
Parīkṣit-janma-saṃkaṭa and Kuntī’s petition to Vāsudeva (परिक्षिज्जन्मसंकटं कुन्त्याः प्रार्थना च)
Upa-parva: Vārāṇasī-praveśa and Parīkṣit-janma-saṃkaṭa (episode within Āśvamedhika-parva)
Vaiśaṃpāyana reports that Kṛṣṇa, informed of the Aśvamedha timing, travels with prominent Vṛṣṇis (including Balarāma, Sātyaki/Yuyudhāna, Pradyumna/Raukmiṇeya, Sāmba, Gada, Kṛtavarman, and others) to Vārāṇasī. Dhṛtarāṣṭra and Vidura receive them according to protocol, and Kṛṣṇa resides there honored by Vidura and Yuyutsu. During their stay, Parīkṣit—Janamejaya’s father—is born, but lies motionless, afflicted by the Brahmāstra deployed by Aśvatthāman, intensifying both relief and sorrow among the populace. Kṛṣṇa hastens into the inner quarters, where Kuntī approaches in tears, joined by Draupadī, Subhadrā, and other women. Kuntī addresses Kṛṣṇa as the family’s refuge and invokes his earlier pledge to revive the child born dead. She frames the infant as the remaining support of the Pāṇḍavas, the ancestral offerings of Pāṇḍu, and the continuity of Abhimanyu’s line; she recalls Abhimanyu’s affectionate plans for the child’s future training among the Vṛṣṇis. The women collectively bow and petition Kṛṣṇa to secure the welfare of the lineage. The chapter closes with Kṛṣṇa lifting and consoling Kuntī, signaling imminent intervention.
Chapter Arc: ज्योतिष-शास्त्र के ध्रुव नक्षत्रों (उत्तरा-त्रय, रोहिणी) और ध्रुव-वार (रविवार) का संकेत देकर ब्राह्मण युधिष्ठिर को बताते हैं कि यह समय देव-पूजन और सिद्धि के लिए अत्यन्त अनुकूल है। → राजा युधिष्ठिर ब्राह्मणों की आज्ञा मानकर गिरीश (महादेव) के लिए विधिपूर्वक उपहार-बलि की व्यवस्था करते हैं; पुरोहित अग्नि को आज्य से तर्पित कर मन्त्र-सिद्ध चरु बनाता है, और क्रमशः पुष्प, मोदक, पायस, मांस, फल-गूदा, लावा आदि विविध नैवेद्य जुटाए जाते हैं। साथ ही यक्षों-भूतों के अधिपतियों (कुबेर, मणिभद्र आदि) के लिए भी निवाप, तिलयुक्त अन्न, कृसर (खिचड़ी) और मांस से बलि-क्रम निर्धारित होता है—अनुष्ठान की व्यापकता और सूक्ष्म विधि ही तनाव का स्रोत बनती है। → पुरोहित द्वारा रात्रिचर भूतों के लिए घड़ों में भात भरकर बलि अर्पित की जाती है; युधिष्ठिर सहस्रों गौएँ ब्राह्मणों को दान देते हैं, और धूप-सुगन्ध व पुष्पालंकार से महादेव का स्थान अत्यन्त शोभायमान हो उठता है—यही अनुष्ठान का चरम, जहाँ लोक-देव-यक्ष-भूत सभी को विधि से तृप्त किया जाता है। → कुबेर (धनपति) की भी विचित्र पुष्प, मालपूआ, खिचड़ी आदि से प्रसन्नतापूर्वक पूजा होती है; विधि-पालन, दान और संतोष के साथ युधिष्ठिर का यज्ञ-परिसर शान्त, पवित्र और समृद्धि-संकेत से भर जाता है। → अनुष्ठान से प्रसन्न देव-यक्ष शक्तियाँ आगे किस प्रकार फल प्रदान करेंगी—यह संकेत अगले प्रसंग के लिए छोड़ा जाता है।
Verse 1
>>: बछ। अर: - ज्योतिष शास्त्रके अनुसार तीनों उत्तरा तथा रोहिणी--ये ध्रुवसंज्ञक नक्षत्र हैं। दिनोंमें रविवारको ध्रुव बताया गया है। उत्तरा और रविवारका संयोग होनेपर अमृतसिद्धि नामक योग होता है; अतः इसी योगमें पाण्डवोंके प्रस्थान करनेका अनुमान किया जा सकता है। पजञज्चषष्टितमो< ध्याय: ब्राह्मणोंकी आज्ञासे भगवान् शिव और उनके पार्षद आदिकी पूजा करके युधिष्ठटिरका उस धनराशिको खुदवाकर अपने साथ ले जाना ब्राह्मणा ऊचु क्रियतामुपहारोउद्य त्यम्बकस्य महात्मन: । दत्त्वोपहारं नूपते ततः स्वार्थ यतामहे,ब्राह्मण बोले--नरेश्वरर अब आप परमात्मा भगवान् शंकरको पूजा चढ़ाइये। पूजा चढ़ानेके बाद हमें अपने अभीष्ट कार्यकी सिद्धिके लिये प्रयत्न करना चाहिये
ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ କହିଲେ—ହେ ନରେଶ୍ୱର! ଆଜି ମହାତ୍ମା ତ୍ର୍ୟମ୍ବକ (ଶିବ)ଙ୍କୁ ଉପହାର ଅର୍ପଣ କର। ଉପହାର ଦେଇ ସାରିଲେ ପରେ ଆମ ଅଭିପ୍ରେତ କାର୍ଯ୍ୟସିଦ୍ଧି ପାଇଁ ପ୍ରୟାସ କରିବା ଉଚିତ।
Verse 2
श्रुत्वा तु वचन तेषां ब्राह्मणानां युधिष्ठिर: । गिरीशस्य यथान्यायमुपहारमुपाहरत्,उन ब्राह्मणोंकी बात सुनकर राजा युधिष्ठिरने भगवान् शंकरको विधिपूर्वक नैवेद्य अर्पण किया
ସେହି ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ବିଧିଅନୁସାରେ ଗିରୀଶ (ଶିବ)ଙ୍କୁ ଉପହାର ଅର୍ପଣ କଲେ।
Verse 3
आज्येन तर्पयित्वाग्निं विधिवत् संस्कृतेन च । मन्त्रसिद्धं चरुं कृत्वा पुरोधा: स ययौ तदा,तत्पश्चात् उनके पुरोहितने विधिपूर्वक संस्कार किये हुए घृतके द्वारा अग्निदेवको तृप्त करके मन्त्रसिद्ध चरु तैयार किया और भेंट अर्पित करनेके लिये वे देवताके समीप गये
ତାପରେ ପୁରୋହିତ ସଂସ୍କୃତ ଘୃତଦ୍ୱାରା ବିଧିଅନୁସାରେ ଅଗ୍ନିଙ୍କୁ ତର୍ପଣ କରି, ମନ୍ତ୍ରସିଦ୍ଧ ଚରୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ କରି ସେତେବେଳେ (ଅର୍ପଣ ପାଇଁ) ଅଗ୍ରସର ହେଲେ।
Verse 4
स गृहीत्वा सुमनसो मन्त्रपूता जनाधिप । मोदकै: पायसेनाथ मांसैश्नोपाहरद् बलिम्
ତାପରେ ଜନାଧିପ ରାଜା ମନ୍ତ୍ରପୂତ ଶୁଭ ପୁଷ୍ପାଦି ଗ୍ରହଣ କରି, ମୋଦକ, ପାୟସ ଓ ମାଂସ ଆଦିଦ୍ୱାରା ବିଧିଅନୁସାରେ ବଳି-ଉପହାର ଅର୍ପଣ କଲେ।
Verse 5
सर्व स्विष्टतमं कृत्वा विधिवद् वेदपारग:
ବେଦପାରଗ (ପୁରୋହିତ) ବିଧିଅନୁସାରେ ସର୍ବପ୍ରକାରେ ପରମ-ସ୍ୱିଷ୍ଟତମ କର୍ମ ସମ୍ପନ୍ନ କଲେ।
Verse 6
यक्षेन्द्राय कुबेराय मणिभद्राय चैव ह,तथान्येषां च यक्षाणां भूतानां पतयश्न ये । कृसरेण च मांसेन निवापैस्तिलसंयुतै: ७ ।। इसके बाद यक्षराज कुबेरको, मणिभद्रको, अन्यान्य यक्षोंकी और भूतोंके अधिपतियोंको खिचड़ी, फलके गूदे तथा तिलमिश्रित जलकी अंजलियाँ निवेदन करके उनकी पूजा सम्पन्न की
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ତାପରେ ସେ ଯକ୍ଷରାଜ କୁବେର, ମଣିଭଦ୍ର ଏବଂ ଅନ୍ୟ ଯକ୍ଷମାନେ ଓ ଭୂତମାନଙ୍କ ଅଧିପତିମାନଙ୍କୁ କୃସର (ଖିଚୁଡ଼ି), ମାଂସ ଓ ତିଳମିଶ୍ରିତ ନିବାପ ଅର୍ପଣ କରି ବିଧିପୂର୍ବକ ତାଙ୍କର ପୂଜା ସମାପ୍ତ କଲେ।
Verse 7
तथान्येषां च यक्षाणां भूतानां पतयश्न ये । कृसरेण च मांसेन निवापैस्तिलसंयुतै: ७ ।। इसके बाद यक्षराज कुबेरको, मणिभद्रको, अन्यान्य यक्षोंकी और भूतोंके अधिपतियोंको खिचड़ी, फलके गूदे तथा तिलमिश्रित जलकी अंजलियाँ निवेदन करके उनकी पूजा सम्पन्न की
ସେହିପରି ଅନ୍ୟ ଯକ୍ଷମାନେ ଓ ଭୂତମାନଙ୍କ ଅଧିପତିମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ କୃସର, ମାଂସ ଓ ତିଳମିଶ୍ରିତ ନିବାପ ଅର୍ପଣ କରି ସେ ସମ୍ମାନ କଲେ।
Verse 8
ओदनं कुम्भश: कृत्वा पुरोधा: समुपाहरत् । ब्राह्मणेभ्य: सहस्राणि गवां दत्त्वा तु भूमिप:
କୁମ୍ଭକୁମ୍ଭରେ ଓଦନ (ପକା ଭାତ) ପ୍ରସ୍ତୁତ କରି ପୁରୋହିତ ତାହା ଆଣିଲେ; ଏବଂ ରାଜା ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ସହସ୍ର ସହସ୍ର ଗାଈ ଦାନ କରି ବିଧିଅନୁସାରେ ଅଗ୍ରସର ହେଲେ।
Verse 9
धूपगन्धनिरुद्धं तत् सुमनोभिश्च संवृतम्
ସେ ସ୍ଥାନ ଧୂପର ସୁଗନ୍ଧରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା ଏବଂ ତାଜା ପୁଷ୍ପଗୁଚ୍ଛରେ ଆବୃତ ଥିଲା।
Verse 10
कृत्वा पूजां तु रुद्रस्य गणानां चैव सर्वश:
ରୁଦ୍ରଙ୍କ ପୂଜା କରି ସେ ରୁଦ୍ରଙ୍କ ସମସ୍ତ ଗଣମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ସର୍ବପ୍ରକାରେ ପ୍ରଣାମ କଲେ।
Verse 11
ययौ व्यासं पुरस्कृत्य नृपो रत्ननिर्धि प्रति । भगवान् शिव और उनके पार्षदोंकी सब प्रकारसे पूजा करके महर्षि व्यासको आगे किये राजा युधिष्ठिर उस स्थानको गये, जहाँ वह रत्न एवं सुवर्णकी राशि संचित थी ।। १० न््।! पूजयित्वा धनाध्यक्षं प्रणिपत्याभिवाद्य च,प्रीतिमान् स कुरुश्रेष्ठ खानयामास तद् धनम् | वहाँ उन्होंने नाना प्रकारके विचित्र फूल, मालपूआ तथा खिचड़ी आदिके द्वारा धनपति कुबेरकी पूजा करके उन्हें प्रणाम--अभिवादन किया। तत्पश्चात् उन्हीं सामग्रियोंसे शंख आदि निधियों तथा समस्त निधिपालोंका पूजन करके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी पूजा की। फिर उनसे स्वस्तिवाचन कराकर जन ब्राह्मणोंके पुण्याहघोषसे तेजस्वी हुए शक्तिशाली कुरुश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर बड़ी प्रसन्नताके साथ उस धनको खुदवाने लगे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଧନାଧ୍ୟକ୍ଷ କୁବେରଙ୍କୁ ଯଥାବିଧି ପୂଜା କରି, ପ୍ରଣାମ ଓ ସମ୍ମାନପୂର୍ବକ ଅଭିବାଦନ କରି, ପ୍ରୀତିମନା କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ସେଇ ଧନନିଧିକୁ ଖୋଦାଇଲେ। ଏହା ଲୋଭର ଅର୍ଜନ ନୁହେଁ; ଶ୍ରଦ୍ଧା, ଶିଷ୍ଟାଚାର ଓ ପବିତ୍ର ରୀତିର ସ୍ୱୀକୃତି ସହିତ ସମୃଦ୍ଧି ଧର୍ମସେବାରେ ଲାଗୁ—ଏହି ଭାବ ଥିଲା।
Verse 12
सुमनोभिर्विचित्राभिरपूपै: कूसरेण च । शड्खादींश्व निधीन् सर्वान् निधिपालांश्व सर्वशः
ବିଭିନ୍ନ ସୁନ୍ଦର ଚିତ୍ରବିଚିତ୍ର ପୁଷ୍ପ, ଅପୂପ (ନୈବେଦ୍ୟ ପିଠା) ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଅର୍ପଣଦ୍ରବ୍ୟ ଦ୍ୱାରା ସେମାନେ ଶଙ୍ଖାଦି ସମସ୍ତ ନିଧି ଏବଂ ସେହି ନିଧିମାନଙ୍କର ରକ୍ଷକମାନଙ୍କୁ ସର୍ବପ୍ରକାରେ ପୂଜା କଲେ।
Verse 13
अर्चयित्वा द्विजाग्रयान् स स्वस्ति वाच्य च वीर्यवान् | तेषां पुण्याहघोषेण तेजसा समवस्थित:
ବୀର୍ୟବାନ୍ ରାଜା ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କୁ ଅର୍ଚ୍ଚନା କରି ସେମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସ୍ୱସ୍ତିବାଚନ କରାଇଲେ; ସେମାନଙ୍କ ପୁଣ୍ୟାହଘୋଷରେ ସେ ତେଜସ୍ୱୀ ହୋଇ ସ୍ଥିରଭାବେ ଅବସ୍ଥିତ ରହିଲେ।
Verse 14
ततः पात्री: सकरका बहुरूपा मनोरमा:,कुछ ही देरमें अनेक प्रकारके विचित्र, मनोरम एवं बहुसंख्यक सहस्रों सुवर्णमय पात्र निकल आये। कठौते, सुराही, गडुआ, कड़ाह, कलश तथा कटोरे--सभी तरहके बर्तन उपलब्ध हुए
ତାପରେ ଛୋଟ ଛୋଟ ଅଳଙ୍କାରଯୁକ୍ତ, ବହୁରୂପୀ ମନୋହର ପାତ୍ରଗୁଡ଼ିକ ସହସ୍ର ସହସ୍ର କରି ପ୍ରକଟ ହେଲା—ସବୁ ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ।
Verse 15
भृूज़ाराणि कटाहानि कलशान् वर्धमानकान् | बहूनि च विचित्राणि भाजनानि सहस्रश:,कुछ ही देरमें अनेक प्रकारके विचित्र, मनोरम एवं बहुसंख्यक सहस्रों सुवर्णमय पात्र निकल आये। कठौते, सुराही, गडुआ, कड़ाह, कलश तथा कटोरे--सभी तरहके बर्तन उपलब्ध हुए
ସୁରାହି, କଟାହ, କଳଶ ଓ ବର୍ଧମାନକ—ଏବଂ ନାନାପ୍ରକାର ବିଚିତ୍ର ଭାଜନ ସହସ୍ର ସହସ୍ର କରି ପ୍ରକଟ ହେଲା।
Verse 16
उद्धारयामास तदा धर्मराजो युधिष्ठिर: । तेषां रक्षणमप्यासीन्महान् करपुटस्तथा,धर्मराज युधिष्ठिरने उस समय उन सब बर्तनोंको भूमि खोदकर निकलवाया। उन्हें रखनेके लिये बड़ी-बड़ी संदूर्कें लायी गयी थीं
ସେତେବେଳେ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଭୂମି ଖୋଦାଇ ସେ ସମସ୍ତ ପାତ୍ର-ବାସନକୁ ଉଦ୍ଧାର କରାଇଲେ। ସେଗୁଡ଼ିକର ରକ୍ଷା ପାଇଁ ବଡ଼ ବଡ଼ ସନ୍ଦୁକ ଆଣି ସୁରକ୍ଷିତ ଭାବେ ରଖାଇଲେ; ଅର୍ପିତ ଧନ-ବସ୍ତୁର ସଂରକ୍ଷଣ ରାଜଧର୍ମ ବୋଲି ପ୍ରକାଶ କଲେ।
Verse 17
नद्धं च भाजनं राजंस्तुलार्थमभवन्नूप । वाहन पाण्डुपुत्रस्य तत्रासीत् तु विशाम्पते,राजन्! एक-एक संदूकमें बंद किये हुए बर्तनोंका बोझ आधा-आधा भार होता था। प्रजानाथ! उन सबको ढोनेके लिये पाण्डुपुत्र युधिष्ठिके वाहन भी वहाँ उपस्थित थे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍, ସେ ପାତ୍ରଗୁଡ଼ିକୁ ଦୃଢ଼ଭାବେ ବାନ୍ଧି ସୁରକ୍ଷିତ ଭାବେ ବନ୍ଦ କରାଯାଇଥିଲା, ଏବଂ ତୌଳ ଅନୁସାରେ ଭାର ସମାନ ଭାବେ ବଣ୍ଟିତ ହୋଇଥିଲା। ହେ ପ୍ରଜାନାଥ, ସେଗୁଡ଼ିକୁ ବହନ କରିବାକୁ ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଯାନମାନେ ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲେ।
Verse 18
षष्टिरुष्टसहस्राणि शतानि द्विगुणा हया: । वारणाश्न महाराज सहस्रशतसम्मिता:,महाराज! साठ हजार ऊँट, एक करोड़ बीस लाख घोड़े, एक लाख हाथी, एक लाख रथ, एक लाख छकड़े और उतनी ही हथिनियाँ थीं। गधों और मनुष्योंकी तो गिनती ही नहीं थी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାରାଜ, ଷାଠି ହଜାର ଉଠ ଥିଲେ; ଘୋଡ଼ା ଶତର ଦ୍ୱିଗୁଣ-ଶତ ପ୍ରମାଣରେ ଅତ୍ୟଧିକ ଥିଲେ; ଏବଂ ହାତୀ ଏକ ଲକ୍ଷ ସଂଖ୍ୟାରେ ଥିଲେ।
Verse 19
शकटानि रथाश्रैव तावदेव करेणव: । खराणां पुरुषाणां च परिसंख्या न विद्यते,महाराज! साठ हजार ऊँट, एक करोड़ बीस लाख घोड़े, एक लाख हाथी, एक लाख रथ, एक लाख छकड़े और उतनी ही हथिनियाँ थीं। गधों और मनुष्योंकी तो गिनती ही नहीं थी
ସେତେଇ ସଂଖ୍ୟାରେ ଶକଟ (ଗାଡ଼ି) ଓ ରଥ ଥିଲେ, ଏବଂ ସେତେଇ ସଂଖ୍ୟାରେ ହାତିଣୀମାନେ ମଧ୍ୟ ଥିଲେ। କିନ୍ତୁ, ମହାରାଜ, ଗଧା ଓ ମନୁଷ୍ୟଙ୍କ ସଂଖ୍ୟା ଗଣନାତୀତ ଥିଲା।
Verse 20
एतद् वित्तं तदभवद् यदुद्धप्रे युधिष्ठिर: । षोडशाष्टौ चतुर्विशत्सहस्रं भारलक्षणम्,द्वैपायनाभ्यनुज्ञात: पुरस्कृत्य पुरोहितम् । युधिष्ठिरने वहाँ जितना धन खुदवाया था, वह सोलह करोड़ आठ लाख और चौबीस हजार भार सुवर्ण था। उन्होंने उपर्युक्त सब वाहनोंपर धन लद॒वाकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने पुनः महादेवजीका पूजन किया और व्यासजीकी आज्ञा लेकर पुरोहित धौम्य मुनिको आगे करके हस्तिनापुरको प्रस्थान किया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଯେ ଧନ ସେଠାରେ ଖୋଦାଇ ଉଦ୍ଧାର କରାଇଥିଲେ, ତାହା ଷୋଳ କୋଟି ଆଠ ଲକ୍ଷ ଚବିଶ ହଜାର ଭାର ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା। ଦ୍ୱୈପାୟନ (ବ୍ୟାସ)ଙ୍କ ଅନୁମତି ନେଇ, ପୁରୋହିତଙ୍କୁ ଅଗ୍ରେ ରଖି, ଯୁଧିଷ୍ଠିର ପୁନଃ ମହାଦେବଙ୍କ ପୂଜା କରି ହସ୍ତିନାପୁର ଦିଗକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 21
एतेष्वादाय तद् द्रव्यं पुनरभ्यर्च्य पाण्डव: । महादेवं प्रति ययौ पुरं नागाह्दयं प्रति,द्वैपायनाभ्यनुज्ञात: पुरस्कृत्य पुरोहितम् । युधिष्ठिरने वहाँ जितना धन खुदवाया था, वह सोलह करोड़ आठ लाख और चौबीस हजार भार सुवर्ण था। उन्होंने उपर्युक्त सब वाहनोंपर धन लद॒वाकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने पुनः महादेवजीका पूजन किया और व्यासजीकी आज्ञा लेकर पुरोहित धौम्य मुनिको आगे करके हस्तिनापुरको प्रस्थान किया
ସେଇ ସମସ୍ତ ବାହନରେ ଧନ ଲଦାଇ ପାଣ୍ଡବ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ପୁନର୍ବାର ମହାଦେବଙ୍କୁ ପୂଜା କରି ପ୍ରଣାମ କଲେ। ପରେ ଦ୍ୱୈପାୟନ ବ୍ୟାସଙ୍କ ଅନୁମତି ନେଇ, ପୁରୋହିତ ଧୌମ୍ୟ ମୁନିଙ୍କୁ ଅଗ୍ରେ ରଖି, ନାଗାହୃଦୟ-ପୁର ଦିଗକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 22
000४7 222६ चर ॥ > कु कं |! २0०४० १॥७ ( / हि आ. बा हि गोयुते गोयुते चैव न्यवसत् पुरुषर्षभ:,राजन! वे वाहनोंपर बोझ अधिक होनेके कारण दो-दो कोसपर मुकाम देते जाते थे। द्रव्यके भारसे कष्ट पाती हुई वह विशाल सेना उन कुरुश्रेष्ठ वीरोंका हर्ष बढ़ाती हुई बड़ी कठिनाईसे नगरकी ओर उस धनको ले जा रही थी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ବାହନମାନଙ୍କ ଉପରେ ଭାର ଅତ୍ୟଧିକ ଥିବାରୁ ସେମାନେ ଦୁଇ-ଦୁଇ କ୍ରୋଶ ଅନ୍ତରେ ପଡ଼ାଉ ଦେଉଥିଲେ। ଧନର ଭାରରେ କ୍ଲାନ୍ତ ସେଇ ବିଶାଳ ସେନା, କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୀରମାନଙ୍କ ହର୍ଷ ବଢ଼ାଇ, ମହା କଷ୍ଟରେ ସେଇ ଧନକୁ ନଗର ଦିଗକୁ ନେଇଯାଉଥିଲା।
Verse 23
सा पुराभिमुखा राजन्नुवाह महती चमू: । कृच्छाद् द्रविणभारार्ता हर्षयन्ती कुरूद्वहान्,राजन! वे वाहनोंपर बोझ अधिक होनेके कारण दो-दो कोसपर मुकाम देते जाते थे। द्रव्यके भारसे कष्ट पाती हुई वह विशाल सेना उन कुरुश्रेष्ठ वीरोंका हर्ष बढ़ाती हुई बड़ी कठिनाईसे नगरकी ओर उस धनको ले जा रही थी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ସେଇ ବିଶାଳ ସେନା ନଗର ଦିଗକୁ ଅଗ୍ରସର ହେଲା। ଧନଭାରରେ ପୀଡିତ ହୋଇ ସେ ମହା କଷ୍ଟରେ ଆଗକୁ ବଢ଼ୁଥିଲା; ତଥାପି ସେଇ ଧନ ବହନ କରି କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୀରମାନଙ୍କ ହର୍ଷ ବଢ଼ାଉଥିଲା।
Verse 43
सुमनोभिश्न चित्राभिलजिरुच्चावचैरपि | जनेश्वर! उन्होंने मन्त्रपूत पुष्प लेकर मिठाई, खीर, फलके गूदे, विचित्र पुष्प, लावा (खील) तथा अन्य नाना प्रकारकी वस्तुओंद्वारा उपहार समर्पित किया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନେଶ୍ୱର! ସେମାନେ ମନ୍ତ୍ରପୂତ ପୁଷ୍ପ, ମିଠା ଦ୍ରବ୍ୟ ଓ ପାୟସ (ଖୀର), ଫଳର ଗୁଦା, ବିଚିତ୍ର ବର୍ଣ୍ଣର ପୁଷ୍ପ, ଲାଜା (ଖୀଲ) ଏବଂ ଅନ୍ୟ ନାନା ପ୍ରକାର ବସ୍ତୁ ଉପହାର ରୂପେ ସମର୍ପଣ କଲେ।
Verse 56
किंकराणां तत: पश्चाच्चकार बलिमुत्तमम् | वेदोंके पारंगत विद्वान् पुरोहितने विधिपूर्वक देवताको अत्यन्त प्रिय लगनेवाले समस्त कर्म करके फिर भगवान् शिवके पार्षदोंको उत्तम बलि (भेंट-पूजा) चढ़ायी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ସେ ପ୍ରଥମେ କିଙ୍କରମାନଙ୍କୁ ଉତ୍ତମ ବଳି ଅର୍ପଣ କଲେ। ପରେ ବେଦପାରଙ୍ଗତ ପୁରୋହିତ ବିଧିପୂର୍ବକ ଦେବତାମାନଙ୍କୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରିୟ ଲାଗୁଥିବା ସମସ୍ତ କର୍ମ ସମ୍ପନ୍ନ କରି, ନିୟମାନୁସାରେ ସବୁ ସମାପ୍ତ କରି, ଭଗବାନ ଶିବଙ୍କ ପାର୍ଷଦମାନଙ୍କୁ ପୁନର୍ବାର ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବଳି (ଭେଟ-ପୂଜା) ଅର୍ପଣ କଲେ।
Verse 64
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपरव्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें द्रव्य लानेका उपक्रमविषयक चौंयठवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଅଶ୍ୱମେଧିକ ପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଅନୁଗୀତାପର୍ବରେ ଦ୍ରବ୍ୟ ଆଣିବା ଉପକ୍ରମବିଷୟକ ଚଉଷଠିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 65
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि द्रव्यानयने पज्चषष्टितमो5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें द्रव्यका आनयनविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଅଶ୍ୱମେଧିକ ପର୍ବରେ ଅନୁଗୀତାପର୍ବରେ ଦ୍ରବ୍ୟାନୟନବିଷୟକ ପଞ୍ଚଷଠିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ।
Verse 83
नक्तंचराणां भूतानां व्यादिदेश बलिं तदा | तदनन्तर पुरोहितने घड़ोंमें भात भरकर बलि अर्पित की। इसके बाद भूपालने ब्राह्मणोंको सहस्रों गौएँ देकर निशाचारी भूतोंको भी बलि भेंट की
ସେତେବେଳେ ରାଜା ନିଶାଚର ଭୂତମାନଙ୍କ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ବଳି ଦେବାକୁ ଆଜ୍ଞା କଲେ। ତଦନନ୍ତରେ ପୁରୋହିତ ଘଡ଼ାମାନେ ଭାତ ଭରି ବଳି ଅର୍ପଣ କଲେ। ପରେ ଭୂପାଳ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ସହସ୍ର ସହସ୍ର ଗାଈ ଦାନ କରି, ନିଶାଚର ଭୂତମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ନିୟତ ବଳି ଭେଟିଲେ।
Verse 96
शुशुभे स्थानमत्यर्थ देवदेवस्य पार्थिव । पृथ्वीनाथ! देवाधिदेव महादेवजीका वह स्थान धूपोंकी सुगन्धसे व्याप्त और फूलोंसे अलंकृत होनेके कारण बड़ी शोभा पा रहा था
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ପାର୍ଥିବ, ହେ ପୃଥ୍ୱୀନାଥ! ଦେବାଧିଦେବ ମହାଦେବଙ୍କ ସେଇ ସ୍ଥାନ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଶୋଭା ପାଉଥିଲା। ଧୂପର ସୁଗନ୍ଧରେ ବ୍ୟାପ୍ତ ଓ ପୁଷ୍ପରେ ଅଲଙ୍କୃତ ହୋଇ ତାହା ମହା ଦୀପ୍ତିରେ ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ଥିଲା।
Verse 133
प्रीतिमान् स कुरुश्रेष्ठ खानयामास तद् धनम् | वहाँ उन्होंने नाना प्रकारके विचित्र फूल, मालपूआ तथा खिचड़ी आदिके द्वारा धनपति कुबेरकी पूजा करके उन्हें प्रणाम--अभिवादन किया। तत्पश्चात् उन्हीं सामग्रियोंसे शंख आदि निधियों तथा समस्त निधिपालोंका पूजन करके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी पूजा की। फिर उनसे स्वस्तिवाचन कराकर जन ब्राह्मणोंके पुण्याहघोषसे तेजस्वी हुए शक्तिशाली कुरुश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर बड़ी प्रसन्नताके साथ उस धनको खुदवाने लगे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ପ୍ରୀତିମାନ କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସେଇ ଧନ ଖୋଦାଇବାକୁ ଲାଗିଲେ। ସେଠାରେ ସେ ନାନାପ୍ରକାର ବିଚିତ୍ର ପୁଷ୍ପ, ମାଲପୁଆ ଓ ଖିଚୁଡ଼ି ଆଦି ଦ୍ୱାରା ଧନପତି କୁବେରଙ୍କ ପୂଜା କରି ପ୍ରଣାମ-ଅଭିବାଦନ କଲେ। ପରେ ସେଇ ସାମଗ୍ରୀରେ ଶଙ୍ଖ ଆଦି ନିଧିମାନଙ୍କୁ ଓ ସମସ୍ତ ନିଧିପାଳମାନଙ୍କୁ ପୂଜି, ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ସତ୍କାର କଲେ। ତାପରେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ହାତେ ସ୍ୱସ୍ତିବାଚନ କରାଇ, ପୁଣ୍ୟାହଘୋଷରେ ତେଜସ୍ୱୀ ହୋଇ, ଶକ୍ତିମାନ କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରସନ୍ନତାରେ ସେଇ ଧନ ଖୋଦାଇବାକୁ ପ୍ରବୃତ୍ତ ହେଲେ।
A conflict between irreversible wartime consequences (Brahmāstra’s lingering harm) and the ethical necessity of safeguarding an innocent heir, framed through the family’s appeal to Kṛṣṇa’s responsibility and prior assurance.
The chapter stresses pratijñā-pālana (fidelity to one’s promise) and the dharmic priority of protecting vulnerable life as essential to restoring social order after systemic violence.
No explicit phalaśruti appears in this excerpt; the meta-significance is narrative: Parīkṣit’s survival is positioned as the linchpin for the epic’s dynastic continuation and Janamejaya’s later listening context.