
अश्वमेधीयस्य हयस्य दक्षिणापश्चिमगमनम् — The Sacrificial Horse’s Southern and Western Circuit
Upa-parva: Aśvamedha-Haya-Cāraṇa (Horse-Wandering Campaign Episodes)
Vaiśaṃpāyana reports the Aśvamedha horse’s itinerary and the escorting enforcement undertaken by Arjuna (Kaunteya, Kirīṭin). The horse first moves south under royal authorization and is honored by Magadha. It returns and reaches Śukti, a Cedi city, where it is received with pre-battle honor by Śarabha, son of Śiśupāla. The horse then proceeds through multiple regions (including Kāśī, Andhra, Kosala, Kirāta, and Taṅgaṇa), after which Arjuna accepts due honors and reorients toward Daśārṇa. There, a ruler named Citrāṅgada offers resistance, leading to a severe contest that ends in Arjuna’s victory and subjugation of the opponent. Arjuna next enters the territory associated with the Niṣāda king Ekalavya; Ekalavya’s son confronts him with Niṣāda forces, framed as an attempt to obstruct the sacrifice, and is defeated. Continuing along the southern sea, Arjuna faces further engagements involving Draviḍa, Andhra, Raudra, Māhiṣaka, and Kollagireya groups. Following the horse’s direction, he traverses Saurāṣṭra, reaches Gokarṇa and Prabhāsa, and the horse arrives at Dvāravatī guarded by Vṛṣṇi warriors. Yādava youths attempt to seize the horse but are restrained by Ugrasena; the Vṛṣṇy-Andhaka leader (Kṛṣṇa) and Vasudeva meet Arjuna, honor him, and permit him to continue. The horse then moves west along the sea, reaches Pañcanada, and enters Gandhāra, where a formidable battle arises with the Gandhāra king—identified as Śakuni’s son—motivated by prior enmity.
Chapter Arc: अश्वमेध के अश्व का अनुसरण करते हुए अर्जुन के सामने शकुनि-पुत्र (गान्धारों का महारथ) विशाल सेना सहित प्रत्युद्यत होता है—ध्वज-पताकाओं से सजी हस्ति-अश्व-रथ-युक्त वाहिनी के साथ। → गान्धार-योद्धा अपने कुल-अपमान और शकुनि-वध की स्मृति से क्रुद्ध होकर युद्ध के लिए उकसते हैं; अर्जुन धर्मात्मा होकर भी रण-आवश्यकता से पीछे नहीं हटता और विरोधी को संयमित वाणी से समझाने का प्रयत्न करता है, पर सेना का आवेग बढ़ता जाता है। → अर्जुन अर्धचन्द्राकार बाण से शकुनि-पुत्र का शिरस्त्राण वैसे ही उड़ा देता है जैसे कभी जयद्रथ के प्रसंग में निर्णायक प्रहार किया था; तत्पश्चात गान्धारों के रोके जाने पर भी वह नाम ले-लेकर उनके मस्तक काट गिराता है—रण का चरम उन्माद यहीं फूटता है। → विजयी अर्जुन मामी (गान्धारी) का स्मरण कर शत्रु-पक्ष के प्रति मर्यादा रखता है; वह शकुनि-पुत्र को सान्त्वना देकर कहता है कि गान्धारी-माता और धृतराष्ट्र के सम्बन्ध के कारण ही वह जीवित छोड़ा जा रहा है—अर्थात् पराजय के साथ जीवनदान। → अश्वानुसरण का अभियान आगे बढ़ता है—अश्व के मार्ग में अगले राज्य/वीर का प्रतिरोध अभी शेष है।
Verse 1
अपर बक। ] अत काड< चतुरशीतितमो< ध्याय: शकुनिपुत्रकी पराजय वैशम्पायन उवाच शकुनेस्तनयो वीरो गान्धाराणां महारथ: । प्रत्युद्ययौ गुडाकेशं सैन्येन महता वृतः,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! शकुनिका पुत्र गान्धारोंमें सबसे बड़ा वीर और महारथी था। वह विशाल सेनासे घिरकर निद्राविजयी अर्जुनका सामना करनेके लिये चला
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ଶକୁନିଙ୍କ ପୁତ୍ର ଗାନ୍ଧାରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମହାବୀର ଓ ମହାରଥୀ ଥିଲା। ସେ ବିଶାଳ ସେନାରେ ପରିବୃତ ହୋଇ ଗୁଡାକେଶ (ନିଦ୍ରାଜୟୀ) ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ସମ୍ମୁଖୀନ କରିବାକୁ ଅଗ୍ରସର ହେଲା।
Verse 2
हस्त्यश्वरथयुक्तेन पताकाध्वजमालिना । अमृष्यमाणास्ते योधा तृपस्य शकुनेर्वधम्
ହାତୀ-ଘୋଡ଼ା-ରଥରେ ସଜ୍ଜିତ ଏବଂ ପତାକା-ଧ୍ୱଜରେ ଶୋଭିତ ସେଇ ଯୋଦ୍ଧାମାନେ, ଅସହ୍ୟ କ୍ରୋଧରେ ଜ୍ୱଳି, ଶକୁନିଙ୍କ ବଧରେ ତୃପ୍ତି ମାନିଲେ।
Verse 3
स तानुवाच धर्मात्मा बीभत्सुरपराजित:
ତେବେ ଧର୍ମାତ୍ମା, ଅପରାଜିତ ବୀଭତ୍ସୁ (ଅର୍ଜୁନ) ସେମାନଙ୍କୁ କହିଲେ।
Verse 4
युधिष्ठिरस्यथ वचन न च ते जगृहुर्हितम् । किसीसे परास्त न होनेवाले धर्मात्मा अर्जुनने उन्हें राजा युधिष्ठिरकी बात सुनायी; परंतु उस हितकर वचनको भी वे ग्रहण न कर सके ।। ३ $ ।। वार्यमाणा5पि पार्थेन सान्त्वपूर्वममर्षिता:
ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣିଲେ ମଧ୍ୟ ସେମାନେ ହିତକର କଥା ଗ୍ରହଣ କଲେ ନାହିଁ। ପାର୍ଥ ସାନ୍ତ୍ୱନାପୂର୍ବକ ରୋକିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କଲେ ମଧ୍ୟ, ସେମାନେ ଅମର୍ଷରେ ଅଡ଼ି ରହିଲେ।
Verse 5
ततः शिरांसि दीप्ताग्रैस्तेषां चिच्छेद पाण्डव:
ତାପରେ ପାଣ୍ଡବ ଦୀପ୍ତାଗ୍ର ଶସ୍ତ୍ରଦ୍ୱାରା ସେମାନଙ୍କ ଶିର ଛେଦ କଲେ।
Verse 6
ते वध्यमाना: पार्थेन हयमुत्सृज्य सम्भ्रमात्
ପାର୍ଥ (ଅର୍ଜୁନ)ଙ୍କ ପ୍ରହାରରେ ସେମାନେ ଭୟାକୁଳ ହେଲେ। ଆତଙ୍କରେ ଯଜ୍ଞାଶ୍ୱକୁ ଛାଡ଼ି ଗୋଲମାଳରେ ଦିଗ୍ଦିଗନ୍ତକୁ ପଳାଇଗଲେ।
Verse 7
निरुध्यमानस्तैश्लापि गान्धारै: पाण्डुनन्दन:
ଗାନ୍ଧାର ଯୋଧାମାନେ ତାଙ୍କୁ ଘେରି ଅଟକାଇଲେ ମଧ୍ୟ, ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ (ଅର୍ଜୁନ) ରଣମଧ୍ୟରେ ଅଚଳ ଭାବେ ଦୃଢ଼ ରହିଲେ।
Verse 8
वध्यमानेषु तेष्वाजौ गान्धारेषु समन््तत:
ଯୁଦ୍ଧରେ ସମସ୍ତ ଦିଗରେ ଗାନ୍ଧାର ଯୋଧାମାନେ ବଧ ହେଉଥିଲେ; ରଣଭୂମି ସର୍ବତ୍ର ଘୋର ସଂହାରର ଦୃଶ୍ୟ ହୋଇଉଠିଲା।
Verse 9
त॑ युध्यमान राजान क्षत्रधर्मे व्यवस्थितम्,क्षत्रियधर्ममें स्थित होकर युद्ध करनेवाले उस राजासे अर्जुनने इस प्रकार कहा--“वीर! तुम्हें युद्ध करनेसे कोई लाभ नहीं है। महाराज युधिष्ठिरकी यह आज्ञा है कि मैं राजाओंका वध न करूँ। अतः तुम युद्धसे निवृत्त हो जाओ जिससे आज तुम्हारी पराजय न हो'
କ୍ଷତ୍ରଧର୍ମରେ ଅବସ୍ଥିତ ହୋଇ ଯୁଦ୍ଧ କରୁଥିବା ସେଇ ରାଜାଙ୍କୁ ଦେଖି ଅର୍ଜୁନ ଧର୍ମସମ୍ମତ ହିତବାକ୍ୟ କହିଲେ— “ବୀର! ଏହି ଯୁଦ୍ଧରେ ତୁମର କିଛି ଲାଭ ନାହିଁ। ମହାରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଆଜ୍ଞା— ମୁଁ ରାଜାମାନଙ୍କୁ ବଧ କରିବି ନାହିଁ। ତେଣୁ ଯୁଦ୍ଧରୁ ନିବୃତ୍ତ ହୁଅ, ଯେପରି ଆଜି ତୁମ ପରାଜୟ ନ ହେଉ।”
Verse 10
पार्थोउब्रवीज्न मे वध्या राजानो राजशासनात् | अलं युद्धेन ते वीर न ते5स्त्वद्य पराजय:,क्षत्रियधर्ममें स्थित होकर युद्ध करनेवाले उस राजासे अर्जुनने इस प्रकार कहा--“वीर! तुम्हें युद्ध करनेसे कोई लाभ नहीं है। महाराज युधिष्ठिरकी यह आज्ञा है कि मैं राजाओंका वध न करूँ। अतः तुम युद्धसे निवृत्त हो जाओ जिससे आज तुम्हारी पराजय न हो'
ପାର୍ଥ (ଅର୍ଜୁନ) କହିଲେ— “ରାଜାଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ଅନୁସାରେ ଏହି ରାଜାମାନେ ମୋ ଦ୍ୱାରା ବଧ୍ୟ ନୁହେଁ। ବୀର! ଯୁଦ୍ଧ ପର୍ଯ୍ୟାପ୍ତ; ଆଜି ତୁମ ପରାଜୟ ନ ହେଉ।”
Verse 11
इत्युक्तस्तदनादृत्य वाक्यमज्ञानमोहित: । स शक्रसमकर्माणं समवाकिरदाशुगै:,उनके ऐसा कहनेपर भी वह अज्ञानसे मोहित होनेके कारण उनकी बातकी अवहेलना करके इन्द्रके समान पराक्रमी अर्जुनपर शीघ्रगामी बाणोंकी वर्षा करने लगा
ସେମାନେ ଏପରି କହିଥିଲେ ମଧ୍ୟ ଅଜ୍ଞାନରେ ମୋହିତ ହୋଇ ସେ ତାଙ୍କର କଥାକୁ ଅବହେଳା କଲା ଏବଂ ଇନ୍ଦ୍ରସମ ପରାକ୍ରମୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ଉପରେ ଶୀଘ୍ରଗାମୀ ବାଣବର୍ଷା କରିବାକୁ ଲାଗିଲା।
Verse 12
तस्य पार्थ: शिरस्त्राणमर्धचन्द्रेण पत्रिणा । अपाहरदमेयात्मा जयद्रथशिरो यथा,तब अमेय आत्मबलसे सम्पन्न अर्जुनने जिस प्रकार जयद्रथका सिर उड़ाया था, उसी प्रकार शकुनि-पुत्रके शिरस्त्राणः (टोप)-को एक अर्धचन्द्राकार बाणसे काट गिराया
ତାପରେ ଅମେୟ ଆତ୍ମବଳସମ୍ପନ୍ନ ପାର୍ଥ (ଅର୍ଜୁନ) ଯେପରି ଏକଦା ଜୟଦ୍ରଥଙ୍କ ଶିର ଛେଦ କରିଥିଲେ, ସେହିପରି ପତ୍ରଯୁକ୍ତ ଅର୍ଧଚନ୍ଦ୍ରାକାର ବାଣରେ ଶକୁନି-ପୁତ୍ରଙ୍କ ଶିରସ୍ତ୍ରାଣକୁ କାଟି ଫେଲିଲେ।
Verse 13
त॑ दृष्टवा विस्मयं जम्मुर्गान्धारा: सर्व एव ते । इच्छता तेन न हतो राजेत्यसि च त॑ विदु:,यह देखकर समस्त गान्धारोंको बड़ा विस्मय हुआ और वे सब-के-सब यह समझ गये कि अर्जुनने जान-बूझकर गान्धारराजको जीवित छोड़ दिया
ଏହା ଦେଖି ସମସ୍ତ ଗାନ୍ଧାର ଲୋକ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବିସ୍ମିତ ହେଲେ ଏବଂ ଅର୍ଜୁନ ଇଚ୍ଛାକୃତଭାବେ ଗାନ୍ଧାରରାଜଙ୍କୁ ନ ମାରି ଛାଡ଼ିଦେଇଛନ୍ତି ବୋଲି ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ବୁଝିଗଲେ।
Verse 14
गान्धारराजपुत्रस्तु पलायनकृतक्षण: । ययौ तैरेव सहितत्त्रस्तै: क्षुद्रमूगैरिव,उस समय गान्धारराज शकुनिका पुत्र भागनेका अवसर देखने लगा। जैसे सिंहसे डरे हुए छोटे-छोटे मृग भाग जाते हैं, उसी प्रकार अर्जुनसे भयभीत हुए सैनिकोंके साथ वह स्वयं भी भाग निकला
ସେତେବେଳେ ଗାନ୍ଧାରରାଜଙ୍କ ପୁତ୍ର (ଶକୁନି-ପୁତ୍ର) ପଳାଇବାର ସୁଯୋଗ ଦେଖି, ସିଂହକୁ ଦେଖି ଭୟଭୀତ ଛୋଟ ମୃଗମାନେ ଯେପରି ଛିଟିକି ପଳାନ୍ତି, ସେହିପରି ଅର୍ଜୁନଭୟାକୁଳ ସେନାମାନଙ୍କ ସହ ନିଜେ ମଧ୍ୟ ପଳାଇଗଲା।
Verse 15
तेषां तु तरसा पार्थस्तत्रैव परिधावताम् | प्रजहारोत्तमाड़्ानि भल््लै: संनतपर्वभि:,वहीं चक्कर काटनेवाले बहुत-से सैनिकोंके मस्तक अर्जुनने झुकी हुई गाँठवाले भल्लोंद्वारा वेगपूर्वक काट लिया
ସେମାନେ ସେଠାରେ ଏଦିକ-ସେଦିକ ଦୌଡ଼ୁଥିବାବେଳେ, ପାର୍ଥ (ଅର୍ଜୁନ) ତୁରନ୍ତ ତୀବ୍ର ବେଗରେ ଝୁକା ଗାଠଯୁକ୍ତ ଭଲ୍ଲ ବାଣଦ୍ୱାରା ସେମାନଙ୍କ ଅନେକଙ୍କ ମସ୍ତକ ସେଠାରେଇ କାଟି ଫେଲିଲେ।
Verse 16
उच्छितांस्तु भुजान् केचिन्नाबुध्यन्त शरैह्वतान् । शरैर्गाण्डीवनिर्मुक्ति: पृथुभि: पार्थचोदितै:,अर्जुनद्वारा चलाये और गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बहुसंख्यक बाणोंसे कितने ही योद्धाओंकी ऊँची उठी हुई भुजाएँ कटकर गिर गयीं और उन्हें इस बातका पतातक न लगा
ପାର୍ଥଙ୍କ ଆଦେଶରେ ଗାଣ୍ଡୀବରୁ ନିଷ୍କ୍ରାନ୍ତ ପ୍ରଶସ୍ତ ଅସଂଖ୍ୟ ଶରବୃଷ୍ଟିରେ ଅନେକ ଯୋଦ୍ଧାଙ୍କ ଉଠାଇଥିବା ଭୁଜ କଟି ପଡ଼ିଗଲା; ଶରାହତ ହୋଇ ସେମାନେ ଏହା ମଧ୍ୟ ଜାଣିପାରିଲେ ନାହିଁ।
Verse 17
सम्भ्रान्तनरनागाश्वमपतद् विद्रुतं बलम् । हतविध्वस्तभूयिष्ठमावर्तत मुहुर्मुहु:
ମଣିଷ, ହାତୀ ଓ ଘୋଡ଼ା ଭୟରେ ଅସ୍ଥିର ହେଲେ; ସେନା ଭାଙ୍ଗି ପଳାଇଲା। ଅଧିକାଂଶ ହତ ଓ ବିଧ୍ୱସ୍ତ ହୋଇ ସେ ମୁହୁର୍ମୁହୁଃ ପୁନଃପୁନଃ ଘୁରି ଆସୁଥିଲା।
Verse 18
सम्पूर्ण सेनाके मनुष्य, हाथी और घोड़े घबराकर इधर-उधर भटकने लगे। सारी सेना गिरती-पड़ती भागने लगी। उनके अधिकांश सिपाही युद्धमें मारे गये या नष्ट हो गये और वह बार-बार युद्धभूमिमें ही चक्कर काटने लगी ।। नाभ्यदृश्यन्त वीरस्य केचिदग्रेग्रयकर्मण: । रिपव: पात्यमाना वै ये सहेयुर्धन॑जयम्,श्रेष्ठ कर्म करनेवाले वीर अर्जुनके सामने कोई भी शत्रु खड़े नहीं दिखायी देते थे, जो अर्जुनकी मार पड़नेपर उनका वेग सहन कर सके
ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସେନାର ମଣିଷ, ହାତୀ ଓ ଘୋଡ଼ା ଭୟରେ ଏଦିକ-ସେଦିକ ଭ୍ରମଣ କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ; ସେନା ଲୁହୁଳୁହୁଳି ପଳାଇଲା। ତାଙ୍କର ଅଧିକାଂଶ ସୈନିକ ଯୁଦ୍ଧରେ ହତ କିମ୍ବା ନଷ୍ଟ ହେଲେ, ଏବଂ ସେ ମୁହୁର୍ମୁହୁଃ ରଣଭୂମିରେ ହିଁ ଚକ୍କର କାଟୁଥିଲା। ଶ୍ରେଷ୍ଠ କର୍ମକର୍ତ୍ତା ବୀର ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଧନଞ୍ଜୟଙ୍କ ପ୍ରହାରବେଗ ସହିପାରିବା ଭଳି କୌଣସି ଶତ୍ରୁ ଦୃଶ୍ୟମାନ ହେଲା ନାହିଁ।
Verse 19
ततो गान्धारराजस्यथ मन्त्रिवृद्धपुर:सरा । जननी निर्ययौ भीता पुरस्कृत्यार्घ्यमुत्तमम्,तदनन्तर गान्धारराजकी माता अत्यन्त भयभीत होकर बूढ़े मन्त्रियोंको आगे करके उत्तम अर्घ्य ले नगरसे बाहर निकली और रणभूमिमें उपस्थित हुई
ତାପରେ ଗାନ୍ଧାରରାଜଙ୍କ ଜନନୀ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଭୀତ ହୋଇ, ବୃଦ୍ଧ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ଆଗରେ ରଖି, ଉତ୍ତମ ଅର୍ଘ୍ୟ ନେଇ, ନଗରରୁ ବାହାରି ରଣଭୂମି ଦିଗକୁ ଗଲେ।
Verse 20
सा न्यवारयदव्यग्रं त॑ पुत्र युद्धदुर्मदम् । प्रसादयामास च तं जिष्णुमक्लिष्टकारिणम्,आते ही उसने अपने व्यग्रतारहित एवं रणोन्मत्त पुत्रको युद्ध करनेसे रोका और अनायास ही महान् कर्म करनेवाले विजयशील अर्जुनको प्रिय वचनोंद्वारा प्रसन्न किया
ସେ ନିଜର ବ୍ୟଗ୍ରତାହୀନ କିନ୍ତୁ ରଣମଦରେ ମତ୍ତ ପୁତ୍ରକୁ ଯୁଦ୍ଧରୁ ରୋକିଲେ; ଏବଂ ପ୍ରିୟ ବଚନରେ ଅକ୍ଲିଷ୍ଟକାରୀ, ବିଜୟଶୀଳ ଅର୍ଜୁନ—ଜିଷ୍ଣୁଙ୍କୁ—ପ୍ରସନ୍ନ କଲେ।
Verse 21
तां पूजयित्वा बीभत्सु: प्रसादमकरोत् प्रभु: । शकुनेश्चापि तनयं सान्त्वयन्निदमब्रवीत्,सामर्थ्यशाली अर्जुनने भी मामीका सम्मान करके उन्हें प्रसन्न किया और स्वयं उनपर कृपादृष्टि की। फिर शकुनिके पुत्रको भी सान्त्वना प्रदान करते हुए वे इस प्रकार बोले --
ତାଙ୍କୁ ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ସମ୍ମାନରେ ପୂଜା କରି ପରାକ୍ରମୀ ବୀଭତ୍ସୁ (ଅର୍ଜୁନ) କୃପା ପ୍ରଦର୍ଶନ କଲେ। ପରେ ଶକୁନିଙ୍କ ପୁତ୍ରକୁ ମଧ୍ୟ ସାନ୍ତ୍ୱନା ଦେଇ ଏହିପରି କହିଲେ—
Verse 22
न मे प्रियं महाबाहो यत्ते बुद्धिरियं कृता । प्रतियोद्धुममित्रघ्न भ्रातैव त्वं ममानघ,'शत्रुसूदन! महाबाहु वीर! तुमने जो मुझसे युद्ध करनेका विचार किया, यह मुझे प्रिय नहीं लगा; क्योंकि अनघ। तुम तो मेरे भाई ही हो
ହେ ମହାବାହୁ! ତୁମେ ମୋ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ଯେ ନିଶ୍ଚୟ କରିଛ, ତାହା ମୋତେ ପ୍ରିୟ ନୁହେଁ। ହେ ଶତ୍ରୁଘ୍ନ, ହେ ଅନଘ! ତୁମେ ମୋ ପାଇଁ ଭାଇ ସମାନ।
Verse 23
गान्धारीं मातरं स्मृत्वा धृतराष्ट्रकृतेन च । तेन जीवसि राजंस्त्वं निहतास्त्वनुगास्तव,“राजन! मैंने माता गान्धारीको याद करके पिता धृतराष्ट्रके सम्बन्धसे युद्धमें तुम्हारी उपेक्षा की है; इसीलिये तुम अभीतक जीवित हो। केवल तुम्हारे अनुगामी सैनिक ही मारे गये हैं
ରାଜନ୍! ମାତା ଗାନ୍ଧାରୀଙ୍କୁ ସ୍ମରଣ କରି ଏବଂ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ କାରଣରୁ ଯୁଦ୍ଧରେ ମୁଁ ତୁମକୁ ଉପେକ୍ଷା କରିଥିଲି; ସେହିପାଇଁ ତୁମେ ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଜୀବିତ। ତୁମ ଅନୁଗାମୀମାନେ ମାତ୍ର ନିହତ ହୋଇଛନ୍ତି।
Verse 24
मैवं भू: शाम्यतां वैरं मा ते भूद् बुद्धिरीदृशी । गच्छेथथास्त्वं परां चैत्रीमश्वमेधे नूपस्य न:,“अब हमलोगोंमें ऐसा बर्ताव नहीं होना चाहिये। आपसका वैर शान्त हो जाय। अब तुम कभी इस प्रकार हमलोगोंके विरुद्ध युद्ध ठाननेका विचार न करना। “आगामी चैत्रमासकी पूर्णिमाको महाराज युधिष्ठिरका अश्वमेध यज्ञ होनेवाला है। उसमें तुम अवश्य आना”
ଏପରି କରନି। ବୈର ଶାନ୍ତ ହେଉ; ଆଗକୁ ଆଉ କେବେ ଆମ ବିରୋଧରେ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାର ଏମିତି ଭାବନା ତୁମ ମନରେ ନ ଉଠୁ। ଆସନ୍ତା ଚୈତ୍ର ପୂର୍ଣ୍ଣିମାରେ ମହାରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଅଶ୍ୱମେଧ ଯଜ୍ଞ ହେବ; ତୁମେ ନିଶ୍ଚୟ ଆସ।
Verse 46
परिवार्य हयं जग्मुस्ततश्लुक्रोध पाण्डव: । यद्यपि पार्थने सान्त्वनापूर्वक समझा-बुझाकर उन सबको युद्धसे रोका, तथापि वे अमर्षशील योद्धा उस घोड़ेको चारों ओरसे घेरकर उसे पकड़नेके लिये आगे बढ़े। यह देख पाण्जुपुत्र अर्जुनको बड़ा क्रोध हुआ
ତାପରେ ସେମାନେ କ୍ରୋଧରେ ଉତ୍ତେଜିତ ହୋଇ ଘୋଡ଼ାଟିକୁ ଚାରିଦିଗରୁ ଘେରି ଆଗେଇଲେ; ଏହା ଦେଖି ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ର ଅର୍ଜୁନ ଭୟଙ୍କର କ୍ରୋଧିତ ହେଲେ।
Verse 56
क्षुरैगाण्डीवनिर्मुक्ति्नातियत्नादिवार्जुन: । वे गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए तेज धारवाले धुरोंसे बिना परिश्रमके ही उनके मस्तक काटने लगे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଗାଣ୍ଡୀବରୁ ନିଷ୍କ୍ରାନ୍ତ କ୍ଷୁରଧାର ବାଣମାନେ ଦ୍ୱାରା ଅର୍ଜୁନ ପ୍ରାୟ ଅଳ୍ପ ପ୍ରୟାସରେ ଯୁଦ୍ଧରେ ସେମାନଙ୍କ ମସ୍ତକ କାଟି କାଟି ଭୂମିରେ ପତିତ କରିବାକୁ ଆରମ୍ଭ କଲେ।
Verse 63
न्यवर्तन्त महाराज शरवर्षार्जिता भृशम् | महाराज! अर्जुनकी मार खाकर उनके बाणोंकी वर्षसे पीड़ित हुए गान्धार सैनिक उस घोड़ेको छोड़कर बड़े वेगसे पीछे लौट गये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ମହାରାଜ! ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ପ୍ରହାରରେ ପୀଡିତ ଓ ଭୟଙ୍କର ବାଣବର୍ଷାରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ନିପୀଡିତ ଗାନ୍ଧାର ସୈନ୍ୟମାନେ ଯଜ୍ଞାଶ୍ୱକୁ ଛାଡ଼ି ମହାବେଗରେ ପଛକୁ ଫେରିଗଲେ।
Verse 76
आदिश्यादिश्य तेजस्वी शिरांस्येषां न्यपातयत् | गान्धारोंके द्वारा रोके जानेपर भी तेजस्वी वीर पाण्डुनन्दन अर्जुन उनके नाम ले-लेकर मस्तक काटने और गिराने लगे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତେଜସ୍ବୀ ଅର୍ଜୁନ ସେମାନଙ୍କୁ ଏକେକ କରି ଚିହ୍ନଟ କରି ମସ୍ତକ କାଟି ପତିତ କରୁଥିଲେ। ଗାନ୍ଧାରମାନେ ରୋକିଲେ ମଧ୍ୟ ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ ଅର୍ଜୁନ ନାମ ନେଇ ନେଇ ଶିରଛେଦ କରି ଭୂମିରେ ପକାଇ ଦେଉଥିଲେ।
Verse 83
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वनें यज्ञसग्बन्धी अश्चका अनुसरणविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ,स राजा शकुने: पुत्र: पाण्डवं प्रत्यवारयत् । जब चारों ओर युद्धमें गान्धारोंका संहार आरम्भ हो गया, तब राजा शकुनि-पुत्रने पाण्डुकुमार अर्जुनको रोका
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ଶକୁନିଙ୍କ ପୁତ୍ର ରାଜା ପାଣ୍ଡବଙ୍କୁ ରୋକିଲେ। ଯେତେବେଳେ ସମସ୍ତ ଦିଗରେ ଯୁଦ୍ଧରେ ଗାନ୍ଧାରମାନଙ୍କ ସଂହାର ଆରମ୍ଭ ହେଲା, ସେତେବେଳେ ଶକୁନିପୁତ୍ର ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ନିବାରଣ କଲେ।
Verse 84
इति श्रीमहा भारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे शकुनिपुत्रपराजये चतुरशीतितमो<ध्याय:
ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତେ ଆଶ୍ୱମେଧିକପର୍ବଣି ଅନୁଗୀତାପର୍ବଣି ଅଶ୍ୱାନୁସରଣେ ଶକୁନିପୁତ୍ରପରାଜୟେ ଚତୁରଶୀତିତମୋଽଧ୍ୟାୟଃ ସମାପ୍ତଃ।
Verse 213
अभ्ययु: सहिता: पार्थ प्रगृहीतशरासना: । उसकी सेनामें हाथी, घोड़े और रथ सभी सम्मिलित थे। वह सेना ध्वजा-पताकाओंकी मालासे मण्डित थी। गान्धारदेशके योद्धा राजा शकुनिके वधका समाचार सुनकर अमर्षमें भरे हुए थे; अतः हाथमें धनुष-बाण ले उन्होंने एक साथ होकर अर्जुनपर धावा बोल दिया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ପାର୍ଥ! ଧନୁଷ-ବାଣ ପ୍ରସ୍ତୁତ କରି ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଏକତ୍ର ହୋଇ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ଉପରେ ଧାଇଲେ। ସେମାନଙ୍କ ସେନା ହାତୀ, ଘୋଡ଼ା ଓ ରଥରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା ଏବଂ ଧ୍ୱଜ-ପତାକାର ମାଳାରେ ସୁଶୋଭିତ ଥିଲା। ଗାନ୍ଧାରଦେଶର ଯୋଦ୍ଧାମାନେ ରାଜା ଶକୁନିଙ୍କ ବଧସମ୍ବାଦ ଶୁଣି କ୍ରୋଧରେ ଜ୍ୱଳିଉଠିଲେ; ତେଣୁ ଅସ୍ତ୍ର ଧରି ଏକ ଘନ ଦଳ ହୋଇ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ଆକ୍ରମଣ କଲେ।
The episode balances ritual authority with political autonomy: when local powers challenge the horse, Arjuna must decide how to uphold the sacrifice’s legitimacy while limiting escalation, treating resistance as a test of sovereignty rather than an occasion for indiscriminate violence.
Legitimate rule is depicted as a synthesis of honor and restraint: acceptance of pūjā and tribute is paired with disciplined enforcement when the yajña is threatened, implying that stability after catastrophe requires both recognition rituals and accountable power.
No explicit phalaśruti is stated in the provided passage; the chapter’s meta-function is archival and cartographic—documenting how the Aśvamedha’s progress converts contested spaces into ritually acknowledged order within the epic’s post-war reconstruction.