Adhyaya 76
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 7628 Versesअर्जुन के पक्ष में निर्णायक—प्रतिरोधी राजा परास्त होकर अधीनता स्वीकार करता है।

Adhyaya 76

Arjuna Confronted by Saindhava Forces during the Aśvamedha Circuit (श्वेतवाहनस्य सैन्धवसंघर्षः)

Upa-parva: Aśvānugamana (Ritual Horse-Guarding) Episode

Vaiśaṃpāyana reports that, after the horse enters a Saindhava-controlled region, resentful rulers—identified as remnants and sons of the slain—advance to oppose the Pāṇḍava protector. They surround Arjuna, who is on foot near the consecrated horse, and proclaim their names, lineages, and prior deeds while releasing dense volleys of arrows. The barrage is depicted with cosmic-omen imagery: dust-darkened light, turbulent winds, eclipsing motifs, meteoric signs, trembling mountains, and unnatural rains, emphasizing the perceived gravity of the moment. Under the weight of the arrow-net, Arjuna briefly loses composure; the Gāṇḍīva and his hand-protection slip, and the attackers intensify their fire, assuming advantage. Observing this, celestial seers and sages express alarm, then invoke auspicious victory as Arjuna’s radiance is rekindled. Regaining steadiness, he draws the divine bow with repeated, machine-like resonance and answers with an expansive counter-volley likened to Indra’s rain. The Saindhava host becomes obscured by arrows; fear and disorder spread, and Arjuna, moving in all directions, disperses them with rotating, wheel-like formations of shafts, finally shining through the broken mass like the autumn sun after splitting cloud-banks.

Chapter Arc: तीन रात्रियों तक घोर संग्राम के बाद चौथे दिन प्राग्ज्योतिष का राजा वज्रदत्त रणभूमि में अट्टहास करता हुआ अर्जुन को ललकारता है—“आज तुम्हें जीवित न छोड़ूँगा।” → वज्रदत्त अपने पिता भगदत्त की परंपरा और नाग-बल का गर्व लेकर बार-बार प्रचंड आक्रमण करता है; अर्जुन उसके वेग को रोकता है, पर राजा क्रोध में नागेन्द्र और पर्वत-तुल्य बल वाले गज-प्रहारों को आगे बढ़ाता है। → अर्जुन के तीक्ष्ण नाराच हाथी/नाग-वाहन के मर्मस्थलों को भेद देते हैं; वह वज्राघात-सा घायल होकर सहसा धराशायी हो जाता है और वज्रदत्त का गर्वपूर्ण आक्रमण टूट जाता है। → अर्जुन विजय के बाद भी युधिष्ठिर की आज्ञा स्मरण कर वज्रदत्त का वध नहीं करता—राजाओं को न मारने, उन्हें यज्ञ-अश्वमेध के हेतु समझाकर साथ लेने का उपदेश देता है; पराजित वज्रदत्त ‘तथास्तु’ कहकर स्वीकार करता है। → अश्वमेध-अश्व की आगे की यात्रा में अगले राजाओं/प्रदेशों से होने वाले नए प्रतिरोध का संकेत।

Shlokas

Verse 1

अपन क्रात बछ। 2 षट्सप्ततितमो<ध्याय: अर्जुनके द्वारा वज्दत्तकी पराजय वैशम्पायन उवाच एवं त्रिरात्रमभवत्‌ तद्‌ युद्धे भरतर्षभ । अर्जुनस्य नरेन्द्रेण वृत्रेणेव शतक्रतो:,वैशम्पायनजी कहते हैं--भरतश्रेष्ठ! जैसे इन्द्रका वृत्रासुरके साथ युद्ध हुआ था, उसी प्रकार अर्जुनका राजा वझदत्तके साथ तीन दिन तीन रात युद्ध होता रहा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ସେଇ ଯୁଦ୍ଧ ତିନି ରାତି ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଚାଲିଲା। ଯେପରି ଶତକ୍ରତୁ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କର ବୃତ୍ର ସହ ଯୁଦ୍ଧ ହୋଇଥିଲା, ସେପରି ଅର୍ଜୁନଙ୍କର ରାଜା ବଜ୍ରଦତ୍ତ ସହ ଯୁଦ୍ଧ ହେଲା।

Verse 2

ततश्षतुर्थे दिवसे वज़दत्तो महाबल: । जहास सस्वनं हासं वाक्‍्य॑ चेदमथाब्रवीत्‌,तदनन्तर चौथे दिन महाबली वज्रदत्त ठहाका मारकर हँसने लगा और इस प्रकार बोला --[

ତାପରେ ଚତୁର୍ଥ ଦିନ ମହାବଳୀ ବଜ୍ରଦତ୍ତ ଗଞ୍ଜନାମୟ ଉଚ୍ଚ ହାସ୍ୟ କରି, ପରେ ଏହି କଥା କହିଲା।

Verse 3

अर्जुनार्जुन तिष्ठस्व न मे जीवन विमोक्ष्यसे । त्वां निहत्य करिष्यामि पितुस्तोयं यथाविधि,“अर्जुन! अर्जुन! खड़े रहो। आज मैं तुम्हें जीवित नहीं छोड़ूँगा। तुम्हें मारकर पिताका विधिपूर्वक तर्पण करूँगा

“ଅର୍ଜୁନ! ଅର୍ଜୁନ! ଠିଆ ରୁହ—ମୋ ହାତରୁ ତୁମେ ପ୍ରାଣ ସହିତ ମୁକ୍ତି ପାଇବ ନାହିଁ। ତୁମକୁ ବଧ କରି ମୁଁ ବିଧିମତେ ମୋ ପିତାଙ୍କୁ ତର୍ପଣଜଳ ଦେବି।”

Verse 4

त्वया वृद्धो मम पिता भगदत्त: पितु: सखा । हतो वृद्धो मम पिता शिशुं मामद्य योधय,“मेरे वृद्ध पिता भगदत्त तुम्हारे बापके मित्र थे, तो भी तुमने उनकी हत्या की। मेरे पिता बूढ़े थे, इसलिये तुम्हारे हाथसे मारे गये। आज उनका बालक मैं तुम्हारे सामने उपस्थित हूँ; मेरे साथ युद्ध करो'

“ମୋ ବୃଦ୍ଧ ପିତା ଭଗଦତ୍ତ ତୁମ ପିତାଙ୍କର ସଖା ଥିଲେ; ତଥାପି ତୁମେ ମୋ ବୃଦ୍ଧ ପିତାଙ୍କୁ ବଧ କଲ। ବୃଦ୍ଧ ଥିବାରୁ ସେ ତୁମ ହାତରେ ପଡ଼ିଗଲେ। ଆଜି ମୁଁ, ତାଙ୍କର ପୁତ୍ର, ତୁମ ସମ୍ମୁଖରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ—ଏବେ ମୋ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କର।”

Verse 5

इत्येवमुक्त्वा संक्रुद्धो वज़दत्तो नराधिप: । प्रेषयामास कौरव्य वारणं पाण्डवं प्रति,कुरुनन्दन! ऐसा कहकर क्रोधमें भरे हुए राजा वज्रदत्तने पुनः पाण्डुपुत्र अर्जुनकी ओर अपने हाथीको हाँक दिया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ କୌରବନନ୍ଦନ! ଏପରି କହି କ୍ରୋଧରେ ଦଗ୍ଧ ରାଜା ବଜ୍ରଦତ୍ତ ପୁନର୍ବାର ପାଣ୍ଡବ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ପ୍ରତି ନିଜ ହାତୀକୁ ହଂକାଇଲା।

Verse 6

सम्प्रेष्यमाणो नागेन्द्रो वजदत्तेन धीमता । उत्पतिष्यन्निवाकाशमभिदुद्राव पाण्डवम्‌,बुद्धिमान्‌ वज्रदत्तके द्वारा हाँके जानेपर वह गजराज पाण्डुपुत्र अर्जुनकी ओर इस प्रकार दौड़ा, मानो आकाशमें उड़ जाना चाहता हो

ବୁଦ୍ଧିମାନ ବଜ୍ରଦତ୍ତଙ୍କ ପ୍ରେରଣାରେ ସେ ଗଜେନ୍ଦ୍ର ପାଣ୍ଡବ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ଦିଗକୁ ଏମିତି ଧାଇଲା, ଯେନେ ଆକାଶକୁ ଉଡ଼ିଯିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ।

Verse 7

अग्रहस्तसुमुक्तेन शीकरेण स नागराट्‌ | समौक्षत गुडाकेशं शैलं नीलमिवाम्बुद:,उस गजराजने अपनी सूँडसे छोड़े गये जलकणोंद्वारा गुडाकेश अर्जुनको भिगो दिया। मानो मेघने नील पर्वतपर जलके फुहारे डाल दिये हों

ସେ ଗଜରାଜ ନିଜ ସୁଣ୍ଡର ଅଗ୍ରଭାଗରୁ ଛାଡ଼ା ଜଳକଣାଦ୍ୱାରା ଗୁଡାକେଶ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ଭିଜାଇଦେଲା; ଯେନେ ମେଘ ନୀଳ ପର୍ବତ ଉପରେ ଜଳଛିଟା ବର୍ଷାଇଛି।

Verse 8

स तेन प्रेषितो राज्ञा मेघवद्‌ विनदन्‌ मुहुः । मुखाडम्बरसंह्वादैरभ्यद्रवत फाल्गुनम्‌,राजासे प्रेरित होकर बारंबार मेघके समान गम्भीर गर्जना करता हुआ वह हाथी अपने मुखके चीत्कारपूर्ण कोलाहलके साथ अर्जुनपर टूट पड़ा

ରାଜାଙ୍କ ପ୍ରେରଣାରେ ପଠାଯାଇ ସେ ହାତୀ ମେଘ ପରି ବାରମ୍ବାର ଗମ୍ଭୀର ଗର୍ଜନ କରୁଥିଲା; ମୁଖରୁ ଉଠୁଥିବା କାହଳୀସଦୃଶ କୋଲାହଳ ସହ ଫାଲ୍ଗୁନ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ଉପରେ ଧାଇପଡ଼ିଲା।

Verse 9

स नृत्यत्रिव नागेन्द्रो वज्दत्तप्रचोदितः । आससाद द्रुतं राजन्‌ कौरवाणां महारथम्‌,राजन! वज्रदत्तका हाँका हुआ वह गजराज नृत्य-सा करता हुआ तुरंत कौरव महारथी अर्जुनके पास जा पहुँचा

ରାଜନ୍! ବଜ୍ରଦତ୍ତଙ୍କ ହାଙ୍କାରେ ସେ ଗଜେନ୍ଦ୍ର ନୃତ୍ୟ କରୁଥିବା ପରି ଚାଲି ଶୀଘ୍ର ଧାଇ, କୌରବମାନଙ୍କ ମହାରଥୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ନିକଟକୁ ପହଞ୍ଚିଗଲା।

Verse 10

तमायान्तमथालक्ष्य वज्रदत्तस्य वारणम्‌ | गाण्डीवमाश्रित्य बली न व्यकम्पत शत्रुहा,वज्रदत्तके उस हाथीको आते देख शत्रुओंका संहार करनेवाले बलवान्‌ अर्जुन गाण्डीवका सहारा लेकर तनिक भी विचलित नहीं हुए

ବଜ୍ରଦତ୍ତଙ୍କ ସେ ହାତୀ ଆସୁଥିବା ଦେଖି, ଶତ୍ରୁସଂହାରକ ବଳବାନ ଅର୍ଜୁନ ଗାଣ୍ଡୀବକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି କିଛିମାତ୍ରେ ଡଗମଗାଇଲେ ନାହିଁ।

Verse 11

चुक्रोध बलवच्चापि पाण्डवस्तस्य भूपते: । कार्यविघ्नमनुस्मृत्य पूर्ववैरं च भारत,भरतनन्दन! वज्रदत्तके कारण जो कार्यमें विघ्न पड़ रहा था, उसको तथा पहलेके वैरको याद करके पाण्डुपुत्र अर्जुन उस राजापर अत्यन्त कुपित हो उठे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କାର୍ଯ୍ୟରେ ପଡ଼ିଥିବା ବିଘ୍ନକୁ ଓ ପୂର୍ବବୈରକୁ ସ୍ମରଣ କରି ପାଣ୍ଡବ ଅର୍ଜୁନ ସେହି ରାଜାଙ୍କ ଉପରେ ଭୟଙ୍କର କ୍ରୋଧିତ ହେଲେ।

Verse 12

ततस्तं॑ वारणं क्रुद्ध: शरजालेन पाण्डव: । निवारयामास तदा वेलेव मकरालयम्‌,क्रोधमें भरे हुए पाण्डुकुमार अर्जुनने अपने बाणसमूहोंद्वारा उस हाथीको उसी तरह रोक दिया, जैसे तटकी भूमि उमड़ते हुए समुद्रको रोक देती है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ କ୍ରୋଧରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ପାଣ୍ଡବ ଅର୍ଜୁନ ଶରଜାଳ ଦ୍ୱାରା ସେହି ହାତୀକୁ ଏମିତି ରୋକିଦେଲେ, ଯେପରି ତଟଭୂମି ମକରାଳୟ ସମୁଦ୍ରକୁ ରୋକେ।

Verse 13

स नागप्रवर: श्रीमानर्जुनेन निवारित: । तस्थौ शरैविंनुन्नाड़: श्वाविच्छललितो यथा,उसके सारे अंगोंमें बाण धँसे हुए थे। अर्जुनके द्वारा रोका गया वह शोभाशाली गजराज काँटोंवाली साहीके समान खड़ा हो गया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଅର୍ଜୁନ ଦ୍ୱାରା ରୋକାଯାଇଥିବା ସେହି ଶ୍ରୀମାନ ଗଜଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଶରବିଦ୍ଧ ଅଙ୍ଗସହ, ସାହି ପରି କାଁଟା ଉଠିଥିବା ଭଳି ନିଶ୍ଚଳ ହୋଇ ଦାଁଡ଼ି ରହିଲା।

Verse 14

निवारितं गजं दृष्टवा भगदत्तसुतो नृपः । उत्ससर्ज शितान्‌ बाणानर्जुनं क्रोधमूर्च्छित:,अपने हाथीको रोका गया देख भगदत्तकुमार राजा वद्भरदत्त क्रोधसे व्याकुल हो उठा और अर्जुनपर तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ନିଜ ହାତୀ ରୋକାଯାଇଥିବା ଦେଖି ଭଗଦତ୍ତପୁତ୍ର ରାଜା କ୍ରୋଧମୂର୍ଛିତ ହୋଇ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ଉପରେ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ବାଣ ଛାଡ଼ିଲେ।

Verse 15

अर्जुनस्तु महाबाहु: शरैररिनिघातिभि: । वारयामास तान्‌ बाणांस्तदद्भुतमिवा भवत्‌,परंतु महाबाहु अर्जुनने अपने शत्रुधाती सायकोंद्वारा उन सारे बाणोंको पीछे लौटा दिया। वह एक अद्भुत-सी घटना हुई

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କିନ୍ତୁ ମହାବାହୁ ଅର୍ଜୁନ ଶତ୍ରୁନିଘାତୀ ଶରଦ୍ୱାରା ସେହି ସମସ୍ତ ବାଣକୁ ରୋକି ପଛକୁ ଫେରାଇଦେଲେ; ସେ ଦୃଶ୍ୟ ଅଦ୍ଭୁତ ପରି ଲାଗିଲା।

Verse 16

ततः पुनरभिक्रुद्धों राजा प्राग्ज्योतिषाधिप: । प्रेषयामास नागेन्द्रं बलवत्‌ पर्वतोपमम्‌,तब प्राग्ज्योतिषपुरके स्वामी राजा वचद्धदत्तने अत्यन्त कुपित हो अपने पर्वताकार गजराजको पुन: बलपूर्वक आगे बढ़ाया

ତେବେ ପ୍ରାଗ୍ଜ୍ୟୋତିଷପୁରର ଅଧିପତି ରାଜା ପୁଣି ଅତ୍ୟନ୍ତ କ୍ରୋଧିତ ହୋଇ, ପର୍ବତସମ ବଳବାନ ଗଜେନ୍ଦ୍ରକୁ ବଳପୂର୍ବକ ଆଗକୁ ପଠାଇଲେ।

Verse 17

तमापतत्तं सम्प्रेक्ष्य बलवत्‌ पाकशासनि: । नाराचमग्निसंकाशं प्राहिणोद्‌ वारणं प्रति,उसे बलपूर्वक आक्रमण करते देख इन्द्रकुमार अर्जुनने उस हाथीके ऊपर एक अग्निके समान तेजस्वी नाराच चलाया

ସେଇ ବଳବାନ ହାତୀଟି ପୂର୍ଣ୍ଣ ବେଗରେ ଧାଇ ଆସୁଥିବା ଦେଖି, ପାକଶାସନ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ର ଅର୍ଜୁନ ଅଗ୍ନିସମ ଦୀପ୍ତିମାନ ନାରାଚ ବାଣ ତାହା ପ୍ରତି ଛାଡ଼ିଲେ।

Verse 18

स तेन वारणो राजन्‌ मर्मस्वभिहतो भृशम्‌ | पपात सहसा भूमौ वज़रुग्ण इवाचल:,राजन! उस नाराचने हाथीके मर्मस्थानोंमें गहरी चोट पहुँचायी। वह वज्ञके मारे हुए पर्वतकी भाँति सहसा पृथ्वीपर ढह पड़ा

ହେ ରାଜନ! ସେଇ ଅସ୍ତ୍ରରେ ହାତୀର ମର୍ମସ୍ଥାନରେ ଭୟଙ୍କର ଆଘାତ ଲାଗିଲା; ଇନ୍ଦ୍ରବଜ୍ରରେ ଭଙ୍ଗିତ ପର୍ବତ ପରି ସେ ହଠାତ୍ ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଗଲା।

Verse 19

स पतन्‌ शुशुभे नागो धनंजयशराहत: । विशन्निव महाशैलो महीं वज्रप्रपीडित:,अर्जुनके बाणोंसे घायल होकर गिरता हुआ वह हाथी ऐसी शोभा पाने लगा, मानो वज्रके आघातसे अत्यन्त पीड़ित हुआ महान्‌ पर्वत पृथ्वीमें समा जाना चाहता हो

ଧନଞ୍ଜୟଙ୍କ ବାଣରେ ଆହତ ହୋଇ ପଡ଼ୁଥିବା ସେ ଗଜ ମଧ୍ୟ ଶୋଭା ପାଉଥିଲା—ଯେପରି ବଜ୍ରାଘାତରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପୀଡ଼ିତ ମହାପର୍ବତ ଭୂମିରେ ଲୀନ ହେବାକୁ ଯାଉଛି।

Verse 20

तस्मिन्‌ निपतिते नागे वज्रदत्तस्य पाण्डव: । तं॑ न भेतव्यमित्याह ततो भूमिगतं नृपम्‌,वज्रदत्तके उस हाथीके धराशायी होते ही राजा वज्रदत्त स्वयं भी पृथ्वीपर जा पड़ा। उस समय पाण्डुपुत्र अर्जुनने उससे कहा--“राजन्‌! तुम्हें डरना नहीं चाहिये”

ବଜ୍ରଦତ୍ତର ଗଜଟି ପଡ଼ିଯିବା ସହିତ ରାଜା ବଜ୍ରଦତ୍ତ ମଧ୍ୟ ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଲେ। ସେତେବେଳେ ପାଣ୍ଡବ ଅର୍ଜୁନ ତାଙ୍କୁ କହିଲେ—“ରାଜନ! ଭୟ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ।”

Verse 21

जब मैं घरसे प्रस्थित हुआ, उस समय महातेजस्वी राजा युधिष्ठिरने मुझसे कहा --'धनंजय! तुम्हें किसी तरह भी राजाओंका वध नहीं करना चाहिये”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମୁଁ ଘରୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରିବାବେଳେ ମହାତେଜସ୍ବୀ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ମୋତେ କହିଲେ—“ଧନଞ୍ଜୟ! କୌଣସି ପରିସ୍ଥିତିରେ ମଧ୍ୟ ତୁମେ ରାଜାମାନଙ୍କୁ ବଧ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ।”

Verse 22

सर्वमेतन्नरव्याप्र भवत्येतावता कृतम्‌ । योधाश्षापि न हन्तव्या धनंजय रणे त्वया,“पुरुषसिंह! इतना करनेसे सब कुछ हो जायगा। अर्जुन! तुम्हें युद्ध ठानकर योद्धाओंका वध कदापि नहीं करना चाहिये

“ନରବ୍ୟାଘ୍ର! ଏତିକି କଲେ ସବୁ କାମ ସିଦ୍ଧ ହେବ। ଧନଞ୍ଜୟ! ରଣରେ ମଧ୍ୟ ବଧର ନିଶ୍ଚୟ କରନି; ଯୋଧାମାନଙ୍କୁ ବଧ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ।”

Verse 23

अब्रवीद्धि महातेजा: प्रस्थितं मां युधिष्ठिर: । राजानस्ते न हन्तव्या धनंजय कथंचन,वक्तव्याश्नापि राजान: सर्वे सहसुहृज्जनै: । युधिष्ठिरस्याश्वमेधो भवद्धिरनुभूयताम्‌ “तुम सभी राजाओंसे कह देना कि आप सब लोग अपने सुहृदोंके साथ पधारें और युधिष्ठिरके अश्वमेधयज्ञ-सम्बन्धी उत्सवका आनन्द लें”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମୁଁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରୁଥିବାବେଳେ ମହାତେଜସ୍ବୀ ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—“ଧନଞ୍ଜୟ! ସେ ରାଜାମାନଙ୍କୁ କୌଣସି ପରିସ୍ଥିତିରେ ମଧ୍ୟ ବଧ କରନି। ବରଂ ସମସ୍ତ ରାଜାଙ୍କୁ ତାଙ୍କ ସୁହୃଦ ଓ ମିତ୍ରମାନଙ୍କ ସହ କହିଦିଅ—‘ଆସି ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଅଶ୍ୱମେଧ-ଉତ୍ସବର ଆନନ୍ଦ ନିଅ’।”

Verse 24

इति भ्रातृवच: श्रुत्वा न हन्मि त्वां नराधिप । उत्तिष्ठ न भयं ते$स्ति स्वस्तिमान्‌ गच्छ पार्थिव,“नरेश्वर! भाईके इस वचनको सुनकर इसे शिरोधार्य करके मैं तुम्हें मार नहीं रहा हूँ। भूपाल! उठो, तुम्हें कोई भय नहीं है। तुम सकुशल अपने घरको लौट जाओ

ଭାଇର ବଚନ ଶୁଣି ସେ କହିଲା—“ନରାଧିପ! ଭ୍ରାତୃବଚନକୁ ଶିରୋଧାର୍ଯ୍ୟ କରି ମୁଁ ତୁମକୁ ବଧ କରିବି ନାହିଁ। ଉଠ; ତୁମର ଭୟ ନାହିଁ। ପାର୍ଥିବ! କୁଶଳରେ ଘରକୁ ଯାଅ।”

Verse 25

आगच्छेथा महाराज परां चैत्रीमुपस्थिताम्‌ । यदाश्वमेधो भविता धर्मराजस्य धीमत:,“महाराज! आगामी चैत्रमासकी उत्तम पूर्णिमा तिथि उपस्थित होनेपर तुम हस्तिनापुरमें आना। उस समय बुद्धिमान्‌ धर्मराजका वह उत्तम यज्ञ होगा”

“ମହାରାଜ! ଚୈତ୍ରମାସର ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପୂର୍ଣ୍ଣିମା ଆସିଲେ ହସ୍ତିନାପୁରକୁ ଆସ। ସେ ସମୟରେ ଧୀମାନ ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ଅଶ୍ୱମେଧ ଯଜ୍ଞ ହେବ।”

Verse 26

एवमुक्त: स राजा तु भगदत्तात्मजस्तदा । तथेत्येवाब्रवीद्‌ वाक्‍्यं पाण्डवेनाभिनिर्जित:,अर्जुनके ऐसा कहनेपर उनसे परास्त हुए भगदत्तकुमार राजा वज्रदत्तने कहा--“बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा”

ଅର୍ଜୁନ ଏପରି କହିବା ପରେ, ପାଣ୍ଡବଙ୍କ ହାତରେ ପରାଜିତ ଭଗଦତ୍ତପୁତ୍ର ରାଜା ବଜ୍ରଦତ୍ତ କହିଲେ—“ତଥାସ୍ତୁ; ଏମିତିହି ହେବ।”

Verse 75

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अर्जुनका वज्रदत्तके साथ युद्धविषयक पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଆଶ୍ୱମେଧିକପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଅନୁଗୀତାପର୍ବରେ ଅର୍ଜୁନଙ୍କର ବଜ୍ରଦତ୍ତ ସହ ଯୁଦ୍ଧବିଷୟକ ପଞ୍ଚସପ୍ତତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 76

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि वज्रदत्तपराजये षट्सप्ततितमो<ड्ध्याय:

ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଆଶ୍ୱମେଧିକପର୍ବର ଅନୁଗୀତାପର୍ବରେ ବଜ୍ରଦତ୍ତ-ପରାଜୟବିଷୟକ ଷଟ୍ସପ୍ତତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ।

Frequently Asked Questions

The chapter implicitly frames the dilemma of enforcing postwar authority: Arjuna must protect a sacred state-ritual and uphold sovereignty while responding proportionately to challengers motivated by grievance and inherited enmity.

Even elite capacity can be momentarily disrupted (moha), but dharma in action requires recovery—re-centering attention, restoring disciplined skill, and reasserting order without abandoning the governing obligation.

No explicit phalaśruti appears in this unit; the meta-commentary is conveyed through narrative signs—celestial concern, invocation of victory, and the restoration of tejas—positioning the episode as a case study in resilience and rightful protection.