
Abhimanyunidhana-prakāśaḥ — Vasudeva–Kṛṣṇa–Subhadrā–Kuntī śoka-saṃvāda (Disclosure and Consolation)
Upa-parva: Āśvamedhika-parva — Abhimanyu-nidhana-smṛti (Vasudeva–Subhadrā śoka-saṃvāda episode)
Vaiśaṃpāyana reports that Kṛṣṇa, while narrating the war before his father Vasudeva, deliberately passes over Abhimanyu’s death to prevent acute distress (1–3). Subhadrā, learning of her son’s fall in battle, collapses and urges Kṛṣṇa to state the truth; Vasudeva, seeing her, also faints from grief (4–6). Reviving, Vasudeva questions Kṛṣṇa: why the death was concealed, how Abhimanyu was killed, whether he was struck from behind, whether his face was disfigured, and what he said regarding Subhadrā and Vasudeva—framing Abhimanyu as spirited and proud in youthful valor (7–14). Kṛṣṇa replies with a corrective account: Abhimanyu did not retreat or act dishonorably; he fought intensely, slew large numbers, and was exhausted by major adversaries before falling into Duryodhana’s side’s control; he is portrayed as difficult to defeat in single combat and as attaining a heroic destination (16–23). The narrative then shifts to the women’s mourning: Subhadrā’s sister approaches Pṛthā (Kuntī) and Draupadī seeking the children; Kuntī consoles Subhadrā by invoking mortality, kṣatriya lineage, and the assurance of Uttarā’s pregnancy, and she arranges śrāddha-associated giving and donations (24–40). The chapter closes with renewed counsel to abandon consuming grief, framing Abhimanyu’s end as a time-governed event and his posthumous state as honorable (41).
Chapter Arc: वसुदेव कृष्ण से पूछते हैं कि जिसे लोग ‘अद्भुत’ कहते हैं, वह महाभारत-युद्ध वास्तव में कैसा था—और प्रत्यक्षदर्शी से यथातथ्य सुनाने का आग्रह करते हैं। → कृष्ण के सामने युद्ध का विराट विस्तार खुलता है: पाण्डवों का भीष्म, द्रोण, कर्ण, कृप और शल्य जैसे महारथियों से सामना; दिनों-दिन बढ़ती क्षति; धृष्टद्युम्न का सेनानायकत्व और भीम का रक्षक-रूप; फिर भी थकान, निरुत्साह और टूटते रथ-वाहन। → रात में शिबिर में निश्चिन्त सोई पाण्डव-सेना पर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा का धावा—पिता-वध का प्रतिशोध बनकर वह सोते हुए सैनिकों का संहार करता है। → कृष्ण युद्ध का समापन-चित्र देते हैं: अठारह दिनों तक चला लोमहर्षक संग्राम, जिसमें असंख्य पृथिवीपाल मारे गए और स्वर्गगामी हुए; कथा सुनते-सुनते वृष्णियों पर भी दुःख-शोक का भार उतर आता है। → युद्ध-वर्णन के बाद शोक की छाया बनी रहती है—आगे यह पीड़ा वृष्णि-समाज और उत्तरकथा में किस रूप में फूटेगी, इसका संकेत देकर अध्याय विराम लेता है।
Verse 1
वसुदेवजीने पूछा--वृष्णिनन्दन! मैं प्रतिदिन बातचीतके प्रसंगमें लोगोंके मुँहसे सुनता आ रहा हूँ कि महाभारत-युद्ध बड़ा अद्भुत हुआ था। इसलिये पूछता हूँ कि कौरवों और पाण्डवोंमें किस तरह युद्ध हुआ?
ବସୁଦେବ କହିଲେ— “ହେ ବୃଷ୍ଣିନନ୍ଦନ! ପ୍ରତିଦିନ ସାଧାରଣ କଥାବାର୍ତ୍ତାର ପ୍ରସଙ୍ଗରେ ଲୋକମାନଙ୍କ ମୁଖରୁ ମୁଁ ଶୁଣିଆସୁଛି ଯେ ମହାଭାରତ-ଯୁଦ୍ଧ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଅଦ୍ଭୁତ ଥିଲା। ତେଣୁ ମୁଁ ପଚାରୁଛି—କୌରବ ଓ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଯୁଦ୍ଧ କିପରି ହେଲା?”
Verse 2
त्वंतु प्रत्यक्षदर्शी च रूपज्ञश्न महाभुज । तस्मात् प्रब्रृहि संग्रामं याथातथ्येन मेडनघ,महाबाहो! तुम तो उस युद्धके प्रत्यक्षदर्शी हो और उसके स्वरूपको भी भलीभाँति जानते हो: अत: अनघ! मुझसे उस युद्धका यथार्थ वर्णन करो
ବାସୁଦେବ କହିଲେ—ମହାବାହୋ! ତୁମେ ସେଇ ଯୁଦ୍ଧର ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷଦର୍ଶୀ ଓ ଘଟିଥିବାର ସତ୍ୟ ସ୍ୱରୂପକୁ ମଧ୍ୟ ଭଲଭାବେ ଜାଣ। ତେଣୁ, ଅନଘ ବୀର! ଯେପରି ଘଟିଥିଲା ସେପରି ଯଥାର୍ଥ ଭାବେ ମୋତେ ସେଇ ଯୁଦ୍ଧର ବୃତ୍ତାନ୍ତ କୁହ।
Verse 3
यथा तदभवद् युद्ध॑ पाण्डवानां महात्मनाम् । भीष्मकर्णकृपद्रोणशल्यादिभिरनुत्तमम्,महात्मा पाण्डवोंका भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य और शल्य आदिके साथ जो परम उत्तम युद्ध हुआ था, वह किस तरह हुआ?
ବାସୁଦେବ କହିଲେ—ମହାତ୍ମା ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କର ଭୀଷ୍ମ, କର୍ଣ୍ଣ, କୃପ, ଦ୍ରୋଣ, ଶଲ୍ୟ ଆଦି ଅଗ୍ରଣୀ ଯୋଦ୍ଧାମାନଙ୍କ ସହ ଯେ ଅନୁତ୍ତମ ଯୁଦ୍ଧ ହୋଇଥିଲା, ସେ କିପରି ଘଟିଲା? କେମିତି ଭାବେ ତାହା ପ୍ରସାରିତ ହେଲା, କୁହ।
Verse 4
अन््येषां क्षत्रियाणां च कृतास्त्राणामनेकश: । नानावेषाकृतिमतां नानादेशनिवासिनाम्,दूसरे-दूसरे देशोंमें निवास करनेवाले, भाँति-भाँतिकी वेशभूषा और आकृतिवाले जो अस्त्र-विद्यामें निपुण बहुसंख्यक क्षत्रिय वीर थे, उन्होंने भी किस प्रकार युद्ध किया था?
ବାସୁଦେବ କହିଲେ—ଏବଂ ଅନ୍ୟ ଅନେକ କ୍ଷତ୍ରିୟ ଯୋଦ୍ଧା, ଯେମାନେ ଅସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟାରେ ପାରଙ୍ଗତ, ନାନା ଦେଶରେ ବସୁଥିଲେ ଓ ନାନା ବେଶଭୂଷା-ଆକୃତିରେ ଚିହ୍ନିତ ଥିଲେ—ସେମାନେ ମଧ୍ୟ କିପରି ଯୁଦ୍ଧ କଲେ?
Verse 5
वैशम्पायन उवाच इत्युक्त: पुण्डरीकाक्ष: पित्रा मातुस्तदन्तिके । शशंस कुरुवीराणां संग्रामे निधनं यथा,वैशम्पायनजी कहते हैं--माताके निकट पिताके इस प्रकार पूछनेपर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण कौरव वीरोंके संग्राममें मारे जानेका वह प्रसंग यथावत् रूपसे सुनाने लगे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମାତାଙ୍କ ସମୀପରେ ପିତା ଏପରି ପଚାରିବା ସହିତ, ପୁଣ୍ଡରୀକାକ୍ଷ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କୁରୁବୀରମାନଙ୍କର ସଙ୍ଗ୍ରାମରେ ଯେପରି ନିଧନ ହେଲା, ସେହି ପ୍ରସଙ୍ଗକୁ ଯଥାର୍ଥ ଭାବେ କହିବାକୁ ଆରମ୍ଭ କଲେ।
Verse 6
वासुदेव उवाच अत्यद्भुतानि कर्माणि क्षत्रियाणां महात्मनाम् | बहुलत्वान्न संख्यातुं शक््यान्यब्दशतैरपि,श्रीकृष्णने कहा--पिताजी! महाभारत-युद्धमें काममें आनेवाले मनस्वी क्षत्रिय वीरोंके कर्म बड़े अदभुत हैं। वे इतने अधिक हैं कि यदि विस्तारके साथ उनका वर्णन किया जाय तो सौ वर्षोमें भी उनकी समाप्ति नहीं हो सकती
ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କହିଲେ—ପିତାଜୀ! ମହାଭାରତ ଯୁଦ୍ଧରେ ପ୍ରକାଶିତ ମହାତ୍ମା କ୍ଷତ୍ରିୟ ବୀରମାନଙ୍କର କର୍ମ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଅଦ୍ଭୁତ। ସେଗୁଡ଼ିକ ଏତେ ଅଧିକ ଯେ, ବିସ୍ତାରରେ ବର୍ଣ୍ଣନା କରିବାକୁ ଯାଇଲେ ଶତବର୍ଷରେ ମଧ୍ୟ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଗଣନା ସମ୍ଭବ ନୁହେଁ।
Verse 7
प्राधान्यतस्तु गदत: समासेनैव मे शृणु । कर्माणि पृथिवीशानां यथावदमरथद्ुते,अतः देवताओंके समान तेजस्वी तात! मैं मुख्य-मुख्य घटनाओंको ही संक्षेपसे सुना रहा हूँ, आप उन भूपतियोंके कर्म यथावत् रूपसे सुनिये
ହେ ଅମରଦୂତ! ଏବେ ମୁଖ୍ୟ କଥାଗୁଡ଼ିକୁ ବାଛି ସଂକ୍ଷେପରେ ମୋ କଥା ଶୁଣ। ହେ ତାତ, ଦେବତାସମ ତେଜସ୍ବୀ! ମୁଁ ପ୍ରଧାନ-ପ୍ରଧାନ ଘଟଣାମାନେ ମାତ୍ର ସଂକ୍ଷେପରେ କହୁଛି; ତୁମେ ସେଇ ଭୂପତିମାନଙ୍କ କର୍ମକୁ ଯଥାକ୍ରମେ ଓ ଯଥାରୂପେ ଶୁଣ।
Verse 8
भीष्म: सेनापतिरभूदेकादशचमूपति: । कौरव्य: कौरवेन्द्राणां देवानामिव वासव:,जैसे इन्द्र देवताओंकी सेनाके स्वामी हैं, उसी प्रकार कुरुकुलतिलक भीष्म भी श्रेष्ठ कौरववीरोंके सेनापति बनाये गये थे। वे ग्यारह अक्षौहिणी सेनाके संरक्षक थे
ଭୀଷ୍ମ ସେନାପତି ହେଲେ—ଏଗାର ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନାର ଅଧିପତି। କୌରବ ନରେଶମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସେ ଦେବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବାସବ (ଇନ୍ଦ୍ର) ପରି—କୌରବ ସେନାର ଅଗ୍ରଣୀ ରକ୍ଷକ ଓ ନେତା ଭାବେ ନିୟୁକ୍ତ ହେଲେ।
Verse 9
शिखण्डी पाण्डुपुत्राणां नेता सप्तचमूपति: । बभूव रक्षितो धीमान् श्रीमता सव्यसाचिना,पाण्डवोंके सेनानायक शिखण्डी थे, जो सात अक्षौहिणी सेनाओंका संचालन करते थे। बुद्धिमान शिखण्डी श्रीमान् सव्यसाची अर्जुनके द्वारा सुरक्षित थे
ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସେନାନାୟକ ହେଲେ ଶିଖଣ୍ଡୀ—ସାତ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନାର ଅଧିପତି। ସେଇ ଧୀମାନ୍ ଯୋଦ୍ଧା ଶ୍ରୀମାନ୍ ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସୁରକ୍ଷିତ ଥିଲେ।
Verse 10
तेषां तदभवद् युद्ध दशाहानि महात्मनाम् | कुरूणां पाण्डवानां च सुमहल्लोमहर्षणम्,उन महामनस्वी कौरवों और पाण्डवोंमें दस दिनोंतक महान् रोमांचकारी युद्ध हुआ
ସେଇ ମହାତ୍ମା କୌରବ ଓ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଦଶ ଦିନ ଧରି ଯୁଦ୍ଧ ହେଲା—ଅତ୍ୟନ୍ତ ବିଶାଳ, ରୋମହର୍ଷକ ଓ ଭୟାନକ।
Verse 11
ततः शिखण्डी गाड़ेयं युध्यमानं महाहवे । जघान बहुभिर्बाणै: सह गाण्डीवधन्चना,फिर दसवें दिन शिखण्डीने महासमरमें जूझते हुए गंगानन्दन भीष्मको गाण्डीवधारी अर्जुनकी सहायतासे बहुसंख्यक बाणोंद्वारा बहुत घायल कर दिया
ତାପରେ ମହାସମରରେ ଯୁଦ୍ଧ କରୁଥିବା ଗାଙ୍ଗେୟ ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ଶିଖଣ୍ଡୀ—ଗାଣ୍ଡୀବଧାରୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ସହ—ବହୁ ବାଣରେ ବିଦ୍ଧ କଲେ।
Verse 12
अकरोत् स ततः काल॑ शरतल्पगतो मुनि: । अयनं दक्षिण हित्वा सम्प्राप्ते चोत्तरायणे,तत्पश्चात् भीष्मजी बाणशय्यापर पड़ गये। जबतक दक्षिणायन रहा है, वे मुनिव्रतका पालन करते हुए शरशय्यापर सोते रहे हैं। दक्षिणायन समाप्त होकर उत्तरायणके आनेपर ही उन्होंने मृत्यु स्वीकार की है
ବାସୁଦେବ କହିଲେ—ତାପରେ ଶରଶୟ୍ୟାରେ ଶୟିତ ସେଇ ମୁନି ନିଜ ପ୍ରୟାଣର କ୍ଷଣ ନିଜେ ନିର୍ଣ୍ଣୟ କଲେ। ସୂର୍ଯ୍ୟର ଦକ୍ଷିଣାୟନ ଥିବା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ସେ ଦେହ ତ୍ୟାଗ କଲେ ନାହିଁ; ସେ କାଳ ଶେଷ ହୋଇ ଉତ୍ତରାୟନ ଆସିଲେ ତେବେ ମାତ୍ର ମୃତ୍ୟୁ ଗ୍ରହଣ କଲେ—ବ୍ରତନିଷ୍ଠା ଓ କାଳଜୟର ପ୍ରମାଣ ଦେଇ।
Verse 13
ततः सेनापतिरभूद् द्रोणो<स्त्रविदुषां वर: । प्रवीर: कौरवेन्द्रस्य काव्यो दैत्यपतेरिव,तदनन्तर अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ आचार्य द्रोण कौरवपक्षके सेनापति बनाये गये। वे कौरवराजकी सेनाके प्रमुख वीर थे, मानो दैत्यराज बलिकी सेनाके प्रधान संरक्षक शुक्राचार्य हों
ତାପରେ ଅସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟାରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦ୍ରୋଣ ସେନାପତି ହେଲେ। ସେ କୌରବେନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ପ୍ରଧାନ ବୀର—ଯେପରି ଦୈତ୍ୟପତିଙ୍କ ପାଇଁ କାବ୍ୟ (ଶୁକ୍ରାଚାର୍ଯ୍ୟ) ଅଗ୍ରେ ଥାଇ ରକ୍ଷା କରନ୍ତି।
Verse 14
अक्षौहिणीभ्रि: शिष्टाभिननवभिरद्द्धिजसत्तम: । संवृत: समरश्लाघी गुप्त: कृपवृषादिभि:,उस समय मरनेसे बची हुई नौ अक्षौहिणी सेना उन्हें सब ओरसे घेरकर खड़ी थी। वे स्वयं तो युद्धका हौसला रखते ही थे, कृपाचार्य और कर्ण भी सदा उनकी रक्षा करते रहते थे
ସେ ସମୟରେ ଅବଶିଷ୍ଟ ଥିବା ନଅ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ତାଙ୍କୁ ସବୁଦିଗରୁ ଘେରି ରହିଥିଲା। ସେ ନିଜେ ସମରଗର୍ବୀ ଥିଲେ, ଏବଂ କୃପ ଓ ବୃଷ (କର୍ଣ୍ଣ) ଆଦି ସଦା ତାଙ୍କୁ ରକ୍ଷା କରୁଥିଲେ।
Verse 15
धृष्टय्युम्नस्त्वभून्नेता पाण्डवानां महास्त्रवित् । गुप्तो भीमेन मेधावी मित्रेण वरुणो यथा,इधर महान् अस्त्रवेत्ता धृष्टद्युम्न पाण्डवसेनाके अधिनायक हुए। जैसे मित्र वरुणकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार भीमसेन मेधावी धृष्टद्युम्नकी रक्षा करने लगे
ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସେନାନାୟକ ହେଲେ ମହାସ୍ତ୍ରବିଦ୍ ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ। ଯେପରି ମିତ୍ର ବରୁଣଙ୍କୁ ରକ୍ଷା କରନ୍ତି, ସେପରି ମେଧାବୀ ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନଙ୍କୁ ଭୀମ ରକ୍ଷା କଲେ।
Verse 16
स च सेनापरिवृतो द्रोणप्रेप्सुर्महामना: । पितुर्निकारान् संस्मृत्य रणे कर्माकरोन्महत्,पाण्डवसेनासे घिरे हुए महामनस्वी वीर धृष्टद्युम्नने द्रोणके द्वारा अपने पिताके अपमानका स्मरण करके उन्हें मार डालनेके लिये युद्धमें बड़ा भारी पराक्रम दिखाया
ନିଜ ସେନାରେ ପରିବୃତ ମହାମନା ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ ଦ୍ରୋଣଙ୍କୁ ପହଞ୍ଚିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ହେଲେ। ପିତାଙ୍କ ଅପମାନ ସ୍ମରଣ କରି ସେ ରଣରେ ମହାନ୍ ପରାକ୍ରମର କର୍ମ କଲେ।
Verse 17
तस्मिंस्ते पृथिवीपाला द्रोणपार्षतसंगरे । नानादिगागता वीरा: प्रायशो निधनं गता:,धृष्टद्युम्न और द्रोणके उस भीषण संग्राममें नाना दिशाओंसे आये हुए भूपाल अधिक संख्यामें मारे गये
ଦ୍ରୋଣ ଓ ପାର୍ଷତପୁତ୍ର ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନଙ୍କ ଭୟଙ୍କର ସଂଗ୍ରାମରେ ନାନା ଦିଗରୁ ଆସିଥିବା ଅନେକ ବୀର ଭୂପାଳ ବହୁ ସଂଖ୍ୟାରେ ନିହତ ହେଲେ।
Verse 18
दिनानि पज्च तद् युद्धमभूत् परमदारुणम् | ततो द्रोण: परिश्रान्तो धृष्टद्युम्नवशं गत:,उन दोनोंका वह परम दारुण युद्ध पाँच दिनोंतक चलता रहा। अन्तमें द्रोणाचार्य बहुत थक गये और धृष्टद्युम्नके वशमें पड़कर मारे गये
ସେମାନଙ୍କର ସେଇ ପରମ ଦାରୁଣ ଯୁଦ୍ଧ ପାଞ୍ଚ ଦିନ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଚାଲିଲା। ତାପରେ ଦ୍ରୋଣାଚାର୍ଯ୍ୟ ଅତ୍ୟନ୍ତ କ୍ଲାନ୍ତ ହୋଇ ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନଙ୍କ ବଶରେ ପଡ଼ି ନିହତ ହେଲେ।
Verse 19
ततः सेनापतिरभूत् कर्णो दौर्योधने बले । अक्षौहिणीभ्रि: शिष्टाभिवृत: पञचभिराहवे,तत्पश्चात् दुर्योधनकी सेनामें कर्णको सेनापति बनाया गया, जो मरनेसे बची हुए पाँच अक्षौहिणी सेनाओंसे घिरकर युद्धके मैदानमें खड़ा था
ତାପରେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ସେନାରେ କର୍ଣ୍ଣଙ୍କୁ ସେନାପତି କରାଗଲା। ଯୁଦ୍ଧଭୂମିରେ ଅବଶିଷ୍ଟ ପାଞ୍ଚ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ଦ୍ୱାରା ଘେରାଯାଇ ସେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଥିଲେ।
Verse 20
तिस्रस्तु पाण्डुपुत्राणां चम्वो बीभत्सुपालिता: । हतप्रवीरभूयिष्ठा बभूवु: समवस्थिता:,उस समय पाण्डवोंके पास तीन अक्षौहिणी सेनाएँ शेष थीं, जिनकी रक्षा अर्जुन कर रहे थे। उनमें बहुत-से प्रमुख वीर मारे गये थे; फिर भी वे युद्धके लिये डटी हुई थीं
ସେ ସମୟରେ ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ପାଖରେ ତିନି ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ଶେଷ ଥିଲା, ଯାହାକୁ ବୀଭତ୍ସୁ ଅର୍ଜୁନ ରକ୍ଷା କରୁଥିଲେ। ସେମାନଙ୍କର ଅନେକ ପ୍ରମୁଖ ବୀର ନିହତ ହୋଇଥିଲେ; ତଥାପି ସେ ସେନା ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ସଜ୍ଜ ହୋଇ ଦୃଢ଼ ଭାବେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଥିଲା।
Verse 21
ततः पार्थ समासाद्य पतड़ इव पावकम् | पजञ्चत्वमगमत् सौतिर्द्धितीयेडहनि दारुण:,कर्ण दो दिनतक युद्ध करता रहा। वह बड़े क्रूर स्वभावका था। जैसे पतंग जलती आगमें कूदकर जल मरता है, उसी प्रकार वह दूसरे दिनके युद्धमें अर्जुनसे भिड़कर मारा गया
ତାପରେ, ହେ ପାର୍ଥ, କ୍ରୂର ସ୍ୱଭାବର ସୂତପୁତ୍ର କର୍ଣ୍ଣ ତୁମକୁ ସମ୍ମୁଖୀନ ହୋଇ; ଦ୍ୱିତୀୟ ଦିନରେ ପତଙ୍ଗ ଯେପରି ଜ୍ୱଳନ୍ତ ଅଗ୍ନିରେ ପଡ଼ି ନଶ୍ଟ ହୁଏ, ସେପରି ଯୁଦ୍ଧରେ ନିହତ ହେଲେ।
Verse 22
हते कर्णे तु कौरव्या निरुत्साहा हतौजस: । अक्षौहिणीभिस्तिसूभिमरद्रेशं पर्यवारयन्,कर्णके मारे जानेपर कौरव हतोत्साह होकर अपनी शक्ति खो बैठे और मद्रराज शल्यको सेनापति बनाकर उन्हें तीन अक्षौहिणी सेनाओंसे सुरक्षित रखकर उन्होंने युद्ध आरम्भ किया
କର୍ଣ୍ଣ ନିହତ ହେବା ପରେ କୌରବମାନଙ୍କର ଉତ୍ସାହ ଭଙ୍ଗିଗଲା ଓ ବଳ କ୍ଷୀଣ ହେଲା। ତେବେ ମଦ୍ରରାଜ ଶଲ୍ୟଙ୍କୁ ସେନାପତି କରି, ତିନି ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନାରେ ତାଙ୍କୁ ଚାରିଦିଗରୁ ଘେରି ସୁରକ୍ଷା ଦେଇ ସେମାନେ ପୁନର୍ବାର ଯୁଦ୍ଧ ଆରମ୍ଭ କଲେ।
Verse 23
हतवाहनभूयिष्ठा: पाण्डवा5पि युधिष्ठटिरम् । अक्षौहिण्या निरुत्साहा: शिष्टया पर्यवारयन्,पाण्डवोंके भी बहुत-से वाहन नष्ट हो गये थे। उनमें भी अब युद्धविषयक उत्साह नहीं रह गया था तो भी वे शेष बची हुई एक अक्षौहिणी सेनासे घिरे हुए युधिष्ठिरको आगे करके शल्यका सामना करनेके लिये बढ़े
ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କର ମଧ୍ୟ ଅନେକ ଯାନବାହନ ନଷ୍ଟ ହୋଇଯାଇଥିଲା। ଯୁଦ୍ଧୋତ୍ସାହ ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ ମନ୍ଦ ପଡ଼ିଥିଲା; ତଥାପି ଅବଶିଷ୍ଟ ଏକ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନାରେ ଘେରା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଅଗ୍ରେ ରଖି ସେମାନେ ଶଲ୍ୟଙ୍କ ସମ୍ମୁଖୀନ ହେବାକୁ ଆଗେଇଲେ।
Verse 24
अवधीन्मद्रराजानं कुरुराजो युधिष्ठिर: । तस्मिंस्तदार्धदिवसे कृत्वा कर्म सुदुष्करम्,कुरुराज युधिष्ठिरने अत्यन्त दुष्कर पराक्रम करके दोपहर होते-होते मद्रराज शल्यको मार गिराया
କୁରୁରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁଷ୍କର ପରାକ୍ରମ କରି ଅର୍ଧଦିନ ହେବା ପୂର୍ବରୁ ମଦ୍ରରାଜ ଶଲ୍ୟଙ୍କୁ ବଧ କଲେ।
Verse 25
हते शल्ये तु शकुनिं सहदेवो महामना: । आहर्तारें कलेस्तस्य जघानामितविक्रम:,शल्यके मारे जानेपर अमित पराक्रमी महामना सहदेवने कलहकी नींव डालनेवाले शकुनिको मार दिया
ଶଲ୍ୟ ନିହତ ହେବା ପରେ ଅମିତ ପରାକ୍ରମୀ ମହାମନା ସହଦେବ ସେହି କଳହର ମୂଳ ପ୍ରେରକ ଶକୁନିକୁ ବଧ କଲେ।
Verse 26
निहते शकुनौ राजा धार॑राष्ट्र: सुदुर्मना: । अपाक्रामद् गदापाणिहत भूयिष्ठसैनिक:,शकुनिकी मृत्यु हो जानेपर राजा दुर्योधनके मनमें बड़ा दुःख हुआ। उसके बहुत-से सैनिक युद्धमें मार डाले गये थे। इसलिये वह अकेला ही हाथमें गदा लेकर रणभूमिसे भाग निकला
ଶକୁନି ନିହତ ହେବା ପରେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ରାଜା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଗଭୀର ଦୁଃଖରେ ଡୁବିଗଲା। ତାଙ୍କର ଅଧିକାଂଶ ସେନା ନିହତ ହୋଇଥିବାରୁ, ହାତରେ ଗଦା ଧରି ସେ ଏକାକୀ ରଣଭୂମିରୁ ପଛକୁ ହଟିଗଲା।
Verse 27
तमन्वधावत् संक्रुद्धो भीमसेन: प्रतापवान् । हदे द्वैपायने चापि सलिलस्थं ददर्श तम्,इधरसे अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए प्रतापी भीमसेनने उसका पीछा किया और द्वैपायन नामक सरोवरमें पानीके भीतर छिपे हुए दुर्योधनका पता लगा लिया
ଅତ୍ୟନ୍ତ କ୍ରୋଧରେ ଉଦ୍ଦୀପ୍ତ ପ୍ରତାପୀ ଭୀମସେନ ତାହାକୁ ଧାଉଥିଲେ; ଦ୍ୱୈପାୟନ ନାମକ ହ୍ରଦର ଜଳମଧ୍ୟରେ ଲୁଚିଥିବା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ ମଧ୍ୟ ସେ ଦେଖିଲେ।
Verse 28
हतशिष्टेन सैन्येन समन्तात् परिवार्य तम् । अथोपविविशुर्द्वश हृदस्थं पञच पाण्डवा:,तदनन्तर हर्षमें भरे हुए पाँचों पाण्डव मरनेसे बची हुई सेनाके द्वारा उसपर चारों ओरसे घेरा डालकर तालाबमें बैठे हुए दुर्योधनके पास जा पहुँचे
ତାପରେ ହର୍ଷରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ପାଞ୍ଚ ପାଣ୍ଡବ ଅବଶିଷ୍ଟ ସେନାକୁ ସହ ନେଇ ତାହାକୁ ସମସ୍ତ ଦିଗରୁ ଘେରି, ହ୍ରଦମଧ୍ୟରେ ବସିଥିବା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ନିକଟକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ।
Verse 29
विगाहा सलिल त्वाशु वाग्बाणैर्भुशविक्षत: । उत्थाय स गदापाणिरयुद्धाय समुपस्थित:,उस समय भीमसेनके वाग्बाणोंसे अत्यन्त घायल होकर दुर्योधन तुरंत पानीसे बाहर निकला और हाथमें गदा ले युद्धके लिये उद्यत हो पाण्डवोंके पास आ गया
ସେ ସମୟରେ ଭୀମସେନଙ୍କ ବାଗ୍ବାଣରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଆହତ ହୋଇ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ତୁରନ୍ତ ଜଳରୁ ବାହାରିଲେ ଏବଂ ହାତରେ ଗଦା ଧରି ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଉଦ୍ୟତ ହୋଇ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ନିକଟକୁ ଆସିଲେ।
Verse 30
ततः स निहतो राजा धार्तराष्ट्रो महारणे | भीमसेनेन विक्रम्य पश्यतां पृथिवीक्षिताम्,तत्पश्चात् उस महासमरमें सब राजाओंके देखते-देखते भीमसेनने पराक्रम करके धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधनको मार डाला
ତାପରେ ସେଇ ମହାରଣରେ ପୃଥିବୀର ରାଜାମାନେ ଦେଖୁଥିବାବେଳେ ଭୀମସେନ ନିଜ ପରାକ୍ରମରେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ରାଜା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ ନିହତ କଲେ।
Verse 31
ततस्तत् पाण्डवं सैन्यं प्रसुप्तं शिबिरे निशि । निहतं द्रोणपुत्रेण पितुर्वधममृष्यता,इसके बाद रातके समय जब पाण्डवोंकी सेना अपनी छावनीमें निश्चिन्त सो रही थी, उसी समय द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने अपने पिताके वधको न सह सकनेके कारण आक्रमण किया और सबको मार गिराया
ତାପରେ ରାତିରେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସେନା ଶିବିରରେ ନିଶ୍ଚିନ୍ତ ଶୋଇଥିବାବେଳେ, ପିତୃବଧକୁ ସହିନ ପାରି ଦ୍ରୋଣପୁତ୍ର ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା ଆକ୍ରମଣ କରି ସେମାନଙ୍କୁ ନିହତ କଲେ।
Verse 32
हतपुत्रा हतबला हतमित्रा मया सह । युयुधानसहायेन पज्च शिष्टास्तु पाण्डवा:,उस समय पाण्डवोंके पुत्र, मित्र और सैनिक सब मारे गये। केवल मेरे और सात्यकिके साथ पाँचों पाण्डव शेष रह गये हैं
ତାଙ୍କର ପୁତ୍ରମାନେ ନିହତ, ବଳ ଭଙ୍ଗ, ମିତ୍ରମାନେ ବିନଷ୍ଟ। ମୋ ସହ ଏବଂ ଯୁୟୁଧାନ (ସାତ୍ୟକି) ସହାୟ ଥିବାରୁ କେବଳ ପାଞ୍ଚ ପାଣ୍ଡବ ମାତ୍ର ଅବଶିଷ୍ଟ ଅଛନ୍ତି।
Verse 33
सहैव कृपभोजाभ्यां द्रौणिर्युद्धादमुच्यत । युयुत्सुश्चापि कौरव्यो मुक्त:पाण्डवसंश्रयात्,कौरवोंके पक्षमें कृपाचार्य और कृतवर्माके साथ द्रोणपुत्र अश्वत्थामा युद्धसे जीवित बचा है। कुरुवंशी युयुत्सु भी पाण्डवोंका आश्रय लेनेके कारण बच गये हैं
କୃପ ଓ ଭୋଜ (କୃତବର୍ମା) ସହ ଦ୍ରୋଣପୁତ୍ର ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା ଯୁଦ୍ଧରୁ ଜୀବନ୍ତ ମୁକ୍ତ ହେଲା। ଏବଂ କୌରବବଂଶୀ ଯୁୟୁତ୍ସୁ ମଧ୍ୟ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଆଶ୍ରୟ ନେଇଥିବାରୁ ରକ୍ଷା ପାଇଲା।
Verse 34
निहते कौरवेन्द्रे तु सानुबन्धे सुयोधने । विदुर: संजयश्चैव धर्मराजमुपस्थितौ,बन्धु-बान्धवोंसहित कौरवराज दुर्योधनके मारे जानेपर विदुर और संजय धर्मराज युधिष्ठिरके आश्रयमें आ गये हैं
ବନ୍ଧୁ-ବାନ୍ଧବ ସହିତ କୌରବେନ୍ଦ୍ର ସୁୟୋଧନ (ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ) ନିହତ ହେବା ପରେ, ବିଦୁର ଓ ସଞ୍ଜୟ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ନିକଟକୁ ଆସି ଆଶ୍ରୟ ନେଲେ।
Verse 35
एवं तदभवद् युद्धमहान्यष्टादश प्रभो । यत्र ते पृथिवीपाला निहता: स्वर्गमावसन्,प्रभो! इस प्रकार अठारह दिनोंतक वह युद्ध हुआ है। उसमें जो राजा मारे गये हैं, वे स्वर्गलोकमें जा बसे हैं
ପ୍ରଭୋ! ଏଭଳି ଭାବେ ସେଇ ମହାଯୁଦ୍ଧ ଅଠାର ଦିନ ଚାଲିଲା; ଏବଂ ତାହାରେ ନିହତ ହୋଇଥିବା ପୃଥିବୀପାଳ ରାଜାମାନେ ସ୍ୱର୍ଗଲୋକରେ ବାସ କଲେ।
Verse 36
वैशम्पायन उवाच शृण्वतां तु महाराज कथां तां लोमहर्षणाम् । दुःखशोकपरिकक््लेशा वृष्णीनामभवंस्तदा,वैशम्पायनजी कहते हैं--महाराज! रोंगटे खड़े कर देनेवाली उस युद्ध-वार्ताको सुनकर वृष्णिवंशी लोग दुःख-शोकसे व्याकुल हो गये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାରାଜ! ସେଇ ଲୋମହର୍ଷଣ କଥା ଶୁଣୁଥିବାବେଳେ ବୃଷ୍ଣିବଂଶୀମାନେ ଦୁଃଖ, ଶୋକ ଓ କ୍ଲେଶରେ ଆକୁଳ ହୋଇପଡ଼ିଲେ।
Verse 60
इति श्रीमहा भारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि वासुदेववाक्ये षष्टितमो5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपवके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें श्रीकृष्णद्वारा युद्धवृत्तानतका कथनविषयक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଅଶ୍ୱମେଧିକ ପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଅନୁଗୀତା-ପର୍ବରେ ବାସୁଦେବ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ)ଙ୍କ ବଚନସମ୍ବଳିତ ଷଷ୍ଟିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା। ଏଠାରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଯୁଦ୍ଧବୃତ୍ତାନ୍ତକୁ ଯୁଦ୍ଧୋତ୍ତର ଧର୍ମ-ଆଧ୍ୟାତ୍ମିକ ପରିପ୍ରେକ୍ଷ୍ୟରେ ଚିନ୍ତନମୟ ଉପଦେଶରୂପେ କହି ସମାପ୍ତ କରନ୍ତି।
Whether it is ethically permissible to delay painful truth to prevent immediate harm: Kṛṣṇa omits Abhimanyu’s death to protect Vasudeva, but the household’s grief dynamics require timely, accurate disclosure and accountability in narration.
The chapter teaches disciplined grief: acknowledging loss without collapsing into rage or paralysis, interpreting death within kṣatriya duty and kāla, and translating sorrow into socially constructive rites and generosity.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-function is practical and ethical—modeling how truthful narration, consolation, and śrāddha-linked giving stabilize community life after catastrophic events.