
Ulūpī’s Disclosure and the Saṃjīvana-Maṇi: Arjuna’s Restoration (उलूपी-प्रकटनं संजीवनमणि-स्थापनं च)
Upa-parva: Babhruvāhana–Ulūpī Episode (Maṇipura Encounter) — Upa-parvan within Āśvamedhika-parva
Vaiśaṃpāyana reports that, with the Maṇipura ruler seated in extremis and overcome by paternal grief, Ulūpī reflects upon a revivifying jewel (saṃjīvana-maṇi) associated with nāga protection. Taking the jewel, she addresses the assembled forces with calming speech, instructing Babhruvāhana not to grieve and clarifying that Arjuna (Jişṇu/Dhanaṃjaya) is not truly “defeated” in an ultimate sense. She states that a māyā named Mohinī was deployed by her for a purposive aim connected to the father’s interests, and that the encounter functioned as a test of Babhruvāhana’s strength rather than a terminal act. Ulūpī further elevates Arjuna’s status by describing him as an enduring, great-souled figure whom even Indra could not overcome in battle, thereby reframing the event from culpable harm to orchestrated trial. She then directs that the divine jewel be placed upon Arjuna’s chest; Babhruvāhana complies out of filial attachment and without malicious intent. Upon placement, Arjuna revives as if waking from sleep; celestial signs (flowers, drums, acclaim) mark restoration. Arjuna embraces Babhruvāhana, then notices his grieving mother with Ulūpī and inquires into the cause and the women’s presence. The Maṇipura ruler responds deferentially, indicating that Ulūpī should be questioned for the explanation.
Chapter Arc: अर्जुन—अश्वमेध के घोड़े के अनुगमन में—मणिपुर के राजा बभ्रुवाहन से पराजित होकर भूमि पर पड़े हैं; तभी नागकन्या उलूपी प्रकट होकर इस पराजय का रहस्य खोलने का संकेत देती है। → अर्जुन उलूपी से पूछते हैं कि क्या वह बभ्रुवाहन का कुशल चाहती है और क्या अनजाने में उससे या बभ्रुवाहन से कोई अप्रिय कर्म हो गया। उलूपी बताती है कि यह पराजय साधारण नहीं—भीष्म-वध के बाद अर्जुन ने जिन दिव्य-तत्त्वों/वसुओं के प्रति शान्ति-प्रायश्चित्त नहीं किया, उसी दोष की छाया अब फलित हुई है; यदि शान्ति किए बिना अर्जुन जीवन त्यागते, तो धर्म-हानि और भी बढ़ती। → उलूपी स्पष्ट करती है कि अर्जुन का गिरना ‘वीरता की कमी’ नहीं, बल्कि ‘अधूरे प्रायश्चित्त’ का दण्ड-संकेत है—और उसी हेतु वह आई है कि अर्जुन का जीवन, यश और अश्वमेध-यज्ञ की मर्यादा बची रहे। → उलूपी के निर्देश से उपाय किया जाता है: बभ्रुवाहन को साथ लेकर (माताओं/परिजनों सहित) उचित शान्ति-प्रक्रिया और क्षमा-याचना का क्रम चलता है; अर्जुन चित्रांगदा और उलूपी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं, और बभ्रुवाहन अर्जुन की आज्ञा से अश्वमेध महायज्ञ में ब्राह्मण-सेवा/परिवेषण हेतु उपस्थित होने का वचन देता है। → अर्जुन के पुनर्जीवन/पुनर्स्थापन के बाद भी प्रश्न शेष रहता है—क्या यह शान्ति-क्रम उनके समस्त पूर्वकर्म-दोष को पूर्णतः काट देगा, और अश्वमेध की यात्रा आगे किन नई परीक्षाओं से गुज़रेगी?
Verse 1
अप्--#रू- एकाशीतितमो<ध्याय: उलूपीका अर्जुनके पूछनेपर अपने आगमनका कारण एवं अर्जुनकी पराजयका रहस्य बताना, पुत्र और पत्नीसे विदा लेकर पार्थका पुन: अश्व॒के पीछे जाना अर्जुन उवाच किमागमनकृत्यं ते कौरव्यकुलनन्दिनि । मणिपूरपतेर्मातुस्तथैव च रणाजिरे,अर्जुन बोले--कौरव्य नामके कुलको आनन्दित करनेवाली उलूपी! इस रणभूमिमें तुम्हारे और मणिपुरनरेश बश्रुवाहनकी माता चित्रांगदाके आनेका क्या कारण है?
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—ହେ ଉଲୂପୀ, କୁରୁବଂଶର ଆନନ୍ଦଦାୟିନୀ! ତୁମେ କେଉଁ କାର୍ଯ୍ୟରେ ଏଠାକୁ ଆସିଛ? ଏବଂ ମଣିପୁରରାଜଙ୍କ ମାତା ଚିତ୍ରାଙ୍ଗଦା ମଧ୍ୟ ଏହି ରଣଭୂମିକୁ କାହିଁକି ଆସିଛନ୍ତି?
Verse 2
कच्चित् कुशलकामासि राज्ञोड5स्य भुजगात्मजे । मम वा चपलापाड़ि कच्चित् त्वं शुभमिच्छसि,नागकुमारी! तुम इस राजा बश्रुवाहनका कुशल-मंगल तो चाहती हो न? चंचल कटाक्षवाली सुन्दरी! तुम मेरे कल्याणकी भी इच्छा रखती हो न?
ହେ ନାଗକନ୍ୟା, ଭୁଜଗବଂଶଜେ! ତୁମେ କି ଏହି ରାଜା ବଭ୍ରୁବାହନଙ୍କ କୁଶଳ-ମଙ୍ଗଳ ଚାହୁଁଛ? ଏବଂ ହେ ଚପଳ ଦୃଷ୍ଟିବତୀ ସୁନ୍ଦରୀ! ମୋର ମଙ୍ଗଳ ମଧ୍ୟ କି ତୁମେ ଇଚ୍ଛା କରୁଛ?
Verse 3
कच्चित् ते पृथुलश्रोणि नाप्रियं प्रियदर्शने । अकार्षमहमज्ञानादयं वा बभ्रुवाहन:,स्थूल नितम्बवाली प्रियदर्शने! मैंने या इस बभ्रुवाहनने अनजानमें तुम्हारा कोई अप्रिय तो नहीं किया है?
ହେ ପୃଥୁଳଶ୍ରୋଣୀ, ପ୍ରିୟଦର୍ଶନେ! ଅଜ୍ଞାନବଶତଃ ମୁଁ କିମ୍ବା ଏହି ବଭ୍ରୁବାହନ ତୁମ ପ୍ରତି କିଛି ଅପ୍ରିୟ କରିଦେଇଛୁ କି?
Verse 4
कच्चिन्नु राजपुत्री ते सपत्नी चैत्रवाहनी । चित्राजड्भदा वरारोहा नापराध्यति किंचन,तुम्हारी सौत चित्रवाहनकुमारी वरारोहा राजपुत्री चित्रांगदाने तो तुम्हारा कोई अपराध नहीं किया है?
ଆଉ କୁହ—ତୁମ ସପତ୍ନୀ, ଚିତ୍ରବାହନଙ୍କ କନ୍ୟା, ବରାରୋହା ରାଜକୁମାରୀ ଚିତ୍ରାଙ୍ଗଦା ତୁମ ପ୍ରତି କିଛି ଅପରାଧ କରିନାହାନ୍ତି ତ?
Verse 5
तमुवाचोरगपतेर्दुहिता प्रहसन्निव । न मे त्वमपराद्धोडसि न हि मे बश्रुवाहन:,अर्जुनका यह प्रश्न सुनकर नागराजकन्या उलूपी हँसती हुई-सी बोली--'प्राणवल्लभ! आपने या बश्रुवाहनने मेरा कोई अपराध नहीं किया है। बभ्रुवाहनकी माताने भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा है। यह तो सदा दासीकी भाँति मेरी आज्ञाके अधीन रहती है। यहाँ आकर मैंने जो-जो जिस प्रकार काम किया है, वह बतलाती हूँ; सुनिये
ଏହା ଶୁଣି ନାଗରାଜଙ୍କ କନ୍ୟା ଉଲୂପୀ ମୃଦୁ ହସି କହିଲେ—“ପ୍ରିୟ! ତୁମେ ମୋ ପ୍ରତି କୌଣସି ଅପରାଧ କରିନାହ; ବଭ୍ରୁବାହନ ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ—ସେ ମଧ୍ୟ ମୋର ଅପରାଧୀ ନୁହେଁ।”
Verse 6
न जनित्री तथास्येयं मम या प्रेष्यवत् स्थिता । श्रूयतां यद् यथा चेदं मया सर्व विचेष्टितम्,अर्जुनका यह प्रश्न सुनकर नागराजकन्या उलूपी हँसती हुई-सी बोली--'प्राणवल्लभ! आपने या बश्रुवाहनने मेरा कोई अपराध नहीं किया है। बभ्रुवाहनकी माताने भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा है। यह तो सदा दासीकी भाँति मेरी आज्ञाके अधीन रहती है। यहाँ आकर मैंने जो-जो जिस प्रकार काम किया है, वह बतलाती हूँ; सुनिये
ଏହି ନାରୀ—ଯେ ମୋର ଜନନୀ—ସେ ତେଣୁ ନୁହେଁ; ଦାସୀ ପରି ମୋର ଆଜ୍ଞାଧୀନ ରହେ। ତେଣୁ ଶୁଣ, ମୁଁ ଏଠାରେ ଯାହା-ଯାହା ଏବଂ ଯେମିତି-ଯେମିତି କରିଛି, ସବୁ କହୁଛି।
Verse 7
न मे कोपस्त्वया कार्य: शिरसा त्वां प्रसादये । त्वत्प्रियार्थ हि कौरव्य कृतमेतन््मया विभो,'प्रभो! कुरुनन्दन! पहले तो मैं आपके चरणोंमें सिर रखकर आपको प्रसन्न करना चाहती हूँ। यदि मुझसे कोई दोष बन गया हो तो भी उसके लिये आप मुझपर क्रोध न करें; क्योंकि मैंने जो कुछ किया है, वह आपकी प्रसन्नताके लिये ही किया है
ମୋ ପ୍ରତି କ୍ରୋଧ କରନ୍ତୁ ନାହିଁ; ମୋ ଉପରେ ରୋଷ ନିବେଶ କରନ୍ତୁ ନାହିଁ। ମୁଁ ଶିର ନମାଇ ଆପଣଙ୍କୁ ପ୍ରସନ୍ନ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛି। ହେ କୌରବ୍ୟ, ହେ ବିଭୋ! ମୁଁ ଯାହା କରିଛି, ସେ ସବୁ ଆପଣଙ୍କ ପ୍ରୀତି ପାଇଁ ମାତ୍ର।
Verse 8
यत्तच्छूणु महाबाहो निखिलेन धनंजय । महाभारतयुद्धे यत् त्वया शान्तनवो नृप:
ହେ ମହାବାହୁ ଧନଞ୍ଜୟ, ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ଶୁଣ—ମହାଭାରତ ଯୁଦ୍ଧରେ ଶାନ୍ତନବ ନୃପ ତୋ ଦ୍ୱାରା ଯାହା କରାଇଥିଲେ ସେ କଥା।
Verse 9
न हि भीष्मस्त्वया वीर युद्धामानो हि पातित:
ହେ ବୀର, ଯୁଦ୍ଧ କରୁଥିବା ଭୀଷ୍ମ ତୋ ଦ୍ୱାରା ପତିତ ହୋଇନଥିଲେ; ରଣଭୂମିରେ ତାଙ୍କ ପତନ ତୋର ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ପରାକ୍ରମରୁ ହୋଇନଥିଲା।
Verse 10
तस्य शान्तिमकृत्वा त्वं त्यजेथा यदि जीवितम्
ତାଙ୍କର ଶାନ୍ତି ସ୍ଥାପନ ନକରି ଯଦି ତୁମେ ପ୍ରାଣ ତ୍ୟାଗ କରିଥାନ୍ତ, ତେବେ ସେ ଅଧର୍ମ ହେଉଥାନ୍ତା; ଅନ୍ୟର ଅଶାନ୍ତିକୁ ଅନିରାକୃତ ରଖି ଜୀବନ ଛାଡ଼ିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।
Verse 11
एषा तु विहिता शान्ति: पुत्राद् यां प्राप्ततानसि । वसुभिर्वसुधापाल गड़या च महामते,“महामते! पृथ्वीपाल! पूर्वकालमें वसुओं तथा गंगाजीने इसी रूपमें उस पापकी शान्ति निश्चित की थी; जिसे आपने अपने पुत्रसे पराजयके रूपमें प्राप्त किया है
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—“ମହାମତେ, ପୃଥିବୀପାଳ! ଏହି ହେଉଛି ସେଇ ପ୍ରାୟଶ୍ଚିତ୍ତ-ଶାନ୍ତି, ଯାହା ପୂର୍ବକାଳରେ ବସୁମାନେ ଓ ଭାଗୀରଥୀ ଗଙ୍ଗା ନିର୍ଦ୍ଧାରଣ କରିଥିଲେ। ସେଇ ‘ପାପ-ଶାନ୍ତି’ ତୁମେ ଏବେ ନିଜ ପୁତ୍ର ଦ୍ୱାରା—ପରାଜୟର ରୂପେ—ପାଇଛ।”
Verse 12
पुरा हि श्रुतमेतत् ते वसुभि: कथितं मया । गज्जायास्तीरमाश्रित्य हते शान्तनवे नूप,“पहलेकी बात है, एक दिन मैं गंगाजीके तटपर गयी थी। नरेश्वर! वहाँ शान्तनुनन्दन भीष्मजीके मारे जानेके बाद वसुओंने गंगातटपर आकर आपके सम्बन्धमें जो यह बात कही थी, उसे मैंने अपने कानों सुना था
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—“ନରେଶ୍ୱର! ଏହି କଥା ମୁଁ ପୂର୍ବରୁ ଶୁଣିଥିଲି—ବସୁମାନଙ୍କ ମୁଖରୁ—ଏବଂ ସେଇ କଥା ମୁଁ ତୁମକୁ କହିଥିଲି। ଶାନ୍ତନୁନନ୍ଦନ ଭୀଷ୍ମ ନିହତ ହେବା ପରେ ସେମାନେ ଗଙ୍ଗାତଟକୁ ଆସି ତୁମ ବିଷୟରେ ଯାହା କହିଥିଲେ, ମୁଁ ତାହା ନିଜ କାନରେ ଶୁଣିଥିଲି।”
Verse 13
आप्लुत्य देवा वसव: समेत्य च महानदीम् । इदमूचुर्वचो घोरं भागीरथ्या मते तदा,“वसु नामक देवता महानदी गंगाके तटपर एकत्र हो स्नान करके भागीरथीकी सम्मतिसे यह भयानक वचन बोले--
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—“ସେତେବେଳେ ଦେବସ୍ୱରୂପ ବସୁମାନେ ମହାନଦୀର ତଟରେ ସ୍ନାନ କରି ଏକତ୍ର ହେଲେ ଏବଂ ଭାଗୀରଥୀଙ୍କ ସମ୍ମତିରେ ଏହି ଭୟଙ୍କର ବଚନ କହିଲେ।”
Verse 14
एष शान्तनवो भीष्मो निहत: सव्यसाचिना । अयुध्यमान: संग्रामे संसक्तो5न्येन भाविनि । तदनेनानुषड्गेण वयमद्य धनंजयम्
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—“ଏହି ଶାନ୍ତନୁନନ୍ଦନ ଭୀଷ୍ମ ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ହାତରେ ନିହତ ହେଲେ। ସେ ଯୁଦ୍ଧ କରୁନଥିଲେ; କିନ୍ତୁ ଅନ୍ୟଜନଙ୍କ ଭାଗ୍ୟ-ପ୍ରବାହରେ ସଙ୍ଗ୍ରାମରେ ଜଡିଗଲେ। ତେଣୁ ଏହି ଅନୁଷଙ୍ଗ-ପରିଣାମରେ ଆଜି ଆମେ ମଧ୍ୟ ଧନଞ୍ଜୟଙ୍କ କର୍ମଭାର ବହନ କରୁଛୁ।”
Verse 15
शापेन योजयामेति तथास्त्विति च साब्रवीत् । “भाविनि! ये शान्तनुनन्दन भीष्म संग्राममें दूसरेके साथ उलझे हुए थे। अर्जुनके साथ युद्ध नहीं कर रहे थे तो भी सव्यसाची अर्जुनने इनका वध किया है। इस अपराधके कारण हमलोग आज अर्जुनको शाप देना चाहते हैं।” यह सुनकर गंगाजीने कहा--'हाँ, ऐसा ही होना चाहिये' ।। तदहं पितुरावेद्य प्रविश्य व्यथितेन्द्रिया
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—“ସେମାନେ କହିଲେ—‘ଶାପରେ ତାକୁ ବାନ୍ଧିଦେବା’; ଗଙ୍ଗା କହିଲେ—‘ତଥାସ୍ତୁ’। ତା’ପରେ ମୁଁ ପିତାଙ୍କୁ ନିବେଦନ କରି, ବ୍ୟଥିତ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ସହିତ ଭିତରକୁ ପ୍ରବେଶ କଲି।”
Verse 16
पिता तु मे वसून् गत्वा त्वदर्थे समयाचत
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—ମୋ ପିତା ବସୁମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଇ, ପୂର୍ବ ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ପ୍ରତିଜ୍ଞାଅନୁସାରେ, ତୁମ ପକ୍ଷରେ ସେମାନଙ୍କୁ ପ୍ରାର୍ଥନା କରିଥିଲେ।
Verse 17
पुत्रस्तस्य महाभाग मणिपूरेश्वरो युवा,“महाभाग नागराज! मणिपुरका नवयुवक राजा बश्रुवाहन अर्जुनका पुत्र है। वह युद्ध- भूमिमें खड़ा होकर अपने बाणोंद्वारा जब उन्हें पृथ्वीपर गिरा देगा, तब अर्जुन हमारे शापसे मुक्त हो जायूँगे
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—ହେ ମହାଭାଗ! ତାଙ୍କ ପୁତ୍ର ମଣିପୁରର ଯୁବ ଅଧିପତି। ହେ ମହାଭାଗ ନାଗରାଜ! ମଣିପୁରର ନବଯୁବ ରାଜା ବଭ୍ରୁବାହନ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ପୁତ୍ର। ସେ ରଣଭୂମିରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହୋଇ ନିଜ ବାଣଦ୍ୱାରା ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ପୃଥିବୀରେ ପତିତ କରିଦେଲେ, ତେବେ ଅର୍ଜୁନ ଆମ ଶାପରୁ ମୁକ୍ତ ହେବେ।
Verse 18
स एन॑ रणमध्यस्थ: शरै: पातयिता भुवि | एवं कृते स नागेन्द्र मुक्तशापो भविष्यति,“महाभाग नागराज! मणिपुरका नवयुवक राजा बश्रुवाहन अर्जुनका पुत्र है। वह युद्ध- भूमिमें खड़ा होकर अपने बाणोंद्वारा जब उन्हें पृथ्वीपर गिरा देगा, तब अर्जुन हमारे शापसे मुक्त हो जायूँगे
ସେ ରଣଭୂମିର ମଧ୍ୟରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହୋଇ ନିଜ ବାଣଦ୍ୱାରା ତାଙ୍କୁ ପୃଥିବୀରେ ପତିତ କରିବ; ଏପରି ହେଲେ, ହେ ନାଗେନ୍ଦ୍ର, ସେ ଶାପମୁକ୍ତ ହେବ।
Verse 19
गच्छेति वसुभ्रि श्चोक्तो मम चेदं शशंस सः । तच्छुत्वा त्वं मया तस्माच्छापादसि विमोक्षितः,“अच्छा अब जाओ' वसुओंके ऐसा कहनेपर मेरे पिताने आकर मुझसे यह बात बतायी। इसे सुनकर मैंने इसीके अनुसार चेष्टा की है और आपको उस शापसे छुटकारा दिलाया है
ବସୁମାନେ ‘ଯାଅ’ ବୋଲି କହିବା ପରେ ମୋ ପିତା ଆସି ଏହି କଥା ମୋତେ ଜଣାଇଲେ। ତାହା ଶୁଣି ମୁଁ ସେହିପରି କରି ଆପଣଙ୍କୁ ସେଇ ଶାପରୁ ମୁକ୍ତ କରିଦେଲି।
Verse 20
न हि त्वां देवराजो5पि समरेषु पराजयेत् । आत्मा पुत्र: स्मृतस्तस्मात् तेनेहासि पराजित:,'प्राणनाथ! देवराज इन्द्र भी आपको युद्धमें परास्त नहीं कर सकते, पुत्र तो अपना आत्मा ही है, इसीलिये इसके हाथसे यहाँ आपकी पराजय हुई है
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—ପ୍ରାଣନାଥ! ସମରରେ ଦେବରାଜ ଇନ୍ଦ୍ର ମଧ୍ୟ ଆପଣଙ୍କୁ ପରାଜିତ କରିପାରିବେ ନାହିଁ। ପୁତ୍ରକୁ ନିଜ ଆତ୍ମା ସ୍ୱରୂପ ମନାଯାଏ; ତେଣୁ ଏଠାରେ ପୁତ୍ରରୂପେ ଆପଣଙ୍କ ନିଜ ଆତ୍ମାର ହାତରେ ଆପଣ ପରାଜିତ ହୋଇଛନ୍ତି।
Verse 21
न हि दोषो मम मत: कथं वा मन्यसे विभो । इत्येवमुक्तो विजय: प्रसन्नात्माब्रवीदिदम्,'प्रभो! मैं समझती हूँ कि इसमें मेरा कोई दोष नहीं है। अथवा आपकी क्या धारणा है? क्या यह युद्ध कराकर मैंने कोई अपराध किया है?' उलूपीके ऐसा कहनेपर अर्जुनका चित्त प्रसन्न हो गया। उन्होंने कहा--
“ପ୍ରଭୋ! ମୋ ମତରେ ମୋର କୌଣସି ଦୋଷ ନାହିଁ। କିମ୍ବା, ହେ ବିଭୋ, ଆପଣ କ’ଣ ଭାବୁଛନ୍ତି?” ଏଭଳି କୁହାଯାଉଥିବାବେଳେ ବିଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ପ୍ରସନ୍ନଚିତ୍ତ ହୋଇ ଏହି କଥା କହିଲେ।
Verse 22
सर्व मे सुप्रियं देवि यदेतत् कृतवत्यसि । इत्युक्त्वा सोडब्रवीत् पुत्र मणिपूरपतिं जय:
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ— “ଦେବୀ! ଏହି ବିଷୟରେ ତୁମେ ଯାହା କରିଛ, ସେ ସବୁ ମୋ ପାଇଁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରିୟ।” ଏଭଳି କହି ବିଜୟୀ ଅର୍ଜୁନ ତାଙ୍କ ପୁତ୍ର— ମଣିପୁରର ରାଜାଙ୍କୁ— ସମ୍ବୋଧନ କଲେ।
Verse 23
युधिष्ठिरस्याश्वमेध: परिचैत्रीं भविष्यति
“ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଅଶ୍ୱମେଧ ଯଜ୍ଞ ଚୈତ୍ର ମାସରେ ହେବ।”
Verse 24
तत्रागच्छे: सहामात्यो मातृभ्यां सहितो नूप
“ହେ ନୃପ! ସେତେବେଳେ ତୁମେ ତୁମ ଅମାତ୍ୟମାନଙ୍କ ସହ ଏବଂ ତୁମ ଦୁଇ ମାତାଙ୍କ ସହିତ ସେଠାକୁ ଆସ।”
Verse 25
“नरेश्वर! आगामी चैत्रमासकी पूर्णिमाको महाराज युधिष्ठिरके यज्ञका आरम्भ होगा। उसमें तुम अपनी इन दोनों माताओं और मन्त्रियोंके साथ अवश्य आना' ।। इत्येवमुक्त: पार्थेन स राजा बभ्रुवाहन: । उवाच पितरं धीमानिदमस्राविलेक्षण:,अर्जुनके ऐसा कहनेपर बुद्धिमान् राजा बश्रुवाहनने नेत्रोंमें आँसू भरकर पितासे इस प्रकार कहा--
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ— “ନରେଶ୍ୱର! ଆସନ୍ତା ଚୈତ୍ରମାସର ପୂର୍ଣ୍ଣିମା ଦିନ ମହାରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଯଜ୍ଞ ଆରମ୍ଭ ହେବ। ସେଠାକୁ ତୁମେ ତୁମ ଏହି ଦୁଇ ମାତା ଓ ଅମାତ୍ୟମାନଙ୍କ ସହ ନିଶ୍ଚୟ ଆସିବା ଉଚିତ।” ପାର୍ଥ ଏଭଳି କହିବା ପରେ ବୁଦ୍ଧିମାନ ରାଜା ବଭ୍ରୁବାହନ ଅଶ୍ରୁପୂର୍ଣ୍ଣ ନୟନରେ ପିତାଙ୍କୁ ଏହିପରି କହିଲେ।
Verse 26
उपयास्यामि धर्मज्ञ भवत: शासनादहम् । अश्वमेधे महायज्ञे द्विजातिपरिवेषक:,'धर्मज्ञ! आपकी आज्ञासे मैं अश्वमेध महायज्ञमें अवश्य उपस्थित होऊँगा और ब्राह्मगोंको भोजन परोसनेका काम करूँगा
ଧର୍ମଜ୍ଞ! ଆପଣଙ୍କ ଆଜ୍ଞାନୁସାରେ ମୁଁ ନିଶ୍ଚୟ ଅଶ୍ୱମେଧ ମହାଯଜ୍ଞରେ ଉପସ୍ଥିତ ହେବି ଏବଂ ସେଠାରେ ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କୁ ଭୋଜନ ପରିବେଷଣ କରିବି।
Verse 27
मम त्वनुग्रहार्थाय प्रविशस्व पुरं स्वकम् । भार्याभ्यां सह धर्मज्ञ मा भूत् ते5त्र विचारणा,“इस समय आपसे एक प्रार्थना है--धर्मज्ञ! आज मुझपर कृपा करनेके लिये अपनी इन दोनों धर्मपत्नियोंके साथ इस नगरमें प्रवेश कीजिये। इस विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये
ଧର୍ମଜ୍ଞ! ମୋପରେ ଅନୁଗ୍ରହ କରିବା ପାଇଁ ନିଜ ନଗରରେ ପ୍ରବେଶ କରନ୍ତୁ। ଆପଣଙ୍କ ଦୁଇ ଭାର୍ଯ୍ୟା ସହିତ ଆସନ୍ତୁ; ଏଥିରେ କୌଣସି ସନ୍ଦେହ କିମ୍ବା ଅନ୍ୟ ଭାବନା ରଖିବେ ନାହିଁ।
Verse 28
उषित्वेह निशामेकां सुखं स्वभवने प्रभो । पुनरश्चानुगमनं कर्तासि जयतां वर,'प्रभो! विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ! यहाँ भी आपका ही घर है। अपने उस घरमें एक रात सुखपूर्वक निवास करके कल सबेरे फिर घोड़ेके पीछे-पीछे जाइयेगा'
ପ୍ରଭୋ! ବିଜୟୀ ବୀରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏହା ମଧ୍ୟ ଆପଣଙ୍କ ନିଜ ଘର। ନିଜ ଭବନରେ ଏଠାରେ ଗୋଟିଏ ରାତି ସୁଖରେ ରହି, ପ୍ରଭାତେ ପୁଣି ଯଜ୍ଞାଶ୍ୱର ପଛେ ପଛେ ଯାଆନ୍ତୁ।
Verse 29
इत्युक्त: स तु पुत्रेण तदा वानरकेतन: । स्मयन् प्रोवाच कौन्तेयस्तदा चित्राड्रदासुतम्,पुत्रके ऐसा कहनेपर कुन्तीनन्दन कपिध्वज अर्जुनने मुसकराते हुए चित्राड्रदाकुमारसे कहा--
ପୁତ୍ର ଏପରି କହିବା ପରେ ବାନରକେତନ କୁନ୍ତୀନନ୍ଦନ ଅର୍ଜୁନ ହସି, ସେତେବେଳେ ଚିତ୍ରାଡ୍ରଦାପୁତ୍ରଙ୍କୁ କହିଲେ।
Verse 30
विदितं ते महाबाहो यथा दीक्षां चराम्यहम् । न स तावत् प्रवेक्ष्यामि पुरं ते पूुधुलोचन,“महाबाहो! यह तो तुम जानते ही हो कि मैं दीक्षा ग्रहण करके विशेष नियमोंके पालनपूर्वक विचर रहा हूँ। अतः विशाललोचन! जबतक यह दीक्षा पूर्ण नहीं हो जाती तबतक मैं तुम्हारे नगरमें प्रवेश नहीं करूँगा
ମହାବାହୋ! ମୁଁ ଦୀକ୍ଷା ଗ୍ରହଣ କରି ତାହାର ନିୟମ ଅନୁସାରେ ଚରଣ କରୁଛି—ଏହା ତୁମେ ଜାଣ। ତେଣୁ, ପୃଥୁଲୋଚନ! ଯେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଏହି ଦୀକ୍ଷା ପୂର୍ଣ୍ଣ ହେଉନାହିଁ, ସେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ମୁଁ ତୁମ ନଗରରେ ପ୍ରବେଶ କରିବି ନାହିଁ।
Verse 31
यथाकामं व्रजत्येष यज्ञियाश्वो नरर्षभ । स्वस्ति ते5स्तु गमिष्यामि न स्थान विद्यते मम,“नरश्रेष्ठ! यह यज्ञका घोड़ा अपनी इच्छाके अनुसार चलता है (इसे कहीं भी रोकनेका नियम नहीं है); अतः तुम्हारा कल्याण हो। मैं अब जाऊँगा। इस समय मेरे ठहरनेके लिये कोई स्थान नहीं है”
ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏହି ଯଜ୍ଞୀୟ ଅଶ୍ୱ ନିଜ ଇଚ୍ଛାମତେ ଚାଲେ; ଏହାକୁ ରୋକିବାର ନିୟମ ନାହିଁ। ତୁମର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। ମୁଁ ଏବେ ଯାଉଛି; ଏ ସମୟରେ ମୋ ପାଇଁ ରହିବାକୁ କୌଣସି ସ୍ଥାନ ନାହିଁ।
Verse 32
स तत्र विधिवत् तेन पूजित: पाकशासनि: । भायभ्यामभ्यनुज्ञात: प्रायाद् भरतसत्तम:,तदनन्तर वहाँ बभ्रुवाहनने भरतवंशके श्रेष्ठ पुरुष इन्द्रकुमार अर्जुनकी विधिवत् पूजा की और वे अपनी दोनों भार्याओंकी अनुमति लेकर वहाँसे चल दिये
ସେଠାରେ ବଭ୍ରୁବାହନ ପାକଶାସନ (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କ ପୁତ୍ର, ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ବିଧିମତେ ପୂଜା କଲେ। ପରେ ନିଜ ଦୁଇ ଭାର୍ଯ୍ୟାଙ୍କ ଅନୁମତି ପାଇ ଅର୍ଜୁନ ସେଠାରୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 81
इति श्रीमहा भारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे एकाशीतितमो<ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଆଶ୍ୱମେଧିକ ପର୍ବର ଅନୁଗୀତା ପର୍ବରେ ଅଶ୍ୱାନୁସରଣ-ବିଷୟକ ଏକାଶୀତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 83
अधर्मेण हतः पार्थ तस्यैषा निष्कृति: कृता । “महाबाहु धनंजय! आप मेरी कही हुई सारी बातें ध्यान देकर सुनिये। पार्थ! महाभारत- युद्धमें आपने जो शान्तनुकुमार महाराज भीष्मको अधर्मपूर्वक मारा है, उस पापका यह प्रायश्चित्त कर दिया गया
ପାର୍ଥ! ସେ ଅଧର୍ମରେ ହତ ହୋଇଥିଲେ; ତେଣୁ ସେହି କର୍ମର ଏହି ପ୍ରାୟଶ୍ଚିତ୍ତ କରାଗଲା।
Verse 96
शिखण्डिना तु संयुक्तस्तमाश्रित्य हतस्त्वया । “वीर! आपने अपने साथ जूझते हुए भीष्मजीको नहीं मारा है, वे शिखण्डीके साथ उलझे हुए थे। उस दशामें शिखण्डीकी आड़ लेकर आपने उनका वध किया था
ବୀର! ଭୀଷ୍ମ ଶିଖଣ୍ଡୀ ସହ ଯୁଦ୍ଧରେ ଲଗ୍ନ ଥିବାବେଳେ, ଶିଖଣ୍ଡୀକୁ ଆଡ଼ କରି ତୁମେ ତାଙ୍କୁ ହତ କରିଥିଲ। ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ସମରରେ ତୁମେ ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ମାରିନଥିଲ।
Verse 103
कर्मणा तेन पापेन पतेथा निरये ध्रुवम् । “उसकी शान्ति किये बिना ही यदि आप प्राणोंका परित्याग करते तो उस पापकर्मके प्रभावसे निश्चय ही नरकमें पड़ते
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ— ସେହି ପାପକର୍ମର ପ୍ରଭାବରେ ତୁମେ ନିଶ୍ଚୟ ନରକରେ ପତିତ ହେଇଥାନ୍ତ। ପ୍ରଥମେ ଶାନ୍ତି ସ୍ଥାପନ କରି ଦୋଷର ପ୍ରତିକାର ନ କରି ଯଦି ପ୍ରାଣତ୍ୟାଗ କରିଥାନ୍ତ, ତେବେ ସେହି କର୍ମଫଳ ତୁମକୁ ଘୋର ଗତିକୁ ଟାଣିନେଇଥାନ୍ତ।
Verse 166
पुन: पुन: प्रसाद्यैतांस्त एनमिदमन्रुवन् । “वे तत्काल वसुओंके पास जाकर उन्हें बारंबार प्रसन्न करके आपके लिये उनसे बारंबार क्षमा-याचना करने लगे। तब वसुगण उनसे इस प्रकार बोले--
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ— ସେମାନେ ପୁନଃପୁନଃ ବସୁମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଇ ସେମାନଙ୍କୁ ପ୍ରସନ୍ନ କରି, ଆପଣଙ୍କ ପାଇଁ ବାରମ୍ବାର କ୍ଷମା ଯାଚନା କରୁଥିଲେ। ତାପରେ ସେମାନେ ତାଙ୍କୁ ଏହି କଥା କହିଲେ। ତଦନନ୍ତରେ ବସୁଗଣ ସେମାନଙ୍କୁ ଏପରି କହିଲେ।
Verse 226
चित्राड़दाया: शृण्वत्या: कौरव्यदुहितुस्तदा । “देवि! तुमने जो यह कार्य किया है, यह सब मुझे अत्यन्त प्रिय है।” यों कहकर अर्जुनने चित्रांगदा तथा उलूपीके सुनते हुए अपने पुत्र मणिपुरनरेश बश्रुवाहनसे कहा--
କୌରବୀ କନ୍ୟା ଚିତ୍ରାଙ୍ଗଦା ଶୁଣୁଥିବାବେଳେ ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ— “ଦେବି! ତୁମେ କରିଥିବା ଏହି କାର୍ଯ୍ୟ ମୋତେ ସର୍ବଥା ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରିୟ।” ଏପରି କହି—ଚିତ୍ରାଙ୍ଗଦା ଓ ଉଲୂପୀ ଶୁଣୁଥିବା ସମୟରେ—ଅର୍ଜୁନ ମଣିପୁରର ରାଜା ନିଜ ପୁତ୍ର ବଭ୍ରୁବାହନଙ୍କୁ ସମ୍ବୋଧନ କଲେ।
Verse 1563
अभवं स च तच्छुत्वा विषादमगमत् परम् । ः | : है डर “उनकी बातें सुनकर मेरी सारी इन्द्रियाँ व्यथित हो उठीं और पातालमें प्रवेश करके मैंने अपने पितासे यह सारा समाचार कह सुनाया। यह सुनकर पिताजीको भी बड़ा खेद हुआ
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ— ସେହି କଥା ଶୁଣି ମୋର ସମସ୍ତ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ବ୍ୟଥିତ ହେଲା, ଏବଂ ମୁଁ ପରମ ବିଷାଦରେ ଡୁବିଗଲି। ପରେ ପାତାଳରେ ପ୍ରବେଶ କରି ମୋ ପିତାଙ୍କୁ ସମଗ୍ର ବୃତ୍ତାନ୍ତ ଜଣାଇଲି। ତାହା ଶୁଣି ମୋ ପିତା ମଧ୍ୟ ଗଭୀର ଶୋକରେ ଆବୃତ ହେଲେ।
The tension lies between accountability for harm in a strategic engagement and the later revelation that the act was an orchestrated test; the chapter resolves it by emphasizing intent, disclosure, and reparative action.
Restorative dharma is prioritized: when a conflict is framed as instrumental or misperceived, moral order is re-established through truth-telling, compassion, and concrete remediation rather than prolonged blame.
No explicit phalaśruti appears in this passage; its meta-function is narrative-ethical, demonstrating how reconciliation and repair integrate diverse lineages (Kuru, Maṇipura, nāga) within the post-war moral landscape.