्छिरो ज्वलितकुण्डलम्‌

ତାପରେ ସେ ପୀତବର୍ଣ୍ଣ, ଅତ୍ୟନ୍ତ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଅନ୍ୟ ଏକ ଭଲ୍ଲବାଣରେ ସାରଥିର ଦେହରୁ ଜ୍ୱଳନ୍ତ କୁଣ୍ଡଳଶୋଭିତ ଶିର କାଟି ପକାଇଲା।

Verse 24

फिर दूसरे पानीदार एवं तीखे भल्लसे उसके सारथिके चमकीले कुण्डलवाले मस्तकको धड़से काट गिराया ।।

ତାପରେ ସେ ପୀତବର୍ଣ୍ଣ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଭଲ୍ଲବାଣରେ ସାରଥିର ଜ୍ୱଳନ୍ତ କୁଣ୍ଡଳଶୋଭିତ ଶିର ଦେହରୁ କାଟି ପକାଇଲା। ତାହା ପରେ ସହଦେବ ତୀକ୍ଷ୍ଣ କ୍ଷୁରପ୍ରବାଣରେ ରଣରେ କୌରବ୍ୟର ମହାଧନୁ କାଟିଦେଇ, ପୁଣି ତାକୁ ପାଞ୍ଚ ବାଣରେ ବିଦ୍ଧ କଲା।

Verse 25

हताश्चृं तु रथं त्यक्त्वा दुर्मुखो विमनास्तदा । आरुरोह रथं राजन्‌ निरमित्रस्थ भारत

ତେବେ ହତାଶ ଦୁର୍ମୁଖ ନିଜ ରଥ ତ୍ୟାଗ କରି, ସେ ସମୟରେ ମନ ଖିନ୍ନ ହୋଇ, ହେ ରାଜନ, ନିରମିତ୍ରର ରଥରେ ଚଢ଼ିଲା।

Verse 26

राजन्‌! भरतनन्दन! तब दुर्मुख दुःखी मनसे उस अश्वहीन रथको त्यागकर निरमित्रके रथपर जा चढ़ा ।।

ହେ ରାଜନ, ଭରତନନ୍ଦନ! ସେତେବେଳେ ଦୁଃଖିତମନା ଦୁର୍ମୁଖ ଅଶ୍ୱହୀନ ସେ ରଥକୁ ତ୍ୟାଗ କରି ନିରମିତ୍ରର ରଥରେ ଚଢ଼ିଲା। ତାପରେ ଶତ୍ରୁବୀର-ସଂହାରୀ ସହଦେବ ମହାହବେ କ୍ରୁଦ୍ଧ ହୋଇ ସେନାର ମଧ୍ୟରେ ଭଲ୍ଲବାଣରେ ନିରମିତ୍ରକୁ ନିହତ କଲା।

Verse 27

स पपात रथोपस्थान्निरमित्रो जनेश्वर: । त्रिगर्तराजस्य सुतो व्यथयंस्तव वाहिनीम्‌,त्रिगर्तराजका पुत्र राजा निरमित्र अपने वियोगसे आपकी सेनाको व्यथित करता हुआ रथकी बैठकसे नीचे गिर पड़ा

ତାହାପରେ ତ୍ରିଗର୍ତ୍ତରାଜଙ୍କ ପୁତ୍ର ଜନେଶ୍ୱର ନିରମିତ୍ର, ଯେ ତୁମ ଵାହିନୀକୁ ବ୍ୟଥିତ କରୁଥିଲା, ରଥୋପସ୍ଥାନରୁ ତଳେ ପଡ଼ିଗଲା।

Verse 28

त॑ तु हत्वा महाबाहुः सहदेवो व्यरोचत । यथा दाशरथी राम: खरं हत्वा महाबलम्‌

ତାହାକୁ ବଧ କରି ମହାବାହୁ ସହଦେବ ଦୀପ୍ତିମାନ୍ ହେଲେ—ଯେପରି ଦଶରଥନନ୍ଦନ ରାମ ମହାବଳୀ ଖରକୁ ବଧ କରି ଶୋଭିତ ହୋଇଥିଲେ।

Verse 29

हाहाकारो महानासीत्‌ त्रिगर्तानां जनेश्वर । राजपुत्रं हतं दृष्टवा निरमित्र॑ं महारथम्‌,नरेश्वर! महारथी राजकुमार निरमित्रको मारा गया देख त्रिगर्तोंके दलमें महान्‌ हाहाकार मच गया

ହେ ଜନେଶ୍ୱର! ମହାରଥୀ ରାଜପୁତ୍ର ନିରମିତ୍ର ହତ ହୋଇଛି ବୋଲି ଦେଖି ତ୍ରିଗର୍ତ୍ତମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମହା ହାହାକାର ହେଲା।

Verse 30

नकुलस्ते सुतं राजन्‌ विकर्ण पृथुलोचनम्‌ । मुहूर्ताज्जितवॉल्लोके तदद्भुतमिवा भवत्‌,राजन! नकुलने विशाल नेत्रोंवाले आपके पुत्र विकर्णको दो ही घड़ीमें पराजित कर दिया; यह अद्भुत-सी बात हुई

ରାଜନ୍! ପୃଥୁଲୋଚନ ତୁମ ପୁତ୍ର ବିକର୍ଣ୍ଣକୁ ନକୁଳ ମୁହୂର୍ତ୍ତମାତ୍ରେ ଜିତିଲେ; ଲୋକେ ତାହାକୁ ଅଦ୍ଭୁତ ପରି ଭାବିଲେ।

Verse 31

सात्यकिं व्याप्रदत्तस्तु शरै: संनतपर्वभि: । चक्रे<दृश्यं साश्वसूतं सध्वजं पृतनान्तरे,व्याप्रदत्तने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा सेनाके मध्यभागमें घोड़ों, सारथि और ध्वजसहित सात्यकिको अदृश्य कर दिया

ତେବେ ବ୍ୟାପ୍ରଦତ୍ତ ନମ୍ର-ପର୍ବ ଥିବା ବାଣମାନେ ଦ୍ୱାରା ସେନାମଧ୍ୟରେ ସାତ୍ୟକିଙ୍କୁ ଅଶ୍ୱ, ସାରଥି ଓ ଧ୍ୱଜ ସହିତ ଏମିତି ଆବୃତ କଲେ ଯେ ସେ ଅଦୃଶ୍ୟ ପରି ହେଲେ।

Verse 32

तान्‌ निवार्य शरान्‌ शूर: शैनेय: कृतहस्तवत्‌ | साश्व॒सूतध्वजं बाणैरव्याच्रिदत्तमपातयत्‌

ସେ ବାଣମାନଙ୍କୁ ନିବାରି ଶୂର ଶୈନେୟ ସାତ୍ୟକି କୃତହସ୍ତ ପୁରୁଷ ପରି ନିଜ ବାଣଦ୍ୱାରା ଅଶ୍ୱ, ସାରଥି ଓ ଧ୍ୱଜ ସହିତ ଅବ୍ୟାଚୃଦତ୍ତକୁ ପାତିତ କଲେ।

Verse 33

कुमारे निहते तस्मिन्‌ मागधस्य सुते प्रभो । मागधा: सर्वतो यत्ता युयुधानमुपाद्रवन्‌,प्रभो! मगधनरेशके पुत्र राजकुमार व्याप्रदत्तके मारे जानेपर मगधदेशीय वीरोंने सब ओरसे प्रयत्नशील होकर युयुधानपर धावा किया

ପ୍ରଭୋ! ମଗଧରାଜଙ୍କ ସେଇ କୁମାର ନିହତ ହେବା ସହିତ, ସମସ୍ତ ଦିଗରୁ ଉଦ୍ୟତ ମଗଧବୀରମାନେ ଏକାସାଥିରେ ଯୁୟୁଧାନଙ୍କ ଉପରେ ଧାଇ ପଡ଼ିଲେ।

Verse 34

विसृजन्त:ः शरांश्वैव तोमरांश्न सहस्रश: । भिन्दिपालांस्तथा प्रासान्‌ मुदूगरान्‌ मुसलानपि

ସେମାନେ ସହସ୍ର ସହସ୍ର ଶର ଓ ତୋମର ବିସର୍ଜନ କରୁଥିଲେ; ଭିନ୍ଦିପାଳ, ପ୍ରାସ, ମୁଦ୍ଗର ଓ ମୁସଳ ମଧ୍ୟ ଛାଡ଼ୁଥିଲେ।

Verse 35

तांस्तु सर्वानू स बलवान्‌ सात्यकिर्युद्धदुर्मद:

ତେବେ ଯୁଦ୍ଧୋନ୍ମାଦରେ ମତ୍ତ ଶକ୍ତିଶାଳୀ ସାତ୍ୟକି ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ମୁହାଁ ଦେଲେ।

Verse 36

मागधान्‌ द्रवतो दृष्टवा हतशेषान्‌ समन्ततः

ବଧ ପରେ ଅବଶିଷ୍ଟ ମଗଧ ସେନା ସମସ୍ତ ଦିଗକୁ ଦୌଡ଼ୁଥିବା ଦେଖି,

Verse 37

नाशयित्वा रणे सैन्यं त्वदीयं माधवोत्तम:

ରଣରେ ତୁମ ସେନାକୁ ନାଶ କରି, ମାଧବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ...

Verse 38

भज्यमानं बल॑ राजन्‌ सात्वतेन महात्मना

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍, ସେଇ ମହାତ୍ମା ସାତ୍ୱତ ବୀରଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସେନା ଭଙ୍ଗୁର ହେଉଥିଲା; ରଣଭୂମିରେ ତାଙ୍କର ଅପ୍ରତିହତ ପରାକ୍ରମ ବ୍ୟୂହକୁ ଭେଦି ସମସ୍ତ ଦର୍ଶକଙ୍କ ଧୈର୍ୟ ଓ ଧର୍ମବୁଦ୍ଧିକୁ ପରୀକ୍ଷା କରୁଥିଲା।

Verse 39

ततो द्रोणो भृशं क्रुद्ध: सहसोदवृत्य चक्षुषी । सात्यकिं सत्यकर्माणं स्वयमेवाभिदुद्रुवे,तब अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए द्रोणाचार्यने सहसा आँखें घुमाकर सत्यकर्मा सात्यकिपर स्वयं ही आक्रमण किया

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ତାପରେ ଦ୍ରୋଣ ଭୟଙ୍କର କ୍ରୋଧରେ ଜ୍ୱଳି, ହଠାତ୍ ଚକ୍ଷୁ ଘୁରାଇ, ସତ୍ୟକର୍ମା ସାତ୍ୟକିଙ୍କ ଉପରେ ସ୍ୱୟଂ ଧାଇଗଲେ; ସେଇ କ୍ଷଣରେ ରଣକ୍ରୋଧ ଶାସ୍ତ୍ରଜ୍ଞ ଗୁରୁଙ୍କ ସଂଯମକୁ ମଧ୍ୟ ଭେଦି ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍ ପ୍ରତିଶୋଧକୁ ପ୍ରେରିତ କଲା, ଏବଂ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ–ଆବେଗ ମଧ୍ୟର ଧର୍ମସଙ୍କଟକୁ ଅଧିକ ଘନ କରିଦେଲା।

Verse 106

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें युधिष्चटिरका पलायनविषयक एक सौ छवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଦ୍ରୋଣପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଜୟଦ୍ରଥବଧପର୍ବରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପଲାୟନବିଷୟକ ଏକଶ ଛଅତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 107

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि संकुलयुद्धे सप्ताधिकशततमो<ध्याय:

ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଦ୍ରୋଣପର୍ବରେ ଜୟଦ୍ରଥବଧପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ସଙ୍କୁଳଯୁଦ୍ଧବର୍ଣ୍ଣନାତ୍ମକ ଏକଶ ସାତତମ ଅଧ୍ୟାୟ।

Verse 346

अयोधयमन्‌ रणे शूरा: सात्वतं युद्धदुर्मदम्‌ । वे शूरवीर मागध-सैनिक बहुत-से बाणों

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ରଣରେ ଶୂରମାନେ ଯୁଦ୍ଧୋନ୍ମତ୍ତ ସାତ୍ୱତ ବୀର ସାତ୍ୟକିଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କଲେ। ମାଗଧ ସୈନିକମାନେ ଅନେକ ବାଣବର୍ଷା, ସହସ୍ର ତୋମର, ଭିନ୍ଦିପାଳ, ପ୍ରାସ, ମୁଦ୍ଗର ଓ ମୂସଳର ପ୍ରହାର କରି ସମରାଙ୍ଗଣରେ ତାଙ୍କ ଉପରେ ଝାପି ପଡ଼ିଲେ; ତଥାପି ସେ ରଣେ ଦୁର୍ଜୟ ହୋଇ ରହିଲେ।

Verse 356

नातिकृच्छाद्धसन्नेव विजिग्ये पुरुषर्षभ: । बलवान युद्धदुर्मद पुरुषप्रवर सात्यकिने हँसते हुए ही उन सबको अधिक कष्ट उठाये बिना ही परास्त कर दिया

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଅତି କଷ୍ଟ ବିନା, ଯେନ ହସୁଥିବା ପରି, ଯୁଦ୍ଧୋନ୍ମାଦରେ ମତ୍ତ, ବଳବାନ ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ ସାତ୍ୟକି ସେମାନଙ୍କୁ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ପରାଜିତ କଲେ।

Verse 363

बल॑ ते5भज्यत विभो युयुधानशरार्दितम्‌ । प्रभो! मरनेसे बचे हुए मागध-सैनिकोंको चारों ओर भागते देख सात्यकिके बाणोंसे पीड़ित हुई आपकी सेनाका व्यूह भंग हो गया

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ପ୍ରଭୋ! ଯୁଯୁଧାନ (ସାତ୍ୟକି)ର ବାଣରେ ଆହତ ଆପଣଙ୍କ ସେନାବଳ ଭାଙ୍ଗିଗଲା। ମୃତ୍ୟୁଭୟରୁ ବଞ୍ଚିଥିବା ମାଗଧ ସୈନିକମାନେ ସବୁଦିଗକୁ ପଳାଉଥିବା ଦେଖି, ଆହତ ଓ ଭୀତ ସେନାର ବ୍ୟୂହ ଭଙ୍ଗ ହେଲା।

Verse 376

विधुन्वानो धनु: श्रेष्ठ व्यभश्राजत महायशा: । इस प्रकार मधुवंशके श्रेष्ठ वीर महायशस्वी सात्यकि रणक्षेत्रमें आपकी सेनाका विनाश करके अपने उत्तम धनुषको हिलाते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଧନୁଷକୁ ଝାଡ଼ି ଝାଡ଼ି ସେ ମହାଯଶସ୍ବୀ ଯୋଦ୍ଧା ଦୀପ୍ତିମାନ ହେଲେ। ଏଭଳି ମଧୁବଂଶର ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୀର ଶ୍ରୀମାନ ସାତ୍ୟକି ରଣକ୍ଷେତ୍ରରେ ଆପଣଙ୍କ ସେନାକୁ ବିନାଶ କରି, ନିଜ ଉତ୍ତମ ଧନୁଷକୁ କମ୍ପାଇ ପରମ ଶୋଭା ପାଇଲେ।

Verse 386

नाभ्यवर्तत युद्धाय त्रासितं दीर्घबाहुना । राजन! महामना महाबाहु सात्यकिके द्वारा डरायी गयी और तितत-बितर की हुई आपकी सेना फिर युद्धके लिये सामने नहीं आयी

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ରାଜନ୍! ଦୀର୍ଘବାହୁ, ମହାମନା, ମହାବାହୁ ସାତ୍ୟକି ଦ୍ୱାରା ଭୀତ ଓ ଛିଟିଯାଇଥିବା ଆପଣଙ୍କ ସେନା ପୁଣି ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ସାମ୍ନାକୁ ଆସିଲା ନାହିଁ।

Frequently Asked Questions

The chapter frames a dharma tension between relentless pursuit of advantage (including disabling chariot infrastructure and pre-empting reinforcements) and the intermittent demands of honor and grief, seen when Karṇa pauses to acknowledge Durmukha even as the engagement continues.

Capability in action is shown as relational and conditional: success depends on support systems, composure, and adaptive decision-making; emotional disturbance can briefly suspend strategic clarity, yet duty-driven re-entry remains a defining feature of kṣātra conduct.

No explicit phalaśruti is provided in this adhyāya; its significance is contextual, contributing to the epic’s cumulative reflection on agency, loss, and the ethical ambiguity of tactical necessity within the broader war narrative.

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